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खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज complete

जाने क्या हुआ कि उसके हाथों की उंगलियों के नाखून एकाएक इंच-इंच भर लम्बे हो गए । चेहरा अचानक ही बदलकर भयानक-सा होगया कि कोई देखे तो चीख उठे । आगे के दो दांत इंचभर बाहर को आ गए । सिर के बाल झुण्ड बनाकर खडे हो गए । अब उसकी चाल में भी बदलाव आ गया था ।

ये अवतारा का असली चेहरा था ।

उसके भीतर का शैताऩ जाग उठा था ।

आगे चलते व्यक्ति को किसी के पीछे आने का अहसास हूआ तो वो ठिठककर पलटा । अंधेरे में उसकी निगाह भवतारा पर पड़ी । कुछ पल उसने भवतारा को देखा ।

भवतारा और पास आ गया ।

जब उसने भवतारा का असली रूप देखा तो खौफ से आंखें खुल गई । मुंह पूरा-का-पूरा खुल गया । शायद वो दहशत से चीखना चाहता था, अपने पास किसी दरिंदे को पाकर ।

उसी पल भवतारा पास पहुचा और उसे जोर से धक्का दिया ।

वो लड़खड़ाकर नीचे जा निरा । उसमें इतनी हिम्मत न थी कि उठ सके । डर के मारे वो सूखे पते की भाति कांप रहा था । आंखें दहशत से फटी हुई थी ।

किताबी दरिदे को पहली बार अपने सामने देखा था । भवतारा के होंठों से मद्धिम-सीं गुर्राहट बार-बार निकल रही थी ।

"क..कौंन हो तुम ?" उसके होठों से थरथराता स्वर निकल । वो नीचे ही गिर पड़ा था।

भवतारा गुर्राहटों के साथ, उसके पास नीचे बैठा । दोनों टांगे फैलाकर शरीर को टांगों में जकड़ लिया । दहशत से कांपकर उसने खुद को छुडाना चाहा, परंतु कोई फायदा न हुआ ।

उसकी टांगों की जकडन से उसने खुद को आजाद कराना चाहा, ,. परंतु नाकाम रहा ।

भवतारा ने उसके सिर के बाल मुटूठी में जकड़े और गर्दन एक तरफ कर दी, उसके साथ ही उसने होठों से बाहर निकले दात उसकी गर्दन की नस में घुसेड़ दिए ।

वो व्यक्ति तड़प उठा ।

लेकिन भवतारा की पकड़ से आजाद न हुआ । उसके शरीर का खून भवतारा के दातों की नली के रास्ते उसके गले मे उतरता जा रहा था ।

अब तो उस व्यक्ति का छटपटाना भी बंद हो गया ।

तीन मिनट तक यही चलता रहा।

कोई दूसरा तब तक गली में न आया था ।

फिर जब भवतारा ने उसके शरीर को छोडा तो वह नीचे लुढ़क गया । उसकी जान खत्म हो चुकी थी ।

भवतारा के होंठों से गुर्राहट निकली ।

ठीक यहीं पल थे कि टॉर्च की तीव्र रोशनी भवतारा के शरीर पर पडी ।

रोशनी में स्पष्ट दिखा कि उसके होंठ-मुह और दांत खून से सने हुए थे । उसने ऊपर रोशनी की तरफ सिर उठाया तो पास के मकान की खिडकी से किसी को झांकते पाया । वो ही उस पर टॉर्च की रौशनी मार रहा था । अगले ही पल औरत की भयपूर्ण तीखी चीख गूंजी । टॉर्च उपर से नीचे आ गिरी और पहले की तरह अंधेरा छा गया ।

भवतारा उठा और गली में आगे बढ गया । अब भवतारा की चाल में मस्ती थी । वो इस तरह झूमते हुए आगे बढ रहा था जैसे भरपूर नशा कर लिया हो । उसके होंठों से अब भी गुर्राहट निकल रही थी ।

गली के आगे बाले मोड पर जाकर वह ठिठका ।

अब वो सामान्य दिख रहा था । उंगलियों के नाखून लुप्त हो गए थे । इसी तरह बाहर को निकले दांत भी मुह में वापस चले गए थे । सिर के बाल ठीक हो गए थे । भयानक हो चुका चेहरा भी अब पहले की तरह सामान्य था, परंतु होठो-दांतों और चेहरे पर खून लगा स्पष्ट नजर आ रहा था ।

भवतारा ने ठिठककर गर्दन घुमाते हुए गली में देखा ।

गली शांत थी । वहां कोई न था ।

उसके वाद भवतारा आगे बढ़ गया । कुछ आगे जाकर, सडक के किनारे उसे टूंटी लगी दिखाई दी तो पानी से वो अपने हाथ-मुंह धोने लगा।

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मंगलू पास की पुलिया पर बैठा भवतारा के आने का इंतजार कर रहा था । रात के बारह बज रहे थे । वो अकेला बैठा-बैठा बोर हो चुका था और साथ ही अपने भविष्य की योजना भी बना रहा था । भवतारा ने उसे पैसा देना था । वो सोच रहा था कि उस पैसे का क्या करेगा । उसे कोई दुकान ले लेनी चाहिए । आराम से कम-धंधा करेगा ।

सारा वक्त उसने इन्हीं सोचो में डूबे बिताया । तब एक बजने को था, जब भवतारा वहाँ पहुंचा ।

"तुम कहीं चले गए थे?" मंगलं ने नाराजगी भरे स्वर में पूछा ।

“काम था ।" भवतारा मुस्कराया । वो फ्रेश और खुश लग रहा था ।

"ऐसा भी क्या काम जो मुझे नहीं ले गए साथ?"

“चलो, अब मैं आराम करूंगा ।"

दोनों उस मंदिर के गेट की तरफ़ ब्रढ़ गए ।

गेट बंद था और भीतर कोई दरबान भी नहीं खडा था ।

"ये गेट तो बंद हो गया, तुम दिन में अपना काम नहीं कर सकते थे ।" मंगलू ने कहा ।

" मेरे काम रात को होते हैँ !"

"अब क्या करें बाहर ही सोना पडेगा ।"

उसी क्षण उस बड़े से गेट के भीतर लगी कुंडी खुद व-खुद खुलने लगी ।

" ये क्या ?" मंगलू के मुँह से निकला ।

"तुमने अमी मेरी शक्तियां देखी ही कहाँ हैं ।"

मंगलू कुछ न कह सका।

गेट खुल गया।

दोनों ने भीतर प्रवेश किया और आगे बढ़ गए । पीछे गेट अपने आप बंद होता चला गया । कुंडी लग गई ।

वे दोनों उसी दीवार वाले रास्ते से होकर गोल कमरे में जा पहुचे ।

“ओह !" भवतारा बैठता हुआ बोला---" जीवित होकर कितना अच्छा लग रहा है ।"

"इसमें अच्छा क्या लगता है?"

"तुम नहीं समझोगे ।"

" अरे ?"मंगलू के होंठों से निकला---" तुम्हारी कमीज पर खून की बूंद कहा से आई ?"

भवतारा ने कमीज की तरफ देखा भी नहीं और मुस्कराकर बोला----"लग गई होगी कहीं से ।"

"खाना खा लिया?"

"हां ।" भवतारा की आखों में तीव्र चमक आ ठहरी ।

"मैंने तो कूछ खाया ही नहीं । जब से चाकू मुझे कूड़े के ढेर से मिला तब से मुझे भूख नही लगी !!

" ये भी मेरी शक्ति का कमाल है तुम जब तक मेऱी सेवा मे हो, तुम्हें मूख नहीँ लगेगी।"

"ऐसा क्यों?"

"मैं नहीं चाहता हूं कि शैतान के सेवक पेट भरने के चक्कर मे अपना वक्त खराब करते रहे । जो मेरी सेवा करेगा, वो हर परेशानी से आजाद हो जाएगा ।" भवतारा ने मुस्कराकर कहा ।

"मैं नहीं चाहता हूं कि शैतान के सेवक पेट भरने के चक्कर मे अपना वक्त खराब करते रहे । जो मेरी सेवा करेगा, वो हर परेशानी से आजाद हो जाएगा ।" भवतारा ने मुस्कराकर कहा ।

"तुम मुझसे खुश हो?" मंगलू ने पूछा ।

"हां, वहुत खुश......!"

"मेरी सेवा में कोई कमी तो नहीं?"

"नहीं । तुम तो मेरे दोस्त हो ।"

"तुमने मुझें दौलत देने का वादा किया था ।" मंगलू बोला-" वो मुझे दे दो !"

"दौलत?" भवतारा ने मुस्कराकर मंगलू को देखा ।

"दौलत चाहिए तुम्हें?"

"हां ।" मंगलू ने फौरन सिर हिलाया ।

"क्या करेगा तू दौलत का?"

" खाऊंगा, ऐश करूणा ।"

"तुझे भूख तो लगती नहीं, फिर क्या खाएगा तू ?" भवतारा मुस्कराया।

" वो..... वो मैं काम करूंगा ।"

"काम करके पैसा कमाएगा?"

" हां ।"

"क्या करेगा पैसा कमाकर?"

" कार खरीदूंगा-मकान खरीदूंगा ।"

"कार और मकान तो मैं तूझें वैसे ही दे दूंगा । तू इस जगह पर रह, कार किसी की भी उठा ले !"

मंगलू भवतारा को देखने लगा ।

"ठीक कहा न मैंने?" भवतारा मुस्कराया ।

"इस तरह तो मैं करूंगा क्या, बोर हो जाऊंगा ।"

"बोर क्यो होगा, तू मेरी सेवा में लगा रह । यहां तेरे को क्या कमी है?" भवतारा उठता हुआ बोला-----“मै अव आराम करूंगा । नीद आ रही है मुझे !"

"लेकिन मुझे दौलत.....!"

"बेकार की बाते न कर ।" भवतारा, कह उठा-" तेरे को दुनिया हर आराम हासिल है। दौलत का तेरे लिए कोई इस्तेभाल नहीं । जब चीज की जरूरत ही नहीं तो उसे मांगता क्यों है?"

