• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

कामाग्नि complete

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
फिल्म ख़त्म हुई तब तक 12 बजने में 10 मिनट कम थे।

विराज- यार, काश हम भी तुम्हारे नग्न समुद्रतट यानि न्यूड बीच वाला अनुभव ले पाते।

शालू- मुझे तो उस क्लब में जाकर चुदवाने का मन कर रहा है।

जय- क्यों ना हम यहीं वो क्लब बना लें। मान लो यही वो क्लब है और हम न्यू इयर मनाने यहाँ आये हैं।

शालू- एक काम करते हैं जैसे ही 12 बजेंगे, हम सब एक साथ नंगे हो जाएँगे तो फिर किसी को पहले या बाद में नहीं होना पड़ेगा और शर्म भी नहीं आएगी।

विराज- ठीक है फिर ऐसे कपड़े पहन लेते हैं जो एक झटके में निकल जाएं।

शीतल- आप लोग अन्दर जा कर लुंगी पहन लो।

शालू- हाँ, हमारे कपड़े तो वैसे भी केवल ये डोरियों से अटके हैं बस अन्दर के कपड़े निकालने पड़ेंगे तो वो हम पहले ही निकाल लेते हैं।

शालू और शीतल ने जो मैक्सी पहनी थीं उनमें कंधे पर बस दो डोरी थीं जिनके सहारे पूरी ड्रेस लटक रही थी। जब दोनों मर्द बेडरूम में लुंगी लेने गए तो शालू ने अपनी निगरानी में शीतल के ब्रा और पेंटी निकलवा दिए और खुद के भी निकाल दिए। 12 बजने में 1 ही मिनट बचा था।

जय (ऊंची आवाज़ में)- एक काम करो आप लोग भी यहाँ बेडरूम में ही आ जाओ।

शीतल- ठीक है जी।

शीतल ने नशे में लहराती हुई आवाज़ में जवाब दिया.

दोनों बेडरूम में पहुंचे तो जय और विराज लुंगी लपेट कर आधे नंगे खड़े थे और आखिरी मिनट के सेकंड्स गिन रहे थे।

49 … 50 … 51 … 52 … 53 … 54 … 55 … 56 … 57 … 58 … 59 … हैप्पी न्यू इयर !!!

एक झटके में दोनों लुंगियां ज़मीन पर थीं। अगले ही क्षण शालू की मैक्सी भी फर्श पर गिर गई लेकिन शीतल ने अपनी मैक्सी निकलने के बजाए दोनों हाथों से अपनी आँखें बंद कर लीं थीं। आखिर शालू ने ही उसे अपने गले लगाते हुए उसकी मैक्सी नीचे खसका दी। वैसे शायद वो ऐसी हालत में शालू को अपने से चिपकने ना देती लेकिन अभी शर्म के मारे वो उससे चिपक गई और अपना सर उसके कंधे पर झुका कर आँखें मूँद लीं।

विराज जाकर शालू के पीछे चिपक गया और जय शीतल का पीछे। शालू ने जय को आँख मारते हुए चुम्बन का इशारा किया और अपने होंठ आगे कर दिए। जय भी हल्का नशे में था और न्यू इयर पार्टी की मस्ती थी सो अलग। उसने भी आवाज़ किये बिना अपने होंठ शालू के होंठों से टकरा कर हल्का सा चुम्बन ले लिया। तभी शालू ने शीतल धक्का दे कर अपने से अलग किया।

शालू- अब तू अपना पति सम्हाल; मैं अपना सम्हालती हूँ।

इतना कह कर शालू पलटी और घुटनों के बल बैठ कर विराज का लंड चूसने लगी। जय ने शीतल को पीछे से पकड़ लिया और एक हाथ से उसके स्तन मसलने लगा और दूसरे से उसकी चूत का दाना।

एम्स्टर्डम में तो कोई अनजान था जिसके सामने शीतल ने चुदवाया था और वहां एक जोड़ा स्टेज पर खुले आम चुदाई कर रहा था जिसे देख कर उसे जोश आ गया था; लेकिन यहाँ तो उसके पति का लंगोटिया यार था जिसके सामने वो नंगी खड़ी थी और वो अपनी पत्नी से लंड चुसवाते हुए उसके नंगे बदन को निहार रहा था।

पहली बार अपने बचपन के दोस्त की नंगी बीवी को देखते हुए विराज के लंड को लोहे की रॉड बनने में देर नहीं लगी। उसने शालू को वहीँ बिस्तर पर पटका और उसकी कमर के नीचे तकिया लगा कर उसे चोदने लगा। शालू के दोनों पैरों को उसने अपने हाथों से पकड़ रखा था और खुद घुटने मोड़ कर बिस्तर पर बैठे बैठे उसे चोद रहा था।

जय और शीतल कुछ देर तक तो उनकी चुदाई देखते रहे फिर जय शालू के बाजू में पीछे दीवार पर तकिया लगा कर अधलेटा सा बैठ गया और शीतल को अपना लंड चूसने के लिए कहा। पहले तो कुछ देर उसने बिस्तर के किनारे बैठ कर जय का लंड चूसा लेकिन फिर सुविधा के हिसाब से बिस्तर पर पैर मोड़ कर बैठी और झुक कर चूसने लगी। ऐसे में उसकी गांड विराज की आँखों के ठीक सामने थी और दोनों जंघाओं के बीच उसकी चिकनी मुनिया भी झाँक रही थी।

विराज कभी शीतल की गांड और चूत को देखता तो कभी उसके झूलते मम्मों को। शालू का ध्यान काफी देर से विराज की नज़रों पर था। उसने भी सोचा क्यों ना वो कोई शरारत करे। उसने अपना सर जय की ओर घुमाया और जैसे ही जय ने उसकी ओर देखा, शालू ने अपने हाथों से अपने स्तनों को सहलाते हुए आँखों से उनकी ओर इशारा किया और फिर अपने होंठों से एक हवाई चुम्बन जय की ओर फेंका।

जय इस मादक आमंत्रण के सम्मोहन में बंध कर जैसे खुद-ब-खुद शालू की ओर झुका और उसके रसीले आमों का रस चूसने लगा। शीतल तो जय के लंड पर झुकी थी इसलिए देख नहीं पाई कि अभी अभी क्या हुआ लेकिन इस हरकत ने विराज का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। उसकी आँखों के सामने उसका दोस्त उसकी बीवी के स्तनों को मसलते हुए चूस रहा था। विराज की उत्तेजना और बढ़ गई और उस से रहा नहीं गया। उसने भी शीतल की गांड पर हाथ फेरते हुए एक उंगली उसकी भीगी-भीगी चुनिया-मुनिया के अन्दर सरका दी।

 
शीतल को तो जैसे करंट लग गया। पहले तो वो कुछ क्षणों के लिए जैसे मदहोशी के आगोश में समां गई लेकिन जैसे ही वो मदहोशी टूटी उसे याद आया कि उसके पति ने वादा किया था कि उसके अलावा शीतल को कोई नहीं चोदेगा और वो अचानक उठ कर बैठ गई और गुस्से से विराज की ओर मुड़ी…

शीतल- आपकी हिम्म… त…

लेकिन तभी उसे एहसास हुआ कि उसने अभी अभी क्या देखा था। उसने अपना सर वापस जय की ओर घुमाया और देखा कि वो अभी भी शालू का स्तनपान करने में व्यस्त था।

शीतल- अब समझ आया। यही चाहिए था ना आपको? तो फिर मेरी क्या ज़रूरत थी। मुझे अपने चरित्र पर कोई दाग नहीं लगवाना; आपको जो करना है कीजिये; मैं मना नहीं करती लेकिन मुझे इस सब में शामिल नहीं होना है। मैं जा रही हूँ। आप लोग मज़े करो।

इस से पहले कि जय सम्हाल पाता या समझ पाता कि क्या हुआ है, शीतल बाहर निकल गई।

जय- क्या हुआ यार, अचानक से इतना क्यों भड़क गई। अच्छा नहीं लगा तो मना कर देती।

विराज- नहीं यार! भाभी भड़कीं तो मेरी हरकत से थी फिर तेरी हरकत देख के उनका गुस्सा बेकाबू हो गया।

जय- तुझे तो मैंने बताया था ना कि वो मेरे अलावा किसी से नहीं चुदवाएगी फिर तूने हरकत की क्यों?

