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औरत फ़रोश का हत्यारा ibne safi

चालाक औरत

हमीद का दिल बुरी तरह उलझन में पड़ा हुआ था। कभी वह सचमुच शहनाज़ पर शक करने लगता और कभी इस शक को मुहब्बत की लहर अपने साथ बहा ले जाती। वह सोच रहा था कि अगर वाक़ई वह ख़त शहनाज़ को मिला होता तो वह उसे मेज़ के नीचे न डाल देती और यह भी अजीब बात है कि पुलिस का शक ख़त्म करने के लिए ग़ायब हो गयी। ऐसी सूरत में तो उसे यहीं मौजूद रहना चाहिए था, ताकि पुलिस का शक ख़त्म हो जाये। मगर ऐसा भी हो सकता है कि इस गिरोह के लोगों ने उसे महज़ इसलिए ग़ायब कर दिया है कि कहीं पुलिस उस पर ज़ुल्म करके सारा राज़ उगलवा न ले, मगर ऐसी सूरत में भी शहनाज़ वह ख़त पढ़ने के बाद ज़रूर जला देती। फिर आख़िर क्या बात है? वह उकता कर फ़रीदी के ख़त का जवाब लिखने बैठ गया। मगर लिखे क्या? फ़रीदी की तरफ़ से एक तरह की नफ़रत उसके दिल में पैदा हो गयी थी। कुछ-कुछ लिखना तो शुरू कर दिया, लेकिन येलो डिंगू का ज़िक्र नहीं किया। उसके बारे में सिर्फ़ इतना लिखा कि उसके खो जाने पर उसे अफ़सोस है। शहनाज़ के बारे में भी यह लिख दिया कि वह अभी तक नहीं मिल सकी। इस बीच में उसने क्या किया, उसके बारे में उसने कुछ भी लिखना बेकार समझा। उसने इरादा कर लिया कि इस मुहिम को वह अकेले ही पूरा करने की कोशिश करेगा और फ़रीदी को यह दिखा देगा कि वह निरा बुद्धू नहीं है। आख़िर उसे भी तो तरक़्क़ी करनी ही है। कब तक फ़रीदी का सहारा लेता रहेगा। इस तरह तो शायद वह ज़िन्दगी भर तरक़्क़ी का मुँह न देख सकेगा। रह गया फ़रीदी तो वह अच्छा-ख़ासा झक्की है। कितनी बार चीफ़ इन्स्पेक्टरी मिली। ठुकरा दी। न जाने किस तरह का आदमी है। उसकी बात ही समझ में नहीं आती। कभी यह हाल होता है कि चाहे कोई वास्ता हो या न हो, ज़बर्दस्ती हर मामले में टाँग अड़ा देता है और जब कोई ख़ास मौक़ा आता है तो इतनी सफ़ाई से अलग हो जाता है जैसे कोई बात ही न हो। हमीद के और उसके सम्बन्ध अच्छे थे, लेकिन फिर भी उसने उसकी परवाह नहीं की और यहाँ से चला गया। अगर शहनाज़ से उसका कोई ताल्लुक़ न होता तो शायद वह अपनी जान तक की बाज़ी लगा देता। हमीद जितना सोचता जा रहा था, उसकी तबीयत की उकताहट उतनी ही बढ़ती जा रहा थी। दीवार पर लगी हुई घड़ी आठ बजा रही थी। उसने सोचा, क्यों न ‘गुलिस्ताँ होटल’ ही में चल कर दिल बहलाया जाय और इस तरह शायद कर्नल प्रकाश के बारे में भी कुछ मालूम हो सके। मगर उसके बारे में मालूम करने की ज़रूरत ही क्या है, क्योंकि वह तो क़तई परदेसी आदमी है। सूरत से ख़तरनाक ज़रूर मालूम होता है, लेकिन इस घटना से उसका क्या सम्बन्ध है। उसके पीछे पड़ना बेकार ही वक़्त बर्बाद करना है।

उसने कपड़े पहने, पहले सोचा कि फ़रीदी की कार निकाल ले, लेकिन फिर कुछ सोच कर पैदल ही चल पड़ा। आगे चल कर एक टैक्सी की और ‘गुलिस्ताँ होटल’ की तरफ़ रवाना हो गया।

नाच घर में काफ़ी रौनक थी। अभी नाच शुरू नहीं हुआ था। लोग इधर-उधर बैठे कुछ खा-पी रहे थे। शराब के काउण्टर पर अच्छी-ख़ासी भीड़ थी। हमीद ने छिछलती-सी नज़र सब पर डाली। एक मेज़ पर कर्नल प्रकाश बैठा कुछ पी रहा था और साथ ही कोई अख़बार भी देखता जा रहा था। वह उस मेज़ पर अकेला ही था। बाक़ी तीन कुर्सियाँ ख़ाली थीं। उसी के क़रीब एक और मेज़ ख़ाली थी। हमीद ने न जाने क्यों अपने लिए वही जगह चुनी।

कर्नल प्रकाश अपने आस-पास से बेख़बर पढ़ने में लगा था। उस वक़्त हमीद को उसे बहुत ही क़रीब से देखने का मौका मिला। वह उसे पहले से ज़्यादा ख़तरनाक मालूम हो रहा था।

हमीद इधर-उधर बैठी हुई औरतों को इस तरह घूरने लगा जैसे वह एक बहुत अय्याश क़िस्म का आदमी हो। अचानक उसने यूँ ही पीछे मुड़ कर देखा, लेडी सीताराम हॉल में दाख़िल हो रही थी।

वह चुपके से कर्नल प्रकाश के पीछे खड़ी हो गयी। कर्नल प्रकाश पढ़ने में मशग़ूल रहा। लेडी सीताराम सत्ताईस-अट्ठाईस साल की औरत थी। उसके होंट बहुत ज़्यादा पतले थे जिन पर बहुत गहरे रंग की लिपस्टिक लगायी गयी थी, ऐसा मालूम होता था जैसे उसने अपने होंट भींच रखे हों। माथे पर पड़ी हुई लकीरें ख़राब नहीं मालूम होती थीं। वह कुछ पल उसी तरह कर्नल प्रकाश के पीछे खड़ी रही, फिर उसने धीरे से कुछ कहा और वापस जाने के लिए मुड़ गयी। कर्नल प्रकाश चौंक कर पीछे देखने लगा। उसके चेहरे पर शरारती मुस्कुराहट नाच रही थी। लेडी सीताराम ऊपर गैलरी में जाने के लिए ज़ीने पर चढ़ रही थी। उसके जाने के तीन-चार मिनट बाद कर्नल प्रकाश भी उठा। अब वह भी उसी ज़ीने पर चढ़ रहा था। हमीद हैरत से पलकें झपकाने लगा। यह बात उसकी समझ में बिलकुल न आयी कि लेडी सीताराम कर्नल प्रकाश से इस क़िस्म के ताल्लुक़ात कैसे रखती है, जबकि ख़ुद सीताराम कर्नल प्रकाश के लिए बिलकुल अजनबी थे और उन दोनों की पहली मुलाक़ात लॉरेंस बाग़ में ख़ुद उसी के सामने हुई थी।

आख़िर यह मामला क्या है? हमीद थोड़ी देर तक सोचता रहा कि उसे क्या करना चाहिए। वह उठा और लापरवाही से टहलता हुआ ख़ुद भी उसी ज़ीने पर चढ़ने लगा। गैलरी ख़ाली पड़ी थी। उसने बालकनी में झाँक कर देखा। वे दोनों जँगले पर झुके, खड़े हुए बातें कर रहे थे, उन्हीं के क़रीब से दो खम्भों के नीचे से आती हुई लिण्टर फैली हुई थी। ऊपर आ कर लिण्टर इतना फैल गया था कि बालकनी का वह हिस्सा बिलकुल बेकार हो गया था। सार्जेंट हमीद दूसरे दरवाज़े से निकल कर लिण्टर की आड़ में छिप गया। इस तरफ़ अँधेरा होने के कारण उधर वालों की नज़रें हमीद तक नहीं पहूँच सकती थीं। इस तरह वह ऐसी जगह पहूँच चुका था जहाँ से उनकी बातचीत का एक-एक शब्द साफ़ सुन सकता था।

लेडी सीताराम कह रही थी–

‘‘कर्नल... तुम शायद कोई जादूगर हो।’’

‘‘क्यों... क्यों, ख़ैरियत तो है?’’ कर्नल प्रकाश क़हक़हा लगा कर बोला।

‘‘मुझे बताओ कि मैं अपना ज़्यादा-से-ज़्यादा वक़्त तुम्हारे साथ क्यों गुज़ारना चाहती हूँ?’’

‘‘यह अपने दिल से पूछो।’’ कर्नल प्रकाश बहुत ही रूमानी अन्दाज़ में बोला।

‘‘काश! मैं अफ़्रीका में पैदा हुई होती।’’

‘‘तब तुम इतनी हसीन न होतीं।’’

‘‘तो क्या मैं वाक़ई हसीन हूँ?’’

‘‘काश! मैं तुम्हारे हुस्न की तस्वीर शब्दों में खींच सकता।’’

‘‘हटो भी।’’ लेडी सीताराम ने शर्मीले अन्दाज़ में कहा।

‘‘लेडी सीताराम, मैं सच कहता हूँ कि...’’

‘‘देखो कर्नल, तुम मेरा नाम जानते हो।’’ वह प्रकाश की बात काट कर बोली। ‘‘मुझे इस मनहूस नाम से मत पुकारा करो। मुझे तकलीफ़ होती है।’’

‘‘अच्छा, चलो यही सही... हाँ, तो हसीन रेखा... मैं एक सिपाही क़िस्म का अक्खड़ आदमी हूँ। लेकिन तुम्हारी प्यारी-प्यारी-सी शख्सियत ने मुझे बिलकुल मोम बना दिया है।’’

‘‘तुम मुझे बेवकूफ़ बना रहे हो।’’ लेडी सीताराम नाज़ से बोली।

‘‘नहीं रेखा, तुम पहली औरत हो जिससे मुझे इतना लगाव है। मैं अभी तक कुँवारा हूँ। कभी-कभी सोचता हूँ कि काश! तुम मेरे हिस्से में आयी होतीं।’’

‘‘मेरी ऐसी क़िस्मत कहाँ थी।’’ लेडी सीताराम ठण्डी आह भर कर बोली।

‘‘हाँ, और सुनो...’’ कर्नल प्रकाश बोला। ‘‘आज शाम इत्तफ़ाक़ से तुम्हारे खूसट से मुलाक़ात हो गयी। मुझसे मिल कर बहुत ख़ुश हुआ है और कल शाम को चाय की दावत दी है। कितना मज़ा आयेगा जब वह मेरा परिचय तुमसे अजनबी की हैसियत से करायेगा। मुझे तो सोच-सोच कर हँसी आ रही है।’’

‘‘बहुत अच्छा हुआ डियर कर्नल... अब मैं तुमसे बाक़ायदा मिल सकूँगी। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ।’’

‘‘तुम नहीं, बल्कि मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि मुझे यहाँ एक अनमोल हीरा नसीब हुआ है जिसका जवाब दुनिया में नहीं।’’

‘‘और तुम ठहरे हीरों के व्यापारी...’’ लेडी सीताराम क़हक़हा लगा कर बोली।

कर्नल प्रकाश हँसने लगा।

‘‘अरे, यह कौन आ रहा है?’’ लेडी सीताराम चौंक कर बोली। ‘‘मेरा भतीजा सुरेन्द्र कुमार... अच्छा कर्नल साहब... अब तुम नीचे जाओ... मैं भी अभी आयी। सुरेन्द्र के सामने हम एक-दूसरे के लिए अजनबी ही रहेंगे।’’

‘‘अच्छा, मैं चला... लेकिन यह तो बताओ कि अब कब मिलेंगे?’’

