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कमीना देवर complete

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Guest
हमारा परिवार एक बहुत ही आदर्श परिवार है सभी बड़े उँचे विचारों वाले लोग हैं। केवल मुझे छोड़ कर, हमारी माताजी की सोच है कि लड़्की हमेंशा अपने से छोटे घर की लानी चाहिये ताकि वो घर में असानी से निभा सके और अपनी लड़्की को हमेशा अपने से बड़े घर में देनी चाहिये, ताकि वो सुखी रह सके। सो मेंरे परिवार ने अपने उच्च विचारों के अनुसार मेंरे बड़े भाई की शादी एक अत्यन्त ही गरीब घर की लड़्की से कर दी उनकी इतनी भी हैसियत नहीं थी कि वो लोग अपनी लड़्की को ढंग के दो जोड़ी कपड़े भी दे सके। लेकिन गरीब होने के बाद भी वे बड़े खुद्दार लोग थे कभी किसी को अपनी गरीबी क अह्सास नहीं होने देते थे। उन्होने अपनी लड़्की को जैसा कि आम मध्यम वर्गीय गरीब परिवारों में शिक्षा दी जाती है वो सभी शिक्षा दि थी जैसे हर परिस्थिति में रहना , सब के साथ तालमेल रखना परिवार में कभी किसी कि चुगली न करना आदि आदि। वैसे भी मेंरी भाभी के परिवार की आर्थिक स्थिती मध्यम ही रही है बचपन से उनके परिवार ने अनेंक आर्थिक विषमताएं देखी है सो परिवार के लोग वैसे ही बड़े शालीन एवं विनम्र हैं।

भाभी कालेज भी पैदल ही आना जान करती थी उनके कालेज में भी कोई ज्यादा दोस्त नहीं थे और जो थे वो भी कुछ खास नहीं थे, गरीबॊं के वैसे भी ज्यादा दोस्त नहीं होते है।धन की की कमी इंन्सान को जीवन मे बड़ा ही संकुचित एवं आत्मविश्वास विहिन बना देते है। मेंरी भाभी के साथ भी कुछ ऎसा ही था वो बहुत ही सकुचा कर रहती थी अन्यन्त अल्प बात करती थी । किसी भी बात का "जी" "अच्छा" "ठीक है" ऎसे ही जवाब देती थी बहुत ही संभल कर बोलती थी उसका पूरा प्रयास रहता था कि उसकि बातों से कोई भी सदस्य नारज ना होने पाये। कभी कुछ गलत हो जाये तो भी शिकायत नहीं करती थी।शायद उसे अभी अपनी तीन जवान बहनों कि शादी कि चिंता मन ही मन सता रही थी इसलिये उसका पूरा प्रयास रहता था कि उसकी वजह से उसके परिवार का नाम खराब ना हो और उसकी बहनॊं कि शादी में कोई अड़्चन ना आये। गरीब मध्यम वर्गीय परिवारों के लिये तो वैसे भी ईज्जत ही सबसे बड़ी दौलत होती है। मेंरी मां तो बड़ी खुश थी ऎसी शर्मिली बहू को पाकर।

मुझे अपनी भाभी कि जो बात सबसे ज्यादा पसंद थी वो था उसका शानदार जिस्म। गोरा बदन,सुंदर चेहरा,बेह्तरीन चिकनी एवं मोटी जांघे,बाहर की तरफ़निकलती हुई गोल गोल मोटी मोटी गांढ़ और मदहोश करने वाली रसीली शानदार उभारों वाली उसकी दोनों छातियां। मैं तो जब भी उसे देखता मेरा लंड़ खड़ा हो जाता और मुझे ऎसी ईच्छा होती कि मै इसे तुरंत नंगी कर ड़ालू और उसकी रसीली छातियों में भरे हुए जवानी के रस को जी भर कर पिऊ। लेकिन ये एक सच्चाई थी कि वो रसीली छातियां और मखमली चूत मेंरी नही थी। ये सोच कर मेंरा मन अपने भाई के प्रति थोड़ी देर के लिये घृणा से भर जाता।

मेंरा भाई वैसे भी उस बेह्तरीन जवान पुदी का मजा नहीं ले पाता था क्योंकि उसकी नौकरी ही ऎसी थी महिने में बीस दिन तो बो बाहर ही रहता था। बचे हुए दस दिनों में सात दिन उसे शहर में अपनी टिम के साथ घूमना होता था।अब तीन दिन में नंगा नहायेगा क्या ? और निचोडे़गा क्या? सो किसी-किसी महिने तो भाभी बिन चुदी ही रह जाती थी। कभी कभी मुझे ऎसा विचार आता कि भाभी के लिये ऎसे विचार मन में लाना गलत है, लेकिन जैसे ही भाभी मेंरे साम्ने आती मेंरी कामवासना मेंरी अन्तरात्मा पर हावी हो जाती और मैं फ़िर से उत्तेजित हो जाता और उसको चोदने के खयाल में डूब जाता । मेंरे लिये तो भाभी को चोदना अब एक मिशन बन चुका था, मैं मन ही मन अपनी भाभी के उपर न्योछावर हो चुका था और उसके बेह्तरिन जिस्म का दिवाना बन गया था। अब तो रात दिन मेंरे मन में भाभी को चोदने का ही खयाल रहता था।

भाभी का शर्मिलापन मेंरे लिये काफ़ी सुखद और मेंरी योजना में काफ़ी सहायक था। मैने तय कर लिया कि ऎसे भाभी के जिस्म को चोदने का खयाल कर के मुठ्ठ मारने से कुछ हासिल नही होने वाला उसे पाने के लिये प्रयास करना पड़ेगा। वैसे भी जिस इंसान के लिये इस बेह्तरीन पुदी को घर में लाया गया था उसे तो इसे ठीक से देखने की भी फ़ुर्सत नहीं थी चोदने की बात तो बहुत दूर थी। दौलत और जवानी दोनों ही उपभोग करने पर हि सुख देते हैं अन्यथा दोनों बोझ बन कर रह जाते है। दौलत और औरत की जवानी दोनों को ही अपनी रक्षा के लिये मजबूत कंधो के सहारे की जरुरत होती है, अन्यथा उसे कोई भी लूट कर ले जा सकता है। मेंरे घर में भी जवानी की दौलत खुले आम घूम रही थी और उसका रखवाला गायब था। सो मैंने उसे लूटने का फ़ैसला कर लिया था। बस प्रयास करना था और अवसर हासिल करना था
 