वो सीढियों की तरफ बढ़ गया । . ,

मंगलू हक्का-बक्का रह गया ।

"लेकिन तूने तो कहा था कि मुझे ढेर सारी दौलत...... ।"

"मंगलू....." सीढियां चढता भवतारा कह उठा----"मुझे नींद आ रही है, बाद में बात करना ।"

मंगलू भवतारों को देखता रहा ।

भवतारा ऊपर पहुंचा और देखते-ही-देखते अपने कमरे में प्रवेश कर गया ।

मंगलू को अपने सपने टूटते-से महसूस हुए । भवतारा उसे दौलत हैं नहीं दे रहा, जबकि उसके मन में तो सिर्फ एक ही इच्छा थी । ढेर सारी दौलत पा लेने की इच्छा।

मंगलू ने मन-हीं-मन ये इरादा पक्का किया कि वो भवतारा से दौलत लेकर रहेगा ।

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राजन रात को जब होटल पहुचा तो बारह बज रहे थे ।

मोना चौधरी और सतपाल जाग रहे थे ।

सतपाल ने राजन का मोना चौधरी से परिचय कराया, फिर वे लोग एक-दूसरे को शैतान के बेटे से वास्ता रखती सारी बाते बताने लगे । आधे घंटे की बातचीत के बाद राजन उठता हुआ बोला ।

"भूख वहुत लगी है । मैं नहाकर आता हु, तुम खाना मंगवाओ ।" कहकर वो बाथरूम में चला गया ।

सतपाल ने रूम सर्विस को खाना लाने को कहा । वे दोनों पहले खा चुके थे ।

कुछ देर बाद राजन नहाकर बाहर निकला और बोला ।

“तांत्रिक मोहम्मद को खबरी का नाम बताना चाहिए था ।"

"क्या पता नाम वो भी न जान पाया हो ।" सतपाल गंभीर स्वर में बोला------"अपने काम से मतलब रखना चाहिए । हमारे लिए इतना ही जानना वहुत है कि कोई हमे भवतारा के बारे में खबर देगा ।"

"तब तक हम बैठे रहेगें ?"

"बैठना ही पडेगा । अब हपे ये आशा तो है ही कि हमेँ किसी भी वक्त भवतार के बारे मे खवर मिल सकती है ।"

"हां, ये आशा तो मन में है ही ।" राजन ने सिर हिलाकर कहा----“खाना नहीं आया !"

"आने वाला होगा !"

" तुम लौर्गों ऩे डिनर ले लिया?"

" हा !"

राजन बैठता हुआ कह उठा ।

“मेरे खयाल में तात्रिक बेलीराम ने यहाँ से निकलने के लिए गुप्त रास्ता बना रखा होगा । उसी रास्ते से वो मंगलू के साथ वहां से निकलकर शितान के बेटे के शरीर के पास पहुंचा होगा । निकलने के लिए मुख्य रास्ता इस्तेमालं करता तो मुझे अवश्य नजर आता । मैं बहुत अच्छी तरह से वहां पर नजर रख रहा था ।"

खाने के लिए रूम सर्विस को पुन कहा गया ।

कुछ देर बाद वेटर खाना लाया ।

"माफ़ कीजिए साहबजी!” वेटर आते ही बोला-----" खाना लाने में देर हो गई । वो क्या है कि गली में दो लाशें मिलने की खबर मिली, मै देखने चला गया था !"

" लाशें!"

"हा साहब जी, दो लाशें । एक औरत की और एक आदमी । औरत की लाश तो उसके घर की पहली मंजिल की खिडकी पर आधी बाहर और आधी भीतर लटकी है । उसकी आंखें फ्टी पडी हैं, पुलिस का कहना है कि उसने ऐसी चीज देखी है कि दहशत से उसके दिल ने, काम करना बंद कर दिया । शायद उसने टॉर्च से गली में कुछ ऐसा देखा । क्योंकि टॉर्च उसके हाथ से छूटकर गली में गिरी पडी है । औरत के घरवालों ने उसकी टॉर्च को पहचाना !"

"और दूसरी लाश?"

"साहब जी, वो तो गली में पडी है । एकदम निचूड्री हुई, जैसे किसी ने उसका खून पी लिया हो !"

सतपाल चौका ।।

मोना चौधरी भी एकाएक सीधी बैठ गई ।

राजन ने सतपाल को देखा ।

"खुन पी लिया हो?" सतपाल के होंठो से निकला ।

" हां साहब जी, बिल्कुल पीली और सुखी पडी है वो लाश ।"

"मैं दो लाश देखकर आता हूं ।" सतपाल बोला ।

"में भी चलती हूं।" मोना चौधरी उठ खडी हुई ।

"चलो !" राजन कह उठा ।

'साहब जी, खाना ठंडा तो जाएगा !" वेटर के होंठों से निकला ।

" कोई बात नहीं ।"

तो सभी बाहर निकले और तेज-रोज कदमों से सीढियों की तरफ़ बढ गए ।

"कहीं ये काम शेतान के बेटे का तो नहीं?”

"यही आशंका मेरे मन में है "। सतपाल होंठ मींचकर बोला ।

"वो जिंदा हो गया होगा !"

" तांत्रिक मोहम्मद ने इशारा तो दिया था उसके जिन्दा होने का ।" मोना चौधरी बोली ।

" देखते हैं, कहीं वेटर की बात झूठी ही न हो ।"

" गली में दो पुलिस कारे खडी थी, जिनकी हेडलाइट की रोशनी में पूरी गली चमक रही थी । हर तरफ़ पुलिस की खाकी वर्दियां नजर आ रही थी । कुछ और लोग भी तमाशबीनों की तरह खडे थे । गली के घरों से भी लोग झाक रहे थे । पुलिस की एम्बुलेंस गली के बाहर खडी थी ।

लाश अभी भी गली के बीचोबीच पडी थी।

खिड़की वाली औरत की लाश को हटा लिया गया था ।

अब गली में पडी लाश का पंचनामा किया जा रहा था । एक तरफ खडे दो पुलिस वाले बातचीत में और डायरी में कुछ लिखने में व्यस्त थे ।

मोना चौधरी, सतपाल और राजन वहां पहुँचे ।

"क्या हुआ सर?" सतपाल ने एक हवलदार से पूछा।

"मर्डर हो गया है” । उसने कहा------" एक मर्डर, एक का हार्ट फेल ।"

"ओह! कैसे हुआ?"

"तफ्तीश जारी है ।"

“कोई बता रहा था कि लाश ऐसी है, जैसे किसी ने आदमी का खून ही पी लिया हो ।" सतपाल बोला ।

हवलदार ने गली में पड़ी लाश को देखा, जहाँ पुलिस वाले उसे स्ट्रैचर मेँ डालने में व्यस्त थे।

"लगता तो ऐसा ही है ।" हवलदार ने कहा…… "सही बात तो पोस्टमार्टम के बाद ही पता चलेगी ।"

तब तक राज़न लाश के पास जा पहुचा था और पुलिस वालों के साथ उसे उठाकर स्ट्रैचर मे डालने मे सहायता करने लगा ।।

पुलिस बालों ने उसे देखा, पंरंतु कहा कुछ नहीं । लाश के रट्रेचर पर डालने के साथ ही राजन ने, लाश के गले के दोनों ओर देखा ।

अगले ही पल वो जड़ हो गया ।

आशंका सही साबित हुई । गले पर एक तरफ़ दो निशान को स्पष्ट दिखे । बिन्दू जैसे गहरे निशान ।। गले पर हर तरफ़ खून फैला हुआ था ।

"ये गले पर निशान कैसा ।" राजन अनजान बनता पुलिस वालों से बोला ।

"अभी स्पष्ट नहीँ, परंतु लगता है जैसे किसी ने इसका पूरा खून निकाल लिया हो ।" एक पुलिस वाला बोला… उसके बाद लाश यहां फेक दी गई हो" ।

"तुम कौन हो?" दूसरे पुलिस वाले ने पूछा।

"पास ही होटल में ठहरा हू । लाशों के बारे में सुना तो यहां !"

"जाओ, अपना काम करों ।"

राजन वहाँ से हट गया । जो जानना चाहता था, वो तो जान ही चुका था । स्ट्रेचर पर रखी लाश को गली के मोड पर खड़ी एम्बुलेंस तक ले जाया जाने लगा ।

राजन मोना चौधरी और सतपाल के साथ गली के मोड की तरफ बढा ।

"शैतान का बेटा पुन जीवित हैं गया है । उसी का कारनामा है ।" राजन का स्वर गंभीर था ।

" तुम कैसे कह सकते हो ?" सतपाल ने उसे देखा ।

" लाश उठाने के बहाने लाश का गला देखा । गले में एक तरफ जहाँ से खुन की नस गुजरती है, वहीं नन्है-से दो छेद हुए हुए पड़े हैं, जैसे कि दात लगाए गए हों । लाश की हालत बता रही है कि उसमें खून नहीं रहा । पुलिस वाला भी यही कह रहा था कि जैसे उसका खून निकालकर किसी ने यहाँ लाश फेंकी है ।"

"मुझे तो अभी भी विश्वास नहीं आ रहा ।" सतपाल ने गहरी सांस ली ।

“किस बात का विश्वास !" राजन ने उसे देखा ।

"कि ये शैतान के बेटे का कारनामा है ।"

" वो जिंदा हो गया है तो तुमने कहा था खून पीएगा !" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा…" उसका भोजन खून है और इसीलिए उसने पुन: जीवन पाया है ।"

" हां, मैंने ऐसा ही कहा था ।"

"फिर तो तुम्हें मान लेना चाहिए कि ये सब उसी का किया-धरा है ।"

"डर लगता है ।" सतपाल ने चिंतित लहजे में .कहा----"अगर वो सच में जिन्दा हो गया है तो वहुत बुरा होया ।"

“मालूम हो जाएगा । एक रात ओर इंतजार कर लो ।" मोना चौधरी … गंभीर थी……"आज रात उसने ये काम किया है तो कल रात भी करेगा, कल रात ,भी वो किसी का खून पीएगा ।"

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तांत्रिक बेलीराम इस वक्त गहरी नींद में था ।

धोती जैसा कपड़ा उसने कमर के गिर्द और कंधे पर लपेट रखा था । गले में कई तरहं की मालाएं और माथे पर अघमिटा-सा तिलक लगा नजर आ रहा था । उस कमरे में उसके अलावा कोई और न था । आधी रात का वक्त हो रहा था ।

बाबा दूसरे कमरे में सोया हुआ था । बाहर बेलीराम के शिष्यों की नशे भरी आवाजे यदा-कदा सुनाई दे जाती थ्री, परंतु कुल मिलाकर डेरे पर शांति थी । रात के इस सन्माटे के को कभी-कभार जानवरों की आवाजें भंग कर देती थी । एकाएक बेलीराम के कमरे में चांटे की तीव्र आवाज उभरी और बेलीराम तडफड़ाकर उठा ।

"कौन है?" आस-पास देखता बेलीराम गुस्से से कह उठा ।

"मैं हूं।" वहां मोहम्मद की आवाज गूंजी ।

"त. ..तूने मुझे चांटा मारा ।"

अगले ही पल पुन: चांटे की आवाज उभरी और बेलीराम तड़फड़ाकर खड़ा हो गया ।

"होश में आ मोहम्मद! " बेलीराम गुस्से से चीखकर बोला ।

"होश में तो आया हूं अब ।" तांत्रिक मोहम्मद का कड़वा स्वर वहां गूंजा ।

" तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझे चांटा मारने की?" बेलीराम फड़फ़ड़ाया।

" मैँ तो तेरे को उल्टा मी लटका सकता हूं, बोल लटकाऊं क्या?"