विराज- नहीं यार, मेरा चोदने का कोई इरादा नहीं था। वो तो तुझे शालू के बोबे चूसते देखा तो सोचा छूने में क्या हर्ज़ है तो मैंने एक उंगली भाभी की चूत में डाल दी पीछे से, ये सोच के कि उनको भी थोड़ा मज़ा आ जाएगा।

जय- अरे यार! गलती मेरी ही है। उसने कहा था कि उसे मेरे अलावा कोई हाथ नहीं लगाएगा और मैंने तुझे बोल दिया कि मेरे अलावा कोई नहीं चोदेगा। अब तो ये ग़लतफ़हमी महंगी पड़ गई। खैर तुम अपनी चुदाई खत्म करो मैं जा के देखता हूँ मना सकता हूँ या नहीं अब उसको। आधे घंटे में वापस ना आऊं तो फिर इंतज़ार मत करना।

विराज और शालू का तो मन फीका पड़ गया था, तो उन्होंने फिर आगे चुदाई नहीं की। जय ने भी शीतल को मानाने की कोशिश की लेकिन उसने बात करने से साफ़ इन्कार कर दिया। जय ने फिर वापस जाना सही नहीं समझा, वो वहीं शीतल के साथ चिपक कर सो गया।

उधर विराज-शालू ने भी कुछ समय तक इंतज़ार किया फिर वो भी सो गए। अगली सुबह दोनों जल्दी निकल गए क्योकि राजन को उसकी दादी के भरोसे छोड़ कर आए थे तो ज्यादा देर रुक नहीं सकते थे।

इस सामूहिक चुदाई का तो कुछ नहीं हो पाया क्योंकि शीतल के संस्कार उसे पराए मर्द से चुदवाने की इजज़र नहीं दे रहे थे लेकिन शालू क्या उसके और जय के बीच कोई और नया समीकरण बन पाएगा?

देखते हैं अगले भाग में!

 
दोस्तो, आपने इस गर्म सेक्स कहानी के पिछले भाग में पढ़ा कि शीतल सामूहिक चुदाई के लिए तो मान गई लेकिन अब तक उसके संस्कार उसे अपने पति के अलावा किसी और से चुदवाने की इजाज़त नहीं दे रहे थे। वहीं दूसरी ओर शालू तो जय से चुदाने के लिए तैयार बैठी थी। अब आगे…

सामूहिक चुदाई की पहली कोशिश नाकाम हो चुकी थी। आगे भी इसके हो पाने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे थे। आखिर हर किसी को अपनी ज़िन्दगी में कोई तो नया रंग भरना ही था। जय और विराज दोनों अपने अपने तरीके से कोशिश करने लगे।

जय ने अपनी उन ब्लू फिल्म वाली कैस्सेट्स का सहारा लिया जो वो एम्स्टर्डम से लाया था, लेकिन विराज के लिए अब कुछ नया करने को बचा नहीं था। राजन अभी छोटा था उसके सोने तक वैसे भी विराज कुछ कर नहीं पाता था और देर रात तक इतना समय होता नहीं था कि कुछ खास किया जा सके।

धीरे धीरे विराज और शालू का काम जीवन नीरस होने लगा था।

लेकिन जय के अभी कोई बच्चे नहीं थे उसने शीतल के साथ ब्लू फिल्म देखना शुरू किया। हालाँकि शीतल विवाहेतर संबंधों के पक्ष में नहीं थी फिर भी पता नहीं क्यों उसे 1974 में बनी इमैन्युएल (Emmanuelle) नाम की फिल्म बहुत पसंद आई। उसमें भी नायिका का पति उसे मज़े करने के लिए प्रोत्साहित करता रहता था। लेकिन शायद जो उसे पसंद आया था वो उस नायिका के कामानंद का प्रदर्शन था।

इस फिल्म का कई भाग थे और कई महीनों तक शीतल बस उन्ही को देखने की माँग करती रहती थी। आखिर एक दिन जय के कहने पर उन्होंने 1976 में बनी ऐलिस इन वंडरलैंड देखी। ये एक तरह से हास्य फिल्म थी। सेक्स में कॉमेडी का मिलना ही एक अलग अनुभव था उस पर हिंदी फिल्मों की तरह गाने भी। चुदाई करते करते गाना गाते कलाकार सोच कर ही हँसी आती है। ये शीतल ही नहीं बल्कि जय के लिए भी एक नया अनुभव था।

लेकिन इस फिल्म से शीतल को एक और नई बात सीखने को मिली जो उसने पहले कभी सपने भी नहीं सोची थी। और वो थी रिश्तों में चुदाई। इस फिल्म में ऐलिस, एक जुड़वां भाई-बहन से मिलती है जिनका नाम ट्विडलीडी और ट्विडलीडम था। वो बच्चों की तरह खेलते खेलते चुदाई करते रहते हैं। शीतल को ये बात अजीब सी लगी।

शीतल- इन्होंने ऐसा क्यों दिखाया? भाई-बहन भी कभी ऐसा करते हैं क्या!

जय- ज़्यादातर नहीं करते। लेकिन शीतल, दुनिया बहुत बड़ी है हर तरह के लोग हैं। कुछ लोग करते भी होंगे।

शीतल- पता नहीं। मुझे तो नहीं लगता। वैसे भी ये तो मजाकिया फिल्म है वो भी काल्पनिक दुनिया के बारे में इसलिए दिखा दिया होगा।

जय- तुमको ऐसा लगता है तो फिर मैं तुमको एक और फिल्म दिखाता हूँ। मैंने भी नहीं देखी है लेकिन पोस्टर देख कर ही समझ गया था कि उसमें क्या है।

शीतल- क्या नाम है उस फिल्म का?

जय- टैबू

शीतल- मतलब?

