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ऋचा (उपन्यास)

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घर के काम निबटाना सबकी मजबूरी थी, वरना आजकल टी.वी. सीरियल के मुकाबले उन्हें ऋचा की कहानी में ज्यादा मज़ा आ रहा था।

थाने में ऋचा को देख इन्स्पेक्टर कुलकर्णी हक्का-बक्का रह गया।

“आप……….. खुद यहाँ आई हैं?”

“जी हाँ, मैं जानना चाहता हूँ, केस की क्या स्थिति है? तीनों अभियुक्त कहाँ हैं?”

“जी…….. उन्हें तो कल ज़मानत पर छोड़ दिया गया है। उनपर मुकदमा चलाया जाएगा।” इन्स्पेक्टर हड़बड़ा-से गए।

“ज़मानत पर छोड़ दिया गया ताकि बाहर जाकर किसी और लड़की का बलात्कार करें?” ऋचा की आँखों से चिनगारियाँ छूट रही थीं।

“देखिए, कोर्ट के आर्डर के सामने हमारी बात नहीं चल सकती।”

“ठीक है मि. कुलकर्णी, मैं देखती हूँ, क्या किया जा सकता है।”

उत्तेजित ऋचा सीधी चीफ़ जस्टिस गर्ग के घर पहुँच गई। दरबान के रोकने की परवाह न कर, डोर-बेल बजाती गई। दरवाजा खुलते ही ऋचा अन्द प्रविष्ट हो गई।

चीफ जस्टिस गर्ग ब्रेकफास्ट ले रहे थे। ऋचा को देख चेहरे पर नाराज़गी-सी उभर आई। नाराज़गी की परवाह न कर, संक्षेप में ऋचा ने अपना केस सुना दिया।

“आप मुझसे क्या चाहती हैं? अन्ततः हर बात का एक तरीका होता है। इस तरह बिना इजाज़त घर में घुस आना अपराध है। आपको सज़ा दी जा सकती है। कानून का अपना नियम है। हर फैसला नियम-कानून के अधीन किया जाता है।”

“किस कानून की बात आप कर रनहे हैं, सर? जहाँ एक लड़की का तीन-तीन युवक सामूहिक बलात्कार करने के बाद खुले घूम रहे हैं और फ़रियादी लड़की को कानून के नियम-कायदे समझाए जाते हैं?”

“कोर्ट के फ़ैसलों में वक्त तो लगता ही है। तुम्हें सब्र से काम लेना चाहिए।”

“सब्र रखने की बात कहना बहुत आसान है, अगर यही हादसा आपकी अपनी बेटी के साथ होता तो क्या आप इसी सब्र से काम लेते? नहीं सर, नहीं। जब तक बलात्कार झेलनेवाली लड़की के साथ आप जुड़ाव न महसूस करेंगे, तब तक रोज़ किसी शीला, मीना, लीला, रमा का बलात्कार होता रहेगा। कुछ देर के लिए मुझमें अपनी बेटी को देख लीजिए, सर, तब आप उस पिता के हाहाकार को समझ सकेंगे, जो आज मेरे पिता सह रहे हैं।”

चीफ़ जस्टिस गर्ग मौन रह गए। उनकी पत्नी की आँखों में आँसू आ गए।

“मैं तुम्हारा दर्द समझ रही हूँ, बेटी। मुझे खुशी है, तुमने हिम्मत नहीं हारी। मेरा आशीर्वाद है, तुम्हें कामयाबी मिले।”

“ठीक हैं, तुम अपना मुकदमा दाखिल कराओ। विश्वास रखो, तुम्हारे साथ अन्याय नहीं होगा।”

“थैंक्यू, सर!”

ऋचा का चेहरा चमक उठा। रास्ते में महिलाओं का जुलूस जोरदार नारों के साथ सड़क पर उतर आया था। एक बार जुलूस में शामिल होने की इच्छा हो आई, पर अब उसे अपने केस के लिए वकील ढॅूँढ़ना है।
 


घर वापस आती ऋचा को विशाल बेतरह याद आने लगा। काश, आज इस मुश्किल के वक्त विशाल उसके साथ होता, पर वह तो इतना कायर निकला कि झूठी तसल्ली के दो शब्द देने भी नहीं आ सका। ऋचा जानती है, अब वह पहले वाली स्थिति में नहीं है, शादी न सही, दोस्ती तो कायम रखी जा सकती थी। शायद अन्य सामान्य पुरूषों की तरह ही बलात्कार की शिकार लड़की के साथ किसी भी तरह का सम्बन्ध बनाए रखने में उसे अपना सम्मान घटने का डर होगा। इस वक्त ऋचा के सामने सच शीशे की तरह साफ़ था। हाँ, वह विशाल से बहुत प्यार करती है। पर शायद विशाल के लिए ऋचा बस एक समय काटने की साथिन भर थी।

साइकिल रख, बैठक में विशाल को देख, ऋचा चैंक गई। क्या यह सच था!

“तुम…….. यहाँ?”

“हाँ, ऋचा। बड़ी देर से तुम्हारा इन्तज़ार कर रहा हूँ।”

“थैंक्स, विशाल! वैसे यहाँ आने की तो तुम्हें कोई जल्दी नहीं थी।” अनजाने ही ऋचा की आवाज में व्यंग्य उतर आया।

“देर या जल्दी का सवाल तो तब उठता, जब मैं शहर में मौजूद होता, ऋचा।” उदास स्वर में विशाल ने बताया।

“ओह! तो हादसे की बात सुनते ही आप शहर छोड़ गए। ठीक कहा न, विशाल?” अपनी सवालिया आँखें ऋचा ने विशाल पर निबद्ध कर दीं।

“मुझे इतना ही जान सकीं, ऋचा?” आहत स्वर में विशाल ने पूछा।

“तुम्हें जान ही कहाँ सकी, विशाल? मैं तो भ्रम में जीती रही।”

“और मेरी गैरहाज़िरी ने तुम्हारा वह भ्रम तोड़ दिया।”

“शायद, यही सच है।”

“तुम कुछ नहीं जानती, ऋचा। उस रात पिक्चर के बाद जब घर पहुँचा, पापा का मेजेस था, माँ को सीरियस हार्ट-अटैक हुआ था। रात में ही घर के लिए निकल गया। आज लौटते ही तुम्हारे पास आया हूँ।”

“सच कह रहे हो, विशाल?” कुछ अविश्वास से ऋचा ने पूछा।

“माँ की बीमारी का बहाना ओछे इन्सान बना सकते हैं, मैं, वैसा इन्सान नहीं हूँ।”

“अब माँ कैसी हैं?”

“ख़तरे के बाहर हैं, पर छह हफ्तो का बेड़-रेस्ट बताया गया है।”

“इस वक्त तो तुम्हें उनके पास होना चाहिए था, विशाल। “

“मेरा जिसके साथ इस वक्त रहना जरूरी है, उसी के पास आया हूँ, ऋचा। तुम्हारा केस फ़ाइल करना है। सारे पेपर्स तैयार हैं, तुम्हारे सिग्नेचर चाहिए।”

“मुझसे कुछ नहीं पूछोगे, विशाल?” ऋचा की आँखें भर आई।

“जिस ऋचा को इतने करीब से जाना है, उससे कुछ पूछने की क्या सचमुच कोई ज़रूरत है?”