" तू झगडा करने पऱ उतारु है?"

"झगड़ा तो तूने कर हीलिया है । मेरी ताकतों की डोरी तेरे चेलो ने क्यों तोडी? ”

" वो मेरे चेलों ने नहीं, भवतारा के शागिर्द ने तोडी थी । जंगला मेरे आदेशों पर नहीं चलता !"

"तुम सब एक हो !"

“वहम है तुम्हारा ।”

" तूने मेरे को चाकू नहीँ दिया ।"

" मोहम्मद ये तू भी जानता है कि वो चाकू तेरे को नहीं दिया जा सकता था । तभी तूने वो ही चाकू मांगा ।"

" अच्छा?" मोहम्मद के हंसने की आवाज आई-----" तू तो बडा समझदाऱ हो गया है । तूने मेरी चालाकी भांप ली ।"

"क्या चाहता हैं तू?”

"मेरे से टकराकर तुम सबने ठीक नही किया !"

"गलती ही गई थी जंगला से, तेरे को परेशान करने का जंगला का कोई इरादा नहीं था ।"

"गलती की सजा भुगतेगा नहीँ?"

" वो सजा जंगला को दे । मेरे से क्या बात करता है ।"

"मैं तो कहूंगा कि उसे शक्तियों की डोरी तोडने को भवतारा ने कहा था।

" भवतारा क्यो कहेगा तेरे को पता है कि भवतारा झगडों में हिसा, नहीं लेंता !"

" तुम सव सजा भुगतोगै।"

बेलीराम का चेहरा कठोर हुआ ।

"भवतारा को झगडा पसंद नहीं, तो इसका ये मतलब नहीं कि तेरी हरकतों पर वो चुप बैठ जाएगा ।"

"मैं जानता हु, वो नम्बरी हरामी है ।"

" भवतारा तेरे की तबाह कर देगा अगर तूने कोई शरारत की तो"

" धमकी देता है , मेरे को धमकी.......!"

"बता रहा हूँ कि कुछ किया तो भवतारा तेरे को छोड़ेगा नहीं ।"

"देखते रहो कि अभी क्या होता है !" मोहम्मद का स्वर तीखा था----"पता तो होगा तेरे को कि, वो फिर से जिन्दा हो गया है ।"

"मालूम है ।"

" कुछ वक्त पहले उसने एक मनुष्य का खून पिया है ।"

"वो तो उसका भोजंन है ।"

"लेकिन एक मनुष्य अपनी जान गंवा बैठा । "

"अभी तो ।" मुस्कराया वेलीराम-" जाने कितने मनुष्यों का खून भवतारा का भोजन बनेगा ।"

"अपना किया भुगतेगा भवतारा ।"

"तू ये बाते भवतारा से क्यों नहीं कहता?"

"क्यों जाऊ मैं उसके पास, मुझे क्या पडी है उसे है समझाने की? क्या वो नहीं जानता कि वो गलत कर रहा है?"

"डरता है तू भवतारा से बात करने में ।”

"हवा मत दे मुझे । मैं तेरी बातों में फ़सने वाला नहीं ।"

"मेरे से क्या चाहता है तू ?"

"समझा दे भवतारां को--------जो कर रहा है, उसका नतीजा बहुत बुरा होगा ।"

"वो महागुरु है मेरा । मैं उससे ऐसी बातें नहीं कह सकता !" बेलीराम ने कहा ।

" उसकी गलत बातों में हां मिलाना ही जानता है ।"

"हम शैतान के उपासक है । यही सब करना और मानना हमारा धर्म है मोहम्मद । यही शिक्षा हमने पाई है !"

तभी चांटे की आवाज उभरी ।

बेलीराम का मस्तिष्क झनझना उठा ।

चांटा जोरदार था ।

"बाज आजा, वरना भुगतेगा !" बेलीराम ने गुर्राकर कहा !

"मैं तो चाहता हूँ कि तू मुझ पर वार करे । कर बार------ एक वार किया । मेरी माला तोडी-----वो सजा तो तुम लोग भुगतोगे ही । दूसरा कर उसकी सजा देता हू । तुझे उसी पल मिट्टी मे मिला दूगा ।"

बेलीराम होंठ भिचे खडा रहा । कुछ नहीं बोला ।

"फिर आऊंगा बेलीराम । बुरा भुगतोगे , तुम संब…!"

उसके बाद तांत्रिक मोहम्मद की आबाज, नहीं आई ।

कई मिनट बीत गए ।

गुस्से में लिपटा बेलीराम शैतान के बेटे को बुलाने के लिए मंत्र उच्चारण करने लगा ।

चंद पल ही बीते कि जंगला की आवाज गूंजी ।

"क्या बात है, शैतान का बेटा नीद में है, क्यों उसे तंग करात है !!"

"तू क्यों आया?" बेलीराम गुर्राया ।

“सुना नहीं तूने । शैतान का बेटा नीद में है । भोजन के पश्चात् वो आराम कर रहा है । क्या चाहता है तू ?"

"तूने तांत्रिक मोहम्मद का धागा तोडकर बहुत बुरा किया।"

"कितनी बार कहेगा ये बात?"

"मोहम्मद ने मेरी पिटाई की !"

"तो तू भी उसे पीटता !"

"एक गलती के बाद दूसरी गलती करता । मोहम्मद की ताकत को तू जानता नहीं ।"

"जानता हू ।"

"उसे शैतान का बेटा ही पीट सकता है, लेकिन मोहम्मद तक पहुंचना किसी के लिए भी आसान् नंहीं ।"

"तूने मोहम्मद को कहना था किं जंगला से बात कर । उसने धागा तोडा है !"

"कहा, लेकिन तेरे बारे में बो सुनता ही नहीं ।"

"शैतान के बेटे को तू क्या कहना चाहता है?"

“मौहम्मद धमकी दे चुका है कि तुम सब भुगतोगे" ।

"उसकी धमकी पर तू परेशान क्यों होता है बेलीराम !"

" बकवास मत कर । वो हम सबको तगड़ा नुकसान पहुचा सकता है ।"

"क्या वो जानता है कि शैतान का बेटा कहाँ पर है?" जंगला ने पूछा ।

“नहीं जानता ।"

"तो वो हमें कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता ।"

" बच्चा है अभी तू मोहम्मद की ताकत नहीं पहचानता ।"

“क्या उसकी ताकत शैतान के बेटे से ज्यादा है?"

बेलीराम ने जवाब न दिया ।

"बोल, चुप क्यों हो गया?"

" जो भी हो , मोहम्मद भी कम नही है । इतना ही जानता हूं मै !"

"ठीक है, शैतान के बेटे तक मैं बात पहुंचा दूंगा, यही बात कहना चाहता था तू.....!"

"ये क्या कम है?"

"मोहम्मद चाहता है कि हम उसके खिलाफ कुछ करें, ताकि उसे हमसे लड़ने का बहाना मिले ।" बेलीराम ने शांत और गभीर स्वर में कहा----“वो उकसा रहा था मुझें कि मैं उसे मारू ।"
 
"मैंने धागा त्तोड़ा । मोहम्मद चाहे तो मुझें खत्म करके सजा दे सकता है, लेकिन वो मुझे कुछ कहता क्यों नही !"

"वो झगड़ा करना चाहता है ।"

" मुझे तो लगता है कि बात कुछ और ही है ।"

" क्या?"

"यहीँ तो पता नहीं ।" जंगला की सोच भरी आवाज गूंज रही थी…"मोहम्मद का इस तरह बार-बार धमकी देना, मुझे तो अजीब-सा लगता है । जाता हु--तेरी बात शैतान के बेटे तक पहुंचा दूंगा !"

उसके बाद जंगला की आवाज न आई ।

तांत्रिक बेलीराम कमर पर हाथ बाधे टहलने लगा !

रात सरकती जा रही थी ।

@@@@@@@@@@@@@@@

सुबह के आठ बजे थे कि सतपाल का मोबाइल फोन बजने लगा ।

सतपाल ने आखें खोली । फोन उठाया और कॉलिंग स्विच दबाकर कान से लगा लिया ।

"हैलो!"

"नींद में हो?” मिथलेश की आवाजं कानों में पडी ।

"अब जाग गया ।" सतपाल बोता-----" कैसा है !"

"ठीक दूंगी। राजन से बात हुई?"

" वो मेरे पास ही है ।"

"तुम्हारे पास…समझा नहीं ।"

“भवतारा जीवित हो उठा है ।"

"ओंह !"

“वहां राजन का कोई काम नहीं बचा था तो उसे मैंने अपने पास बुला लिया ! मोना चौधरी साथ में है और हम तीनों होटेल मे ठहरे हुए हैं । रात शायद भवतारा ने अपना पहला शिकार किया है !"

“इसका मतलवं कि खून पीया किसी का रात में?"

“हां । इत्तफाक से ये सब होटल की गली में ही हुआ । राजन ने लाश देखी उसका कहना है कि भवतारा ने ही ये किया है !"

"इसका मतलब अब हालात खतरनाक होने लगे है ।"

" आज रात भी देखेंगे कि भवतारा, फिर किसी का खून पीता है । उसे, तो हर रात इंसान का ताजा खून चाहिए !"

"तो क्या अभी पूरा भरोसा नहीं कि रात को भभवतारा ने ही...... ।"

"भरोसा है, किर भी हम अपनी तसल्ली कर लेऩा चाहते हैं !"

"सावधान रहना और रात के वक्त कभी भी शैतान के बेटे के सामने मत पड़ना ।" फोन द्वारा मिथलेश की आवाज कानों में पड़ रंही थी---" अंधेरा घिरते ही उसकी ताकते सक्रिय हो उठती है और वो बहुत ताकतवर बन जाता है !"

" इस बात का ध्यान रखूगा ।" .

