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कामुकता भरे पल आरज़ू के साथ
मूलतः भोपाल का रहने वाला हूँ लेकिन लखनऊ में रहता हूँ। रिश्तेदारों में एक खाला कानपुर में रहती हैं
खाला के तीन बच्चे थे, जिनमें एक लड़का था जिसके साथ मैंने अपने टाईम में काफी मस्ती की है और दो लड़कियाँ, जिनमें एक फ़रीदा की अभी चार साल पहले शादी हो गयी थी और वह अपने पति के पास रहने सऊदी चली गयी। दूसरी घर पे ही रहती थी, जिसका नाम शाजिया था।
लड़का मेरा हमउम्र था जिसकी शादी भी यूँ तो साथ में ही की गयी थी, लेकिन ठीक ठाक कुछ कमाता धमाता नहीं था तो आये दिन झगड़ा बना रहता था और उसकी बीवी मायके पड़ी रहती थी।
घर के हालात कुछ ठीक नहीं थे, जिस वजह से शाजिया की शादी भी नहीं हो पा रही थी, जबकि वह भी अट्ठाईस की हो चुकी थी।
जिस दौरान सब ठीकठाक था और मैं उनके घर जा जा कर रुक जाता था, उस दौरान शाजिया छोटी ही थी, इसलिये उससे मेरी कोई खास बोलचाल नहीं ही थी। हां, इधर लखनऊ रहने के दौरान हम सभी चूँकि व्हाट्सएप पर एक घरेलू ग्रुप से जुड़े थे तो बातचीत होती रहती थी, जिससे सभी बातें पता चलती रहती थीं।
तीन साल से मैं लखनऊ में था और इस बीच तीन बार ही कानपुर खाला के यहाँ गया था। अब दुआ सलाम, खैरियत पूछने तक या इधर-उधर की जनरल बातें तो उससे हो जाती थीं लेकिन कोई खास कंटीन्युटी उससे फिर भी नहीं थी।
उसका खास जिक्र इसलिये भी, क्योंकि मैंने जिंदगी में जिन लोगों पर सेक्स के अभाव का असर पड़ते देखा है.. वह भी उनमें से एक थी।
वह करीब साढ़े पांच फुट की लंबाई, साफ रंगत और आकर्षक चेहरा रखने वाली लड़की थी जो करीब पांच छः साल पहले तक अच्छी सेहत रखती थी। कभी कजिन्स पर मैंने कोई गलत नजर तो नहीं डाली, बस जनरल वे में बता रहा हूँ कि उसकी फिगर कोई उत्तेजक तो नहीं लेकिन फिर भी ठीक ठाक थी।
लेकिन वर्तमान में वह लगभग ढांचा सी दुबली पतली हो गयी थी। सीना नाम का रह गया था, कूल्हे भी सपाट हो गये थे। हाथ पैर की हड्डियां दिखतीं और नसें चमकती थीं; देखकर किसी बीमारी का शिकार लगती थी.
मगर खाला ने बताया था कि उसकी सभी जांचें हो चुकी थीं और सभी ठीक ठाक ही रही थीं। उसे किसी तरह की कोई बीमारी नहीं थी.. फिर क्या वजह थी उसके एकदम ढल जाने की? मुझे यौन कुंठा, घुटन, कुढ़न के सिवा और कोई वजह नहीं समझ में आती थी।
बहरहाल, वह काबिले जिक्र इसलिये भी है कि यह कहानी उसी को लेकर है।
एक दिन खाला का फोन आया था कि शाजिया को मेरी मदद की जरूरत थी। दरअसल वह कानपुर में जिस जगह नौकरी करना चाह रही थी, उसका हेड-ऑफिस लखनऊ में था और इंटरव्यू यहीं होना था।
शाजिया के मुताबिक शाम हो जानी थी और वह यूँ शाम या रात को सफर करने के पक्ष में नहीं थी।
मैं उनका आशय समझ गया था और उन्हें भरोसा दिलाया था कि वह फिक्र न करें, मैं इंतजाम कर दूंगा। रात भर रुक के सुबह मैं खुद ही चारबाग ट्रेन पे बिठा आऊँगा।
इसके बाद मैंने अपने मकान मालिक को यह बात बता कर उसके रुकने के लिये उनसे इजाजत मांगी। यह भी पेशकश की, कि अगर उन्हें कोई एतराज हो तो वह नीचे सुला सकते हैं।
यह मेरी एक आदत है कि जहां रहता हूँ वहां इतनी इज्जत तो बना कर रखता हूँ कि सामने वाला भरोसा कर सके, फिर आगंतुक लड़की कोई गैर या दोस्त नहीं, बल्कि खालाजाद बहन ही थी तो उन्हें क्या एतराज होता। उन्होंने इजाजत दे दी।
वह ग्यारह बजे आ गयी थी। मैंने उसे स्टेशन से ले लिया और उसकी बताई जगह पर छोड़ दिया और खुद अपने ऑफिस निकल आया।
