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काली घटा/ गुलशन नन्दा KALI GHATA by GULSHAN NANDA

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रात मौन थी ! वायु का नाम तक न था! दर मेंढकों के टराने की ध्वनि सुनाई दे रही थी। राजेन्द्र और वासुदेव झील के किनार लट प्रकाश की नीलाहट को निहार रहे थे, जिस पर धीरे-धीरे तारा का जाल फैलता जा रहा था। दोनों चुपचाप किसी गहरी सोच में डूब हुए।

मित्र के मन का भेद जानकर राजेन्द्र को यू अनुभव हो रहा था मानो किसी ने उसके शरीर को सुइयों से छेद डाला हो और उसम हिलने की शक्ति भी न रही हो।

क्या यह सब है? क्या वास्तविकता कल्पना से इतनी भयानक थी ? क्या माज तक वह इस ज्याला में अकेला ही जलता रहा है । \

क्या जीवन में ऐसे भेद भी हैं जो पति अपनी पत्नी से नहीं कह सकता?

ऐसे कितने ही प्रश्न उसके मस्तिष्क में उठे और चक्कर लगाने लगे। उसकी सांस ध्रुटी जा रही थी। उसने कठिनता से गर्दन माड़कर वासु देव को देखा। वह झील के जल की भांति मौन और शात, आकाश का मोर पथराई हुई दृष्टि से देख रहा था।

अचानक एक आवाज हई। दोनों के विचार की कड़ा टूट गई और वह एक साथ उठ बैठे । सामने हाथ में टॉर्च लिये माधुरी खड़ी उन्हें पुकार रही थी।

दोनों बिना बात किये सिर झुकाये घर की ओर चल पड़े। माधुरी पीछे और वह दोनों प्रागे-मागे 'कहीं उसके प्रेम का रहस्य तो नहीं खुल गया ? कहीं इसी बात पर दोनों में झगड़ा तो नहीं हुआ ? दह यह सोचती हुई मन ही मन डरती आ रही थी।

खाना खाते समय भी तीनों चुप थे। किसी ने कोई बात न की, कोई हँसा नहीं, कोई वाद-विवाद नहीं हुआ, बस चुपचाप खाते रहे यू अनुभव हो रहा था मानो तीनों एक दूसरे से डर रहे हों । खाना विष बनकर उनके गले से नीचे उतर रहा था।

राजेन्द्र खाने के तुरन्त बाद अपने कमरे में चला पाया । माधुरी का हृदय धड़क रहा था। उसे अकेले में अपने पति से भय लग रहा था। वह सोच रही थी कि वह अपने कमरे में चला जाए तो अच्छा हो, किन्तु ऐसा न हुआ । वह एक पत्रिका लेकर उसके पास ही पाराम कुर्सी पर टांगें लम्बी करके बैठ गया। थोड़ी देर माधुरी एक मानसिक दुविधा में बैठी रही और फिर धीरे से उठकर दूसरे कमरे में जाने लगी।

अचानक वासुदेव ने पुकारा, "माधुरी !"

अपना नाम सुनकर वह कांप गई और विस्मय से अपने पति को देखने लगी ।

वासुदेव ने उसे पाश्चर्य में देखकर धीमे स्वर में पूछा, "क्या बात है ?"

___“जी!" वह झेंप गई और घबराहट दूर करने का प्रयत्न करने लगी।

"कुशल तो है ? आज कुछ उदास दीख रही हो।"

"नहीं तो.."आप चुप थे "मैं तो..."

"राजी को दूध पहुँच गया ?"

"गंगा से कह दिया था..."

"स्वयं देख लिया करो''वह अतिथि नहीं, मेरा बड़ा प्रिय मित्र

वह चुप रही। ... क्षण भर रुककर वासुदेव फिर बोला, "कहीं वह भूल न जाये, ज़रा देख लेना।"

यह कहकर वह फिर पत्रिका पढ़ने में लग गया।

वह उठी और बाहर चली गई।

- गंगा दूध का गिलास लिए राजेन्द्र के कमरे की ओर जा रही थी। माधुरी ने उसके हाथ से गिलास ले लिया और स्वयं उधर चली। वह बड़ी देर से उससे अकेले में मिलने का यत्त कर रही थी, किन्तु अवसर ही न मिल रहा था।

___ कमरे में हल्का-हल्का प्रकाश था और वह पलंग पर लेटा छत की. ओर देख रहा था। उसने माधुरी को आते हए नहीं देखा । माधुरी ने पहले तो उसे अपने आने की सूचना देनी चाही, परन्तु फिर कुछ सोच कर रुक गई। मेज पर दूध का गिलास रखने लगी तो मेज को हल्की सी ठोकर लगी।
 
"कौन ?" वह आहट सुनकर चौंक उठा। ..

''मैं 'माधुरी।"

"माधुरी ! तुम यहाँ कैसे?"

"आपके लिए दूध लाई थी।"

"गंगा नहीं थी क्या ? आज मुझे दूध नहीं पीना।"

"क्यों ? मेरे हाथ लग गये इसलिये...?"

"नहीं, माधुरी''आज मन नहीं चाहता।"

"वही तो मैं पूछ रही हूँयह आपको एकाएक हो क्या गया है ?"

"कुछ नहीं'"

यू ही मन उदास हो गया है।"

"क्यों ?"

"कुछ विशेष बात नहीं...

"आप मुझसे कुछ छिपा रहे हैं।"

"मन का भ्रम. "एक अकारण सा भय...?"

"क्या ?" वह राजेन्द्र के बिल्कुल सनीप आ गई और धड़कते हुए हृदय से उसकी बात सुनने लगी।

."सोचता हूँ कहीं तुम्हारा प्रेम धोखा न हो..."

राजेन्द्र की बात उसके मन पर नश्तर के समान लगी और वह तेजी से दूर हट गई। ऐसा करते हुए मेज को ठोकर लगी और दूध का गिलास उलट गया।

उसने एक दृष्टि गिरे हुए दूध पर और दूसरी राजेन्द्र पर डाली और झट बाहर निकल गई। राजेन्द्र के मुख पर एक छिपी मुस्कान थी। अभी उसने बाहर पैर रखा ही था कि लैम्प की बत्ती बुझ गई और कमरे में अंधेरा छा गया ।

रात बढ़ती जा रही थी। खिड़की खुली थी और बाहर हवा के झोंके एक भन्द सी मधुर जलतरंग बजा रहे थे ।

राजेन्द्र की आँखों में नींद न थी । अंधेरे में लेटे उसके मस्तिष्क के छाया-पट पर स्वयं अतीत के चित्र उतरने लगे। उसकी आँखों के सामने वह दृश्य फिर गया जब वह और वासुदेव सैनिकः कालिज में इकट्रे शिक्षार्थी थे। दोनों बड़े गूढ़ मिनथे । शिक्षा समाप्त होने पर दोनों को अलग-अलग यूनिटों में बदल दिया गया । वह मद्रास में चला गया और वासुदेव को ब्रह्मा की सीमा पर जाना पड़ा।

जहाँ इस भयंकर युद्ध ने संसार भर में हाहाकार मचा दी वहाँ वासुदेव भी इसके प्रभाव से न बच सका। राजेन्द्र को उसका रहस्य आज ही ज्ञात हुआ । अभी तक उसके कानों में अपने मित्र के दुःख-भरे शब्द गूंज रहे थे। उसने अपनी पूरी आत्मकथा उसे सुना दी थी।

जापानियों से लड़ते हुए उसकी कम्पनी शत्रु के घेरे में आ गई और वह बन्दी बना लिये गये ! उसे दस और साथियों के साथ पहाड़ में खोदकर बनाये गये एक ऐसे कमरे में कैद कर दिया गया जिसके बाहर लोहे की मोटी सीखों का छोटा सा किवाड़ था। एक ओर छत से मिला हा एक झरोखे का स्थान था जो लोहे की मोटी जाली से ढका हमा था जिससे थोड़ा सा उजाला उन तक पहुँचता । केवल इसी उजाले से वह दिन-रात का अनुमान लगा सकते थे । खाना और पानी उन्हें नाम मात्र को ही दिया जाता था। यहीं वह जीवन की अन्तिम साँसे गिन रहे थे।