" तुम जब से गए हो, तब से मैं शैतान के बेटे की बाते पुरानी किताबो मेँ ढूंढ़ रहा हूं।"

" कुछ काम की बात मालुम हुई?"

"हाँ !"

"क्या ?"

अब तक मोना चौधरी और राजन भी उठकर बैठ गए थे । राजन ने रूम सर्विस फोन करके तीन कप चाय के लिए आर्डर किया, परंतु उनका ध्यान बातों पर ही था ।

“एक किताब में स्पष्ट लिखा है कि शैतान का बेटा अगर धरती पर आता है तो उसकी मौत का कारण वो ही चीज़ बनेगी, जिसके सहारे उसने जन्म लिया है ।"

"चाकू !" सतपाल के होंठों से निकला ।

"हां चाकू ही हो सकता है !"

"परंतु वो चाकू तो भवतारा के पास है !"

"ये तुम जानो ,जो किताब में लिखा है, मैंने तुम्हें वो ही बताया है ।"

"किसने लिखी है ये किताब?”

"डेढ सौ बरस पुरानी ये किताब पंडित प्रवीण ने लिखी है । तब का वहुत बड़ा विद्वान था और भविष्यवाणी किया करता था । इन बातों में उसने बहुत नाम कमाया ।"

"जानता हू।”

"करीब दो सौ बरस पहले तांत्रिक रूप सागर ने भी अपनी, किताब में शैतान के बेटे के बारे में भविष्यवाणी की है ।"

"वो क्या कहता है?”

"तांत्रिक रूप सागर की लिखी किताब में शैतान के बेटे से वास्ता रखता सिर्फ एक पैरा है, वै लिखता है कि शैतान का बेटा दोबारा जन्म लेगा और उसकी मौत का कारण कामिनी नाम की युवती बनेगी !"

"कामिनी नाम की युवती !"

"हां ।"

"क्यों-कैसे-क्या इसके बारे मे कुछ नहीं लिखा?"

"जो मैंने तुम्हें बताया है, शैतान के बेटे के बारे में सिर्फ वो ही लिखा है, वस ।"

सतपाल के चेहरे पर सोच के भाव आए।

"मैं और किताबे छान रहा हूँ । कोई काम की वात मिली तो तुम्हें खबर करूंगा ।" मिथलेश की आवाज़ कानों में पडी ।

"ठीक है ।"

"याद रखना, अंधेरे में शैतान के बेटे की ताकतवर शक्तियां जाग्रत हो उठती हैं, तब भूल से भी उसके सामने मत जाना ।"

"मैं ध्यान रखूंगा---तुम फिक्र मत करो । तांत्रिक मोहम्मद मिलने आया था ।"

"मोहम्मद तुम्हारे पास?" मिथलेश की आवाज में हैरानी आ गई थी ।

" हां, मोहम्मद का धागा, जंगला नाम की शैतानी ताकत ने तोड दिया था । मोहम्मद इसी बात का बहाना बनाकर शैतान के बेटे के पीछे पड़ गया है । उसका कहना है कि कोई खबरी देर--सबेर उन्हें भवतारा के बारे में खबर देगा ।"

"खबरी, क्या कोई भेदिया होगा वो ।"

"शायद भेदिया ही हो । मोहम्मद ने कहा कि हम यहीं होटल में ठहरे रहे, जब तक कि खबरी न मिले हमसे ।"

"ओह! ......समझा ।"

"मोहम्मद हमें आगे करके, खुद पीछे से शैतान के बेटे से झगडा करना चाहता है ।"

"ये मोहम्मद ने कहा या तुम्हारा ख्याल है!"'

"मोहम्मद ने ही कहा । वों मेरा कंधा चाहता है ।"

"मेरे खयाल में तो इस बात में कोई बुराई नहीं । मोहम्मद साथ रहेगा तो तुम्हें सुरक्षा भी देगा ।"

"मैंने भी यही सोचा, अच्छा बंद करता हूं।"
 
सतपाल ने फोन बंद करके पास रखा और मोना चौधरी व राजन को देखा ।

तभी वैटर,चाय रख गया । तीनों चाय पीने लगे ।

"दो बाते काम की बताई हैं मिथलेश ने ।" घूट भरता सतपाल गंभीर स्वर में बोला-----"पहली तो ये कि शैतान के बेटे को उसी चाकू से मारा जा सकता है, जिसके दम पर वो जीवित हुआ है ।"

" वो चाकू तो उसी के पास है !"

" हां ।"

" तुम क्या समझते हो कि शैतान के बेटे से चाकू लिया जा सकता है?” राजन कह उठा।

" नहीं लिया जा सकता । "

उसी पल मोना चौधरी कह उठी ।

" दूसरे हथियार से क्यों नहीं मारा जा सकता ?"

" शैतानी ताकते साधारण हथियार से नहीं खत्म होती । इन्हें खत्म करने के लिए जोखिम उठाना पड़ता है, खास तरह के हथियार होते है इन्हें खत्म करने केलिए, जिम्हें मंत्रों से सिद्ध किया गया होता है !"

" ओह !"

"चूंकि वो चाकू शैतान के बेटे का ही है, उसमे मारक शक्ति मौजूद होगी तभी बरसों पूर्व भविष्यवाणी की गई कि उस चाकू से शैतान के बेटे को खत्म किया जा सकता है !"

"जो कि शैतान कें बेटे के पास ही है ।"

"हां, यही वजह है कि हमेँ चाकू का ख्याल छोड देना चाहिए !"

"और दूसरी बात ?"

"दूसरी बात ये बताई मिथलेश ने कि शैतान के बेटे की मौत की वजह कामिनी नाम की युवती बनेगी ।"

" कामिनी । ”

"ये कौन है और. ...!”

"कामिनी के बारे में और कोई जानकारी नहीं मिली कि मिथलेश हमें बताता । मालूम नहीं वो कौन है और कहां रहती है । इन सब सवालों का जवाब भविष्य के गर्भ में है ।" सतपाल का स्वर गंभीर था ।

राजन ने व्याकुल होकर पहलू बदला ।

“क्या जरूरी है कि हम इन बातों पर विश्वास करें । वे बाते झूठी भी हो सकती हैं ।" मोना चौधरी ने कहा ।

"ये बाते झूठी नहीं हैं । जो किताबें हमारे पास हैं, उनमे सिर्फ सच ही लिखा हुआ है ।"

"'इतने भरोसे की वजह."'

"हमारी किताबों की लाइब्रेरी हमारे पिताजी ने _तैयार की थी । पिताजी हर काम ठोक बजाकर पक्का करते थे । अगर उन्हें किसी किताब की किसी बात पर शक होता तो इस बात का वो किताब पर लिख जाते!"

मोना चौधरी ने इस बारे में दोबारा कुछ न कहा ।

राजन चाय का घूट भरते हुए का उठा ।

"तो हमें जाने वाले वक्त का इंतजार करना होगा । 'खबरी' और कामिनी का इंतजार.. !"

“कोई जरूरी तो नहीं कि कामिनी हमेँ मिले ।" सतपाल ने राजन को देखा ।

"क्या मतलब?"

"मिथलेश ने बताया है कि कामिनी नाम की युवती, शैतान के बेटे की मौत की वजह बनेगी । भविष्य के गर्भ मे क्या है, कामिनी कैसे इस मामले में दखल देती है, हमें कुछ नहीं पता। राजन जवाब में सिर्फ सिर हिलाकर रह गया ।

"इस तरह होटल में बैठे रहने का क्या फायदा?" मोना चौधरी ने कहा…"बाहर निकलकर हमें हाथ-पांव तो मारने ही चाहिए कि शायद शैतान के बेटे के बारे में कोई जानकारी मिल जाए ।"

"हां, ऐसा किया जा सकता है !" सतपाल ने सिर हिलाया…"परंतु हम तीनों में से कोई एक हर वक्त इसी कमरे में ही रहेगा, क्या पता वो खबरी कब यहां, आ पहुचे ।"

@@@@@@@@@@@@@@@

दिन के दस बज रहे थे।

मंगलू उठकर, नहा-धोकर तैयार हो चुका था । आज उसने अलमारी से कपड़े निकालकर पहने थे कपडे उस पर जंच रहे थे ।

उसने आईने में खुद को देखा, शानदार लग रहा था बो । ऐसे बढिया कपडे उसने पहली बार पहने थे । अब कोई देखकर ये सोच भी नहीं सकता था कि ये, वो ही मंगलू है, जो दस-बीस रुपए के लिए गंदगी के ढेर में हाथ-पांव मारकर काम की चीज तलाश करता था ।

खुदं को सजा-धजाकर कुर्सी पर बैठ गया और भवतारा के बारे में सोचने लगा ।

उसकी सोच का केंद्र पैसा था । दौलत थी । उसने भवतारा से दौलत लेनी थी, परंतु शैतान का बेटा उसे टरका रहा था, ये तो उसने महसूस कर लिया था ।

मन में उसने पूरा निश्चय कर रखा था कि वो शैतान के बेटे से दौलत लेकर रहेगा । यहां से चला जाना चाहता था बो, यहां जाने क्यों उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था, परंतु वो रुका हुआ था तो सिर्फ दौलत लेने के लिए । उसे पूरा विश्वास था कि देर-सबेर वो शैतान के बेर्टे से दौलत हासिल कर लेगा !!