शाम को पांच बजे वह फारिग हो गयी लेकिन मैं छः बजे छूटा तो उस तक करीब साढ़े छः बजे पंहुच पाया।
आगे का वक्त वैसा ही गुजरा जैसा गुजरता है। पहले सीधे घर ले गया, जहां वह नहा धोकर फ्रेश हुई। फिर उसे अमीनाबाद ले आया जहां थोड़ी शॉपिंग करने के बाद वहीं टुंडे के यहाँ खाना खिलाया, प्रकाश के यहाँ कुल्फी खिलाई और थोड़ा वापसी में गोमती किनारे टहल कर साढ़े दस बजे घर आ गये।
इस बीच इधर-उधर की बातें ही होती रही थीं। बावजूद इसके कि उसकी बहुत कम बोलने की आदत थी। या शायद हम दोनों की उम्र के फर्क की वजह से वह असहज हो रही हो।
खैर.. करीब ग्यारह बजे सोने के लिये लेटने की नौबत आई। ऊपर मेरे कमरे में एक तख्त ही था जो मकान मालिक की मेहरबानी से लेटने के काम आता था, बाकी मैं तो सफरी जीवन की वजह से कोई खास सामान ही नहीं बनाता था।
उसे मैंने तख्त पे लिटा दिया और खुद नीचे चटाई बिछा कर लेट गया।
“सुन!” मैंने उसकी तरफ करवट ले कर कुहनी के बल चेहरा उठाते हुए कहा।
“हां भाई?” वह तख्त के किनारे पर आकर मेरी तरफ करवट ले कर मुझे देखने लगी।
“पांच छः साल पहले तक तो तुम्हारी सेहत अच्छी भली थी और दिखने में काफी अच्छी लगती थी। अब क्या हो गया तुम्हें?”
“पता नहीं।” उसने अनमने भाव से जवाब दिया।
“कोई ऐसी बीमारी है जो खाला ने मुझे बतानी ठीक न समझी हो?” मैंने थोड़ी आत्मीयता पैदा करते हुए कहा।
“जैसे?” वह थोड़ा चौंक कर गौर से मुझे देखने लगी।
“जैसे ल्यूकोरिया ही ले लो।” मैंने राजदाराना अंदाज में कहा।
मूलतः भोपाल का रहने वाला हूँ लेकिन लखनऊ में रहता हूँ। रिश्तेदारों में एक खाला कानपुर में रहती हैं
खाला के तीन बच्चे थे, जिनमें एक लड़का था जिसके साथ मैंने अपने टाईम में काफी मस्ती की है और दो लड़कियाँ, जिनमें एक फ़रीदा की अभी चार साल पहले शादी हो गयी थी और वह अपने पति के पास रहने सऊदी चली गयी। दूसरी घर पे ही रहती थी, जिसका नाम शाजिया था।
लड़का मेरा हमउम्र था जिसकी शादी भी यूँ तो साथ में ही की गयी थी, लेकिन ठीक ठाक कुछ कमाता धमाता नहीं था तो आये दिन झगड़ा बना रहता था और उसकी बीवी मायके पड़ी रहती थी।
घर के हालात कुछ ठीक नहीं थे, जिस वजह से शाजिया की शादी भी नहीं हो पा रही थी, जबकि वह भी अट्ठाईस की हो चुकी थी।
जिस दौरान सब ठीकठाक था और मैं उनके घर जा जा कर रुक जाता था, उस दौरान शाजिया छोटी ही थी, इसलिये उससे मेरी कोई खास बोलचाल नहीं ही थी। हां, इधर लखनऊ रहने के दौरान हम सभी चूँकि व्हाट्सएप पर एक घरेलू ग्रुप से जुड़े थे तो बातचीत होती रहती थी, जिससे सभी बातें पता चलती रहती थीं।
तीन साल से मैं लखनऊ में था और इस बीच तीन बार ही कानपुर खाला के यहाँ गया था। अब दुआ सलाम, खैरियत पूछने तक या इधर-उधर की जनरल बातें तो उससे हो जाती थीं लेकिन कोई खास कंटीन्युटी उससे फिर भी नहीं थी।
उसका खास जिक्र इसलिये भी, क्योंकि मैंने जिंदगी में जिन लोगों पर सेक्स के अभाव का असर पड़ते देखा है.. वह भी उनमें से एक थी।
वह करीब साढ़े पांच फुट की लंबाई, साफ रंगत और आकर्षक चेहरा रखने वाली लड़की थी जो करीब पांच छः साल पहले तक अच्छी सेहत रखती थी। कभी कजिन्स पर मैंने कोई गलत नजर तो नहीं डाली, बस जनरल वे में बता रहा हूँ कि उसकी फिगर कोई उत्तेजक तो नहीं लेकिन फिर भी ठीक ठाक थी।
लेकिन वर्तमान में वह लगभग ढांचा सी दुबली पतली हो गयी थी। सीना नाम का रह गया था, कूल्हे भी सपाट हो गये थे। हाथ पैर की हड्डियां दिखतीं और नसें चमकती थीं; देखकर किसी बीमारी का शिकार लगती थी.
