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Guest
रात को जब तीनों बेडरूम में मिले तो शालू ने फिर वही अपनी बच्चों जैसी राग अलापी- सुनिए ना… आज मेरा मन है कि पूरी रात मैं बस भैया से ही चुदवाऊँ … फिर पता नहीं कब मिलना हो।
विराज- अरे यार, फिर मैं क्या करूँगा? तुमको पता है मुझे मुठ मारने की आदत नहीं है। कल जिन्दगी में पहली बार मुठ मारी थी।
शालू- जाओ… जाकर अपनी माँ चोदो।
सुनील- शालू! ये क्या तरीका है अपने पति से बात करने का। एक तो भले इंसान ने हमको चुदाई करने का मौका दिया और तुम उनसे ऐसे बात कर रही हो?
शालू- अरे नहीं भैया, मैं गाली नहीं दे रही हूँ। वो सच में अपनी माँ चोदते हैं। यहाँ बैठे बैठे बोर होंगे इसलिए सलाह दे रही थी कि अपनी माँ के साथ चुदाई कर लें।
विराज ने कहा- ठीक है!
और वो अपनी माँ के कमरे की तरफ चला गया।
इधर सुनील को विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है। वो भले ही खुद अपनी सगी बहन से साथ किशोरावस्था से ही सम्भोग कर रहा था लेकिन उसे लगा था कि वो ही ये काम कर रहा है बाकी दुनिया में कोई ऐसा नहीं कर सकता।
हाँ यह बात सच है कि हर घर में ऐसा नहीं होता लेकिन जो भी हो रिश्तों में चुदाई एक सच्चाई तो है। लेकिन फिर भी ये जितनी कहानियों में दिखाई देती है उतनी सच्चाई में नहीं क्योंकि समाज में इसे बहुत बुरी नज़र से देखा जाता है।
सुनील- तो क्या जीजाजी शादी के पहले से ही अपनी माँ को चोद रहे हैं?
शालू- नहीं, सच कहूँ तो अभी एक डेढ़ साल पहले मैंने ही अपनी सास को इन से चुदवाया है। लेकिन इच्छा इनकी बचपन से थी।
सुनील- हाँ, मुझे भी माँ के मम्मे बड़े पसंद थे। मैंने भी तेरे पैदा होने के बाद भी उनका दूध पीना नहीं छोड़ा था लेकिन फिर वो गुज़र गईं। खैर तूने कैसे अपनी सास चुदवा दी?
शालू- वो लम्बी कहानी है बाद में बताऊँगी, अभी तुम ये देखो।
इतना कह कर शालू ने वो दर्पण हटा दिया और सामने का दृश्य देख कर विराज के दिल की धड़कन बढ़ गई। विराज अपनी माँ को घोड़ी बना के चोद रहा था। विराज की माँ के लटके हुए स्तन हर धक्के के साथ झूला झूल रहे थे। इस दृश्य को देख सुनील एक बार फिर अपना धैर्य खो बैठा और पहले उसने अपने कपड़े निकाल फेंके और फिर अपनी बहन को नंगी कर के वहीं चोदने लगा।
उधर विराज को शालू की चुदाई की हल्की हल्की आवाजें सुनाई पड़ रहीं थीं क्योंकि सुनील उसे बड़ी जोर से पीछे से चूत में लंड डाल कर खड़े खड़े कांच के पास ही चोद रहा था और एक दर्पण खुला होने की वजह से ज्यादा प्रतिरोध भी नहीं था। विराज भी जोश में आकर अपनी माँ की चूत का भुरता बनाने लगा।
काफी देर बाद जब माँ-बेटा झड़ गए तो थोड़ा सुस्ताने के बाद माँ ने अपनी बात कही।
माँ- बेटा! सच्ची बतैये… कल से जे का चल राओ है?
विराज- क्या मतलब? कुछ भी तो नहीं?
माँ- मोए का तूने बच्चा समझी है। मोए सब समझ आ रई है। तू बता रओ है कि मैं अबेई जा के बहू से पूछ लऊं?