काफी देर कुर्सी पर बैठे रहने के पश्चात बोर होता वो उठा ओर सीढियां चढकर ऊपर की मंजिल पर जा पहुचा । उसने भवतारा के कमरे में झांका ।

भवतारा पस्त-सा बैड पर फैला, गहरी नीद में सोया हुआ था ।

ये तो जाने कब तक सोया, रहेगा ।

इस विचार के साथ वो पुन: नीचे आ गया । मन में आया कि बाहर चले, कुछ देर बाद लौट आएगा । ये उसे ठीक लगा । वो उसी गुप्त रास्ते से बाहर निकला । इस वक्त मंदिर में ज्यादा भीड नहीं थी । मंगलू टहलता हुआ मंदिर के भीतर प्रवेश कर गया ।

वहां पहुचा जहां शैतान के बेटे की समाधि और बुत था ।

ठीक इसी के नीचे कमरे में शैतान का बेटा सोया हुआ था । समाधि के पास शैतान का वुत मौजूद था जिसे कि कई रंगों में रंगा हुआ था । बुत वास्तव में आकर्षक था । लोग समाधि पर सिर झुकाते, फूल-हार चढाते और जाने क्या मांगकर चले जाते ।

मंगलू को ये सब आडम्बर लगा ।

वो मंदिर से बाहर निकला और मैन गेट की तरफ़ बढ़ गया । ये सोचकर उसे बहुत अच्छा लग रहा था कि उसे कोई देख नहीं पारहा । वो गेट से बाहर निकल आया और जानता था कि अव उसे लोग़ देख पा रहे है ।

टालता हुआ वो आगे बढा और सड़क के किंनारे वनी उसी पुलिया पर जा बैठा, जहाँ वो रात बैठा शैतान के बेटे के लौटने का की इंतजार कर रहा था । सड़क पर से लोग आ जा रहे थे ।

अभी उसे बैठे कुछ वक्त ही हुआ था कि सामने से उसे एक युवती आती दिखी । जिसने कि दोनों बांहों में प्रेस किए ढेर सारे कपड़े उठा रखे थे । जो कि उसके चेहरे के आगे आ रहे थे औंर रास्ता देखने के लिए वो सिर को दाएं-बाएं घुमा रही थी । उसने गुलाबी रंग की कमीज सलवार और ऊची एडी वाले गोल सैडिल पहन रखे थे । बालों की चुटिया करके पीछे को बांध रखे थे ।

ज्योंही वो मंगलू के सामने से निकली तो मंगलू ने टोका।

"गिर जाओगी ।"

वो ठिठकी, कपडों के पीछे से सिर निकालकर मंगलु को देखा ।

वो खूबसूरत थी । वहुत अच्छी लग रही थी । गोरा रंग, छरहरा शरीर, नाक मे नथनी चमक रही थी । कानों में लम्बे-लम्बे झुमके लटक रहे थे । कलाइयों में कांच की चूडियां थी । उम्र अट्ठारह या उन्नीस की रही होगी ।

तभी वो पुलिया के पास आई और बोली ।

"लो हाथ लगाओ ।"

मंगलू ने हाथ लगाया और दोनो बाहों में उठा रखे ढेर सारे कपडों को पुलिया पर रखा और खुद भी बाहें हिलाती पुलिया पर बैठती कह उठी ।

" बापू ठीक ही तो कहता था कि इतने कपडे एक साथ नहीं ले जा सकेगी । आधे ले जा, लेकिन मैं ही थी जो कि जिद पर अडी रही कि ले जाऊंगी !" साथ ही उसने गहरी सांस ली ।

"बापू?" मंगलू ने उसे देखा ।

" उधर पास ही रहता है, धोबी है ना, कपड़े प्रेस करता है ।"

" और तुम क्या करती हो?"

"मैं, तो पढती हूं । अब छुट्टियां हो गई तो बापू के काम में हाथ बंटाना पड़ता है । बूढा है ना ।"

" मां नही है !"

" है क्यों नहीं-उसकी भी उम्र कहा रही भाग दौड़ की , शरीर में दर्द होता रहता है ।"

"ओह! "

" लेकिंन खाना वगैरह बना देती है यही बहुत है!" वो मुस्करा कर बोली ।

मंगलू उसे देखने लगा ।

" ऐसा क्या देखता है।"

" तुझें देखता हूं , बहुत अच्छी है !"

" सच मेरे ये झुमके कैसे है ? आज ही पहने है !"

"वहुत अच्छे हैं, लेकिन तू ज्यादा अच्छी है।"

" धत.....!"

"कसम से । तेरे को पहले किस ने नहीं कहा क्या?"

"कहा है !"

" किसने ?"

" मेरी सहेली ने स्कूल में वो मेरे साथ ही पढती है । वो कहती है कि मैं सुन्दर लगती हूं !"

मंगलू मुस्कराता हुआ उसे देखता रहा ।

" ऐसे मत देख.....!"

" क्यों?"

" पता नही यहां दिल मै कुछ-कुछ होता है।"

"ऐसा पहले भी कभी हुआ है ?"

" नही तो पहले नहीँ हुआ !! आज पहली बार होरहा है !" उसने भोलेपन से कहा !!

" इसका मतलब मैं तेरे को अच्छा लगा हूं।"

" तू मेरे को क्यों अच्छा लगेगा ? मैं तो तेरे को जानती तक नहीं !"

" नही जानती तो जान लेगी।"

" कैसे जानूंगी?"

" ऐसे ही बातें कर-करके मेरा नाम मंगलू है !"

" मगंलू हूं ......लेकिन मैंने तो तेरे पहली बार देखा है । तू यहा पर क्या कर रहा है ?"

" मैँ यहां बैठा हूं ! उधर बो मंदिर में काम करता हूं।"

"मंदिर में तेरे को पहले कभी नहीं देखा ।"

" नया काम हे ।"

"ओह समझी ।" उसने सिर हिलाया ।

मंगलू पुन उसे निहारने लगा ।

"तू फिर बैसे ही देखता है।"

"तू मुझे अच्छी जो लगती है ।" मंगलू ने मुस्कराकर कहा ।

"धत ! अच्छा ये वता तू यहीं बैठा है अभी?"

" हां, क्यों?"

"मैं मंदिर में प्रेस किए कपडे देकर आती हूं । बाकी कपडों का तू ध्यान रखंना-अभी आई ।"

"ठीक है !"
 
उसने आधे कपड़े उठाए, फिर मंगलू को देखकर मुस्कराकर बोली----"मैं अभी आई।"

"नाम क्या है तेरा ?"

"कामिनी ।" उसने खिलखिलाते हुए कहा और कपडे लिए मंदिर के गेट की तरफ वढ़ गई ।।।

मंगलू उसे जाते देखता रहा।

वो सच से मंगलू को अच्छी लगी थी ।

मंगलू पास रखे प्रेस किए कपडों पर हाथ फेरता रहा । नजरें उसकी मंदिर के गेट की तरफ ही रहीं । जल्दी ही वो लौट आई और आते वक्त वो हाथ में पकडे पैसों की गिनती कर रही थी।

पास आते ही पैसे उसने मुट्ठी में पकडे और मंगलू से बोली । "मैं जल्दी आ गई ना?"

"हां ।" मंगलू मुस्कराया-"ये कपड़े तूने कहा ले जाने है ?"

"वो उधर पास की गली में।"

मंगलू उठा और कपडों को अपने हाथों में उठाता बोला ।

"चलो ।"

"कहां?"

"जहां ये कपड़े देने हैं । मै उठाकर ले चलता हूँ ।" मंगलु ने कहा ।

"ना बाबा ना, बाद मे तुम मजदूरी के दो रुपए मांगोगे तो मैं कहां से दूंगी । बापू तो हिसाब के बहुत पक्के हैं, एक-एक पैसा र्गिनकर लेते हैं , तो मैं क्या जवाब दूंगी कि दो रूपये कहां गये?" वो भोलेपन से बोली।

"मजदूरी मत देना ।"

"फिर ठीक है, चलो ।" मंगलू उसके साथ चल पड़ा ।

"तुम सबके काम मुफ्त में करते हो?”

"पहली बार तुम्हारा काम कर रहा हूं !"

"मेरा क्यों?”

"क्योंकि तुम मुझे अच्छी लगी हो।”

"धत, जो भी तेरे को अच्छा लगेगा, तू उसका काम करेगा ।”

मंगलू चलते-चलते पुन: उसे देखने लगा ।

"फिर ऐसे देखते हो मुझें।”

"मजदूरी ले रहा हूं।"

"मुझे देखकर?"

"हां ।"

"ठीक है, देखते रहो, लेकिन अभी मत देखना । तुमने कपडे उठा रखे हैं । ठोकर लगी तो गिर जाओगे और सारे कपडे भी खराब हो जाएंगे । तुम बाद में मुझे देख लेना ।"

"बाद में कब?"

" जब कपड़े दे देगे । तब हम पुलिया पर बैठ जाएंगे, । तब दो मिनट मुझे देख लेना ।"

"सिर्फ दो मिनट ।"

" हां मुझे घर भी जाना है, बरना बापू डाट लगाएंगे कि इतनी देर से क्यो आई ।"

"ठीक है ।" दोनों एक नाली में पहुचे ।

वहाँ कामिनी ने एक घर से कपड़े देकर पैसे लिए और वे वापस चल दिए।

"तो तुम मंदिर में काम करते हो?”

"हां ।"

"रहते कहां हो?"

"'मंदिर में ।"

"अच्छा किसके लिए, क्या काम करते हो?"

"है कोई, तुम रोज मंदिर में कपड़े देने आती हो ?" मंगलू ने पूछा।।

" छुट्टियां है, अब तो रोज ही आना पडेगा । मंदिर वालों के इतने कपडे होते हैं, कई बार तो दिन में दो बार आना पड़ता है ।"

"थकान हो जाती होगी?"

"थकान तो नहीं होती । सामने का तो रास्ता है ।" कामिनी ने हाथ उठाकर कहा ।

"जब कपडे नहीं देने होते तो तब क्या करती हो?"

" पढ लेती हूं , जब पढने का मन नहीं होता तो चौधरी कै बगीचे में चली जाती हूं ।"

" चौधरी का बगीचा?"

""हा, वहां आम लगे होते हैं । कच्चे आम तोड़ लाती हूं । कभी चौधरी देखता है तो पीछे भागता है, लेकिन आज-तक वो मुझे पकड नहीं सका, मैं बहुत तेज दौड़ती हू !" कामिनी हंसते हुए कह उठी ।

पुलिया आ गई थी ।

कामिनी पुलिया पर बैठते हुए बोली ।

" लो मै बैठ गई । अब तुम भी बैठो और दो मिनट मुझे देख लो ।"

मंगलू मुस्कराया ।

"जल्दी करो, मुझें घर भी जाना है । बापू देख रहा होगा कि मैं कहाँ मर गई ।"

मंगलू बैठा और कामिनी को देखने लगा ।

कामिनी के चेहरे पर मुस्कान थी । वो भी मंगलू को देख रही थी ।

"मैं तुम्हें कैसा लगता हूं !" मंगलू ने पूछा ।

"ठीक हो । तुम्हारा चेहरा बुरा नहीं है ।"

" तुम्हें कैसा लगता हूं !"

" ठीक ही हो, ये सब सवाल मत पूछो । तेरे से मैंने व्याह तो करना नहीं है !"

"ब्याह नहीं करना?"

"नहीं ।"

“क्यों ?"