जय- वर्जित।

यह शायद दुनिया की पहली फिल्म थी जिसमें माँ-बेटे के बीच के कामुक रिश्ते को इतनी गहराई से दिखाया था। फिल्म में माँ-बेटे की चुदाई देख कर तो शीतल थर थर कांपने लगी, वो दृश्य उसके सेक्स को झेल पाने की मानसिक शक्ति से बहुत ऊपर था; उसके हाथ पैर ढीले पड़ गए और दिल की धड़कन राजधानी एक्सप्रेस के साथ रेस लगाने लगी।

उस दिन शीतल चुदाई के समय एक लाश की तरह पड़ी रही लेकिन जो अनुभव उसकी चूत को हुआ वो शायद पहले कभी नहीं हुआ था। सच है… सेक्स, शरीर का नहीं दिमाग का खेल है।

जय और शीतल ने जब ये ब्लू फिल्में देखना शुरू किया तब इस सब के बिलकुल विपरीत विराज और शालू की आँखों से नींद गायब थी और वो एक रात बिस्तर पर पड़े पड़े अपने नीरस काम-जीवन पर चर्चा कर रहे थे। वही पुराना घिसा-पिटा चुदाई का खेल खेलने में अब उन्हें कोई रूचि नहीं रह गई थी।

शालू- देखो क्या से क्या हो गया। कहाँ तो आप जय के साथ मज़े कर लेते थे और कहाँ अब मेरे होते हुए भी कुछ नहीं कर पा रहे।

विराज- तब तो माँ की चुदाई देख कर मस्ती करते थे अब अकेले अकेले मज़ा नहीं आ रहा। जय की बीवी ने भी मना कर दिया नहीं तो अपनी ज़िन्दगी ऐश में कटती।

शालू- क्या कहा आपने? माँ की चुदाई?

विराज तो शालू को पूरी कहानी बताई कि कैसे वो अपनी माँ और जय के पापा की चुदाई देखते थे और दरअसल कैसे उनके आपस में मुठ मारने की शुरुआत भी उसकी माँ की वजह से ही हुई थी।

 
यह सब सुनते सुनते शालू के दिमाग में एक खुराफात आई।

शालू- जय के पापा तो मम्मी को अब भी चोदते होंगे। क्यों ना हम भी उनकी चुदाई देख देख के चुदाई करें?

विराज- नहीं यार, अब वो सुराख से देख कर मज़ा नहीं आयेगा, और वैसे देखते देखते तुमको कैसे चोद पाऊंगा।

शालू- ये तुम्हारी माँ के बेडरूम और हमारे बेडरूम के बीच की दीवार में एक तरफ़ा आईना लगवा लें तो कैसा रहेगा?

विराज- हम्म! आईडिया तो अच्छा है लेकिन माँ यहाँ आई तो उसे दिख जाएगा कि उस आईने से हमें सब दीखता है। एक मिनट सोचने दो।

आखिर सोच समझ कर सही प्लान मिल ही गया। सबसे पहले अपने बेडरूम को नया बनाने की बात की गई और फिर विराज ने कहा कि हम अपने आराम के साथ साथ माँ को भी वही आराम देंगे और इस तरह दोनों बेडरूम को फिर से बनवाने का काम शुरू किया। दोनों बेडरूम के बीच की दीवार में दोनों तरफ एक जैसे आईने लगवाए गए जिनके बीच दीवार नहीं थी। राजन के लिए एक छोटा बिस्तर बनवाया गया जो एक पार्टीशन के उस तरफ रखा था जिस से चुदाई के वक़्त कोई बाधा ना हो।

दोनों बेडरूम के दर्पण एक दम सामान्य दर्पण ही दिखाई देते थे लेकिन विराज के बेडरूम के दर्पण को सरका कर आसानी से हटाया जा सकता था। उसके बाद केवल माँ के बेडरूम का दर्पण लगा रहता जिसमें से विराज के तरफ से सब साफ़ दिखाई देता था। ये बात विराज ने शालू को भी नहीं बताई थी कि माँ के तरफ वाला दर्पण भी हटाया जा सकता था लेकिन उसको खोलने की कुण्डी जय के बेडरूम की ही तरफ थी।

तो अब सबके सोने के बाद विराज के बेडरूम का दर्पण हटा दिया जाता और वो खिड़की अब एक लाइव टीवी बन जाती लेकिन अक्सर उस पर एक ही बोरिंग का कार्यक्रम चल रहा होता था जिसमें विराज की माँ सोती हुई दिखाई देती थी। लेकिन कभी कभी विराज और शालू की किस्मत अच्छी होती तो उस पर लाइव ब्लू फिल्म चलती थी जिसकी हीरोइन विराज की माँ होती थी।

कई महीनों तक विराज और शालू ने बड़े मज़े किये. शालू को तो बड़ा जोश आ जाता था और वो विराज की माँ को रंडी, छिनाल और पता नहीं क्या कह कर चिढ़ाती थी कि देख कैसे तेरी माँ अपने यार से चुदा रही है।

विराज को भी इस बात से और जोश आता और वो शालू को दुगनी ताकत से चोदता। विराज और शालू के काम-जीवन में फिर से एक नई ऊर्जा आ गई थी।

लेकिन ये सब ज्यादा समय नहीं चल पाया। एक दिन जब जय के पापा सुबह खेत पर घूमने गए तो वहां उनको सांप ने काट लिया और जब तक कोई उनको वहां बेहोश पड़ा देख पता बहुत देर हो चुकी थी। अस्पताल जाते जाते ही उनकी मौत हो गई। माहौल थोड़ा ग़मगीन हो गया और इस बीच किसी के दिमाग में ये बात नहीं आई कि अब विराज और शालू को उनकी लाइव ब्लू फिल्म देखने को नहीं मिलेगी।

ग़म और ख़ुशी रात और दिन की तरह होते हैं। एक जाता है तो दूसरा आता है। अगले ही महीने शीतल ने बताया कि वो गर्भवती है। जय को लगा कि शायद उसके बाबूजी उसके बेटे के रूप में वापस आने वाले हैं। सारे ग़म फिर खुशी में बदल गए।

लेकिन विराज और शालू के लिए तो सब कुछ फिर से नीरस हो गया था। जय के ऐश भी खत्म होने ही वाले थे क्योंकि ना केवल शीतल गर्भवती होने के कारण अब पहले जैसे चुदा नहीं सकती थी बल्कि उसने उन सब ब्लू फिल्मों को भी ताले में बंद कर दिया था क्योंकि उसे लगता था कि इस सब का आने वाले बच्चे पर गलत असर पड़ेगा।

जहाँ चाह वहां राह … नदी अपना रास्ता खुद ढूँढ लेती है। शालू ने विराज को एक तीर से दो निशाने लगाने की सलाह दी।

शालू- देखो जी, ऐसे वापस नीरस होने से कोई फायदा नहीं है। उधर शीतल भी पेट से है। मेरे टाइम पर जय भाईसाहब ने आपका साथ दिया था। अब आप उनका साथ दे दो…

विराज- साथ देने का वादा तो तूने भी किया था।

शालू- अरे! अब आप कहोगे तो मैं मना करुँगी क्या। आप जाकर निमंत्रण तो दो।

विराज- चुदाई निमंत्रण? हे हे हे!!!

विराज जब शहर गया तो जय की दुकान पर जा कर उसने अपनी बात उसे बता दी और कह दिया कि जब मन करे आ जाना। जय ने हमेशा की तरह पूरी ईमानदारी के साथ शीतल से पूछ लिया।

जय- विराज आया था कुछ काम से तो आधे घंटे दुकान पर बैठ कर गया। कह रहा था कि शालू पेट से थी तो तुमने बड़ा साथ दिया था। अब मैं चाहूँ तो वो मेरा साथ दे सकता है।

शीतल- हाँ तो चले जाओ… और अगर आपके दोस्त को दिक्कत ना हो तो शालू के साथ भी कर लेना जो करना हो।

जय- अरे नहीं, तुमको तो वो पसंद नहीं था ना। मैं उसके साथ नहीं करूँगा।

शीतल- नहीं नहीं, वो तो मुझे कोई हाथ लगाए ये पसंद नहीं है। आपको अच्छा लगता है ये सब तो मैं क्यों आपकी तमन्नाओं के रास्ते का पत्थर बनूँ।

जय- तुमको पक्का कोई समस्या नहीं है ना?

