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औरत फ़रोश का हत्यारा ibne safi

‘‘लेडी सीताराम ने।’’ शहनाज़ ने कहा। ‘‘लेडी सीताराम मुझे अच्छी तरह जानती हैं। मैं उनकी छोटी बहन का ट्यूशन करती थी। जब मैं कल शाम को ‘गुलिस्ताँ होटल’ पहूँची तो वे दोनों बैठे हुए थे। लेडी सीताराम ने मुझे भी उसी मेज़ पर बुलाया। वहीं उससे पहचान हुई। लेडी सीताराम को थोड़ी देर बाद अचानक कोई काम याद आ गया और वे जल्द ही वापस आ जाने का वादा करके चली गयीं। मुझे हमीद साहब का इन्तज़ार करना था, क्योंकि उन्होंने मुझसे ‘गुलिस्ताँ होटल’ में मिलने का वादा किया था, इसलिए मैं वहीं कुँवर साहब के पास बैठी बातें करती रही। फिर कुछ देर बाद नाच शुरू हो गया। लेडी सीताराम उस वक़्त तक नहीं लौटी थीं। हमारे हमीद साहब भी नदारद थे। मैं सोच रही थी क्या करूँ कि कुँवर साहब ने नाचने के लिए कहा। दिल तो नहीं चाहता था, मगर न चाहते हुए भी नाचना ही पड़ा।’’

‘‘अच्छा दूसरे राउण्ड में जो औरत उसके साथ नाच रही थी, वह कौन थी?’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘लेडी सीताराम... वह शायद पहले ही राउण्ड के बीच में वापस आ गयी थीं।’’ शहनाज़ ने कहा।

‘‘अच्छा, तो वही लेडी सीताराम थीं।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘वे तो बिलकुल जवान हैं और सीताराम की उम्र साठ से किसी तरह कम न होगी।’’

‘‘ये उनकी दूसरी बीवी हैं। अभी तीन साल हुए उनकी शादी हुई है।’’

‘‘जिस लड़की को आप पढ़ाती हैं उसकी उम्र क्या है?’’

‘‘ज़्यादा-से-ज़्यादा पन्द्रह साल।’’

‘‘क्या वह भी यहाँ रहती है?’’

‘‘जी हाँ! लेडी सीताराम उसे अपने साथ रखती हैं।’’

‘‘सर सीताराम और लेडी सीताराम के ताल्लुक़ात कैसे हैं?’’ मेरे खय़ाल से तो आपस में बनती न होगी?’’ फ़रीदी ने धीरे से कहा।

‘‘ऐसी कोई बात तो नहीं मालूम होती। लगभग एक साल तक मैं उनके यहाँ आती-जाती रही हूँ।’’

‘‘अब मैं यह सोच रहा हूँ कि पुलिस को इसकी ख़बर कैसे मिली कि आप उसके साथ नाच रही थीं। क्या ‘गुलिस्ताँ होटल’ में कोई और भी आपका जानने वाला मौजूद था?’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘मेरे खय़ाल से तो आप दोनों और लेडी सीताराम के अलावा और कोई नहीं था या अगर और कोई रहा भी हो तो मुझे उसका पता नहीं।’’

‘‘आपने पुलिस को बयान देते वक़्त यह बताया था या नहीं कि लेडी सीताराम काफ़ी वक़्त तक कुँवर रामसिंह के साथ रहीं जिनका क़त्ल कर दिया गया,’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘क़त्ल...’’ शहनाज़ चौंक कर बोली। ‘‘तो क्या कुँवर साहब को क़त्ल किया गया है लेकिन अख़बारों में तो उनकी ख़ुदकुशी की ख़बर छपी हुई है।’’

‘‘शायद ऐसा ही हो।’’ फ़रीदी ने लापरवाही से कहा। ‘‘हाँ, आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया।’’

‘‘मैं दरअसल पुलिस को यह बताना भूल गयी कि लेडी सीताराम भी कुँवर साहब के साथ थीं।’’ शहनाज़ ने कहा। ‘‘मैं अभी इसकी ख़बर पुलिस को दे दूँगी।’’

‘‘नहीं, अब इसकी कोई ज़रूरत नहीं। अब आप पुलिस को कोई और बयान न दीजिएगा। मैं अभी कोतवाली जा कर सारा मामला ठीक कर दूँगा। आपको कोई परेशान नहीं करेगा।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘किस ज़बान से आपका शुक्रिया अदा करूँ।’’ शहनाज़ ने कहा।

‘‘शुक्रिया वग़ैरह की ज़रूरत नहीं।’’ हमीद ने मुँह बना कर कहा। ‘‘ये अपने ही आदमी हैं।’’

‘‘क्या कहा आदमी...’’ फ़रीदी ने बनावटी ग़ुस्से से कहा।

‘‘जी नहीं, अफ़सर...’’ हमीद ने घबराने की ऐक्टिंग करते हुए कहा। शहनाज़ हँसने लगी।

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शहनाज़ ग़ायब

शहनाज़ के चले जाने के बाद फ़रीदी और हमीद दोनों कोतवाली की तरफ़ चल दिये। उनकी कार तेज़ी से शहर की सड़कें तय कर रही थी।

‘‘क्यों भई हमीद... शहनाज़ के बारे में तुम्हारा क्या खय़ाल है?’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘यह आप क्यों पूछ रहे हैं और किस नाते से?’’ हमीद बोला।

‘‘आशिक़ के नाते से नहीं पूछ रहा हूँ, बल्कि सार्जेंट के नाते से पूछ रहा हूँ।’’

‘‘तो मेरा जवाब यह है कि मैं उसके लिए किसी हालत में भी सार्जेंट हमीद नहीं हो सकता।’’

‘‘और अगर राम सिंह के क़त्ल में उसी का हाथ हो तो...’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘तब भी मैं सिर्फ़ हमीद रहूँगा।’’ हमीद ने गम्भीरता से कहा।

‘‘शाबाश... ऐ मजनूँ के भाई, ख़ुदा तुम पर रहम करे।’’ फ़रीदी ने हँस कर कहा। ‘‘अगर यही बात है तो मजबूरन मुझे तुमको इस केस से अलग ही रखना पड़ेगा।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘तो आपको यह केस मिला ही कब जाता है। कोई ऐसा ख़ास केस नहीं। राम सिंह एक मुजरिम और क़ातिल था। जब भी पुलिस के हत्थे चढ़ता, उसे फाँसी ज़रूर हो जाती। मेरा खय़ाल है कि इस सिलसिले में कुछ ज़्यादा छान-बीन ही न की जायेगी। लेकिन एक बात समझ में नहीं आयी कि अख़बारों में ख़ुदकुशी की ख़बर छपी है, जबकि आप पूरे तौर पर उसे क़त्ल साबित कर चुके थे।’’