एक रात उन्होंने साहस किया और मिलकर उस दीवार को खोदने लगे जिसमें झरोखा था । भाग्य ने उनका साथ दिया और दो रातों में वह उस झरोखे में इतना स्थान खोदने में सफल हो गये जिसमें से रेंगकर वह बाहर निकल सके।

तीसरी रात बाहर निकलने की योजना बनी । वासुदेव का पांचवा नम्बर था। उससे पहले उसके चार साथी बाहर निकलकर झाड़ियों में छिप गये थे । जब सन्नाटा छा गया और वह निश्चिन्त हो गये कि वह लोग सुरक्षित हैं तो उसने धीरे से गर्दन बाहर निकाली और चारों ओर दृष्टि दौड़ाई । सर्वत्र मौन था । दूर दो सन्तरी पहरा दे रहे थे। वासुदेव ने शरीर को समेटकर ऊपर उठाया, नीचे वाले साथियों ने सहारा दिया और वह रेंगता हुआ बाहर आ गया। ज़रा सी पाहट हुई तो उसने अपने आप को झाड़ियों में छिपा लिया और धरती पर लेट गया ।
 
सन्तरी आपस में मुड़कर बातें करने लगे तो उसने धीरे-धीरे रेंग कर बढ़ना आरम्भ किया । कुछ आगे चलकर उठ खड़ा हुआ और दौड़ने लगा । दुर्भाग्य से उसका पाँव फिसला और वह गिर पड़ा । सन्तरियों ने झट से ललकारा । एक ने हवा में गोली छोड़ी और सर्च-लाइट घुमा कर देखा।

सर्च-लाइट की रोशनी ज्यों-ज्यों उसके समीप पा रही थी, उसकी साँस ध्रुटी जा रही थी । जीवन मृत्यु की सीमा पर दिखाई दे रहा था। बच निकलने का कोई मार्ग न था, करे तो क्या करे ? रोशनी उसके आगे होकर मुड़ गई। उसने साहस बटोरा और पूरे बल से भामा । मर्च लाइट मुड़कर उस पर आ पड़ी और इसके साथ ही गोलियों को एक बौछार उसके पास-पास होने लगी। वह धरती पर गिर गया। - गोलियों की बौछार समाप्त हुई तो घायल वासुदेव से स्वयं को अधेरी झाड़ियों में फेंक दिया। भाग्य से उसके दूसरे साथी भी वहीं छिपे बैठे थे। इससे पहले कि सन्तरी उस स्थान पर पहुँचते, उसके साथी घायल वासुदेव को लेकर नदी में उतर गये और रात के अंधेरे में तैरते हुए उसे पार कर गये।

वासुदेव के प्रारण तो बच गये किन्तु, वह अति घायल हुअा था। एक गोली उसकी जाँच में घुस गई थी। कैम्प में तत्कालीन चिकित्सा दी गई और शीघ्र ऑपरेशन के लिए पीछे भिजवा दिया गया। गोली निकल गई और प्रॉपरेशन सफल रहा । घाव भरने तक दो महीने उसे हस्पताल में ही रहना पड़ा।

जब उसका हस्पताल से जाने का दिन आया तो डाक्टर ने उससे हाथ मिलाते हुए कहा

"वासुदेव! तुम बड़े भाग्यशाली हो।" .

"सब आपकी कृपा है डाक्टर ! वरन मुझे तो बचने की कोई आशा न थी।"

ऐसा मत कहो वासुदेव ! मैंने तो अपना कर्त्तव्य ही पालन किया है. बचाने वाला तो भगवान ही है । अच्छा, अब तुम यहाँ से जा रहे हो तो मैं तुमसे तुम्हारे जीवन सम्बन्धी कुछ कहना चाहता हूँ।"

.. "क्या ?"

"तुम एक जिम्मेवार मिलिट्री अफ़सर हो और मैं तुम्हें अँधेरे में

नहीं रखना चाहता।"

"मैं समझा नहीं, डाक्टर !"

"तुम्हें जीवन तो अवश्य मिल गया है, किन्तु खेद है कि मुझे तुम्हारी कुछ खुशियाँ छीननी पड़ी।"

"डाक्टर'..!"

"हाँ, वासुदेव ! तुम्हारे जीवन के लिए मुझे विवशतः ऐसा करना पड़ा । गोली जाँघ में बहुत गहरी चली गई थी।"

"तो...?"

"प्रापरेश्न करते समय मुझे तुम्हारी कुछ ऐसी नसें काटनी पड़ी जो फिर नहीं मिल सकतीं।"

वासुदेव आश्चर्यचकित डाक्टर की ओर देखने लगा। उसकी समझ में कुछ न पा रहा था कि डाक्टर क्या कहना चाहता था । किन्तु जब उसते मुह मोड़कर धीमे स्वर में उससे कहा, "वासुदेव ! अब नपुंसक हो गये हो और स्त्री-सम्भोग के योग्य नहीं रहे," तो उसके मस्तिष्क पर एक हथौड़े की सी चोट लगी। उसका रोम-रोम कांप उठा ..."उसे यू लगा मानो किसी ने उसकी युवा-आकांक्षाओं का गला घोंट दिया हो कोई बर्फ का तोदा उस पर आ गिरा हो और उसका शरीर सुन्न हो गया हो। वह सिर निहोड़ाये चुपचाप हस्पताल से बाहर निकल प्राया।

राजेन्द्र को उसका दुख और विवशता जानकर एक आघात सा लगा । उसे स्वयं से घृणा होने लगी। माधुरी के विचार से भी उसका सीना जलने लगता "उसने अपने मित्र की पीठ में खंजर घोंपा था'.. कितना गिरा हुआ कार्य था."उसे अपने मानव होने पर भी शंका होने लगी।

वासुदेव में कितया धैर्य था. 'सचमुच वह देवता था.. अपनी पत्नी के विरुद्ध उसने एक शब्द मुह से न निकाला और माधुरी'? वह उसे पत्थर समझती है "कितनी शीघ्र वह अपना प्रेम और कर्तव्य सब कुछ भूल गई. उसे वासुदेव के यह कहे हुए शब्द स्मरण हो पाये, "मैं अब जान पाया कि प्रेम कुछ नहीं"इसका प्राधार कामुकता पर है... और वह यदि न हो तो प्रेम एक धोखा है, अलावा है ..."

रात भर वह इन्हीं विचारों में उलझा रहा और सवेरा होने की प्रतीक्षा करता रहा । उसने सोचा, क्यों न वह यह स्थान छोड़कर चला जाये और आजीवन उसे अपना मुह न दिखाये।
 
उसने रात ही को भाग जाने की सोची, किन्तु सहसा उसे फिर वासुदेव के दुख का विचार पाया और उसके पांव रुक गये।

अबको वह उसे धोखा न देना चाहता था।

"यह क्या?" "वासुदेव ! अब प्राज्ञा चाहिये।"

"पागल' तो नहीं हो गये.."तुम नहीं जा सकते ।" वासुदेव ने उसके हाथ से लेकर कपड़े अलमारी में रख दिये और फिर बोला, "याद है, तुमने एक वचन दिया था ?"

"क्या ?"

"मुझे मझधार में छोड़कर न जानोगे।"

• "मैं तो स्वयं डूब रहा हूँ, तुम्हारी क्या सहायता करूँगा ?"

"कभी तिनके का सहारा भी बहुत बड़ा सहारा बन जाता है।" "तुम तो जानते हो अब मेरा यहाँ रहना तुम दोनों के लिए अच्छा

"ऐसा तो तुम सोचते हो राजी ! मैं नहीं । मन की बात कह दूं ?"

"तुम्हारी दो दिन की संगत में माधुरी का जीवन बदल गया... तुम दोनों के मन में प्रेम का नव-संचार हुआ है 'इस बस्ती को फिर से उजाड़ने में क्या लाभ...?"

"यह तुम कह रहे हो?" "हाँ, मैं ही कह रहा हूँ.... 'मेरा और माधुरी का यही सम्बन्ध है

कि वह दुनिया वालों के सामने मेरी पत्नी है किन्तु, मैं उसके जीवन को यू नीरस' बनाये रखू, यह करना मेरे लिये सम्भव नहीं.''अब मेरी यही इच्छा है कि तुम दोनों सुखी रहो तुम दोनों युवा हो, तुम्हारा पहले का प्रेम है 'भगवान इस प्रेम को बनाये रखे, इसी में मेरी प्रसन्नता

___"परन्तु, वासुदेव ! यह कितनी विचित्र बात है इस से तुमको

जलन न होगी ?"