‘‘बहुत जल्द...’’ लेडी सीताराम ने कहा और टहलती हुई बालकनी के दूसरे किनारे तक चली गयी।

तक़रीबन दस-पन्द्रह मिनट तक वह वहाँ टहलती रही, फिर वह भी नीचे चली गयी। हमीद लिण्टर की आड़ से निकला और पूरी बालकनी का चक्कर लेता हुआ दूसरे ज़ीने से नीचे उतर आया। नाच शुरू हो चुका था। कर्नल प्रकाश एक नयी लड़की के साथ नाच रहा था। लेडी सीताराम और सुरेन्द्र एक किनारे बैठे हुए कुछ पी रहे थे। हमीद दोनों को देखता हुआ बार की तरफ़ चला गया। उसकी निगाहें उन्हीं दोनों पर टिकी हुई थीं। सुरेन्द्र एक मामूली तबीयत का, मगर ख़ूबसूरत नौजवान था। उसने काला सूट पहन रखा था जो उस पर बहुत ज़्यादा खिल रहा था। दूसरा राउण्ड शुरू होने पर लेडी सीताराम और सुरेन्द्र उठ कर टहलते हुए गैलरी के ज़ीनों की तरफ़ गये। दूसरे पल दोनों ग़ायब थे। कर्नल प्रकाश अब एक दूसरी औरत के साथ नाच रहा था। न जाने क्यों हमीद का दिल चाहा कि उन दोनों के पीछे जाये, वह टहलता हुआ ज़ीने के क़रीब आया, लेकिन ठिठक गया और वह अपने मक़सद में कामयाब न हो सका। कर्नल प्रकाश के क़दम कुछ डगमगा रहे थे। वह इस तरह लड़खड़ा रहा था जैसे वह बहुत ज़्यादा पी गया हो। उसके साथ नाचने वाली औरत ने शायद इसे महसूस कर लिया था, इसलिए वह उसकी पकड़ से निकल जाने की कोशिश कर रही थी। थोड़ी देर बाद कर्नल प्रकाश ने ख़ुद उसे छोड़ दिया और लड़खड़ाता हुआ ज़ीने की तरफ़ बढ़ा।

हमीद हैरान था कि आख़िर यह बात क्या है। यह ऊपर क्यों जा रहा है, क्योंकि अभी-अभी लेडी सीताराम ने उससे कहा था कि वह सुरेन्द्र की मौजूदगी में एक-दूसरे के लिए बिलकुल अजनबी होंगे। हमीद अभी सोच ही रहा था कि वह क्या करे कि कर्नल प्रकाश लड़खड़ाता हुआ नीचे उतर आया। ग़ुस्से से उसके नथुने फूल रहे थे, निचला होंट उसने अपने दाँतों में दबा रखा था। वह लड़खड़ाता हुआ बार की तरफ़ चला गया। हमीद ने इधर-उधर देखा और दबे पाँव ज़ीने पर चढ़ता चला गया।
 
अब फिर वह उसी लिण्टर की आड़ में छिप गया था। लेडी सीताराम और सुरेन्द्र एक-दूसरे के हाथ-में-हाथ डाले जँगले पर झुके हुए थे।

‘‘सुरेंद्र डार्लिंग! मैं अब इस तरह ज़िन्दा रहना नहीं चाहती।’’ लेडी सीताराम बोली।

‘‘तो आख़िर इसमें परेशानी की कौन-सी बात है। दुनिया की नज़रों में अगर हम चाची और भतीजे रह कर ही ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठायें तो क्या बुराई है!’’ सुरेन्द्र बोला।

‘‘लेकिन मुझे यह पसन्द नहीं।’’ लेडी सीताराम ने कहा।

‘‘समझ में नहीं आता कि आख़िर इसमें बुराई क्या है!’’ सुरेन्द्र बोला।

‘‘मैं उस बूढ़े खूसट की शक्ल भी नहीं देखना चाहती।’’ लेडी सीताराम ने कहा।

‘‘यह ज़रा मुश्किल चीज़ है, लेकिन तुम जो कहो, मैं करने के लिए तैयार हूँ।’’ सुरेन्द्र बोला।

‘‘आओ, हम तुम कहीं दूर चले जायें, बहुत दूर... जहाँ हम दोनों के सिवा और कोई न हो।’’

‘‘अरे-रे-रे...नहीं... वहाँ हमारा खाना कौन पकायेगा।’’ सुरेन्द्र हँस कर बोला।

‘‘शरीर कहीं के।’’ लेडी सीताराम ने कहा और सुरेन्द्र ‘‘ओ ओ!’’ करता हुआ एक तरफ़ हट गया।

शायद लेडी सीताराम ने उसके चुटकी काट ली थी। हमीद इनकी बातें सुन कर चुपके से गैलरी में आ गया।

ग्यारह बजे रात को जब वह घर वापस आ रहा था तो उसके ज़ेहन में अजीब खय़ाल आ रहे थे। अजीबो-ग़रीब औरत है, एक तरफ़ तो भतीजे को फाँस रखा है और दूसरी तरफ़ कर्नल प्रकाश को बेवकूफ़ बना रही है। कर्नल ग़ुस्से में नीचे उतरा था, शायद उसने भी उनकी बातचीत सुनी होगी। देखिए, अब क्या होता है। उसका दिमाग़ फिर उलझने लगा। लेकिन इन सब बातों का शहनाज़ से क्या सम्बन्ध? वह आख़िर उनके पीछे क्यों लगा हुआ है? मगर फिर लेडी सीताराम ही ने तो पुलिस को शहनाज़ की तरफ़ से शक में डाला था और यह भी तो राम सिंह के साथ नाची थी। यह एक गन्दी औरत है और राम सिंह ऐसी औरतों का व्यापार करता था। यहाँ तक तो कड़ियाँ मिलती हैं, लेकिन फिर सवाल यह पैदा होता है कि लेडी सीताराम एक दौलतमन्द आदमी की बीवी है। ग़रीब तो है नहीं कि औरत बेचने वाले से उसका सम्बन्ध हो। अजीब गुत्थी है। ऐसी औरत आज तक उसकी नज़रों से नहीं गुज़री थी। कमबख़्त का चेहरा इतना ख़ूबसूरत है कि कोई भी उसे इतना ज़लील नहीं समझ सकता। यह औरत जो सोसाइटी में काफ़ी इज़्ज़त की नज़रों से देखी जाती है, कितनी गिरी हुई है। उसे ऐसा महसूस होने लगा कि शायद शहनाज़ भी ऐसी ही हो। वह काफ़ी आज़ाद खय़ाल है। नाचघरों में मर्दों के साथ नाचती-फिरती है। उसे अपनी मुहब्बत पर नफ़रत की हल्की-सी परत चढ़ती हुई महसूस होने लगी।

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सर सीताराम

दूसरे दिन हमीद बहुत उलझन में था कि किस तरह सर सीताराम तक पहूँच जाये, उसे इस दिलचस्प ड्रामे के अंजाम को देखने की तमन्ना थी। वह देखना चाहता था कि लेडी सीताराम और कर्नल प्रकाश, जो पहले से एक-दूसरे के गहरे दोस्त हैं, सर सीताराम के सामने अजनबियों की तरह कैसे मिलते हैं। वह दिन भर यही सोचता रहा कि किस तरह उस वक़्त सर सीताराम के यहाँ पहूँच जाये, जब कर्नल प्रकाश भी वहाँ मौजूद हो। दफ़्तर में भी उसका दिल न लगा और वह दफ़्तर बन्द होने से पहले ही घर लौट आया। जैसे-जैसे शाम क़रीब आती जा रही थी, उसकी उलझन बढ़ती जा रही थी। वह ड्रॉइंग-रूम में एक सो़फे पर लेटा खय़ालों में गुम था कि नौकर ने एक विज़िटिंग कार्ड ला कर उसके सामने रख दिया।

‘‘डॉक्टर महमूद...’’ हमीद ने धीरे से कहा। ‘‘उन्हें अन्दर भेज दो।’’ हमीद उठ कर बैठ गया।

‘‘आदाब अ़र्ज है, हमीद साहब।’’ डॉक्टर महमूद ने ड्रॉइंग-रूम में दाख़िल होते हुए कहा। वह अधेड़ उम्र का आदमी था। चेहरा दाढ़ी-मूँछों से साफ़ था। फ़रीदी के साथ उसके ताल्लुक़ात बहुत अच्छे थे जिसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि वह जानवरों के अस्पताल का इंचार्ज था और कुत्तों के म़र्ज का माहिर। इसलिए सोसाइटी में उसकी बहुत इज़्ज़त थी, लेकिन उसमें बुराई यह थी कि वह ऊँची सोसाइटी में बैठ-बैठ कर लम्बी-चौड़ी हाँकने का आदी हो गया था। उसका कार्ड देखते ही हमीद को उलझन होने लगी थी। ऐसे लोगों से बातचीत करना वह सिर्फ़ वक़्त की बर्बादी समझता था, क्योंकि उसे अच्छी तरह मालूम था कि उनकी बातों में नब्बे फ़ीसदी झूठ ही होता है। डॉक्टर महमूद ज़्यादातर हाई सोसाइटी की औरतों की बातें किया करता था, जैसे फ़लाँ जज की बीवी ने उसे यूँ मुस्कुरा कर देखा, फ़लाँ सेठ की बीवी उसके साथ भाग जाने के लिए राज़ी हो गयी थी। फ़लाँ कर्नल की बेवा बहन उस पर बुरी तरह लट्टू हो रही थी। फ़लाँ ऐडवोकेट की लड़की तो उसके लिए ज़हर तक खा लेने के लिए तैयार बैठी है, लेकिन वह उसकी परवाह नहीं करता, क्योंकि ख़ुद उसकी बीवी कई बच्चे जन चुकने के बावजूद सिर्फ़ तेरह बरस की मालूम होती थी और उसके हुस्न का तो यह आलम है कि शायद हूरें भी उसकी क़सम खाती होंगी।

हमीद डॉक्टर महमूद को देख कर ज़बर्दस्ती मुस्कुराता हुआ उठा और उससे हाथ मिलाते वक़्त ज़बर्दस्ती की गर्मजोशी दिखाते हुए बैठ गया।

‘‘क्या फ़रीदी साहब घर पर मौजूद नहीं हैं?’’ डॉक्टर महमूद ने बैठते हुए कहा।

‘‘जी नहीं! वे बाहर गये हैं।’’ हमीद ने कहा।

‘‘भई हमीद साहब, क्या बताऊँ... मालूम नहीं, आप लोगों से इतनी क्यों मुहब्बत हो गयी है, हालत यह है कि अगर ज़्यादा दिनों तक आप लोगों से न मिलूँ तो अजीब तरह की उलझन होने लगती है।’’ डॉक्टर महमूद ने कहा।

‘‘मुहब्बत है आपकी...’’ हमीद मुस्कुरा कर बोला। वह उससे ज़्यादा बातचीत नहीं करना चाहता था ताकि जल्दी ही पीछा छूट जाये।

‘‘इस वक़्त सर सीताराम के यहाँ टी पार्टी में जा रहा था, सोचा, लगे हाथ आप लोगों से भी मिलता चलूँ, वैसे मुझे फ़ुर्सत कहाँ।’’ डॉक्टर महमूद ने कहा। ‘‘भई, क्या बताऊँ मैं तो उस टी पार्टी को महज़ वक़्त की बर्बादी समझता हूँ, मगर क्या करूँ ये लोग किसी तरह मानते ही नहीं। अब आज ही की बात ले लीजिए, सर सीताराम का आदमी दावत का कार्ड ले कर आया। मैंने टालने के लिए जवाब लिख दिया कि मैं माफ़ी चाहता हूँ, क्योंकि मेरे पास एक मेहमान आ गये हैं, लेकिन साहब, भला सर सीताराम कहाँ मानने वाले, फ़ौरन कहला भेजा कि मेहमान समेत आ जाओ। मरता क्या न करता, जाना ही पड़ेगा। जा कर कहूँगा कि मेहमान की तबीयत कुछ ख़राब थी, इसलिए वह न आ सकेगा।’’

हमीद की आँखें चमकने लगीं, उसने सोचा क्यों न इस मौक़े से फ़ायदा उठाये, हालाँकि वह अच्छी तरह समझता था कि यह मेहमान वाली बात सौ फ़ीसदी गप है, लेकिन वह फिर भी कह ही बैठा–

