• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

कामाग्नि complete

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
रात को जब तीनों बेडरूम में मिले तो शालू ने फिर वही अपनी बच्चों जैसी राग अलापी- सुनिए ना… आज मेरा मन है कि पूरी रात मैं बस भैया से ही चुदवाऊँ … फिर पता नहीं कब मिलना हो।

विराज- अरे यार, फिर मैं क्या करूँगा? तुमको पता है मुझे मुठ मारने की आदत नहीं है। कल जिन्दगी में पहली बार मुठ मारी थी।

शालू- जाओ… जाकर अपनी माँ चोदो।

सुनील- शालू! ये क्या तरीका है अपने पति से बात करने का। एक तो भले इंसान ने हमको चुदाई करने का मौका दिया और तुम उनसे ऐसे बात कर रही हो?

शालू- अरे नहीं भैया, मैं गाली नहीं दे रही हूँ। वो सच में अपनी माँ चोदते हैं। यहाँ बैठे बैठे बोर होंगे इसलिए सलाह दे रही थी कि अपनी माँ के साथ चुदाई कर लें।

विराज ने कहा- ठीक है!

और वो अपनी माँ के कमरे की तरफ चला गया।

इधर सुनील को विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है। वो भले ही खुद अपनी सगी बहन से साथ किशोरावस्था से ही सम्भोग कर रहा था लेकिन उसे लगा था कि वो ही ये काम कर रहा है बाकी दुनिया में कोई ऐसा नहीं कर सकता।

हाँ यह बात सच है कि हर घर में ऐसा नहीं होता लेकिन जो भी हो रिश्तों में चुदाई एक सच्चाई तो है। लेकिन फिर भी ये जितनी कहानियों में दिखाई देती है उतनी सच्चाई में नहीं क्योंकि समाज में इसे बहुत बुरी नज़र से देखा जाता है।

सुनील- तो क्या जीजाजी शादी के पहले से ही अपनी माँ को चोद रहे हैं?

शालू- नहीं, सच कहूँ तो अभी एक डेढ़ साल पहले मैंने ही अपनी सास को इन से चुदवाया है। लेकिन इच्छा इनकी बचपन से थी।

सुनील- हाँ, मुझे भी माँ के मम्मे बड़े पसंद थे। मैंने भी तेरे पैदा होने के बाद भी उनका दूध पीना नहीं छोड़ा था लेकिन फिर वो गुज़र गईं। खैर तूने कैसे अपनी सास चुदवा दी?

शालू- वो लम्बी कहानी है बाद में बताऊँगी, अभी तुम ये देखो।

इतना कह कर शालू ने वो दर्पण हटा दिया और सामने का दृश्य देख कर विराज के दिल की धड़कन बढ़ गई। विराज अपनी माँ को घोड़ी बना के चोद रहा था। विराज की माँ के लटके हुए स्तन हर धक्के के साथ झूला झूल रहे थे। इस दृश्य को देख सुनील एक बार फिर अपना धैर्य खो बैठा और पहले उसने अपने कपड़े निकाल फेंके और फिर अपनी बहन को नंगी कर के वहीं चोदने लगा।

उधर विराज को शालू की चुदाई की हल्की हल्की आवाजें सुनाई पड़ रहीं थीं क्योंकि सुनील उसे बड़ी जोर से पीछे से चूत में लंड डाल कर खड़े खड़े कांच के पास ही चोद रहा था और एक दर्पण खुला होने की वजह से ज्यादा प्रतिरोध भी नहीं था। विराज भी जोश में आकर अपनी माँ की चूत का भुरता बनाने लगा।

काफी देर बाद जब माँ-बेटा झड़ गए तो थोड़ा सुस्ताने के बाद माँ ने अपनी बात कही।

माँ- बेटा! सच्ची बतैये… कल से जे का चल राओ है?

विराज- क्या मतलब? कुछ भी तो नहीं?

माँ- मोए का तूने बच्चा समझी है। मोए सब समझ आ रई है। तू बता रओ है कि मैं अबेई जा के बहू से पूछ लऊं?

विराज- अब मैं क्या बताऊँ। आप समझदार हो… आपको जो भी समझ आया है सही ही आया होगा।

माँ- पर बहू ने तो कई थी के बा ने अपने भाई से कबऊ नी चुदाओ।

आखिर विराज से माँ को पूरी कहानी सुना दी। लेकिन माँ को यह बात पसंद नहीं आई। उनका साफ़ कहना था कि जब तक पति है तब तक किसी और से चुदवाना सही नहीं है। विराज ने भी उनको यह नहीं बताया कि किसी और से चुदवाने की शुरुवात उसी ने करवाई थी। माँ भी खुद अपने बेटे से चुदवा रहीं थीं तो ज्यादा कुछ बोल नहीं सकती थीं लेकिन उनको ये बिल्कुल अच्छा नहीं लगा कि कोई उनके बेटे की आँखों के सामने उसकी बीवी को चोद के जाए।

अगले दिन सुनील चला गया लेकिन फिर अक्सर घर से किसी ना किसी बहाने निकलता और एक दो रात अपनी बहन के घर रुक कर जाता। विराज की माँ ने साफ़ कह दिया था कि जब भी वो आये तो विराज उनके पास ही रहा करे। उनकी पुरानी सोच को ये बात समझ नहीं आ सकी कि विराज को भी अपनी पत्नी को उसके भाई से चुदवाने में मज़ा आता था। विराज की माँ अपनी बहू से खफा भी थी तो अब उसने साथ में चुदवाना बंद कर दिया था तो कभी कभी दोनों सुनील को शहर की किसी होटल में बुला कर एक साथ सामूहिक चुदाई कर लिया करते लेकिन अक्सर तो विराज को घर पर अपनी माँ ही चोदनी पड़ती।

उधर शीतल ने एक बच्चे को जन्म दिया। इस बार लड़का हुआ था जिसका नाम उन्होंने समीर रखा। विराज और शालू बधाई देने गए लेकिन अब उनके बीच चुदाई का रिश्ता नहीं बचा था। हाँ पर उनके बच्चों यानि कि सोनिया और राजन में दोस्ती का नया रिश्ता ज़रूर शुरू हो गया था।

अगले ही महीने शालू ने भी खुशखबरी दे दी। वो भी गर्भवती हो गई थी। इस बार विराज को जय की ज़रूरत नहीं थी, उसके पास चोदने के लिए उसकी माँ थी।

नौ महीने बाद जब शालू ने जब एक बेटी को जन्म दिया तो शायद उस बच्ची की किस्मत में माँ का प्यार नहीं था। विराज के सर पर दो बच्चों को पालने की ज़िम्मेदारी आ गई। ऐसे में जय और शीतल ने पूरी दोस्ती निभाई और विराज की बेटी नेहा को अपना दूध पिलाया लेकिन उसके एक साल की होने पर विराज की माँ उसे अपने पास ले आईं और उन्ही ने उसे पाला।

अब विराज की जिंदगी भी ज़िम्मेदारी के बोझ तले इतनी दब गई थी कि उसको ज्यादा चोदा-चादी के बारे में सोचने का समय नहीं मिलता था। कभी कभार माँ को चोद लेता था वरना ज्यादातर समय उसका खेती-बाड़ी और बच्चों की देखभाल में ही गुज़रता था। धीरे धीरे बच्चे बड़े होते रहे और माँ-बाप बूढ़े।

ज़माना हमेशा आगे बढ़ता है। अगर इस पीढ़ी में कामुकता का ये हाल है तो अगली पीढ़ी में क्या होगा?