‘‘यह सब उसी बूढ़े सब-इन्स्पेक्टर की शरारत है। वह दरअसल अपनी कारगुज़ारी दिखा कर तरक़्क़ी हासिल करना चाहता था। दो-तीन दिन के बाद वह अपने तरीक़े से इस बात को पब्लिक के सामने लायेगा कि मरने वाला किसी रियासत का राजकुमार नहीं, बल्कि मशहूर बदमाश राम सिंह था और उसने ख़ुदकुशी नहीं की, बल्कि उसे क़त्ल किया गया है। ख़ैर, मुझे क्या... इस तरह उसका भला होता है तो मुझे क्या ऐतराज़ हो सकता है।’’

‘‘लेकिन आपने जिस वक़्त अपनी दलील पेश की थी, वहाँ होटल मैनेजर भी तो मौजूद था।’’ हमीद ने कहा।

‘‘तो इससे क्या होता है। उसका मुँह बहुत आसानी से बन्द किया जा सकता है, मेरे खय़ाल से तो सब-इन्स्पेक्टर की सिर्फ़ एक ही धमकी काफ़ी हुई होगी।’’

‘‘ख़ैर, अगर ऐसा है तो मैं उन बूढ़े मियाँ से समझ लूँगा।’’ हमीद ने होंट सिकोड़ते हुए कहा।

‘‘इसकी ज़रूरत ही क्या है।’’ फ़रीदी ने धीरे से कहा और कोतवाली के फाटक में दाख़िल होने के लिए कार घुमायी।

‘‘बूढ़ा सब-इन्स्पेक्टर सिन्हा कोतवाली में मौजूद था और वह नौजवान सब-इन्स्पेक्टर भी, जो वारदात की रात में सब-इन्स्पेक्टर सिन्हा के साथ था।’’

‘‘फ़रीदी साहब, आपकी रात वाली बात मेरी समझ में नहीं आयी थी।’’ सब-इन्स्पेक्टर ने झेंप मिटाते हुए कहा। ‘‘मैं उसे ख़ुदकुशी ही समझता हूँ।’’

‘‘हो सकता है, आप ही की राय ठीक हो... मुझसे ग़लती भी हो सकती है।’’ फ़रीदी ने आराम से जवाब दिया।

‘‘नहीं... ख़ैर, मैं यह तो नहीं कह सकता।’’ सिन्हा ने कहा।

‘‘लेकिन आपने तहक़ीक़ात के सिलसिले में ग़लत आदमी को चुना है।’’ फ़रीदी ने सिगार सुलगाते हुए कहा।

‘‘मैं समझा नहीं।’’ सिन्हा बोला।

‘‘जिस वक़्त यह वारदात हुई, शहनाज़ मेरे साथ नाच रही थी और आख़िर तक मेरे ही साथ रही, पहले राउण्ड में वह ज़रूर राम सिंह के साथ नाची थी, लेकिन उसे कुँवर ही समझ कर... इससे पहले कभी उसने उसे देखा भी न था।’’

‘‘तब तो वाक़ई मुझसे ग़लती हुई।’’ सिन्हा ने जवाब दिया।

‘‘ख़ैर, कोई बात नहीं, वह बेचारी बहुत परेशान है।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘हाँ, यह तो बताइए कि इस बात का आपको किस तरह पता चला कि शहनाज़, राम सिंह के साथ नाच रही थी और उसके साथ नाचने वाली दूसरी औरत कौन थी।’’

‘‘दूसरी के बारे में तो मैं कुछ नहीं जानता।’’ सिन्हा ने जवाब दिया। ‘‘और किसी कारण से यह भी नहीं बता सकता कि शहनाज़ के बारे में ख़बर देने वाला कौन है।’’
 
‘‘ख़ैर, मैं इसके लिए आपको मजबूर न करूँगा। मैं तो इस वक़्त सिर्फ़ शहनाज़ की तरफ़ से सफ़ाई पेश करने के लिए आया था।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘उसकी तरफ़ से आप इत्मीनान रखें।’’ सिन्हा ने उठते हुए कहा। ‘‘मैं अब माफ़ी चाहता हूँ, एक ज़रूरी काम से मुझे बाहर जाना है।’’

‘ज़रूर-ज़रूर...’’ फ़रीदी ने उठ कर उससे हाथ मिलाते हुए कहा।

सिन्हा चला गया... नौजवान सब-इन्स्पेक्टर अभी तक ख़ामोश बैठा था। फ़रीदी उसकी तरफ़ मुड़ कर बोला :

‘‘कहिए दारोग़ा जी... क्या आप अभी हाल ही में यहाँ आये हैं।’’

‘‘जी हाँ... ट्रेनिंग ले कर आये हुए अभी सिर्फ़ छै महीने हुए हैं। अभी तो काम ही सीख रहा हूँ।’’

‘‘आप जल्दी तरक्क़ी करेंगे। फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा। ‘‘लेकिन इस लाइन में तरक्क़ी करने के लिए थोड़ी-सी चालबाज़ी की भी ज़रूरत होती है। अब सिन्हा साहब ही को ले लीजिए। कितनी होशियारी से काम ले रहे हैं कि अभी तक इस बात का भी ऐलान नहीं किया कि मृतक राजकुमार नहीं, बल्कि मशहूर बदमाश राम सिंह है। अगर यह इस केस में कामयाब हो गये तो इनका सर्कल इन्स्पेक्टर हो जाना कोई बड़ी बात नहीं।’’

‘‘अगर आप लोगों की मेहरबानी साथ रही तो मेरा तरक़्क़ी करना मुश्किल न होगा।’’ नौजवान सब-इन्स्पेक्टर बहुत ही इज़्ज़त के साथ बोला।

‘‘भई, मेरे लायक़ जो काम हो, उसके लिए मैं हर वक़्त तैयार हूँ। मुझे न जाने क्यों आपसे कुछ मुहब्बत-सी हो गयी है। लीजिए सिगार पीजिए।’’ फ़रीदी ने सिगार का डिब्बा बढ़ाते हुए कहा। नौजवान सब-इन्स्पेक्टर ने सलाम करके एक सिगार लिया और सुलगा कर हल्के-हल्के कश लेने लगा।

‘‘न जाने क्यों मेरा दिल चाह रहा है कि इस केस की निजी तौर पर छान-बीन करूँ और कामयाबी हो जाने पर मशहूर कर दूँ कि इसकी कामयाबी का सेहरा आप ही के सर है।’’

नौजवान सब-इन्स्पेक्टर की बाँछें खिल गयीं और उसके मुँह से सिर्फ़ इतना ही निकल सका, ‘‘अरे, ऐसा क्या...’’

