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Guest
जाने क्या हुआ कि उसके हाथों की उंगलियों के नाखून एकाएक इंच-इंच भर लम्बे हो गए । चेहरा अचानक ही बदलकर भयानक-सा होगया कि कोई देखे तो चीख उठे । आगे के दो दांत इंचभर बाहर को आ गए । सिर के बाल झुण्ड बनाकर खडे हो गए । अब उसकी चाल में भी बदलाव आ गया था ।
ये अवतारा का असली चेहरा था ।
उसके भीतर का शैताऩ जाग उठा था ।
आगे चलते व्यक्ति को किसी के पीछे आने का अहसास हूआ तो वो ठिठककर पलटा । अंधेरे में उसकी निगाह भवतारा पर पड़ी । कुछ पल उसने भवतारा को देखा ।
भवतारा और पास आ गया ।
जब उसने भवतारा का असली रूप देखा तो खौफ से आंखें खुल गई । मुंह पूरा-का-पूरा खुल गया । शायद वो दहशत से चीखना चाहता था, अपने पास किसी दरिंदे को पाकर ।
उसी पल भवतारा पास पहुचा और उसे जोर से धक्का दिया ।
वो लड़खड़ाकर नीचे जा निरा । उसमें इतनी हिम्मत न थी कि उठ सके । डर के मारे वो सूखे पते की भाति कांप रहा था । आंखें दहशत से फटी हुई थी ।
किताबी दरिदे को पहली बार अपने सामने देखा था । भवतारा के होंठों से मद्धिम-सीं गुर्राहट बार-बार निकल रही थी ।
"क..कौंन हो तुम ?" उसके होठों से थरथराता स्वर निकल । वो नीचे ही गिर पड़ा था।
भवतारा गुर्राहटों के साथ, उसके पास नीचे बैठा । दोनों टांगे फैलाकर शरीर को टांगों में जकड़ लिया । दहशत से कांपकर उसने खुद को छुडाना चाहा, परंतु कोई फायदा न हुआ ।
उसकी टांगों की जकडन से उसने खुद को आजाद कराना चाहा, ,. परंतु नाकाम रहा ।
भवतारा ने उसके सिर के बाल मुटूठी में जकड़े और गर्दन एक तरफ कर दी, उसके साथ ही उसने होठों से बाहर निकले दात उसकी गर्दन की नस में घुसेड़ दिए ।
वो व्यक्ति तड़प उठा ।
लेकिन भवतारा की पकड़ से आजाद न हुआ । उसके शरीर का खून भवतारा के दातों की नली के रास्ते उसके गले मे उतरता जा रहा था ।
अब तो उस व्यक्ति का छटपटाना भी बंद हो गया ।
तीन मिनट तक यही चलता रहा।
कोई दूसरा तब तक गली में न आया था ।
फिर जब भवतारा ने उसके शरीर को छोडा तो वह नीचे लुढ़क गया । उसकी जान खत्म हो चुकी थी ।
भवतारा के होंठों से गुर्राहट निकली ।
ठीक यहीं पल थे कि टॉर्च की तीव्र रोशनी भवतारा के शरीर पर पडी ।
रोशनी में स्पष्ट दिखा कि उसके होंठ-मुह और दांत खून से सने हुए थे । उसने ऊपर रोशनी की तरफ सिर उठाया तो पास के मकान की खिडकी से किसी को झांकते पाया । वो ही उस पर टॉर्च की रौशनी मार रहा था । अगले ही पल औरत की भयपूर्ण तीखी चीख गूंजी । टॉर्च उपर से नीचे आ गिरी और पहले की तरह अंधेरा छा गया ।
भवतारा उठा और गली में आगे बढ गया । अब भवतारा की चाल में मस्ती थी । वो इस तरह झूमते हुए आगे बढ रहा था जैसे भरपूर नशा कर लिया हो । उसके होंठों से अब भी गुर्राहट निकल रही थी ।
गली के आगे बाले मोड पर जाकर वह ठिठका ।
अब वो सामान्य दिख रहा था । उंगलियों के नाखून लुप्त हो गए थे । इसी तरह बाहर को निकले दांत भी मुह में वापस चले गए थे । सिर के बाल ठीक हो गए थे । भयानक हो चुका चेहरा भी अब पहले की तरह सामान्य था, परंतु होठो-दांतों और चेहरे पर खून लगा स्पष्ट नजर आ रहा था ।