‘‘तो इसमें परेशानी की क्या बात है? मैं आपका मेहमान बन कर चला जाऊँगा।’’

‘‘अरे आप कहाँ... आप मज़ाक़ कर रहे हैं।’’ डॉक्टर महमूद ने झेंपी हुई हँसी हँसते हुए कहा।

‘‘नहीं, मैं सच कह रहा हूँ।’’ हमीद ने कहा।

‘‘और अगर किसी ने पहचान लिया तो...’’ डॉक्टर महमूद ने पीछा छुड़ाने के लिए कहा। ‘‘मुझे बड़ी शर्मिन्दगी उठानी पड़ेगी।’’

‘‘कमाल कर दिया आपने...’’ हमीद ने हँस कर कहा। ‘‘अरे साहब, मैं भेस बदल कर चलूँगा।’’

‘‘अब तो आप वाक़ई मज़ाक़ कर रहे हैं।’’ डॉक्टर महमूद ने क़हक़हा लगा कर कहा।

‘‘बख़ुदा मैं मज़ाक़ नहीं कर रहा।’’ हमीद ने कहा। ‘‘बात यह है कि मुझे सर सीताराम के कुत्तों को देखने का बेहद शौक़ है। मैंने कई बार कोशिश की कि वहाँ तक पहूँचूँ, मगर कोई अच्छा बहाना हाथ न आ सका।’’

‘‘अगर यह बात है तो मैं किसी मौक़े पर आपको उनसे मिलाऊँगा।’’ डॉक्टर महमूद ने कहा।

‘‘आप जानते हैं कि हम लोगों को इतनी फ़ुर्सत कहाँ... आज ख़ुशक़िस्मती से कोई केस नहीं है। इसलिए फ़ुर्सत-ही-फ़ुर्सत है, वरना पता नहीं कब और किस वक़्त फिर काम पर जाना पड़े।’’

‘‘मगर...’’ डॉक्टर महमूद ने बात काटते हुए कहा।

‘‘अगर-मगर कुछ नहीं... मैं इस वक़्त आपके साथ ज़रूर चलूँगा।’’ हमीद ने कहा। ‘‘आख़िर आपको परेशानी किस बात की है, जबकि सीताराम आपको मेहमान समेत बुला चुके हैं।’’

‘‘परेशानी की कोई बात नहीं। सोचता हूँ कि अगर आप भेस बदलने पर पहचान लिये गये तो बड़ी शर्मिन्दगी होगी।’’ डॉक्टर महमूद ने कहा।

‘‘इसका ज़िम्मा मैं लेता हूँ।’’ हमीद ने सीने पर हाथ मार कर कहा। ‘‘अगर कोई पहचान ले तो मैं एक हज़ार रुपये आपको दूँगा, कहिए, तो लिख कर दे दूँ।’’

डॉक्टर महमूद उलझन में पड़ गया। वह टी पार्टी में बुलाया ज़रूर गया था, लेकिन मेहमान वाली बात उसने महज़ अपनी लापरवाही और अपनी नज़रों में ऊँचे तबक़े की कोई अहमियत न होने के इज़हार के लिए यूँ ही कह दी थी। अब उसे अपनी बेवकूफ़ी पर अफ़सोस हो रहा था, लेकिन अब हो ही क्या सकता था। तीर कमान से निकल चुका था... मजबूरन उसे हमीद की बात माननी ही पड़ी। हमीद उसे ड्रॉइंग-रूम में बिठा कर ख़ुद चलने की तैयारी करने के लिए दूसरे कमरे में चला गया।

डॉक्टर महमूद बैठा दाँत पीस रहा था। ख़ामख़ा की बला गले लग गयी। बिन बुलाये मेहमान को अपने साथ ऐसी जगह ले जाना सरासर तहज़ीब के ख़िलाफ़ समझा जाता है। मिडल-क्लास की ज़िन्दगी में तो ख़ैर, हर चीज़ ठीक है, लेकिन हाई सोसाइटी के लोग इन बातों का ख़ास खय़ाल रखते हैं। महमूद बैठा उलझ रहा था कि पुराने ज़माने के एक मुसलमान रईस ने ड्रॉइंग-रूम में दाख़िल हो कर कहा, ‘‘अस्सलाम अलैकुम।’’

डॉक्टर महमूद चौंक कर खड़ा हो गया।

‘‘क्या फ़रीदी साहब हैं।’’ आने वाले ने बेतकल्लुफ़ी से बैठते हुए कहा।

‘‘जी नहीं... वे तो बाहर गये हैं।’’ डॉक्टर महमूद ने जल्दी से कहा।

‘‘आप कौन हैं?’’ अजनबी ने डॉक्टर महमूद की तरफ़ देखते हुए कहा।

‘‘मुझे डॉक्टर महमूद कहते हैं, जानवरों के हस्पताल का इंचार्ज हूँ।’’

‘‘बहुत ख़ूब... आपसे मिल कर बहुत ख़ुशी हुई।’’ अजनबी ने हाथ मिलाते हुए कहा। उसके बाद ख़ामोशी छा गयी।

‘‘आपने यह नहीं पूछा कि मैं कौन हूँ, बहुत बदतमीज़ मालूम होते हैं आप।’’ अजनबी ने बुरा-सा मुँह बना कर कहा।

डॉक्टर महमूद हड़बड़ा कर हकलाने लगा।

‘‘घबराओ नहीं, प्यारे डॉक्टर...’’ अजनबी ने क़हक़हा लगा कर कहा। ‘‘जब तुम मुझे नहीं पहचान सके तो फिर कौन माई का लाल पहचान सकेगा।’’

‘‘अरे हमीद साहब...’’ डॉक्टर ने उछल कर कहा। ‘‘ख़ुदा की क़सम कमाल कर दिया।’’

‘‘अच्छा, तो अब अच्छी तरह समझ लीजिए मेरी तारीफ़ यह है।’’ हमीद हँस कर बोला। ‘‘ख़ान बहादुर मुजाहिद मि़र्जा... अवध का बहुत बड़ा ताल्लुक़ेदार... क्या समझे और कुत्तों का शौक़ीन।’’

‘‘समझ गया... अच्छी तरह समझ गया। अब मुझे कोई परेशानी नहीं।’’ डॉक्टर महमूद ने कहा। दोनों कार पर बैठ कर सर सीताराम की कोठी की तरफ़ रवाना हो गये।
 
कोठी के बाग़ में एक बड़ी-सी मेज़ बिछी हुई थी जिस पर दावत का सामान लगा हुआ था। सर सीताराम, सुरेन्द्र और कुछ लोग कुर्सियों पर बैठे गप्पें मार रहे थे। कर्नल प्रकाश अभी नहीं आया था। डॉक्टर महमूद के पहूँचने पर सब लोग खड़े हो गये। उसके साथ एक अधेड़ उम्र के अजनबी को देख कर लेडी सीताराम ने बुरा-सा मुँह बनाया। सर सीताराम का मूड भी कुछ ख़राब हो गया।

‘‘सर सीताराम, आपसे मिलिए।’’ डॉक्टर महमूद ने मुस्कुरा कर कहा। ‘‘आप हैं मेरे दोस्त ख़ान बहादुर मुजाहिद मि़र्जा, अवध के बहुत बड़े ताल्लुक़ेदार... आपका सिलसिला वाजिद अली शाह मरहूम से मिलता है।’’

‘‘ओह, बहुत ख़ुशी हुई आपसे मिल कर।’’ सर सीताराम ने उठ कर गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए कहा।

‘‘मुझे आपसे मिलने का बहुत अरमान था...’’ हमीद ने कहा। ‘‘हालाँकि मुझे इस वक़्त न आना चाहिए था, लेकिन मैं आज रात की गाड़ी से लखनऊ वापस जा रहा हूँ। महमूद साहब यहाँ आ रहे थे। मैंने सोचा, लगे हाथ आपसे भी मिल लूँ।’’

‘‘अरे, ख़ान बहादुर साहब...’’ सर सीताराम ने कहा। ‘‘मेरी ख़ुशक़िस्मती है कि मैं आपसे मुलाक़ात कर सका, मुझे ख़ानदानी आदमियों से मिल कर बेहद ख़ुशी होती है।’’

‘‘मुहब्बत है आपकी।’’ हमीद ने मुस्कुरा कर कहा। ‘‘दरअसल मुझे जो चीज़ यहाँ तक खींच कर लायी है, वो आपके कुत्ते हैं। मुझे भी कुत्तों का शौक़ है।’’

‘‘तब तो आपसे मिल कर और भी ख़ुशी हुई।’’ सर सीताराम ने बच्चों की तरह हँसते हुए कहा। लेडी सीताराम ने नफ़रत से होंट सिकोड़ लिये। सर सीताराम और हमीद में कुत्तों के सिलसिले में एक लम्बी बहस छिड़ गयी। दोनों अपने आपको ज़्यादा क़ाबिल दिखाना चाहते थे। बाद में यह तय हुआ कि चाय पीने के बाद सर सीताराम के कुत्ताघर की सैर की जायेगी।

थोड़ी देर के बाद कर्नल प्रकाश भी आ गया। वह इस वक़्त पहले से ज़्यादा शानदार नज़र आ रहा था। उसे देख कर सब लोग खड़े हो गये। सर सीताराम ने आगे बढ़ कर उनका स्वागत किया।

‘‘आइए, आइए, कर्नल साहब... हम सब बेचैनी से आपका इन्तज़ार कर रहे थे।’’

‘‘शुक्रिया, शुक्रिया।’’ कर्नल प्रकाश मुस्कुराता हुआ बोला।

‘‘इनसे मिलिए।’’ सर सीताराम ने परिचय कराना शुरू किया। ‘‘रेखा, मेरी बीवी।’



‘‘बड़ी ख़ुशी हुई आपसे मिल कर।’’ कर्नल प्रकाश ने हाथ मिलाते समय झुक कर कहा।

लेडी सीताराम के माथे पर पसीने की हल्की-हल्की बूँदें फूट आयी थीं। वह हाथ मिला कर ज़बर्दस्ती मुस्कुराने की कोशिश करती हुई ख़ामोशी से बैठ गयी। उसके बाद एक-एक करके सबसे परिचय कराया गया। हमीद महसूस कर रहा था कि कर्नल प्रकाश की नज़र बार-बार उस पर पड़ रही थी। वह कुछ घबरा-सा गया। लेकिन फ़ौरन ही ख़ुद पर क़ाबू करके मुस्कुरा-मुस्कुरा कर बातें करने लगा। लेडी सीताराम अब तक ख़ामोश थी। शायद सर सीताराम ने भी उसे महसूस कर लिया था। इसलिए एक मौक़े पर कह उठे।

‘‘कर्नल साहब, रेखा को ज़्यादा बातें करने की आदत नहीं और अजनबियों से वह कुछ शर्माती भी है।’’

‘‘ख़ूब, यह तो अच्छी आदत है।’’ कर्नल प्रकाश ने मुस्कुरा कर कहा। ‘‘कम-से-कम हर शरीफ़ औरत में यह सिफ़त तो होनी ही चाहिए। क्या खय़ाल है, नवाब साहब।’’

‘‘ठीक फ़रमाया आपने...’’ हमीद ने कहा।

चाय का दौर ख़त्म हो जाने के बाद सर सीताराम सबको ले कर कुत्ताघर की तरफ़ चले गये।

कर्नल प्रकाश और हमीद ने कुत्तों की जम कर तारीफ़ की। एक कुत्ते की नस्ल के बारे में दोनों में बहस हो गयी। दोनों किसी तरह चुप होने का नाम ही न लेते थे। हमीद को अपनी मालूमात पर पूरा भरोसा था, क्योंकि वह फ़रीदी जैसे माहिर उस्ताद का चेला था। बहस को लम्बा खिंचता देख कर आख़िरकार सर सीताराम को बीच-बचाव कराना पड़ा।

सब कुत्तों को देख लेने के बाद, वे फिर बाग़ में पड़ी हुई कुर्सियों पर आ कर बैठ गये।

‘‘अच्छा, सर सीताराम... मैं अब जाना चाहूँगा।’’ कर्नल प्रकाश ने कहा।

‘‘ऐसी भी क्या जल्दी?’’