अब मैने भाभी के ज्यादा से ज्यादा करीब रहेने का विचार कर लिया। जब भी भाभी घर में अकेले मिलती मैं उससे काफ़ी सट कर या करीब खड़े रहने का ही प्रयास करता, और मौका मिलते ही मैं उसके गदराए बदन पर कहीं पर भी हाथ लगाने से नहीं चुकता और ऎसे जाहिर करता जैसे ये सब अन्जाने में हो गया है। भाभी के अकेले मेरे सामने से गुजरते ही मैं उसके रसीले बदन को निहरने लगता विशेषकर उसकी शानदार उभरों वाली रसीली छातीयों को . ऎसा नहीं है कि उसे ये सब पता नहीं था उसे अब मुझ पर कुछ कुछ शंका होने लगी थी, और मैं चाहता भी यही था कि तुझे कुछ समझ तो आए मेंरी जान . मै अकेले में जब भी उससे बात करता तो मेंरा ध्यान पूरी तरह से उसकी अनछुई कड़्क जवानी के रस से भरपूर छातीयों पर ही रहता . झिनी साड़ी के भीतर से दिखने वाले उसकी छाती के क्लिवेज का तो मैं दिवाना बन गया था। और मैं भी उसे बुरी तरह से घूर कर उसे पूरी तरह से समझा देता था कि मैं तेरे कौन से अंग को निहार रहा हूं। वो बुरी तरह से झेंप जाती थी,लेकिन हाय रे उसकी शरम वो चाह कर भी मेंरे सामने अपना पल्लु ठीक नहीं कर पाती थी, और मैं उसके शर्म का भरपूर फ़ायदा उठाते हुए उसके जिस्म को घूरने का पूरा मजा लेने लगा।और इसी शर्म का लाभ उठाते हुए मैं उसकी जवान बुर का रस भी पीना चाह्ता था।

इसी तरह से कुछ दिन बीत गये और मेंरे मन का ये ड़र निकल गया कि कहीं ये मेंरी हरकतों को घर में मेरी मां या बहन को न बता दे। इस बीच दो-तीन बार भाई का फ़ॊन आया लेकिन उसकी बातों से कहीं नही लगा कि मेंरी गदराई स्वप्न सुंदरी ने उसे इस बारे में कुछ भी बताया हो .

उसने एक बार मुझ से फ़ॊन पर कहा कि अपनी भाभी से खाली काम ही करवाता है कि उसे घूमाने भी ले जाता है, देख वो बहुत चुप रहने वाली लड़्की है उसे कोई तकलीफ़ भी होगी तो वो अपने मुंह से नही बोलेगी शरम और झिझक तो जैसे वो दहेज में लाई है। मां को तो अपने पूजा पाठ और किटी पार्टी से ही फ़ुर्सत नहीं मिलती होगी, और दिया (मेंरी छोटी बहन) को अपने कालेज,ट्यूशन,पढाई और दोस्तों से। तू अक्सर घर के काम से बाहर बजार वगैरे जाता है तो कभी ले जाय कर उसे साथ में , इसी बहाने उसे शहर के बारे में कुछ तो जानकारी होगी और उसका भी मन लगा रहेगा। मैं तो मन ही मन बड़ा खुश हो गया, उसने तो जैसे मेंरे मुह की बात छीन ली मुझ से। मैने भी फ़ौरन हां कर दी और भाभी के

सामने ही झूठ बोल दिया कि भैया मैं तो कहता हूं लेकिन वो ही नहीं चलती तो मैं क्या करुं, आप ही बोल दो भाभी को ऎसा कह कर मैंने भी को फ़ोन पकड़ा दिया। लेकिन वाह री भाभी उसने एक बार भी भाई से ये नहीं कहा कि मैंने तो ऎसा कभी बोला ही नहीं। वो तो बस जी, हां, अच्छा ऎसे ही बोलती

रही। फ़िर उसने फ़ोन मां को दिया, भाई ने मां को भी वही बात बोली जो उसने मुझ से कही थी, मां ने हंसते हुए कहा तुझे वहां बैठ कर भी चैन नहीं है क्या ? सारा दिन क्या नेहा (मेंरी भाभी) के बारे में ही सोचता है, काम में मन लगता है कि नहीं ? तू चिंता न कर बेटा मैं सनी से कह दूंगी वो कभी घर के काम से बाहर जायगा तो कभी नेहा को ले जाया करेगा। मां ने भाभी की तरफ़ देख कर व्यंग से कहा मुझे तो शक है कि इसके मुंह मे जुबान भी है या नहीं। खैर तू छोड़ बेटा इन सब बातों को हम सब सम्भाल लेंगे मैने तेरे लिये मिर्ची का अचार बना कर रखा है, अगली बार जब तू आयेगा तो ले जाना अपने साथ। खाने का ध्यान रखता है कि नहीं ? जवाब मे उसने कहा तू चिंता न कर मां लेकिन इस बार चेवड़ा और लड्डू ज्यादा देना मेरे कमीने दोस्तों को ये कुछ ज्यादा पसंद है और ये समय से पहले ही खतम हो जाते हैं। मां ने खिलखिलाते हुए कहा ठीक है बेटा इस बार मैं ज्यादा बना दुंगी।

और सुन इस बार तुझे इन चीजों में नया स्वाद मिलेगा क्योंकि इस बार ये सब तेरी गूंगी गुड़ीया से बनवाउंगी। इसी तरह मां बेटे में घरेलु बातें होती रही।

मां जब फ़ोन पर बात कर रही थी तो उसकी पीठ हमारी तरफ़ थी। इसलिये मैं बेखौफ़ भाभी से लगभग सट कर खड़ा था और मेंरा हाथ भाभी के पंजो से टकरा रहे थे। और वो किंकर्तव्यमूढ़ अपना सर जमीन की तरफ़ कर के खड़ी थी। उसके इस निर्विरोध रवैये से मेंरा हौसला बढा और मैने और थोड़ा जोर से उसके हाथों अपना हाथ टकराने लगा। अब मैं पूरी तरह से भाभी से सट कर खड़ा हो गया और मेंरा पूरा हाथ भाभी से चिपक गया . उसके नाजुक बदन की गर्मी से मेंरा लण्ड़ खड़ा हो गया। अब मैने अपना हाथ भाभी की जांघो से धीरे धीरे टकराना शुरु कर दिया। वो पूर्ववत खड़ी रही। अब मैने थोड़ी और हिम्मत करते हुए हाथ हल्का सा पिछे करते हुए उसकी गांड़ पर अपना हाथ मारने लगा। कुछ सेकण्ड़ तक उसकी गांड़ में हाथ टकराने के बाद मैंने अपना हाथ उसकी गांड़ पर ही रख दिया और धीरे से अपना हाथ घूमाते हुए अपना पंजा उसकी गांड़ पर रख दिया। पंजा उसकी गांड़ पर रख्ते ही वो थोड़ी चिंहुकी और हौले से मेंरी तरफ़ देखा। लेकिन मैं पूरी तरह अन्जान बन कर खड़ा रहा और मां बेटे के फ़ोन पर बात को सुनने का और जबरन मुस्कुराने का नाटक करता रहा। मेंरे लिये ये लिका छिपी अब बर्दाश्त के बाहर होते जा रही थी मैं जल्द ही नतीजा हासिल करना चाह्ता था लेकिन अपने जोश पर होश का कंट्रोल जरुरी था। खैर मैने थोड़ा और प्रयास करते हुए उसकी दांई गांड़ से अपना हाथ घुमाते

हुए उसकी बाई गांड़ पर घुमाते हुए उसके कमर और पीठ पर घुमाते हुए उसके कंधो पर रख दिया जैसे दोस्तों के कंधो पर रख्ते है।
 
दोस्तो आज से एक और नई कहानी शुरू कर रहा हूँ . यह कहानी देवर भाभी संबंधों पर आधारित है कि कैसे एक कमीना देवर अपनी सुंदर सुशील मासूम शर्मीली भाभी को आपने साथ संबंध बनाने के लिए मजबूर कर देता है. उम्मीद है कि ये कहानी आपको पसंद आएगी .