भवतारा ने ठिठककर गर्दन घुमाते हुए गली में देखा ।
गली शांत थी । वहां कोई न था ।
उसके वाद भवतारा आगे बढ़ गया । कुछ आगे जाकर, सडक के किनारे उसे टूंटी लगी दिखाई दी तो पानी से वो अपने हाथ-मुंह धोने लगा।
@@@@@@@@@@@@@@@
मंगलू पास की पुलिया पर बैठा भवतारा के आने का इंतजार कर रहा था । रात के बारह बज रहे थे । वो अकेला बैठा-बैठा बोर हो चुका था और साथ ही अपने भविष्य की योजना भी बना रहा था । भवतारा ने उसे पैसा देना था । वो सोच रहा था कि उस पैसे का क्या करेगा । उसे कोई दुकान ले लेनी चाहिए । आराम से कम-धंधा करेगा ।
सारा वक्त उसने इन्हीं सोचो में डूबे बिताया । तब एक बजने को था, जब भवतारा वहाँ पहुंचा ।
"तुम कहीं चले गए थे?" मंगलं ने नाराजगी भरे स्वर में पूछा ।
“काम था ।" भवतारा मुस्कराया । वो फ्रेश और खुश लग रहा था ।
"ऐसा भी क्या काम जो मुझे नहीं ले गए साथ?"
“चलो, अब मैं आराम करूंगा ।"
दोनों उस मंदिर के गेट की तरफ़ ब्रढ़ गए ।
गेट बंद था और भीतर कोई दरबान भी नहीं खडा था ।
"ये गेट तो बंद हो गया, तुम दिन में अपना काम नहीं कर सकते थे ।" मंगलू ने कहा ।
" मेरे काम रात को होते हैँ !"
"अब क्या करें बाहर ही सोना पडेगा ।"
उसी क्षण उस बड़े से गेट के भीतर लगी कुंडी खुद व-खुद खुलने लगी ।
" ये क्या ?" मंगलू के मुँह से निकला ।
"तुमने अमी मेरी शक्तियां देखी ही कहाँ हैं ।"
मंगलू कुछ न कह सका।
गेट खुल गया।
दोनों ने भीतर प्रवेश किया और आगे बढ़ गए । पीछे गेट अपने आप बंद होता चला गया । कुंडी लग गई ।
वे दोनों उसी दीवार वाले रास्ते से होकर गोल कमरे में जा पहुचे ।
“ओह !" भवतारा बैठता हुआ बोला---" जीवित होकर कितना अच्छा लग रहा है ।"
"इसमें अच्छा क्या लगता है?"
"तुम नहीं समझोगे ।"
" अरे ?"मंगलू के होंठों से निकला---" तुम्हारी कमीज पर खून की बूंद कहा से आई ?"
भवतारा ने कमीज की तरफ देखा भी नहीं और मुस्कराकर बोला----"लग गई होगी कहीं से ।"
"खाना खा लिया?"
"हां ।" भवतारा की आखों में तीव्र चमक आ ठहरी ।
"मैंने तो कूछ खाया ही नहीं । जब से चाकू मुझे कूड़े के ढेर से मिला तब से मुझे भूख नही लगी !!
" ये भी मेरी शक्ति का कमाल है तुम जब तक मेऱी सेवा मे हो, तुम्हें मूख नहीँ लगेगी।"
"ऐसा क्यों?"
"मैं नहीं चाहता हूं कि शैतान के सेवक पेट भरने के चक्कर मे अपना वक्त खराब करते रहे । जो मेरी सेवा करेगा, वो हर परेशानी से आजाद हो जाएगा ।" भवतारा ने मुस्कराकर कहा ।
"मैं नहीं चाहता हूं कि शैतान के सेवक पेट भरने के चक्कर मे अपना वक्त खराब करते रहे । जो मेरी सेवा करेगा, वो हर परेशानी से आजाद हो जाएगा ।" भवतारा ने मुस्कराकर कहा ।
"तुम मुझसे खुश हो?" मंगलू ने पूछा ।
"हां, वहुत खुश......!"
"मेरी सेवा में कोई कमी तो नहीं?"
"नहीं । तुम तो मेरे दोस्त हो ।"
"तुमने मुझें दौलत देने का वादा किया था ।" मंगलू बोला-" वो मुझे दे दो !"
"दौलत?" भवतारा ने मुस्कराकर मंगलू को देखा ।
"दौलत चाहिए तुम्हें?"
