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अचानक घॅंुघरू छनकाती एक युवती ने बड़े अदब से सलाम कर, नृत्य शुरू कर दिया। युवती ने रंगीन घाघरा-चोली पहन रखा था। साथ में एक युवक ढोल लिए था। ढोल की थाप पर युवती के पाँव थिरक रहे थे। लोगों की भीड़ आसपास मिसट आई। नृत्य समाप्त कर युवती ने माथे पर छलक आई पसीने की बॅंूदें चुन्नी से पोंछ डालीं। ढोल रखकर युवक ने लोगों के सामने झोली फैला दी। युवती ऋचा के पास आकर जमीन पर बैठ गई।
“तुम दिन भर में कितना कमा लेती हो?”
“हमें क्या पता, उससे पूछो।” युवती ने युवक की ओर इशारा कर दिया।
“क्यों तुम नाचती हो, मेहनत करती हो, पर तुम्हें यह भी नहीं पता कि तुम कितना कमाती हो?”
“ऐ मेम साहब, वह हमारी जोरू है। उसको कमाई से क्या मतलब? जल्दी पैसा देने का …..”
“क्यों, जोरू होने का मतलब कमाई से औरत का कोई मतलब नहीं?” ऋचा का पत्रकार फुँफकार उठा।
“ज्यादा बात नहीं करने का, तमाशा देखो, पैसा देना है तो दो नहीं तो राम-राम।” युवक ने ढोल उठाकर चलने का उपक्रम किया।
“अरे अरे, रूको भाई। ये लो।” जेब से दस रूपए निकालकर विशाल ने युवक की ओर बढ़ा दिए।
“यह क्या, तुमने भी उस आदमी को ही पैसे दिए। औरत के साथ हमेशा ही अन्याय होता है।”
“अरे, जब उस औरत को कुछ अंतर नहीं पड़ता तो तुम क्यों बेकार अपना सिर खपा रही हो। तुम्हारा पारा नीचे उतारने के लिए, लगता है, कोल्ड ड्रिंक ही काफ़ी नहीं है, आइसक्रीम लानी होगी।” विशाल ने बात हॅंसी में उड़ानी चाही।
“तुम भी तो पुरूष हो, विशाल। तुम्हारा सोच अलग कैसे होगा?”
“तुम तो छोटी-सी बात का बतंगड़ बना रही हो। हम जब शादी करेंगे, तब तुम अपना वेतन बिल्कुल अलग रखना।”
“वाह, जनाब, कुछ मुलाकातों में शादी तक पहुँच गए। इस भुलावे में मत रहिएगा। अब चलें, मुझे आॅफिस में सुनीता की खबर भी छपने को देनी है।”
“तुम्हारा काम तो मेरा समय छीन लेता है। थोड़ी देर और रूको न?”
“अच्छा जी, अब आपको भी हमारे काम से शिकायत होने लगी, शिकायत के लिए तो मेरी माँ ही काफ़ी हैं।”
“भला तुम्हारी माँ को तुम्हारे काम से क्या शिकायत हो सकती है। घर में अपना वेतन नहीं देतीं, क्या?”
“मज़ाक छोड़ो। एक तो लड़की, उसपर कुँवारी। भला माँ मेरे पैसों को हाथ लगाएगी? आज भी बाहर काम करने वाली लड़कियों की यही नियति है, विशाल। घर-बाहर के सारे काम करने पर भी बेटी को बेटे वाला सम्मान नहीं मिल पाता।” ऋचा कुछ उदास हो आई।
“ज़माना बदल रहा है, एक दिन तुम्हारी माँ भी तुम्हारा महत्त्व समझेंगी, ऋचा। चलो, तुम्हें तुम्हारें कार्यालय तक पहुँचा आऊॅं।”
यूनीवर्सिटी की फ़ाइनल परीक्षाएँ शुरू हो जाने की वजह से ऋचा, विशाल, नीरज, स्मिता सभी व्यस्त हो गए। ऋचा ने अखबार के दफ्तर से भी छुट्टी ले रखी थी। छुट्टी के लिए एप्लीकेशन देती ऋचा से सीतेश ने परिहास किया था-
“जब तक आप छुट्टी पर हैं, न किसी लड़की का बलात्कार होगा, न कोई औरत दहेज के लिए जलाई जाएगी।”
“ये तो रोज की कहानियाँ हैं, सीतेश। मेरे रहने न रहने से क्या फर्क पड़ता है?”
“पड़ता है, ऋचा जी। आप तो खोज-खोजकर ये खबरें लाती थी। दूसरों का शायद इन घटनाओं में उतना इन्टरेस्ट न हो।”
“ठीक कहते हो, सीतेश। जब तक रिपोर्टर ऐसी घटनाओं के साथ जुड़ाव न महसूस करें, उन्हें फर्क नहीं पड़ेगा। किसी शीला, लीला से उन्हें क्या लेना-देना।” ऋचा उदास हो आई।
“अरे अरे… आप तो सीरियस हो गई। मैंने तो मज़ाक किया था। हम हृदयहीन नहीं हैं, ऋचा जी, पर शायद जिस तरह आप इन घटनाओं से जुड़ जाती हैं, हम नहीं जुड़ पाते। विश्वास रखिए, ऐसी कोई भी दुःखद घटना नजर अन्दाज नहीं की जाएगी।”
“थैंक्स सीतेश!”