“विशाल, मैंने हर पल तुम्हें याद किया, तुम्हारी कमी महसूस की।” ऋचा की आँखों से आँसू बह निकले।

“छिह, यह कौन-सी ऋचा है? मेरी ऋचा आँसू नहीं बहा सकती।” बड़े प्यार से विशाल ने ऋचा के आँसू पोंछ दिए। ऋचा मुस्करा दी।

“ठहरो, तुम्हारे लिए चाय लाती हूँ।”

“चाय क्यों, मैं तो खाना खाऊॅंगा, अम्मा जी अपने होनेवाले दामाद के लिए खाना बना रही हैं।” शैतानी से विशाल मुस्करा दिया।

“क्या ……… क्या कहा तुमने?”

“वही जो तुमने सुना है। कहो, तुम्हें तो कोई इन्कार नहीं है, ऋचा?”

“नहीं, विशाल। अब स्थिति दूसरी है। तुम्हारे परिवारवालों को बलात्कार की शिकार लड़की स्वीकार नहीं होगी। शायद तुम भी दयावश मुझसे शादी करना चाहो। पर जब भी मुझे देखोगे हमेशा वह हादसा तुम्हें याद आएगा। मैं तुम्हें मुक्त करती हूँ, तुम किसी और लड़की से विवाह कर लो।”

“अरे वाह, पहले खुद प्यार के बन्धन में बाँधा और अब अपनी मर्ज़ी से मुक्त कर दिया। देखो ऋचा, मैं तुम्हारे इशारों पर नाचने वाला गुलाम नहीं, मेरी भी मर्ज़ी है।”

“तुम्हारी क्या मर्ज़ी है, विशाल?”

“मैं तुम्हारे साथ शादी करूँगा। हमारा एक प्यारा-सा घर होगा। घर में ढेर सारे गुलाब खिलेंगे। नन्हे-मुन्ने बच्चे होंगे………”

“बस-बस। अब ये सपने मत दिखाओं। विशाल, मैं नहीं चाहती, शादी का उपकार करके बाद में पछताओ।”

“मैं कोई काम ऐसा नहीं करता, जिसके लिए पछताना पड़े। मैंने एक जुझारू पत्रकार को अपनी पत्नी के रूप में चुना है और मैं चाहता हूँ, मेरी वह कर्मठ पत्रकार जल्दी-से-जल्दी अपने कर्म-क्षेत्र में जुट जाए।” विशाल हॅंस रहा था।

“तुम कितने अच्छे हो, विशाल। अपने चुनाव पर मुझे भी गर्व है।” ऋचा की आँखें चमक उठीं।

खाना खाते, विशाल ने ऋचा के पिता से ऋचा का हाथ माँग सबको चैंका दिया-

“बाबूजी, हम दोनों एक-दूसरे को बहुत चाहते हैं। ऋचा के साथ जल्दी-से-जल्दी विवाह करना चाहता हूँ। हमारे विवाह से बहुत-सी समस्याएँ दूर हो जाएँगी। आपकी अनुमति चाहिए।”

बाबू जी और माँ का चेहरा खुशी से चमक उठा। क्या दुनिया में विशाल जैसे भी लोग हैं?

“जुग-जुग जियो, बेटा, पर क्या तुम्हारे परिवारवाले ऋचा को स्वीकार कर सकेंगे?” पिता ने शंका जताई।

“उनकी आज्ञा लेकर ही आपसे ऋचा का हाथ माँग रहा हूँ। मैं चाहता हूँ, हमारा विवाह सादगी के साथ मन्दिर या आर्य-समाज में सम्पन्न किया जाए।”

“नहीं, बेटा। वर्तमान स्थिति में इस तरह के विवाह को लेकर लोग बातें बनाएँगे। हम चाहते हैं, विवाह पूरे विधि-संस्कार से इस घर से हो।” माँ ने अपने मन की बात कही।
 


“लोगों की परवाह मत करो, माँ। वो तो हर तरह से कुछ-न-कुछ कहने का बहाना खोज ही लेंगे। विशाल ठीक कहते हैं, विवाह में कोई तामझाम नहीं चाहिए।” ऋचा ने अपना निर्णय दे डाला।

“माँ की बीमारी की वजह से मेरे घर से बस मेरी बहन माधवी ही आ सकेगी। यहाँ के मेरे मित्र-बन्धु भी साथ रहेंगे।” विशाल ने स्थिति बता दी।

दो दिन बाद आर्य-समाज-मन्दिर में विवाह होना तय हो गया। बाबू जी और माँ के चेहरों का विषाद छंट गया। इला दीदी और जीजा जी भी पहुँच गए। इला दीदी ने सिलाई का डिप्लोमा ले लिया था। अब उन्हें नौकरी की तलाश है। दीदी का चमकता चेहरा देख, ऋचा खुश हो गई।

आर्य-समाज के प्रबन्धक ने स्वंय ही आदर्श विवाह की सूचना समाचार-पत्रों में छपवा दी। विवाह के समय भारी भीड़ जमा हो गई। लोग विशाल को बधाई देते यह कहना नहीं भूलते कि उसने बड़ी हिम्मत का काम किया है। ची।फ़ जस्टिस को विवाह में सम्मिलित होते देख, लोग ताज्जुब में पड़ गए। ऋचा के सिर पर आशीर्वाद का हाथ धर, उनकी पत्नी ने एक सोने की चेन उसे पहना दी। ऋचा की आँखें भर आई। वह स्नेहमयी स्त्री सचमुच ऋचा की शुभाकांक्षिणी थीं। स्मिता, सुधा, परेश, नीरज, रागिनी सबने अलग-अलग बधाई दी।

विवाह के बाद ऋचा और विशाल को शहर के एम.एल.ए. की कार द्वारा उनके घर तक पहुँचाया गया। विशाल के छोटे से घर मंे कोई सजावट नहीं थी। माधवी ने भाई-भाभी के स्वागत में खीर बनाई थी। सहास्य भाभी को छेड़ती माधवी ने कहा-

“भाभी, भइया को तो आपने उनकी मंजिल तक पहुँचा दिया। अब हमेें एयरफ़ोर्स तक पहुँचाने की जिम्मेदारी उठानी होगी।”

“तुम जिस भाई की बहिन हो, उस बहिन के लिए कुछ भी कर पाना सम्भव होगा, यह मेरा विश्वास है, माधवी। अपना लक्ष्य तुम जरूर पा सकोगी।” ऋचा ने सच्चे मन से आशीर्वाद दिया।

रात के एकान्त में ऋचा ने विशाल से एक अनुरोध किया-

“जब तक मैं अपने अपराधियों को सज़ा नहीं दिलवा लेती, हमारी मधु-यामिनी स्थगित रहेगी। मेरा यह अनुरोध मान सकोगे, विशाल?”