‘‘मुझे बिज़नेस के सिलसिले में एक साहब से मिलना है।’’

‘‘अब तो बराबर मुलाक़ात होती रहेगी न?’’ सर सीताराम ने भी उठते हुए कहा।

‘‘जब तक यहाँ रुका हूँ, तब तक तो मुलाक़ात होगी ही... और अभी तक यहाँ अच्छी सोसाइटी मिली ही नहीं।’’

सर सीताराम ने दाँत निकाल दिये।

कर्नल प्रकाश के चले जाने के बाद काफ़ी लोग एक-एक करके उठ गये।

‘‘जब भी इस शहर में आइएगा, इस ग़रीबख़ाने को न भूलिएगा।’’ सर सीताराम ने हमीद से कहा।

‘ज़रूर, ज़रूर... आपकी बातचीत ने मेरे दिल पर गहरा असर डाला है। कभी लखनऊ तशरीफ़ लाइए।’’

‘‘क्या बताऊँ, न जाने क्यों अब घर छोड़ते वक़्त कुछ उलझन-सी महसूस होती है।’’

हमीद यूँ ही हँसने लगा और उसकी निगाह लेडी सीताराम की तरफ़ उठ गयी जो उसे बहुत ग़ौर से देख रही थी।

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बुरे फँसे

हमीद को अपनी बेवकूफ़ी पर बहुत अफ़सोस हुआ कि उसने यह क्यों कह दिया कि वह आज ही रात की गाड़ी से लखनऊ वापस जा रहा है। अब इस तरह फ़िलहाल वह वहाँ न जा सकेगा। उसे फ़रीदी की हिदायत याद आ गयी कि कोठी के अन्दर जाने की कोशिश न करना। मालूम नहीं, उसने यह क्यों कहा था। हमीद सोचने लगा, कहा होगा, अपना-अपना काम करने का तरीक़ा है, जब फ़रीदी को इस केस से कोई दिलचस्पी ही नहीं, तो ख़ामख़ा क्यों उसकी हिदायतों के चक्कर में पड़ कर अपना काम ख़राब करे। अब वह फिर कर्नल प्रकाश के पीछे लग गया था। दो-चार दिन इसी क़िस्म के चक्करों में गुज़र गये, लेकिन कोई काम की बात न मालूम हो सकी। इन तीन-चार दिनों में लेडी सीताराम और कर्नल प्रकाश बाक़ायदा तौर पर खुल्लम-खुल्ला एक-दूसरे से मिलने लगे थे। लेडी सीताराम अब ‘गुलिस्ताँ होटल’ में सुरेन्द्र के सामने भी कर्नल प्रकाश के साथ नाच सकती थी। हमीद महसूस कर रहा था कि सुरेन्द्र को कर्नल प्रकाश और लेडी सीताराम की बेतकल्लुफ़ी बिलकुल पसन्द नहीं। हमीद को हैरत तो इस बात पर थी कि कर्नल प्रकाश लेडी सीताराम और सुरेन्द्र के ताल्लुक़ात के बारे में जानते हुए भी क्यों उस पर बुरी तरह रीझा हुआ है। बार-बार उसके दिल में ख़्वाहिश पैदा होती कि काश, फ़रीदी यहाँ मौजूद होता। उसे इस बीच उसे फ़रीदी से थोड़ी-सी चिढ़ ज़रूर हो गयी थी, लेकिन वह अच्छी तरह समझता था कि अगर वह यहाँ मौजूद होता तो कभी का सारा केस हल हो गया होता। उसको अब अफ़सोस हो रहा था कि उसने फ़रीदी को सारे हालात लिख कर क्यों नहीं भेज दिये। हो सकता था कि वह ऐसे अजीबो-ग़रीब केस को हल करने के शौक़ में बीमारी ही की हालत में चला आता।

इन दिनों उसे शहनाज़ की याद बुरी तरह सता रही थी। उसे उसकी बेगुनाही का पूरा-पूरा यक़ीन था। वैसे कभी-कभी वह उसकी बढ़ी हुई आज़ादी और लेडी सीताराम की आदतों का खय़ाल करते हुए उससे दुखी ज़रूर हो जाता था, लेकिन यह चीज़ बिलकुल वक़्ती होती थी। वह फिर यह सोचने पर मजबूर हो जाता था कि दुनिया की सारी औरतें या सारे मर्द एक जैसे नहीं होते, इश्क़ और मुहब्बत के मामले में वह एक बेपरवाह आदमी था। उसका अक़ीदा था कि दुनिया में क़ैस और फ़रहाद क़िस्म की मुहब्बत का वजूद ही नहीं था। उसने अब से पहले भी कई इश्क़ किये थे, लेकिन वे सिर्फ़ फ़िल्मी गानों और बेतुकी हाय-वाय ही तक सीमित रहे थे और वैसे वह फ़रीदी को चिढ़ाने के लिए भी अकसर एक-आध इश्क़ कर बैठता था। ऐसी कहानियों के महबूब ज़्यादातर फ़़र्जी हुआ करते थे। शहनाज़ से भी उसकी महज़ दोस्ती थी, लेकिन इस बीच में उसे उससे हमदर्दी ज़रूर हो गयी थी और यह हमदर्दी धीरे-धीरे दूसरी शक्ल लेती जा रही थी। लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ था कि उसने अपनी कोई रात तारे गिन-गिन कर गुज़ारी हो, या सिर्फ़ आहें भरता रहा हो। दोनों वक़्त पेट भर कर खाना खाता था, ‘गुलिस्ताँ होटल’ में जा कर एक आधा राउण्ड नाचता भी था, लेकिन साथ ही यह ज़रूर था कि शहनाज़ को हासिल करने के लिए अपनी जान की भी बाज़ी ज़रूर लगा सकता था। उसके लिए अपना ख़ून बहाने के लिए भी तैयार था।

आज शाम को जब वह दफ़्तर से वापस आया तो उसे फ़रीदी का ख़त मिला। जिसमें उसने सबसे पहले शहनाज़ के बारे में पूछा था, फिर येलो डिंगू की कहानी थी और आख़िर में अपनी बीमारी का हाल लिखा था। वह अभी तक बीमार था। कमज़ोरी बहुत ज़्यादा थी, इसलिए सफ़र करने की हिम्मत नहीं कर सकता था। आख़िर में उसने फिर लिखा था कि उसे केस की पूरी जानकारी दी जाये। फ़रीदी का ख़त पढ़ कर हमीद के दिल में हमदर्दी का जज़्बा जाग उठा। वह मुहब्बत जाग उठी जो उसे फ़रीदी से थी। उसे फ़रीदी से उतनी ही मुहब्बत थी जितनी कि अपने बड़े भाई से हो सकती है। अगर फ़रीदी ने उसे यह न लिख दिया होता कि तुम परेशान हो कर यहाँ आने की कोशिश न करना, बल्कि शहनाज़ के सिलसिले में छानबीन में लगे रहना, तो वह एक-आध हफ़्ते की छुट्टी ले कर बम्बई ज़रूर जाता और जिस तरह भी बन पड़ता, फ़रीदी को वहाँ से लाने की कोशिश करता।

नाश्ता करने के बाद हमीद ने फ़रीदी को ख़त लिखना शुरू किया। पूरे हालात लिखे, येलो डिंगू का हवाला देते हुए लिखा कि महज़ उसकी वजह से उसे इतनी बातें मालूम हुर्इं और वह बहुत जल्द उसे कर्नल प्रकाश से क़ानूनी तौर पर छीन लेगा। ख़त ख़त्म कर चुकने के बाद वह सो गया।

आज रात को ‘गुलिस्ताँ होटल’ में ख़ास प्रोग्राम था। टिकट का दाम इतना बढ़ा दिया गया था कि सिर्फ़ हाई सोसाइटी ही के लोग उसमें हिस्सा ले सकते थे। कर्नल प्रकाश के बारे में जानकारी लेने के बाद से हमीद रोज़ाना ‘गुलिस्ताँ होटल’ जाता था, इसलिए उसे रात को सोने का मौक़ा कम मिलता था। यही वजह थी कि आजकल दिन में सोना उसके लिए ज़रूरी हो गया था।

तक़रीबन आठ बजे वह सो कर उठा। बेवक़्त सोने से तबीयत कुछ भारी हो गयी थी। लेकिन का़ॅफी के एक प्याले ने उसके जिस्म में हरकत पैदा कर दी थी। खाना खाने के बाद उसने जल्दी-जल्दी कपड़े बदले और ‘गुलिस्ताँ होटल’ की तरफ़ रवाना हो गया।

‘गुलिस्ताँ होटल’ के नाच घर को आज बिलकुल अनोखे अन्दाज़ में सजाया गया था। चारों तरफ़ क़हक़हे गूँज रहे थे। हमीद की निगाहें कर्नल प्रकाश और लेडी सीताराम को ढूँढ रही थीं, लेकिन वे दोनों अभी तक नहीं आये थे। हमीद ऊपर गैलरी में गया। बालकनी भी ख़ाली थी। फिर टहलता हुआ कर्नल प्रकाश के कमरे की तरफ़ गया। वह भी बन्द था। थक-हार कर वह हॉल में लौट आया। एक जगह एक मेज़ ख़ाली नज़र आयी। क़रीब जाने पर मालूम हुआ कि कर्नल प्रकाश के लिए पहले ही से ‘‘बुक’’ कर दी गयी थी। एक मेज़ के पास दो ऐंग्लो इण्डियन लड़कियाँ बैठी हुई थीं। बाक़ी दो कुर्सियाँ ख़ाली थीं। वह उनके क़रीब गया।

‘‘अगर कोई हर्ज न हो तो मैं यहाँ बैठ जाऊँ।’’ हमीद ने कहा।

‘ज़रूर, ज़रूर...’’ दोनों एक साथ बोलीं।

हमीद उनका शुक्रिया अदा करके बैठ गया। वह यूँ भी काफ़ी हसीन था और इस वक़्त उम्दा क़िस्म के काले सूट में वह कोई बड़ा आदमी मालूम हो रहा था। शायद वे दोनों भी उसे ऐंग्लो इण्डियन समझ रही थीं। हमीद ने बैठते ही उन पर रोब डालने के लिए कुछ खाने-पीने की चीज़ों का ऑर्डर दिया।

‘‘आप हम लोगों के लिए तकलीफ़ न कीजिए।’’ लड़कियों में से एक बोली।

‘‘वाह, यह कैसे हो सकता है।’’ हमीद ने मुस्कुरा कर कहा।

‘‘माफ़ कीजिएगा, हम लोग ऐसे लोगों की दावत क़बूल नहीं करते, जिन्हें हम जानते न हों।’’

‘‘तो इसमें हर्ज ही क्या है... अब आप मुझे जान जायेंगी। मुझे आर्थर कहते हैं, आपके शहर में नया आया हूँ।’’

दोनों लड़कियाँ एक-दूसरे को देख कर हँसने लगीं।

‘‘यह जूलिया है और मैं लिज़ी... हम दोनों स्टूडेण्ट हैं।’’

‘‘कितने प्यारे हैं आप दोनों के नाम... जूलिया...लिज़ी... ऐसा मालूम होता है जैसे किसी ने कानों में शहद टपका दिया हो।’’

‘‘तो आप शायर भी हैं।’’ जूलिया ने मुस्कुरा कर कहा।

‘‘काश, मैं शायर होता। जूलिया...लिज़ी...लिज़ी...जूलिया...’’

इतने में बैरा ऑर्डर ले कर आ गया। तीनों खाने-पीने में लग गये। थोड़ी देर के बाद नाच के लिए संगीत शुरू हो गया।

‘‘मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं नाच के लिए किससे प्रपोज़ करूँ।’’ हमीद ने कहा।

‘‘हम दोनों बारी-बारी से नाचेंगी।’’ जूलिया ने कहा।

और लिज़ी उठ कर खड़ी हो गयी। हमीद ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया और दोनों धीरे-धीरे हिलते हुए नाचने वालों की भीड़ में आ गये।

‘‘तुमने बहुत ज़्यादा पी रखी है।’’ लिज़ी मुस्कुरा कर बोली।

‘‘मैंने... नहीं, एक क़तरा भी नहीं।’’

‘‘कौन-सी पीते हो...?’’