‘‘नहीं, वाक़ई न जाने क्यों मैं आपको तरक्क़ी करता हुआ देखना चाहता हूँ। मैं यह जानता हूँ कि यह केस सिन्हा साहब की हठधर्मी की वजह से डिपार्टमेंट ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन के सुपुर्द न किया जायेगा और मेरा दिल भी चाहता है कि इसकी तफ़तीश करूँ, इसलिए इसका नतीजा यही होगा कि निजी तफ़तीश के बाद मुझे किसी-न-किसी के सिर इसकी कामयाबी का सेहरा ज़रूर बाँधना पड़ेगा। इसलिए मैं यह सोचता हूँ कि वह आप ही क्यों न हों।’’

‘‘अरे साहब, अगर ऐसा हो तो क्या कहने, मैं ख़ुद को दुनिया का सबसे ख़ुशकिस्मत इन्सान समझूँगा।’’ नौजवान सब-इन्स्पेक्टर बोला।

‘‘लेकिन इसके लिए राज़दारी शर्त है।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘और अभी तक तो यही पता नहीं चल सका कि शहनाज़ की मुख़बरी करने वाला कौन है।’’

‘‘आप परेशान न हों, मैं किसी से इसका ज़िक्र न करूँगा।’’ नौजवान सब-इन्स्पेक्टर ने कहा। ‘‘और रही शहनाज़ की बात तो उसकी मुख़बरी करने वाली एक औरत है।’’

‘‘वह कौन औरत है...?’’ फ़रीदी ने जल्दी से पूछा।

‘‘लेडी सीताराम...’’ सब-इन्स्पेक्टर ने धीरे से कहा। ‘‘कल आप के चले जाने के बाद वह हमें ‘गुलिस्ताँ होटल’ में मिली थी।’’

‘‘बहुत ख़ूब... अच्छा, इसका ज़िक्र सिन्हा साहब से न कीजिएगा। मैं अब चलूँगा।’’ फ़रीदी ने उठते हुए कहा। ‘‘हाँ, मैं आपका नाम पूछना तो भूल ही गया।’’ फ़रीदी चलते-चलते बोला।

‘‘मुझे जगदीश कुमार कहते हैं।’’ सब-इन्स्पेक्टर ने उठ कर हाथ मिलाते हुए कहा।

‘‘अच्छा जगदीश साहब... घबराइए नहीं... पुलिस के बड़े ओहदे आपका इन्तज़ार कर रहे हैं।’’ फ़रीदी ने कहा और हमीद को ले कर बाहर चला गया।

‘‘कहो बरख़ुरदार, कैसी रही।’’ फ़रीदी ने कार में बैठते हुए कहा।

‘‘भई, आपको घुसना भी ख़ूब आता है।’’ हमीद हँस कर बोला।

फ़रीदी हँसने लगा।

‘‘अब कहाँ चल रहे हैं?’’ हमीद ने पूछा।

‘‘सिविल सर्जन के यहाँ।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘क्यों... वहाँ क्या करना है।’’

‘‘रिश्वत दे कर अपने लिए एक माह की छुट्टी का मेडिकल र्सिटफ़िकेट लूँगा।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘वह क्यों...’’ हमीद ने हैरत से कहा।

‘‘मैं कुत्तों की नुमाइश देखने बाहर जा रहा हूँ, अपने कुछ बेहतरीन क़िस्म के कुत्ते भी अपने साथ ले जाऊँगा।’’ फ़रीदी ने कहा।
 
‘‘लेकिन आप तो निजी तौर पर इस केस की छान-बीन करने जा रहे थे।’’ हमीद ने हैरत से कहा।

‘‘मेरे खय़ाल से तो इसकी कोई ज़रूरत नहीं, असली मक़सद तो शहनाज़ को बचाना था, सो वह पूरा हो गया।’’

‘‘ताज्जुब है कि आप ऐसा कह रहे हैं। क्या आपको इस पर यक़ीन है कि सिन्हा सचमुच शहनाज़ का पीछा छोड़ देगा। अगर ऐसा था तो उसने लेडी सीताराम का नाम क्यों छिपाया। इससे मालूम होता है कि वह सफ़ाई दे देने के बाद भी शहनाज़ पर शक कर रहा है।’’

‘‘भई, कुछ भी हो... मेरा जाना ज़रूरी है। मैं नुमाइश के ऑर्गनाइज़र से वादा कर चुका हूँ। हाँ, यह ज़रूर हो सकता है कि नुमाइश ख़त्म होते ही फ़ौरन वापस आ जाऊँ।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘ख़ैर, साहब, जाइए... आप भला मेरे लिए क्यों तकलीफ़ करने लगे। जानते हैं न कि शहनाज़ मेरी दोस्त है।’’ हमीद ने मुँह फुला कर कहा।

‘‘बस, बिगड़ गये।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘तुम तो हो निरे घामड़... आख़िर इतनी जल्दी कौन-सी आफत आ जायेगी। मेरे जाने के बाद सर सीताराम के घर की निगरानी करते रहना। अच्छा, चलो... शहनाज़ को भी लगे हाथों कुछ बातें बताता चलूँ।’’

‘‘जी बस... रहने दीजिए। हम लोगों की फ़िक्र न कीजिए। ख़ुदा आपके कुत्तों को सलामत रखे।’’ हमीद ने मुँह बना कर कहा।

‘‘आप गधे हैं।’’ फ़रीदी ने यह कह कर कार शहनाज़ के घर की तरफ़ मोड़ दी।

शहनाज़ बेली रोड पर एक छोटे-से ख़ूबसूरत मकान में रहती थी। उस वक़्त वहाँ न जाने क्यों अच्छी-ख़ासी भीड़ लगी हुई थी। शहनाज़ की बूढ़ी नौकरानी हाथ नचा-नचा कर लोगों से बातें कर रही थी।

‘‘क्या बात है?’’ हमीद ने कार से उतर कर उससे पूछा।

‘‘अरे साहब! पूछिए मत, क्या हो गया?’’ वह हाँफती हुई बोली।

‘‘क्या हो गया?’’ हमीद ने हैरत से कहा।

‘‘अभी मेम साहिबा यहाँ खड़ी थीं। मैं वहाँ बरामदे में देख रही थी, अचानक एक मोटर यहाँ आ कर रुकी। उस पर से दो आदमी उतरे और उन्होंने मेम साहिबा को उठा कर मोटर में डाल दिया और मोटर यह जा, वह जा... न जाने कहाँ ग़ायब हो गयी। हाय! अब क्या होगा?’’ नौकरानी रोती हुई बोली।

‘‘मोटर किधर गयी?’’ फ़रीदी ने जल्दी से कहा, ‘‘और कितनी देर हुई, मोटर का रंग कैसा था।’’

‘‘मुश्किल से पन्द्रह-बीस मिनट हुए होंगे।’’ नौकरानी ने दक्खिन की तरफ़ हाथ उठाते हुए कहा। ‘‘मोटर उस तरफ़ गयी है। मोटर का रंग कत्थई था। बिलकुल नयी मालूम होती थी।’’

‘‘हमीद जल्दी करो...’’ फ़रीदी ने कार में बैठ कर स्टार्ट करते हुए कहा।

फ़रीदी की कार तेज़ी से दक्खिन की तरफ़ जा रही थी।

‘‘यह तो बहुत बुरा हुआ।’’ फ़रीदी ने कहा।

हमीद ग़ुस्से में होंट चबा रहा था। वे दोनों घण्टों सड़कें नापते फिरे लेकिन कत्थई रंग की नयी कार कहीं न दिखाई दी।

‘‘सब्र करो मियाँ हमीद, इसके अलावा कोई और चारा नहीं।’’ फ़रीदी ने उसका कन्धा थपकते हुए कहा।