यह मेरी कहानी नही है इसका लेखक कोन है मुझे नही पता

धन्यवाद:-सलिल
 
मेंरे हाथ उसके कंधो पर ठीक उसकी ब्रा की पट्टी पर थे,अब मैंने अपनी ऊंगलियों को ढीला छोड़ दिया और अब वो ठीक उस जगह के उपर थी जहां से उसके स्तन काउभार शुरु हो रहा था। बेचारी, अब समझ कर भी अनजान बनने की उसकी बारी थी। घर में मेंरे रुतबे और मान को देखते हुए और अपने घर की हालत तथा एक शादी लायक बहन सहित तीन बहनॊं के घर में बैठे रहने की परिस्थिती तथा पति के लगातार घर से दूर रहने के हालात और अपनी स्वयं की शारीरिक जरुरत इन तमाम बातों ने उसके सामने ऎसे हालत पैदा कर दिये थे कि शायद अभी चुप्पी साधे रखने में ही उसकी भलाई थी। उसकी बेबसी का अब मैं भरपूर मजा ले रहा था, मुझे इस बात का पूरा यकीन हो गया था कि अकेले में शायद भले ही वो मुझे कुछ कहने का साह्स करे लेकिन सब के सामने मुझे कहने या मेंरे बारे में कुछ भी बुरा बोलने का साहस उसमें नही था।

इन बातों का अहसास होते ही और तमाम परिस्थिती अपने पक्ष में होते देख मैंने अपने मन में अपार शांति का अनुभव किया।

मैने एक बार अपनी मां की तरफ़ देखा वो अभी भी पूरी तल्लीनता से भाई से बात कर रही थी, उसकी तरफ़ से आशवस्त हो कर मैंने अब पूरी निर्भिकता से अपनी भाभी की तरफ़ देखा उसकी नजरें पूरी तरह से जमीन पर गड़ी हुई थी, अब मैने उसके स्तनों पर नजर ड़ाली, किसी अनहोनी की आशंका में उसकी सांसे कुछ तेज हो गई थी और वो जरा जोर से गहरी सांस ले रही थी। गहरी सांसे लेने के कारण उसके स्तन उपर नीचे हो रहे थे, जब उसके दोनों स्तन उपर की तरफ़ उठते तो मेंरी उंगलियां उसके स्तनों के उभार शुरु होने वाले स्थान से काफ़ी नीचे तक अपने आप चली जाती और उसके स्तन का काफ़ी हिस्सा उससे छुआ जाता।मैं अपनी भाभी के शरीर से उसी तरह चिपका हुआ था जैसे लोहा चुंबक से। लेकिन इस तरह स्तन के छुआने से मेंरे लिये खुद पर कबू रखना मुश्किल हो रहा था। कहीं मां के सामने कुछ गड़्बड़ न हो जाय इसलिये मैंने अपना हाथ वहां से हटा लिया और फ़िर से उसे नेहा भाभी की बड़ी बड़ी नरम गांड़ के पास स्थापित कर दिया, चार पांच बार हल्के से अपने हाथ को उसकी गांड़ से टकराने के बाद मैंने अपना हाथ हिलाना बंद कर दिया और मेंरा हाथ अब उसकी गांड़ से चिपक गया।

३०-४० सेकण्ड़ तक उसी तरह से अपना हाथ का उपरी भाग उसकी गांड़ पर रखने के बाद मैंने फ़िर से अपने हाथ को घुमा लिया और अपनी हथेली को उसकी गांड़ से लगा दिया, अब उसकी गांड़ मेंरी हथेली में थी। अब तक उसे पूरी तरह से यकीन हो चुका था कि मैं उसके शरीर से खेल रहा हूं। और यही मैं चाहता भी था।

इस बीच मेंरी मां और भाई के बीच फ़ोन पर संवाद जारी था

मां - बेटा संजय क्या तुम इस बार छुट्टी में थोड़े ज्यादा समय के लिये घर आ सकते हो?

संजय - क्यों मां ?

मां - दरअसल मैं तुम से सनी के विवाह के बारे में बात करना चाहती हूं?

संजय - लेकिन मां अभी तो वो पढ़ रहा है न?

मां - हां, लेकिन समय जाते कहां पता चलता है? और फ़िर ये उसका अखीरी साल ही तो है न कालेज का? और फ़िर तुम्हारे पापा ने कह दिया है कि कालेज खत्म करने के बाद सनी

उनका बीमा का काम ही संभालेगा सो नौकरी की चिंता जैसी कोई बात उसके साथ नहीं है।

संजय - तो तुमने कोई लड़की देखी है उसके लिये?

मां - हां और मुझे तो बेहद पसंद भी है और सनी को भी।

संजय - अच्छा!! कौन है मां वो खुशनसीब लड़की?

मां - नीता। अगर तुन्हें कोई आपत्ति न हो तो।

संजय ने लग्भग चिखते हुए कहा - क्या!!!!! नीता!!!!! , भला ममममुझे क्या आपत्ति हो सकती है। नेहा से पूछो।

मां - अरे हमारी तरफ़ से बात तो बही चलाएगी न। लेकिन तू साफ़ साफ़ बता कि तुझे अपनी साली नीता से सनी की शादी में कोई ऎतराज तो नहीं है न?