- "जलन ! मुझे तो अब जीवन भर ही जलत रहेगी. परन्तु उस निर्दोष को भी अपनी ज्वाला में क्यों धकेलू !"

"तो क्या स्वयं उसे यह पाप करने को कहोगे स्वयं अपनी प्रांखों के सामने...?" - "इस पाप का भार तो मुझ पर है "उस पर नहीं।"

"नहीं-नहीं"तुम उसके साथ मुझसे भी यह पार करायो यह सम्भव नहीं।"

___ "तो राजेन्द्र ! क्या यह अच्छा होगा कि वह मुझे छोड़कर एक दिन किसी और के साथ भाग जाये और मैं किसी को मुह न दिखा सकू..". वह दूसरों के सामने मेरा रहस्य खोल दे और लोग मेरा उपहास उड़ायें और मैं तंग आकर आत्महत्या कर लू...?"

राजेन्द्र यह सुनकर सटपटा गया । उससे कोई उत्तर न बन पहा और वह मुट्ठियाँ भींचता हुआ खिड़की के पास जा खड़ा हुआ ! अभी पी ही फटी थी। उसने दूर क्षितिज में झांका, उसे किसी प्रकार चैन न था । वासुदेव उसके पीछे आ खड़ा हुआ और धीरे से बोला-~--

'किसी दूसरे के पास जाने से तो अच्छा होगा कि वह तुम्हारी हो जाये तुम्हारा यह उपकार मैं जीवन भर न भूलूंगा।"

'एक बार फिर सोच लो, वासुदेव !" बह मुड़ते हुए बोला। -- "यह सब कुछ सोच-विचारकर ही कह रहा हूं।"

"तो एक वचन देना होगा।"

"क्या?"

"तुम हमारे प्रेम में बांटा न बनोगे."और माधुरी पर कभी प्रगट न होने दोगे कि तुम उससे असा करते हो।"

"घृणा" ! मैंने उससे सदा प्रेम किया है और प्रेम करता रहूँगा।" "वह कहाँ है ?" राजेन्द्र ने पूछा।

"सो रही है । तुम उसे जगा लामो मैं सैर के लिए घोड़ों का प्रबन्ध करता हूँ।"

"उसे तुम स्वयं ही जगायो।"

"नहीं भाई ! चले भी जाओ,"~-वासुदेव ने मुस्कराते हुए कहा और बाहर चला गया।

राजेन्द्र ने उसकी मुस्कराहट में छिपी हुई पीड़ा का अनुमान लगाया। वह कैसा पति है जो अपनी पत्नी को दुराचार की खाई में धकेलकर अपने मन की शान्ति खोज रहा है ? कहीं वह उसकी परीक्षा तो नहीं ले रहा ? उसकी समझ में कुछ न पा रहा था कि वह क्या करे "इतनी बड़ी मानसिक समस्या उसके सामने उत्पन्न हो सकती है, यह उसने कभी न सोचा था
 
अनमने मन से यह माधुरी के कमरे की ओर रवाना हुआ। बरामदे में रखे फूलों के गमलों से उसने गुलाब का एक फूल तोड़ा और मुट्ठी में । रख लिया। - माधुरी अपने बिस्तर पर न थी। उसने चारों मोर दृष्टि दौड़ाकर देखा । स्नान गृह का बार खुला था जिससे प्रगट हो रहा था कि वह अभी-अभी भीतर गई है। वह पर्दे की प्रोट में खड़ा होकर उसके बाहर पाने की प्रतीक्षा करने लगा।

'थोड़ी ही देर में वह बाहर निकली और तौलिये से मुंह पोंछती हुई दर्पण के सामने केश सँवारने लगी। राजेन्द धीरे-धीरे दबे पांव

उसके पीछे जा खड़ा हुआ और गुलाब के फूल को उसके पूड़े में टाँकने लगा। दर्पण में छाया सो देखकर माधुरी झट से मुड़ी और राजेन्द्र को देखकर उखड़े हुए सांस में बोली ---

"मोह ! पाप"इस सम ?"

फूल राजेन्द्र के हाथ से फर्श पर जा गिरा! माधुरी ने घबराहट में चारों ओर देखा और नीचे झुककर पूल उठाने लगी। उसी समय राजेन्द्र भी मुका। दोनों के हाथ टकराये. और शारीर में एक सिहरन सी दौड़ गई। माधुरी का हाथ ढीला पड़ गया। राजेन्द्र ने फूल उठा लिया और मुस्कराकर उसकी ओर देखते हुए बोला

."अनुमति हो तो इसे तुम्हारे बालों में टॉक दूं।"

लज्जा से माधुरी के मुख पर घबराहट सी उत्पन्न हुई । राजेन्द्र समझ गया और नीचे संकेत करते हुए बोला---

"तुम्हारे पति महोदय तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं ।"

"कहाँ ?"

"नीचे "ड्योढ़ी में ""

घोड़ों पर घूमने का विचार है।"

"मुझसे तो नहीं कहा ।"

"किन्तु, मुझको तुम्हें ही लाने के लिये भेजा है।' यह जानकर कि वासुदेव नीचे है, माधुरी ने सांत्वना की सांस ली और फिर से दर्पण में देखने लगी । राजेन्द्र ने बढ़कर फूल उसके जूड़े में टोंक दिया। ____"कहिये, रात कैसे कटी ?" माधुरी ने होटों को सिकोड़ते हुए धीमे

स्वर में पूछा। ..

"जैसे-तैसे कट ही गई."हँसकर गुजारे या इसे रोकर गुजार दें।" राजेन्द्र ने अन्तिम वाक्य बड़ा धीरे-धीरे रुक-रुककर बोला। माधुरी मुस्करा दी और बोली, "और अब दिन कैसे कटेगा?" . "वह भी तुम लोगों के संग कट जायेगा।"

"यदि मैं साथ न जा सका तो...?" "तो वासुदेव को अकेले ही जाना पड़ेगा।

और प्राप ?" "मैं."मेरा क्या है.."तुम्हारे बिना तो मैं न जा सकूगा।"

यह उत्तर सुनकर माधुरी चुप हो गई और दर्पण में अपने आपको देखती रही। वह भी मान वहा उसे देखता रहा। नीचे से घोड़ों के हिन हिनाने की ध्वनि पाई तो दोनों चौंककर एक दूसरे को सकने लगे।

राजेन्द्र ने समीप आकर पूछा -----

"क्या विचार है ?" "प्राय चलिये.मैं कपड़े पहनकर अभी आई।"

कुछ दर बाद नीनों घोड़ों पर सवार झील के किनारे-किनारे बड़े जा रहे थे । अभी सूर्य न निकला था। हवा के झोतल झौंकों ने तीनों के मस्तिष्क से एक बोझ सा हटा दिया था। घोड़ों की डोर थामे वह मास-पास के लक्ष्य में खोये चले जा रहे थे "अपनी-अपनी धुन में, अपनी अपनी कल्पना में, बिना बात चीत किये ।

बस्ती को वह बहुत पीछे छोड़ आये थे। सहसा यह देखकर कि वासुदेव उनसे बहुत आगे निकल चुका है, माधुरी पाश्चर्य में पड़ गई । वह दोनों अपने विचारों में इतने गुमसुम थे कि उन्हें पता भी न चला वह बाब उनकी छोड़कर भागे चला गया। उसने दृष्टि फिराकर राजेन्द्र की ओर देखा भीर हया से लहराती हुई लटों को संभालते हुए बोली---

"आप नहीं गये ?"

"कहाँ ?"

"उनके साथ

"घोड़ा दौड़ाने ?"

"तुम्हें अकेला छोड़कर यह कैसे हो सकता है ?"

"आज न जाने क्यों अकेले ही रहने को मन चाहता है।"

"तो ठीक है.'","-राजेन्द्र ने कहा और घोड़े को एड़ लगा दी।

माधुरी ने ऊँचे स्वर में पुकारकर उसे रोकना चाहा, किन्तु क्षण भर में

ही वह दूर पहुंच चुका था। __ थोड़ी ही देर में घोड़ा दौड़ाते हुए वह वासुदेव से जा मिला और उसके घोड़े से घोड़ा मिलाते बोला, “तुम इतनी दूर कहाँ चले आये ?"