‘‘नमक छिड़किए ज़ख़्मों पर...’’ हमीद ने बुरा-सा मुँह बना कर कहा।

‘‘बस, चहकना भूल गये। अब ही तो आये जनाब चक्कर में। अच्छा, अब सिविल सर्जन के यहाँ चलना चाहिए।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘मुझे तो आप यहीं उतार दीजिए। जब तक मैं उस कार को तलाश न कर लूँगा, मुझे चैन नहीं आयेगा।’’ हमीद ने कहा।

‘‘बेवकूफ़ हो क्या? इस शहर में कत्थई रंग की दर्जनों कारें होंगी। क्या चीफ़ इन्स्पेक्टर की कार कत्थई रंग की नहीं। इस तरह भी कहीं सुराग़ मिला करता है।’’

‘‘फिर बताइए, मैं क्या करूँ?’’ हमीद ने बेबसी से कहा।

‘‘मुझे फ़िलहाल जाने दो और ख़ुद सीताराम की कोठी की निगरानी करते रहो, मगर ख़बरदार कोई बेवकूफ़ी न होने पाये। मेरी वापसी पर मुझे पूरी रिपोर्ट देना और हाँ, सर सीताराम की कोठी के अन्दर जाने की कोशिश न करना।’’

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येलो डिंगू

सर सीताराम शहर के रईस आदमियों में से थे और बेपनाह दौलत के मालिक थे। उनकी उम्र पचपन या साठ के क़रीब रही होगी। पचास साल की उम्र में उनकी बीवी का इन्तक़ाल हो गया था। उनके कोई सन्तान न थी। पहली बीवी से कोई औलाद न थी। बीवी के मरने के कुछ दिन बाद तक वे इस टेक पर अड़े रहे कि दूसरी शादी किसी हाल में नहीं करेंगे, लेकिन आख़िरकार उनका दिल उनके एक क़़र्जदार की जवान लड़की पर आ ही गया और उन्होंने उसके साथ शादी कर ली। यही लड़की मौजूदा लेडी सीताराम थी। उसके साथ उसकी छोटी बहन कुमुदिनी भी रह रही थी। सर सीताराम उसे ऊँची शिक्षा दिला रहे थे। सर सीताराम के साथ उनका भतीजा सुरेन्द्र कुमार भी रहता था, जो तीन साल पहले इंग्लैंड से एम.ए. की डिग्री ले कर वापस आया था। वह एक तन्दुरुस्त नौजवान था। सर सीताराम उसे बेटों की तरह मानते थे। उन्होंने लगभग साठ-सत्तर कुत्ते पाल रखे थे सब एक-से-एक थे। दुनिया की कोई मशहूर नस्ल न रही होगी जिसका एक-आध जोड़ा उनके पास न हो। शहर में वे कुत्तों के स्पेशलिस्ट समझे जाते थे। इस लाइन में उनके तजरुबे का यह आलम था कि महज़ कुत्तों की आवाज़ सुन कर उसकी नस्ल के बारे में पूरे-पूरे लेक्चर दे डालते थे।

हमीद ने इन सारी बातों का पता लगा लिया था। उसे रह-रह कर फ़रीदी पर ग़ुस्सा आ रहा था। वह उसकी परेशानियों की परवाह किये बग़ैर कुत्तों की नुमाइश में हिस्सा लेने के लिए बम्बई चला गया, लेकिन वह कर ही क्या सकता था। फ़रीदी बहरहाल उसका अफ़सर था। यह उसकी शराफ़त और नेकी थी कि उसने कभी उसे अपना मातहत नहीं समझा। हमीद दिन में कई बार सर सीताराम की कोठी का चक्कर लगाता। लेकिन बेकार। किसी तरह का कोई सुराग़ न मिला। उसे सबसे बड़ी परेशानी शहनाज़ की वजह से थी, वरना भला वह क्यों बेकार ही में अपना वक़्त बर्बाद करता। मालूम नहीं, वह कहाँ और किस हाल में होगी।

इस दौरान फ़रीदी की तरफ़ से मैदान साफ़ देख कर सब-इन्स्पेक्टर सिन्हा ने भी नये-नये गुल खिलाने शुरू किये। एक दिन अख़बारों में ख़बर देखने में आयी कि ‘गुलिस्ताँ होटल’ में ख़ुदकुशी करने वाला कोई राजकुमार नहीं, बल्कि राम सिंह नाम का बदमाश था, जो औरतों को बेचता था। फिर दूसरे दिन अख़बार वाले चीख़ रहे थे कि राम सिंह ने ख़ुदकुशी नहीं की थी, बल्कि उसको किसी ने क़त्ल कर दिया था और सारी जासूसी का सेहरा सब-इन्स्पेक्टर के सिर बाँधा जा रहा था। अख़बार वाले दिल खोल कर उसकी तारीफ़ों के पुल बाँध रहे थे। यह सब देख कर हमीद का ख़ून खौलने लगा। वह कोतवाली पहूँचा... इत्तफ़ाक से सब-इन्स्पेक्टर सिन्हा से जल्दी ही मुठभेड़ हो गयी।

‘‘कहिए हमीद साहब, मिज़ाज तो अच्छे हैं।’’ इन्स्पेक्टर सिन्हा ने मुस्कुरा कर कहा।

‘‘जी हाँ, काफ़ी अच्छे।’’ हमीद ने मुँह बना कर कहा। ‘‘हमारे मिज़ाज अच्छे न होते तो यह दिन देखना नसीब न होता।’’

‘‘आप कुछ परेशान मालूम होते हैं।’’ सिन्हा ने कहा। ‘‘भई क्या करूँ, मजबूरन शहनाज़ का गिरफ़्तारी वॉरण्ट जारी करना पड़ा।’’

‘‘गिरफ़्तारी वॉरण्ट...’’ हमीद चौंक कर बोला। ‘‘क्या मतलब...?’’

‘‘जी हाँ... वह बहुत चालाक औरत मालूम होती है।’’

‘‘क्या बकवास है...’’ हमीद ने झल्ला कर कहा। ‘‘उसे तो कुछ लोग ज़बर्दस्ती पकड़ ले गये।’’

सिन्हा हँसने लगा।

‘‘अभी आपकी उम्र ही क्या है, हमीद मियाँ... मैंने बाल धूप में स़फेद नहीं किये।’’ सिन्हा ने कहा।

‘‘क्या मतलब...?’’ हमीद ने कहा।

‘‘अच्छा, यह बताइए... क्या आपने अपनी आँखों से देखा था कि कुछ लोग उसे ज़बर्दस्ती पकड़ ले गये।’’

‘‘नहीं... लेकिन हम लोग ठीक उस वक़्त पहूँचे थे, जब उसकी नौकरानी मकान के सामने खड़ी शोर मचा रही थी।’’
 
‘‘तो फिर मामला साफ़ है।’’ सिन्हा ने हाथ मलते हुए कहा। ‘‘शहनाज़ ने बहुत अच्छा प्लान बनाया। एक तरफ़ उसने आप लोगों से अपनी सफ़ाई दिलवायी और दूसरी तरफ़ अपनी बेगुनाही का और ज़्यादा यक़ीन दिलाने के लिए इस तरह ग़ायब हो गयी। भई, बला की चालाक औरत निकली।’’

