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मुझे रंजिता पर दया आ गई, तो मैंने यही बात रागिनी को कहा। रागिनी भी रंजिता की हालत पर तरस खा बोली, "हमें कुछ करना होगा वर्ना ये साला अंकल उस बेचारी को ऐसा डरा देगा कि बेचारी अपने खसम से भी चुदाने में डरेगी आज के बाद।" मेरे हाँ में सर हिलाने पर, रागिने वैसे हीं नंगी उन दोनों की तरफ़ बढ़ गई। मैं भी पीछे चला। रागिनी ने जमील से कहा-"आ जाओ अंकल, मेरे गाँड़ में अपना लन्ड पेल लो। ये बेचारी अभी बच्ची है, इसको तो ठीक से अपना झाँट भी छिलने नहीं आता है...अभी क्या गाँड़ मरा पाएगी।" रंजिता यह सब सुन कर जैसे चैन पाई और उठ कर बिस्तर पर एक तरह खिसक गई जिससे रागिनी बिस्तर पर आ सके। जमील का काला खतना हुआ लन्ड अब दम तना हुआ था और उसका का गुलाबी सुपाड़ा एक दम लाल आलू बना हुआ था। लन्ड की नसें फ़ुली हुई थी। सब वियाग्रा का असर था। रागिनी अपने हाथों और घुटनों के बल एक कुतिया की तरह बिस्तर पर अपना पोजीशन ठीक की। उसकी गुलाबी बूर जिसमें अभी कुछ समय पहले मैं अपने हल्लाबी लन्ड को पेल कर भीतर घुच-पिलान का खेल खेलने में मगन था अब भी मेरे उस चुदाई के सबूत के तौर पर गीली हुई चमक बिखेर रही थी। मैंने रंजिता की तरफ़ नजर घुमाई तो देखा कि बेचारी रागिनी की उठी हुई चुतड़ और उसकी खुली हुई बूर पर नजर गड़ाए हुए है।