“तुम्हारे मन की आग मैं महसूस कर सकता हूँ, ऋचा। यही ठीक होगा। पहले वकील साहब मुकदमा जीतकर दिखाएँ, फिर मधु-यामिनी मनाएँ। वाह! क्या तुक बनी है।”

विशाल के परिहास पर दोनों जी खोलकर हॅंस पड़े।

अगले कुछ दिन भारी व्यस्तता में कटे। इस बीच युवकों के पिताओं ने ऋचा और विशाल पर हर तरह के दबाव डाले। पैसों से लेकर पाँव पड़कर माफी माँगने तक की बात कही गई, पर ऋचा अविचलित रही। शहर में ऋचा की हिम्मत की दाद दी जाती। अखबार-पत्रिकाओं ने ऋचा को उच्च पद देने के प्रस्ताव रखे, पर ऋचा ने निश्चय कर लिया, अब वह अपना खुद का अखबार निकालेगी, जिसमें सच्ची पत्रकारिता को प्रोत्साहन दिया जाएगा।

विशाल ऋचा के केस की तैयारी में जुटा था, कहीं कोई बात छूट न जाए। सुनीता के केस की तारीख भी आनेवाली थी। अच्छी बात यह हुई कि सुधा के मामले में इन्क्वॅायरी-कमेटी ने सुधा को निर्दोष बताते हुए उसे पुनः नौकरी पर रखने के आदेश दे दिए। सुधा फिर उसी जगह जाने से हिचक रही थी, पर परेश ने हिम्मत दिलाते हुए कहा-

“तुमने अपनी ऋचा दीदी से कोई सीख नहीं ली। उन्होंने किस हिम्मत से अपने बलात्कार की रिपोर्ट न सिर्फ थाने में दर्ज कराई बल्कि अखबारों में छपवाई और एक तुम हो जिसे फिर जॅाब आॅफर किया जा रहा है और तुम ज्वाइन करते डर रही हो। याद रखो, तुम्हारी पुनः नियुक्ति के लिए ऋचा जी ने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है।”
 


“ठीक कहते हो, परेश। अगर मैं ड्यूटी ज्वाइन नहीं करती तो यह ऋचा दीदी की हार होगी और मैं किसी भी हालत में उन्हें हारने नहीं दूँगी।”

परेश और सुधा के साथ स्मिता और नीरज भी आए थे। सुधा को बधाई देती ऋचा सचमुच खुश थी। नीरज बेहद शर्मिन्दा था-

“मुझे क्या माफ़ कर सकती हो, ऋचा? उस दिन होश गॅंवा, न जाने क्या-कुछ कह गया। तुमने सुधा के लिए जो किया, एक भाई होकर भी मैं नहीं कर सका।”

“जाने दो, नीरज। उस दिन तुम नहीं, एक परेशान भाई बोल रहा था। लड़की के साथ कुछ ऊॅंच-नीच हो जाने पर घरवालों की मनोदशा मैं समझ सकती हूँ। हमें इस समाज को बदलना होगा, नीरज।”

“उसकी पहल तो हो चुकी है, ऋचा। सारा शहर तुम्हारे मुकदमे के फ़ैेसले के लिए बेचैन है।” नीरज हॅंस रहा था।

“सुना है, वे तीनों तो गूँगे-से हो गए हैं। उनके बाहर निकलते ही लोग उॅंगलियाँ उठाते हैं। सारी हेकड़ी धरी-की-धरी रह गई।” परेश खुश था।

“इसका श्रेय तो ऋचा दीदी को जाता है। अगर उन्होंने डर के कारण अपनी बात छिपा ली होती तो आज भी वे लोग खुले साँड़-से सड़कों पर घूम रहे होते। मेरा तो जी चाहता है, हम सब मिलकर उन्हें सबक सिखाएँ।” सुधा उत्तेजित थी।

“नहीं, सुधा। मुझे पूरी उम्मीद है, कानून उन्हें कड़ी-से-कड़ी सजा दिलवाएगा। वैसे तुमलोग शादी कब कर रहे हो?”

“जिस दिन उन दुष्ट बलात्कारियों को सज़ा दी जाएगी, आप केस जीत जाएँगी, उसके बाद ही हमारा विवाह होगा। यही हमारा निश्चय है।” दृढ़ स्वर में परेश ने बात कही।

“थैंक्स, परेश, पर यह तो तुम्हारे साथ अन्याय ही होगा।” विशाल ने कृतज्ञता जताई।

“हाँ, ऋचा, तुम्हारे प्रशंसकों में प्रकाश जी का नाम भी जुड़ गया है। जल्दी ही वह तुमसे मिलने आने वाले हैं। रागिनी और प्रकाश आज ही आते, पर स्कूल में कुछ काम निकल आया है।” स्मिता ने मुस्कराकर ऋचा की बड़ाई की।

“अच्छा-अच्छा, हम काफ़ी नाम कमा चुके। अब बता, तेरे जॅाब का क्या रहा? इन दिनों तूने तो मुझे भुला ही दिया न, स्मिता?”

“नहीं, ऋचा, तू क्या भुलाई जा सकनेवाली चीज है। असल में हमारा जी अच्छा नहीं रहता, इसलिए अभी जॅाब की बात छोड़ दी है।” कुछ शर्माती स्मिता ने कहा।

“आप जल्दी ही मौसी बननेवाली हैं, ऋचा जी। भाभी उम्मीद से हैं। एक और खुशखबरी, नीरज भइया बैंक-सर्विस के लिए चुन लिए गए हैं।” सुधा ने दो-दो खुशखबरियाँ दे डालीं।

“अरे वाह! तब तो मिठाई के साथ आना चाहिए था।” ऋचा चहक उठी।

“सोचा तो हमने भी था, फिर लगा, तेरे साथ ऐसा हादसा हुआ, उसके बाद क्या मिठाई लाना ठीक होगा?” कुछ संकोच से स्मिता ने कहा।
 


“ठीक कहती हो, स्मिता। अगर विशाल मेरे साथ न होते तो हिम्मत न हारने पर भी लोगों की नज़रों में मैं बेचारी लड़की भर बनकर रह जाती। अपने खुशहाल जीवन के लिए मैं विशाल की आभारी हूँ। विशाल ने मुझे यह विश्वास दिलाया है कि जो हुआ, वह एक दुर्घटना थी और दुर्घटनाएँ दुःस्वप्नों की तरह भुला दी जानी चाहिए।” कृतज्ञ दृष्टि से ऋचा विशाल को देख, मुस्करा दी।

“अच्छा-अच्छा, अब विशाल-प्रशंसा-पुराण बन्द करो। अपने दोस्तों को बढ़िया-सी कॅाफ़ी पिला दो।”

ऋचा के हटते ही नीरज पूछ बैठा-

“एक बात पूछना चाहता हूँ विशाल, क्या ऋचा के साथ हुए हादसे का तुमपर ज़रा-सा भी असर नहीं हुआ? मेरी बात को अन्यथा मत लेना प्लीज!”