"एक हिरन देखा था "न जाने कहाँ चला गया?" वासुदेव ने बंदूक कंधे पर लटकाते हुए उत्तर दिया और फिर उसे अकेला देखकर पूछने लगा, “माधुरी कहाँ है ?"

"पीछे आ रही होगी।"

"अच्छा होता जो तुम उसके साथ रहते अकेले में डर न जाये।"

"डरने की क्या बात है ?" राजेन्द्र ने असावधानी से पूछा।

"स्त्री ही तो है.. देखो ! मैं अपने शिकार की खोज में जंगल में जाता हूँ, तुम यहीं उसके आने की प्रतीक्षा करो । लौटते में मिलेंगे।"

बासुदेव यह कहकर क्षण भर में घोड़े को एड़ लगाकर प्रोझल हो गया । राजेन्द्र । ने घोड़े का मुह पीछे की ओर मोड़ लिया और माधुरी को देखने लगा।

थोड़ी देर में वह भी घोड़ा दौड़ाती, हांफती हुई श्रा पहुँची और बोली, "यह क्या? मुझे अकेले छोड़ पाए ?"

"तुम्हीं तो अकेलापन चाहती थीं।"

"बात तो पूरी सुन ली होती।"

"क्या ?"

"अकेलापन चाहती थी, किन्तु आपके साथ ।"

"तो लो, मैं आ गया।"

“यह आज आपको हुआ क्या है ?"

"क्या ?"

"यह अनूठापग"कुछ बने-बने दीख रहे हैं ?"

"नहीं तो 'बड़े दिनों पश्चात् घोड़े की सवारी की है, इसीलिये ।"

"मैं कौन सी घुड़सवार हूँ"","--उसने कहा और फिर क्षण भर रुककर पूछा, "वह कहाँ चले गये ?"

 
"सामने जंगल में हिरन का शिकार करने ।" राजेन्द्र ने दूर जंगल की ओर संकेत करते हुए उत्तर दिया। ___हूँ..." वह नाक चढ़ाते बोली, “वास्तविकता को छोड़कर कल्पना के स्वर्ण-मृग के पीछे भागते फिरते हैं ।"

"चलो, इसी बहाने हमारा मिलन तो हो जाता है।"

"ऐसा मिलन भी क्या जो मन को एक धड़ का सा लगा रहे..., हर आहट में एक घबराहट छिपी हो।"

"ठीक है माधुरी! किन्तु, बिल्कुल आजाद जीवन में भी कोई आनन्द नहीं"हल्का-हल्का उर ही तो प्रसन्नता को बढ़ाता है।"

"छोड़िये इस वाद-विवाद को मैं तो थककर चूर हो गई,"--- उसने घोड़े को बिल्कुल पास लाते हुए कहा ।

'अभी तो प्रारम्भ ही है और तुम थक गई..."आगे चलकर क्या होगा?" ,

- "प्रारम्भ तो जीवन की दौड़ का है. मैं घोड़ा दौड़ाने की बात कर

"मोह ! मैं समझा तुम प्रेम से थक गई हो. 'अच्छा, प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।"

"किसकी ?"

"तुम्हारे पतिदेव की।" राजेन्द्र ने 'पति' के शब्द को चबाकर बोलते हुए कहा । उसे यूअनुभव हुआ कि यह शब्द माधुरी को काँटे के समान लगा हो । कुछ देर दोनों चुप रहे और फिर राजेन्द्र बोला- .

"तुम्हारे शिकारी-पति पर बड़ा तरस आता है।"

"क्यों ?"

"स्वयं शिकार के पीछे चला गया है और अपना 'धन' यहाँ छोड़ गया है।"

"आप पर भरोसा जो है।"

"हाँ ! जानती हो, क्या आदेश दे गया है ?"

"क्या?"

"मेरी माधुरी अकेले में डर न जाये "उसके साथ रहना।"

. "इसीलिए आप मुझे अकेला छोड़कर भाग जाना चाहते थे।" ..

"चाहता तो नहीं किन्तु होगा ऐसा ही।"

"तो शाप मुझे छोड़ जायेंगे ?"

"माधुरी ! न जाने क्यों, कुछ ऐसे ही विचार पाते हैं..." ....

क्या ?"

"कि मैं कोई महा पाप कर रहा हूँ.."जो मित्र मुझ पर इतना विश्वास करता है उसी का विश्वासघात कर रहा हूँ... उसी के यहाँ चोरी कर रहा हूँ।" ... माधुरी ने उसकी बात सुनी और तीव्र दृष्टि से उसे देखा । वह आगे कुछ और कहना चाहता था, किन्तु माधुरी घोड़े को पगडंडी पर डालकर आगे बढ़ गई । कुछ देर चुपचाप खड़ा वह उसे जाते हुए देखता रहा और जब वह पेड़ों में प्रोझल हो गई, तो धीमी चाल से उसने भी घोड़ा पगडंडी पर डाल दिया।

वातावरण में एक चीख ग*जी । घोड़े पर बैठा राजेन्द्र सिर से पाँव तक कीप गया और तेजी से उसी ओर बढ़ा जिधर माधुरी गई थी । उसको चीख अभी तक उसके कानों में गज रही थी । न जाने अचानक उसे क्या हो गया था।

कुछ दूर उसने माधुरी के घोड़े को खड़े हुए देखा ! माधुरी नीचे धरती पर बेसुध पड़ी थी। सोच ही रहा था कि उसके गिरने का क्या कारण हो सकता है कि उसकी दृष्टि थोड़ी दूर पर एक पेड़ के तने पर पड़ी, जहाँ एक लम्बा साँप रेंगता हुआ ऊपर चढ़ रहा था।..

राजेन्द्र शीघ्रता से नीचे उतरा और माधुरी का सिर हाथों में थाम कर उसे पुकारने लगा। जब पुकारने पर वह सुध में न आई तो उसने उसे बांहों में उठा लिया। इस विचार से कि कहीं वह सांप के काटे से बेसुध न हो गई हो, उसने उसे अपने आगे घोड़े पर डाला और सरपट घोड़ा दौड़ाता पर की ओर मुड़ा। माधुरी का घोड़ा भी उसके पीछे पीछे भागता चला पाया।

घर पहुँचने पर भी वह सुध में न आई । राजेन्द्र ने उसे गंगा की सहायता से नीचे उतारा और उसके कमरे में लाकर पलंग पर लिटा दिया। गंगा को उसने पानी लाने के लिये भेजा और स्वयं उसकी बाहों को टटोलकर साँप काटे का निशान देखने लगा ! साड़ी का घेरा खिसका कर उसने पाँव और पिंडलियों को भी छूकर ध्यानपूर्वक देखा, किन्तु उसे साँप काटे का कोई चिन्ह दिखाई न दिया। उसके शरीर को निहारते हुए उसे कुछ संकोच हुआ ! उसके सिर को दोनों हाथों से झंझोड़ते हुए अपना मुंह उसके कान के पास ले जाते हुए उसने फिर पुकारा, "माधुरी .""माधुरी!"

एकाएक माधुरी के हाथ उठे और उसके गले में पड़ गये। उसकी आँखें अभी तक बन्द थीं। राजेन्द्र घबरा सा गया और हड़बडाकर उसकी ओर देखने लगा। माधुरी ने बाहों की जकड़ और कड़ी कर ली और आँखें खोलकर मुस्कराने लगी।

"तो क्या तुम...?"

"बेसुध थी. "पापके शरीर के स्पर्श से सुध में प्रा गई।"

"झूठ "तुम मुझे बनाती रहीं।"

"यदि ऐसा न करती तो आपका हृदय कैसे पिघलता और इतनी दूर से मुझे उठाकर कौन लाता ?"."

"तो तुम मेरी परीक्षा ले रही थी ?"

"प्रेम में कुछ ऐसी ही परीक्षाएं आती रहती हैं।" . .

"मैं तो समझा था कि तुम्हें साँप..."
 
"मैं तो समझा था कि तुम्हें साँप..."

"काट जाता तो अच्छा था यह हर दिन का झगड़ा तो मिट जाता।"

"कैसा झगड़ा?"