संजय - क्या मां , भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है, बल्कि ये तो नेहा के लिये भी बहुत अच्छा होगा उसे यहां अपनी बहन की कंपनी मिल जायेगी। और वो काफ़ी भले लोग है, और मैं नीता को अच्छी तरह से जानता हूं काफ़ी सरल और शांत लड़की है वो। मां मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

इधर मां के मुंह से अपनी बहन और मेंरी शादी की बात सुन कर मेंरी गुलबदन नेहा जान बुरी तरह चौंक गई और आचर्य से कभी मां की तरफ़ तो कभी कभी मेंरी तरफ़ देख रही थी। और मैंने भी मौके का भरपूर फ़ायदा उठाते हुए अपनी हसीना की गांड़ को जरा जोर से दबा दिया। और उसकी गांड़ में हल्के से हाथ घुमाते हुए उसकी अंडरवियर को तलाशते हुए अपना हाथ उसकी अंडरवियर के उभार पर रख दिया। अब वो अपने प्रति मेंरी हवस को समझ चुकी थी लेकिन अब तो वो चाह कर भी न तो मेंरे घर में और ना ही अपने घर में कुछ बता सकती थी। मेंरे एक ही दांव ने उसको चारों खाने चित कर दिया था और वो लाजवाब हो गई थी।
 
अचानक उसने मां से कहा कि उसे भाई से कुछ बात करनी है, मां ने भी तत्काल अपनी बात खतम करते हुए फ़ोन उसे दे दिया जैसे ही फ़ोन उसने लिया मेरा दिल धड़कनेलगा और मेंरी गांड़ फ़टने लगी कि ये क्या बोलेगी। उसने फ़ोन हाथ में लेकर भाई से कहा-

नेहा भाभी- आप कब आ रहे हैं यहां?

संजय - अभी तो नहीं, और इस बार आने में थोडा़ देर हो सकती है क्योंकि यहां काम कुछ ज्यादा है। इस बार केवल एक दिन के लिये ही आ पाउंगा क्योंकि उसके तुरंत बाद मुझे छ: महिने की ट्रेनिंग के लिये बंगलौर जाना है और उस दौरान हम अपना परिवार साथ नही रख सकते। ट्रेनिंग के खतम होने के बाद मुझे २ वर्ष के लिये किसी भी शहर मे काम करना होगा। वहां तुम साथ रह सकती हो लेकिन तुम तो देखती हो न कि मै कैसे महीने भर तक घर बाहर ही रहता हूं। सो, पराए शहर में मैं तुम्हें कई दिनों तक अकेले रखना ठीक नहीं समझता कम से कम अपने परिवार में तुम सुरक्षित तो हो। नेहा मेंरे नौकरी में अच्छी जगह बनाने के लिये तुम्हें इतना सहयोग तो देना पडे़गा।

नेहा भाभी - ठीक है जैसा उचित समझें किजीये। आने के पहले फ़ोन करना मत भूलना, अच्छा रखती हूं। ऎसा कह कर उसने फ़ोन रख दिया।

उसके फ़ोन रखते ही मेंरी जान में जान आई, उसके फ़ोन लेते समय मुझे ये भय सता रहा था कि कहीं वो रिश्ते के लिये मना न कर दे और मेंरे बारे में भाई को न बता दे। अब उसकी तरफ़ से मेंरा मन सदा के लिये निर्भय हो चुका था।

मां तो भाभी को फ़ोन देते ही यह कह कर चली गई कि उसे बहुत नींद आ रही है। इधर भाभी ने फ़ोन रखते ही मेंरी तरफ़ मुस्कुरा कर देखा और कहा नीता इतनी पसंद थी तो मुझे क्यों नहीं बताया, मैने मन में सोचा अगर तुझे बताता तो शायद बात बिगड़ भी सकती थी। लेकिन मैं मुस्कुराते रहा और कहा वो मेंरी मां है और मेंरे बात करने से ही मेंरे इशारों को समझ गई आप शायद नहीं समझ पाती, उसने कहा कर के तो देखते एक बार। मैंने तपाक से जवाब दिया आप कहां समझती है मेंरे इशारे। वो बुरी तरह से झेंप गई और अपना सर निचे कर दिया और कहा ऎसा नहीं है इतनी मूर्ख और नादान भी नहीं हूं मैं समझने वाले सारे ईशारे समझ ही समझ जाती हूं, अब जिन्हें समझना ही नहीं है ऎसे ईशारों को समझने से क्या मतलब। मैने भी तत्काल कहा मुझे क्या पता आप कौन से इशारे समझती हैं? और कौन से नहीं इसीलिये मैने मां से कहा . उसने जवाब में कुछ नहीं कहा केवल एक व्यंग भरी नजर से मुझे देखा और हौले से मुस्कुरा दिया। फ़िर उसने धीरे से कहा चलिये अब आपके साथ ड़बल रिश्ता होने जा रहा है बहुत बधाई आपको। मैने मन में कहा ड़बल नहीं मेंरी जान ट्रिपल रिश्ता कायम होने जा रहा है। लेकिन प्रत्यक्षत: केवल थैंक्स भाभी कहा। उसने कहा मुझे बहुत नींद आ रही है मैं सोने जा रही हूं गुड़ नाईट, और ऎसा कह कर वो धीरे धीरे सीढीयों की तरफ़ बढने लगी, चलते वक्त उसकी बड़ी बड़ी गांड़ हौले हौले हील रही थी और उसकी टाइट साड़ी से उसकी अंड़रवियर का उभार साफ़ दिख रहा था जिसे देख कर मेंरा लण्ड़ बुरी तरह से खड़ा हो गया। मेंरी किस्मत में अभी कुछ दिन और तड़फ़ना लिखा था, उसने उपर जाते हुए एक तिरछी नजर मुझ पर ड़ाली और हमारी नजर मिलते ही अपनी नजर निचे कर दिया लेकिन वो अपनी हल्की मुस्कान को मुझ से नहीं छिपा सकी और वो तेजी से सीढीयां चढते हुए अपने कमरे की तरफ़ जाने लगी।
 
मैं भाभी को अपने कमरे में घुसते तक देखता रहा जैसे ही वो कमरे में गई मेंरे दिमाग में तुरंत ये विचार आया कि अब ये नंगी हो कर अपने कपड़े बदलेगी। ये विचार आते ही मैं तत्काल हरकत में आया और दौड़ते हुए उपर की तरफ़ भागा। कमरे के हाल की सीढीयां तीसरी मंजिल मे मेरे कमरे के पास जा कर खतम होती थी, सीढीयों के खतम होते ही सीधे हाथ की तरफ़ मुड़ने पर २-३ कदमों के बाद मेंरे कमरे का दरवाजा था, और उसके बाद थोड़ा आगे जा कर फ़िर सीधे मुड़ने पर ४-५ कदमों के फ़ासले से मेंरी गुलबदन हसीना नेहा जान के कमरे का दरवाजा, और उसके २-३ कदमों के बाद एक छोटी सी २ टप्पे वाली सीढी थी जिसे लांघ कर छत पर जाया जा सकता था। उसी छत पर भाभी के कमरे की एक मध्यम आकार की खिड़की थी जिस पर गर्मी से बचाव के लिये कूलर लगा कर रखा था।