"व्याह के लिए तो बापू ही लड़का देखेगा । क्या मैं बापू से जाकर कहु कि कि मैंने लड़का पसंद कर लिया है । मेरा व्याह कर दो । ऐसा कहते हुए मेरी जुबान न कट जाएगी ।" कामिनी ने तेज स्वर में कहा ।

"तुम मुझे पसंद कर लो, मैं तुम्हारे बापू से बात कर लूगा ।"

" धत ऐसे थोड़े ही न होता है । बस तुम्हारी मजदूरी चुकता हो गई, अब मैं चलती हू !"

“अभी तो एक मिनट भी नहीं हुआ । तुम तो दो मिनट के लिए.....!"

"अब इतनी भी बेवकूफ नहीं हूँ जो मिनट-दो मिनट का हिसाब न लगा सकूं !"

"मैंने तो तुम्हें अभी ठीक से देखा भी नहीं ।"

"मेरा वापू मुझे दूंढ़ताहुआ आ गया तो तुम्हें उल्टा लटका देगा, साथ में मुझे भी । वो कहता ,ज्यादा देर मैं बाहर न रहा करूं । अब मैं बड़ी हो गई हू।” कामिनी ने गर्दन को झटका देकर कहा ।

"तुम बड़ी कहाँ-----अभी तो दस साल की हो ।"

"पूरे अटूठारह की हूं मैं । आने वाली सदियों में उन्नीस की हो जाऊंगी । हां ।”

मंगलू मुस्कराया ।

"तुमने मेरी उम्र पूछी नहीं ।"

"बता-तेरी उम्र कितनी है?”

"इक्कीस बरस और मैं...!" आगे की बात मंगलू पूरी न कर सका ।

“मंगलू !"

मंगलू फौरन चौंककर उठा । पीछे भवतारा खड़ा था ।

भवतारा चमक-भरी निगाहों से कामिनी क्रो ही देख रही था ।

“यहां क्या कर रहे हो मंगलू?" भवतारा की निगाह कामिनी के जिस्म पर फिर रही थी ।

कामिनी असुविधा-सो महसूस करने लगी ।

"तुम नीद में थे कि मैँ बाहर घूमने......!" मंगलू ने कहना चाहा ।

"ये कौन है?" भवतारा की निगाह कामिनी से न हटी थी ।

"कामिनी नाम है इसका । उस तरफ़ कहीं धोबी है । उसकी बेटी है । मंदिर में कपडे देने आइ थी ।"

“काफी खूबसूरत है, हसीन है, इस पर से तो नजरे ही नहीं हट रहीं ।" भवतारा कह उठा ।

मंगलू का दिल किया कि कामिनी से कहे कि वो चली जाए ।

तभी कामिनी कह उठी ।

"मैं जाती हूं मंगलू ?" कहने के साथ ही मुड्री और तेज-तेज कदमों से आगे बढ़ गई । भवतारा की निगाह जाती कामिनी पर ही रही । ये देखकर मंगलू को मन-ही-मन गुस्सा आ गया।

"क्या बाते हो रही थीं?" भवतारा ने मगंलू को देखा ।

"यूं ही, बातें क्या होनी हैं ।" मंगलू ने लापरवाही से कहा। दूर जाती कामिनी ने एकबार पलटकर उन्हें देखा था, परंतु रुकी नहीं ।

"मुझें ये अच्छी लगी ।" भवतारा बोला।

मंगलू मन-ही-मन उखड़ा ।।

मंगलू ने देखा, भवतारा नहा-धोकर-नए कपडे डाले हुए था ।।

"कहीं जाना है क्या?" मंगलू ने जान-बूझकर बातों का सिलसिला बढाया ।

"भीतर बैठकर भी क्या करेगे, कहीं घूमने चलते है ।" भवतारा कह उठा ।

"तुमने नाश्ता-लंच वगैरह भी करना होगा ।" मंगलू ने कहा।

" नहीं, मैं सिर्फ रात को ही खाता हूं ।” भवतारा ने शांत स्वर में कहा ।

"तुम्हें दिन में भूख नहीं लगती?"

"मेरी दी शक्तियों से तुम्हें मूख नहीं लगती तो अपनी ताकत का इस्तेमाल मैं स्वयं पर क्यों नहीं करूंगा ।”

“समझा ।"

दोनों सडक पर आगे बढने लगे ।

“तुम्हारे पास कार नहीं है, पैदल ही चलोगे?"

"मुझें पैदल घुमना अच्छा लगता है ।"

मंगलू ने फिर कूछ न कहा।

"कामिनी नाम बताया था तुमने उसका?"

" हां ।" मंगलु मन-ही-मन उबला कि ये कामिनी की बात क्यों कर रहा है?

" बाप धोबी है?”

"लोगों के कपडे प्रेस करता है !" मंगलू ने उखड़े स्वर मैं कहा !

भवतारा चलते-चलते मंगलू को देखकर बोला ।

"नाराज क्यों होते हो?"

"मैं ठीक हूं।"

"क्या कामिनी से तुम्हारा कोई रिश्ता है?"

" नहीं ।"

"फिर तो तुम्हें मेरी बात पर ज़रा भी नाराजगी नहीं दिखानी चाहिए ।"

"मैं कौन होता तुम्हे नारभुजगी दिखाने वाला?"

"तुम मेरे दोस्त मंगलू?"

मंगलू खामोश रहा ।

"कामिनी कल फिर आएगी तुमसे मिलने?"

"मुझसे मिलने क्यों आएगी ?" चाहकर भी मंगलू अपनी नाराज़गी पर काबू न रख पा रहाथा।

" मैंने सोचा कि उसने कहा हो कि वो कल फिर आएगी या तुमने उसे आने को कहा हो ?"

"मुझे उसमें ऐसा कुछ नजर नहीं आया हैं जो अच्छा लगे ।" मंगलू ने 'जान-बूझकर कहा ।

"तुम मेरी नजरों से देखोगे तो वो तुम्हें दुनिया की एकमात्र हसीन युवती लगेगी ।" भवतारा कह उठा ।

मंगलू जैसे भीतर-ही-भीतर सुलग उठा ।

"ये बेकार की बाते छोडो । इन बातों में मेरी दिलचस्पी नहीं है ।" मंगलू बोला ।

"ठीक है । ये बात नहीं करते । तुम्हारी क्या किसी खास वात में दिलचस्पी है?"

" हां, पैसे में…दोलत में…तुम मेरा पैसा दो, जो तुमने देने का वादा किया था ।”

"फिर वो ही बात?" भवतारा मुस्करा पडा------"तुम्हें पैसे के अलावा और कुछ नहीं सूझता ।"

उसकी बात पर मंगलू कुढकर बोला ।

"मैँ तुमसे भीख नहीं मांग रहा हूं तुम्हारा काम किया है, उसके बदले पैसा मांग रहा हूं तुमने वादा किया था कि...!"

"मैंने कब कहा वादा नहीं किया ।"
 
“तो मेरा पैसा दो ।"

"दूंगा , परंतु अभी तुम्हें कुछ इंतजार करना होगा ।"

" क्यों ?"

"मेरा पैसा आने वाला है कहीं से?"

"आने वाला है कहीं से . . . क्या मतलव ?"

"मैंने अपना पैसा कहीं रखा हुआ है, वो आते ही तुम्हें दौलत से भर दूंगा !"

"कब ?"

"एक-दो या चार दिन की बात है । तुम्हें पैसा जरूर दूंगा ।"

मंगलू खामोश रहा ! चलते हुए भवतारा ने उसके कंधे पर हाथ रखकर मुस्कराते हुए कहा ।

"तुम मेरे दोस्त हो ना !"

"मेरे पैसे दो, फिर मुझे दोस्त कहना ।"

" पैसा तुम्हें अवश्य दूंगा । मैंने तुम्हें दोस्त माना है दिल से । अब नाराजगी छोड़ दो ।"

मंगलू ने कुछ न कहा । वे दोनों बाजार में पहुंच चुके थे ।

भवतारा रोनकी माहौल में नजरे दौड़ाता कह उठा ।

"आह, दुनिया कितनी हसीन है?"

"मेरी नजर से देखी तो हसीन नहीं लगेगी !" मगंलू गहरी सांस लेकर बोला ।

"'क्यों?"

"दुनिया हसीन लगे, इसके लिए पैसा चाहिए ।"

"हमने पैसे का क्या करना है मंगलू? हसीन चीज का लुफ्त लेने में पैसे नहीं लगते ।"

"ठीक कहते हो ।" मंगलू चुभते स्वर में बोला…"सामने वाला मलाई कोफ्ता खाए और हमें इसी बात पर सब्र कर लेना चाहिए कि मलाई कोफ्ते की खूशवू कितनी हसीन है ।"

भवतारा ने मंगलू देखा, फिर हंस पड़ा ।

“इसके अलावा हम कर भी क्या सकते हैं क्योंकि हमें भूख नहीं लती ।"

" पैसा जब जेब में होंगे तो भूख भी लगेगी ।"

" तुम हमेशा नाराजगी भरी बाते क्यों करते हो मंगलू?"

"मेरे पैसे दे दो । तव नाराजगी दूर हो जाएगी ।"

"दूंगा, मेरे पैसे आने दो । मैं तुम्हें वहुत सारे पैसे दूंगा । तू तो मेरा दोस्त है मगंलू !"

भवतारा ने उसका हाथ दबाकर कहा ।

"मैं थकने लगा हूँ । कब तक हम चलते रहेगे?” बोला मंगलू।

"हम घूम रहे हैं ।"

"खाली जेब थकान हो जाती है ।"

"ठीक है, अगर तुम्हारे पास पैसे होते तो तुम क्या करते-बताओ मुझे ।" भवतारा मुस्कराया ।

"बेकार की बात मत करो ।"

"अच्छी बात है । मैं कामिनी की बात करता हूं । वो सच में सुन्दर है, उसे देखा तो मैं उस पर मोहित हो गया । अब भी रह रहकर उसका चेहरा मेरी आंखों के सामने आ रहा है । चंचलता से भरी आंखें, मासूम चेहरा । शोख अदाएं, मसानी चाल, नाक और होंठ की खूबसूरती देखते ही बनती है, जैसे किसी कलाकार ने फुर्सत में उसे बनाया है और.... .!"