‘‘तो इस तरह फिर यह भी कहा जा सकता है कि मैं और फ़रीदी साहब भी इस क़त्ल में शामिल हैं, क्योंकि वह आख़िर तक हमारे साथ रही थी।’’ हमीद ने ग़ुस्सा से कहा।

‘‘मैं यह नहीं कहता कि आपकी गवाही ग़लत है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उसने आप लोगों को भी धोखा दिया हो।’’ सिन्हा ने कहा।

‘‘यह बिलकुल नामुमकिन है।’’

‘‘हो सकता है।’’ सिन्हा ने धीरे से कहा और अपनी मेज़ पर रखे हुए कागज़़ात उलटने-पलटने लगा। हमीद ग़ुस्से में अपने होंट चबा रहा था। वह थोड़ी देर तक यूँ ही बैठा रहा फिर ख़ामोशी से उठ कर बाहर निकल आया।

शाम हो रही थी, बाज़ार में काफ़ी भीड़ हो गयी थी। हमीद बुरी तरह उखड़ा हुआ था। सिन्हा से बातचीत करने के बाद से उसका मूड बहुत ज़्यादा ख़राब हो गया था। दिल बहलाने के लिए वह एक रेस्टोरेण्ट में चला गया। थोड़ी देर तक बैठा चाय पीता रहा, लेकिन वहाँ भी दिल न लगा। रेस्टोरेण्ट से निकल कर वह फ़ुटपाथ पर खड़ा हो गया उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, अचानक उसने एक टैक्सी रुकवायी और उस पर बैठ कर सर सीताराम की कोठी की तरफ़ रवाना हो गया। कोठी से एक फर्लांग दूर ही उसने टैक्सी छोड़ दी और वहाँ से पैदल चलता हुआ किताबों की एक दुकान पर आया। यहाँ उसके और कोठी के बीच में सिर्फ़ सड़क थी, देखने में वह काउण्टर पर लगी हुई किताबें उलट-पलट रहा था, लेकिन उसकी निगाहें कोठी के बाग़ के फाटक की तरफ़ लगी हुई थीं। थोड़ी देर के बाद सर सीताराम एक कत्थई रंग के स्पैनियल कुत्ते की ज़ंजीर थामे कोठी में दिखे। यह उनकी सैर का वक़्त था। उनकी आदत थी कि वे रोज़ाना शाम को अपने किसी चहेते कुत्ते को ले कर घूमने के लिए पैदल लॉरेंस गार्डन तक जाया करते थे। हमीद उन्हें जाता हुआ देखता रहा। उसने जल्दी से एक किताब ख़रीदी और सर सीताराम के पीछे चल पड़ा। सर सीताराम बुढ़ापे में ज़रूर क़दम रख चुके थे, लेकिन वे अभी तक काफ़ी मज़बूत मालूम होते थे। चेहरे पर से दाढ़ी-मूँछें साफ़ थीं। भरे हुए चेहरे पर पतले-पतले होंट कुछ अजीब-से मालूम होते थे। कनपटी और आँखों के बीच बहुत सारी लकीरें थीं। नीचे का जबड़ा चेहरे के ऊपरी हिस्से की तुलना में ज़्यादा भारी था। उनकी चाल में एक अजीब क़िस्म की शान पायी जाती थी, जिसमें ग़ुरूर झलकता था या फिर हो सकता था कि उनमें यह अन्दाज़ पचीस साल तक फ़ौजी ज़िन्दगी गुज़ारने की वजह से पैदा हो गया था, वैसे वे काफ़ी मिलनसार मशहूर थे।

हमीद उन्हें कई बार देख चुका था। वह उन्हें ख़तरनाक आदमी समझने लगा था। उसके हिसाब से भारी जबड़ों के लोग ज़ालिम होते हैं, न जाने क्यों उसका दिल बार-बार कह उठता था कि राम सिंह वाले मामले में इन हज़रत का हाथ है और शहनाज़ को ग़ायब करा देने के ज़िम्मेदार भी यही हैं।

हमीद बराबर सर सीताराम का पीछा किये जा रहा था। थोड़ी देर के बाद वे लॉरेंस गार्डन पहूँच गये। कुछ पल टहलते रहने के बाद वे एक बेंच पर बैठ कर सुस्ताने लगे। हमीद भी कुछ दूर हट कर एक बेंच पर बैठ कर नयी ख़रीदी हुई किताब के पन्ने उलटने लगा। वह सोच रहा था कि किस तरह सर सीताराम से जान-पहचान पैदा करे। अचानक ग़ुर्राहट की आवाज़ सुनाई दी और एक पीले रंग का ख़ौफ़नाक कुत्ता मेंहदी की बाड़ फलाँगता हुआ सर सीताराम के कुत्ते पर झपट पड़ा। उसने उनके कुत्ते को दो-तीन पटख़नियाँ दीं और उसकी गर्दन दबा कर बैठ गया। सर सीताराम के कुत्ते ने सहम कर आवाज़ भी निकालनी छोड़ दी थी। सर सीताराम बेंच पर खड़े हो कर चीख़ रहे थे।
 
‘‘ऐ हटो... हटो... डिंगू के बच्चे।’’ एक आदमी गार्डन की बाड़ की दूसरी तरफ़ से कहता हुआ कूदा। उसने झपट कर पीले कुत्ते के पट्टे पर हाथ डाल दिया। उसकी पकड़ से आज़ाद होते ही सर सीताराम का कुत्ता भाग कर बेंच के नीचे दुबक गया। आने वाला एक बहादुर आदमी मालूम होता था। उसके लाल गोरे चेहरे पर गहरे काले रंग की फ़्रेंच कट दाढ़ी बड़ी अजीब लग रही थी, लेकिन उसमें बेढंगापन नहीं था। आँखों पर बग़ैर फ़्रेम का छोटा-सा चश्मा था। मूँछें बारीक़ और नुकीली थीं। जिस्म की बनावट बता रही थी कि वह कड़ी मेहनत का आदी है। उसने काले रंग का सूट पहन रखा था। दिखने में वह किसी ऊँची सोसाइटी का मेम्बर मालूम होता था।

‘‘जनाब, मुझे शर्मिन्दगी है।’’ उसने बिफरे हुए पीले कुत्ते को अपनी तरफ़ खींचते हुए कहा।

‘‘मगर... मगर... इतना ख़ौफनाक कुत्ता...आप उसे इस तरह आज़ाद क्यों छोड़ देते हैं।’’ सर सीताराम ने बुरा-सा मुँह बना कर कहा। ‘‘आप भारी जुर्म कर रहे हैं।’’

‘‘जुर्म,’’ अजनबी ने चौंक कर कहा। ‘‘भला इसमें जुर्म की क्या बात है?’’

