S
StoryPublisher
Guest
खैर ऐसे ही कुछ दिन चलता रहा। कुछ दिनों बाद राज का टूर का दौरा बढ़ने लगा। उनका काम का बोझ बढ़ गया। तब एक दिन मेरे पति राज ने मुझे कहा की यदि उसकी गैर हाजिरी में मुझे कोई भी दिक्कत होती है तो मैं भी समीर को बुला सकती हूँ तब मुझे जैसे सब कुछ मिल गया। राज उन दिनों टूर पर बहुत ज्यादा रहता था।
एक दिन रात को दस बजे मुझे ध्यान आया की हमारे बाथरूम का नलका ज्यादा ही लीक कर रहा था। मैं समीर को बुलाना तो चाहती थी पर बड़ा हिचकिचा रही थी।
इतनी रात को अकेले में घर बुलाना ठीक नहीं लग रहा था। पर क्या करती? मज़बूरी थी। यदि उस नलके को ठीक नहीं किया तो सुबह टंकी खाली हो सकती थी और फिर पुरे दिन पानी के बगैर क्या हाल हो सकता था वह सोचने से ही मैं घबरा गयी। फिर राज और समीर दोनों ने ही तो कहा था की मैं समीर को कभीभी बुला सकती थी? यह सोच कर मैंने समीर को रात करीब साढ़े दस बजे फ़ोन किया और समीर थोड़ी देर के बाद आया। वह कुछ चाभियाँ और स्क्रू ड्राइवर इत्यादि लेकर बाथरूम में घुसा।
उस रात बिना कुछ सोचे समझे मैं भी समीर के साथ बाथरूम में घुसी। मैं देखना चाहती थी की आखिर समस्या क्या है, और समीर उसे कैसे ठीक करता है। छोटे से बाथरूम मैं मुझे समीर से सटकर खड़े रहना पड़ा। उस की साँसे मैं महसूस कर रही थी। उसके थोडासा हिलने पर उसकी कोहनी मेरे स्तन पर टकरा जाती थी। मेरे बदन में अजीब सो रोमांच हो रहा था। कई महीनों या सालों के बाद मुझे ऐसा रोमांच महसूस हुआ। मेरे स्तनोँ में जैसे बिजली का करंट बह रहा हो ऐसा मुझे लग रहा था। मेरे बदन में एक के बाद एक सिहरन की मौजें उछाल मार रही थी।
तीन सालों से राज से मानसिक और शारीरिक उदासीनता के कारण मेरा अंतःस्राव रुक सा गया था। समीर की निकटता से जैसे सारा इकठ्ठा हुआ वह अंतःस्राव जो उदासीनता के बाँध के कारण सालों से रुंधित था उसमें दरार पड़ गई गयी और वह कोई न कोई रूप में बून्द बून्द रिसना शुरू हो गया। सालों के बाद फिरसे मेरे मनमें वह जातीयता की मचलन उजागर होने लगी।
मेरे यह भाव को आप अनैतिक कह सकते हैं। मैं भी समझती थी की ऐसा विचार करना भी पाप था। यह समझते हुए भी मैं रोमांच अनुभव कर रही थी। मैं शायद समीर को एक तरह से चुनौती दे रही थी। एक सुन्दर स्त्री जब अकेले में एक युवा पुरुष को अपने स्तनोँ को बार बार सहज रूप से छूने दे तो मतलब तो साफ़ ही है न?