“सच तो यह है, मैं स्तब्ध रह गया था। एक पल को लगा, मेरी दुनिया ही उजड़ गई, सब कुछ ख़त्म हो गया। हाॅस्पिटल में माँ की बेड के पास बैठा जागता रहा। अचानक लगा, ये मैं क्या सोचने लगा। ऋचा को मैंने पूरे मन से चाहा, क्या मात्र शरीर ही सबकुछ हो गया। आखिर लोग विधवा से भी तो विवाह करते हैं। उस स्थिति में तो उसका अपने पति के साथ भावनात्मक जुड़ाव भी रहता होगा। ऋचा तो उनसे नफ़रत करती है। उसके मन ने तो बस मुझे चाहा है, उस मन को कैसे नकार दूँ? बस सारी दुविधा दूर हो गई।” विशाल गम्भीर हो आया।

“वाह विशाल भाई, आपने तो पूरा नज़रिया ही बदल दिया। काश, दूसरे पुरूष भी आपकी तरह ऐसी स्थिति का विश्लेषण कर पाते।” परेश की आँखों में सच्ची प्रशंसा की चमक थी।

“लीजिए गरमा-गरम कॅाफ़ी हाजिर है।” कॅाफ़ी के साथ बिस्किट लेकर ऋचा आ गई।

सबके जाने के बाद ऋचा विशाल से पूछ बैठी-

“विशाल, क्या तुम पहले जैसा सहज अनुभव करते हो या लोगों के सामने एक्टिंग करना तुम्हारी मजबूरी है?”

“मैं कभी अच्छा एक्टर नहीं रहा, ऋचा। क्या तुम मेरे साथ असहज महसूस करती हो?”

“नहीं, विशाल, पर कभी-कभी दुःस्वप्न मुझे जगा जाते हैं। जी चाहता है, अपने हाथों से उन्हें सज़ा दूँ।”

“वक्त सबसे बड़ा मरहम है, वह बड़े-बड़े दुःख भुला देता है, यह तो बस एक हादसा था।” विश्वास से विशाल ने ऋचा की आँखों में आँखें डालकर देखा।

“अच्छा विशाल, तुम मेरे केस को लेकर बिज़ी हो। सुनीता के केस का क्या हो रहा है? “

“पन्द्रह दिसम्बर को उसकी सुनवाई है। सिस्टर मारिया जैसी चश्मदीद गवाह की वजह से उसका केस काफ़ी मजबूत है। सुनीता ने बताया, राकेश उससे माफ़ी माँगने को तैयार है, पर सुनीता उस नरक में वापस नहीं जाना चाहती।”

“बिल्कुल ठीक निर्णय है। राकेश इन्सान नहीं, राक्षस है।”

“और मेरे बारे में आपका क्या ख्याल है, ऋचा जी?” विशाल ने ऋचा को छेड़ा।

“तुम? बस ठीक-ठाक हो।” ऋचा हॅंस पड़ी।

“तुम्हारे लिए एक और खुशखबरी है, तुम अपना अखबार निकालना चाहती हो, उसके लिए चन्द्रमोहन जी पैसा लगाने को तैयार हैं। उन्हें विश्वास है, तुम जैसी कर्मठ संपादिका के साथ अखबार खूब चलेगा।”

“वाह! यह तो सचमुच अच्छी ख़बर है। मैं कल ही से तैयारी में जुट जाती हूँ।” ऋचा खुश हो गई।

ऋचा के मुकदमे के दिन कोर्ट में तिल रखने की जगह नहीं थी। शहर के सारे पत्रकार, युवा पीढ़ी और दूसरे लोग उमड़ पड़े थे।
 


अभियुक्तों की ओर से वकील ने ज़ोरदार शब्दों में दलीलें पेश कर ऋचा के बयान को झूठा सिद्ध करना चाहा, पर ऋचा के निर्भीक बयान में सच्चाई थी। डाॅ. निवेदिता और सिस्टर मारिया ने ऋचा के बयान की पुष्टि कर, ऋचा की सच्चाई पर मुहर लगा दी। डाॅ. निवेदिता की घोषणा से तो कोर्ट में सन्नाटा ही छा गया-

“माई लाॅर्ड, मैं बताना चाहॅूंगी, उस रात ऋचा ने जो कपड़े पहन रखे थे, वे कपड़े मेरे पास सुरक्षित रखे हैं, उन कपड़ों की मदद से डी.एन.ए. जाँच कराई जा सकती है।”

विपक्षी वकील ने बात परिहास में टालनी चाही-

“इसका मतलब डाॅ. निवेदिता डाॅक्टरी के साथ साइड-बिजनेस के रूप में वकीलों के लिए सबूत जमा करने का काम भी करती हैं।”

“जी हाँ, जिस दिन सबूत के अभाव में बलात्कार की शिकार मेरी बहन को कोर्ट से न्याय नहीं मिल सका, उसे आत्महत्या करनी पड़ी, उस दिन से हर बलात्कार की शिकार लड़की की मदद करना मेरा फ़र्ज बन गया है। मेरी आपके लिए भी एक सलाह है। बलात्कारियों को बचाने की जगह उन्हें सज़ा दिलाने में मदद करके पुण्य कमाइए। हो सकता है, जिन्हें आप आज बचा रहे हैं, कल आपकी बेटी का बलात्कार कर डालें।”

कोर्ट में उपस्थित जनसमूह ने तालियाँ बजाकर डाॅ. निवेदिता की बात का समर्थन किया। विपक्षी वकील का चेहरा तमतमा आया।

सिस्टर मारिया ने दृढ़ स्वर में अपनी बात कही-

“मैं एक नर्स हूँ। इन्स्पेक्टर कुलकर्णी के साथ मैं भी उस फ़ार्म-हाउस में गई थी, जहाँ वो तीनों अपनी जीत का जश्न मना रहे थे। पलंग की चादर पर पड़े खून के धब्बे, ऋचा के फाड़े गए कपड़ों के टुकड़े सबूत के रूप में ज़ब्त किए गए थे। मुझे उम्मीद है, इंस्पेक्टर कुलकर्णी ने उन सबूतों को सुरक्षित रखा होगा।”

“जी ……ई …….. हाँ-हाँ …… इन्स्पेक्टर हकला से गए।

“क्या बात हैं, इन्स्पेक्टर आपकी तबीयत तो ठीक है? मैं अदालत में सिस्टर मारिया के बताए गए सबूत पेश करने की इजाज़त चाहता हूँ।” विशाल ने इन्स्पेक्टर की आँखों में आँखें डालकर अपनी बात कही।

इन्स्पेक्टर कुलकर्णी का चेहरा उतर-सा गया। सबूत छिपाने के परिणाम गम्भीर हो सकते हैं। विशाल की धमकी के बाद प्रमाण छिपा सकना असम्भव था। बाजी हारते देख, विपक्षी वकील ने ऋचा से अश्लील प्रश्न पूछकर उसके चरित्र पर उॅंगली उठाने का प्रयास किया-

“सुनते हैं, आप रातों में अक्सर देर तक बाहर रहती थीं। पुरूषों की कम्पनी आप ज्यादा एन्जवाॅय करती थीं, क्या यह सच है?”