 
अब तक आपने पढ़ा कि कैसे विराज और जय ने अपनी वासना की उड़ान भरी और उसमें उनकी पत्नियों और माँ-बाप की क्या भूमिका रही। अब उनकी वासना के लिए आगे कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था लेकिन जैसे नदी अपना रास्ता खुद बना लेती है वैसे ही जिंदगी भी।

देखते हैं उनकी अगली पीढ़ी क्या गुल खिलाती है।

अब आगे…

जय और विराज वासना के जिन पंखों पर उड़े थे वो तो ज़िम्मेदारी के बोझ तले कमज़ोर पड़ गए थे। नेहा दस साल की हुई तब विराज की माँ भी गुज़र गईं और विराज अपने दो बच्चों के साथ बिलकुल अकेला रह गया। तब तक राजन के भी स्कूल की पढ़ाई पूरी हो गई थी। कुछ ही महीनों में वो कॉलेज की पढ़ाई के लिए शहर चला गया। उसका मेडिकल कॉलेज में सेलेक्शन तो हो गया था लेकिन हॉस्टल मिलने में कुछ समय लग गया तो कुछ महीने वो जय के घर ही रहा।

एक तरफ राजन की सोनिया के साथ बचपन वाली दोस्ती अब रोमांस में बदल रही थी तो दूसरी ओर विराज के सर पर नेहा की पूरी ज़िम्मेदारी आ गई थी। खाना बनाने से लेकर घर की साफ़-सफाई तक सारा काम विराज खुद करता था। नेहा थोड़ी बहुत मदद कर दिया करती थी लेकिन विराज उसे पढ़ाई में ध्यान लगाने के लिए ज्यादा जोर देता था।

इधर नेहा हाई-स्कूल में पहुंची और उधर राजन ने अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी कर ली थी। जब उसकी इंटर्नशिप चल रही थी तो वो अक्सर सोनिया से मिलने उसके शहर चला जाया करता था। अब उसके पास थोड़ा समय भी था और पैसे भी। ऐसे ही मिलते मिलाते दोनों चुदाई भी करने लगे। राजन किसी अच्छे से होटल में रूम बुक कर लेता और सोनिया कॉलेज बंक करके आ जाती और फिर पूरा दिन मस्त चुदाई का खेल चलता।

इंटर्नशिप पूरी होते ही राजन ने अपने पिता विराज और सोनिया के मम्मी-पापा दोनों को कह दिया कि उसे सोनिया से शादी करनी है।

वो दोनों तो पहले से ही पक्के दोस्त थे उन्हें क्या समस्या होनी थी। सोनिया की माँ थोड़ी नाखुश थी क्योंकि उसके हिसाब से विराज ठरकी था और उसे लगता था कि कहीं वो सोनिया पर पूरी नज़र ना डाले और क्या पता राजन भी अपने बाप पर गया हो और सोनिया को अपने दोस्तों से चुदवता फिरे।

लेकिन जब मियाँ, बीवी और बीवी का बाप भी राज़ी तो क्या करेंगी माँजी।

दोनों की शादी धूम-धाम से हुई और फिर सोनिया राजन के साथ दूसरे शहर में चली गई जहाँ राजन ने अपना क्लिनिक खोला था।

इधर जब नेहा ने जवानी की दहलीज़ पर कदम रखा तो विराज का मन भी डोलने लगा था। विराज का मन इसलिए डोला था कि एक तो विराज को काफी समय हो गया था स्त्री संसर्ग के बिना और उस पर नेहा बिलकुल अपनी माँ जैसी दिखती थी; लेकिन विराज नहीं चाहता था कि नेहा की पढ़ाई में कोई रुकावट आये इसलिए उसने नेहा को उसके भाई के साथ रहने के लिए शहर ये बहाना बना कर भेज दिया कि वहां पढ़ाई अच्छी हो जाएगी और साथ में कॉलेज की तैयारी भी कर लेगी।

नेहा ने भी इस बात को गंभीरता से लिया और पढ़ाई में अपना दिल लगाया। स्कूल की पढ़ाई के साथ साथ अच्छे कॉलेज में एडमिशन के लिए एंट्रेंस एग्जाम की भी तैयारी की। उधर एक बेडरूम में राजन और सोनिया की चुदाई चलती थी और दूसरे बेडरूम में नेहा की पढ़ाई। दिन में भी कभी उसका ध्यान उसके भैया-भाभी की चुहुलबाज़ी पर नहीं जाता था।

आखिर उसकी मेहनत रंग लाई और शहर के सबसे अच्छे कॉलेज में उसका सेलेक्शन हो गया। पहले सेमिस्टर के रिजल्ट्स भी अच्छे आये तब जा कर नेहा को थोड़ा सुकून मिला और उसने पढ़ाई के अलावा भी दूसरी बातों की तरफ ध्यान देना शुरू किया। ज़ाहिर है सेक्स उन बातों में से एक था। अब उसका ध्यान अपने भैया कि उन सब हरकतों पर जाने लगा था जो वो हर कभी नज़रें बचा कर सोनिया भाभी के साथ साथ करते थे। कभी किचन में भाभी के उरोजों को मसलते हुए दिख जाते तो कभी बाथरूम से नहा कर आती हुई भाभी के टॉवेल के नीचे हाथ डाल कर उनकी चूत के साथ छेड़खानी करते हुए।

इन सब बातों को सोच सोच कर नेहा रोज़ रात को अपनी चूत सहलाते हुए सो जाती। सब कुछ ऐसे ही चलता रहता अगर होली के एक दिन पहले सोनिया की नज़र, रंग खरीदते समय एक भांग की दूकान पर ना पड़ी होती। उसने सोचा क्यों ना थोड़ी मस्ती की जाए तो वो थोड़ी ताज़ी घुटी हुई भांग खरीद कर ले आई। अगले दिन सुबह वो भांग नाश्ते में मिला दी गई।

नेहा ने नाश्ता किया और चुपके से जा कर अपने सोते हुए भैया के चेहरे पर रंग से कलाकारी करके आ गई। सोनिया अभी किचन में ही थी कि राजन उठ कर बाथरूम गया तो देखा किसी ने उसे पहले ही कार्टून बना दिया है। उसने भी जोश में आ कर किचन में काम कर रही सोनिया को पीछे से पकड़ कर रंग दिया। उसका चेहरा ही नहीं बल्कि कुर्ती में हाथ डाल कर उसके स्तनों पर भी अपने हाथों के छापे लगा दिए।

 
सोनिया- अरे ये क्या तरीका है… अभी तो मैं काम कर रही हूँ। नाश्ता करने तक तो इंतज़ार कर लिया होता।

राजन- नाश्ते तक? तुमने तो मेरे जागने तक का इंतज़ार नहीं किया।

राजन ने अपनी शक्ल दिखाई तो सोनिया हँसी रोक नहीं पाई।

सोनिया- अरे बाबा, मैं तो नाश्ता बनाने में बिजी थी। ये देखो मेरे हाथ … यह ज़रूर नेहा का काम होगा।