‘‘स्कॉच...’’ हमीद ने जल्दी से कहा। ‘‘लेकिन मैंने इतवार के दिन पीने से क़सम खा रखी है।’’

‘‘क्यों...?’’

‘‘मैं थोड़ा-सा मज़हबी आदमी भी हूँ।’’

‘‘यह बहुत बुरी बात है।’’

‘‘अच्छी हो या बुरी... उसूल, बहरहाल उसूल है।’’ हमीद ने कहा। ‘‘तुम कौन-सी पीती हो।’’

‘‘शेरी...’’

‘‘अच्छा, तो मैं तुम्हें शेरी ज़रूर पिलाऊँगा।’’

‘‘तुम बहुत ख़ूबसूरत हो।’’

‘‘एक बार एक बुढ़िया ने भी मुझसे यही कहा था।’’

लिज़ी खिलखिला कर हँस पड़ी।

‘‘तुम बहुत दिलचस्प आदमी मालूम होते हो।’’

‘‘तुम जैसी ख़ूबसूरत लड़कियों की नज़दीकी मुझे सब कुछ बना देती है।’’

‘‘बातें ख़ूब बना लेते हो।’’

‘‘मैं रोज़ाना एक दर्जन बातें बनाता हूँ और फिर उन्हें पैक करके बिकने के लिए बाज़ार में भेज देता हूँ।’’

‘‘तुम ज़रूर पिये हुए हो।’’

‘‘तुम्हारी सितारों से ज़्यादा चमकदार आँखों की क़सम मैं नशे में नहीं हूँ।’’

‘‘ख़ैर होगा... तुम बहुत अच्छा नाच लेते हो।’’

अचानक हमीद की नज़रें उस मेज़ की तरफ़ उठ गयीं जो कर्नल प्रकाश के लिए बुक थी। शायद कर्नल प्रकाश, लेडी सीताराम और सुरेन्द्र अभी-अभी आ कर बैठे थे। लेडी सीताराम इस वक़्त बहुत ज़्यादा ख़ूबसूरत लग रही थी। थोड़ी देर सुस्ताने के बाद कर्नल प्रकाश और लेडी सीताराम नाचने के लिए तैयार हो गये। हमीद और लिज़ी कई बार नाचते हुए कर्नल प्रकाश और लेडी सीताराम के क़रीब से गुज़रे। लेडी सीताराम शराब के नशे में मस्त थी।

नाच के साथ-साथ संगीत धीरे-धीरे त़ेज होता जा रहा था कि अचानक पूरे हॉल में अँधेरा छा गया। शायद फ़्य़ूज उड़ गया था। अँधेरे में अजीब तरह का शोर मच गया। अचानक एक औरत की चीख़ सुनाई दी।
 
‘‘अरे... अरे... छोड़ो... अरे छोड़... मेरा हार... मेरा हार...’’ वह बुरी तरह चीख़ रही थी। उसी के साथ ही और भी कई त़ेज आवाज़ें सुनाई देने लगीं। कुछ पलों के बाद फिर रोशनी हो गयी। एक जवान औरत जो कपड़ों से काफ़ी दौलतमन्द मालूम हो रही थी अभी तक ‘‘मेरा हार! मेरा हार!’’ चीख़े जा रही थी। कुछ लोग उसके पास इकट्ठे हो गये थे।

‘‘किसी ने मेरा हीरों का हार उतार लिया...’’ वह चीख़ कर बोली।

इतने में मैनेजर भी आ गया। उसने हॉल के सब दरवाज़े ताले लगा कर बन्द करवा दिये।

‘‘भाइयो और बहनो,’’ वह एक मेज़ पर खड़ा हो कर बोला। ‘‘मुझे बहुत अफ़सोस है, किसी बदमाश ने लेडी इक़बाल का हार चुरा लिया है। मजबूरन मुझे उस वक़्त तक के लिए सब दरवाज़े बन्द करा देने पड़े हैं, जब तक कि पुलिस आ कर मुनासिब कार्रवाई न शुरू कर दे। उम्मीद है कि आप लोग मुझे इस गुस्ताख़ी के लिये माफ़ कर देंगे।’’

‘‘बिलकुल ठीक है... बिलकुल ठीक है।’’ बहुत-सी आवाज़ें सुनाई दीं।

कुछ देर बाद पुलिस आ गयी। एक सिरे से सबकी तलाशी शुरू हो गयी। तलाशी लेने वालों में इन्स्पेक्टर जगदीश भी था। जब वह हमीद के क़रीब आया तो हमीद ने भी अपने हाथ उठा दिये।

‘‘अरे आप...’’ जगदीश ठिठक कर बोला। ‘‘क्यों मज़ाक़ करते हैं।’’

वह आगे बढ़ने लगा।

‘‘ठहरो... मेरी तलाशी भी लेते जाओ।’’ हमीद ने धीरे से कहा।

जगदीश भी ठिठक गया।

‘‘जल्दी करो... हिचकिचाओ नहीं... समझने की कोशिश करो और मेरे लिए तुम बिलकुल अजनबी बने रहो।’’ जगदीश ने हमीद की भी तलाशी ली और आगे बढ़ गया। हमीद ख़ुद भी अपनी त़ेज नज़रों से बराबर काम ले रहा था। लेकिन उसे अच्छी तरह यक़ीन हो गया था कि चोर इस वक़्त हॉल में मौजूद नहीं। क्योंकि औरत के चीख़ने के दो-तीन मिनट बाद तक हॉल में अँधेरा रहा था। इतनी देर में चोर बहुत आसानी से बाहर जा सकता था। इस वक़्त की तलाशी सिर्फ़ रस्मी कार्रवाई समझ रहा था।

तलाशी का सिलसिला लगभग तीन घण्टे तक जारी रहा, लेकिन कोई नतीजा न निकला। आख़िर थक-हार कर पुलिस वालों ने दरवाज़े खुलवा दिये। थोड़ी देर बाद हॉल में बिलकुल सन्नाटा था। सिर्फ़ वही लोग बाक़ी रह गये थे जो ‘गुलिस्ताँ होटल’ में ठहरे हुए थे। लेडी सीताराम और सुरेन्द्र भी अभी मौजूद थे। उन्हीं के क़रीब की एक मेज़ पर हमीद भी कॉफ़ी पी रहा था। पुलिस वाले कुछ देर ठहर कर वापस चले गये। लेडी इक़बाल अभी तक मैनेजर से उलझी हुई थी। मैनेजर बुरी तरह परेशान था, क्योंकि उसके होटल में यह दूसरा हादसा था और अब कोई चीज़ होटल को बदनामी से नहीं बचा सकती थी।

‘‘अब चलना चाहिए।’’ लेडी सीताराम बोली।

‘‘ऐसी भी क्या जल्दी।’’ कर्नल प्रकाश ने कहा। ‘‘कुछ देर चल कर मेरे कमरे में बैठिए, फिर चली जाइएगा... क्यों सुरेन्द्र साहब।’’

‘‘मुझे कोई एतराज़ नहीं।’’ सुरेन्द्र ने कहा।

तीनों उठ कर ज़ीनों की तरफ़ बढ़े।

उनका पीछा करने की ख़्वाहिश को हमीद किसी तरह न दबा सका। वह तब ख़ास तौर पर कर्नल प्रकाश का पीछा करने का आदी हो गया था जब लेडी सीताराम भी उसके साथ होती थी और उस वक़्त तो सुरेन्द्र भी था। कर्नल प्रकाश का दुश्मन। इस वक़्त उनका पीछा करने की सबसे बड़ी वजह यह थी कर्नल प्रकाश ने इन दोनों को इतनी रात गये रोका क्यों है। हमीद भी उठा और सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर आया। कर्नल प्रकाश के कमरों के सामने एक छोटा-सा लॉन था, जिसे ऊँची-ऊँची दीवारों ने चारों तरफ़ से घेर रखा था। इस तरह यह हिस्सा होटल के दूसरे हिस्सों से बिलकुल अलग हो गया था। कमरे का दरवाज़ा बन्द था। हमीद दरवाज़े से लग कर खड़ा हो गया। उसे इत्मीनान था कि उस वक़्त उधर कोई नहीं आ सकता। उसने अपनी आँख दरवाज़े की चाभी के सूराख़ से लगा दी। लेडी सीताराम और सुरेन्द्र सोफ़ों पर बैठे हुए थे और कर्नल प्रकाश टहल रहा था।

‘‘मैं इस वक़्त आप लोगों को अपना एक करतब दिखाना चाहता हूँ।’’ वह टहलते-टहलते रुक कर बोला।

सुरेन्द्र और लेडी सीताराम उसे हैरत से देखने लगे।

‘‘यह देखिए... यह रहा... लेडी इक़बाल का हार...’’

‘‘अरे...’’ कह कर लेडी सीताराम और सुरेन्द्र खड़े हो गये।

कर्नल प्रकाश ने एक ज़ोरदार क़हक़हा लगाया।

‘‘मैं आपको इतना गिरा हुआ नहीं समझता था।’’ सुरेन्द्र ने त़ेज आवाज़ में कहा।

‘‘ओह मेरे शेर...’’ कर्नल प्रकाश कँटीली हँसी के साथ बोला। ‘‘तुम किसी से कम हो।’’

‘‘क्या मतलब...’’ सुरेन्द्र जल्दी से बोला। उसके चेहरे पर परेशानी साफ़ दिखने लगी थी।

‘‘मतलब साफ़ है, ज़रा इसे देखिए।’’ कर्नल प्रकाश ने एक कागज़़ निकाल कर सुरेन्द्र की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा।

सुरेन्द्र कागज़़ ले कर पढ़ने लगा। उसके माथे से पसीने की बूँदें टपकने लगीं, उसने कागज़़ फाड़ देने का इरादा किया, लेकिन दूसरे ही पल में कर्नल प्रकाश के हाथ में पिस्तौल थी।

‘‘ख़बरदार... इधर लाओ, वरना भेजा उड़ा दूँगा।’’ उसने धीरे से कहा। ‘‘तुम ग़लत समझे। मैं तुमसे समझौता करना चाहता हूँ।’’

सुरेन्द्र ने कागज़़ लौटा दिया, लेकिन वह बुरी तरह काँप रहा था। लेडी सीताराम के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। ऐसा मालूम हो रहा था जैसे वह गूँगी हो गयी हो। कभी वह सुरेन्द्र की तरफ़ देखती और कभी कर्नल प्रकाश की तरफ़।

‘‘मैं इस कागज़़ की पूरी कहानी अच्छी तरह जानता हूँ।’’ कर्नल प्रकाश ने कहा।

‘‘न जाने आप क्या कह रहे हैं।’’ सुरेन्द्र मुश्किल से बोला।

‘‘ख़ैर, तुम अभी बच्चे हो... मुझे धोखा नहीं दे सकते। हाँ, अब आओ काम की बात की तरफ़। मैं तुमसे समझौता करना चाहता हूँ।’’

‘‘किस बात का समझौता।’’

‘‘हाँ, अब आये हो सीधी राह पर।’’ कर्नल प्रकाश मेज़ पर बैठते हुए बोला।
 
‘‘जानते हो मैं अफ़्रीका से यहाँ किसलिए आया हूँ? ये तीनों हार मेरे ही हैं और ये दुनिया में अपना जवाब नहीं रखते। इस हार की असली कीमत लेडी इक़बाल को भी पता नहीं। हाँ, तो ये हार मेरी तिजोरी से चुराये गये थे। मैं काफ़ी दिनों तक उनकी तलाश में घूमता रहा। आख़िर मुझे पता चला कि तीनों हार इस मुल्क में बेच दिये गये हैं। मैं यहाँ आया और काफ़ी दिनों तक इधर-उधर की ख़ाक छानता रहा। आख़िरकार मुझे मालूम हो ही गया कि तीनों हार इसी शहर में बेचे गये हैं। एक तो मैंने हासिल कर ही लिया। बाक़ी रहे दो हार... उनके बारे में कुछ पता नहीं चल सका कि किसके क़ब्ज़े में हैं। बहरहाल, मैं जिस मामले में तुमसे समझौता करना चाहता हूँ, वह यह है कि तुम दोनों मुझे यहाँ के बड़े आदमियों से मिलाओ। मैं अपने हार हासिल करके वापस चला जाऊँगा और एक बहादुर की तरह वादा करता हूँ कि तुम लोगों का राज़ मेरे सीने में दफ़्न रहेगा।’’

