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खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज complete

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खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरीcomplete

Khabari.jpg



जानलेवा, तीखी गर्मी पड़ रही थी ।

जहाँ तक भी नजर जाती, सव कुछ सुलगता-सा लग रहा था ।

ये बंजर मेदान था और जमीन के साथ-साथ देखने से ऐसा लग रहा था, जैसे जमीन से धुआं निकल रहा हो, सूर्य जैसे अपनी सारी गर्मी इसी मैदान पर फेंक रहा हो । यूं तो हवा थमी-सी थी, पंरंतु एकाएक जव हवा उठती तो अपने साथ मैदान की मिट्टी को भी आगोश में लेकर उड़ा देती और वो धूल का छोटा-सा गुब्बार उड़ता हुआ दूर तक जाता दिखाई देता रहता ।

वो दो युवक थे जो इस जानलेवा गर्मी में वहां मौजूद थे ।

दोंनों की उम्र बीस-इक्कीस के करीब थी, परंतु वे फटेहाल थे । जिस्म पर पड़े कपडे फट रहे थे । बात इस तरह उलझे हुए थे जैसे उन्हें नहाए महीना बीत गया हो ।

पांवों में फटे जूते थे । गालो पर शेव के बाल भी बड़े हुए थे । उनकी हालत से स्पष्ट था कि लम्बे समय से भरपेट खाना भी उन्होंने. नहीं खाया है । कोई ट्रक उस मेदान में कूडा फेक गया होगा वे दोनों युवक उसी कूड़े की छानबीन कर रहे थे ।

वे इतने व्यस्त लग रहे थे कि तपती गर्मी का जैसे उन्हें अहसास ही नहीं हो रहा था ।

तभी एक युवक ने दूसरे से कहा।

“मंगलू! हमें दस दिन हो गए झुग्गी में गए ।"

" मैं मां से नहीं मिलूंगा । तुझे जाना है, तो जा ! मगंलू ने कहा ।

" क्यों ?"

"देख !" मंगलू अपने काम में व्यस्त बोला…" मां हमेशा बोलती रहती कोई काम करने को । वो समझती है कि मैं काम नहीं करना चाहता, जबकि मुझे काम मिलता नहीं । तेरे को तो सब पता है ।"

"इसमें मां का तो कोई कसूर नहीं ।" भानू ने कहा ।

"तो मेरी कहां गलती है? तू बेशक वापस चला जा, तेरा बापू अच्छा है ।"

"खाक अच्छा है ।" भानू ने मुंह बनाया-"दिन में पीता नहीं तो खाना भी खिलाता है, बात भी करता है । रात में जब पी लेता है तो गालियां देता है, मारता है । तूने तो देखा ही है, पचासों बार ।"

मंगलू कूडे के ढेर से छांट-छांटकर काम की चीजे एक तरफ रख रहा था ।

भानू भी ऐसा ही कर रहा था ।

"अगर मुझे कमाने की इच्छा न होती तो मैं कूड़े के ढेर में हाथ क्यों मारता? हम दोनों यही कोशिश कर रहे हैं कि यहां से इकट्ठा किए सामान को कबाडी के हाथ बेचकर दस-बीस रुपए मिल जाएंगे !"

"तू ठीक कहता है, लेकिन हमारी बात समझता कौन है?"

कूड़े को छानने में दोनों के हाथ तेजी से काम कर रहे थे ।

तभी मंगलू का हाथ किसी ठोस चीज से टकराया ।

वो रुका ।

उसने उंगलियों में पकडकर उस चीज को बाहर खींच लिया ।

पुराने-से कपड़े में लिपटी वो पतली-लम्बी चीज लगी कोई । उसने फौरन कपड़े के बल खोलने शुरू कर दिए । कुछ ही पलो बाद, लेदर के केस में फंसा उसके हाथ में चाकू थमा था ।

जो कि दस इंच लम्बा और करीब डेढ़ इंच चौडा था । उस चाकू की धार एक तरफ़ थी ।

अब तक मंगलू चाकू को लेदर के केस से बाहर निकाल चुका था । चाकू का फल पुराना हो रहा था । उसके आगे के हिस्से पर अभी भी सूखा हुआ खून लगा हुआ था, जो कि पुराना होकर दाग जैसा लग रहा था । स्पष्ट था कि वहुत पहले चाकू का इस्तेमाल किया गया और उसे साफ किए विना केस में रख दिया गया । उस पर तब का लगा खून सूखकर काला पड़ा और फिर जंग जैसा लगने लगा था ।

"चंद कदम दूर कूड़े के ढेर के पास बैठा भानू कह उठा ।

"ये क्या है?"