राजन- इस नेहा की बच्ची को तो मैं नहीं छोडूंगा आज।

इतना कह कर राजन नेहा के कमरे की तरफ भागा। लेकिन नेहा रंग लगवाने के लिए तैयार नहीं थी वो भी इधर उधर भागने लगी। आखिर नेहा को किसी भी तरह पकड़ कर रंगने के चक्कर में राजन का एक हाथ उसकी छाती पर पड़ गया और उसने अपनी बहन के स्तन को दबाते हुए अपनी ओर खींचा। इससे नेहा शर्मा गई और जैसे ही राजन को अहसास हुआ कि क्या हो गया है तो वो भी थोड़ा सकुचा गया। यह पहली बार था जब उसने अपनी पत्नी के अलावा किसी और के उरोजों को छुआ था वो भी अपनी सगी बहन के।

इतने में नेहा भाग कर घर से बाहर निकली लेकिन उसकी किस्मत में रंगना ही लिखा था। उसके कॉलेज की कुछ सहेलियाँ और उनके बॉय-फ्रेंड्स इनके घर की तरफ ही आ रहे थे उन्होंने झटपट उसे पकड़ लिया और फिर तो नेहा की वो रंगाई हुई है कि समझो अंग अंग रंग में सरोबार हो गया। भीड़ में किसने उसके स्तनों का मर्दन किया और किसने नितम्बों का ये तो उसे भी नहीं पता चला।

लेकिन उसे मज़ा भी बहुत आया क्योंकि कई दिनों से वो खुद ही के स्पर्श से कामुकता का अनुभव कर रही थी। आज पहले अपने ही भैया के हाथों उसके उरोजों का उद्घाटन हुआ था और अब इतने लोगों ने उसे छुआ था कि उसके लिए इस सुख की अनुभूति का वर्णन करना संभव नहीं था। ऊपर से भजियों में मिली भांग ने भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था।

इधर सोनिया ने अपने हाथों से अपने पति को भांग वाले भजिये खिलाने शुरू किये। लेकिन राजन आज कुछ ज्यादा ही रोमाँटिक हो रहा था उसने भी अपने होंठों में दबा दबा कर वही भजिये सोनिया को खिलने शुरू किये। सोनिया भी मन नहीं कर पाई क्योंकि उनका पहला चुम्बन ऐसे भी राजन ने उसे चॉकलेट खिलने के बहाने किया था। इधर राजन और सोनिया को भांग का नशा चढ़ना शुरू हुआ उधर नशे में चूर और रंग में सराबोर नेहा ने दरवाज़े पर दस्तक दी।

राजन ने दरवाज़ा खोला तो उसके तो होश ही उड़ गए। उस भीगे बदन के साथ जिस नशीली अदा से वो खड़ी थी उसे देख कर राजन का लण्ड झटके मारने लगा। वो अन्दर आई तो उसके ठण्ड के मारे कड़क हुए चूचुक जो टी-शर्ट के बाहर से ही साफ़ दिख रहे थे और उसके पुन्दों के बीच की घांटी में फंसी उसकी गीली स्कर्ट जो उसके नितम्बों की गोलाई स्पष्ट कर रही थी उसे देख कर तो राजन का ईमान अपनी सगी बहन पर भी डोल गया। तभी सोनिया भी आ गई।

सोनिया- ननद रानी, बाहर ही पूरा डलवा चुकी हो या घर में भी कुछ डलवाओगी?

नेहा नशे में खुद पर काबू नहीं कर पाई और नशीले अंदाज़ में खिलखिला दी। सोनिया को नेहा की वजह से ही सुबह सुबह रंग दिया गया था उसका बदला तो उसे लेना ही था।

सोनिया- तुम्हारी वजह से मैं रंगी गई थी। बदला लिए बिना कैसे छोड़ दूं। अब बाहर तो कोई कोरी जगह दिख नहीं रही है तो अन्दर ही लगाना पड़ेगा।

इतना कह कर सोनिया ने नेहा के टॉप में हाथ डाल कर उसके मम्में रंग दिए। इस बात पर नेहा भी बिदक गई।

नेहा- भैया, भाभी को पकड़ो, मैं भी रंग लगाऊँगी।

राजन ने सोनिया को पीछे से ऐसे पकड़ लिया कि उसके दोनों हाथ भी पीछे ही बंध गए। नेहा कुर्ती के गले में हाथ डाल कर सोनिया के जोबन को रंगने जा ही रही थी कि उसने देखा वहां पहले ही रंग लगा हुआ है।

नेहा- क्या यार भैया! आपने तो इनके खरबूजे पहले ही रंग दिए हैं।

राजन- तो तू सलवार निकाल के तरबूजे रंग दे!

नेहा ने सलवार का नाड़ा खींचा और सोनिया की पेंटी में अपने दोनों हाथ डालकर उसके दोनों कूल्हों पर रंग लगाने लगी। इधर राजन ने सोनिया की कुर्ती निकालने की कोशिश की तो उसकी पकड़ कमज़ोर पड़ गई। उसने सोचा था कि कुर्ती तो पकड़ में रहेगी लेकिन सोनिया खुद उसमें से निकल भागी और तुरंत राजन के पीछे जा कर उसे धक्का मार दिया। अब सोनिया केवल ब्रा और पेंटी में थी।

राजन अभी ठीक से समझ भी नहीं पाया था कि क्या हुआ है, वो लड़खड़ा गया और नेहा के ऊपर जा गिरा। उसके हाथ में जो सोनिया की कुर्ती थी उसमें नेहा का सर फंस गया। राजन अभी नेहा का सहारा ले कर अभी थोड़ा सम्हला ही था कि, सोनिया ने राजन की अंडरवेयर नीचे खसका दी, और नेहा के हाथ उसके भाई के नंगे नितम्बों पर रख दिए। राजन का लण्ड भी फनफना के उछल पड़ा।

सोनिया- मेरी सलवार निकलवाओगे। ये लो अब अपनी तशरीफ़ रंगवाओ!

 
तीनों भांग के नशे में ज्यादा सोच नहीं पा रहे थे। सबसे कम सोनिया को ही चढ़ी थी क्योंकि उसे पता था इसलिए उसने बस उतने ही भजिये खाए थे जितने राजन ने उसे जबरन खिला दिए थे। राजन को अब चढ़ने लगी थी लेकिन नेहा पूरी तरह से भंग के नशे में गुम थी। नशा अपनी जगह था लेकिन सर पर कुर्ती फंसे होने की वजह से अब नेहा को कुछ दिख नहीं रहा था। वो मस्त अपने भाई के पुन्दों पर रंग मले जा रही थी और हँसे जा रही थी।

राजन को भले ही ज्यादा नशा नहीं था लेकिन आज सुबह ही उसने पहली बार अपनी बहन के स्तनों को कपड़ों के ऊपर से ही सही लेकिन महसूस तो किया था और उसके मन को कुछ वर्जित कल्पनाएँ जैसे छू कर निकल गईं थीं। अब जब उसकी बहन के कोमल हाथ उसके नग्न नितम्बों को सहला रहे थे तो वो कल्पनाएँ फिर वापस आ गईं और वो किम्कर्तव्यविमूढ़ हुआ वहीं खड़ा रह गया। इतने समय का फायदा उठाते हुए सोनिया नेहा के पीछे पहुँच चुकी थी और उसकी स्कर्ट भी खसकाना चाहती थी।

सोनिया- और तुमने मेरी सलवार खिसकाई थी… ये लो गई तुम्हारी स्कर्ट!