शीतल- मुझे क्या समस्या होगी? बल्कि मैं तो कहती हूँ ऐसे जम के चोदना उसको कि वो भी याद रखे कि शीतल का पति क्या मस्त चोदता है।

कहानी जारी रहेगी

 
जय को तो मन ही मन मज़ा आ गया। पहली बार वो किसी पराई नारी को चोदने जा रहा था वो भी अपने बचपन के यार के साथ मिल कर। आखिर अगले रविवार की दोपहर वो घर से निकला तब भी शीतल ने कह कर भेजा कि अच्छे से चोदना, जल्दी झड़ के मेरी नाक मत कटा देना।

जय शाम तक गाँव पहुँच गया। खाना खा पीकर सब सोने चले गए और जय, विराज के साथ बैठ कर दारू पी रहा था। अभी एक-एक पैग ही लगाया था कि शालू ने आकर कहा कि राजन सो गया है।

दोनों विराज के बेडरूम में चले गए। शालू एक पतली सी नाइटी पहने बिस्तर के बीचों बीच लेटी थी लेकिन उसने अपना ऊपरी हिस्सा कोहनियों के बल उठा रखा था। विराज ने अपना शर्ट निकाल फेंका और केवल चड्डी में शालू के पीछे जाकर बैठ गया। शालू ने अपना सर उसकी गोद में रख दिया।

विराज ने अपने दोनों हाथ उसकी नाइटी के अन्दर डाल कर कुछ देर उसके स्तनों को वैसे ही सहलाया फिर धीरे से नाइटी की डोरियाँ कन्धों पर से नीचे सरका कर उसे कमर तक खिसका दिया। बाकी शालू ने खुद नाइटी कमर से नीचे निकाल कर फेंक दी। अब वो पूरी नंगी थी। जय ने सोचा नहीं था कि सबकुछ इतना जल्दी हो जाएगा। वो तो अभी शर्ट ही निकाल रहा था और उसका तो अभी ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ था।

विराज- आओ ठाकुर! भोग लगाओ।

जय- नहीं यार तुम्हारी पत्नी है, शुरुआत तुम ही करो।

शालू- सुनो जी, आप ही ज़रा चाट के गीली कर दो। तब तक मैं जय भाई साहब का खड़ा करती हूँ। भाई साब आप इधर आइये।

विराज नीचे जा कर शालू की चूत चाटने लगा और शालू ने जय की चड्डी नीचे खींच कर निकाल दी। उसका लंड बड़ा तो हो गया था लेकिन अभी खड़ा नहीं हुआ था। शालू ने उसे गपाक से अपने मुँह में लिया और चूसने लगी। पता नहीं वो शालू की चूत की खुशबू थी या उसके जय के लंड को चूसने का दृश्य जिसने विराज का लंड जल्दी ही कड़क कर दिया। विराज ने तुरंत उठ कर अपनी चड्डी उतारी और वहीं बैठ कर शालू को चोदना शुरू कर दिया।

तभी शालू उठी और कुश्ती के किसी दाव की तरह विराज को चित करते हुए उसके ऊपर चढ़ कर बैठ गई। जय को अचम्भा ये हो रहा था कि इस पूरे दाव में उसने विराज के लंड को अपनी चूत से निकलने नहीं दिया।

शालू- वो क्या है ना भाई साब, लेटे-लेटे लंड चूसना थोड़ा मुश्किल रहता है। आइये अभी अच्छे से चूस के दो मिनट में आपके लंड को लौड़ा बनाती हूँ।

शालू किसी घुड़सवारी करती हुई लड़की की तरह उछल उछल कर विराज को चोद रही थी और एक हाथ से पकड़ कर जय का लंड भी चूस रही थी। पता नहीं क्या सच में वो जय को बेहतर चूस पा रही थी या फिर उसके उछलते हुए स्तनों का वो मादक दृश्य था, या फिर शायद शालू का विराज पर हावी होने का वो अंदाज़ जो जय को बड़ा उत्तेजक लगा था; जो भी जो जय का लंड अब कड़क होकर झटके मारने लगा था। शालू ने जय को छोड़ा और झुक कर अपने स्तन विराज की छाती पर टिका दिए।

शालू- भाईसाब, आप एक काम करो पीछे वाले छेद में डाल दो। अपने दोस्त की बीवी की गांड मार लो आज!

जय- यार तू डाल ले ना पीछे, मैं आगे आ जाता हूँ। मुझे पीछे का कोई आईडिया नहीं है।

विराज- आईडिया तो मुझे भी नहीं है यार। मैंने भी आज तक इसकी गांड नहीं मारी है। तू ही कर दे उद्घाटन।

शालू- हाँ हाँ भाईसाब जल्दी डाल दो। बड़े दिन से मन था आगे-पीछे एक साथ लंड लेने का। एक फोटो में देखा था तब से सपने देख रही हूँ। आज आप मेरा सपना सच कर ही दो।

जय ने थोड़ा थूक अपने लंड पर लगाया और थोड़ा शालू की गांड पर और लंड को उसकी गांड के छेद पर रख कर दबा दिया। लंड की मुंडी तो आसानी से चली गई लेकिन तभी शालू की गांड का छल्ला कस गया और उसका लंड ऐसे फंस गया कि ना अन्दर जा रहा था ना बाहर। थोड़ी देर तक कोशिश करने के बाद कहीं जा कर जय अपने लंड को पूरा अन्दर घुसा पाया।

अब शालू ने कमर हिलाना शुरू किया चूत का लंड अन्दर जाता तो गांड का बाहर आता और जब पीछे धक्का मरती तो चूत का लंड बाहर की ओर निकलता और गांड वाला अन्दर घुस जाता।

जय और विराज को कुछ करना ही नहीं पर रहा था। अकेली शालू दो-दो लंडों को एक साथ चोद रही थी। आखिर उसकी उत्तेजना चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई, वो कुछ देर तक बहुत तेज़ी से स्टीम इंजन की रॉड के जैसे आगे पीछे हुई और फिर झड़ गई।

जब शालू के धक्के बंद हुए तो विराज और जय ने अपने लंड आगे पीछे करना शुरू किया। अब जब लंड आगे पीछे हुए तो दोनों को एक दूसरे के लंड का अहसास भी हुआ। पुरानी यादें भी ताज़ा हो गईं जब वो बचपन में लंड से लंड लड़ाते थे। आखिर दोनों से इस नए अनुभव का रोमांच बर्दाश्त नहीं हुआ और जल्दी ही दोनों शालू की चूत और गांड में ही झड़ गए।

 
उसके बाद एक बार विराज ने अकेले गांड मारने का अनुभव लिया और जय ने खड़े खड़े शालू को चोदा ये देख कर विराज का लंड भी खड़ा हो गया और शालू जय के गले में बाँहें डाल कर और उसकी कमर को अपनी टांगों में जकड़ कर लटक गई फिर पीछे से विराज ने उसकी गांड में अपना लंड डाल दिया और फिर दोनों ने मिलकर शालू को अपने दो-दो लंडों पर उछाल-उछाल कर चोदा।

आखिर शालू को बीच में सैंडविच बना कर तीनों नंगे ही सो गए। सुबह जय की नींद जल्दी खुल गई थी। उसने शालू के अंगों से खेलना और सहलाना शुरू किया तो शालू भी उठ गई। उसने जय को अपने साथ आने को कहा। दोनों नंगे ही कमरे से बाहर आ गए। जय को समझ नहीं आ रहा था कि हो क्या रहा है, शालू चाहती क्या है। उसने धीरे से खुसुर-फुसुर बात करने का सोचा।

जय- हम कहाँ जा रहे हैं?