"चाकू है, पुराना है लेकिन प्चास रुपए मिल जाएंगे । साफ करके बेच देंगे । तब चमक जाएगा ।"

"ठीक है । साफ कर दे चाकू को. . !" कहकर भानू अपने काम में व्यस्त हो गया ।

मंगलू चाकू को साफ करने लगा ।

उसी पल उसके कानों में सरसराती आवाज़ गूंजी ।

"ये क्या कर रहा है मंगलू?”

मंगलू के हाथ रूके ।

चौंककर उसने आस-पास देखा । कोई न दिखा ।

“क्या देख रहा है, मुझे दूढ़ रहा है? मैं नहीं दिखूंगा तेरे को !" शब्दों की सरसराहट पुन: कानों में पड्री ।

" कौन है तु?" मंगलू के होंठों से निकला ।

"भवतारा हूं मैं । शैतान का बेटा ।"

"कौन शैतान?"

भानू अपना काम छोड़कर हैरानी से उसे देखने लगा था ।

"किससे बातें कर रहा है?" भानू ने उससे पूछा ।

मंगलू ने उसकी बात का ज़वाब न दिया ।

“ये चाकू मेरा है ।" शब्दों की सरसराहट पुन: कानों में पडी ।

"तुम्हारा?" मंगलू आस-पास देखता, चेहरे का पसीना पोंछते हुए कह उठा ।

"हां मेरा । मैंने इसे वहुत छिपाकर रखा था, लेकिन आज ये कूड़े के ढेर में पहुंच--।"

"मैं तुम्हें चाकू नहीं दूगा ।"

" क्यों ?"

" ये अब मुझे मिला है, मेरा है । मैं इसे प्चास रुपए में बेच दूंगा । ये तुम्हारा नहीं है ।"

"तुम्हें दौलत चाहिए?”

"हां ।”

"में दूंगा…बहुत दौलत दूंगा, लेकिन तुम्हें मेरा एक काम करना होगा !"

"क्या ?"

" ये चाकू लेक़र मेरी बताई जगह पऱ आना होगा ।"

"मैं ऐसा करूंगा तो तुम मुझे दौलत दोगे?"

"हां । दौलत के साथ-साथ अपना आशीर्वाद भी दूगा । आशीर्वाद तो तुम्हें अभी से मिल गया है ।"

"आशीर्वाद से क्या होगा?"

 
"तुम्हें अब कोई मार नहीं सकेगा । तुम मर नहीं सकोगे । भवतारा ने तुम्हें अपना लिया है । ये सब इसलिए हो रहा है कि मेरा चाकू तुम्हारे पास है और इसे लेकर तुम मेरी बताई जगह पर आने वाले हो ।" उसके कानों में सरसराहट गूंज रही थी-“तुम्हें चाहिए कि मुझे अपना गुरु मान लो ।"

"उससे क्या होगा?"

" फिर मेरी सरपरस्ती में आ जाओगे जो काम करोगे, शैतान के लिए । तुम्हें वहुत दौलत दूगा ।"

"मुझे मंजूर है ।"

"अब तुम मेरे हुक्म के गुलाम बनने जा रहे हो ।"

"लेकिन मैं कैसे यकीन कर लूं कि ये चाकू तुम्हारा है?" एकाएक मंगलू'ने कहा ।

" तुम्हें ये जानने की जरूरत भी क्या है । तुम तो चाकू को पचास रुपए मे बेचने की सोच रहे थे और मैं तुम्हें इस चाकू के बदले बेपनाह दौलत देने जा रहा हूँ । अपनी सरपरस्ती भी तुम्हें देने जा रहा हूं ।"

“तुमने ये चाकू कहाँ रखा था?"

"ज़मीन के नीचे । छिपाकर । वो भी दस साल पहले की बात है । ये बाते फुर्सत में पूछना । अब खामोश हो जाओ । मेरा आशीर्वाद तुम्हें देने जा रहा हूं ।" इसके साथ ही सरसराहट कानों से पड़नी बंद होगई ।

अगले ही पल मंगलू को अपनी सांसों में अनजानी-सी महक का अहसास हुआ । मदहोश कर देने बाली महक थी वो । मगंलू को लगा जैसे किसी नशे में उतरता जा रहा हो ।

चंद पल-ऐसे ही रहे।

फिर मंगलू को लगा जैसे उसके शरीर के भीतर किसी अनजानी-सी शक्ति का संचार हो गया हो । उसने खुद को पहले से हल्का महसूस किया । भूख भी लग रही थी, जो कि एकाएक समाप्त हो गई ।

और वो महक जैसे उसकी सासों का हिस्सा बन गई हो । तभी भानू पास आया !