लेकिन जल्दीबाज़ी में और शायद कुछ नशे की वजह से सोनिया ने स्कर्ट के साथ साथ नेहा की पेंटी भी खिसका दी। राजन का लण्ड सीधे अपनी बहन की चूत से जा टकराया लेकिन तब तक राजन और नेहा भी अपनी हड़बड़ाहट से बाहर आ गए थे। नेहा गुस्से में पलटी और सोनिया के ऊपर टूट पड़ी।

नेहा- तुमने मुझे नंगी किया? मैं तुमको नहीं छोडूंगी भाभी!

सोनिया इस अचानक हमले से अपना संतुलन खो बैठी और फर्श पर तिरछी पड़ गई। नेहा ने इसका फायदा उठाते हुए उसकी पेंटी खींच ली। जब नेहा अपनी भाभी को नंगी करने की कोशिश में झुकी हुई थी तो उसके भैया उसके चूतड़ों के बीच उसकी चूत के दीदार कर रहे थे। राजन का लण्ड जैसे फटने को था उससे रहा नहीं गया और उसने अपना टी-शर्ट खुद निकाल फेंका और पूरा नंगा हो गया।

राजन ने तुरंत अपना लण्ड अपनी बहन के मुस्कुराते हुए भगोष्ठों (चूत के होंठ) के बीच घुसा दिया। नेहा चिहुंक उठी, और तुरंत सीधी होकर पलटी। तब तक उसके हाथ में उसकी भाभी की पेंटी आ गई थी, लेकिन अपने सामने अपने भाई को पूरा नंगा देख कर वो ठिठक कर वहीं खड़ी रह गई। उसके आँखें उसके तनतनाए हुए लण्ड पर जमी हुए थी और इसी का फ़ायदा उठा कर सोनिया ने पाछे से उसका टी-शर्ट खींच लिया। अब दोनों ननद-भाभी केवल एक-एक ब्रा में थी और राजन बिलकुल नंगा उनको देख कर अपना लण्ड मुठिया रहा था।

नेहा भी कैसे चुप रहती वो भी सोनिया से गुत्थम-गुत्था हो गई। दोनों करीब-करीब नंगी लड़कियों में एक दूसरे को पूरी नंगी करने के लिए कुश्ती चल रही थी। पहले नेहा ने सोनिया की ब्रा निकाल ली लेकिन खुद को सोनिया के चुंगल से नहीं निकाल पाई। आखिर जब नेहा की ब्रा सोनिया के हाथ आई तब तक नेहा पलट चुकी थी लेकिन तब भी सोनिया ने उसे नहीं छोड़ा था। अब सोनिया फर्श पर पीठ के बल लेटी थी और उसने पीछे से नेहा को उसके बाजुओं के नीचे से अपने हाथ फंसा कर उसके कन्धों को पकड़ा हुआ था। दोनों पूरी नंगी थीं और दोनों की नज़रों के सामने राजन नंगा खड़ा मुठ मार रहा था।

सोनिया- चला अपनी पिचकारी राजन! रंग डे अपनी बहन को अपने सफ़ेद रंग से।

नेहा- नहीं भाभी छोड़ो मुझे… ही ही ही… नहीं भैया प्लीज़… सू-सू मत करना प्लीज़!!!

सोनिया- अरे तुम चलाओ पिचकारी… ही ही ही।

नेहा शायद सोनिया की बात का मतलब नहीं समझी थी। दोनों भाँग की मस्ती में मस्त होकर हँसे जा रहीं थीं। राजन ने पहली बार अपनी बहन को नंगी देखा था और जिस तरह की नंगी लड़कियों की कुश्ती उसे देखने को मिल रही थी उसके बाद किसी भी आदमी को झड़ने में ज्यादा समय नहीं लग सकता खासकर जब उनमें से एक लड़की उसकी बहन हो।

राजन के लण्ड से वीर्य की फुहार छूट पड़ी और पहली बूँद नेहा के स्तन पर जा गिरी। सोनिया ने उसे नेहा के चूचुक पर मॉल दिया। इस से नेहा का भी मज़ा आ गया और उसका छटपटाना बंद हो गया।

राजन आगे बढ़ा और अगली 1-2 धार उसने नेहा और सोनिया के चेहरे पर भी छोड़ दीं। नेहा को अब तक ये तो समझ आ गया था कि ये पेशाब नहीं था। सोनिया ने वीर्य की कुछ बूँदें नेहा के चेहरे से चाट लीं और फिर नेहा को फ्रेंच-किस करके उसे भी भाई उसके भाई के वीर्य का स्वाद चखा दिया। फिर सबसे पहले सोनिया उठ खड़ी हुई और धीमी आवाज़ में मस्ती वाली अदा से राजन को छेड़ने लगी।

सोनिया- याद है… हमारी पहली होली पर तुमने मुझे ऐसे ही रंगा था… लेकिन तब इतना रंग नहीं निकला था तुम्हारी पिचकारी से।

राजन (शरमाते हुए)- अब क्या बोलूं… तब तुम अकेली थीं, अभी दो के हिसाब से…

सोनिया- हाँ हाँ पता है मुझे… आज दूसरी में कुछ ज्यादा ही इंटरेस्टेड हो रहे हो।

सोनिया (जोर से)- चलो सब चल के नहा लेते हैं। बहुत हो गई होली… (धीरे से) अब कुछ ठुकाई हो जाए।

 
राजन डॉक्टर था तो उसने पहले ही सोनिया को समझा रखा था कि होली पर कौन सा रंग इस्तेमाल करना चाहिए। ये सूखा वाला आर्गेनिक रंग था जिसे छूटने में ज्यादा देर नहीं लगती। जल्दी ही सबका रंग तो उतर गया लेकिन भंग का रंग थोड़ा बाकी था या शायद भांग तो उतर गई थी पर मस्ती अभी भी चढ़ी हुई थी। राजन और सोनिया शॉवर के नीचे बांहों में बाहें डाले एक दूसरे के नंगे बदन को सहला रहे थे और चुम्बन का आनन्द ले रहे थे।

नेहा उनकी तरफ ना देखने का नाटक करते हुए दूसरी तरफ मुँह करके खड़ी थी लेकिन झुक कर पैरों को साफ़ करने के बहाने से अपने पैरों के बीच से अपने भाई के लण्ड का दीदार कर रही थी जो अब वापस से सख्त लौड़ा बन चुका था। उधर चुम्बन टूटा तो राजन, सोनिया के उरोजों पर टूट पड़ा। तभी सोनिया की नज़र नेहा पर गई जो कनखियों से उनकी ही तरफ देख रही थी।

सोनिया ने राजन का कड़क लण्ड किसी हैंडल की तरह पकड़ा और उसे खीचते हुए राजन को नेहा के पीछे खड़ा कर दिया। नेहा उठने को हुई तो सोनिया ने अपने एक हाथ से उसकी पीठ को दबाते हुए दूसरे से राजन का लण्ड उसकी बहन की चूत के मुहाने पर रख दिया और फिर उसी हाथ से राजन का चूतड़ पर एक चपत जमा दी, ठीक वैसे जैसे घोड़े को दौड़ाने के लिए उसके पिछवाड़े पर मारी जाती है।