तब अचानक समीर के हाथ से कुछ छूट कर नीचे गिर ने के कारण पाइप में से पानी का फव्वारा छूटा। पानी का जोश इतना तेज था की समीर और मैं दोनों ही देखते ही देखते पूरे भीग गए। मेरे हाल तो बिलकुल देखने लायक थे। उस रात को मैं सोने जा रही थी इस लिए मैंने मात्र मेरी नाइटी पहनी थी और अंदर कुछ नहीं पहना था। जब समीर आया तो मैंने अपने कंधे पर चुन्नी डाल दी थी, ताकि मैं अपने बड़े स्तनोँ को कुछ हद तक छिपा सकूँ।
पानी के फव्वारे के कारण न सिर्फ मेरी चुन्नी उड़ गयी, बल्कि मेरा पूरा बदन पानी में सराबोर भीग गया, और मेरी पतली नाइटी मेरे बदन पर ऐसे चिपक गयी की ऐसा लग रहा था जैसे मैंने कोई कपडे पहने ही नहीं थे। मेरे पति के ख़ास दोस्त के सामने मैं जैसे नंगी खड़ी हुई थी। लाज से मैं कुछ भी बोलने लायक ही नहीं थी।
समीर का हाल देखते ही बनता था। उसके मुंह पर हवाइयां उड़ रहीं थीं। एक बुद्धू की तरह वह एकटक मेरे स्तनोँ को ताक रहा था। मैंने जब अपनी छाती को देखा तो समझी। मेरी निप्पले साफ़ साफ़ दिख रहीं थीं। ठण्ड और भीगने के कारण मेरी निप्पले खड़ी सख्त होगयी थीं। मेरे सख्त बड़े स्तन जैसे समीर को चुनौती दे रहे थे।
मैं जान गयी की अगर मैं थोड़ी देर और वहां उस हाल में खड़ी रही तो मेरी शामत आना तय था। समीर की नजरें मेरे बदन को ऐसे तक रही थीं जैसे एक भूखा प्यासा आदमी गरम, स्वादिष्ट और सुगन्धित पकवान को सामने सजाये हुए रखा देख कर ललचाता है।
मेरी जांघें पूरी नंगी दिख रही थीं। मेरी जांघों के बीच का उभार और मेरी योनि की मध्य रेखा पर फैले हलके बाल भी दिख रहे थे। मैं अपने नितम्ब नहीं देख पा रही थी। पर मुझे समीर की नजर से पता लग गया था की वह भी उसकी आँखों को ठंडक और लन्ड को तेज गर्मी दे रहे होंगे। अनायास ही मेरी नजर समीर के पाँव के बीच गयी। उसने भी पाजामे के नीचे कुछ नहीं पहना था। मुझे उसके पाँव के बीच उसका खड़ा लन्ड नजर आया।
एक दिन रात को दस बजे मुझे ध्यान आया की हमारे बाथरूम का नलका ज्यादा ही लीक कर रहा था। मैं समीर को बुलाना तो चाहती थी पर बड़ा हिचकिचा रही थी।
इतनी रात को अकेले में घर बुलाना ठीक नहीं लग रहा था। पर क्या करती? मज़बूरी थी। यदि उस नलके को ठीक नहीं किया तो सुबह टंकी खाली हो सकती थी और फिर पुरे दिन पानी के बगैर क्या हाल हो सकता था वह सोचने से ही मैं घबरा गयी। फिर राज और समीर दोनों ने ही तो कहा था की मैं समीर को कभीभी बुला सकती थी? यह सोच कर मैंने समीर को रात करीब साढ़े दस बजे फ़ोन किया और समीर थोड़ी देर के बाद आया। वह कुछ चाभियाँ और स्क्रू ड्राइवर इत्यादि लेकर बाथरूम में घुसा।
उस रात बिना कुछ सोचे समझे मैं भी समीर के साथ बाथरूम में घुसी। मैं देखना चाहती थी की आखिर समस्या क्या है, और समीर उसे कैसे ठीक करता है। छोटे से बाथरूम मैं मुझे समीर से सटकर खड़े रहना पड़ा। उस की साँसे मैं महसूस कर रही थी। उसके थोडासा हिलने पर उसकी कोहनी मेरे स्तन पर टकरा जाती थी। मेरे बदन में अजीब सो रोमांच हो रहा था। कई महीनों या सालों के बाद मुझे ऐसा रोमांच महसूस हुआ। मेरे स्तनोँ में जैसे बिजली का करंट बह रहा हो ऐसा मुझे लग रहा था। मेरे बदन में एक के बाद एक सिहरन की मौजें उछाल मार रही थी।
तीन सालों से राज से मानसिक और शारीरिक उदासीनता के कारण मेरा अंतःस्राव रुक सा गया था। समीर की निकटता से जैसे सारा इकठ्ठा हुआ वह अंतःस्राव जो उदासीनता के बाँध के कारण सालों से रुंधित था उसमें दरार पड़ गई गयी और वह कोई न कोई रूप में बून्द बून्द रिसना शुरू हो गया। सालों के बाद फिरसे मेरे मनमें वह जातीयता की मचलन उजागर होने लगी।
मेरे यह भाव को आप अनैतिक कह सकते हैं। मैं भी समझती थी की ऐसा विचार करना भी पाप था। यह समझते हुए भी मैं रोमांच अनुभव कर रही थी। मैं शायद समीर को एक तरह से चुनौती दे रही थी। एक सुन्दर स्त्री जब अकेले में एक युवा पुरुष को अपने स्तनोँ को बार बार सहज रूप से छूने दे तो मतलब तो साफ़ ही है न?