‘‘ऐसे ख़तरनाक कुत्ते को आज़ाद छोड़ देना जुर्म नहीं तो और क्या है!’’ सर सीताराम ऊँची आवाज़ में बोले। ‘‘या फिर शायद आप इसकी नस्ल से वाक़िफ़ नहीं हैं। यह अफ़्रीकी नस्ल का येलो डिंगू है, कभी-कभी यह शेर और चीते से भी टक्कर ले लेता है, यह आपको कहाँ से मिल गया और यहाँ की आबोहवा में अब तक कैसे ज़िन्दा है।’’

अजनबी सर सीताराम को हैरत से देख रहा था। अचानक उसका चेहरा ख़ुशी से चमकने लगा।

‘‘वाह रे मेरी क़िस्मत...’’ वह चीख़ कर बोला। ‘‘सारे मुल्क में आप ही मुझे कुत्तों के मामले में इतने तजरुबेकार नज़र आये हैं, मुझे आपसे मिल कर बेहद ख़ुशी हुई है और मुझे ख़ुद हैरत है कि यह कुत्ता यहाँ किसके पास था और यहाँ की आबोहवा में ज़िन्दा कैसे रहा।’’

‘‘क्या मतलब...?’’ सर सीताराम ने चौंक कर कहा। ‘‘तो क्या यह कुत्ता आपका नहीं है?’’

‘‘जी नहीं! यह बहुत ही अजीबो-ग़रीब तरीक़े से मुझ तक पहूँचा है।’’ अजनबी ने अपने पाइप में तम्बाकू भरते हुए कहा।

सर सीताराम दिलचस्पी के साथ अजनबी को देख रहे थे। हमीद का दिल बड़ी तेज़ी से धड़क रहा था, क्योंकि वह उस कुत्ते को पहचानता था।

‘‘तीन-चार दिन की बात है।’’ अजनबी कहने लगा। ‘‘मैं शिकार खेल कर वापस आ रहा था मैंने एक चलती हुई ट्रेन के जानवरों के डिब्बे से इस कुत्ते को कूद कर बाहर आते देखा। ट्रेन गुज़र गयी और यह भागता हुआ मेरी तरफ़ आ रहा था। मैंने कार रोक दी और उतर कर इसे पकड़ लिया। तब से यह मेरे पास है।’’

‘‘लेकिन यह इतनी जल्दी आपके क़ाबू में कैसे आ गया?’’ सर सीताराम पलकें झपकाते हुए बोले।

‘‘ओह, मेरे लिए यह कौन-सी बड़ी बात है।’’ अजनबी मुस्कुरा कर बोला। ‘‘मैंने अपनी ज़िन्दगी का बहुत सारा हिस्सा अफ़्रीका के जंगलों में गुज़ारा है।’’

‘‘मैं इस ज़ात के कुत्तों की नस-नस से वाक़िफ़ हूँ।’’ सर सीताराम जल्दी से बोले।

अजनबी ने अपने कुत्ते के गले में ज़ंजीर डाल कर उसे एक बेंच के पाये से बाँध दिया और सर सीताराम के कुत्ते को गोद में उठा कर उसके सर पर हाथ फेरने लगा।

‘‘मुझे छोटी ज़ात के स्पैनियल बहुत पसन्द हैं।’’ अजनबी बोला। ‘‘आप बहुत शा़ैकीन आदमी मालूम होते हैं। क्या आपके पास और कुत्ते भी हैं।’’

‘‘जी हाँ...’’ सर सीताराम मुस्कुरा कर बोले। ‘‘तक़रीबन पाँच या छै दर्जन।’’

‘‘पाँच-छै दर्जन,’’ अजनबी चौंक कर बोला। ‘‘तब तो आप वाक़ई बिलकुल मेरी तरह हैं।’’

‘‘तो क्या आप भी।’’ सर सीताराम ने कहा।

‘‘जी हाँ...’’ अजनबी ने जवाब दिया।

‘‘आपकी तारीफ़...’’ सर सीताराम ने कहा।

अजनबी ने अपना कार्ड जेब से निकाल कर सर सीताराम के हाथ में दे दिया। ‘‘कर्नल जी. प्रकाश, सी.बी.ई.।’’ सर सीताराम ने बुलन्द आवाज़ से कार्ड पढ़ा।

‘‘और आप...’’ अजनबी ने कहा।

‘‘लोग मुझे सर सीताराम के नाम से पुकारते हैं।’’

‘‘सर सीताराम...’’ अजनबी ने ख़ुशी के लहजे में चीख़ कर उनसे हाथ मिलाते हुए कहा। ‘‘बड़ी ख़ुशी हुई आपसे मिल कर... भला क्यों न हो... आपसे ज़्यादा कुत्तों के बारे में कौन जान सकता है। यही तो मैं कहूँ... मैंने आपकी तारीफ़ एक अंग्रेज़ दोस्त से अफ़्रीका में सुनी थी। इस अचानक मुलाक़ात से मुझे कितनी ख़ुशी हुई है, यह मैं बयान नहीं कर सकता।’’

‘‘आप मुझे शर्मिन्दा कर रहे हैं। अरे, आप भला किससे कम हैं।’’ सर सीताराम ने कहा। ‘‘क्या इस वक़्त मैं अफ़्रीका के मशहूर करोड़पति से बातचीत नहीं कर रहा हूँ।’’
 
‘‘यह मेरी ख़ुशनसीबी है कि यहाँ भी लोग मुझे जानते हैं।’’ अजनबी ने मुस्कुरा कर कहा।

‘‘एक बार मेरा इरादा हुआ था कि अफ़्रीका की एक हीरे की खान का हिस्सेदार हो जाऊँ, उसी दौरान मुझे आपका नाम मालूम हुआ था, वाक़ई मैं बहुत ख़ुशक़िस्मत हूँ कि आज आपसे इस तरह मुलाक़ात हो गयी।’’

अब दोनों बातचीत करते हुए बेंच पर बैठ गये थे। हमीद की नज़रें कुत्ते पर जमी थीं। उसने इन दोनों की बातचीत साफ़ सुनी थी। यूँ तो वह किताब पढ़ रहा था, लेकिन कनखियों से बार-बार उनकी तरफ़ देखता जा रहा था। अचानक एक खय़ाल उसके दिल में पैदा हुआ। उसे आज ही ख़बर मिली थी कि मृतक राम सिंह के कुछ साथी उसके क़ातिल की तलाश में लगे हैं। तो क्या यह अजनबी उन्हीं में से कोई एक है? लेकिन यह उसे कैसे मिल गया, कहीं उसकी आँखें उसे धोखा तो नहीं दे रही हैं। मगर नहीं, वह उसे हज़ार में पहचान सकता है।

हमीद इधर इन गुत्थियों में उलझ रहा था और वे दोनों बातचीत में मशग़ूल थे, लेकिन उनकी आवाज़ अब ज़्यादा साफ़ नहीं सुनाई दे रही थी। हमीद फिर उलझन में पड़ गया, उन दोनों में अभी-अभी मुलाक़ात हुई थी और इतनी जल्दी यह राज़दारी कैसी...ऐसा मालूम हो रहा था जैसे दोनों बरसों से एक-दूसरे को जानते हों।

थोड़ी देर तक दोनों धीरे-धीरे बातें करते रहे, फिर उठ खड़े हुए।

‘‘अच्छा कर्नल साहब, अब चलना चाहिए। वाक़ई आपसे मिल कर बड़ी ख़ुशी हुई।’’ सर सीताराम ने कर्नल प्रकाश से हाथ मिलाते हुए कहा। ‘‘तो फिर कल आप आ रहे हैं न...’’