नेहा- आह! आऊ!! आऽऽऽ

बस इतना, और अपने भाई घोड़े जैसे लण्ड के तीन धक्कों से नेहा ने अपना कुँवारापन हमेशा के लिए खो दिया। लेकिन कुँवारेपन के बोझ तले अपनी जवानी को सड़ाना चाहता भी कौन है। नेहा तो खुद कब से अपनी चूत की चटनी बनाने के लिए एक मूसल ढूँढ रही थी, जो आज उसकी भाभी ने खुद अपने हाथों से लाकर उसकी चूत पर रख दिया था। दर्द ख़त्म हो चुका था और अब जो अनुभव नेहा को हो रहा था उससे उसे ऐसा लग रहा था कि बस ये चुदाई यूँ ही चलती रहे; कभी ख़त्म ही ना हो।

सोनिया इन दोनों की उत्तेजना बढाने के लिए गन्दी गन्दी बातें बोल रही थी और कभी नेहा के स्तनों को सहला रही थी तो कभी उसे चूम रही थी। काश नेहा की कामना सच हो पाती और ये भाई बहन की चुदाई कभी ख़त्म ही ना होती।

 
आपने पढ़ा कि कैसे राजन ने होली की मस्ती और नशे में अपनी बहन नेहा को अपनी पत्नी सोनिया के सामने ही चोद दिया था. उसके बाद तीनों एक साथ नंगे नहाए और वहाँ बाथरूम में भी राजन ने नेहा बहन को एक बार और चोदा जिसमे सोनिया ने भी पूरा साथ दिया।

अब आगे…

बाथरूम ने नहाते नहाते जब मैं नेहा को चोद रहा था, तब तक नहाने की वजह से हम सब का नशा उतर चुका था लेकिन फिर भी मेरी बीवी और नेहा को कोई आपत्ति नहीं थी और हम तीनों पूरे होश में चुदाई का लुत्फ़ उठा रहे थे।

पहले मुझे लगा कि सोना (सोनिया) नशे में है इसलिए कुछ नहीं कह रही है लेकिन फिर जब नेहा को चोदने के बाद मैं उसे चोद रहा था तो वो नेहा के साथ मस्ती कर रही थी, उसको दोबारा चुदाई के लिए तैयार कर रही थी।

आखिर में जब वो झड़ने की कगार पर पहुंची तो नेहा को मुझे किस करने को कहा और मुझे उसकी चूचियां मसलने को। मैं अपनी बहन के मुख में जीभ डाल कर उसे किस कर रहा था और साथ में बाएँ हाथ से उसे अपनी बाहों में भर के उसकी बाईं चूची मसल रहा था जबकि दाईं चूची मेरी छाती से चिपकी हुई थी। दूसरे हाथ से मैं सोना की कमर पकड़ के उसे चोद रहा था।

हम भाई बहन की ये वासना भरी स्थिति देखते हुए सोना जोर से झड़ने लगी।

बाथरूम से बाहर आकर भी किसी ने कपड़े नहीं पहने, सबने नंगे ही खाना खाया और फिर तीनों बेडरूम में ऐसे ही एक साथ लेट गए। मेरे एक तरफ नेहा और दूसरी तरफ सोना, दोनों मेरी तरफ करवट ले कर और मुझसे चिपक कर लेटी थीं।

मैंने कहा- आज जो भी हुआ वो कभी सोचा नहीं था. ना कि कभी ऐसा भी हो सकता है।

दोनों ने एक साथ कहा- हम्म्म…

“मज़ा तो बहुत आया लेकिन सोना, तुम्हें बुरा तो नहीं लगा? और नेहा तुम्हें?” मैंने दोनों से एक साथ सवाल कर दिया।

पहले नेहा बोली- शुरू में अजीब लगा था लेकिन नशे में कुछ ज्यादा समझ नहीं आया और फिर बाद में मजा आने लगा।

सोना ने भी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा- शुरू में नशे और मस्ती में ये समझ ही नहीं आया कि तुम मेरे सामने अपनी बहन चोद रहे हो. लेकिन जैसे जैसे होश आता गया, मुझे बुरा लगने की बजाए और अच्छा लगने लगा। तुम अपनी सगी बहन चोद रहे हो, यह सोच सोच कर तो मैं इतनी गीली हो गई थी कि आज तक कभी नहीं हुई।

“हाँ, वो तो मैं समझ सकता हूँ, मैंने भी तुमको कभी इतनी जोर से झाड़ते नहीं देखा। लेकिन ये सब शुरू शराब के नशे से हुआ और बाद में चुदाई के मज़े में मैंने भी ध्यान नहीं दिया कि मैं बहनचोद बन गया हूँ। इसलिए अब जब सोचता हूँ तो लगता है कि कहीं हमने कुछ गलत तो नहीं कर लिया?”

नेहा- नहीं भैया, आप ऐसा ना सोचो, मैं तो बचपन से ही आपको बहुत चाहती थी और जब जवानी आई तो आप ही वो पहले मर्द थे जिसको मैं अपनी कल्पना में चोदा करती थी। मेरे ख्याल से कोई भी लड़की कभी ना कभी अपने भाई की ओर आकर्षित ज़रूर होती है.

सोनिया- हम्म्म, वो तो है.

नेहा- क्योंकि सबसे पहले आप ही थे जिसको मैं इतना पास से देख पाती थी। और याद है वो एक बार जब आप बाथरूम से नहा के आ रहे थे और मैं जा रही थी तब आपका टॉवेल खुल गया था। वो पहली बार था जब मैंने कोई जवान लंड देखा था। उस दिन पहली बार मैंने बाथरूम में अपनी चूत में उंगली डाल के अपनी मुनिया को शांत किया था। वो तो ये समाज के नियम कानूनों की वजह से आगे कुछ करने की हिम्मत नहीं हुई और इसी वजह से आज जब आज आपने अपना लंड मेरी चूत में डाला तो मैंने शुरू में थोड़ा मना भी किया लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि मैं ऐसा नहीं चाहती थी।

राजन- चलो अच्छा हुआ तुमने ये सब बता दिया अब मैं बिना किसी अपराधबोध (गिल्टी फीलिंग) के तुम्हारे साथ मज़े कर पाऊंगा। और सोना, तुम बहुत हाँ में हाँ मिला रहीं थीं। तुम्हारी भी कोई ऐसी तमन्ना थी क्या अपने भाई के साथ?

सोनिया- हाँ, लेकिन यहाँ तो आग दोनों तरफ बराबर लगी थी।

नेहा- क्या बात है भाभी, फिर क्या आप पहले ही चुदवा चुकी हो अपने भाई से?

सोनिया- अरे न…हीं!

नेहा- अब समझ आया आपको हमारी चुदाई देख कर बुरा क्यों नहीं लगा। क्या बात है भैया, भाभी तो पहले से ही भाईचोद हैं.