लेडी सीताराम और सुरेन्द्र बेबसी से एक-दूसरे को ताक रहे थे।

‘‘मेरा दोस्ती का हाथ हमेशा तुम लोगों की तरफ़ बढ़ा रहेगा।’’ कर्नल प्रकाश फिर बोला। ‘‘तुम जब भी यहाँ अपने लिए ख़तरा महसूस करो, तुम लोग मेरे साथ अफ़्रीका आ सकते हो, मैं हमेशा तुम्हें अपना ही समझूँगा। तुम लोग अभी मुझे जानते नहीं। मैं तुम्हें एक रात में करोड़पति बना सकता हूँ... बोलो, क्या कहते हो।’’

‘‘मंज़ूर है...’’ सुरेन्द्र ने कहा।

‘‘शाबाश... मुझे तुमसे यही उम्मीद थी... बिना एक-दूसरे के काम आये... ज़िन्दा रहना बेकार है।’’

कर्नल प्रकाश ख़ामोश हो गया। ऐसा मालूम हुआ जैसे वह किसी चीज़ पर ग़ौर कर रहा हो। अचानक वह दरवाज़े की तरफ़ झपटा... और दरवाज़ा खोल दिया। हमीद सँभलने भी न पाया था कि कर्नल प्रकाश का हाथ उसकी गर्दन पर पड़ा।

‘‘ख़बरदार, शोर न करना... वरना यहीं ढेर कर दूँगा।’’ कर्नल प्रकाश ने हमीद को कमरे के अन्दर धकेल कर दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर दिया।

लेडी सीताराम और सुरेन्द्र घबरा कर खड़े हो गये।

‘‘यह कौन है...?’’ दोनों बोल पड़े।

हमीद बेबसी से फ़र्श पर पड़ा कर्नल प्रकाश के हाथ में दबे हुए पिस्तौल को देख रहा था।

‘‘कौन है बे तू...?’’ कर्नल प्रकाश गरज कर बोला।

‘‘तमीज़ से बात करो।’’ हमीद उठ कर बैठते हुए बोला।

‘‘अच्छा जी... सीधी तरह बताओ नहीं तो...’’

‘‘अगर मैं न बताऊँ तो...’’

‘‘मेरा एक कारतूस ख़राब होगा...’’ कर्नल प्रकाश बोला। उसके आवाज़ में दरिन्दगी महसूस हो रही थी।

हमीद लरज़ उठा।

‘‘जानते हो, कर्नल प्रकाश का राज़ मालूम करने वाले की सज़ा मौत है।’’ कर्नल ने कहा। ‘‘ख़ैरियत चाहते हो तो सीधी तरह बता दो कि तुम कौन हो।’’

‘‘तुम ज़रा गोली चला कर तो देखो।’’ हमीद कड़क कर बोला। ‘‘कर्नल प्रकाश, तुमने शायद अभी तक किसी बराबर वाले से टक्कर नहीं ली।’’

‘‘वाह री मेरी मेंढकी।’’ कर्नल प्रकाश ने कहा। ‘‘मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं, वरना मैं अभी तुमसे उगलवा लेता... ख़ैर, फिर सही...’’

कर्नल प्रकाश ने मेज़ पर रखा हुआ रोल उठा कर हमीद के सिर पर दे मारा... हमीद लड़खड़ा कर गिर पड़ा। उसने दो-तीन रोल और रसीद किये। हमीद बेहोश हो चुका था।

‘‘देखा तुमने...’’ कर्नल दोनों की तरफ़ मुड़ कर बोला। ‘‘इस तरह लोग मेरे पीछे लगे हुए हैं, मालूम नहीं यह कौन है। शुक्र है कि मैंने बातों में तुम्हारे राज़ पर कोई रोशनी नहीं डाली। मगर इसे शक ज़रूर हो गया होगा। यह मालूम करना ज़रूरी है कि यह कौन है, वरना मैं इसको इसी वक़्त ठिकाने लगा देता। मगर अब सवाल यह पैदा होता है कि इसे रखा कहाँ जाये।’’

‘‘इसका इन्तज़ाम मैं करूँगी।’’ लेडी सीताराम जल्दी से बोली। ‘‘लेकिन इसे यहाँ से किस तरह ले जाया जायेगा।’’

‘‘बहुत ही आसानी से... यह मैं कर लूँगा।’’ कर्नल प्रकाश ने कहा और हमीद पर झुक गया। हमीद का सिर फट गया था। ज़ख़्म से खून बह रहा था।

कर्नल प्रकाश ने ज़ख़्म साफ़ करके पट्टी बाँध दी।

‘‘सुरेन्द्र, आओ... इसे पकड़ कर नीचे ले चलें। कार तो तुम लाये ही होगे।’’ कर्नल ने कहा।

‘‘तो क्या इसी तरह नीचे ले जाइएगा।’’ लेडी सीताराम हैरत से बोली।

‘‘हाँ... इसी तरह... तुम घबराओ नहीं... तुम अभी मुझे नहीं जानतीं।’’

हमीद को एक तरफ़ से सुरेन्द्र ने पकड़ा और दूसरी तरफ़ से कर्नल प्रकाश ने और उसे सहारा देते हुए ले चले।

नीचे उतर कर वे हॉल से गुज़र रहे थे कि मैनेजर लपकता हुआ उनकी तरफ़ आया।

‘‘क्यों... कर्नल साहब क्या बात है?’’

‘‘अरे साहब, क्या बताऊँ... आज कल के लौंडों के जिस्म में ताक़त नहीं और पीने पर आयेंगे तो बोतलें साफ़... साहबज़ादे ने वह उछल-कूद मचायी कि सिर ही फोड़ बैठे। अब इन्हें इनके घर फेंकने जा रहा हूँ। मना कर रहा था कि ज़्यादा न पियो... मगर कौन सुनता है।’’

मैनेजर मुस्कुरा कर सिर हिलाता हुआ वापस चला गया।

‘‘क्यों सुरेन्द्र, कैसी रही।’’ कर्नल प्रकाश कार में बैठ कर बोला।

‘‘मानता हूँ उस्ताद...’’

‘‘मैं आपको इतना दिलेर नहीं समझती थी।’’ लेडी सीताराम बाली।

‘‘अभी तुम लोगों ने देखा ही क्या है... मुझे कर्नल प्रकाश कहते हैं।’’

कार अँधेरी सड़कों पर अपनी रोशनी बिखेरती हुई त़ेजी से सर सीताराम की कोठी की तरफ़ जा रही थी।

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प्रेम कहानी

हमीद को होश आया तो उसे अपने चारों तरफ़ अँधेरा-ही-अँधेरा फैला हुआ मालूम हुआ। उसका सिर बुरी तरह दुख रहा था। ख़ून ज़्यादा बह जाने की वजह से कमज़ोरी बढ़ गयी थी। उसने लेटे- ही-लेटे इधर-उधर हाथ-पैर चलाये। वह एक चटाई पर पड़ा था, थोड़ी देर तक वह आँखें फाड़-फाड़ कर अँधेरे में घूरता रहा, फिर उसने आँखें बन्द कर लीं। धीरे-धीरे सारी कहानी उसके ज़ेहन में नाचने लगी। मालूम नहीं वह इस वक़्त कहाँ पड़ा हुआ है। इसका तो उसे यक़ीन हो गया था कि वह कहीं पर क़ैद है। उसने कर्नल प्रकाश का राज़ मालूम कर लिया था। लिहाज़ा वह उसे आज़ाद क्यों छोड़ने लगा। आख़िर लेडी सीताराम का राज़ क्या था जिसकी तरफ़ कर्नल प्रकाश ने इशारा किया था? कहीं यह राम सिंह के क़त्ल की तरफ़ तो इशारा नहीं था। यह कर्नल प्रकाश बहुत ही चालाक आदमी मालूम होता है।

हमीद को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई उसके सिर पर हथौड़े चला रहा हो। उस पर धीरे-धीरे बेहोशी छाने लगी थी। न जाने कितना वक़्त गुज़र गया, वह सोता रहा।

अचानक उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी की नर्म साँस उसके चेहरे को छू रही हो। कोई उस पर झुका हुआ था। उसने आँखें खोलने की कोशिश की, लेकिन ऐसा मालूम हुआ जैसे उनमें मिर्चें भर दी गयी हों। लाख कोशिश के बावजूद वह आँखें न खोल सका। अब किसी की नर्म-नर्म उँगलियाँ उसके बालों पर धीरे-धीरे रेंग रही थीं।

‘‘हमीद साहब।’’ किसी ने धीरे से पुकारा।

वह चौंक पड़ा। आवाज़ जानी-पहचानी मालूम हुई। उसने फिर पुकारा। अब की बार हमीद ने आँखें खोल दीं और साथ ही वह हड़बड़ा कर उठ बैठा।

‘‘अरे तुम... शहनाज़...’’ वह ख़ुशी और ताज्जुब के मिले जुले लहजे में चीख़ा।

शहनाज़ ने सिर हिला दिया। उसका सु़र्ख और गोरा रंग हल्दी की तरह पीला हो गया था। आँखों के चारों तरफ़ गड्ढे पड़ गये थे। होंटों पर काली-काली तह जम गयी थी। आँखों में आँसू छलक रहे थे।

‘‘यह आपके सिर में क्या हुआ...? आपके कोट पर ख़ून के धब्बे कैसे हैं?’’ शहनाज़ एक ही साँस में कह गयी।

‘‘यह एक लम्बी कहानी है...’’ हमीद ने कहा। ‘‘मुझ में इतनी ताक़त नहीं कि अभी बता सकूँ। मैं तुम्हारे बारे में जानने के लिए बेताब हूँ। तुम यहाँ किस तरह पहूँचीं।’’

‘‘यह मैं बाद में बताऊँगी। आपकी हालत मुझसे नहीं देखी जाती। मैं क्या करूँ।’’

‘‘सच...’’ हमीद ने एक मुस्कुराहट के साथ कहा और फिर चटाई पर लेट गया। शहनाज़ ने अपना दुपट्टा तह करके उसके सिर के नीचे रख दिया। उसकी आँखों में रुके हुए क़तरे गालों पर ढलक आये।

‘‘तुम रो रही हो? पगली कहीं की।’’ हमीद धीरे से बोला। ‘‘मैं तुम्हें पाने के लिए जद्दोजेहद कर रहा था... पा लिया... अब मैं बहुत ही सुकून के साथ मर सकता हूँ।’’

शहनाज़ हिचकियाँ ले कर रोने लगी।

‘‘तुम मुझे अपना दोस्त समझती हो?’’ हमीद ने पूछा।

शहनाज़ ने ‘‘हाँ’’ में सिर हिला दिया।

‘‘तो मैं अपनी दोस्ती की क़सम दे कर कहता हूँ कि रोना बन्द करो... मैं अपने दिल को इस वक़्त बहुत ज़्यादा कमज़ोर महसूस कर रहा हूँ।’’

शहनाज़ ने आँसू पोंछ डाले और अपनी हिचकियों को दबाने की कोशिश करने लगी।

‘‘तुम बहुत अच्छी लड़की हो। मैं शुरू ही से तुम्हें बेगुनाह समझता रहा हूँ... जब तुम्हारी गिरफ़्तारी का वॉरण्ट निकला था तो मैं इन्स्पेक्टर से लड़ गया था।’’

‘‘गिरफ़्तारी का वारॅण्ट...’’ शहनाज़ चौंक कर बोली। ‘‘वह किसलिए?’’