चूंकि अभी गर्मी के दिन नहीं थे इसलिये कूलर का उपयोग नहीं होता था और बंद ही रहता था। मैने अपने खाली समय में छत में जा कर उस कूलर के पिछले हिस्से से उसमें लगी खस को काफ़ी कुछ निकाल दिया था और एक जगह से छेद जैसा बना दिया था, कूलर के उसी छेद से मैं भाभी के कमरे की हर चीज को असानी से देख सकता था। मैं दौड़ते हुए अपने कमरे की तरफ़ गया और फ़िर वहां से तेज चाल चलते हुए नेहा के कमरे दरवाजे के पास जा कर खड़ा हुआ और दरवाजे पर कान लगा कर सुनने की कोशीश करने लगा कि अंदर मेंरी जानेमन क्या कर रही है? मुझे अंदर उसके चहल कदमी की अवाज आई और फ़िर कुछ ही क्षणों में मुझे उसके कपड़ों की अलमारी के खुलने की अवाज आई। मैं तत्काल वहां से हट कर छत में चला गया। वहां घुप्प अंधकार छाया हुआ था बादलों की वजह अकाश में तारे भी नहीं दिख रहे थे।

मैं सीधे कूलर के पास गया और उसके खस को हटा कर बनाए हुए छेद में आंख गड़ाकर देखने लगा। मुझे अंदर का दृष्य उसके कमरे की ट्यूब लाईट की रोशनी के कारण साफ़ दिखई दे रहा था, उसने अलमारी से अपना नाइट गाउन बाहर निकाल कर आल्मारी को बंद किया और वो पलंग की तरफ़ गई वहां उसने अपना गाउन रखा और और उसने अपने पल्लु को हटा कर नीचे गिरा दिया अब उसका ब्लाउस साफ़ दिखाइ दे रहा था अब उसने अपने लहंगे में फ़ंसी साड़ी को भी निकाल कर अलग कर दिया . वो अब केवल लहंगे और ब्लाउस में खड़ी थी . तभी अचानक वो चलते हुए कूलर की तरफ़ बढी मैने देखा चलते वक्त उसके वक्ष बेहतरीन अंदाज में हिल रहे थे। कूलर के ठीक नीचे टी.वी. था वो उसके पास आइ और टी.वी. चालू कर दिया। अब वो t.v. देखते हुए ही अपना हाथ अपने ब्लाउस की तरफ़ ले गई और उसने उसका पहला बटन खोल दिया

अगर छत में कूलर न होता तो मेंरे और उसके बीच केवल एक हाथ का ही अंतर था। इतने पास से उसका बदन देखने से मेंरा मुंह सूखने लगा और लंड़ ने अंदर बगावत कर दी अब मुझे उसको संभालना मुश्किल हो रहा था। जैसे ही उसने अपने ब्लाउस का पहला बटन खोला मुझे उसकी क्लीवेज साफ़ दिखाई देने लगी अब लंड़ बुरी तरह से कड़क हो गया था और उसे संभालने में मुझे दिक्कत होने लगी मैने उसे सीधा करने के लिये जैसे ही खड़ा होने की कोशीश की उत्तेजना के कारण मै हल्का सा कूलर से टकरा गया और थोड़ी सी टकराने की अवाज हुइ मैं घबड़ा गया और कूलर के पास से हट गया और अपने लंड़ को सीधा किया। मुझे ऎसा लगा कि मैं वहां से भाग जाऊं लेकिन नेहा का गदराया बदन देखने की चाहत में फ़िर जोखिम उठाते हुए कूलर में आंख गड़ाकर अंदर देखने लगा। t.v. चलने की वजह से उसने उस अवाज को नहीं सुना था , मैने देखा वो उसी जगह खडी थी टी.वी. देखते हुए अब तक उसने अपने ब्लाउस के सभी बटन खोल लिये थे और उसकी ब्लाउस के अंदर से मुझे उसकी गुलाबी ब्रा साफ़ दिखाई दे रही थी। उसकी छातीयां पूरी गोलाईयां लिये थी और वो पूरी तरह से कड़क थी लग्भग ३८ की साईज और पूरी तरह से कड़क स्तन मेंरा लंड़ अपने आप हरकत करने लगा और झटके देने लगा।

अब उसने अपना ब्लाउस भी नीचे गीरा दिया और वो केवल लहंगे और ब्रा में मेरे ठीक सामने खड़ी थी। मेंरा ऎसा मन हुआ की अभी उसके कमरे में जा कर उसको चोद डालूं। ब्लाउस नीचे गीरा देने के बाद उसने t.v. देखते हुए अपना

हाथ अपने लहंगे के नाडे पर रखा और धीरे से नाड़ा खोल कर उसे छोड़ दिया उसका लहंगा अपने आप नीचे गीर गया . अब एक अनिद्द सुंदरी मेरे सामने केवल पेन्टी और ब्रा में खड़ी थी और मैं उसे देखने के अलावा कुछ भी कर

पाने की स्थीति में नही था। मैंने अपने लंड़ को जोर से दबा लिया . केले के पत्तों की तरह चिकनी जांघ और कमर में फ़ंसी गुलाबी पेन्टी उसकी खुबसूरती को और बढा रहे थे।चूंकी वो खिड़की के काफ़ी करीब खड़ी इसलिये मुझे सब साफ़ साफ़ दिखई दे रहा था। उसकी गुलाबी पेन्टी से उसकी चूत का उभार साफ़ साफ़ दिखई दे रहा था। अब क्लाईमेक्स शुरु होने वाला था, उसने अपने हाथों से अपनी ब्रा की पट्टी को कंधो से नीचे गीरा दिया और इधर मेंरे दिल की धड़्कन तेज होने लगी। अब उसने अपनी ब्रा को हाथों से घुमाते हुए उसके पिछले हिस्से आगे कर लिया याने ब्रा के हुक सामने आ गये इस्के कारण अब वो लगभग नंगी हो चुकी थी उसके विशाल तने हुए स्तन मेंरी नजरों के सामने झूल रहे थे और मेंरी जवानी को ललकार रहे थे। अब उसने अपने ब्रा के हुक को खोला और अपनी छातीयों ब्रा के बंधन से अजाद कर दिया। अब वो मेंरे सामने जवानी के रस से भरपूर अपनी गदराइ हुई छातीयों को खोले हुए नंगी खड़ी थी।
 
मैं बदहवास हो अपनी इस नग्न सुंदरी को देख रहा था, अब मैं खुद को रोक पाने में असमर्थ था,

मेंरे लण्ड़ के लिये अब पेन्ट के अन्दर रहना अस्मर्थ हो गया था वो अपने संपूर्ण रुप में आ चुका था और उसे पेन्ट के अन्दर संभाल पाना मेरे लिये सम्भव नहीं था। मैं थोड़ा पिछे हटा और अपने पेन्ट को खोल कर निकाल फ़ेंका अब मेरा लण्ड़ काफ़ी आजाद मह्सूस कर रहा था,मैने देखा वो अपने आप झटके मार रहा था और कामवासना की अधीकता के कारण मेंरा पूरा शरीर गरम हो चुका था और मेंरे पैर थरथरा रहे थे। छत पर किसी के आने का कोई खतरा नही था इसलिये मै पूरी तरह से नंगा हो गया, अब मैंने अपना लंड़ अपने हाथो मे जोर से पकड़ लिया और मै फ़िर से नेहा के नंगे जिस्म को देखने के लिये कूलर के छेद में आंख गड़ाकर बैठ़ गया।