ऐसा कहते कहते नेहा बहुत उत्तेजित हो गई और मुझसे और जोर से चिपकते हुए उसने मेरा लंड अपने हाथ में लेकर 2-3 झटके मुठ भी मार दी।

सोनिया- अरे यार बात तो सुन लो। ऐसा कुछ नहीं हुआ था हमारे बीच।

नेहा- दोनों तरफ आग बराबर लगी हो फिर भी हवनकुंड में घी ना गिरे, ऐसा कैसे हो सकता है?

सोनिया- बताती हूँ बाबा पूरी कहानी बताती हूँ:

 
एक बार मैं रात को पानी पीने किचन में गई तो देखा समीर के कमरे से हल्की लाइट आ रही थी। धीरे से खिड़की का दरवाज़ा हटा कर देखा तो समीर कंप्यूटर के सामने नंगा बैठा ब्लू फिल्म देख रहा था और साथ में मुठ मार रहा था। उसका लंड देखा तो मैं देखती ही रह गई। फिर वो थोड़ी देर बाद झड़ गया और सो गया। उस रात मुझे नींद ही नहीं आई, सारी रात आँखों के सामने उसका लंड घूमता रहा और मैं अपनी चूत में उंगली करती रही।

उसके बाद मैंने कई रातें इस चक्कर में बिना सोए बिता दीं कि शायद फिर कुछ वैसा ही देखने को मिल जाए लेकिन कभी टाइमिंग सही नहीं बैठी।

एक दिन मेरे दिमाग में आईडिया आया कि एक तरीका है जिस से मैं रोज़ वो मस्त लंड देख सकती थी। फिर एक दिन जब घर पर मैं अकेली थी तो बड़ी मेहनत से मैंने बाथरूम के दरवाज़े में ऐसा छेद किया जो आसानी से किसी को समझ ना आये।

उसके बाद जब भी समीर नहाने जाता, मैं मौका देख के उस छेद से उसको नंगा देख लिया करती थी। लेकिन हमेशा वो लटका हुआ लंड ही देखने को मिलता था। कुछ महीने ऐसे ही बीत गए फिर एक दिन जब मैंने छेद से देखा तो समीर ने अपना लंड हाथ में ले कर सहलाना शुरू कर दिया। देखते ही देखते वो तन के खड़ा हो गया। लेकिन समीर मुठ मारने के जगह उससे खेल रहा था बस। उस दिन के बाद से वो रोज़ नहाते वक़्त अपने लंड से खेलता और कभी कभी मुठ भी मारता।

मेरे दिन मज़े में कट रहे थे। जब घर में कोई और ना होता तो मैं नंगी हो कर जाती और उसको देखते देखते अपनी चूत और चूचों के साथ खेल कर झड़ भी जाती थी। लेकिन एक दिन मेरे मन में ख्याल आया कि पहले तो समीर कभी अपने लंड से नहीं खेलता था फिर अचानक अब रोज़ ऐसा क्यों करने लगा? मुझे शक हुआ कि कहीं इसे पता तो नहीं कि मैं उसे देखती हूँ। पर अगर ऐसा ही था तो मतलब वो इस छेद के बारे में जानता था और वो भी इसका इस्तेमाल करता होगा।

उसके बाद जब मैं नहाने गई तो मैंने ध्यान देना शुरू किया। मेरी नज़र उस छेद पर ही टिकी थी। थोड़ी देर बाद सच में उस छेद से जो थोडा लाइट आ रहा था वो बंद हो गया। मतलब कोई मुझे देख रहा था।

लेकिन कौन था ये नहीं कहा जा सकता था। अगले दिन मैं बाथरूम में आ कर नंगी हुई और शावर चालू करके तुरंत मैंने अन्दर से बाहर की तरफ देखना शुरू किया। थोड़ी देर बाद देखा समीर आया दरवाज़े के पास आकर बैठ गया। मैं तुरंत खड़ी हो गई और नहाने लगी।

लेकिन मेरे दिमाग में ये ख्याल भी था कि मेरा भाई मुझे नंगी नहाते हुए देख रहा था और इसलिए मैं ना केवल बाहर से नहा रही थी बल्कि अन्दर से भी बहुत गीली हो गई थी। आखिर मैंने भी चूत में ऊँगली करके खुद को शांत किया।

उसके बाद हम दोनों एक दूसरे को उस छेद से अपनी जवानी के जलवे दिखने लगे। कभी कभी मैं बड़ी कामुक अदा से नहाती तो कभी अपने नंगे शरीर से खेलती रहती। और वो भी यही सब करता था। लेकिन कभी ना उसकी हिम्मत हुई कि इस से आगे कुछ करे और ना मेरी हिम्मत हुई। समाज के ये सब जो कायदे हमें शुरू से सिखा दिए जाते हैं इसकी वजह से एक सीमा के बाद आगे बढ़ना मुश्किल लगता है। एक डर बैठा होता है दिल में कि अगर कुछ किया तो पता नहीं क्या होगा.

और इस से पहले कि हम दोनों में से कोई इस डर से मुक्ति पाने की कगार पर आता, मेरी शादी हो गई और मैं यहाँ आ गई।

नेहा- वाह भाभी! वाह! क्या दिमाग पाया है। ये आईडिया मुझे क्यों नहीं आया। मैं बेकार कल्पना में ही भैया के लंड के बारे में सोच सोच के जैसे तैसे खुद को संतुष्ट किया करती थी।

सोनिया- अरे, लेकिन दिमाग से क्या होता है। किस्मत तो तुम्हारी ज्यादा अच्छी निकली ना। मुझे तो बस देखने को मिलता था, तुम्हें तो चोदने को मिल गया। और शायद तुम कल्पना में ज्यादा रहीं इसलिए तुम्हारे अन्दर दबी हुई भावनाएं ज्यादा थीं इसीलिए शायद आज तुमने कायदों को ताक पर रख दिया. मुझे कुछ हद तक संतुष्टि मिल जाया करती थी इसलिए कभी ज्यादा हिम्मत नहीं कर पाई.

सोनिया की शक्ल देख कर मुझे उस पर तरस आ गया और मैंने बोल दिया- यार तुम फिकर ना करो, तुमने हम दोनों भाई बहन की चुदाई में मदद की है तो हमारा भी फ़र्ज़ बनता है कि हम तुमको तुम्हारे भाई से चुदवाने में मदद करें।

सोनिया की तो जैसे लाटरी लग गई हो, वो तुरंत ख़ुशी से उठ कर बैठ गई और और कहने लगी- वाओ, सच! मगर कैसे? और समीर मुझे चोदना चाहेगा या नहीं?

