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रात मौन थी ! वायु का नाम तक न था! दर मेंढकों के टराने की ध्वनि सुनाई दे रही थी। राजेन्द्र और वासुदेव झील के किनार लट प्रकाश की नीलाहट को निहार रहे थे, जिस पर धीरे-धीरे तारा का जाल फैलता जा रहा था। दोनों चुपचाप किसी गहरी सोच में डूब हुए।
मित्र के मन का भेद जानकर राजेन्द्र को यू अनुभव हो रहा था मानो किसी ने उसके शरीर को सुइयों से छेद डाला हो और उसम हिलने की शक्ति भी न रही हो।
क्या यह सब है? क्या वास्तविकता कल्पना से इतनी भयानक थी ? क्या माज तक वह इस ज्याला में अकेला ही जलता रहा है । \
क्या जीवन में ऐसे भेद भी हैं जो पति अपनी पत्नी से नहीं कह सकता?
ऐसे कितने ही प्रश्न उसके मस्तिष्क में उठे और चक्कर लगाने लगे। उसकी सांस ध्रुटी जा रही थी। उसने कठिनता से गर्दन माड़कर वासु देव को देखा। वह झील के जल की भांति मौन और शात, आकाश का मोर पथराई हुई दृष्टि से देख रहा था।
अचानक एक आवाज हई। दोनों के विचार की कड़ा टूट गई और वह एक साथ उठ बैठे । सामने हाथ में टॉर्च लिये माधुरी खड़ी उन्हें पुकार रही थी।
दोनों बिना बात किये सिर झुकाये घर की ओर चल पड़े। माधुरी पीछे और वह दोनों प्रागे-मागे 'कहीं उसके प्रेम का रहस्य तो नहीं खुल गया ? कहीं इसी बात पर दोनों में झगड़ा तो नहीं हुआ ? दह यह सोचती हुई मन ही मन डरती आ रही थी।
खाना खाते समय भी तीनों चुप थे। किसी ने कोई बात न की, कोई हँसा नहीं, कोई वाद-विवाद नहीं हुआ, बस चुपचाप खाते रहे यू अनुभव हो रहा था मानो तीनों एक दूसरे से डर रहे हों । खाना विष बनकर उनके गले से नीचे उतर रहा था।
राजेन्द्र खाने के तुरन्त बाद अपने कमरे में चला पाया । माधुरी का हृदय धड़क रहा था। उसे अकेले में अपने पति से भय लग रहा था। वह सोच रही थी कि वह अपने कमरे में चला जाए तो अच्छा हो, किन्तु ऐसा न हुआ । वह एक पत्रिका लेकर उसके पास ही पाराम कुर्सी पर टांगें लम्बी करके बैठ गया। थोड़ी देर माधुरी एक मानसिक दुविधा में बैठी रही और फिर धीरे से उठकर दूसरे कमरे में जाने लगी।
अचानक वासुदेव ने पुकारा, "माधुरी !"
अपना नाम सुनकर वह कांप गई और विस्मय से अपने पति को देखने लगी ।
वासुदेव ने उसे पाश्चर्य में देखकर धीमे स्वर में पूछा, "क्या बात है ?"
___“जी!" वह झेंप गई और घबराहट दूर करने का प्रयत्न करने लगी।
"कुशल तो है ? आज कुछ उदास दीख रही हो।"
"नहीं तो.."आप चुप थे "मैं तो..."
"राजी को दूध पहुँच गया ?"
"गंगा से कह दिया था..."
"स्वयं देख लिया करो''वह अतिथि नहीं, मेरा बड़ा प्रिय मित्र
वह चुप रही। ... क्षण भर रुककर वासुदेव फिर बोला, "कहीं वह भूल न जाये, ज़रा देख लेना।"
यह कहकर वह फिर पत्रिका पढ़ने में लग गया।
वह उठी और बाहर चली गई।
- गंगा दूध का गिलास लिए राजेन्द्र के कमरे की ओर जा रही थी। माधुरी ने उसके हाथ से गिलास ले लिया और स्वयं उधर चली। वह बड़ी देर से उससे अकेले में मिलने का यत्त कर रही थी, किन्तु अवसर ही न मिल रहा था।
___ कमरे में हल्का-हल्का प्रकाश था और वह पलंग पर लेटा छत की. ओर देख रहा था। उसने माधुरी को आते हए नहीं देखा । माधुरी ने पहले तो उसे अपने आने की सूचना देनी चाही, परन्तु फिर कुछ सोच कर रुक गई। मेज पर दूध का गिलास रखने लगी तो मेज को हल्की सी ठोकर लगी।
मित्र के मन का भेद जानकर राजेन्द्र को यू अनुभव हो रहा था मानो किसी ने उसके शरीर को सुइयों से छेद डाला हो और उसम हिलने की शक्ति भी न रही हो।
क्या यह सब है? क्या वास्तविकता कल्पना से इतनी भयानक थी ? क्या माज तक वह इस ज्याला में अकेला ही जलता रहा है । \
क्या जीवन में ऐसे भेद भी हैं जो पति अपनी पत्नी से नहीं कह सकता?