कमरे के अंदर का दृष्य अब और भी उत्तेजक हो चुका था,मैने देखा कि नेहा अब वापस पलंग की तरफ़ जा रही है अपने नाईट गाउन को पहनने के लिये और वो पूरी तरह से नंगी हो चुकी थी,इतनी देर में उसने अपनी पेन्टी भी उतार फ़ेंकी थी। उसकी पूरी तरह से अनावृत निर्वस्त्र बड़ी बड़ी भरपूर गोलाईयों वाली मांसल गांड़ चलते समय बड़े मोहक अंदाज मे हील रही थी। मै कुछ क्षण के लिये उसकी उत्तेजक गांड़ की अंतहीन दरार में खो गया।अब मेंरा हाथ धीरे धीरे अपने लंड़ पर आगे पीछे सरकने लगा और मैं नेहा के नंगे जिस्म को देखते हुए मुठ्ठ मारने लगा। तभी अचानक उसके कमरे में फ़ोन बज उठा, फ़ोन की घंटी सुन कर उसके बढते कदम रुक गए और वो वहीं ठिठक कर खड़ी हो गई। शायद वो ये अंदाज लगाने की कोशीश कर रही थी इस वक्त किस्का फ़ोन हो सकता है। कहीं गाउन पहनने के चक्कर में फ़ोन बंद न हो जाय ये सोच कर तुरंत पलटी और उसके पलटते ही मेरे पूरे शरीर में हजारों वाट का करंट दौड़ गया, कितनी खूबसूरत नंगी थी मेंरी नेहा भाभी। वो उसी तरह नंगी ही दौड़ते हुए t.v. की तरफ़ दौड़ी,फ़ोन वहीं रखा था उसके उपर। भाभी जब नंगी दौड़ कर फ़ोन की तरफ़ आ रही थी तो उसके दोनो वक्ष बुरी तरह से उछल रहे थे और एक दूसरे से टकरा रहे थे,ऎसा दृष्य को देख कर मेंरे मन में हाहाकार मच गया और मैं उत्तेजना के अत्यधिक आवेश में कूलर को ही अपने आगोश में लेकर उसे चुमने लगा।अंदर नंगी भाभी और बाहर उसका नंगा देवर दिवाना। दोनों ही अपने अपने कारणॊ से अधूरे और प्यासे थे। देवर तो पहले से ही पागल हो चुका था और नेहा की बुर चोदने के लिये तड़फ़ रहा था, और नेहा उसे अभी और थोड़ी चिंगारी और वज्रपात की जरुरत थी अपने ही देवर के साथ अवैध

संबंध बनाने के लिये।

औरत दो ही कारणों से अपनी लक्षमण रेखा को लांघती है पहला यदी पति इस लायक है तो वो उसे बचाने के लिये अपने घर की दहलीज लांघ कर यम के दरबार से भी अपने पति के प्राण वापस ले आती है और दूसरा यदि वो नालायक है और उसके मनोभावों को नहीं समझता तब वो इस दिवार को लांघ कर लाती है अपना यार और फ़िर शुरु होता है पति-पत्नी और "वो" का अंतहीन सिलसिला . नेहा के लिये संजय अभी तक दूसरे दर्जे वाला ही पति ही साबित हुआ था . उसकी शादी जरुर हुई थी और उसे एक बड़े घर की बहू होने का पूरा सम्मान भी मिला था अपने ससुराल से और समाज से लेकिन पति के जिस प्यार के लिये स्त्री यम से भी लड़ने का साहस जुटा लेती है उसका एक अंश भी संजय उसे नहीं दे पाया था और न ही उसके पास इसके लिये समय था और न उसकी इतनी समझ थी। पति की इस बेरुखी से उपजे खालीपन ने नेहा को शर्मिली से गूंगी भी बना दिया था। सनी ने नेहा के इस खालीपन को पकड़ लिया था और इसीलिये इस गदराइ हसीना की बुर चोदने के लिये पागल था।
 
नेहा नंगी फ़ोन के पास आ कर खड़ी हो गई, मेंरी नजर उसकी चूत पर गई, आहहहह क्या रसीली चूत पाई थी मेंरी जान ने . पूरे जतन से रखती थी वो उसे, पूरी तरह से क्लीन शेव चूत थी उसकी . मुझे उसकी खुबसूरत चूत की दरार साफ़ दिखाई दे रही थी। उसकी चूत की दोनों फ़ांके उभार लिये हुए थी और उसके उपर का हिस्सा भी अपने उभार के के कारण दूर से ही साफ़ दिखई दे रहा था, उसे देखकर मैं अपने होठों पर जीभ घुमाने लगा और उसकी मादक चूत का स्वाद महसूस करने का प्रयास करने लगा। मेंरा बदन तो अब भट्टी की तरह तप चुका था, काम के आवेश में मैं अब तेजी से अपने लण्ड़ को हिलाने लगा। मेंरे अपने घर में ही मेंरे लण्ड़ के लिये इतना सुंदर खिलौना मौजूद था और फ़िर भी मै उससे खेल नहीं पा रहा था, मुझे अपने दुर्भाग्य पर बड़ा ही क्रोध आ रहा था।

उसने फ़ोन उठाया और बोला हेल्लो

सामने संजय था

संजय- हेल्लो, नेहा मैने फ़ोन तुम्हें ये बताने के लिये किया था कि मै रविवार को घर आऊंगा और फ़िर सोमवार को शाम को वापस चला जाऊंगा ट्रेनिंग के लिये। मैने तुम्हें परेशान तो नहीं किया न, तुम सो तो नही गई थी नेहा?

नेहा- नही, बस सोने ही वाली थी। चेंज कर रही थी .

संजय - अच्छा अच्छा, सारी तुम्हें डिस्टर्ब किया। बाय, लेकिन कल मां को जरूर बता देना। रखता हूं गुड़ नाईट।

और फ़िर उसने बिना नेहा की बात सुने ही फ़ोन रख दिया। वो कुछ क्षण फ़ोन को घूरते रही फ़िर उसने उसे जोर से पटक दिया और वापस पलंग की तरफ़ जाने लगी। उसकी गांड़ फ़िर से उछलने लगी अब मै भी अपने क्लाईमेक्स में पहुंच चुका था, उसने अपना गाऊन उठा लिया और पहनने लगी, मेंरा दिल किया कि मैं यही से चिल्ला कर कह दूं, जाने मन कपड़े मत पहनों तुम नंगी बहुत अच्छी लगती हो, मै तुझे सदा नंगी ही देखना चाहता हूं। लेकिन उसने अपना गाऊन पहन लिया। अब मेंरा मूड़ खराब हो गया। अगर मुझे कोई नेहा को आशिर्वाद देने को कहता तो मै उसे एक ही आशिर्वाद देता "सदा नंगी रहो".