शालू- मेरी सासू माँ के कमरे में।

जय- पागल हो क्या? मुझे ऐसे नंगे वहां क्यों ले जा रही हो?

शालू- माँजी इस समय नहा रही होतीं हैं मेरी बड़ी तमन्ना थी उनके नहाते टाइम उनके बिस्तर में चुदवाने की, लेकिन कभी नींद ही नहीं खुलती थी।

शालू ने धीरे से दरवाज़ा थोड़ा सा खोल कर देखा। अन्दर कोई नहीं था। शायद शालू की सासु अटैच्ड बाथरूम में नहाने गई हुईं थीं। शालू ने दरवाज़ा पूरा खोल कर खुला ही छोड़ दिया और जय को अन्दर बुला कर जल्दी से उसका लंड चूसने लगी। अन्दर से नल के चलने की आवाज़ आ रही थी। जय की धड़कन डर के मारे बहुत तेज़ हो गई थी। शायद इसी वजह से उसका लंड भी जल्दी खड़ा हो गया।

शालू जल्दी से लेट गई और अपनी टांगें चौड़ी कर दीं। उसकी चूत भी पूरी गीली हो गई थी। जय ने बिना समय गंवाए अपना लंड उसकी चूत में पेल दिया और शालू के ऊपर लेट कर उसे जल्दी जल्दी चोदने लगा। तभी अन्दर से मग भर भर के पानी डालने की आवाज़ आने लगी।

ॐ गंगे च यमुने! चैव गोदावरी! सरस्वति! नर्मदे! सिंधु! कावेरि!…

शालू- जल्दी चोदो माँ जी आने वाली हैं।

जय ने चुदाई की रफ़्तार इतनी बढ़ा दी कि शायद कोई और टाइम होता तो छह कर भी इतना तेज़ नहीं चोद पाता। तभी बाथरूम के दरवाज़े के खुलने की आवाज़ आई और जय ने आव देखा ना ताओ शालू को वैसे ही गोद में उठा कर बाहर की तरफ भगा। इधर भी भाग ही रहा था कि उसके लंड ने शालू की चूत में अपना लावा उगलना शुरू कर दिया। आखिर उसने विराज के कमरे में जा कर ही सांस ली। शालू को बिस्तर पर पटक के खुद भी उसी के ऊपर लेट गया। उसका लंड अभी भी शालू की चूत में था। इस सब में विराज की भी नींद खुल गई थी।

विराज- क्या हुआ सुबह सुबह चुदाई शुरू कर दी? और ये दरवाज़ा क्यों खोल रखा है। देखो माँ के उठने का टाइम हो गया है कहीं इधर आ गईं तो लफड़ा हो जाएगा।

इस बात पर दोनों हंस पड़े। जय का लंड अब तक अपनी सारी मलाई शालू की कटोरी में खाली कर चुका था। वो उठा और जा कर दरवाज़ा बंद कर दिया। फिर जय ने बताया कि वो अभी क्या गुल खिला के आये हैं।

यह सुन कर तो विराज के भी दिल की धड़कन बढ़ गई।

खैर सबने उठ कर नाश्ता किया और जय को विदा किया। जय जब घर पहुंचा तो शीतल उसी की राह देख रही थी।

शीतल- क्या क्या किया फिर रात को?

जय- विराज और मैंने शालू को खूब चोदा और गांड भी मारी। यहाँ तक कि दोनों काम साथ में भी किये, एक चोद रहा था और एक गांड मार रहा था। खूब गर्म सेक्स का मजा लिया.

शीतल- आप झूठ बोल रहे हो ना? मुझे चिढ़ाने के लिए?

जय- झूठ क्यों बोलूँगा? तुम्ही ने तो कहा था ना कि नाक मत कटाना। तो मैंने शालू को विराज से ज्यादा ही चोदा होगा। मज़ा आ गया उसको।

शीतल- मुझे आपसे ये उम्मीद नहीं थी।

इतना कह कर शीतल दुखी होकर बेडरूम में चली और दरवाज़ा अन्दर से बंद कर लिया। जय ने बाहर से समझाया कि उसके कहने ही पर तो वो गया था अगर वो मन कर देती तो नहीं जाता। आखिर जब कुछ नहीं हुआ तो वो चुपचाप दूकान पर चला गया। शाम को आया तो शीतल सामान्य थी। उसने अपने व्यवहार के लिए माफ़ी भी मांगी और कहा कि ये पहली बार था इसलिए वो बर्दाश्त नहीं कर पाई लेकिन आगे से वो ऐसा नहीं करेगी।

अगले कुछ महीनों में जय 2-4 बार गाँव गया लेकिन उसको समझ आ गया कि शीतल को ये पसंद नहीं आ रहा था। वो कुछ ना भी कहती तो उसके व्यवहार से समझ आ जाता कि वो इस सब से खुश नहीं है। आखिर समय आने पर शीतल ने एक बेटी को जन्म दिया जिसका नाम उन्होंने सोनिया रखा। जय ने शीतल को वादा किया कि अब वो शालू को चोदने गाँव नहीं जाएगा।

विराज और जय अक्सर मिलते रहते थे। कभी कभी शालू भी आ जाती थी और कभी कभी छुट्टियों में जय का परिवार भी गाँव जाता था। दोनों परिवारों की दोस्ती खत्म नहीं हुई और ना ही कम हुई लेकिन उस दोस्ती में से सेक्स का जो हिस्सा था वो खत्म हो गया था।

अब विराज और शालू अपने जीवन में रंग भरने के लिए क्या करेंगे? क्या विराज को अपना पहला प्यार वापस मिल जाएगा?

जानने के लिए इंतज़ार करें अगले भाग का
 
दोस्तो, आपने पिछले भाग में पढ़ा कि शालू और विराज ने जय के साथ तिकड़ी जमी और तीनों ने मस्त चुदाई मस्ती की, लेकिन शीतल को ये सब पसंद नहीं आ रहा था इसलिए आखिर जय ने इस खेल से सन्यास ले लिया।

अब आगे …

जय के इस फैसले के बाद जय ने तो एक सामान्य जीवन जीने का निर्णय ले लिया था लेकिन विराज और शालू की हवस अभी खत्म नहीं हुई थी और उनके लिए ऐसा जीवन बड़ा ही नीरस था।

बड़ी मुश्किल से एक ही साल गुज़रा था कि शालू का दिमाग फिर कोई नई तरकीब ढूँढने में लग गया जिस से वो अपनी जिंदगी में फिर से वासना के नए नए रंग भर सके।

एक बार जब विराज किसी काम से एक हफ्ते के लिए बाहर गया हुआ था तो दो दिन में ही शालू की हालत खराब हो गई क्योंकि अब तो वो सीधी सच्ची चुदाई भी उसे नहीं मिल रही थी। रात को उसे नींद नहीं आ रही थी।

काफी देर तक करवटें बदलने के बाद अचानक वो उठ गई और बेचैनी से कमरे में इधर उधर घूमने लगी। फिर ना जाने उसके मन में क्या आया कि उसने दीवार के उस दर्पण को सरकाया और दूसरे कमरे में देखने लगी।