“जी हाँ, बिल्कुल सच है। मैं एक पत्रकार हूँ। मेरे कई पुरूष-मित्र हैं, वे मेरा सम्मान करते हैं। हाँ, भेड़ियों से पाला पड़ने का यह मेरा पहला और आख़िरी मौका था।”

“इसे आप आख़िरी मौका कैसे कह सकती हैं। हो सकता है, आप के साथ फिर कोई हादसा हो जाए। देर रात तक बाहर घूमना आपका शौक है।”

“हाँ, अगर भेड़ियों को खुला छोड़ दिया जाए तो वे जरूर फिर शिकार करना चाहेंगे, इसीलिए उन्हें खुला छोड़ना खतरे से खाली नहीं होता। वैसे आपकी तसल्ली के लिए बता दॅूं, अब अगर कभी मुझपर हमला करने की कोशिश की गई तो मैं उसे वहीं ख़त्म कर दूँगी। घायल शेरनी अपना शिकार नहीं छोड़ती।”

जनसमूह ने तालियों के साथ ‘हियर-हियर’, ‘दिस इज दि स्पिरिट’ का शोर मचा दिया। अभियुक्तों के नामों के साथ ‘शेम-शेम’ के नारे लगाए गए। बड़ी मुश्किल से लोगों को शान्त किया जा सका।

मुकदमे की पूरी सुनवाई के बाद मुख्य अभियुक्त जयन्त को दस साल की कैदे बा मशक्कत की सज़ा सुनाई गई। अन्य दो अभियुक्तों को जयन्त का साथ देने तथा दुराचार के लिए सात-सात वर्षो की सज़ा का फ़ैसला दिया गया।

फैसले के बाद विशाल को लोगों ने बधाइयाँ देकर, उसके उज्ज्वल भविष्य की घोषणा कर डाली। ऋचा के चारों ओर पत्रकार घिर आए। वे ऋचा को पत्रकारों की ओर से सम्मानित करने को उत्सुक थे। ढेर सारी फ़ोटो खींच डाली गई।

सीतेश ने कहा-

“ऋचा, आप सचमुच अनुपमा हैं। आपने दिखा दिया, बलात्कार की शिकार लड़की सम्मान की पात्री हो सकती है, बशर्ते वह स्वंय को अपराधिनी मानकर हिम्मत न हार जाए। मुझे आप पर गर्व है।”

घर में मित्रों का जमघट देर रात तक जमा रहा।

नीरज ने पूछा-

“भविष्य के लिए अब तुम दोनों की क्या योजना है? कहीं बाहर हो आओ, मन बदल जाएगा।”

“मेरा मन तो आज ही बदल गया है, नीरज। विशाल मेरा केस तो जीत गए, पर अभी सुनीता को न्याय दिलाना है।” ऋचा गम्भीर थी।

“उसकी चिन्ता मत करो, ऋचा। स्त्रियों को न्याय दिलाने में विशाल को कोई पराजित नहीं कर सकता। मुझे डर है, कहीं यह औरतों के ही वकील बनकर न रह जाएँ।” स्मिता ने चुटकी ली।

“ऐसा न कहो, तब तो ऋचा जी के लिए औरतें खतरा बन जाएँगी।” परेश भी परिहास करने से नहीं चूका।

“अब मज़ाक छोड़ो। बताओ, अपनी शादी में हमें कब बुला रहे हो?” ऋचा ने परेश से पूछा।

“जब बड़े आज्ञा दें, हम तो तैयार बैठे हैं।”

“ठीक है, जल्दी ही तारीख निकलवाते हैं, पर मेहनताना देना होगा।” स्मिता ने परेश को छेड़ा।

“वाह, स्मिता, तू तो बड़ी बातें बनाने लगी है, पर नीरज की नौकरी की दावत भूल ही गई।”
 


“नहीं, ऋचा। हम कुछ नहीं भूले हैं, पर तेरे केस का इतना टेन्शन था कि खुशी मनाने का जी ही नहीं चाहा। अब जल्दी ही सबको घर बुलाकर दावत दूँगी।” स्मिता का चेहरा चमक रहा था।

“स्मिता के पास एक और खुशखबरी है, ऋचा।” मुस्कराते नीरज ने कहा।

“वाह! क्या बात है, स्मिता! तू तो छुपी-रूस्तम निकली। एक के बाद एक सरप्राइज दे रही है। जल्दी बता कौन-सी खुशखबरी है।”

“मम्मी-पापा ने हमे माफ़ कर दिया, ऋचा!” स्मिता का चेहरा खुशी से जगमगा रहा था।

“सच! यह तो सचमुच खुशी की बात है। लगता है, वे नाना-नानी बनने वाले हैं, यह खबर उन तक पहुँच गई। क्यों ठीक कह रही हूँ न?”

“नहीं, ऋचा! उन्हें तो यह बात बाद में पता लगी, पर उसके पहले उन्हें प्रशान्त की सच्चाई पता लग गई थी।”

“प्रशान्त की सच्चाई? क्या मतलब है, तेरा, स्मिता?” ऋचा विस्मित थी।

“हाँ, ऋचा! पपा को उनके यू.एस.ए. के मित्रों से पता लगा, प्रशान्त ने एक अमेरिकी लड़की से विवाह कर रखा था। बूढ़े माँ-बाप की सेवा के लिए उसे स्मिता जैसी एक सीधी-सादी लड़की चाहिए थी।”

“हे भगवान्! तू बाल-बाल बच गई, स्मिता! अगर मुझे वह प्रशान्त नामधारी जीव मिल जाए तो काले पानी की सज़ा दिलवा दूँ।” ऋचा का आक्रोश देख विशाल हॅंस पड़ा।

“ग़नीमत है, प्रशान्त को फाँसी पर नहीं लटकाओगी।”

“यह हॅंसने की बात नहीं हैं, विशाल! विदेश ख़ासकर अमेरिका का भूत आज की युवा पीढ़ी पर इस कदर हावी है कि आँखें बन्द कर लड़कियाँ अमेरिका में बसे लड़कों को चुन लेती हैं। बाद में भले ही आठ-आठ आँसू रोने पड़े।”

“शुक्र भगवान् का, तुम्हें किसी अमेरिका में बसे लड़के ने प्रोपोज नहीं किया। वैसे स्मिता तो सचमुच समझदार निकली, प्रशान्त के आकर्षण से बिल्कुल अछूती रही। विशाल की बात पर सब हॅंस पड़े।”

“इसके लिए तो क्रेडिट मुझे मिलना चाहिए। भई, मै हूँ ही ऐसा इन्सान जिसके आगे प्रशान्त जैसे लोग पानी भरें।” काॅलर उठा, नीरज ने गर्व से कहा।

“यह तो सच बात है। अरे, हम भारतीय युवक तो होते ही कमाल के हैं।” इस बार परेश ने अप्रत्यक्ष रूप में अपनी तारीफ़ कर डाली।

“अब असली बात तो बता, तेरे ममी-पापा ने क्या कहा, स्मिता?”

“सबकुछ बड़े नाटकीय ढंग से हुआ। दरवाजे की दस्तक पर मैंने ही दरवाजा खोला। मम्मी-पापा को देख, बिल्कुल जड़ रह गई।”

मम्मी ने बड़े प्यार से पूछा- “कैसी है, स्मिता बेटी?”