"तुम्हारी पसंद वहुत घटिया है ।" मंगलू ने जल-भुनकर कहा ।

"क्यों…क्या तुम्हें कामिनी अच्छी नही लगती?" भवतारा ने पूछा ।

"ज़रा भी नहीं, उसमें मुझे तो ऐसा कुछ नजर नहीं आया, यूं ही तारीफों के पुल बांधे जा रहे हो । साधारण-सी लड़की है । उससे अच्छी लड़कियां तो इस बाजार में घूम रही हैं ।"

"खूबसूरती को पहचानने की तुममें समझ नहीं है ।"

"उसका बाप धोबी है ।" मंगलू नहीं चाहता था कि भवतारा कामिनी की बात करे ।

"मै उसके बाप की नहीं, उसकी बात कर रहा हूं।" भवतारा मुस्कराया।

" कहां तुम कहां वो ।। जैसे ज़मीन-आसमान हो ।"

"पर मेरा दिल आ गया है मंगलू!"

"दो तुम्हारे काबिल नहीं है ।"

" वो मेरे ही काबिल है । मेरे लिए ही बो बनी है । तभी तो उसे देखते ही मैं पागल हो गया हू।"

मंगलू ने होंठ भीचकर मुह घुमा लिया । यही सोचा उसने कि कामिनी की खूबसूरती का भूत देर-ब उसके दिमाग से निकल जाएगा ।

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भवतारा के शरीर में एकाएक ऐठन-सी हुईं, परंतु तुरंत ही ठीक होगई । शाम ढल रही थी ।

दिन की अंतिम रोशनी और अंधेरे का मिलन हो रहा था । वक्त अंधेरे की तरफ सरकना आम हो गया था । सुरमई क्षितिज अब कालिमा में बदल चुका था । रात का अंधेरा, उजाले के अंतिम हिस्से को अपने जागोश में लेता जा रहा था ।

एकाएक मंगलू ठिठका और थकान-भरे स्वर में बोला ।

" बस, अब नहीं चला जाता ।"

"थक गया मंगलू.. !"

" हा वापस चलते हैं !"

"मेरे भोजन का वक्त होता जा रहा है । अंधेरा हो गया है । भोजन के पश्चात मैं वापस चलूगा ।"

" दिन-भर हम घूमते रहे, क्या तुम तब भोजन नहीं कर सकते थे, जो...."

"मुझें अंधेरे में ही भोजन करने की इच्छा जाग्रत होती है ।"

"अजीब हो तुम ।"

भवतारा के जिस्मं में बेचैनी भरने लगी थी । अपने शरीर में होते,. अजीब-से बदलाव की अनुभूति महसूस कर रहा था । अब उसकी पैशाचिक इच्छाएं, उसके मस्तिष्क में कुलवुलाने लगी थीं ।

एकाएक पुन उसके जिस्म में ऐठन उठी ।

तन-सा गया भवतारा का शरीरा ।

अगले ही पल उसके चेहरे का रूप बिगड़ने-सा मुट्ठिया मिच-सी गई । आखें जैसे किसी दरिन्दे की लगने तनी । उसकी सासों मे गुर्राहट का भाव समा गया था जैसे ।

वे दोनों इस वक्त भीड़ भरी सडक पर थे । मंगलू भवतारा को न देखकर, बाजार को देख रहा था, वरना भवतारा में होते परिवर्तन को उसने फौरन भांप जाना था

। भवतारा ने जल्दी से खुद को संभाला। अपनी इच्छाओं को दबाया।

कुरूप होता उसका रूप पुन: सामान्य हो गया । तनाव कुछ कम हुआ ।

वो गहरी-गहरी सासे लेने लगा ।

मंगलू ने उसे देखा और कह उठा ।

"क्या हुआ तुम्हें…तुम लम्बी-लम्बी सांसे क्यो ले रहे हो?"

"शायद थक गया हूं ।" भवतारा का चेहरा गंभीर था ।

"सारा दिन घूमते रहे हैं, थकान तो होगी ही । मेरी मानो वापस चलते हैं । भोजन पैक करा लो ।"

"मैँ कुछ आराम करना चाहता. . . !"

"वो सामने रेस्टोरेंट है, वहां चलकर बैठते हैं । आराम भी हो जाएगा और कुछ खा भी. ..!"

"वहां नहीं, उधर चलते हैं अंधेरे में ।" भवतारा ने शांत स्वर में कहा…"अंधेरे में मुझें आराम मिलेगा ।"

"अंधेरे में आराम, कितनी अजीब बात कह रहे...!"

" चलो !"

दोनों अंधेरे की तरफ बढ गए।

कुछ देर बाद अंधेरे में ठिठके और भवतारा चैन-भरे स्वर में कह उठा ।

"यहां ठीक. है !"

मंगलू भवतारा पर नजर डालकर कह उठा ।

"" तुम्हारी हरकते मेरी समझ से बाहर है । आराम करना था तो कहीं बैठकर करते । इस तरह अंधेरे में खड़े होकर... ।"

"मेरा यहीं आराम है मंगलू?" भवतारा का स्वर गंभीर था…""मुझे अंधेरे में रहकर आराम मिलता है ।"

"तो दिन में क्यों घूमते रहे ।"

"दिन में मैं ठीक रहता हू।"

"तो रात को क्या हो जाता है?"

भवतारा चुप रहा ।

मंगलू ने गहरी सांस ली और इधर-उधर नजरो को दौड़ाता बोला ।

"वापस चलते हैं । रास्ते से भोजन पैक करा लेना । मै भी वहुत थक गया हूं।"

भवतारा खामोश रहा ।

“बोलो, तुम खामोश क्यों हो?"

"कुछ देर चुप रहो ।"

उसी पल भवतारा के शरीर में ऐठन उठनी शुरू हुई ।

अवतारा ने अपने पर काबू पाना चाहा ।

परंतु ऐठन ज्यादा ताकतवर थी । शरीर में ज्यादा तनाव-भर गया था । उसने मंगलू की तरफ पीठ करली । मुटिठयां भिचने लगा । एकाएक चेहरा कुरूप-सा होने लगा । सिर झटककर उसने अपने पर काबू पाने की चेष्टा की ।

फिर धीरे--धीरे वो सामान्य अवस्था में आने लगा ।

अगले कुछ ही पलो में वो सामान्य हो गया ।

भवतारा पलटा, मंगलू को देखा।

मंगलू लापरवाह-सा इधर-उधर देख रहा था ।

तभी मंगलू को सड़क के किनारे-किनारे चलकर आती युवती दिखी । वो इसी तरफ़ आ रही थी । उसके सैडिलो की ठक-ठक, हल्की सी कानों में पड़ रही थी ।

भवतारा भी उसे पास आते देखने लगा । वो पास आई । उसके होंठों पर लाल लिपिस्टिक पुती थी । गालों पर भी लाली लगा रखी थी । बाल कलर से सुनहरी वना रखे थे । सैडिलो के साथ वो स्कर्ट और टॉप पहने थी । पच्चीस की उम्र होगी उसकी । पास से निकलते हुए उसने मंगलू ओंर भवतारा पर मुस्कान फेंकी और पंद्रह कदम दूर जाकर खडी हो गई । फिर बार-बार उन्हें देखने लगी । दर्शा वो ये रही थी जैसे उसे किसी का इंतजार हो यहां ।

"ये. . .! ये कौन है?” भवतारा ने मंगलू से पूछा ।

" ***** ! "
 
"वो क्या होती है?"

" पैसे लेकर पराए आदमी की वन जाती है ।" मंगलू ने मुंह बनाकर कहा ।

"ये यहाँ क्यों खडी है?” भवतारा का हाथ अपने गाल पर पहुचा और गाल मसलने लगा ।

"इस आशा में खडी है कि शायद हम इसकी रात के ग्राहक, बन जाएं । ये हमे नोटों वाला समझ रही है ।"

भवतारा ने आस-पास नजरे दौड़ाईं ।

कुछ दूर उसे गली दिखाई दी ।

"मंगलू!" भवतारा बोला-" वो गली देख रहे हो ना उधर, तीन सौ कदम दूर ।"

“हां !"

"मैं वहीं जा रहा हूं उसे तुम गली में भेजो । इसे कहना बहुत सारे पैसे मिलेंगे ।"

" कामिनी का भूत सिर से उतर गया ।" मंगलू ने व्यंग्य से कहा ।

"मैं जा रहा है । तुम इसे गली में भेजो" ।

"लेकिन तुम्हारे पास पैसे तो है नहीं देने को !"

" तुम्हें जो कहा है, वो ही करो ।" एकाएक भवतारा का स्वर कठोर हो गया और पलटकर वो चल पड़ा ।

मंगलू वहीँ खड़ा भवतारा को गली की तरफ जाते देखता रहा । वो अभी तक उसे ठीक से समझ नहीं पाया था । कभी-कभी भवतारा की हरकतें तो बडी अजीब-सी लगती ।

मगलं ने गर्दन घुमाकर युवती को देखा।

लगा जैसे युवती उसे अपनी ओर देखते पाकर मुस्कराई हो।

मगलू उसकी तरफ़ बढ गया और युवती के पास पहुंचकर ठिठका ।

"हैलौ !" युवती कह उठी…"अपने यार को क्यों भेज दिया? मैं दोनों को निबटा देती ।"

" वो तुमसे मिलना चाहता है !" मंगलू ने मुह बनाकर कहा ।

" मुझसे , लेकिन वो तो चला गया ।" युवती ने भवतारा को दूर गली प्रवेश करते देखा ।

"वो मुझे कह गया है कि तुम्हें गली में भेज दूं ।"

"ओहा तो ये बात है । मेरी फीस पता है?" वो बोली ।

"वो अमीर आदमी है । मेरा दोस्त नहीं है, मैं उसके लिए काम करता हूँ ।"

"अमीर है वो?”

"हां ।"

"पांच हजार देगा !"

"बात कर लेना पहले, मेरे ख्याल में तो दस भी दे सकता है !" । मंगलू ने गहरी सांस ली…“मेरे को भी वहुत पैसे देता है, कभी तो मुझे ही कहना पड़ता है कि बस, और मत दो ।"

"ऐसाँ, फिर तो मैं उससे यारी गांठ लूंगी और तुम्हें मुफ्त में मजे दिया करूंगी ।"

"जाओं वो तुम्हारा इंतजार कर रहा है !"

"जाती हूं---कैसी लग रही हू?"

"अंधेरे में ठीक से नजर नहीं आ रही ।"

" कुछ तो दिख ही रही होऊगी !"

" जितनी दिख रही हो, उतनी अच्छी लग रही हो !"