"हां ।" मंगलू ने फौरन सिर हिलाया ।
"क्या करेगा तू दौलत का?"
" खाऊंगा, ऐश करूणा ।"
"तुझे भूख तो लगती नहीं, फिर क्या खाएगा तू ?" भवतारा मुस्कराया।
" वो..... वो मैं काम करूंगा ।"
"काम करके पैसा कमाएगा?"
" हां ।"
"क्या करेगा पैसा कमाकर?"
" कार खरीदूंगा-मकान खरीदूंगा ।"
"कार और मकान तो मैं तूझें वैसे ही दे दूंगा । तू इस जगह पर रह, कार किसी की भी उठा ले !"
मंगलू भवतारा को देखने लगा ।
"ठीक कहा न मैंने?" भवतारा मुस्कराया ।
"इस तरह तो मैं करूंगा क्या, बोर हो जाऊंगा ।"
"बोर क्यो होगा, तू मेरी सेवा में लगा रह । यहां तेरे को क्या कमी है?" भवतारा उठता हुआ बोला-----“मै अव आराम करूंगा । नीद आ रही है मुझे !"
"लेकिन मुझे दौलत.....!"
"बेकार की बाते न कर ।" भवतारा, कह उठा-" तेरे को दुनिया हर आराम हासिल है। दौलत का तेरे लिए कोई इस्तेभाल नहीं । जब चीज की जरूरत ही नहीं तो उसे मांगता क्यों है?"
वो सीढियों की तरफ बढ़ गया । . ,
मंगलू हक्का-बक्का रह गया ।
"लेकिन तूने तो कहा था कि मुझे ढेर सारी दौलत...... ।"
"मंगलू....." सीढियां चढता भवतारा कह उठा----"मुझे नींद आ रही है, बाद में बात करना ।"
मंगलू भवतारों को देखता रहा ।
भवतारा ऊपर पहुंचा और देखते-ही-देखते अपने कमरे में प्रवेश कर गया ।
मंगलू को अपने सपने टूटते-से महसूस हुए । भवतारा उसे दौलत हैं नहीं दे रहा, जबकि उसके मन में तो सिर्फ एक ही इच्छा थी । ढेर सारी दौलत पा लेने की इच्छा।
मंगलू ने मन-हीं-मन ये इरादा पक्का किया कि वो भवतारा से दौलत लेकर रहेगा ।
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ये अवतारा का असली चेहरा था ।
उसके भीतर का शैताऩ जाग उठा था ।
आगे चलते व्यक्ति को किसी के पीछे आने का अहसास हूआ तो वो ठिठककर पलटा । अंधेरे में उसकी निगाह भवतारा पर पड़ी । कुछ पल उसने भवतारा को देखा ।
भवतारा और पास आ गया ।
जब उसने भवतारा का असली रूप देखा तो खौफ से आंखें खुल गई । मुंह पूरा-का-पूरा खुल गया । शायद वो दहशत से चीखना चाहता था, अपने पास किसी दरिंदे को पाकर ।
उसी पल भवतारा पास पहुचा और उसे जोर से धक्का दिया ।
वो लड़खड़ाकर नीचे जा निरा । उसमें इतनी हिम्मत न थी कि उठ सके । डर के मारे वो सूखे पते की भाति कांप रहा था । आंखें दहशत से फटी हुई थी ।
किताबी दरिदे को पहली बार अपने सामने देखा था । भवतारा के होंठों से मद्धिम-सीं गुर्राहट बार-बार निकल रही थी ।
"क..कौंन हो तुम ?" उसके होठों से थरथराता स्वर निकल । वो नीचे ही गिर पड़ा था।
भवतारा गुर्राहटों के साथ, उसके पास नीचे बैठा । दोनों टांगे फैलाकर शरीर को टांगों में जकड़ लिया । दहशत से कांपकर उसने खुद को छुडाना चाहा, परंतु कोई फायदा न हुआ ।
उसकी टांगों की जकडन से उसने खुद को आजाद कराना चाहा, ,. परंतु नाकाम रहा ।
भवतारा ने उसके सिर के बाल मुटूठी में जकड़े और गर्दन एक तरफ कर दी, उसके साथ ही उसने होठों से बाहर निकले दात उसकी गर्दन की नस में घुसेड़ दिए ।
वो व्यक्ति तड़प उठा ।
लेकिन भवतारा की पकड़ से आजाद न हुआ । उसके शरीर का खून भवतारा के दातों की नली के रास्ते उसके गले मे उतरता जा रहा था ।