मेरे मॅंुह से कोई जवाब ही नहीं निकला। पीछे से सासू माँ के आ जाने पर बड़ी मुश्किल से कह सकी, “अम्मा जी, ये हमारे मम्मी-पापा हैं।”

सासू माँ की खुशी का ठिकाना न था। थालों में मिठाइयाँ, बड़े-बड़े कीमती उपहारों ने उनके सारे गिले-शिकवे दूर कर दिए।

“इतने दिनों बाद बेटी की सुध ली, समधिन जी। हमने तो बहू से कई बार कहा, माँ के घर हो आओ। अरे, माँ-बाप से भी भला कोई नाराज़ होता है।”

“असल में ग़लती हमारी ही थी। हमने हीरा पहचानने में देर कर दी। कोयले को हीरा समझ बैठे थे।” मम्मी की आवाज में अपराध-बोध स्पष्ट था।

“नीरज बेटा कहाँ है?” इतनी देर बाद पापा के बोल फूटे थे।

“बस आता ही होगा। बैंक में बड़ा अफ़सर है सो काम में देर हो ही जाती है।” गर्व से सासू माँ का चेहरा चमक उठा।

तभी नीरज स्कूटर से आ पहुँचे। स्मिता की जगह नीरज की माँ ने उमग कर समधी-समधिन का परिचय दे डाला।

गम्भीर नीरज ने बस अभिवादन भर किया।

“बैठो, बेटा! बड़े थके-से लग रहे हो?” स्मिता के पापा ने स्नेहपूर्ण स्वर में कहा।

“जी नहीं! यह तो मेरा रोज़ का काम है। अभी फ्रेश होकर आता हूँ।”

नीरज के जाने के बाद सासू माँ भी पीछे-पीछे नाश्ते-चाय का इन्तजाम करने चली गई।

स्मिता से मम्मी ने पूछा- “खुश तो हो, बेटी?”

“हाँ, मम्मी! यहाँ हमें कोई तकलीफ़ नहीं है। सब हमें बहुत प्यार करते है।”

“हमसे ग़लती हो गई, स्मिता बेटी। हम प्रायश्चित करना चाहते हैं। मैं चाहता हूँ, तुम दोनों मेरे नए फ़ार्म-हाउस में शिफ्ट कर जाओ। वह फ़ार्म-हाउस मैंने नीरज के नाम कर दिया है।” पापा ने स्मिता से कहा।

कमरे में आते नीरज के कानों में पापा के वे शब्द पड़ गए थे। शांतिपूर्ण स्वर में कहा-

“नहीं, पापा! हमें बस आपका आशीर्वाद चाहिए। जल्दी ही मुझे घर मिलनेवाला है, आप परेशान न हों। हमे अपने इस छोटे से घर में कोई तकलीफ़ नहीं है।”

“नीरज बेटा! हमसे भूल हो गई। हमारा सबकुछ अन्ततः स्मिता का ही तो है।”

“मैंने पहले ही कह दिया था, मुझे आपके धन से कोई लेना-देना नहीं है। स्मिता से बड़ा धन और क्या होगा और वह धन मेरे पास है।”

“मैं तुम्हारे विचारों की कद्र करना हूँ, नीरज, पर माँ-बाप का भी बेटी के लिए कोई फ़र्ज होता है।”

“इस बारे में आप स्मिता से बात कर लीजिए, पापा! अगर स्मिता कुछ स्वीकार करना चाहे तो मुझे आपत्ति नहीं होगी।”

“पापा, आपने और मम्मी ने पढ़ा-लिखाकर मुझे इस योग्य बनाया है। आपके ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकॅंूगी। आज हमे आशीर्वाद देकर आपने सब कुछ दे दिया। इससे अधिक हमें और कुछ नहीं चाहिए।” स्मिता का गला भर आया।

“मुझे अपनी बेटी पर गर्व है। तुमने सच्चा जीवनसाथी चुना है, स्मिता बेटी! भगवान् तुम दोनों को सदैव सुखी रखंे।”

स्मिता की माँ ने स्मिता के गले में हार पहना, हाथों में कंगन भी पहना दिए। स्मिता के विरोध पर आँसू-भरी आँखों से बोली, “इसे मेरा आशीर्वाद समझ कर स्वीकार कर ले, बेटी! बड़ी साध थी, तेरी शादी खूब धूमधाम से करूँगी, पर अपनी ही ग़लती से वह सुख खो दिया।”

सासू माँ अपने और सुधा-रागिनी के गहने-कपड़े पाकर फूली न समाई। उनके जाने के बाद भी उनके गुण-गान करती रहीं।

स्मिता की बातें सब मन्त्र-मुग्ध सुनते रहे। ऋचा के चेहरे पर गर्व छलक आया।
 


“तूने तो कमाल कर दिया, स्मिता! हाथ आई सुख-सम्पत्ति ठुकरा देना बिरलों को ही सम्भव होता है। तू सचमुच गर्व किए जाने योग्य है।”

“यह बात तो सच है, स्मिता ने जिस वैभव का परित्याग कर मेरे साथ कष्टों का जीवन जिया, वह साधारण लड़की को सम्भव नहीं हो सकता। इतना ही नहीं, फिर पास आए सुख को ठुकराकर, स्मिता मेरी आदर की पात्री बन गई है।” स्मिता पर स्नेहभरी दृष्टि डाल, गर्वित नीरज ने कहा।

“हियर-हियर! ये हुई न बात। भई, नीरज और स्मिता की जोड़ी नम्बर वन सिद्ध हो गई।” विशाल ने ताली बजाकर घोषणा कर दी।

“विशाल भाई, देख लीजिएगा, मेरी और सुधा की जोड़ी भी कम नहीं रहेगी।” परेश ने शान से कहा।

“बाई दि वे, हमारी जोड़ी के बारे में सबकी क्या राय है?” विशाल ने हॅंसकर पूछा।

“अरे, आप दोनों तो हम सबके आदर्श हैं। कोशिश करके भी हम आपसे बराबरी नहीं कर सकते।” पूरी सच्चाई से परेश ने कहा।

बातों में वक्त कब निकल गया, पता ही नहीं लगा। अचानक विशाल की दृष्टि घड़ी पर गई। रात के साढ़े नौ बज रहे थे। ऋचा की ओर देखकर कहा- “लगता है, आज खुशी से ही सबका पेट भर दोगी। खाना खिलाने की ज़रूरत नहीं है।”

विशाल की बात पर सबको उठने का उपक्रम करते देख, ऋचा ने आदेश दे डाला-

“बिना खाना खाए कोई नहीं जाएगा। आधे घण्टे में भोजन सर्व कर दिया जाएगा।”

“लगता है, ऋचा के पास कोई जादुई चिराग है, इतने लोगों के लिए आधे घण्टे में खाना तैयार हो जाएगा।” नीरज ने परिहास किया।

“जी हाँ, मेरे पास एक नहीं, आठ-दस जादुई चिराग़ हैं। आप सब क्या चिराग़ों से कम हैं। सबको हेल्प करनी होगी। ये लीजिए। आप सब मटर छीलिए, स्मिता, तू आलू छील दे। मिनटों में आलू-मटर की सब्जी और पूरी तैयार।”

सबको काम देकर ऋचा रसोई में चली गई। जल्दी-जल्दी आटा गॅंूथ, एक ओर भिण्डी छौंक दी। उतनी देर में स्मिता छीले हुए आलू-मटर ले आई। दोनों ने मिलकर पूरियाँ सेंक डालीं। ठीक आधे घण्टे में खाना मेज पर तैयार रखा था। उसे खाने का स्वाद ही अनोखा था। विशाल बड़ा खुश दिख रहा था।