‘ज़रूर, ज़रूर, मेरे लिए यह ख़ुशी की बात है कि अच्छा साथी मिल गया।’’ कर्नल प्रकाश ने हँसते हुए कहा।

दोनों उठ कर बाग़ के बाहर आये।

हमीद अब सीताराम के बजाय कर्नल प्रकाश का पीछा कर रहा था।

उसे यह देख कर बड़ी हैरत हुई कि कर्नल प्रकाश ‘गुलिस्ताँ होटल’ के उन्हीं कमरों में ठहरा हुआ है जिनमें मक़तूल राम सिंह ठहरा हुआ था। उसका शक यक़ीन में बदलने लगा। ज़रूर यह शख़्स राम सिंह ही के गिरोह से ताल्लुक़ रखता है। उसे रह-रह कर फ़रीदी पर ग़ुस्सा आ रहा था कि ऐसे वक़्त में उसे अकेला छोड़ कर ख़ुद सैर-सपाटे करता फिर रहा है। शहनाज़ की गुमशुदगी का खय़ाल उसे बुरी तरह बेचैन किये हुए था। यह तो वह किसी तरह सोच ही नहीं सकता था कि राम सिंह के क़त्ल की साजिश में वह भी शरीक रही है, उसे पूरापूरा यक़ीन था कि वह महज़ इसीलिए ग़ायब की गयी है कि पुलिस उसी को मुजरिम समझ कर क़ातिल की तलाश छोड़ दे।

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दूसरी उलझन

घर वापसी पर हमीद को फ़रीदी का ख़त मिला। उसने लिखा था।

‘‘डियर हमीद

क्या बताऊँ किस मुसीबत में फँस गया। यहाँ आते ही मलेरिया हो गया। अभी तक बुख़ार है, फ़िलहाल सफ़र के लायक़ नहीं। दूसरा सबसे बड़ा ऩुकसान यह हुआ कि मेरा अफ़्रीकी नस्ल का येलो डिंगू रास्ते में कहीं ट्रेन से लापता हो गया। यहाँ आने का असली मक़सद यही था कि उसे नुमाइश में पेश करूँ। बहुत परेशानी है। उसे तलाश कराने के लिए हर तरीक़ा अपना लिया है, तुम भी खय़ाल रखना। शहनाज़ का सुराग मिला या नहीं? मुझे उसका खय़ाल है, लेकिन क्या करूँ, बहुत मजबूर हूँ। अब मालूम हुआ कि मैंने यहाँ आ कर ग़लती की...

फरीदी।’’

हमीद ने ख़त पढ़ कर एक तरफ़ डाल दिया। येलो डिंगू का मामला अब बिलकुल साफ़ हो चुका था। लेकिन वह सोच रहा था कि आख़िर यह कर्नल प्रकाश है कौन? इतनी मक़्क़ारी और अय्यारी उसने आज तक किसी के चेहरे पर न देखी थी, जितनी कि इस कर्नल प्रकाश के चेहरे पर नज़र आती थी और वह शरारती मुस्कुराहट कितनी ख़तरनाक थी। उसकी मुस्कुराहट और उसकी बिल्ली जैसी आँखों की वहशियाना चमक! वह इन्हीं खय़ालों में डूबा हुआ था। और वह चीज़ ख़ून की प्यास के अलावा और क्या हो सकती है। सोचते-सोचते वह उठ कर फ़रीदी की लाइब्रेरी में आया। चारों तरफ़ अलमारियाँ-ही-अलमारियाँ किताबों से भरी नज़र आ रही थीं। वह एक अलमारी के क़रीब आ कर रुक गया। कुछ देर तक किताबों का जायज़ा लेता रहा फिर एक किताब निकाली जिसका नाम ‘‘साउथ अफ़्रीका के कामयाब हिन्दुस्तानी?’’ था। कई पन्ने उलटने के बाद मतलब की चीज़ मिल गयी वह पढ़ने लगा।

‘‘कर्नल जी प्रकाश, सी.बी.ई.। साउथ अफ़्रीका का करोड़पति...हीरों की कई खानों का हिस्सेदार है। 1960 में कारोबार शुरू किया। निडर और बेबाक आदमी है। कई बार चीतों के शिकार में बुरी तरह ज़ख़्मी हो चुका है। दरिन्दों के शिकार का शौक़ जुनून की हद तक रखता है। बहुत सारे ख़ूँख़ार क़िस्म के कुत्ते पाल रखे हैं। कुत्तों की बहुत अच्छी जानकारी रखता है। गर्मियों का मौसम ज़्यादातर स्विट्ज़रलैण्ड में गुज़ारता है। अंग्रेज़ी सरकार ने ख़ुश हो कर सी.बी.ई. के खिताब से नवाज़ा।’’

इतना पढ़ने के बाद हमीद ने अपना सिर हिला दिया और पन्ना उलट दिया। दूसरे पन्ने पर कर्नल प्रकाश की तस्वीर थी। तस्वीर के चेहरे पर भी मक्कारी नज़र नहीं आ रही थी। बहरहाल हमीद का यह खय़ाल भी ग़लत साबित हुआ कि कर्नल प्रकाश राम सिंह के गिरोह से ताल्लुक़ रखता है। फिर भी फ़रीदी का ख़ौफ़नाक कुत्ता येलो डिंगू उसकी उलझन का सबब बना हुआ था। आख़िर वह उससे इतनी जल्दी सध कैसे गया? अब वह सोच रहा था कि उसे कर्नल प्रकाश से हासिल किस तरह किया जाये, लेकिन जल्द ही उसने इस खय़ाल को अपने ज़ेहन से निकाल फेंका। जब फ़रीदी ने शहनाज़ की ज़्यादा परवाह न की तो फिर वह उस ज़लील कुत्ते की परवाह क्यों करे, उसकी क़ीमत शहनाज़ से ज़्यादा नहीं।

हमीद इस खय़ाल में उलझा ही हुआ था कि नौकर ने सब-इन्स्पेक्टर सिन्हा के आने की ख़बर दी। वह हैरान हो गया। आख़िर इन हज़रत ने आने की ज़हमत क्यों की। वह लाइब्रेरी से ड्रॉइंग-रूम में आया। सब-इन्स्पेक्टर सिन्हा उसके इन्तज़ार में बैठा हुआ था, उसे देख कर खड़ा हो गया।

‘‘तशरीफ़ रखिए...’’ हमीद ने बैठते हुए कहा। ‘‘फ़रमाइए, मेरे लायक़ कोई ख़िदमत...’’

‘‘भई, दरअसल मैं आपकी ग़लतफ़हमी दूर करने आया हूँ, उस वक़्त आप नाराज़ हो कर चले आये थे और मैं भी एक बहुत ज़रूरी काम में फँसा था। इसलिए आपको इत्मीनान न दिला सका।’’

‘‘इत्मीनान तो आप मुझे ज़िन्दगी भर नहीं दिला सकते जबकि मैं शहनाज़ की बेगुनाही अच्छी तरह जानता हूँ।’’ हमीद ने सब-इन्स्पेक्टर सिन्हा की तरफ़ सिगार का डिब्बा बढ़ाते हुए कहा।

‘‘फ़रीदी साहब कहाँ हैं?’’