‘‘तुम्हारे ग़ायब हो जाने के बाद तुम्हारे घर से एक ख़त बरामद हुआ जिसमें किसी गिरोह की तरफ़ से ग़ायब हो जाने की हिदायत दी गयी थी।’’

‘‘मैं ख़ुदा की क़सम खा कर कहती हूँ कि मुझे इस तरह के किसी ख़त का पता नहीं और न मैं किसी गिरोह को जानती हूँ।’’

‘‘अब क़सम खाने की ज़रूरत नहीं।’’ हमीद ने कहा। ‘‘तुम्हारी बेगुनाही सूरज की तरह रोशन है। अच्छा, यह बता सकती हो कि तुम किसकी क़ैद में हो।’’

‘‘यह मुझे आज तक न मालूम हो सका। लेकिन मुझे क़ैद करने वाले मुझ पर मेहरबान ज़रूर हैं... उन्होंने मुझे भूखों नहीं मारा।’’

‘‘अच्छा! तो क्या कोई खाना ले कर आता है?’’

‘‘नहीं... इस सामने वाली दीवार की जड़ में एक दरार-सी पैदा हो जाती है और इसी से खाना अन्दर की तरफ़ धकेल दिया जाता है और जब मैं बर्तन इस दरार से बाहर निकाल देती हूँ तो दरार अपने आप बन्द हो जाती है।’’

अब हमीद ने लेटे-ही-लेटे उस जगह का जायज़ा लेना शुरू किया। यह एक बड़ा कमरा था। एक तरफ़ बड़ी-सी मेज़ और कुछ कुर्सियाँ पड़ी हुई थीं। कमरा बता रहा था कि वह तहख़ाना है, छत में दो-तीन जगह मोटे-मोटे और धुँधले शीशे लगे हुए थे, जिनके ज़रिये थोड़ी-बहुत रोशनी अन्दर आती थी। शीशे इतने धुँधले थे कि उनके पार की कोई चीज़ दिखाई नहीं देती थी। इस पूरे कमरे में बाहर जाने के लिए कोई दरवाज़ा नहीं था। सिर्फ़ एक दरवाज़ा नज़र आ रहा था, वह भी इस कमरे के एक कोने में बनी हुई कोठरी का था।

‘‘क्या यह दरवाज़ा बाहर जाने का है।’’ हमीद ने पूछा।

‘‘नहीं ग़ुसलख़ाना है।’’

‘‘तो इसका मतलब कि यह कमरा नहीं, हमारा मक़बरा है।’’ हमीद ने कहा। ‘‘ज़रा हाथ-पाँव में कुछ ताक़त आये तो बाहर निकलने की कोशिश की जाये।’’

इतने में सामने वाली दीवार की जड़ में खटके के साथ एक फ़ुट चौड़ी दरार पैदा हो गयी, जिससे एक ट्रे, जिसमें नाश्ता था, कमरे के अन्दर खिसका दी गयी। शहनाज़ ने बढ़ कर ट्रे उठा ली। हमीद दरार को ग़ौर से देख रहा था। वह सोच रहा था कि इस दरार की हिफ़ाज़त की जाती होगी। हमीद खय़ालों में उलझ गया। इतनी देर में शहनाज़ ने दो प्यालियाँ चाय की तैयार कीं। हमीद को बिलकुल भूख नहीं थी, लेकिन शहनाज़ के कहने पर कुछ-न-कुछ खाना ही पड़ा। शहनाज़ ने बर्तन उसी दरार से वापस कर दिये।

‘‘कल तक मैं बहुत परेशान थी, लेकिन आज न जाने क्यों ऐसा मालूम हो रहा है कि मैं अपने घर ही में बैठी हूँ।’’ शहनाज़ ने कहा।

‘‘ख़ुदा ने चाहा तो बहुत जल्द अपने घर में होगी। मैंने अपनी ज़िन्दगी में एक ही काम अक़्लमन्दी का किया है।’’

‘‘वह क्या...?’’

‘‘यही कि इस हादसे से पहले मैं फ़रीदी साहब को यहाँ के पूरे हालात लिख दिये थे।’’

‘‘तो क्या फ़रीदी साहब मौजूद नहीं थे?’’

‘‘नहीं...वे बाहर गये हुए हैं।’’ हमीद ने कहा और उसके बाद उसने शुरू से ले कर आख़िर तक शहनाज़ को सारी बातें बता दीं।

‘‘तो फिर इसका यह मतलब हुआ कि मैं लेडी सीताराम की क़ैद में हूँ?’’ शहनाज़ ने हैरत से कहा।

‘‘बिलकुल...’’

‘‘लेकिन आख़िर क्यों...? मैंने उनका क्या बिगाड़ा है?’’

‘‘वह दरअसल अपना जुर्म किसी दूसरे के सिर थोपना चाहती थी। इत्तफ़ाक़ से तुम फँस गयीं।’’

‘‘तो क्या लेडी सीताराम ही राम सिंह की क़ातिल हैं?’’

‘‘हालात तो यही कहते हैं।’’

‘‘अब मुझे यहाँ से बच निकलने की कोई उम्मीद नहीं।’’

‘‘ऐसा मत सोचो... फ़रीदी साहब ज़रूर आयेंगे और अगर वे न भी आये तो मेरी मौजूदगी में तुम्हें परेशान होने की बिलकुल कोई ज़रूरत नहीं।’’

‘‘आप बहुत अच्छे आदमी हैं...’’ शहनाज़ ने कहा।

‘‘बस, इतनी-सी बात... नहीं, मैं बहुत बुरा आदमी हूँ।’’

‘‘होगे! लेकिन मेरे लिए नहीं।’’

‘‘तो क्या वाक़ई तुम मुझ पर भरोसा करती हो?’’

‘‘आख़िर क्यों न करूँ?’’

‘‘एक बात पूछूँ... तुमने लेडी सीताराम के यहाँ का ट्यूशन क्यों छोड़ दिया था?’’

‘‘मुझे नापसन्द था।’’

‘‘आख़िर नापसन्द करने की वजह?’’

‘‘वहाँ कई आवारा क़िस्म के लोग आने लगे थे। अकसर वे मुझे भी अपनी तरफ़ बुलाने की कोशिश करते थे। यह चीज़ मुझे पसन्द नहीं थी।’’

हमीद कुछ और पूछने का इरादा कर ही रहा था कि शहनाज़ ने उसे रोक दिया।

‘‘आप ज़्यादा बातें न कीजिए... सिर से बहुत ज़्यादा ख़ून निकल गया है... कहीं फिर चक्कर न आ जाये।’’

‘‘इतने दिनों के बाद तुम मिली हो... दिल चाहता है बस बातें किये जाओ।’’

‘‘नहीं, बस आँख बन्द कीजिए... मैं सिर सहलाती हूँ।’’

हमीद ने आँखें बन्द कर लीं और शहनाज़ धीरे-धीरे उसका सिर सहलाने लगी। हमीद को अपने दिल में एक अजीब-सी ख़लिश महसूस होने लगी। वह प्यार जो हर मर्द को औरत से मिलता है, हमीद को आज तक न मिला था। हमीद को शहनाज़ के इस रवैये से एक लगाव महसूस हुआ जिसे ममता के बाद का दर्जा दिया जा सकता है। उसकी बन्द आँखों से आँसू फूट निकले।

‘‘अरे... अरे, आँसू क्यों?’’

‘‘कुछ नहीं...’’ हमीद ने घुटी हुई आवाज़ में कहा।

‘‘आपको मेरी क़सम, बताइए क्या बात है?’’

‘‘मुझसे तुम्हारी यह हालत नहीं देखी जाती।’’ हमीद ने कहा।

‘‘फ़िलहाल आप अपनी हालत देखिए... मेरी बाद में देखिएगा।’’

‘‘यह आफ़त तुमने ख़ुद अपने सिर मोल ली है।’’ हमीद ने कहा।

‘‘वह कैसे...?’’

‘‘न तुम इतनी सोशल होतीं और न यह दिन देखना नसीब होता।’’

‘‘अपनी इस बेवकूफ़ी पर तो बहुत दिनों से रो रही हूँ।’’ शहनाज़ ने कहा। ‘‘अगर कभी आसमान देखना नसीब हुआ तो इन्शा अल्लाह सही मानी में एक शरीफ़ औरत की तरह ज़िन्दगी गुज़ारने की कोशिश करूँगी।’’
 
‘‘जब तक कि हमारे समाज का पूरा ढाँचा ही न बदल जाये औरतों की आज़ादी कोई मानी नहीं रखती।’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं... अब यह बात मेरी समझ में भी आ गयी है।’’

‘‘ख़ैर, छोड़ो इन बातों को... अब यहाँ से निकलने का कोई प्लान बनाना चाहिए।’’ हमीद ने उठते हुए कहा।

‘‘तो लेटे रहिए न...’’

‘‘नहीं, यह लेटने का वक़्त नहीं। अब किसी पल भी हम मौत से दो-चार हो सकते हैं।’’

‘‘वह कैसे...’’

‘‘कर्नल प्रकाश सिर्फ़ यह मालूम करने के लिए मुझे यहाँ लाया है कि मैं कौन हूँ। मैंने उसका राज़ मालूम कर लिया है... इसलिए वह मुझे कभी ज़िन्दा न छोड़ेगा।’’

‘‘ख़ुदा न करे... ऐसी बात मुँह से न निकालिए।

‘‘मैं सच कह रहा हूँ शहनाज़... यहाँ से बच कर निकलने के लिए जल्दी ही कुछ-न-कुछ करना चाहिए।’’

हमीद उठ कर तहख़ाने की दीवारों को देखने लगा। वह बड़ी मेहनत से दीवार का एक-एक हिस्सा ठोंक-बजा कर देख रहा था। थोड़ी देर बाद वह पसीने-पसीने हो गया, लेकिन कोई नतीजा न निकला।

‘‘मालूम होता है शायद मरने का वक़्त सचमुच क़रीब आ गया है।’’ हमीद ने बेबसी से कहा।

शहनाज़ के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं वह निढाल हो कर चटाई पर लेट गयी।

‘‘क्यों... क्या बात है?’’ हमीद ने कहा।

‘‘कुछ नहीं... यूँ ही चक्कर-सा आ गया है।’’

‘‘घबराओ नहीं... ज़रूर कोई-न-कोई रास्ता निकल आयेगा। मैं इस पर यक़ीन रखता हूँ कि बेगुनाहों का कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता।’’ हमीद ने कहा।

शहनाज़ ने कोई जवाब न दिया। हमीद बैठा सोचता रहा। अचानक उसका खय़ाल दीवार के उस हिस्से की तरफ़ गया जहाँ दरार पैदा हुई थी। वह झुक कर देखने लगा। वहीं क़रीब ही फ़र्श की एक ईंट उखड़ी हुई थी और ख़ाली जगह इतनी भरी हुई थी कि सतह फ़र्श के बराबर हो गयी थी। हमीद ने पहले तो उसकी तरफ़ कोई ध्यान न दिया, लेकिन फिर सोचने लगा कि यहाँ इस तहखाने में इतनी धूल-मिट्टी कहाँ से आयी कि ख़ाली ईंट की जगह ख़ुद-ब-ख़ुद भर गयी और अगर ईंट निकल जाने के बाद उसमें मिट्टी इसलिए भर दी गयी है कि फ़र्श बराबर हो जाये तो यह बात बिलकुल बेतुकी-सी लगती है, क्योंकि जहाँ उस जगह दूसरी ईंट जड़ी जा सकती थी, वहाँ मिट्टी से उसे भरने की कोई वजह नहीं हो सकती।