“भई, यह हमारी ओर से आप सबकी पहली दावत है, यकीन रखिए जल्दी ही आपको शानदार पार्टी मिलेगी।”

“नहीं, विशाल! मैंने तय किया है, जब तक सुनीता को न्याय नहीं मिल जाता, हम ऐसा कोई आयोजन नहीं करेंगे।” गम्भीरता से ऋचा ने कहा।

“आपको क्या शक है कि विशाल सुनीता को न्याय नहीं दिला पाएँगे?” परेश ने जानना चाहा।

“मुझे विशाल की सफलता पर पूरा विश्वास है, पर सुनीता का डर तब तक दूर नहीं होगा, जब तक कोर्ट से उसके पक्ष में फ़ैसला न हो जाए।”

“सुनीता को किस बात का डर है? जब तक कोर्ट में उसका केस विचाराधीन है, उसका पति कोई हिमाकत करने की जुर्रत शायद ही करे।” नीरज ने अपनी राय दी।

“तुम कोर्ट की स्थिति जानते ही हो। पैसों के बल पर झूठेे गवाह खड़े किए जा सकते है। सुनीता को चरित्रहीन सिद्ध करके उससे उसका बच्चा छीना जा सकता है, नीरज।”

“परेशान मत हो, ऋचा! मैने सब तैयारी कर रखी है। सुनीता का बच्चा उसके साथ ही रहेगा।” दृढ़ स्वर में विशाल ने कहा।

दूसरी सुबह ऋचा को कागजों के बीच देख, विशाल ने सहास्य पूछा- “क्या कोई नई रिपोर्ट तैयार की जा रही है? कहीं अपराधी यह बन्दा ही तो नहीं है?”

“अपराधी तो तुम ज़रूर हो, तुमने ही तो अपना अखबार निकालने की सज़ा दी है। उसी की तैयारी कर रही हूँ।”

“वाह, तुम्हारी तत्परता तो माननी पड़ेगी। बात मॅुह से निकली नहीं, और तुम्हारा काम शुरू हो गया। मुझे पूरा विश्वास है, तुम्हारी पत्रिका बहुत सफल रहेगी।”

“विशाल, मैंने तय यिा है, मैं अखबार की जगह एक महिला पत्रिका निकालूँगी। बताओ पत्रिका का नाम ‘तेजस्विनी’ रखूँ या ‘अपराजिता’? इस पत्रिका द्वारा महिलाओं के शोषण और अन्याय के विरूद्ध मुहिम छेड़ी जाएगी।”

“ओह, तब तो डर है, कहीं इसका पहला निशाना मुझपर ही न साधा जाए।”

“ऐसा तो ज़रूर हो सकता है। तैयार रहिए, जनाब। जरा-सी चूक का भारी भुगतान देना पड़ सकता है।”

“इसीलिए तो वकील बना हूँ। ज़रूरत पड़ने पर अपना मुकदमा खुद लड़ सकॅंू।”
 


ऋचा के उत्साह का अन्त नहीं था। पत्रिका की रूपरेखा बनाने मे पूरी तरह से जुट गईं। सुखद आश्चर्य तब हुआ जब सीतेश और एक दो और पुराने सह्कर्मियों ने उसके साथ काम करने की इच्छा व्यक्त की।

अचानक एक दिन सुनीता के पति राकेश को अपने सामने देख ऋचा चैंक गई।

“तुम यहाँ?”

“हाँ, समझौता करना चाहता हूँ।”

“कैसा समझौता?”

“सुनीता को समझाइए, कोर्ट-कचहरी का चक्कर छोड़कर, सीधे-सीधे घरवाली की तरह घर में रहे। चार पैसे क्या कमाती है, दिमाग खराब हो गया।” आवाज में नफ़रत की बू आ रही थी।

“घरवाली बनकर ही तो वह रह रही थी, इसीलिए उसे जलाकर ख़त्म करना चाहा था?”

“गुस्से में तो ऐसा हो ही जाता है। अगर वह मेरा कहा मानकर चलेगी तो ऐसा नहीं होगा।”

“अच्छा, इसका मतलब, जिस दिन तुम्हारी मर्जी के खिलाफ़ कुछ करेगी तो गुस्से में उसे फिर जलाया जा सकता है।” तल्ख़ी से ऋचा ने कहा।

“अब आप तो बात के पीछे ही पड़ गई हैं। आखिर आपको भी वकील साहब की बात मानकर ही तो चलना होगा। आपके साथ जो हुआ, उसके बात क्या दूसरा कोई आपके साथ शादी के लिए तैयार होता? उपकार किया है उन्होंने आपके साथ।” व्यंग्य से होंठ टेढ़े कर राकेश बोला।

“निकल जाओ! गेट आउट! जाओ वरना………” क्रोध से ऋचा का पूरा शरीर काँपने लगा।

“जाता हूँ! सच बात कहने का साहस रखता हूँ। सुनने का साहस रखने की कोशिश कीजिए। आगे-पीछे सब यही बात तो करते हैं।”

राकेश के चले जाने के बाद भी ऋचा बहुत देर तक स्तब्ध बैठी रही। राकेश जैसे निकृष्ट व्यक्ति की बात ने उसे क्यों उद्वेलित कर दिया! वह जानती है, लोग उसे लेकर बातें बनाते हैं, पर ऋचा जैसी लड़की क्यों उन बातों की परवाह करे। उसने निर्णय सोच-समझकर ही लिया था। क्या विशाल के मन में भी कभी ऐसे ही ख्याल आते होंगे।

शाम को विशाल के आने पर पूरी घटना सुनाकर अचानक ऋचा पूछ बैठी-“विशाल, सच कहना, तुम्हारे मन में भी तो कभी यह बात आती होगी?”

“अपने विशाल को बस इतना ही जान सकी हो, ऋचा? तुम जैसी पत्नी पाकर मैं गौरवान्वित हूँ। फिर यह सवाल मत पूछना।” विशाल गम्भीर था।

“माफ़ करना, फिर ऐसी ग़लती नहीं होगी, विशाल।”

सुनीता के पास जाकर ऋचा ने राकेश की बातें बताना ज़रूरी समझा। कहीं ऐसा तो नहीं, सुनीता, राकेश की बातों से सहमत हो जाए। पति आम स्त्री की कमजोरी होता है।

ऋचा से सारी बातें सुनकर सुनीता का चेहरा घृणा से विकृत हो उठा।

“राकेश इन्सान नहीं हैवान है। अपनी हार उसे सहन नहीं है। किसी भी तरीके से वह मुझे फिर हासिल कर, दिखाना चाहता है कि वह पुरूष है, उसकी अधीनता मुझे स्वीकार करनी ही होगी।”

“तुम्हारा पक्का निश्चय है, तुम राकेश के पास वापस नहीं जाना चाहतीं।”

“नहीं, उसके साथ रहने का सवाल ही नहीं उठता। मुझे अपने बेटे का भविष्य बनाना है। उस जैसे शराबी, चरित्रहीन इन्सान के साथ रहकर बेटे का भविष्य नहीं बिगाड़ना है।”

“तब तुम निश्चिंत रहो। तुम केस ज़रूर जीतोगी।”