‘‘एक माह की छुट्टी पर हैं।’’ हमीद ने जवाब दिया।

‘‘क्या कहीं बाहर गये हुए हैं?’’

‘‘जी हाँ... कुत्तों की नुमाइश देखने गये हैं, वहाँ बीमार हो गये हैं।’’

‘‘इसके बावजूद भी आप शहनाज़ की बेगुनाही साबित करने पर तुले हुए हैं?’’ सब-इन्स्पेक्टर सिन्हा ने कहा।

‘‘क्यों... उससे क्या।’’

‘‘ताज्जुब है कि आप इतना भी नहीं समझते।’’ सिन्हा ने हँस कर कहा। ‘‘अगर फ़रीदी साहब शहनाज़ को बेगुनाह समझते होते तो इस तरह मामले को खटाई में डाल कर तफ़रीह करने न चले जाते।’’

‘‘यह तो अपनी-अपनी तबीयत की बात है... अब इसे क्या कहा जाये कि उन्हें आदमियों से ज़्यादा कुत्ते पसन्द हैं।’’ हमीद ने बुरा-सा मुँह बना कर कहा।

‘‘यह बात नहीं हमीद साहब, मैं फ़रीदी साहब को अच्छी तरह जानता हूँ। अगर उन्हें शहनाज़ की बेगुनाही का यक़ीन आ जाता तो वे जान की बाज़ी लगा देते।’’

‘‘मुझसे ज़्यादा आप उन्हें नहीं जानते।’’ हमीद ने कहा।

‘‘अब हठधर्मी को क्या कहा जाय।’’ सब-इन्स्पेक्टर सिन्हा ने सिगार का कश ले कर कहा, ‘‘बहरहाल मुझे इससे बहस नहीं, मैं उसे मुजरिम समझता हूँ, इसलिए मैं उसी हिसाब से काम कर रहा हूँ और जो कुछ आप समझते हैं उसके लिए आप कोशिश करते रहिए। फ़ैसला वक़्त करेगा।’’

‘‘आख़िर उसे मुजरिम समझने की कोई वजह भी तो हो।’’ हमीद ने कहा। ‘‘इसके लिए महज़ शहनाज़ का ग़ायब हो जाना ही काफ़ी नहीं। जैसा कि पहले कह चुका हूँ, हो सकता है कि मुजरिमों ने पुलिस को ग़लत रास्ते पर लगाने के लिए उसे ग़ायब कर दिया हो।’’

‘‘मैं इस वक़्त आपको यही बताने के लिए आया हूँ कि मैं इतना बेवकूफ़ नहीं। इसके लिए मेरे पास बहुत ही ठोस क़िस्म के सबूत हैं इतना मैं भी समझता हूँ कि मुजरिम इस क़िस्म की चाल चल सकते हैं।’’

‘‘ख़ैर साहब...वे सुबूत भी देख लेते हैं।’’

‘‘नहीं, आप मज़ाक़ न समझिए... मैं सीरियसली कह रहा हूँ।’’ सब-इन्स्पेक्टर सिन्हा ने जेब से एक कागज़़ का टुकड़ा निकालते हुए कहा। ‘‘इसे देखिए।’’

हमीद ने कागज़़ ले कर पढ़ना शुरू किया।

‘‘तुमने जिस होशियारी से अपना काम अंजाम दिया है उसकी दाद नहीं दी जा सकती। तुम आज से बाक़ायदा गिरोह में शामिल कर ली गयीं। लेकिन अब बहुत ज़्यादा होशियारी की ज़रूरत है। पुलिस को तुम पर शक हो गया है, इसलिए कुछ दिनों के लिए यहाँ से हट जाओ। बी. वन और बी. टू आज एक बजे दिन में कत्थई रंग की कार पर तुम्हारे मकान के सामने से गुज़रेंगे तुम उन्हें सड़क पर मिलना। बाक़ी काम दोनों ख़ुद कर लेंगे, बहुत ज़्यादा सावधानी की ज़रूरत है।’’

कागज़़ पढ़ते ही हमीद के माथे पर पसीना फूट पड़ा। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था, जिसकी धमक उसे अपने सिर में महसूस हो रही थी। होंट सूख गये थे। उसने होंटों पर ज़बान फेरते हुए कागज़़ सिन्हा को वापस कर दिया।

‘‘भई, यह सुबूत भी बहुत मालूम नहीं होता।’’ हमीद ने ख़ुद पर क़ाबू पाने की कोशिश करते हुए कहा। यह भी हो सकता है कि एक तरफ़ मुजरिमों ने उसे ग़ायब कर दिया हो और दूसरी तरफ़ पुलिस का शक और ज़्यादा मजबूत करने के लिए यह ख़त भी लिख दिया हो। लेकिन आपको यह ख़त मिला कहाँ से?’’

‘‘यह ख़त शहनाज़ के घर की तलाशी लेते वक़्त उसके लिखने की मेज़ के नीचे पड़ा मिला था।’’ सिन्हा ने कहा। ‘‘और रह गयी शक की बात तो यह भी हो सकता है कि मैं ही असली मुजरिम हूँ या फ़रीदी साहब सिर्फ़ असली मुजरिम होने की वजह से बाहर चले गये हों या फिर आप... शक के तहत तो सब कुछ हो सकता है।’’
 
‘‘ख़ैर... ख़ैर...’’ हमीद ने उकता कर कहा। ‘‘इन सब बातों से क्या हासिल। असली बात तो एक-न-एक दिन सामने आ ही जायेगी। बहरहाल, मैं अपने हिसाब से शहनाज़ को बेगुनाह समझने पर मजबूर हूँ।’’

‘‘आप इसके लिए बिलकुल आज़ाद हैं?’’ सब-इन्स्पेक्टर सिन्हा हँस कर बोला। ‘‘किसी के खय़ाल पर तो पाबन्दी लगायी नहीं जा सकती।’’

थोड़ी देर के बाद सिन्हा उठ कर चला गया। सिन्हा के जाते ही हमीद सिर पकड़ कर बैठ गया। तो क्या वाक़ई शहनाज़ मुजरिम है...? मगर नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकती। उसे बहरहाल अपने और अपने ख़ानदान की इज़्ज़त का बहुत खय़ाल था। मुजरिम दूर से पहचाने जा सकते हैं। लेकिन शहनाज़ को क़रीब से देख कर भी कभी उसके दिल में यह खय़ाल पैदा नहीं हुआ था कि शहनाज़ जुर्म भी कर सकती है और फिर ऐसा भयानक और दिल दहला देने वाला जुर्म। फिर आख़िर असली बात क्या है? यह सब आख़िर कैसे हुआ? और फिर वह ख़त...। सोचते-सोचते हमीद का सिर चकराने लगा और वह सो़फे पर सिर टेक कर निढाल-सा हो गया।

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