तब अचानक समीर के हाथ से कुछ छूट कर नीचे गिर ने के कारण पाइप में से पानी का फव्वारा छूटा। पानी का जोश इतना तेज था की समीर और मैं दोनों ही देखते ही देखते पूरे भीग गए। मेरे हाल तो बिलकुल देखने लायक थे। उस रात को मैं सोने जा रही थी इस लिए मैंने मात्र मेरी नाइटी पहनी थी और अंदर कुछ नहीं पहना था। जब समीर आया तो मैंने अपने कंधे पर चुन्नी डाल दी थी, ताकि मैं अपने बड़े स्तनोँ को कुछ हद तक छिपा सकूँ।
पानी के फव्वारे के कारण न सिर्फ मेरी चुन्नी उड़ गयी, बल्कि मेरा पूरा बदन पानी में सराबोर भीग गया, और मेरी पतली नाइटी मेरे बदन पर ऐसे चिपक गयी की ऐसा लग रहा था जैसे मैंने कोई कपडे पहने ही नहीं थे। मेरे पति के ख़ास दोस्त के सामने मैं जैसे नंगी खड़ी हुई थी। लाज से मैं कुछ भी बोलने लायक ही नहीं थी।
समीर का हाल देखते ही बनता था। उसके मुंह पर हवाइयां उड़ रहीं थीं। एक बुद्धू की तरह वह एकटक मेरे स्तनोँ को ताक रहा था। मैंने जब अपनी छाती को देखा तो समझी। मेरी निप्पले साफ़ साफ़ दिख रहीं थीं। ठण्ड और भीगने के कारण मेरी निप्पले खड़ी सख्त होगयी थीं। मेरे सख्त बड़े स्तन जैसे समीर को चुनौती दे रहे थे।
मैं जान गयी की अगर मैं थोड़ी देर और वहां उस हाल में खड़ी रही तो मेरी शामत आना तय था। समीर की नजरें मेरे बदन को ऐसे तक रही थीं जैसे एक भूखा प्यासा आदमी गरम, स्वादिष्ट और सुगन्धित पकवान को सामने सजाये हुए रखा देख कर ललचाता है।
मेरी जांघें पूरी नंगी दिख रही थीं। मेरी जांघों के बीच का उभार और मेरी योनि की मध्य रेखा पर फैले हलके बाल भी दिख रहे थे। मैं अपने नितम्ब नहीं देख पा रही थी। पर मुझे समीर की नजर से पता लग गया था की वह भी उसकी आँखों को ठंडक और लन्ड को तेज गर्मी दे रहे होंगे। अनायास ही मेरी नजर समीर के पाँव के बीच गयी। उसने भी पाजामे के नीचे कुछ नहीं पहना था। मुझे उसके पाँव के बीच उसका खड़ा लन्ड नजर आया।