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औरत फ़रोश का हत्यारा ibne safi

ख़ुशी के पल

फ़रीदी और हमीद अपने ड्रॉइंग-रूम में बैठे चाय पी रहे थे।

‘‘अभी तक जगदीश नहीं आया।’’ फ़रीदी ने घड़ी की तरफ़ देखते हुए कहा।

‘‘तो क्या वाक़ई आप इस केस की कामयाबी का ज़िम्मेदार उसी को बनायेंगे।’’ हमीद बोला।

‘‘मैं उससे वादा कर चुका हूँ। अगर उसने लेडी सीताराम के बारे में मुझे न बताया होता तो मैं ज़िन्दगी भर कामयाब नहीं हो सकता था और मैंने यह सारा सिरदर्द सिर्फ़ शहनाज़ के लिए लिया था।’’

‘‘तो क्या आप वाक़ई शहनाज़...’’ हमीद अचानक बोल पड़ा और उसका चेहरा उतर गया।

‘‘तुम अच्छे-ख़ासे उल्लू हो। शहनाज़ की तलाश मुझे सिर्फ़ तुम्हारे लिए करनी थी, तुम इतनी जल्दी शक क्यों करने लगते हो।’’

‘‘माफ़ कीजिएगा... मैं समझा शायद...।’’

‘‘जी नहीं... आप मुझसे पूछे बग़ैर कुछ न समझा कीजिए। मैं और औरत... लाहौल विला कूवत।’’

‘‘अच्छा साहब... लाहौल विला कूवत...’’ हमीद हँस कर बोला।

‘‘आओ शहनाज़, आओ...’’ फ़रीदी दरवाज़े की तरफ़ मुड़ते हुए बोला।

शहनाज़ मुस्कुराती हुई कमरे के अन्दर दाख़िल हो रही थी।

‘‘बोलो! हमीद अब क्या कहते हो... कह दूँ शहनाज़ से।’’ फ़रीदी ने हँस कर कहा।

हमीद बौखला गया।

‘‘क्या बात है।’’ शहनाज़ बैठते हुए बोली।

‘‘कुछ नहीं...कुछ नहीं।’’ हमीद जल्दी से बोला। ‘‘कोई बात नहीं।’’

‘‘बातें तो मैं आपसे सुनने आयी हूँ।’’

‘‘हाँ! अब सारी कहानी बताइए, मुझे भी बहुत बेचैनी है।’’ हमीद ने कहा।

‘‘कहानी कोई ख़ास नहीं, सिवा इसके कि मैंने बड़ी बेदर्दी से तुम्हारा सिर फोड़ दिया था।’’

‘‘इसकी शिकायत तो मुझे भी है। अगर आप ज़रा-सा इशारा कर देते तो मैं ख़ुद ही बेहोश हो जाता।’’

‘‘ज़रूर, ज़रूर... आपसे यही उम्मीद होती तो इतना झंझट करने की क्या ज़रूरत थी।’’

‘‘अच्छा यह बताइए कि वह कागज़़ कैसा था। जो आपने सुरेन्द्र को दिया था और हार चुराने की क्या ज़रूरत थी।’’

‘‘इतना ही समझने लगो तो फिर सार्जेंट क्यों रहो...’’ फ़रीदी हँस कर बोला। ‘‘अच्छा शुरू से सुनाता हूँ। जगदीश से लेडी सीताराम के बारे में मालूम कर लेने के बाद भी मेरा इरादा इस झगड़े में पड़ने का नहीं था, लेकिन जब यह मालूम हुआ कि शहनाज़ ग़ायब कर दी गयी है तो मैंने उसी वक़्त प्लान तैयार कर लिया, जब हम लोग उनकी तलाश में सड़कें नापते फिर रहे थे। छुट्टी मैंने सचमुच इसलिए लेनी चाही थी कि कुत्तों की नुमाइश में हिस्सा लूँ। इसलिए शहनाज़ के ग़ायब हो जाने के बाद भी मैं इस बात पर अड़ा रहा कि जाऊँगा। तुम मुझे स्टेशन छोड़ने गये थे। मुझे ट्रेन पर सवार करा के तुम वापस चले गये थे। मैं अगले स्टेशन पर उतर गया। वहाँ से भेस बदल कर शहर वापस आया। मुझे सर सीताराम से जान-पहचान पैदा करनी थी, इसलिए मैंने कर्नल प्रकाश का भेस बदला, क्योंकि वह भी कुत्तों का शौक़ीन मशहूर था और अपने अफ़्रीकी नस्ल के येलो डिंगू की वजह से मुझे और भी आसानी हो गयी। मैंने ‘गुलिस्ताँ होटल’ का वही कमरा किराये पर लिया जिसमें राम सिंह ठहरा हुआ था। एक दिन अचानक जब कमरे की सफ़ाई हो रही थी मुझे कालीन के नीचे एक ख़त मिल गया। यह ख़त लेडी सीताराम ने सुरेन्द्र को लिखा था। फ़ौरन मेरे ज़ेहन में यह बात आयी कि शायद राम सिंह दोनों को उसी ख़त से ब्लैक मेल कर रहा था और उन लोगों ने तंग आ कर उसे क़त्ल कर दिया। अब मैंने बाक़ायदा काम शुरू कर दिया। सबसे पहले तो मैंने तुम्हें नुमाइश से ख़त भिजवाने का इन्तज़ाम किया, ताकि तुम्हें बिलकुल यक़ीन हो जाये कि मैं वहीं गया हूँ। इस दौरान मैंने यहीं ‘गुलिस्ताँ होटल’ में लेडी सीतारम पर डोरे डालने शुरू किये। वह बहुत जल्द क़ाबू में आ गयी। फिर मैं सर सीताराम से पार्क में मिला और जब वापस लौट रहा था तो तुम मेरा पीछा कर रहे थे। तुम्हारी मौजूदगी में हमेशा मैं कोई-न-कोई ऐसी हरकत ज़रूर कर बैठता जिससे तुम्हारा शक और ज़्यादा बढ़ जाये। उस दिन बालकनी में भी तुमने हम दोनों की बातें सुनी थीं और उसके बाद सुरेन्द्र और रेखा की बातें भी सुनी थीं। मुझे पहले ही यक़ीन था कि सर सीताराम की कोठी में कोई तहख़ाना ज़रूर है और शहनाज़ साहिबा उसी में बन्द हैं और यह तो मैं पहले ही अन्दाज़ा लगा चुका था कि बेचारे सर सीताराम को इन सब हरकतों की कोई ख़बर नहीं, इसलिए मैंने उस गुप्त जगह का पता लगाने के लिए हार चुराने वाला प्लान बनाया। यह मैं जानता था कि तुम साये की तरह मेरे पीछे लगे रहते हो। इसलिए तुम आज भी हमारी बातचीत सुनने की ज़रूर कोशिश करोगे और ऐसा ही हुआ भी। अगर तुम्हें इस बात का पहले से पता होता तो इस ड्रामे में इतनी असलियत न आती।’’