विराज की माँ दूसरी ओर करवट ले कर सो रही थी। उस खिड़की के एक तरफ़ा कांच से देखते हुए शालू उन यादों में खो गई जब वो इसी खिड़की से विराज की माँ को चुदते हुए देखते थे और फिर विराज उसे दुगनी रफ़्तार से चोदता था। जब वो इन यादों से बहार निकली तो उसकी नज़र एक छोटी सी कुण्डी पर पड़ी। जिज्ञासावश जब शालू ने उसे खींचा तो दूसरी ओर का कांच भी खुलने लगा। उसे अब तक नहीं पता था कि इस दर्पण को भी हटाया जा सकता है।

इसी बात से शालू के मन में एक विचार आया कि जिस आग में वो जल रही है, क्या पता वही आग इस खिड़की के दूसरी ओर भी लगी हो। उसने इसी विचार को एक योजना में बदल दिया। अगले दिन शालू की नज़र विराज की माँ की एक एक हरकत पर थी और वो समझ गई थी कि शायद विराज के पापा के बाद जो स्थान जय के पापा को मिल गया था वो अब खाली है।

शालू की सासू माँ भले ही अब अधेड़ उम्र की हो गई थी लेकिन जवानी ने जैसे उसके बदन को अब तक नहीं छोड़ा था वैसे ही उसकी हसरतें भी अब तक तो जवान ही थीं। उस रात शालू, राजन को सुलाने के बाद अपनी सासू माँ के कमरे में गई।

शालू- माँ जी … सो गई क्या?

माँ- नहीं बहू, इस उमर में इत्ती जल्दी काँ नींद आबे है।

शालू- थोड़ी देर आपके पास सो जाऊं?

माँ- हओ … आजा।

शालू जा कर विराज की माँ के बाजू में जा कर चिपक कर सो गई।

शालू- मेरी माँ तो बचपन में ही गुज़र गई थी। ठीक से याद भी नहीं है।

माँ- तू जाए अपनोंई घर समझ बहू।

शालू- हाँ तभी तो आपके पास आ गई सोने … ये बता रहे थे कि ये काफी बड़े हो गए तब तक आपने इनको अपना दूध पिलाया था।

माँ- हुम्म …

शालू- मुझे भी पिलाओ ना!

माँ- का बात कर रई है। चुप कर!

शालू- बचपन की तो ठीक से याद नहीं है इसलिए सोचा आपको ही माँ समझ के बचपन की कमी पूरी कर लूँ। लेकिन …

माँ- ऐसी है तो पी ले … जे ले!

सासू माँ ने बच्चों को पिलाते हैं वैसे अपने ब्लाउज का नीचे से बटन खोल के अपना एक स्तन निकाल कर शालू की ओर बढ़ा दिया। शालू भी एक हाथ से पकड़ कर उसे चूसने लगी। एक औरत अच्छी तरह जानती है कि कैसे एक बच्चा दूध पीता है और किस तरह चूसने से उत्तेजना बढ़ती है। विराज की माँ पहले ही काफी समय से वासना की आग में जल रही थी। शालू ने उसे और भी भड़का दिया था।

उनकी धड़कन बढ़ गई थी और उनको होश ही नहीं रहा कि कब शालू ने उनके ब्लाउज का बाकी बटन भी निकाल दिए और अब वो दोनों स्तनों को बारी बारी से चूसने लगी थी। जिस भी स्तन को वो ना चूस रही होती उसके चुचुक को अपने थूक से गीले किये हुए अंगूठे से सहलाती रहती। जिससे ऐसा आभास होता जैसे उनके दोनों चूचुक साथ में चूसे जा रहे हैं।

माँ- का कर रई है बहू … अब सेन (सहन) नईं हो रओ।

शालू- माँ जी … मैं भी एक औरत हूँ मैं आपकी समस्या समझ सकती हूँ। आप कहें तो कुछ मदद करूँ आपकी इस तड़प को दूर करने में।

माँ- कर दे बहू … कर दे …

 
शालू ने विराज की माँ की वासना की उस आग को भड़का दिया था जो इतने समय से वक्त की राख में दबने सी लगी थी। शालू ने सासू माँ का घाघरा उठाया और उनकी दोनों टांगें मोड़ कर फैला दीं। उन दोनों मुड़ी हुई टांगों को बांहों में भर के शालू ने अपनी उंगलियों से माँ की चूत की फांके अलग कीं और चूत का दाना अपने होंठों में दबा कर चूसने लगी।

विराज की माँ, कामोद्दीपन के एक अलग ही स्तर पर पहुँच गई थी। अव्वल तो ये कि उसकी चूत एक साल से भी ज्यादा समय से अनछुई थी, उस पर पहले भी कभी किसी ने उसकी चूत को मुँह नहीं लगाया था। उसकी चूत हमेशा चोदी ही गई थी। जिंदगी में पहली बार ये चूत चूसी जा रही थी। सासू माँ की कमर ऊपर नीचे होने लगी और आनंद के मारे वो छटपटा रही थी। अगर शालू ने उनकी टांगें अपनी बाहों में कस कर पकड़ी ना होतीं तो शायद शालू के होंठ अब तक चूत से चिपके ना रह पाते।

काफी देर तक ऐसे ही छटपटाने के बाद आखिर सासू माँ ढीली पड़ गईं। शालू ने भी अब उनको छोड़ दिया और उनके बाजू में जा कर लेट गई। थोड़ी देर बाद जब सासू माँ की साँस में साँस आई तो उन्होंने शालू को गले से लगा लिया।

इसके बाद तो सास-बहू ना केवल सहेलियों की तरह रहने लगीं बल्कि सासू माँ ने शालू को और भी नई नई बातें सिखाने के लिए कहा क्योंकि उन्हें लगा हो सकता है जैसे वो चूत चटवाने के अनुभव से अब तक वंचित थीं वैसे ही और भी कुछ हो जो वो ना जानतीं हों।

शालू ने विराज के आने से पहले सासू माँ को आधुनिक काम शास्त्र का पूरा प्रशिक्षण दे डाला जिसमें घर पर सारा समय नंगे रहने से लेकर खुले आसमान के नीचे चुदाई के मज़े तक और मुख मैथुन से लेकर गुदा मैथुन (गांड मराई) तक के सारे गुर शामिल थे। शालू ने भी समलैंगिक संभोग के सारे प्रयोग जो वो शीतल के साथ नहीं कर पाई थी वो सब अपनी सास के साथ कर लिए।

एक रात दोनों सास-बहू एक दूसरे की चूत चाट कर झड़ गईं और नंगी चिपक कर पड़ी पड़ी बातें करने लगीं।

माँ- बहू … सच्ची कऊँ … तूने तो अच्छेई मजा करा दए।

शालू- हुम्म … अब साल भर से ऊपर हो गया था आपको चुदवाए हुए तो।

माँ- हम्म … जा तो सच्ची कई …

अचानक सासू माँ को होश आया कि उन्होंने गलत बात पर हामी भर दी है। पहले तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई लेकिन फिर थोड़ा साहस जुटा कर सोचा अब इसके साथ इतना सब हो गया तो क्या शर्माना।

माँ- तोय काँ से पता के १ सालई हुओ?

शालू- आपको लगता है जय भाईसाब के बाबूजी के बारे में किसी को नहीं पता?