गाऊन पहनने के बाद वो पलंग पर लेट गई और कोई किताब पढ़ने लगी पढ़ते समय वो अपने पैर इधर उध्रर हिला रही थी जिसके कारण उसका गाऊन घूटनॊं तक उपर उठ़ गया। उसकी चिकनी टांगो पर नजर गड़ाए मै मुठ्ठ मारने लगा और थोड़ी ही देर में मेंरे लण्ड़ ने उल्टी कर दी और पोकने लगा। मैने बड़ी राहत महसूस की। मैने अपना पेन्ट पहना और छत की सीढ़ीयों से सावधानी से निचे उतरा क्योंकि उसके मात्र दो कदमों की दूरी पर नेहा के कमरे का दरवाजा था।

मैने देखा उसके कमरे के दरवाजे से प्रकाश की एक पतली रेखा बाहर आ रही थी। याने वो अंदर से बंद नही था। मै आहिस्ता आहिस्ता चलते हुए उसके दरवाजे के पास पहुंचा और उसके दरवाजे की दरार से अन्दर झांकने की कोशीश करने लगा। दरार से उसका पलंग दिखाई दे रहा था,चूकि दरवाजा हल्का सा खुला था इसलिये मुझे उसकी कमर तक का हिस्सा ही दिख रहा था। मैने देखा उसने अपनी दाहिना पांव सीधा रखा है और बांया मोड़ कर रखा है जिसके कारण उसका गाऊन उसकी जांघ तक चढ़ गया था और मुझे उसकी दाहिनी जांघ अंदर तक साफ़ दिखाई दे रही थी। कुछ क्षण उसे देखने के बाद मै तेजी से उसके दरवाजे से हटा और मुस्कुराते हुए अपने कमरे में चला गया।

कमरे में जाने के बाद मैने भी अपना ड्रेस बदला और लुंगी पहन ली तथा उपर केवल बनियान ही पहने रहा। भाभी के नंगे जिस्म की खुमारी अभी भी मेंरे दिमाग में थी। हांलाकि मैं झड़ चुका था लेकिन फ़िर भी काफ़ी देर तक नेहा भाभी के नंगे जिस्म को देखने के कारण मेंरे शरीर में पैदा गर्मी ने मुझे काफ़ी शीथिल बना दिया था, और मै काफ़ी थका मह्सूस कर रहा था, इसलिये मैं बाथ्ररुम गया और अच्छी तरह से अपने हाथ-पैर और चेहरा पानी से साफ़ किया और सर को थोड़ा पानी मारा, अब मै काफ़ी ताजगी मह्सूस कर रहा था, बाहर आ कर अपना बदन पोंछते हुए मै फ़िर नेहा के गदाराए नंगे बदन के बारे में सोचने लगा। पूरी तरह से फ़्रेश होने के बाद मै अपने पलंग मे जा कर सो गया और सोने का प्रयास करने लगा, नींद मेंरी आंखो से ओझल हो चुकी थी . बार बार भाभी का नंगा जिस्म मुझे नींद से दूर ले आता, मैने बेचैनी में अपना पहलू बदलते हुए एक मेग्जिन उठा कर पढ़्ने का प्रयास करने लगा। लेकिन मैं उसकी एक लाईन पढ़ पाने में असमर्थ था, भाभी के नंगे बदन ने मेंरे दिमाग को कुंद बना कर रख दिया था।
 
मैं बेचैनी में कुछ पहलु बदलने के बाद पलंग से उठ खड़ा हुआ, अपने शर्ट के पास गया और उसकी जेब से सिगरेट निकाल कर और उसे सुलगा ली, अब मै कमरे मेंचहक कदमी करते हुए सिगरेट पीने लगा और भाभी के बारे में सोचने लगा। छत से अपने कमरे में आए मुझे अब दो घंटे से भी ज्यादा बीत चुके थे।

मेंरे कमरे में सिगरेट का धुंआ भरने से मुझे कमरे में घुटन होने लगी तो मैने कमरे का दरवाजा खोल दिया और अपने रुम से बाहर आ कर गैलेरी में चल कदमी करने लगा। तभी मेंरी नजर भाभी के कमरे की तरफ़ गई उसके कमरे से अभी तक लाईट बाहर आ रही थी। याने वो अभी तक खुला हुआ था। मैं सोचने लगा क्या वो अभी तक किताब पढ़ रही है? मेंरी सिगरेट भी खतम हो चुकी थी सो मैंने उसे बुझाया और उसे फ़ेंकने के लिये छत की तरफ़ ही चला गया।

भाभी के दरवाजे के पास से मैंने अपनी सिगरेट छत पर फ़ेंक दी और दरवाजे की दरार से अंदर झांककर देखा। अन्दर का नजारा काफ़ी रोमांचित करने वाला था। भाभी गहरी नींद में सोई हुई थी और किताब आधी उसके सीने पर और आधी उसके चेहरे पर पड़ी थी।उसका चेहरा दाए तरफ़ मुड़ा हुआ था, और उसका बांया हाथ पलंग के बाहर लटक रहा था और उसका बांया पांव भी लटक कर जमीन पर पड़ा था, उसका गाऊन जांघ से भी थोड़ा उपर उठ़ गया था।

मेंरा लंड़ फ़िर से खड़ा होने लगा। मैने दरवाजे को थोड़ा धक्का दिया वो चररररर की अवाज के साथ थोड़ा खुल गया,दरवाजे में अवाज होने के कारण मैं थोड़ा घबरा गया और झट से वहां हट गया। कुछ देर तक मैं वैसे ही दिवार से चिपक कर खड़ा रहा लेकिन मैने देखा दरवाजा उसी तरह से खुला पड़ा है। यानी भाभी उसी तरह से सोई पड़ी है गहरी नींद में।

अब मै फ़िर दरवाजे के सामने खड़ा हो गया और इस बार कुछ हिम्मत के साथ मै दरवाजे को धक्का मार कर पूरा खोल दिया और वहीं खड़ा रहा। भाभी उसी तरह से पड़ी रही उस पर कोई असर नही हुआ लेकिन फ़िर भी मैं निश्चिंत हो जाना चाहता था इसलिये मैने फ़िर से दरवाजे को बंद किया वो फ़िर से अवाज करते हुए बंद हो गया। लेकिन वो सोई पडी रही . ऎसा मैने चार पांच बार किया लेकिन वो तनिक भी नहीं हीली। अब मुझे यकीन हो गया की वो गहरी नीद में है।

मैं उसके कमरे के अंदर गया और धीरे से बोला भाभी , लेकिन वो उसी तरह से पड़ी रही,ऎसा मैने दो तीन बार किया लेकिन वो पूर्ववत सोई रही। अब मैने उसके लाईट और पंखे को भी तीन चार बार बंद चालू करके देखलीया लेकिन उसकी नींद मे कोई खलल नहीं हुआ और बेसुध हो कर सोती रही।