‘‘वह तो सब कुछ है लेकिन मुझे चक्कर आने लगे हैं... इसका क्या इलाज होगा।’’ हमीद ने कहा।

‘‘ओह इसका इलाज तो...’’ फ़रीदी इतना कह कर शहनाज़ की तरफ़ देखने लगा और शहनाज़ ने शर्मा कर सिर झुका लिया।

‘‘हाँ भई... अब तुमने क्या सोचा है। क्या कॉलेज की नौकरी जारी रखोगी?’’ फ़रीदी ने शहनाज़ से पूछा।

‘‘अब जैसी आप राय दें। मेरा तो इस दुनिया में ऐसा कोई नहीं जो मुझे कोई अच्छी राय दे सके।’’

‘‘मेरे खय़ाल से अब तुम नौकरी छोड़ दो। इस घटना के बाद से तुम्हारी काफ़ी बदनामी हो चुकी है। हर मामले में तुम बेगुनाह थीं, लेकिन इस क़िस्म की बदनामी के दाग़ मुश्किल ही से मिटते हैं।’’

‘‘तो फिर बताइए, मैं क्या करूँ?’’

‘‘मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम और हमीद एक-दूसरे से मुहब्बत करते हो। मेरी मानो तो... क्यों हमीद साहब, आपकी क्या राय है।’’

हमीद शर्माने की ऐक्टिंग करने लगा और शहनाज़ जो सचमुच शर्मा रही थी, अब अपनी हँसी न रोक सकी।

इतने में इन्स्पेक्टर जगदीश आ गया। उसके चेहरे से ख़ुशी फूटी पड़ रही थी।

‘‘आओ भई जगदीश साहब, ख़ूब वक़्त पर आये।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘हमीद, ज़रा चाय के लिए कह दो।’’

‘‘मैं आपका शुक्रिया किस मुँह से अदा करूँ इन्स्पेक्टर साहब... कि आपने मेरा कैरियर बना दिया।’’

‘‘शुक्रिया तो मुझे तुम्हारा अदा करना चाहिए।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘अगर तुम मेरी मदद न करते तो बेचारी शहनाज़ न जाने कहाँ होती।’’

‘‘मैंने तो सिर्फ़ ज़बानी मदद की थी, लेकिन आपने इतनी तकलीफ़ों का सामना करके मेरे लिए तरक़्क़ी की राह निकाली।’’

‘‘अगर ऐसा ही है तो फिर शहनाज़ का शुक्रिया अदा करो। न यह इस तरह ग़ायब होतीं और न मैं इस केस में हाथ डालता।’’

‘‘अच्छा साहब... शहनाज़ बहन का भी शुक्रिया।’’ जगदीश ने झुक कर शुक्रिया अदा किया।

‘‘अच्छा जगदीश... लेडी इक़बाल का हार भी लेते जाना, यह कारनामा भी तुम्हारा ही रहेगा।’’

‘‘मैं आपका मतलब नहीं समझा।’’ जगदीश ने हैरान हो कर कहा।

फ़रीदी ने उसे हार की चोरी की सारी कहानी बतायी। जगदीश का मुँह हैरत से खुल गया।

‘‘लेकिन मैं लेडी इक़बाल से कहूँगा क्या?’’

‘‘सीधी-सी बात है... कह देना कि शायद भागते वक़्त चोर के हाथ से गिर गया था। मुझे एक नाली में पड़ा मिला।’’

‘‘आपके एहसानों का शुक्रिया किस ज़बान से अदा करूँ।’’ जगदीश ने कहा।

‘‘अच्छा यह तो बताओ कि सिन्हा का क्या हाल है।’’

‘‘मुँह लटका रहता है... बात-बात पर मुझसे उलझ पड़ता है।’’

‘‘ख़ैर, वह तो होना ही था...’’ हमीद ने कहा।

चारों चाय पीने लगे। कभी-कभी हमीद और शहनाज़ नज़रें चुरा कर एक दूसरे को देख लेते और अजीब क़िस्म की शर्मीली मुस्कुराहट दोनों के होंटों पर नाचने लगती।

end
 
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