माँ- अब बात करन बाले तो तेरी बी पता नई का का केत थे।

शालू- मेरी जो कहते थे वो तो मैंने सुहागरात पर ही इनको सब बता दिया था।

उसके बाद शालू ने अपनी सासू माँ को वो सब बातें बता दीं जो उसने सुहागरात पर विराज के साथ की थीं। उसके बाद ये भी बताया कि कैसे विराज उनकी ही कल्पना में मुठ मारना सीखा और वो जय के साथ क्या क्या करता था। लेकिन उसके आगे की सारी बातें वो छुपा गई कि कैसे उसने भी जय से चुदवाया। लेकिन ये सब सुनने के बाद सासू माँ ने जो कहा उसकी उम्मीद शालू ने नहीं की थी।

माँ- हम्म … चूत चटावे में मजा तो भोत आबे है, पर लंड की कसर तो लंडई पूरी करे है।

शालू- बात तो सही है। फिर जय के पापा के बाद कोई और क्यों नहीं ढूँढा?

माँ- अब बे घर के जैसेई थे। सबे पता थी कि हम उनको घर को काम कर दें हैं ते बे हमरो बहार को काम कर दें हैं। घर में आनो जानो लगो रेत थो। जा के मारे कभी कोई ने कछु नई कई। अब अलग से चुदाबे के लाने कोइए बुलाएं तो बदनामी ना होए।

शालू- हम्म … घर की बात घर में ही रहे तो अच्छा है। सोचती हूँ कुछ अगर आपके लिए कोई इंतज़ाम हो सकता होगा तो ज़रूर बताऊँगी।

माँ- रेन दे बहू! अब जा उमर में कोन पे भरोसा करूँ। थोड़े दिन बचे हैं। बे बी निकल जे हैं।

शालू- मैं तो बता दूँगी भरोसा करना है कि नहीं आप सोच लेना। चलो छोड़ो … अभी मैं आपको फ्रेंच किस सिखाती हूँ।

फिर बहूरानी की कामशास्त्र की कक्षा शुरू हो गई। ऐसे ही समय कब बीत गया पता ही नहीं चला।

 
आखिर विराज वापस आ गया और माँ को वापस अपने कपड़े पहन कर रहना शुरू करना पड़ा। विराज अपने साथ विडियो कैस्सेट प्लेयर ले कर आया था। दिन में सबने मिल कर प्लेयर पर माधुरी की ‘दिल’ देखी। ये प्लेयर वो जय की दूकान से ही खरीद कर लाया था। रात को जब सब सोने लगे तब विराज ने शालू को बताया कि जय ने उसे कुछ चुदाई वाली फिल्मो की कैस्सेट भी दिए हैं।

विराज- जय बोला जिन जिन फिल्मों पर शीतल भाभी ने प्रतिबन्ध लगा रखा है वो सब तू ले जा तो मैं ले आया। वो यूरोप से लाया था ये सब।

शालू- शीतल ने प्रतिबन्ध लगाया है तो फिर तो मस्त माल होगा। लगाओ लगाओ, देखते हैं। वैसे भी बहुत दिन से तुम्हारे लंड के लिए तड़प रही हूँ। मस्त चुदाई की फिल्म देख कर चुदाई करेंगे।

उन्होंने वही फिल्म लगाई ‘टैबू’ जिसमें माँ-बेटे के काम संबंधों को बड़ी गहराई से दिखाया था। विराज और शालू दोनों को ही इंग्लिश समझ नहीं आती थी लेकिन कैस्सेट पर जो नंबर थे उस से ये समझ आ गया था कि ये सब एक ही सीरीज की फ़िल्में हैं। फिर ये इतने गंवार भी नहीं थे कि मॉम, सन, ब्रदर और सिस्टर जैसे शब्द ना समझ पाएं। दोनों चुदाई करते करते फिल्म देख रहे थे। जल्दी ही उनको समझ आ गया कि फिल्म की हेरोइन अपने बेटे से चुदवाने के लिए तड़प रही है। वो उसे मना तो करती है लेकिन फिर एक बार चुदाई शुरू हो जाए तो फिर और चोदने को कहती है।

शालू- देखो कैसे चोद रहा है मादरचोद अपनी माँ को।

विराज- अरे वो मादरचोद नहीं है। उसकी माँ बेटाचोद है।

शालू- क्या फरक पड़ता है कद्दू दराँती पे गिरे या दराँती कद्दू पे।

शालू- तुम्हारी माँ भी लंड के लिए तड़प रही है। वो माँगे तो दोगे अपना लंड माँ की चूत में?

विराज- ऐसी बातें ना कर पगली अभी तेरी चूत में झड़ जाऊँगा नहीं तो। बचपन से उसी के सपने देख देख के तो मुठ मारना सीखा था। लेकिन वो नहीं लेगी मेरा।

शालू- मैं दिलवा दूँ तो?

विराज- तो फिर जो तू माँगे वो तुझे दिलाने की ज़िम्मेदारी मेरी।

इतना कह कर विराज ने शालू को पूरे जोर के साथ चोदना शुरू किया और उधर फिल्म में बेटा अपनी माँ के मुँह में झड़ा और इधर विराज शालू की चूत में। उसके बाद फिल्म में माँ-बेटे की चुदाई के 1-2 सीन और आये और हर बार शालू यही चिल्लाती रही- चोद ज़ोर से मादरचोद … और ज़ोर से चोद। पता नहीं वो फिल्म के हीरो को कह रही थी या विराज को लेकिन एक बार और झड़ के दोनों सो गए।

अगले दिन जब विराज खेत पर गया तो शालू ने सासू माँ से बात की।

शालू- एक लंड मिला है आपके लिए। चाहिए तो बताना?

माँ- कौन को?

शालू- आपको लंड दिखा दूँगी। पसंद आये तब आगे की बात करेंगे।

माँ- तोय काँ से मिल गाओ। कोई भार के अदमी से तो नईं चुदा रइए तू।

शालू- आप फिकर मत करो आपने कहा था ना बदनामी नहीं होना चाहिए, तो आप बेफिक्र रहो।

उस रात विराज ने फिल्म का अगला पार्ट देखने की पेशकश की तो शालू ने मना कर दिया।

शालू- आज आप टीवी पे नहीं लाइव अपनी माँ की नंगी पिक्चर देखो।

विराज- क्या बात कर रही है। माँ ने किसी और से चक्कर चला लिया क्या?

शालू- ऐसा ही कुछ समझो।

इतना कह कर शालू ने अपनी तरफ के दर्पण को खोला और बाहर चली गई। विराज ने देखा दूसरी ओर उसकी माँ बिस्तर पर नंगी लेटी हुई थी और एक हाथ से अपनी चूत और दूसरे से अपने चूचुक मसल रही थी। विराज से उसे ऐसा करते हुए पहली बार देखा था। विराज को अभी कुछ पता नहीं था कि उसकी पीठ पीछे शालू ने उसकी माँ को क्या क्या सिखा दिया था।

अचानक माँ के कमरे का दरवाज़ा खुला और नंगी शालू अंदर आई। विराज को तो जैसे झटका लग गया। उसके मन में यही आया कि ये शालू क्या कर रही है है मरवाएगी क्या।

लेकिन अगले ही पल उसकी आँखों से सामने एक अलग ही नज़ारा था। शालू और विराज की माँ आपस में गुत्थम गुत्था हो गईं और दोनों की जीभें आपस में एक दूसरे से छेड़खानी करने लगीं। शालू खींच कर माँ को दर्पण के पास ले आई और उसे दर्पण की ओर खड़ा करके पीछे से उसके स्तनों को मसलने लगी और फिर पीठ पर चुम्मियाँ लेते हुए नीचे की ओर जाने लगी। माँ खुद को दर्पण में नंगी देख रही थी लेकिन दूसरी ओर से विराज अपनी माँ को पहली बार इतनी करीब से नंगी देख रहा था।

थोड़ी देर बाद शालू ने सासू माँ को बिस्तर पर धकेल दिया और खुद उनके ऊपर चढ़ गई। दोनों एक दूसरे की चूत चाटने लगीं। शालू ने माँ को ऐसे लेटाया था कि उनकी चूत सीधे दर्पण की दिशा में ही थी। थोड़ा चूसने के बाद शालू ने अपने सर ऊपर किया और दर्पण की तरफ इशारा किया कि देखो और फिर माँ की चूत की फांकें खोल के विराज को दिखाईं।

मित्रो, मेरी यह सास बहु सेक्स स्टोरी आपको कैसी लग रही है?