राजन- अरे बाबा इतना टेंशन ना लो। देखो तुमने खुद बोला ना कि समाज के डर से तुम्हारी हिम्मत नहीं हुई लेकिन अब तो तुम अकेली नहीं हो ना। हम भी तुम्हारे साथ हैं। जैसे आज तुमने हमें चुदाई के लिए प्रोत्साहित किया वैसे हम भी तुम दोनों भाई बहन की चुदाई के लिए सही माहोल बनाने में मदद करेंगे। तुम वो सब चिंता अभी से ना करो, कुछ ना कुछ प्लान तो बन ही जाएगा।

नेहा- हाँ भाभी, हम आपको आपके भाई से ज़रूर चुदवाएंगे लेकिन अभी तो आप हम दोनों भाई बहन की चुदाई की चीअर लीडर बनो।

इतना कह कर नेहा भी उठ कर बैठ गई और मेरा लौड़ा, जो उसने अब तक सहला सहला के कड़क कर दिया था उसको, अपनी चूत पर सेट करने लगी। सोनिया भी ख़ुशी में हम दोनों को प्रोत्साहित करने लगी।

सोनिया- हाँ हाँ क्यों नहीं मेरे भेनचोद पति की चुदक्कड़ बहन, जितना चुदवाना है चुदवा। अपने भाई के लंड पर बैठ कर घुड़सवारी कर। और राजन तुम भी चलाओ अपना लंड इसकी चूत में जैसे इंजन में पिस्टन चलता है। बुझा दो इसकी चूत की आग अपने लंड के पानी से।

सोनिया की बातें हमारी उत्तेजना और बढ़ा रही थीं और मेरी बहन मेरा लंड अपनी चूत में लिए उसके ऊपर उछल रही थी। मैं भी नीचे से उसका साथ दे रहा था और साथ ही दोनों हाथों से उसके चूचे भी मसल रहा था।

इस तरह हम तीनों ने मिल कर रात भर चुदाई की।

एक बार तो वो दोनों 69 की पोजीशन में एक दूसरी की चूत का दाना चूस रहीं थीं और मैं बारी बारे दोनों की चूत चोद रहा था। दोनों ने मिल कर कई बार मेरा लंड भी चूसा और एक बार तो दोनों में होड़ लगी थी कि मैं किसके मुँह में झडूंगा।

ऐसे ही मस्ती करते करते वो रात तो निकल गई और फिर अगले दिन से हम रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में व्यस्त हो गए। नेहा अब हम दोनों के साथ ही सोने लगी थी और हम सब मिल कर सेक्स किया करते थे।

दोस्तो, आपको यह भाई बहन की चुदाई कहानी कैसी लगी आप मुझे बता सकते हैं. अगर आपने पसंद किया तो मैं और आगे भी लिखने की कोशिश कर सकता हूँ....SID4YOU

 
साथ बने रहने के लिये बहुत धन्यवाद दोस्तो

 
अब तक आपने पढ़ा कि कैसे नशा उतरने के बाद भी राजन की बहन और उसकी पत्नी इस सारे भाई बहन की चुदाई के प्रकरण से खुश थे और किसी को कोई अफ़सोस नहीं था। इसका कारण यह था कि सोनिया भी अपने भाई के लंड के सपने देखा करती थी और राजन नेहा ने उसे वादा किया कि वो उसका सपना पूरा करने में उसकी मदद करेंगे।

अब आगे…

हमारे दिन (और रातें) मज़े में कट रहे थे। मुझे 2-2 चूत चोदने को मिल रहीं थीं। घर में किसी की शर्म लिहाज़ करने की ज़रुरत नहीं थी। सब सारा समय नंगे ही रहते थे। XXX विडियो टीवी पर ऐसे चलते थे जैसे घरों में आम तौर पर म्यूजिक चैनल चलते हैं, माहौल एकदम मस्त था।

लेकिन एक दिन जब सोनिया को चोदने के बाद मैं नेहा को चोद रहा था तो मैंने देखा कि सोनिया लेटे-लेटे हमें देख रही है लेकिन उसका ध्यान कहीं और ही था जैसे किसी और ख्याल में खोई हुई हो।

तब अचानक मुझे याद आया कि उसे भी अपने भाई की याद आ रही होगी। हम दोनों भाई-बहन की चुदाई देख कर उसका भी मन उसके भाई से चुदवाने को करता होगा। हमने उससे वादा भी किया था लेकिन हम अपने मज़े में इतने खो गए थे कि भूल ही गए।

मुझे ये सोच सोच कर बहुत आत्मग्लानि का अनुभव हुआ और मैं झड़ नहीं पाया। जैसे ही नेहा झड़ी, मैंने अपना लंड बाहर निकाला और मैं दोनों के बीच लेट गया। मेरा खड़ा तना हुआ लंड देख कर सोनिया बोली- अरे तुम्हारा तो अभी भी खड़ा हुआ है। लाओ मैं एक बार फिर चुदवा लेती हूँ।

राजन- नहीं, अभी मूड नहीं है।

सोनिया- अरे ऐसा क्या हो गया? अभी तो पूरे जोश में नेहा की चुदाई कर रहे थे।

राजन- वही तो… जब मैं उसे चोद रहा था तो मैंने देखा तुम पता नहीं किन ख्यालों में खोई हुई हो। तब मुझे याद आया कि तुमको भी शायद समीर से ऐसे ही चुदवाने तमन्ना हो रही होगी। और हमने तुमको वादा भी किया था लेकिन हम भूल ही गए। मुझसे तुम्हारी उदासी देखी नहीं गई इसलिए मूड ख़राब हो गया।

इतना सुनते ही सोनिया ने मुझे गले लगा लिया और जोर से एक चुम्मी लेकर मुझे कस कर अपनी बाहों में जकड़ते हुए बोली- जिसका पति उसके बारे में इतना सोचता हो वो भला उदास कैसे रह सकती है। आपने बिल्कुल सही समझा, मैं अपने भाई के ख्यालों में ही खोई हुई थी। लेकिन मुझे पता है आप अपना वादा नहीं भूले हैं और निभाएंगे भी इसलिए अभी तो मुझे आप पर बहुत प्यार आ रहा है।

उसकी आँखों में आंसू भर आये थे और मुझे पता था वो ख़ुशी के आंसू थे। उसने मुझे बहुत ही कोमल सा चुम्बन किया और हम एक दूसरे के होंठों को हौले हौले चूसने लगे। इस चुम्बन में वासना की उफान नहीं बल्कि सच्चे प्यार की स्थिरता थी। हम दोनों एक दूसरे की ओर करवट किये हुए लेटे थे और एक दूसरे को बाहों में भरे हुए सर से पाँव तक एक दूसरे से चिपके हुए थे। हमारी जांघें और पैर आपस में ऐसे गुत्थम गुत्था थे जैसे आपस में बंध जाना चाहते हों।

स ऐसे ही चिपके हुए मैं कभी उसकी पीठ सहलाता तो कभी नितम्बों से होता हुआ जाँघों तक हल्के से सहला देता, तो कभी स्तनों के बाजू से अपनी उंगलियाँ सरसरा देता।

सोनिया ने धीरे से अपना हाथ पीछे से अपने दोनों पैरों के बीच सरकाया और उसकी दोनों जाँघों के बीच दबे मेरे लिंग को धीरे से अपनी योनि में फिसला दिया। ना तो हमारा चुम्बन टूटा, ना ही आलिंगन लेकिन हम दोनों ने धीरे धीरे अपनी कमर हिलाना शुरू कर दिया। कभी वो हल्के से मेरे नितम्बों को अपनी हथेलियों से मसल देती तो कभी मैं अपने हाथों से उसके स्तनों तो दबा देता या फिर उसके नितम्बों को अपनी हथेलियों का सहारा देकर अपना लिंग उसकी योनि की गहराइयों तक पहुंचा देता।

यह सब हम बहुत आराम से और हौले हौले कर रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो आज हमने पहली बार प्यार करना सीखा था। ना जाने कब तक हम ऐसे ही धीरे धीरे अपने इस अनूठे समागम के आनन्द में गोते लगाते रहे।