विराज- अब मैं क्या बताऊँ। आप समझदार हो… आपको जो भी समझ आया है सही ही आया होगा।
माँ- पर बहू ने तो कई थी के बा ने अपने भाई से कबऊ नी चुदाओ।
आखिर विराज से माँ को पूरी कहानी सुना दी। लेकिन माँ को यह बात पसंद नहीं आई। उनका साफ़ कहना था कि जब तक पति है तब तक किसी और से चुदवाना सही नहीं है। विराज ने भी उनको यह नहीं बताया कि किसी और से चुदवाने की शुरुवात उसी ने करवाई थी। माँ भी खुद अपने बेटे से चुदवा रहीं थीं तो ज्यादा कुछ बोल नहीं सकती थीं लेकिन उनको ये बिल्कुल अच्छा नहीं लगा कि कोई उनके बेटे की आँखों के सामने उसकी बीवी को चोद के जाए।
अगले दिन सुनील चला गया लेकिन फिर अक्सर घर से किसी ना किसी बहाने निकलता और एक दो रात अपनी बहन के घर रुक कर जाता। विराज की माँ ने साफ़ कह दिया था कि जब भी वो आये तो विराज उनके पास ही रहा करे। उनकी पुरानी सोच को ये बात समझ नहीं आ सकी कि विराज को भी अपनी पत्नी को उसके भाई से चुदवाने में मज़ा आता था। विराज की माँ अपनी बहू से खफा भी थी तो अब उसने साथ में चुदवाना बंद कर दिया था तो कभी कभी दोनों सुनील को शहर की किसी होटल में बुला कर एक साथ सामूहिक चुदाई कर लिया करते लेकिन अक्सर तो विराज को घर पर अपनी माँ ही चोदनी पड़ती।
उधर शीतल ने एक बच्चे को जन्म दिया। इस बार लड़का हुआ था जिसका नाम उन्होंने समीर रखा। विराज और शालू बधाई देने गए लेकिन अब उनके बीच चुदाई का रिश्ता नहीं बचा था। हाँ पर उनके बच्चों यानि कि सोनिया और राजन में दोस्ती का नया रिश्ता ज़रूर शुरू हो गया था।
अगले ही महीने शालू ने भी खुशखबरी दे दी। वो भी गर्भवती हो गई थी। इस बार विराज को जय की ज़रूरत नहीं थी, उसके पास चोदने के लिए उसकी माँ थी।
नौ महीने बाद जब शालू ने जब एक बेटी को जन्म दिया तो शायद उस बच्ची की किस्मत में माँ का प्यार नहीं था। विराज के सर पर दो बच्चों को पालने की ज़िम्मेदारी आ गई। ऐसे में जय और शीतल ने पूरी दोस्ती निभाई और विराज की बेटी नेहा को अपना दूध पिलाया लेकिन उसके एक साल की होने पर विराज की माँ उसे अपने पास ले आईं और उन्ही ने उसे पाला।
अब विराज की जिंदगी भी ज़िम्मेदारी के बोझ तले इतनी दब गई थी कि उसको ज्यादा चोदा-चादी के बारे में सोचने का समय नहीं मिलता था। कभी कभार माँ को चोद लेता था वरना ज्यादातर समय उसका खेती-बाड़ी और बच्चों की देखभाल में ही गुज़रता था। धीरे धीरे बच्चे बड़े होते रहे और माँ-बाप बूढ़े।
ज़माना हमेशा आगे बढ़ता है। अगर इस पीढ़ी में कामुकता का ये हाल है तो अगली पीढ़ी में क्या होगा?
विराज- अरे यार, फिर मैं क्या करूँगा? तुमको पता है मुझे मुठ मारने की आदत नहीं है। कल जिन्दगी में पहली बार मुठ मारी थी।
शालू- जाओ… जाकर अपनी माँ चोदो।
सुनील- शालू! ये क्या तरीका है अपने पति से बात करने का। एक तो भले इंसान ने हमको चुदाई करने का मौका दिया और तुम उनसे ऐसे बात कर रही हो?
शालू- अरे नहीं भैया, मैं गाली नहीं दे रही हूँ। वो सच में अपनी माँ चोदते हैं। यहाँ बैठे बैठे बोर होंगे इसलिए सलाह दे रही थी कि अपनी माँ के साथ चुदाई कर लें।
विराज ने कहा- ठीक है!
और वो अपनी माँ के कमरे की तरफ चला गया।
इधर सुनील को विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है। वो भले ही खुद अपनी सगी बहन से साथ किशोरावस्था से ही सम्भोग कर रहा था लेकिन उसे लगा था कि वो ही ये काम कर रहा है बाकी दुनिया में कोई ऐसा नहीं कर सकता।
हाँ यह बात सच है कि हर घर में ऐसा नहीं होता लेकिन जो भी हो रिश्तों में चुदाई एक सच्चाई तो है। लेकिन फिर भी ये जितनी कहानियों में दिखाई देती है उतनी सच्चाई में नहीं क्योंकि समाज में इसे बहुत बुरी नज़र से देखा जाता है।
सुनील- तो क्या जीजाजी शादी के पहले से ही अपनी माँ को चोद रहे हैं?
शालू- नहीं, सच कहूँ तो अभी एक डेढ़ साल पहले मैंने ही अपनी सास को इन से चुदवाया है। लेकिन इच्छा इनकी बचपन से थी।
सुनील- हाँ, मुझे भी माँ के मम्मे बड़े पसंद थे। मैंने भी तेरे पैदा होने के बाद भी उनका दूध पीना नहीं छोड़ा था लेकिन फिर वो गुज़र गईं। खैर तूने कैसे अपनी सास चुदवा दी?