"आपकी चिन्ता "उनका क्रोध और अपने मन की पीड़ा न जाने इसका अन्त क्या होगा ?"

"हाँ, न जाने ..

शब्द अभी राजेन्द्र के मुह में ही थे कि द्वार पर आहट हुई और वह झट अलग हो गये । माधुरी फिर प्रांखें मूंदकर बेसुध हो गई । राजेन्द्र ने मुड़कर देखा, गंगा पानी का गिलास लिये भीतर आ रही थी।

राजेन्द्र ने गंगा के हाथ से गिलास ले लिया और माधुरी के मुख पर पानी के छींटे मारने लगा। माधुरी ने धीरे-धीरे आँखें खोल दी।

और गंगा की ओर यू देखने लगी, जैसे उसे पहचानने का प्रयत्न कर रही हो। राजेन्द्र ने पानी का गिलास गंगा को लौटा दिया और गर्म चाय

का प्याला लाने को कहा । - __गंगा जब बाहर चली गई तो माधुरी तकिये का सहारा लेकर बैठ गई। पानी के छींटों से उसके मुख पर ताजगी आ गई थी और उसके मुस्कराते हुए होंट तो यू लग रहे थे मानो पोस में नहाकर कोई अध खिली कली खुल रही हो । माधुरी ने उसे तौलिया देने का संकेत किया। उसी समय राजेन्द्र की दृष्टि खिड़की से नीचे ड्योढ़ी में पड़ी । वासुदेव भी लौट आया था और घोड़ा बांध रहा था। क्षण भर के लिये यह भौंचक सा स्थिर उसे खड़ा देखता रहा। माधुरी ने पूछा -- . ..."क्या है ?" . .

"कुछ नहीं.. देख रहा था अभी वासुदेव नहीं लौटा।" "किसी हिरन का पीछा कर रहे होंगे।"

राजेन्द्र उसके पास बैठ गया और स्वयं तौलिये से उसका मुख पौंछने लगा ।.माधुरी ने पलकें बन्द कर ली और उसके स्पर्श का आनन्द उठाने

लगी।

राजेन्द्र के कान वासुदेव के पाँव की चाप पर लगे हुए थे। सांस रोककर वह कांपते हुए हाथों से उसके गाल पोंछ रहा था। उसी समय धीरे-धीरे पीछे से वासुदेव भीतर आया और द्वार पर लगे हुए पर्दे के पीछे छिप गया । राजेन्द्र ने उसे भीतर माते हुए देख लिया था, किन्तु माधुरी पर उसे प्रकट न होने दिया ।

उसके मुख पर दृष्टि टिकाये तौलिये से वह उसका मुंह सुखा रहा था कि सहसा काँपकर रह गया । माधुरी ने उसकी कम्पन को अनुभव किया और झट उसकी कलाई थामते हुए पूछा----

"क्या हुमा ?"

"अनजाने में तुम्हारे माथे की बिंदिया पौंछ डाली।"

"तो क्या हुग्रा?"

"यह तुम्हारे सुहाग का चिह्न था।" . .. . ...

"सुहाग ! तुम इसे सुहाग कहते हो? मुझ से पूछो 'निरन्तर तीन वर्षों से यह सुहाग भीगी रातों में अंगारों पर जलता है'चाँदनी में सिर पटककर तड़पता है, तारों की छाया में मन मसोसकर लोटता है... ऐसे सुहाग का तो मिट जाना ही अच्छा है ...राजी...! सच पूछो यह माँग अब भी खाली है."यह माथा इस चाह में है कि इस पर सुहाग का चिह्न हो "यह अंग-अंग एक सहारे का इच्छुक है "क्या तुम सहारा न दोगे "क्या तुम स्वयं अपने हाथों से यह बिदिया न लगाओगे' 'यह माँग न भरोगे?"

राजेन्द्र सुनता रहा और वह कहती रही पागल सी होकर वह अपने आप को भूले जा रही थी। राजेन्द्र ने देखा पर्दा हिल रहा था। उसने माधुरी के मुंह पर हाथ रखकर उसका बोलना बंद कर दिया और उसे दोनों हाथों से पकड़कर ठीक प्रकार से बिठाते हुए बोला, "देखो ! गंगा चाय लाई है "दो बूंट पी लो "अभी ठीक हो जाअोगी।" ..

मंगा को देखकर माधुरी ने शरीर को ढीला छोड़ दिया। राजेन्द्र गंगा को उसे चाय देने का संकेत करके बाहर चला गया । माधुरी विस्मय से उसे देखने लगी।
 
पर्दा अभी तक हिल रहा था। वासुदेव पीठ किये गोल कमरे की ओर जा रहा था। राजेन्द्र ने उसे मुड़ते हुए देख लिया था । कुछ क्षण तक वह बाहर निकल कर खड़ा सोचता रहा और फिर उसके पीछे-पीछे गोल कमरे की ओर चला गया। वह माधरी के प्यार की भाँकी दिखाकर उसके मन की प्रतिक्रिया देखना चाहता था। ____ कमरे में प्राह्ट हुई और वासुदेव ने तेजी से मुड़कर देखा । नौखट का सहारा लिये राजेन्द्र उसकी ओर देख रहा था। वासुदेव के मुख पर हल्का सा दुख और क्रोध उत्पन्न हुआ और उसने मुंह फेरकर भरे हुए स्वर में रुकते-रुकते पूछा, "गंगा कह रही थी 'माधुरी को सौंप ने काट खाया है ?"

"उसे तो नहीं काट खाया. किन्तु तुम्हारे मन में अवश्य डंक लगा

"राजी!" वह तमतमाकर चिल्लाया और मुड़कर उसे देखने लगा। राजेन्द्र शान्त खड़ा मुस्करा रहा था। मित्र को क्रोध में देखकर वह बोला ___"मैं न कहता था कि जो मुझसे मांगा है उसे देख न सकोगे 'अब भी मुझे जाने दो और मुझे यह विचित्र नाटक खेलने पर विवशन करो।"

"नहीं राजी ! ऐसी बात नहीं."मन ही तो ठहरा, लाख संभालने पर भी भर पाता है-अब ऐसा न होगा।"

थोड़ी देर दोनों एक दूसरे को देखते रहे और फिर वासुदेव ने पूछा, - "अब वह कैसी है ?"

चिन्ता न करो'"साँप डसना केवल एक बहाना था-"

"तो...?"

प्रेम का नाटक...".-राजेन्द्र ने धीरे से कहा और उसकी पीठ ठोंकते हुए अपने कमरे में चला गया। वासुदेव अवाक् मूर्ति बना वहीं

खड़ा रहा ।

आकाश घटाटोप हो रहा था। हवा बंद थी, पत्ता तक न हिलता था और सर्वत्र एक सन्नाटा था। राजेन्द्र की आँखों में नींद न थी। उसकी सांस घुटी जा रही थी और वह बेचैनी से रह-रहकर करवटें बदल रहा था। - काली भयानक रात किसी पाने वाले तूफान की प्रतीक थी। उसकी आँखों के सामने वासुदेव का मुख फिर गया "वह कितना दुखी था." वह पर्दे के पीछे छिपा अपनी पत्नी को दूसरे से प्यार करते देखता रहा और हिला नहीं. विष के बूंट पी गया कितना धैर्य है उसमें वह उसके स्थान पर होता तो अवश्य सामने आकर कुछ कर बैठता "वह अनोखा पति था, जो जान-बूझकर अपने आप को कुएँ मैं धकेल रहा था । ""यह कैसी आत्महत्या है उसी समय उसे वासुदेव के यह शब्द याद आये, 'राजी! तुम्हारा मुझ पर यह बड़ा भारी उपकार होगा. मैं नहीं चाहता कि वह किसी और के साथ भाग जाये और लोग मेरी हँसी उड़ायें ... मेरा अपमान करें'''इससे तो अच्छा होगा कि वह तुम्हारी हो रहे ""मुझे प्रसन्नता ही होगी। यह विचार आते ही यह तड़प गया." प्राज वह बेबस था और इसीलिये अपनी पत्नी से डरता था वरना जो व्यक्ति एक मस्त घोहे को वश में ला सकता है, वह क्या पत्नी पर अधि कार नहीं पा सकता"परन्तु नहीं, यह कैसा विचार है "वह सच कहता है, प्रेम एक ढोंग है जिसका आधार केवल वासना पर है वह उसकी वासना-पूर्ति नहीं कर सकता, वरना ऐसे पवित्र-हृदय व्यक्ति को माधुरी कभी धोखा न दे सकती। इन विचारों से उसे उलझन होने लगी । तकिये के नीचे से उसने सिग्रेट की डिबिया निकाली और सुलगाकर पीने लगा। उसने खिड़की का पर्दा हटा दिया।