ऐसे कितने ही प्रश्न उसके मस्तिष्क में उठे और चक्कर लगाने लगे। उसकी सांस ध्रुटी जा रही थी। उसने कठिनता से गर्दन माड़कर वासु देव को देखा। वह झील के जल की भांति मौन और शात, आकाश का मोर पथराई हुई दृष्टि से देख रहा था।
अचानक एक आवाज हई। दोनों के विचार की कड़ा टूट गई और वह एक साथ उठ बैठे । सामने हाथ में टॉर्च लिये माधुरी खड़ी उन्हें पुकार रही थी।
दोनों बिना बात किये सिर झुकाये घर की ओर चल पड़े। माधुरी पीछे और वह दोनों प्रागे-मागे 'कहीं उसके प्रेम का रहस्य तो नहीं खुल गया ? कहीं इसी बात पर दोनों में झगड़ा तो नहीं हुआ ? दह यह सोचती हुई मन ही मन डरती आ रही थी।
खाना खाते समय भी तीनों चुप थे। किसी ने कोई बात न की, कोई हँसा नहीं, कोई वाद-विवाद नहीं हुआ, बस चुपचाप खाते रहे यू अनुभव हो रहा था मानो तीनों एक दूसरे से डर रहे हों । खाना विष बनकर उनके गले से नीचे उतर रहा था।
राजेन्द्र खाने के तुरन्त बाद अपने कमरे में चला पाया । माधुरी का हृदय धड़क रहा था। उसे अकेले में अपने पति से भय लग रहा था। वह सोच रही थी कि वह अपने कमरे में चला जाए तो अच्छा हो, किन्तु ऐसा न हुआ । वह एक पत्रिका लेकर उसके पास ही पाराम कुर्सी पर टांगें लम्बी करके बैठ गया। थोड़ी देर माधुरी एक मानसिक दुविधा में बैठी रही और फिर धीरे से उठकर दूसरे कमरे में जाने लगी।
अचानक वासुदेव ने पुकारा, "माधुरी !"
अपना नाम सुनकर वह कांप गई और विस्मय से अपने पति को देखने लगी ।
वासुदेव ने उसे पाश्चर्य में देखकर धीमे स्वर में पूछा, "क्या बात है ?"
___“जी!" वह झेंप गई और घबराहट दूर करने का प्रयत्न करने लगी।
"कुशल तो है ? आज कुछ उदास दीख रही हो।"
"नहीं तो.."आप चुप थे "मैं तो..."
"राजी को दूध पहुँच गया ?"
"गंगा से कह दिया था..."
"स्वयं देख लिया करो''वह अतिथि नहीं, मेरा बड़ा प्रिय मित्र
वह चुप रही। ... क्षण भर रुककर वासुदेव फिर बोला, "कहीं वह भूल न जाये, ज़रा देख लेना।"
यह कहकर वह फिर पत्रिका पढ़ने में लग गया।
वह उठी और बाहर चली गई।
- गंगा दूध का गिलास लिए राजेन्द्र के कमरे की ओर जा रही थी। माधुरी ने उसके हाथ से गिलास ले लिया और स्वयं उधर चली। वह बड़ी देर से उससे अकेले में मिलने का यत्त कर रही थी, किन्तु अवसर ही न मिल रहा था।
___ कमरे में हल्का-हल्का प्रकाश था और वह पलंग पर लेटा छत की. ओर देख रहा था। उसने माधुरी को आते हए नहीं देखा । माधुरी ने पहले तो उसे अपने आने की सूचना देनी चाही, परन्तु फिर कुछ सोच कर रुक गई। मेज पर दूध का गिलास रखने लगी तो मेज को हल्की सी ठोकर लगी।