शालू- वो लम्बी कहानी है बाद में बताऊँगी, अभी तुम ये देखो।
इतना कह कर शालू ने वो दर्पण हटा दिया और सामने का दृश्य देख कर विराज के दिल की धड़कन बढ़ गई। विराज अपनी माँ को घोड़ी बना के चोद रहा था। विराज की माँ के लटके हुए स्तन हर धक्के के साथ झूला झूल रहे थे। इस दृश्य को देख सुनील एक बार फिर अपना धैर्य खो बैठा और पहले उसने अपने कपड़े निकाल फेंके और फिर अपनी बहन को नंगी कर के वहीं चोदने लगा।
उधर विराज को शालू की चुदाई की हल्की हल्की आवाजें सुनाई पड़ रहीं थीं क्योंकि सुनील उसे बड़ी जोर से पीछे से चूत में लंड डाल कर खड़े खड़े कांच के पास ही चोद रहा था और एक दर्पण खुला होने की वजह से ज्यादा प्रतिरोध भी नहीं था। विराज भी जोश में आकर अपनी माँ की चूत का भुरता बनाने लगा।
काफी देर बाद जब माँ-बेटा झड़ गए तो थोड़ा सुस्ताने के बाद माँ ने अपनी बात कही।
माँ- बेटा! सच्ची बतैये… कल से जे का चल राओ है?
विराज- क्या मतलब? कुछ भी तो नहीं?
माँ- मोए का तूने बच्चा समझी है। मोए सब समझ आ रई है। तू बता रओ है कि मैं अबेई जा के बहू से पूछ लऊं?
विराज- अब मैं क्या बताऊँ। आप समझदार हो… आपको जो भी समझ आया है सही ही आया होगा।
माँ- पर बहू ने तो कई थी के बा ने अपने भाई से कबऊ नी चुदाओ।
आखिर विराज से माँ को पूरी कहानी सुना दी। लेकिन माँ को यह बात पसंद नहीं आई। उनका साफ़ कहना था कि जब तक पति है तब तक किसी और से चुदवाना सही नहीं है। विराज ने भी उनको यह नहीं बताया कि किसी और से चुदवाने की शुरुवात उसी ने करवाई थी। माँ भी खुद अपने बेटे से चुदवा रहीं थीं तो ज्यादा कुछ बोल नहीं सकती थीं लेकिन उनको ये बिल्कुल अच्छा नहीं लगा कि कोई उनके बेटे की आँखों के सामने उसकी बीवी को चोद के जाए।
अगले दिन सुनील चला गया लेकिन फिर अक्सर घर से किसी ना किसी बहाने निकलता और एक दो रात अपनी बहन के घर रुक कर जाता। विराज की माँ ने साफ़ कह दिया था कि जब भी वो आये तो विराज उनके पास ही रहा करे। उनकी पुरानी सोच को ये बात समझ नहीं आ सकी कि विराज को भी अपनी पत्नी को उसके भाई से चुदवाने में मज़ा आता था। विराज की माँ अपनी बहू से खफा भी थी तो अब उसने साथ में चुदवाना बंद कर दिया था तो कभी कभी दोनों सुनील को शहर की किसी होटल में बुला कर एक साथ सामूहिक चुदाई कर लिया करते लेकिन अक्सर तो विराज को घर पर अपनी माँ ही चोदनी पड़ती।
उधर शीतल ने एक बच्चे को जन्म दिया। इस बार लड़का हुआ था जिसका नाम उन्होंने समीर रखा। विराज और शालू बधाई देने गए लेकिन अब उनके बीच चुदाई का रिश्ता नहीं बचा था। हाँ पर उनके बच्चों यानि कि सोनिया और राजन में दोस्ती का नया रिश्ता ज़रूर शुरू हो गया था।
अगले ही महीने शालू ने भी खुशखबरी दे दी। वो भी गर्भवती हो गई थी। इस बार विराज को जय की ज़रूरत नहीं थी, उसके पास चोदने के लिए उसकी माँ थी।
नौ महीने बाद जब शालू ने जब एक बेटी को जन्म दिया तो शायद उस बच्ची की किस्मत में माँ का प्यार नहीं था। विराज के सर पर दो बच्चों को पालने की ज़िम्मेदारी आ गई। ऐसे में जय और शीतल ने पूरी दोस्ती निभाई और विराज की बेटी नेहा को अपना दूध पिलाया लेकिन उसके एक साल की होने पर विराज की माँ उसे अपने पास ले आईं और उन्ही ने उसे पाला।
अब विराज की जिंदगी भी ज़िम्मेदारी के बोझ तले इतनी दब गई थी कि उसको ज्यादा चोदा-चादी के बारे में सोचने का समय नहीं मिलता था। कभी कभार माँ को चोद लेता था वरना ज्यादातर समय उसका खेती-बाड़ी और बच्चों की देखभाल में ही गुज़रता था। धीरे धीरे बच्चे बड़े होते रहे और माँ-बाप बूढ़े।
ज़माना हमेशा आगे बढ़ता है। अगर इस पीढ़ी में कामुकता का ये हाल है तो अगली पीढ़ी में क्या होगा?