एकाएक उसे यू लगा जैसे कोई द्वार पर खड़ा उसे भीतर धकेलने का प्रयत्न कर रहा हो । पहले तो उसने कोई ध्यान न दिया, किन्तु फिर जब किसी ने किवाड़ खटखटाया तो वह उठकर खड़ा हो गया। दबे स्वर में किसी ने उसका नाम लेकर पुकारा । यह माधुरी की आवाज थी जो उसे किवाड़ खोलने के लिये कह रही थी। - राजेन्द्र ने बत्ती जलानी चाही, किन्तु फिर कुछ सोचकर रुक गया। कुछ देर खड़ा सुनता रहा और फिर उसने चिटखनी खोल दी । किवाड़ खुला और माधुरी भीतर आई। इससे पूर्व कि राजेन्द्र उस पर कोई प्रश्न करता, उसने तेजी से मुड़ते हुए किवाड़ बन्द कर दिया। कमरे में फिर मौन सा छा गया और दोनों घबराये से एक दूसरे को देखने लगे।

"क्यों, कुशल तो हो?" राजेन्द्र ने साश्चर्य पूछा।

"जी""यूही चली आई।"

"यू ही चली आई ?" राजेन्द्र ने उसका उत्त र दोहराया।

"जी ! आप ही ने तो कहा था, प्रेम में कभी बड़े साहस से काम लेना पड़ता है।"

'किन्तु, इतनी अधीरता से नहीं।" ___

"अधीरता..? तड़-तड़पकर जल मरने को तुम धैर्य कहते हो "यही ना..?"

___ "उसका उत्तर सुनकर राजेन्द्र चुप रहा । उसने अंधेरे में उसकी आँखों में एक विशेष चमक देखी ''गुलाबी रंग की चमक, जो मनो

भावना के बहुत उभरने पर ही उत्पन्न होती है। उसने धीरे से पूछा

"वासुदेव कहाँ है ?"

“सो रहा है 'आनन्द की नींद ।”

"श्रोह !" उखड़े हुए सांस में उसने कहा और माधुरी की अधखुली आँखों में झाँकते हुए उसकी भरी-भरी नर्म बाँहों को हाथों में संभाला जो उसको अपनी लपेट में ले लेने के लिये व्याकुल हो रही थी । वह असमंजस में था कि इस बढ़ते हुए तुफान को किस प्रकार रोके।

- उसने अपने मन की दशा माधुरी पर प्रकट न होने दी और उसके शरीर को अपनी बाँहों में संभालते हुए बोला, "बड़ी गर्मी है. किवाड़ खोल दूं।" ___

"ॐ हूँ!" माधुरी ने उस से अलग हटकर खिड़की भी बन्द कर दी। राजेन्द्र का मन भीतर ही कांप सा गया। वह किवाड़ के साथ लगकर खड़ा हो गया । उसका मन एक विचित्र दुविधा में था। बाढ़ सब बाँध तोड़ चुकी थी। उसे रोकना व्यर्थ था और उसमें डूब जाना निर्लज्जता थी। उसको समझ में कुछ न पा रहा था कि वह क्या करे। माधुरी उसके पलंग पर लेट गई ।

राजेन्द्र ने बाहर का किवाड़ खोलकर अंधेरे में झांककर देखा । दूर दीवार से लगी उसे एक छाया सी चलती हुई दिखाई दी। उसका अनुमान ठीक ही था। वह वासुदेव था, जो माधुरी का पीछा करते हुए उसी ओर पा रहा था।

राजेन्द्र के मन को प्राघात सा लगा। उसने झट किवाड़ बन्द कर दिया और उसके साथ लगकर बाहर की आहट सुनने लगा। वह जानता था कि इतना कुछ कहने पर भी वासुदेव अवश्य उसका पीछा करेगा। पति चाहे कितना ही बेबस और निर्लज्ज अथवा उदार-हृदय क्यों न हो, अपनी आँखों से यह सहन करना सहल नहीं।

"कोई है क्या ?" माधुरी ने उसे किवाड़ से यू लगे देख, धड़ उठा कर पूछा।

"कोई नहीं. केवल भ्रम ।” राजेन्द्र ने होंटों को दबाते हुए उत्तर दिया। __

_वह सांत्वना की साँस लेकर फिर लेट गई। राजेन्द्र उसकी बेकली को ठीक अनुभव कर रहा था। वह धीरे-धीरे उसके पास गया और बिखरे हए बालों को समेटने लगा। उसके कान बाहर ही लगे हुए थे। वह फिर खिड़की के पास जा खड़ा हुआ और वासुदेव के पैरों की आहट सुनने लगा, जो खिड़की के पास आकर बन्द हो गई थी । उसे विश्वास हो गया कि वह खिड़की के साथ लगकर उनकी बातें सुन रहा है। घबराहट में वह अपने हाथों को उँगलियाँ तोड़ने लगा।

एकाएक उसके शरीर को एक धक्का सा लगा और वह काँप गया । जब सँभला तो उसने माधुरी को पीठ से लगी पाया। उसकी नर्म और भरी हई बाँहें पीछे से उसके वक्ष पर पहुँच गई थीं। राजेन्द्र ने उसे हटाया नहीं और उसके हाथों को अपनी हथेलियों में लेकर खड़ा रहा। उसके नर्म और गर्म शरीर के स्पर्श से उसके अस्थिर मन को एक शान्ति सी मिली।

"राजी !" माधुरी ने लम्बी साँस खींचते हुए धीरे से कहा।

"यूखड़े क्या सोच रहे हो ?"

“सोच रहा हूँ कि नदी बढ़ी आ रही है, मैं प्यासा हूँ''

'बढ़ने का साहस नहीं.

"पाँव रुक-रुक जाते हैं।" ___
 
"क्यों राजी ! जी भरकर प्यास मिटा लो नदी तो स्वयं तुम्हारे चरणों में लोट रही है।" ..

"किन्तु, इसके लिये तो झुकना पड़ेगा।"

"इतना भी न झुकोगे क्या ? यह तरंगें तुम्हारे होंटों को चूमने के लिये व्याकुल हैं।

"किन्तु, कब तक?" वह एकाएक मुड़ा और उसकी गालों को अपने दोनों हाथों में लेकर बोला, "जब यह उतर जायेंगी तो क्या होगा ? वही प्यास 'वही विवशता बल्कि तड़प और भी बढ़ जायेगी।"

माधुरी उसके उत्तर पर विचार करने लगी। राजेन्द ने लपककर खिड़की का पर्दा हटा दिया और तेजी से दोनों किवाड़ खोल दिये । एक परछाईं झट पीछे हटी और दीवार से लग गई । पत्तों की खड़खड़ाहट और किसी के भागकर चलने ने सब भेद खोल दिया। खिड़की के शीशे में से वह भली भांति वासुदेव को देख रहा था । उसको अपने इतना समीप पाकर राजेन्द्र का भय कुछ घट गया था। माधुरी की ओर मुड़ते हुए वह बोला, "इधर आ जायो""देखो हवा कितनी भली लगती है !"

"इसे बन्द ही रहने दीजिये।"

"क्यों ?"

"कहीं कोई आ न जाये ।" ।

"तो क्या हुआ"

एक दिन तो निडर बनना ही होगा।"

"आप सच कहते हैं। इस दिश-दिन की तड़ए इस भय, इस प्यास "इन सब को समाप्त क्यों न कर डालें ?" ___

"कैसे ?" राजेन्द्र ने इस शब्द पर बल देते हुए पूछा और चोर-दृष्टि से शीशे में से वासुदेव को देखा।

"कहीं भाग चलें।" माधुरी ने राजेन्द्र की आँखों में आँखें डालकर कहा।

यह उत्तर सुनते ही राजेन्द्र ने फिर वासुदेव की ओर देखा । इसी समय अचानक आकाश पर चन्द्रमा निकल आया। दोनों की दृष्टि एक साथ ऊपर को उठी । घटाएँ फटकर अलग हो गई थी और वातावरण निखर आया था। दोनों भली प्रकार एक दूसरे को देख रहे थे।

"यह चाँद कहां से निकल पाया ?"