मगर खाला ने बताया था कि उसकी सभी जांचें हो चुकी थीं और सभी ठीक ठाक ही रही थीं। उसे किसी तरह की कोई बीमारी नहीं थी.. फिर क्या वजह थी उसके एकदम ढल जाने की? मुझे यौन कुंठा, घुटन, कुढ़न के सिवा और कोई वजह नहीं समझ में आती थी।
बहरहाल, वह काबिले जिक्र इसलिये भी है कि यह कहानी उसी को लेकर है।
एक दिन खाला का फोन आया था कि शाजिया को मेरी मदद की जरूरत थी। दरअसल वह कानपुर में जिस जगह नौकरी करना चाह रही थी, उसका हेड-ऑफिस लखनऊ में था और इंटरव्यू यहीं होना था।
शाजिया के मुताबिक शाम हो जानी थी और वह यूँ शाम या रात को सफर करने के पक्ष में नहीं थी।
मैं उनका आशय समझ गया था और उन्हें भरोसा दिलाया था कि वह फिक्र न करें, मैं इंतजाम कर दूंगा। रात भर रुक के सुबह मैं खुद ही चारबाग ट्रेन पे बिठा आऊँगा।
इसके बाद मैंने अपने मकान मालिक को यह बात बता कर उसके रुकने के लिये उनसे इजाजत मांगी। यह भी पेशकश की, कि अगर उन्हें कोई एतराज हो तो वह नीचे सुला सकते हैं।
यह मेरी एक आदत है कि जहां रहता हूँ वहां इतनी इज्जत तो बना कर रखता हूँ कि सामने वाला भरोसा कर सके, फिर आगंतुक लड़की कोई गैर या दोस्त नहीं, बल्कि खालाजाद बहन ही थी तो उन्हें क्या एतराज होता। उन्होंने इजाजत दे दी।
वह ग्यारह बजे आ गयी थी। मैंने उसे स्टेशन से ले लिया और उसकी बताई जगह पर छोड़ दिया और खुद अपने ऑफिस निकल आया।
शाम को पांच बजे वह फारिग हो गयी लेकिन मैं छः बजे छूटा तो उस तक करीब साढ़े छः बजे पंहुच पाया।
आगे का वक्त वैसा ही गुजरा जैसा गुजरता है। पहले सीधे घर ले गया, जहां वह नहा धोकर फ्रेश हुई। फिर उसे अमीनाबाद ले आया जहां थोड़ी शॉपिंग करने के बाद वहीं टुंडे के यहाँ खाना खिलाया, प्रकाश के यहाँ कुल्फी खिलाई और थोड़ा वापसी में गोमती किनारे टहल कर साढ़े दस बजे घर आ गये।
इस बीच इधर-उधर की बातें ही होती रही थीं। बावजूद इसके कि उसकी बहुत कम बोलने की आदत थी। या शायद हम दोनों की उम्र के फर्क की वजह से वह असहज हो रही हो।
खैर.. करीब ग्यारह बजे सोने के लिये लेटने की नौबत आई। ऊपर मेरे कमरे में एक तख्त ही था जो मकान मालिक की मेहरबानी से लेटने के काम आता था, बाकी मैं तो सफरी जीवन की वजह से कोई खास सामान ही नहीं बनाता था।
उसे मैंने तख्त पे लिटा दिया और खुद नीचे चटाई बिछा कर लेट गया।
“सुन!” मैंने उसकी तरफ करवट ले कर कुहनी के बल चेहरा उठाते हुए कहा।
“हां भाई?” वह तख्त के किनारे पर आकर मेरी तरफ करवट ले कर मुझे देखने लगी।
“पांच छः साल पहले तक तो तुम्हारी सेहत अच्छी भली थी और दिखने में काफी अच्छी लगती थी। अब क्या हो गया तुम्हें?”
“पता नहीं।” उसने अनमने भाव से जवाब दिया।
“कोई ऐसी बीमारी है जो खाला ने मुझे बतानी ठीक न समझी हो?” मैंने थोड़ी आत्मीयता पैदा करते हुए कहा।
“जैसे?” वह थोड़ा चौंक कर गौर से मुझे देखने लगी।
“जैसे ल्यूकोरिया ही ले लो।” मैंने राजदाराना अंदाज में कहा।