अपनी स्वप्न सुंदरी को अपने सामने इस प्रकार अर्धनग्न अवस्था में बेसुध हो कर सोते देख मैं फ़िर से कामवासना के दलदल में ड़ूब गया। मेंरा लण्ड़ बुरी तरह से खड़ा हो गया था। मैं उसे छूने के लिये बेचैन हो गया। मैंने अपने कदम पलंग की तरफ़ बढ़ाये। अब मैं उसके एकदम करीब आ कर खड़ा हो गया। अब मैने अपना मुंह निचेझुकाते हुए उसके मुंह के एक्दम करीब ले गया और धीरे से बोला भाभीऽऽऽऽऽ उठो , लेकिन वो सोई पड़ी रही।
 
मेंरी नेहा मेंरे एक्दम सामने पड़ी थी उसे देखकर मुझे अपने अंदर एक लावा बहता हुआ मह्सूस हुआ। मेंरी नजर उसकी छातीयों पर पड़ी उसने ब्रा नहीं पहना था लेकिन फ़िर भी उसके कसाव में कोई कमी नही आई थी,वो लटके हुए नहीं थे पूरी तरह से तने हुए थे और उसकी सांसो के साथ पूरी तरह से ताल मिलाते हुए बड़े आकर्षक अंदाज में हील रहे थे।मेंरा मन किया कि उसे मसल ड़ालूं और उसका रस चूसने लग जाऊं।लेकिन मैंने सब्र से काम लेना ठीक समझा। अब मैंने उसके लटके हुए हाथ की

कलाईयों को हौले से अपनी उंगलियों की गिरफ़्त में लिया और उसको आहिस्ता से उपर की तरफ़ उठाया। थोड़ा सा उपर उठाने के बाद उसके चेहरे की तरफ़ देखा वो उसी तरह से सोई रही। अब मैने उसके हाथ को छोड़ दिया अब वो झटके से नीचे आ गिरे, ऎसा २-३ बार करने के बाद भी जब वो नहीं हिली तो मैं समझ गया कि वो मुर्दों से शर्त लगा कर सोई है।अब मैं काफ़ी बेखौफ़ हो गया और मैंने भाभी के पंजो को धीरे से अपने हाथों पकड़ लिया और धीरे धीरे प्यार से उसको सहलाने लगा। कुछ देर तक इसी तरह करने के बाद मैने नेहा को सहलाने का दायरा बढ़ा लिया और अब मैं धीरे धीरे उसके बांए हाथ को कंधे तक सहलाने लगा।

इस तरह उन्मुक्त और बेसुध सोती हुई नेहा बेहद मादक लग रही थी, उसका अर्धनग्न जवान शरीर किसी भी मर्द को पागल करने के लिये काफ़ी था। अपने सामने उसे पा कर पिछले आठ माह की मेंरी दमित कामवासना जागृत होने लगी थी, मैं अत्यन्त कामुक नजरों से उसके बदन को घूर रहा था और उसके शरीर के स्पर्श का आनंद ले रहा था। इस स्त्री को इस तरह अपने सामने बेसुध पड़ा पाकर मैं तमाम रिश्तों को भूल गया और उस जवान कली के हुस्न को अपने हाथों से मसलने के लिये मैं बेचैन होने लगा।

मैने अपना हाथ अब उसके कंधे पर ही रख दिया और उसे हल्के हल्के मसलने लगा और फ़िर धीरे से मैने अपने हाथॊं की उंगलियां उसके स्तन का उभार जहां से शुरु हो रहा था वहां रख दी। आहहह कितना नर्म था उसका स्तन। अब मैं बेचैन होने लगा और धीरे धीरे मेंरा पूरा पंजा उसके बांए स्तन के उपर रख दिया।पूरा स्तन मेंरे हाथ में आते ही मेंरा लण्ड़ अपने काबू के बाहर हो गया अब वो अंदर मे बुरी तरह से झटके मारने लगा।अब मैं खिसक कर उसके पलंग से एकदम चिपक गया और उसका बांया हाथ अपने घुटनों पर रख लिया, मेंरा एक हाथ उसके बांये स्तन को धीरे धीरे मसल रहा था और अब मैंने अपने दूसरे हाथ से उसके बांए हाथ के पंजो को पकड़ लिया और उसको चूमने लगा। २-३ मीनट तक ऎसे ही मैं उसके स्तन को हौले हौले मसलते रहा और उसके हाथों को चूमते रहा फ़िर मैंने अपने दांये हाथ से उसके स्तन को मसलना छोड़ कर उसको धीरे से उसके गाऊन के बटन के उपर रखा और अपने हाथों की ऊंगलियों से ही एक छोटे से प्रयास से उसका पहला बटन खोल दिया।

पहला बटन खुलते ही मुझे उसका क्लीवेज साफ़ दिखाई देने लगा , कामवासना के अतिरेक के कारण मेंरी आंख लाल सुर्ख हो गई थी और मैं अत्यंत कामुक नजरों से उसके बदन को घूर रहा था और स्पर्श कर रहा था। मैंने अपना हाथ उसके क्लीवेज पर घुमाते हुए धीरे से अपना हाथ उसके गाऊन के अंदर ड़ाल दिया और अब मैं उसके दांए स्तन को मसलने लगा।

इंसान को जितना मिलता है उसकी भूख और बढ़ती जाती है,कभी मैं नेहा के शरीर के स्पर्श मात्र से अभीभूत हो जाता था लेकिन आज उसके दोनों स्तनों पर हाथ फ़ेरने के बाद भी मेंरी अधीरता बढ़ती जा रही थी। मैं हौले हौले उसके दोनों स्तनों को बारी बारी मसलते रहा, अब मैंने अपना हाथ उसके गाऊन से बाहर निकाला और धीरे धीरे उसके गाऊन के बाकी बचे तीनों बटन भी खोल दिये।गाऊन के चारों बटन खोल्ने के बाद मुझे उसकी नाभी तक का शरीर साफ़ दिखने लगा। बटन खोल देने के बाद मैने उसके दोनों स्तनों के उपर से गाऊन को धीरे से हटा दिया,उसके दोनों स्तन मेंरे सामने अपने पूर्ण उभारों के साथ मेंरे सामने नग्न पडे़ थे, और मैं पूरी तरह से स्वतन्त्र था उनके साथ खेलने के लिये। अब मैंने उसके दोनों स्तनों को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया और हौले हौले उन्हें मसलने लगा। तभी अचानक उसके नाक से हल्की हल्की अवाज आने लगी याने वो और गहरी नींद मे चली गई।धीरे धीरे उसके नाक की अवाज बढ़ती गई और अब वो खर्राटे लेने लगी।
 
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