और भी अजब बात यह थी कि जब हम अपने अतिरेक पर पहुंचे तो भी हमारी रफ़्तार बहुत तेज़ नहीं हुई, ना ही हमारा आलिंगन या चुम्बन टूटा। लेकिन इतनी देर तक पहले कभी हमने पराकाष्ठा (climax) का अनुभव नहीं किया था। काफी देर तक मेरा लिंग सोनिया की योनि में वीर्य की वर्षा करता रहा और उसकी योनि भी मेरे लिंग को ऐसे चूसती रही जैसे कोई बच्चा अपना अंगूठा चूसता है।

सब ख़त्म होने के बाद भी हम ऐसे ही चिपके पड़े रहे, बीच बीच में कभी कभी मेरा लिंग झटका मार देता तो उसकी योनि भी कस जाती या उसकी योनि में खिंचाव आ जाता और उसकी वजह से मेरा लिंग झटके मारने लगता।

हम पता नहीं कितनी देर ऐसे ही पड़े रहते लेकिन नेहा हमें वापस इसी दुनिया में वापस ले आई।

नेहा- भैया!!! भाभी!!! ये क्या था?

 
तब हमें होश आया कि हम अकेले नहीं थे। मैंने धीरे से सोनिया की पीठ पर हाथ फेरा और उसे सहलाते हुआ अपना लिंग बाहर निकाल लिया और उसके गालों पर एक प्यार भरा चुम्बन देकर मैं बैठ गया।

सोनिया भी उठ कर बैठ गई थी।

मैं- यार क्या था ये तो नहीं पता लेकिन ऐसा पहले कभी अनुभव नहीं किया था। शायद इसी को प्यार करना कहते हैं।

नेहा- तो अब तक जो हम कर रहे थे वो क्या था?

सोनिया- वो चुदाई थी!

और इतना कह कर सोनिया हंस पड़ी। हम दोनों भी हंसने लगे। खैर उस वक़्त तो रात बहुत हो गई थी और हमको सबको नींद आ रही थी इसलिए हम सो गए लेकिन एक बात जो मुझे समझ आई वो यह कि जब सेक्स में इमोशन (भावनाएं) भी हों तो वो एक अलग ही अनुभव होता है। लेकिन अब भावनाएं कोई K-Y जेली तो है नहीं कि बाज़ार से लाओ और चूत में लगा के चुदाई का मज़ा बढ़ा लो। वो तो जब आना होता है तभी आती हैं। और चुदाई का मजा तो कभी भी लिया जा सकता है।

इसलिए ज्यादा भावनाओं में बहने के बजाए मैं अपनी बीवी को उसके भाई से चुदवाने के तरीके सोचने लगा। अगला दिन इसी उधेड़बुन और रोज़मर्रा के कामॉम में निकल गया। रात को जब सब खाना खाने बैठे तब मैंने ये बात निकाली- मेरे इस बारे में सोचने से ही अगर सोनिया को मुझ पर इतना प्यार आ सकता है तो सोचो अगर मैंने सच में अगर इसको इसके भाई से चुदवा दिया तो ये मुझे कितना प्यार करेगी।

सोनिया- हाँ, मैं यही सोच कर इतना भावुक हो गई थी कि मेरा पति मुझे कितना प्यार करता है। मेरी ख़ुशी के लिए वह ये काम तक करने को तैयार है जो कोई पति सपने में भी मंजूर नहीं करता।

नेहा- नहीं भाभी, मैंने अपनी शादीशुदा सहेलियों से सुना है कई पति आजकल स्वैपिंग करते हैं। अपनी पत्नियों को दूसरों से चुदवाते हैं और खुद उनकी पत्नी को चोदते हैं।

सोनिया- हाँ… लेकिन वो तो ये सब अपनी मस्ती के लिए करते हैं ना। मेरे भाई की तो कोई बीवी भी नहीं है।

नेहा- हाँ, लेकिन बदले में आपने भी तो भैया को मुझे चोदने दिया ना।

सोनिया- हाँ, क्योंकि मैं भी तुम्हारे भैया से उतना ही प्यार करती हूँ, इनकी ख़ुशी के लिए मैं कुछ भी कर सकती हूँ।

मैं- सो स्वीट! तुमको जो करना था वो तुम कर चुकीं लेकिन अभी तो हमको तुम्हारी ख़ुशी के लिए कुछ करना है ना। तो देखो मैंने बहुत सोचा है इस बारे में। हमको बहुत सम्हाल कर कदम उठाने पड़ेंगे। कुछ गड़बड़ हो गई तो ना केवल तुम बल्कि मैं और नेहा भी बदनाम हो जाएंगे।

सोनिया- हाँ वो तो है। देखो अगर आसानी से हो सकता हो तो ठीक है नहीं तो रहने दो। मैं तुम्हारे साथ ही खुश हूँ।

मैं- चिंता ना करो, मैंने बहुत सोच समझ कर ऐसा प्लान बनाया है कि खतरा बहुत कम है।

नेहा- क्या प्लान है वो भी तो बताओ?

राजन- देखो, 2-3 महीने बाद राखी है। तब तक तुम समीर से फ़ोन पर बातें करते समय पता करो कि वो भी अब तक तुम्हारे बारे में वैसा ही सोचता है या नहीं। हो सके तो थोड़ी भूमिका भी बना लेना और फिर राखी पर उसको एक हफ्ते के लिए बुला लो यहाँ। त्यौहार ही ऐसा है कि कोई शक भी नहीं करेगा और काम भी हो जाएगा।

नेहा- अरे यार नहीं भैया, मैंने तो इस राखी के लिए बहुत प्लान बना रखे थे कि इस बार कुछ स्पेशल तरीके से मनाऊँगी आपके साथ। कोई और टाइम सोचो ना?

राजन- हम्म… ऐसा है तो… एक काम करेंगे!!… सोनिया, तुम उसको राखी से पहले ही बुलवा लेना तो अगर सब कुछ सही हुआ तो राखी से पहले ही सोनिया समीर से चुदवा चुकी होगी और फिर हम चारों मिल कर तुम्हारे हिसाब से स्पेशल राखी मना लेंगे।

नेहा- हाँ ये बात कुछ ठीक है. और वैसे भी भाभी की वजह से ही तो मैं आपके साथ इतना खुल पाई हूँ। इनकी इजाज़त ना होती तो आज हम तीनों यहाँ नंगे बैठ कर खाना न खा रहे होते। इसलिए इनके लिए इतना रिस्क तो ले ही सकते हैं।

सोनिया- अब खाना खत्म हो गया हो तो बेडरूम में चलें। एक तो तुम लोगों ने मेरी और समीर की चुदाई की बात कर करके मुझे इतना गर्म कर दिया है कि देखो ये कुर्सी तक गीली हो गई मेरे चूत के रस से।

राजन- ऐसा है तो चलो नेहा, आज स्वीट डिश में तुम्हारी भाभी की चूत का रस ही चाट लेंगे दोनों भाई-बहन।

इसके साथ ही सब हंस पड़े और हाथ मुह धो कर अगली चुदाई के लिए तैयार होने लगे।

दोस्तो, आपको यह भाई-बहन और पत्नी की त्रिकोणीय चुदाई की कहानी कैसी लगी आप मुझे ज़रूर बताइयेगा।

 
Back
Top