हमीद ने इधर-उधर देखा। मेज़ पर एक चम्मच पड़ा हुआ था। वह उससे मिट्टी खोदने लगा। काफ़ी मिट्टी निकल जाने के बाद अचानक चम्मच किसी ठोस चीज़ से टकराया। उसने जल्दी-जल्दी मिट्टी निकालनी शुरू की। वह ठोस चीज़ लोहे का एक लट्टू था। उसने उसे घुमाने की कोशिश की, लेकिन उसे हिला भी न सका। उसने अब उसे दूसरी तरफ़ घुमाना शुरू किया। थोड़ी मेहनत के बाद ही लट्टू घूमने लगा और जहाँ पर दरार पैदा हुई थी, वहाँ की दीवार का कुछ हिस्सा धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा था।

‘‘शहनाज़, यह देखो...’’ हमीद ख़ुशी में चीख़ा।

शहनाज़ और हमीद खड़े हैरत से देख रहे थे। सामने की दीवार में एक बड़ा-सा दरवाज़ा दिखा। कुछ दूरी पर ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ थीं।

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एक और भयानक नाच

अभी दोनों की हैरत ख़त्म न हुई थी कि सीढ़ियों पर क़दमों की आहट सुनाई दी। कर्नल प्रकाश और लेडी सीताराम सीढ़ियाँ उतरते हुए नीचे की तरफ़ आ रहे थे। हमीद को ऐसा मालूम हुआ जैसे किसी ने उसे पहाड़ पर से ज़मीन की तरफ़ लुढ़का दिया हो। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करे। कर्नल प्रकाश ने एक ज़ोरदार क़हक़हा लगाया।

‘‘बड़े चालाक हो बरख़ुरदार...’’ उसने जेब से पिस्तौल निकालते हुए कहा। ‘‘पीछे हटो।’’

शहनाज़ और हमीद सहम कर पीछे हट गये।

‘‘लो रेखा, अच्छे वक़्त पर पहूँच गये, वरना यह अभी चोट दे ही गया था।’’ कर्नल प्रकाश ने कमरे में दाख़िल होते हुए कहा।

‘‘डार्लिंग... तुम हमेशा ठीक वक़्त पर काम की बातें सोचते हो।’’ लेडी सीताराम उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए बोली।

‘‘तुम लोग वहाँ कोने में जा कर बैठो।’’ कर्नल प्रकाश ने हमीद और शहनाज़ से कहा। ‘‘अगर ज़रा-सी भी शरारत की तो याद रखना, यह पिस्तौल बड़ा ख़ूनी है।’’

हमीद और शहनाज़ कोने में जा कर बैठ गये।

‘‘जानती हो रेखा डार्लिंग, यह कौन है।’’ कर्नल प्रकाश ने कहा।

‘‘नहीं...’’

‘‘सरकारी जासूस सार्जेंट हमीद...’’

‘‘अरे...’’

‘‘हाँ... यह मुझे सुबह मालूम हुआ। कहो बेटा हमीद साहब, अब तुम्हारा क्या हश्र किया जाये?’’

‘‘कर्नल प्रकाश... कान खोल कर सुन लो... अगर मेरा बाल भी बाँका हुआ तो मेरे उस्ताद तुम्हें ज़िन्दा न छोड़ेंगे। चाहे तुम पाताल ही में जा कर क्यों न छुपो।’’ हमीद ने कहा।

‘‘अच्छा रेखा... अभी मैं इन दोनों को ख़त्म किये देता हूँ। तुम यह बताओ कि अफ़्रीका चलने की क्या रही। अगर तुम तैयार हो जाओ तो मैं अपने दोनों हार लिये बग़ैर ही चला जाऊँगा। तुमसे ज़्यादा उन हारों की कीमत नहीं है।’’

‘‘मगर यह अभी कैसे हो सकता है।’’ लेडी सीताराम ने कहा।

‘‘जो चीज़ तुम्हें रोक रही है, मैं उसे भी समझता हूँ। तुम इत्मीनान रखो... सुरेन्द्र को मुझसे समझौता करना ही पड़ेगा।’’

‘‘क्या मतलब...?’’ लेडी सीताराम चौंक कर बोली।

‘‘अरे, तुम इसका मतलब नहीं समझीं। क्या वह कल रात वाला कागज़़ याद नहीं, जो मैंने सुरेन्द्र को दिया था। देखो... मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम्हारे और सुरेन्द्र के नाजायज़ सम्बन्ध हैं। राम सिंह के हाथ तुम्हारा एक ख़त लग गया था, जो तुमने सुरेन्द्र को लिखा था। वह आये दिन तुम लोगों को उसी ख़त का हवाला देते हुए धमका कर तुमसे रुपया ऐंठता था। आख़िर एक दिन तंग आ कर तुमने उसे क़त्ल कर देने का प्लान बनाया और उसे क़त्ल भी कर दिया। कर्नल प्रकाश से कोई बात छिपी हुई नहीं है।’’

लेडी सीताराम का चेहरा लाल हो गया और वह काँपने लगी।

‘‘लेकिन मेरी रेखा... मैं तुम्हारे बग़ैर ज़िन्दा नहीं रह सकता। मैं तुम्हारी पिछली ज़िन्दगी से कोई सरोकार न रखूँगा। मुहब्बत अन्धी होती है। वह अच्छाई या बुराई कुछ नहीं देखती।’’

‘‘कर्नल, मैं तुम्हारे साथ चलूँगी। इतनी बुराइयों के बावजूद भी मुझमें सच्ची मुहब्बत का जज़्बा मौजूद है। मैं अपनी ज़िन्दगी तुम पर न्योछावर कर दूँगी। मैं क्या बताऊँ कि किन मजबूरियों के तहत सुरेन्द्र...’’

‘‘सुरेन्द्र के साथ अय्याशी करती थी।’’ दरवाज़े की तरफ़ से आवाज़ आयी।

सब की निगाहें उधर उठ गयीं। दरवाज़े पर सुरेन्द्र हाथ में पिस्तौल लिये खड़ा था, जिसका रुख़ कर्नल प्रकाश की तरफ़ था।

‘‘तुम दोनों यह आरज़ू लिये-लिये ही दुनिया से चले जाओगे।’’ वह गरज कर बोला।

कर्नल प्रकाश ने उठना चाहा... सुरेन्द्र ने बैठ कर लट्टू घुमा दिया। दरवाज़ा बन्द हो चुका था।

‘‘ख़बरदार... अपनी जगह से हिलना मत...’’ सुरेन्द्र ने चीख़ कर कहा।

कर्नल प्रकाश ने उसकी तरफ़ बढ़ते हुए क़हक़हा लगाया।

‘‘पीछे हटो... पीछे हटो... नहीं तो गोली चला दूँगा।’’ सुरेन्द्र चीख़ा।

‘‘चला भी दो मेरी जान।’’ कर्नल प्रकाश रुक कर बोला। ‘‘मुझे तुमसे भी उतनी ही मुहब्बत है जितनी कि रेखा से है।’’

‘‘चुप रहो... सुअर के बच्चे।’’ सुरेन्द्र ने गरज कर कहा और ट्रिगर दबा दिया। मगर धमाके की आवाज़ नहीं सुनाई दी।

कर्नल प्रकाश ने फिर क़हक़हा लगाया। सुरेन्द्र घबरा कर पिस्तौल की तरफ़ देखने लगा।

‘‘वाह बरख़ुरदार... इसी के बलबूते पर बहादुरी दिखाने चले थे। सुनो बेटा... मैं माथे की लकीरों में दिल का हाल पढ़ लेता हूँ। मैंने उसी वक़्त तुम्हारी जेब में पड़े हुए पिस्तौल की गोलियाँ निकाल ली थीं जब तुम ऊपर मुझसे बात कर रहे थे। मैं कल रात ही समझ गया था कि तुम कोई चाल ज़रूर चलोगे।

इसलिए तुम इस तहख़ाने को हम दोनों आदमियों का मक़बरा बनाना चाहते थे। ख़ैर अब भी यहाँ तीन ही लाशें होंगी।’’

कर्नल प्रकाश ने बढ़ कर सुरेन्द्र की गर्दन पकड़ ली। सुरेन्द्र बच्चों की तरह चीख़ता रहा। कर्नल प्रकाश ने उसे एक कुर्सी पर बिठा दिया।

‘‘देखो सुरेन्द्र, मैं अब भी तुमसे समझौता करना चाहता हूँ। अगर तुम मुझे रेखा को निकाल ले जाने में मदद देने का वादा करो तो तुम्हें छोड़ दूँगा।’’

‘‘मुझे मंज़ूर है।’’ सुरेन्द्र ने भर्रायी हुई आवाज़ में कहा।

‘‘यूँ नहीं।’’ कर्नल प्रकाश हँस कर बोला। ‘‘तुम बहुत ख़तरनाक आदमी हो। तुम्हें अपना फ़ैसला बदलते देर नहीं लगती। मैं कोई ऐसी चीज़ चाहता हूँ जिससे हमेशा तुम्हारी कोर मुझसे दबती रहे ताकि तुम बाद में कोई शरारत न कर सको।’’

‘‘आख़िर तुम चाहते क्या हो...?’’

‘‘तुम मुझे यह लिख कर दे दो कि तुम राम सिंह के क़ातिल हो। इस पर तुम्हारे और रेखा दोनों के दस्तख़त होंगे। तुम घबराओ नहीं... मैं यह सिर्फ़ अपने इत्मीनान के लिए कर रहा हूँ।’’

सुरेन्द्र के माथे से पसीना छूट पड़ा। कभी वह लेडी सीताराम की तरफ़ देखता और कभी कर्नल प्रकाश की तरफ़।

‘‘मैं एक कागज़़ पर लिखे देता हूँ। तुम दोनों अपने दस्तख़त कर दो।’’ कर्नल प्रकाश ने कहा।

‘‘मैं क्यों दस्तख़त करूँ।’’ रेखा ने कहा।

‘‘रेखा डार्लिंग... तुम घबरा क्यों गयी हो। तुम्हारे दस्तख़त से यह चीज़ और मजबूत हो जायेगी, क्योंकि तुम गवाह के तौर से इस पर दस्तख़त करोगी।

तभी हम दोनों चैन से रह सकेंगे, वरना ये हज़रत।’’

कर्नल प्रकाश ने जल्दी-जल्दी कागज़़ पर लिख कर, दस्तख़त के लिए सुरेन्द्र की तरफ़ बढ़ा दिया। सुरेन्द्र ने माथे का पसीना पोंछते हुए दस्तख़त कर दिये। लेडी सीताराम ने भी यही किया, कर्नल प्रकाश ने कागज़़ मोड़ कर जेब में रख लिया।

‘‘अब तुम दोनों मरने के लिए तैयार हो जाओ।’’ उसने हमीद और शहनाज़ की तरफ़ देख कर कहा।

फिर अचानक कर्नल प्रकाश ने जंगलियों की तरह उछल-उछल कर नाचना शुरू कर दिया। साथ-ही–साथ वह गाता भी जा रहा था। लेकिन वह क्या गा रहा था यह किसी की समझ में नहीं आया, क्योंकि ज़बान विदेशी थी।

वह वहशियों से भी बदतर होता जा रहा था।

‘‘प्रकाश डार्लिंग... प्रकाश डार्लिंग...’’ लेडी सीताराम चीख़ी।

कर्नल प्रकाश, उसी तरह नाचता हुआ बोला। ‘‘बोलो मत... बोलो मत... चीं खीं चीं गीरोला। मैं ख़ुशी का नाच-नाच रहा हूँ। अफ़्रीका के जंगलियों का नाच... गीरोला चिप्पी पैनी टिमटिमायें गीरोला।’’

नाचते-नाचते उसका चश्मा उछल कर दीवार से जा टकराया। मूँछ और दाढ़ी उखड़ कर फर्श पर गिर गयीं और हमीद चीख़ पड़ा। ‘‘फ़रीदी साहब।’’

फ़रीदी खड़ा क़हक़हे लगा रहा था। लेडी सीताराम चीख़ मार कर बेहोश हो गयी। सुरेन्द्र बैठा इस तरह काँप रहा था जैसे उसे जाड़ा दे कर बुख़ार आ गया हो।

फ़रीदी ने जेब से हथकड़ियाँ निकाल कर हमीद को दीं। हमीद ने जल्दी-जल्दी दोनों को हथकड़ियाँ पहना दीं।

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