"कपडों के बिना तो मैं और भी अच्छी लगती हु, दिखाऊंगी तुम्हें......!" वो उत्साह-भरे स्वर में बोली ।

" पहले उसे तो दिखा आओ ।"

"अभी जाती हूं।" उसने मगलू का गाल थपथपाया और गली की तरफ़ बढ गई ।

वो वहीं खड़ा उसे जाते देखता रहा, फिर गहरी सांस लेकर मुंह फेर लिया ।। वो जानता था कि भवतारा से लडकी को फूटी कौडी नहीं मिलने वाली, उसके पास पैसा है ही नहीं ।

तभी स्कूटी पर सवार एक लडकी मंगलू के पास आकर रुकी ।

" ऐ हीरो चलना है क्या?"

"पैसे नहीं हैं ।" मगलू ने मुस्कराकर कहा ।

"भाड में जा ।" लड़की ने कहा और स्कूटी आगे दौडा ले गई ।

लडकी गली के किनारे पल भर के लिए ठिठकी और नजर दौड़ाई गली में । एक-दो लोग आ-जा रहे थे, परंतु वो न दिखा, जिसके लिए आई थी वो । यहीं कहीं होगा, ये सोचकर वो गली में प्रवेश कर गई । उसके सैडिलो की ठक-ठक सुनसान गली मे गूंजने लगी । जो एक-दो लोग आ-जा रहे थे, वो गली में से बाहर निकल गए थे । वो गली मे ठक-ठक करती आगे वढ़ती जा रही थी । आधी गली तय करने पर वो रूकी । वो उसे कहीं भी न दिखा ।

" हैलो !" नजरे दौड़ाती वो शांत स्वर में कह उठी-----" कहां हो तुम मैं आ गई ।"

जवाब में खामोशी छाई रही, कोई जवाब नहीं ।

" हैलो !" उसने पुकारा ।

इस बार ही कोई जवाब नहीं ।

"डरपोक कहीं का । मुझे बुलाकर खुद भाग गया । खामखाह धंधे का टेम खराब किया ।"

वो वड़बड़ा उठी । इसके साथ ही युवती पलटकर बापस बढी ।

ठक-ठक पुन: शुरू हो गई ।

ठीक इसी पल पास ही अंधेरे में दुबका साया उस पर झपट पड़ा ।

" ओह! " युवती के होंठों से निकला-"शरारती कहीं के, तुम हो यहां छिपे हो और मैं तुम्हें दूंढ़........"

वो युवती के भीचे अंधेरे में पुन: दीवार के पास दुबक गया ।

"सब्र करो, मैं भागी तो नहीं जा रही, पूऱी रात अपनी है. . .तुम तो . . ।"

तभी युवती को लगा, जैसे बो जमीन पर बैठ गया हो और अपनी दोनों टांगो में फंसाकर उसे भीच लिया ।

"बहुत ज़ल्दबाज हो, ज़रा भी सब्र नहीं, अव कपड़े फाडोगे क्या--रुको जरां...!” उसी पल युवती को बालों से पकडकर उसका सिर एक तरफ़ को झुकाया और होंठों से निकले दोनों लम्बे दांत, गले पर उभरी खून की नली मे धुसेड़ दिए।

एक पल के लिए सिर्फ एक पल के लिए युवती को अंधेरे में उसके चेहरे की झलक मिली थी । उस झलक ने उसके भीतर इतनी दहशत भर दी कि दो चीख भी न सकी । ये उसकी जिन्दगी की आखिरी झलक थी । उसके बाद क्या हुआ, उसे कछ याद न रहा ।

बो खून पी रहा था और वो बेहोश होती चली गई थी ।

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मंगलूको वहाँ खड़े-खड़े काफी देर हो चुकी थी।

भवतारा लौटा न था ।

कुछ और इंतजार किया उसने भवतारा का । उसके बाद वो गली की तरफ़ चल पड़ा । अव तक तो हर हाल में आ जाना चाहिए था भवतारा को, आखिर इतनी देर कैसे लग गई?

मंगलू गली में पहुंचा । गली में एक जगह पांच-छ: लोग खड़े है । रोशनी न के बराबर थी । मंगलू को लगा कि लोगों ने भवतारा को लडकी के साथ गड़बड़ करते पकड लिया है और अच्छी ठुकाई की होगी । तभी ये लोग खडे है !"

मंगलू उनके पास पहुचा ।

"क्या हुआ भाई साहब?" मंगलू ने शराफ़त भरे स्वर मे पूछा !

"लडकी की लाश पडी है इधर ।"

"किधर?" मंगलू के होंठो से निकला ।

"वो देखो, अंधेरे में, उसके दो पैर रोशनी, में नजर आरहे हैं ।"

मंगलू की निगाह अब तक रोशनी में नज़र आते पेरों पर टिक चुकी थी ।

पैरों में इस वक्त कुछ पहना हुआ नहीं था ।

तभी वहां से निकलते दो आदमी और वहां रूके । लाश की बात सुनते ही एक ने जेब से माचिस निकाली और तीली जलाई ताकि मरने वाली युवती का चेहरा देख सके ।

तीली की रोशनी चमकी तो मंगलू ने भी पल-भर के लिए मृत युवती का चेहरा देखा ।

ये वो ही युबती थी, जिसे उसने गली में भेजा था ।

लेकिन ये मरी कैसे?

कई सवाल मंगलू के मस्तिष्क में उठने लगे ।

सबसे वड़ा सवाल तो उसके सामने ये आया कि क्या भवतारा ने उसे मारा है?

अगर मारा है तो क्यों?

मगलू का दिमाग खराब-सा होने लगा ।

ऐसी क्या बात हो गई कि भवतारा को इसकी जान लेनी पडी । अवश्य पैसे पर झगडा हुआ होगा । युवती पैसे मांग रहीं होगी ओर भवतारा के पास तो पैसे हैं नहीं कि उसे दे देता, ऐसे मे भवतारा उसे मारकर चला गया ।

"पुलिस को खबर कर दी?” पूछा किसी ने ।

"हां, मैंने अपने मोबाइल फोन से पुलिस को खबर की है । वो आती ही होगी ।" जवाब मिला ।

मंगलू के चेहरे पर गंभीरता थ्री । व्याकुलता थी ।

तभी वातावरण में पुलिस सायरन की आवाज़ गूंजी !"

मंगलू ने वहाँ से निकल जाना ही उचित समझा और आगे बढ गया ।।

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मंगलू वापस मंदिर पहुचा तो रात के दस बज रहे थे । मंदिर का गेट बंद हो चुका था । उसे समझ न आया कि अब कैसे भीतर प्रवेश करे, मद्धिम-सी ठंडी हवा चल रही थी । मंदिर के भीतर, दो तीन जगह बल्बो का प्रकाश हो रहा था । मंदिर के भीतर एक-दो लोग उसे दिखे भी, परं किसी से गेट खोलने को कहना ठीक नहीं था । क्योंकि मंदिर की के भीतर पांव रखते ही वो दुसरों की निगाहो से गायब हो जाता और हड़कम्प मच जाता, वो सब घबरा जाते ।

मंगूल वहीं टहलता सोचता रहा कि कैसे भीतर प्रवेश करे?

मंदिर तक जाती सडक सुनसान थी । अब रात के वक्त कौन मंदिर मे जाएगा कि गेट खुले।

मंगलू मंदिर की दीवार के साथ साथ आगे बढ गया । वो भीतर प्रवेश का कोई रास्ता तलाश कर लेना चाहता था और रास्ता मिला भी । दाई तरफ मंदिर की दीवार के साथ वहुत सारा मलबा डाल रखा था । वो मलवे पर जाकर खडा हुआ तो दीवार की मुंडेर अब ज्यादा ऊंची न थी ।

मंगलू ने छलांग भरी और दीवार की मुंडेर थाम ली, फिर दीवार पर चढा और उसके बाद खुद को संभालते हुए दूसरी तरफ कूद गया । ये मंदिर का छोटा सा बाग था, वहां कुछ पेड़ और फूलों की क्यारियां लगी थी । मंगलं आगे बढ गया । सामने से एक व्यक्ति आता दिखाई दिया, परंतु मंगलू निश्चित था कि मंदिर के भीतर अदृश्य है,उसे नहीं देख सकेगा वो ।

फिर मंगलू ने तरकीब से उस दीवार को सरकाकर भीतर प्रवेश किया और भीतर खूंटी को खीचने से दीवार अपनी जगह पर आकर टिक गई । मंगलू ने गहरी सांस ली और आस-पास देखा ।

वो ही गोल कमरा था ।

हर तरफ खामोशी छाई हुई धी ।

शायद भवतारा अभी आया नहीं है । इस विचार के साथ वो सीढियों की तरफ बढ गया । एक बार वो भवतारा के कमंरे मैं नजर डाल लेना चाहता था । रह-रहकर उसकी आंखों के सामने मृत युवती का चेहरा घूम रहा था । यही सोच रहा था कि जो भी हो, भवतारा को उसकी जान नहीं लेनी चाहिए थी । किसी और तरह से मामले को निबटा लेता ।

सीढियां तय करके मंगलू ऊपर पहुचा ।

भवतारा के कमरे का दरवाजा खुला था ।

दरवाजे के बीचो-बीच जा खडा हुआ मगंलू ।

भवतारा बैड पर पीठ के बल पस्त होकर लेटा हुआ था । बांहें बैड पर ऊपर की तरफ फैली हुई थी और टांगें भी दाएं-बाएं को फैली हुई थीं । बहुत चैन की नींद ले रहा था वो । होंठों से मद्धिम-से खुर्राटे निकल रहे थे । मंगलू वहीँ खड़ा देखता रहा उसे । चेहरे पर गभीरता भरे शांत भाव थे ।

फिर जव पलटने लगा कि ठिठक गया ।

छाती पर से कमीज का कुछ हिस्सा लाल-सा नजर आ रहा था । पैट पर भी लाल बड़ा-सा धब्बा दिखा ।

मंगलू कमरे के भीतर प्रवेश कर गया ।

बैंड के मास जाकर रुका और कमीज पर उभरे बड़े-से लाल धब्बे को ध्यान से देखने लगा । पहचानने में ज्यादा देर न लगी कि वो खून का धब्बा है, जो कि सुख चुका था ।

पैंट पर लगे खून के धब्बे को पहचाना ।

उस युवती का ही खून लगा होगा । उसने सोचा, परंतु तभी उसकी निगाह अवतारा के चेहरे पर पडी तो माथे पर बल आ ठहरे ।

मुह होंठ, गाल, हर जगह पर खून लगा था, जो कि सूख गया था ।

चेहरे पर खून कहां से आ गया? उसने सोचा ।

कल रात भी भवतारा जब वापस लौटा था तो उसकी कमीज़ पर खून के दाग थे । मंगलू की सोचो में सवाल तो थे, परंतु ज़वाब न था ।

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