 
आखिर विराज वापस आ गया और माँ को वापस अपने कपड़े पहन कर रहना शुरू करना पड़ा। विराज अपने साथ विडियो कैस्सेट प्लेयर ले कर आया था। दिन में सबने मिल कर प्लेयर पर माधुरी की ‘दिल’ देखी। ये प्लेयर वो जय की दूकान से ही खरीद कर लाया था। रात को जब सब सोने लगे तब विराज ने शालू को बताया कि जय ने उसे कुछ चुदाई वाली फिल्मो की कैस्सेट भी दिए हैं।

विराज- जय बोला जिन जिन फिल्मों पर शीतल भाभी ने प्रतिबन्ध लगा रखा है वो सब तू ले जा तो मैं ले आया। वो यूरोप से लाया था ये सब।

शालू- शीतल ने प्रतिबन्ध लगाया है तो फिर तो मस्त माल होगा। लगाओ लगाओ, देखते हैं। वैसे भी बहुत दिन से तुम्हारे लंड के लिए तड़प रही हूँ। मस्त चुदाई की फिल्म देख कर चुदाई करेंगे।

उन्होंने वही फिल्म लगाई ‘टैबू’ जिसमें माँ-बेटे के काम संबंधों को बड़ी गहराई से दिखाया था। विराज और शालू दोनों को ही इंग्लिश समझ नहीं आती थी लेकिन कैस्सेट पर जो नंबर थे उस से ये समझ आ गया था कि ये सब एक ही सीरीज की फ़िल्में हैं। फिर ये इतने गंवार भी नहीं थे कि मॉम, सन, ब्रदर और सिस्टर जैसे शब्द ना समझ पाएं। दोनों चुदाई करते करते फिल्म देख रहे थे। जल्दी ही उनको समझ आ गया कि फिल्म की हेरोइन अपने बेटे से चुदवाने के लिए तड़प रही है। वो उसे मना तो करती है लेकिन फिर एक बार चुदाई शुरू हो जाए तो फिर और चोदने को कहती है।

शालू- देखो कैसे चोद रहा है मादरचोद अपनी माँ को।

विराज- अरे वो मादरचोद नहीं है। उसकी माँ बेटाचोद है।

शालू- क्या फरक पड़ता है कद्दू दराँती पे गिरे या दराँती कद्दू पे।

शालू- तुम्हारी माँ भी लंड के लिए तड़प रही है। वो माँगे तो दोगे अपना लंड माँ की चूत में?

विराज- ऐसी बातें ना कर पगली अभी तेरी चूत में झड़ जाऊँगा नहीं तो। बचपन से उसी के सपने देख देख के तो मुठ मारना सीखा था। लेकिन वो नहीं लेगी मेरा।

शालू- मैं दिलवा दूँ तो?

विराज- तो फिर जो तू माँगे वो तुझे दिलाने की ज़िम्मेदारी मेरी।

इतना कह कर विराज ने शालू को पूरे जोर के साथ चोदना शुरू किया और उधर फिल्म में बेटा अपनी माँ के मुँह में झड़ा और इधर विराज शालू की चूत में। उसके बाद फिल्म में माँ-बेटे की चुदाई के 1-2 सीन और आये और हर बार शालू यही चिल्लाती रही- चोद ज़ोर से मादरचोद … और ज़ोर से चोद। पता नहीं वो फिल्म के हीरो को कह रही थी या विराज को लेकिन एक बार और झड़ के दोनों सो गए।

अगले दिन जब विराज खेत पर गया तो शालू ने सासू माँ से बात की।

शालू- एक लंड मिला है आपके लिए। चाहिए तो बताना?

माँ- कौन को?

शालू- आपको लंड दिखा दूँगी। पसंद आये तब आगे की बात करेंगे।

माँ- तोय काँ से मिल गाओ। कोई भार के अदमी से तो नईं चुदा रइए तू।

शालू- आप फिकर मत करो आपने कहा था ना बदनामी नहीं होना चाहिए, तो आप बेफिक्र रहो।

उस रात विराज ने फिल्म का अगला पार्ट देखने की पेशकश की तो शालू ने मना कर दिया।

शालू- आज आप टीवी पे नहीं लाइव अपनी माँ की नंगी पिक्चर देखो।

विराज- क्या बात कर रही है। माँ ने किसी और से चक्कर चला लिया क्या?

शालू- ऐसा ही कुछ समझो।

इतना कह कर शालू ने अपनी तरफ के दर्पण को खोला और बाहर चली गई। विराज ने देखा दूसरी ओर उसकी माँ बिस्तर पर नंगी लेटी हुई थी और एक हाथ से अपनी चूत और दूसरे से अपने चूचुक मसल रही थी। विराज से उसे ऐसा करते हुए पहली बार देखा था। विराज को अभी कुछ पता नहीं था कि उसकी पीठ पीछे शालू ने उसकी माँ को क्या क्या सिखा दिया था।

अचानक माँ के कमरे का दरवाज़ा खुला और नंगी शालू अंदर आई। विराज को तो जैसे झटका लग गया। उसके मन में यही आया कि ये शालू क्या कर रही है है मरवाएगी क्या।

लेकिन अगले ही पल उसकी आँखों से सामने एक अलग ही नज़ारा था। शालू और विराज की माँ आपस में गुत्थम गुत्था हो गईं और दोनों की जीभें आपस में एक दूसरे से छेड़खानी करने लगीं। शालू खींच कर माँ को दर्पण के पास ले आई और उसे दर्पण की ओर खड़ा करके पीछे से उसके स्तनों को मसलने लगी और फिर पीठ पर चुम्मियाँ लेते हुए नीचे की ओर जाने लगी। माँ खुद को दर्पण में नंगी देख रही थी लेकिन दूसरी ओर से विराज अपनी माँ को पहली बार इतनी करीब से नंगी देख रहा था।

थोड़ी देर बाद शालू ने सासू माँ को बिस्तर पर धकेल दिया और खुद उनके ऊपर चढ़ गई। दोनों एक दूसरे की चूत चाटने लगीं। शालू ने माँ को ऐसे लेटाया था कि उनकी चूत सीधे दर्पण की दिशा में ही थी। थोड़ा चूसने के बाद शालू ने अपने सर ऊपर किया और दर्पण की तरफ इशारा किया कि देखो और फिर माँ की चूत की फांकें खोल के विराज को दिखाईं।

 
Back
Top