"यही तो प्रेम का साक्षी है।"

"तो राजी ! विलम्ब क्यों.."आज रात ही..."

"इतना शीघ्न ?"

"अच्छा अवसर है. दोनों साथ हैं."चाँद अभी छिप जायेगा.. अँधेरे में नाव झील में डाल देंगे।"

"परन्तु, जायेंगे कहाँ ?"

"कहीं भी इतना बड़ा देश है।"

राजेन्द्र ने माधुरी की आँखों में देखा । आज वह प्रेम के लिये कड़े से कड़ा कष्ट झेलने को भी तैयार थी। उसने धीरे से पूछा---

"तो तुम अपनी बात पर दृढ़ हो ?..'चलोगी?"

"हाँ ! आपको कोई शंका है क्या ?"

"नहीं, तुम पर शंका तो नहीं अपने आप पर से ही विश्वास उठ गया है । तुम सच कहती हो, इतना बड़ा देश है। कहीं भी जा छिपेंगे." किन्तु, धन भी तो चाहिये।"

"दो बरस तक आराम से रहने के लिये तो मेरे पास पर्याप्त है।"

"नहीं माधुरी ! यह क्या थोड़ा है कि मैं तुम्हें अपने मित्र से छीन कर ले जाऊँ.."उसके धन को चुराकर मैं नहीं भागना चाहता।

माधुरी सुप रही और हाथ बढ़ाकर खिड़की बन्द करने का प्रयत्न करने लगी। राजेन्द्र ने उसका हाथ पकड़कर रोक लिया।

"क्यों ?" उसने प्रश्नसूचक दृष्टि उठाते हुए पूछा।

"बन्द हवा में मेरी साँस घुटने लगती है।"

"डरती हूँ कोई आ न जाये ?" । .

“कौन आयेगा वासुदेव के अतिरिक्त यहाँ और कोई है ही कौन ?"

. "उन्हीं की बात तो कर रही थी।"

"उससे मत घबरानो "तुम ने स्वयं ही तो कहा था कि वह पत्थर की मूर्ति है उसमें भावनायें नहीं. वह केवल पशुओं को वश में करना । जानता है 'मानव-हदय की भाषा नहीं समझता।"

"नहीं राजी ! मेरा अभिप्राय यह नया कहीं उन्होंने देख लिया । तो सब बनता हुमा काम बिगड़ जायेगा।"

"नहीं, माधुरी ! यू कहो कि बिगड़सा हुमा काम संवर जायेगा।"

"कसे ?"

- मैं चाहता हूँ कि वह हमारी बातें सुन ले और हमें यू अंधेरे में प्रेम । करता पकड़ ले।" उसने शीशे में बासुदेव की ओर ध्यानपूर्वक देखते हुए कहा।

"यह पाप आज क्या कह रहे हैं ?"

"ठीक ही कह रहा हूँ.. मैं यह नहीं चाहता कि मैं उसकी पीठ में छुरा माई - मैं तो चाहता हूँ कि वह स्वयं अपनी आँखों अपने प्रेम का अन्त देख ले.."और हम दोनों को अपने हाथों विवशता के बंधनों से मुक्त कर दे ।"

"ऐसा कभी हुआ है ? उन्होंने देख लिया तो हम कहीं के भी न रहेंगे

"और जो यहां से भाग गये तो कहाँ के रहेंगे ?" - "मेरा अभिप्राय था कि मैं उनके सामने आने का कभी साहस न कर सकूगी।"

"माधुरी !" टूटे हुए शब्दों में उसने कहा,

"हमें प्रेम के लिये बड़ी से बड़ी आपत्ति का भी सामना करने के लिये तैयार रहना चाहिये

"चाहे बह स्वयं वासुदेव ही क्यों न हो।"

__ शब्द अभी राजेन्द्र के मुंह पर ही थे कि वासुदेव अंधेरे से निकल कर खिड़की में आ गया और बिल्कुल उनके सामने या खड़ा हमा । उसके चेहरे पर दुख और माथे पर पसीना अन्तर के उस मानसिक संघर्ष के साक्षी थे जिस से उसे दो-चार होना पड़ा । माधुरी ने उसे देखा और चीखकर अलग हट के द्वार की ओर भागी । राजेन्द्र ने लपककर उसे पकड़ना चाहा, किन्तु वह तेज़ी से बाहर निकल गई।

जाते-जाते उसने वासुदेव के यह शब्द भी सुन लिये जो वह राजेन्द्र से कह रहा था, 'तुम्हें अपने प्रेम के लिये मुझे बलपूर्वक मार्ग से हटाने का कष्ट न करना पड़ेगा 'मैं तो स्वयं ही हट जाऊँगा।'

और वह कुछ न सुन सकी और सहमी हुई, पसीना-पसीना, धड़कते हुए मन से अपने कमरे में लोट आई । जाने दोनों में क्या झगड़ा हुमा, बात कहाँ तक पहुँची 'किन्तु ; उसने और कुछ भी न सुना और भीतर से कमरे का किवाड़ बन्द करके पलंग पर जा गिरी. “एक भय सा उसके मस्तिष्क पर छा गया "उसकी आंखों में बासुदेव का वह रूप फिर गया, जब वह घोड़े को चाबुकों से मार रहा था।
 
कमरे में अंधेरा । क्षण भर में क्या हो गया होगा, वह सोच भी न सकती थी। उसने अपना मह दोनों हाथों से ढक लिया और कपपी को रोकने का व्यर्थ प्रयत्न करने लगी। उसे यू लग रहा था जैसे अभी वासुदेव किवाड़ को तोड़कर भीतर या जायेगा। ' अचानक किवाड़ पर धमाका हुआ। वासुदेव ही था । उसने जोर से किवाड़ खटखटाया और फिर माधुरी का नाम लेकर पुकारा । उसमें न तो उठने का बल था और न इतना साहस ही कि उसके सामने श्रा सके। सांस रोके हाथों से मुख छिपाये वह चुपचाप पड़ी रही। . वासुदेव कोई उत्तर न पाकर चला गया। फिर से मौन छा गया। रात वैसी ही अंधेरी थी। कहीं से कोई आवाज न पा रही थी, किन्तु उसे चैन न था। उसके सोचने की शक्ति मर गई थी वह पागल हो रही थी मन ही मन वह प्रार्थना कर रही थी कि कभी सवेरा ही न हो और वह यूंही रात के अंधेरे में छिपी बैठी रहे ।

रात ज्यों की त्यों मौन थी। कभी-कभी धीमी सी हवा का कोई झौंका पेड़ों के पत्तों को कुछ गुदगुदा जाता और फिर वही मौन, वही सन्नाटा रात आधी से अधिक वीत चुकी थी। बाहर वातावरण में हल्की सी शीत थी, किन्तु भीतर वासुदेव के घर में एक विचित्र आग सुलग रही थी और इसके बुझने का कोई उपाय न था"तीन हृदय भस्म हो रहे थे।

राजेन्द्र ने कमरे की खिड़की खोलकर बाहर झांका। घटाएँ एक बार छटकर फिर एकत्र हो गई थी। उसने असावधानी से गर्दन झटकी

और हाथ में लिया हुमा पत्र लिफाफे में बन्द कर दिया।

लिफ़ाफ़ा थामकर उसने दूसरे हाथ में अपना मूटकेस उठाया । रात के मौन में ही उसने इस स्थान को त्यागने का निर्णय कर लिया था। वासुदेव और माधुरी का आमना-सामना हो गया और यही वह चाहता था कि माधुरी जान जाये कि जिस पर्दे की प्रोट में वह यौवन का रास रचाना चाहती है, वासुदेव उससे अनभिज्ञ नहीं."उसकी कामना-पूर्ति के लिये उसने स्वयं अपने हाथों अपने मन को मार दिया है।