अब तो उस व्यक्ति का छटपटाना भी बंद हो गया ।
तीन मिनट तक यही चलता रहा।
कोई दूसरा तब तक गली में न आया था ।
फिर जब भवतारा ने उसके शरीर को छोडा तो वह नीचे लुढ़क गया । उसकी जान खत्म हो चुकी थी ।
भवतारा के होंठों से गुर्राहट निकली ।
ठीक यहीं पल थे कि टॉर्च की तीव्र रोशनी भवतारा के शरीर पर पडी ।
रोशनी में स्पष्ट दिखा कि उसके होंठ-मुह और दांत खून से सने हुए थे । उसने ऊपर रोशनी की तरफ सिर उठाया तो पास के मकान की खिडकी से किसी को झांकते पाया । वो ही उस पर टॉर्च की रौशनी मार रहा था । अगले ही पल औरत की भयपूर्ण तीखी चीख गूंजी । टॉर्च उपर से नीचे आ गिरी और पहले की तरह अंधेरा छा गया ।
भवतारा उठा और गली में आगे बढ गया । अब भवतारा की चाल में मस्ती थी । वो इस तरह झूमते हुए आगे बढ रहा था जैसे भरपूर नशा कर लिया हो । उसके होंठों से अब भी गुर्राहट निकल रही थी ।
गली के आगे बाले मोड पर जाकर वह ठिठका ।
अब वो सामान्य दिख रहा था । उंगलियों के नाखून लुप्त हो गए थे । इसी तरह बाहर को निकले दांत भी मुह में वापस चले गए थे । सिर के बाल ठीक हो गए थे । भयानक हो चुका चेहरा भी अब पहले की तरह सामान्य था, परंतु होठो-दांतों और चेहरे पर खून लगा स्पष्ट नजर आ रहा था ।
भवतारा ने ठिठककर गर्दन घुमाते हुए गली में देखा ।
गली शांत थी । वहां कोई न था ।
उसके वाद भवतारा आगे बढ़ गया । कुछ आगे जाकर, सडक के किनारे उसे टूंटी लगी दिखाई दी तो पानी से वो अपने हाथ-मुंह धोने लगा।
@@@@@@@@@@@@@@@
मंगलू पास की पुलिया पर बैठा भवतारा के आने का इंतजार कर रहा था । रात के बारह बज रहे थे । वो अकेला बैठा-बैठा बोर हो चुका था और साथ ही अपने भविष्य की योजना भी बना रहा था । भवतारा ने उसे पैसा देना था । वो सोच रहा था कि उस पैसे का क्या करेगा । उसे कोई दुकान ले लेनी चाहिए । आराम से कम-धंधा करेगा ।
सारा वक्त उसने इन्हीं सोचो में डूबे बिताया । तब एक बजने को था, जब भवतारा वहाँ पहुंचा ।
"तुम कहीं चले गए थे?" मंगलं ने नाराजगी भरे स्वर में पूछा ।
“काम था ।" भवतारा मुस्कराया । वो फ्रेश और खुश लग रहा था ।
"ऐसा भी क्या काम जो मुझे नहीं ले गए साथ?"
“चलो, अब मैं आराम करूंगा ।"
दोनों उस मंदिर के गेट की तरफ़ ब्रढ़ गए ।
गेट बंद था और भीतर कोई दरबान भी नहीं खडा था ।
"ये गेट तो बंद हो गया, तुम दिन में अपना काम नहीं कर सकते थे ।" मंगलू ने कहा ।
" मेरे काम रात को होते हैँ !"
"अब क्या करें बाहर ही सोना पडेगा ।"
उसी क्षण उस बड़े से गेट के भीतर लगी कुंडी खुद व-खुद खुलने लगी ।
" ये क्या ?" मंगलू के मुँह से निकला ।
"तुमने अमी मेरी शक्तियां देखी ही कहाँ हैं ।"
मंगलू कुछ न कह सका।
गेट खुल गया।
दोनों ने भीतर प्रवेश किया और आगे बढ़ गए । पीछे गेट अपने आप बंद होता चला गया । कुंडी लग गई ।
वे दोनों उसी दीवार वाले रास्ते से होकर गोल कमरे में जा पहुचे ।
“ओह !" भवतारा बैठता हुआ बोला---" जीवित होकर कितना अच्छा लग रहा है ।"
"इसमें अच्छा क्या लगता है?"