सुनीता के घर से लौटने के बाद ऋचा बड़ा हल्का महसूस कर रही थी। उसे खुशी थी, सुनीता में अपने अधिकारों के लड़ने की हिम्मत आ गई है। विशाल ने परिहास कर डाला-

“भई मुझे तो डर है, तुम्हारी प्रेरणा से और भी न जाने कितनी पत्नियाँ अपने पतियों को अत्याचार का आरोपी बनाकर, तलाक के मुकदमे न दायर करा दें।”

“अच्छा है, तुम्हारी इनकम तो खूब बढ़ जाएगी। चाहो तो फ़ीस भी बढ़ा सकते हो। मेरा मुकदमा जीतने के बाद जनाब का यश तो खूब फैल गया है।”

“वह तुम्हारा नहीं, मेरा केस था, ऋचा! वैसे मेरा फ़ैसला है, मजबूर स्त्रियों के मुकदमे बिना फ़ीस लडॅंूगा।” विशाल गम्भीर हो आया। ऋचा मुग्ध निहारती रह गई।
 


अन्ततः सुनीता के मुकदमे की तारीख भी आ गई। कोर्ट मंे ऋचा के साथ स्मिता, सुधा, रागिनी, नीरज, परेश सभी उपस्थित थे। सिस्टर मारिया, मुकदमे की ख़ास गवाह थी। ऋचा के समझाने पर मीना के साथ दो पड़ोसी भी राकेश और उसकी माँ के खिलाफ़ गवाही के लिए आ गए थे।

राकेश के खिलाफ़ लगे आरोप सही पाए गए। पत्नी की हत्या के प्रयासों के साथ उसपर हिंसा करने के लिए राकेश और उसकी माँ को दोषी ठहराया गया। राकेश को हत्या के प्रयास के कारण आजीवन कारावास तथा माँ को पाँच वर्षो की सजा सुनाई गई। सुनीता को बेटे की परवरिश का दायित्व दिया गया।

बेटे को गोद में लिए सुनीता की आॅखों में खुशी के आॅसू थे। प्रेस-फोटोग्राफरों ने सुनीता के बेटे सहित फ़ोटो उतार, उसे बधाई दी। सुनीता की माँ और भाई ने विशाल के सामने हाथ जोड़ अपनी कृतज्ञता जताई। माँ ने कहा- “विशाल बेटा, तुमने हमारी बेटी को नई ज़िन्दगी दी है। हम तुम्हारा उपकार कभी नहीं भूलेंगे।” सुनीता की माँ का स्वर गद्गद था।

“बेटा, हम तुम्हारी फ़ीस देने लायक तो नहीं, पर हमसे जो भी बन पड़ेगा, जरूर देंगे।”

“वाह ! एक ओर मुझे बेटा कह रही हैं, दूसरी ओर फ़फ़ीस की बात कहकर पराया बना रही हैं।”

“एक बात कहूँ, विशाल को अपनी फ़ीस नहीं चाहिए, पर मैं अपना हिस्सा नहीं छोड़नेवाली। आपने मुझसे तो पूछा ही नहीं, मुझे क्या चाहिए?” ऋचा ने हॅंसते हुए कहा।

“तुझे क्या चाहिए, बेटी?”

“आपके हाथ का बना खाना खाने जरूर आऊॅंगी।” स्नेह और आदर से अपनी बात कह, ऋचा ने सुनीता की विधवा माँ का मन जीत लिया।

“मेरा घर, तेरा ही घर हैं, जब चाहे आ जा। तेरा मनपसन्द खाना बनाने में माँ को बेहद खुशी होगी, ऋचा।” उल्लसित सुनीता ने कहा।

“ऐ ऋचा, तू कब से ऐसी पेटू हो गई? पन्द्रह दिन ठहर जा। सुधा और रागिनी की शादी में डबल खाना और मिठाई खा लेना।”

“अरे हाँ, मैं तो भूल ही गई थी। अब एक समय उपवास रखना शुरू कर दूँगी ताकि जमकर खा सकॅंू।”

खुशी-खुशी सब घर लौटे थे। घर में एक सुदर्शन युवक के साथ माधवी को प्रतीक्षा करते देख विशाल और ऋचा चैंक उठे।

“माधवी तू, अचानक। कोई खास बात है क्या?”

“हाँ भइया, यह स्क्वैड्रन-लीडर मोहनीश हैं।”

मोहनीश ने शालीनता से उठकर विशाल और ऋचा का अभिवादन किया। सबके बैठ जाने पर मोहनीश ने कहा- “यहाँ आने की एक ख़ास वजह है। मैं माधवी के साथ विवाह की अनुमति चाहता हूँ। हम दोनों एक-दूसरे को बहुत चाहते हैं।”

“क्यों माधवी, क्या यह सच है?” विशाल ने परिहासवश पूछा।

“जी, भइया।”

“देख, माधवी, तू बड़ी भोली है। तूने अच्छी तरह से छानबीन तो कर ली है। कहीं धोखे का कोई चांस तो नहीं है?”

“यह क्या सचमुच एयरफ़ोर्स में हैं? देखने से तो फ़िल्मी हीरो लगते है।” छिपाते हुए भी ऋचा के होंठों पर मुस्कान आ ही गई।

एक पल को विस्मित माधवी, ऋचा का परिहास समझ गई।

“हाँ, भाभी, मैंने तो खोजबीन नहीं की है। तुम अनुभवी हो, पता लगा दो, प्लीज! तुम्हारा एहसान मानूँगी।”

सबकी सम्मिलित हॅंसी से कमरा गॅंूज उठा।

डिनर तक विशाल जान चुका था, मोहनीश एक अच्छे परिवार का लड़का है। उसके माता-पिता माधवी से मिलकर अपनी सहमति दे चुके हैं। माधवी का उत्फुल्ल चेहरा उसकी खुशी बता रहा था। विशाल और ऋचा ने शीघ्र ही माता-पिता की सहमति से मोहनीश के घर विवाह का प्रस्ताव लेकर जाने का फ़ैसला सुना दिया। अन्ततः एक भाई होने के नाते बहिन के लिए सुयोग्य वर उसे ही तो ढॅूँढ़ना था। मोहनीश हर तरह से माधवी के योग्य था। माता-पिता को विशाल की पसन्द पर पूरा विश्वास होगा, इसमें कोई शंका नहीं थी। माधवी का मुख खुशी से चमक उठा।

दोनों को विदा कर रात के एकान्त में विशाल ने शैतानी से पूछा- “क्या हमारी मधु-यामिनी अब माधवी का विवाह होते तक स्थगित रहेगी?” हाँ, वैसे याद आया, शायद हमें सुधा और रागिनी के विवाह की भी तो प्रतीक्षा करनी होगी।

“प्रतीक्षा कर सकते हो?” शोखी से ऋचा ने पूछा।

“अजी, आज तक वही तो कर रहा हूँ। शायद ज़िन्दगी इन्तज़ार में ही बितानी होगी।” विशाल ने लम्बी साँस लेकर बाँहें फैला दीं।

विशाल की फैली बाँहों में मुस्कराती ऋचा समा गई। बाहर निखरी चाँदनी कमरे को रूपहला बना गई।

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