वह धीरे-धीरे पाँव उठाता कमरे से बाहर आ गया । आकाश पर ___घने बादलों के छाने से अंधेरा और गहरा हो चुका था । पाहट को पांव में दबाये वह वासुदेव के कमरे तक पहुँचा। किवाड़ बन्द थे, किन्तु खुली हई दरार से प्रतीत हो रहा था कि भीतर से चिटखनी नहीं लगी। वह क्षण-भर के लिये यहाँ रुका और दरार से लिफ़ाफ़ा भीतर फेंककर तेजी से बरामदा पार करके आँगन में चला पाया। माधुरी का कमरा बन्द था

और वह उससे मिलना भी न चाहता था। इसलिये चुपके से वह ड्योढ़ी से होता हुआ बाहर निकल आया।

झील के किनारे पहुँच कर उसे यू अनुभव हुआ मानो वह पिंजरे से निकल बाहर भाया हो और आज बड़े समय पश्चात् उसने स्वतन्त्रता की साँस ली हो। वह आते हुए वासुदेव से न मिल सका, इस बात का उसे दुख था; किन्तु वह विवश था। अब इससे अधिक वह अपने मित्र के जीवन से खेलना न चाहता था।

उसने सूटकेस को नाव में रखा और एक छिछलती दृष्टि उस विशाल झील पर डाली। आज उसे जीवन बहुत तुच्छ दिखाई दे रहा था, बिल्कुल ऐसी नाव के समान जो बिना पतवारों के पानी के थपेड़ों के सहारे इधर से उधर हिचकोले खाती फिरती हो । अचानक उसे वासुदेव का ध्यान आया और वह उसकी बेबसी की कल्पना करके रो पड़ा। रात के मौन में यह आँसू किसी ने न देखे । आज वह नाटक करते हुए मंच से उठ कर भाग पाया था। उसके मन से एक भारी बोझ उतर चुका था।

ज्योंही उसने नाव का रस्सा खोलना प्रारम्भ किया, उसे किसी के भागने की आवाज आई। उसने गर्दन उठाकर देखा । कोई तेजी से भागता हुआ उसी की ओर पा रहा था । बह नाव छोड़कर उठ खड़ा हुआ और ध्यानपूर्वक पाने वाले को देखने लगा। उसकी घबराहट बढ़ गई और वह साँस रोककर उत्सुकता से भागकर पाने वाले की प्रतीक्षा करने लगा।

उसका अनुमान अब के ठीक न था। आने वाला उसका मित्र नहीं बल्कि माधुरी थी जो हवा की सी तेजी से उसकी ओर भागी चली मा

रही थी। राजेन्द्र के मस्तिष्क पर घोड़े की सी चोट लगी और वह दूर। ही से बोला, "माधुरी ! तुम..."

"हाँ मैं..." उसने हाँपते हुए उत्तर दिया । राजेन्द्र ने एक कड़ी दृष्टि उस पर डाली। वह पई बदलकर हाथ में एक अटैची लेकर धाई थी। राजेन्द्र को उसका निश्चय भांपते देर न लगी। वह बोला-----

"तुम्हें इस समय न आना चाहिए था।" "इसलिये कि तुम रात के अंधेरे में यहां से भाग जामो?"

"हाँ, माधुरी ! दिन के उजाले में अब मैं वासुदेव का सामना न कर पाऊँगा।"

"और मैं...?"

"तुम"तुम तो उसका जीवन हो कोई व्यक्ति अपने जीवन को नहीं ठुकराता "भूल हो जाना तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं।" ___ नहीं राजी ! अब मेरा यहाँ रहना सम्भव नहीं'यदि तुमने भी मुझे ठुकरा दिया तो मैं आत्महत्या कर लंगी।" - "माधुरी ! मैं विवश हूँ"तुम लौट जाओ इसी में तुम्हारी भलाई

-

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___ "वह मैं स्वयं समझती हूँ कि मेरी भलाई किसमें है। "पाप इतना शीघ्र क्यों बदल गये ?" ___"माधुरी, परिस्थिति कभी मानव को बहुत बदल देती है""भावना में पाकर हम बड़ी-बड़ी भूलें कर बैठते हैं. अब भी संभल जायें तो अच्छा है.. मैं किसी के घर की वसन्त लूटकर अपनी झोली भरना नहीं चाहता''यह बात मुझे आजीवन कोसती रहेगी।"

"तो क्या सब बचन भुलाकर, प्रेम से यू विमुख होकर प्राप प्रसन्न रह सकेंगे?"

माधुरी !" उसने काँपते हुए स्वर में कहा और क्षण भर उसकी ओर चुपचाप देखते रहने के पश्चात् फिर बोला, "परिस्थिति को समझो ''देखो तो हम ऐसी अथाह गहराई में गिरते जा रहे हैं जहाँ से निकलना असम्भव हो जायेगा।"

“इसकी मुझे कुछ भी चिन्ता नहीं 'आप मेरे साथ हैं तो मैं बड़े से बड़ा अपमान भी सह सकती हूँ।"

"किन्तु, ऐसा क्यों ?"

"इसका उत्तर चाहते हो तो मेरे मन में झांककर देखो' 'तुम्हारे सिवा यहाँ कोई दूसरा नहीं समा सकता।"

___"इसका क्या विश्वास ?" राजेन्द्र ने उसके मुख से दृष्टि हटा ली

और झील में देखने लगा। उसने अनुभव किया कि वह उसकी बात सुन कर तड़प उठी थी। ____ "तो आप ने मुझ से क्या समझकर प्रेम किया था ? यही सुनाने के लिये ?" यह कहते हुए माधुरी के होंट कॉप रहे थे। इसमें क्रोध की झलक थी।

राजेन्द्र ने एक कंकर उठाकर झील में फेंका और बोला

"जो आज मेरी बनने के लिये अपना सब कुछ छोड़कर चली पाई है क्या उसके लिये यह सम्भव नहीं कि कल मुझसे बड़ी कोई और

आकर्षण शक्ति उसे मुझे भी छोड़ देने पर विवश करदे ?"

"आप केवल मेरी परीक्षा लेने के लिये यह खेल खेल रहे थे ?"

"कैसा खेल ?"

"प्रेम का !"

"माधुरी ! मैं अब जान पाया, यह प्रेम केवल कल्पना है और कुछ . नहीं ""टूटे हुए मन इसमें सहारा हूँढते हैं, किन्तु यह उन्हें कभी भी धोखा दे सकता है।"

"आप ने पहले तो कभी ऐसे विचार प्रगट नहीं किये ।"

"तब इसका ज्ञान न था।"...

"दो घड़ी उनके साथ बैठने से ज्ञान प्राप्त हो गया ?"

"तुमने ठीक जाँचा। उसकी बेबसी ने ही मेरी आँखें खोल दी। तुम ही बतानो उसमें कौन सा ऐसा अभाव है कि उससे नमन किया जा सके. "पाचरण में, शिष्टता में, यहाँ तक कि शारीरिक सौन्दर्य में भी मुझसे बढ़-चढ़कर है किन्तु आज तुम उसे ठुकराकर मेरे साथ भाग जाने को तैयार हो गई 'प्रेम के लिये नहीं ऐश्वर्य के लिये, मानन्द के लिये, बासना-पूर्ति के लिये ''और कौन जानता है एक दिन म

"राजी!" उसने चिल्लाकर उसकी जबान बन्द करनी चाही। उसमें और सुनने का साहस न था। राजेन्द्र चुप हो गया और वह भरी हुई आँखों से दूर शून्य में देखने लगी। ___"हाँ माधुरी ! एक दिन मुझे भी छोड़कर तुम किसी दूसरे के साथ भाग जामोगी।" उसने रुकते-रुकते कहा। . माधुरी की आँखों के सामने अंधेरा छा गया। उसकी बुद्धि ने काम करना छोड़ दिया वह एक ऐसी सीमा पर खड़ी थी जिसके दोनों ओर मृत्यु थी. वह क्या करे ? क्या इतनी दूर पाकर लौट जाना उसके लिये सम्भव था?

वह मोन श्री नीर राजेन्द्र ने उसके मुख पर के बदलते हुए रंगों को निहारा । माधुरी की आँखों में आंसू छलके और फिर वहीं समा गये । उसने धरती पर रखी अटैची को हाथ में लिया और प्रास-पास दृष्टि दौड़ाने लगी।
 
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