"तुम नहीं समझोगे ।"
" अरे ?"मंगलू के होंठों से निकला---" तुम्हारी कमीज पर खून की बूंद कहा से आई ?"
भवतारा ने कमीज की तरफ देखा भी नहीं और मुस्कराकर बोला----"लग गई होगी कहीं से ।"
"खाना खा लिया?"
"हां ।" भवतारा की आखों में तीव्र चमक आ ठहरी ।
"मैंने तो कूछ खाया ही नहीं । जब से चाकू मुझे कूड़े के ढेर से मिला तब से मुझे भूख नही लगी !!
" ये भी मेरी शक्ति का कमाल है तुम जब तक मेऱी सेवा मे हो, तुम्हें मूख नहीँ लगेगी।"
"ऐसा क्यों?"
"मैं नहीं चाहता हूं कि शैतान के सेवक पेट भरने के चक्कर मे अपना वक्त खराब करते रहे । जो मेरी सेवा करेगा, वो हर परेशानी से आजाद हो जाएगा ।" भवतारा ने मुस्कराकर कहा ।
"मैं नहीं चाहता हूं कि शैतान के सेवक पेट भरने के चक्कर मे अपना वक्त खराब करते रहे । जो मेरी सेवा करेगा, वो हर परेशानी से आजाद हो जाएगा ।" भवतारा ने मुस्कराकर कहा ।
"तुम मुझसे खुश हो?" मंगलू ने पूछा ।
"हां, वहुत खुश......!"
"मेरी सेवा में कोई कमी तो नहीं?"
"नहीं । तुम तो मेरे दोस्त हो ।"
"तुमने मुझें दौलत देने का वादा किया था ।" मंगलू बोला-" वो मुझे दे दो !"
"दौलत?" भवतारा ने मुस्कराकर मंगलू को देखा ।
"दौलत चाहिए तुम्हें?"
"हां ।" मंगलू ने फौरन सिर हिलाया ।
"क्या करेगा तू दौलत का?"
" खाऊंगा, ऐश करूणा ।"
"तुझे भूख तो लगती नहीं, फिर क्या खाएगा तू ?" भवतारा मुस्कराया।
" वो..... वो मैं काम करूंगा ।"
"काम करके पैसा कमाएगा?"
" हां ।"
"क्या करेगा पैसा कमाकर?"
" कार खरीदूंगा-मकान खरीदूंगा ।"
"कार और मकान तो मैं तूझें वैसे ही दे दूंगा । तू इस जगह पर रह, कार किसी की भी उठा ले !"
मंगलू भवतारा को देखने लगा ।
"ठीक कहा न मैंने?" भवतारा मुस्कराया ।
"इस तरह तो मैं करूंगा क्या, बोर हो जाऊंगा ।"
"बोर क्यो होगा, तू मेरी सेवा में लगा रह । यहां तेरे को क्या कमी है?" भवतारा उठता हुआ बोला-----“मै अव आराम करूंगा । नीद आ रही है मुझे !"
"लेकिन मुझे दौलत.....!"
"बेकार की बाते न कर ।" भवतारा, कह उठा-" तेरे को दुनिया हर आराम हासिल है। दौलत का तेरे लिए कोई इस्तेभाल नहीं । जब चीज की जरूरत ही नहीं तो उसे मांगता क्यों है?"
वो सीढियों की तरफ बढ़ गया । . ,
मंगलू हक्का-बक्का रह गया ।
"लेकिन तूने तो कहा था कि मुझे ढेर सारी दौलत...... ।"
"मंगलू....." सीढियां चढता भवतारा कह उठा----"मुझे नींद आ रही है, बाद में बात करना ।"
मंगलू भवतारों को देखता रहा ।
भवतारा ऊपर पहुंचा और देखते-ही-देखते अपने कमरे में प्रवेश कर गया ।
मंगलू को अपने सपने टूटते-से महसूस हुए । भवतारा उसे दौलत हैं नहीं दे रहा, जबकि उसके मन में तो सिर्फ एक ही इच्छा थी । ढेर सारी दौलत पा लेने की इच्छा।
मंगलू ने मन-हीं-मन ये इरादा पक्का किया कि वो भवतारा से दौलत लेकर रहेगा ।
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