" तू किससे बात कर रहा ? क्या हुआ तुझे ?"

मगंलू ने भानू को देखा ।

मंगलु-की आंखों में अजीब-सी चमक पाकर भानू हैरान हुआ ।

"क्या हुआ तुझें?"

तभी मंगलू कानों में पुन् सरसराहट गूंजी ।

" मगंलू ......!"

" हां !"

" अब तू वहुत पैसे वाला बन जाएगा । तूने इस दोस्त को क्या करना है । मार दे इसे ।"

“कैसे ?"

"तेरे हाथ में मेरा चाकू हैं,वो निकाल और खत्म कर दे भानू को ....!"

"क्या हुआ ?" उलझन में फंसे भानू ने पूछा ।

तभी मंगलू ने दांत भींचकर चाकू वाला हाथ आगे किया और पूरा का पूरा फ़ल भानू के पेट में घुसेड़ दिया ।

भानू के होंठों से तीव्र चीख निकली ।

मंगलू ने चाकू वापस खींच लिया ।

भानू नीचे गिर गया ।

मंगलू के चेहरे पर खूंखारता के भाव नजर आ रहे थे ।

खून से सना चाकू थामे वो पुन: आगे बढा और तड़पते भानू पर झुका और चाकू की नोक से एक ही बार में भानू का गला काट दिया ।

भानू जोरों से पुन: चीखा, फिर तड़पने लगा ।

मंगलू खून से सना चाकू उसकी कमीज से साफ करने लगा तो कानों में सरसराहट पडी ।

"ये क्या कर रहा है?"

मंगलू एकाएक ठिठक गया ।

"चाकू पर से खून साफ़ कर रहा हूं।"

"इसी खून की तो मुझे ज़रूरत है । इसे साफ न कर । वापस केस में डाल ले ।"

 


मंगलू ने चाकू को लैदर केस में बापस डाला । वो अपने मे अजीब-सी शक्ति का अहसास कर रहा था ।

भानू को वो नहीं मारना चाहता था, परंतु कोई शक्ति उससे ये काम करा रही थी ।

" खूब समझदार है । मेरा नाम रोशन करेगा मेरी दुनिया में तेरा स्वागत है !"

" अब मैं क्या करूं ?" मंगलू बोला ।

"ये चाकू लेकर तुझे मेरे पास आना है ।”

" तू किधर है भवतारा?" मंगलू ने पूछा ।

“पश्चिम दिशा की तरफ चलना शुरू कर दे । मैं तेरे को रास्ता बताता रहूंगा ।"

“ठीक ।" मंगलू ने चाकू वाला लैदर केस मुट्ठी में जकड़ा और उस मैदान से पश्चिम दिशा की तरफ़ बढ गया ।

मोना चौधरी बहुत तेज गति से कार चला रही थी ।

पारसनाथ के पास पहुंचना था उसे ।

पारसनाथ ने किसी ऐसे आदमी को पकड़ रखा था जिससे उसे कुछ पुछना था । इस वक्त सडकों पर भीढ़ कम थी वाहनों की । गर्मी इतनी ज्यादा थी कि आज लोग घर में ही रहना पसंद कर रहे थे । जिन्हें वहुत जरूरी काम था, वो ही घर से निकल रहे थे ।

गर्मी की वजह से कार का ए .सी . भी बढिया ढंग से काम न कर रहा था । फिर भी कार के ए .सी . से इतना फायदा था कि पसीना नहीं बह रहा था ।

सड़क खाली थी । कार की गति तेज थी ।

एकाएक मोना चौधरी के हाथ-पांव फूल गए ।

सड़क के किनारे से चलता हुआ कोई एकाएक सडक के बीचोबीच आ गया था ।

वो और कोई नहीं मंगलू था । हाथ में जिसने केस में बंद चाकू थाम रखा था । वो तो सडक के किनारे किनारे पैदल जा रहा था कि एकाएक कानो में पड़ने वाली सरसराहट ने उसे आदेश दिया कि वो सड़क पार करे । यही वजह थी कि मंगलू उसी पल आगे वढ़ना छोड़कर सड़क पार करने लगा था और मस्तिष्क में उठते विचारों की वजह से वो इस कदर व्यस्त था कि सडक पर नजर डालने का उसे ध्यान ही न रहा ।

ध्यान तब आया जब कारों के ब्रेक चीखे । मंगलू ने कार की तरफ़ देखा जो कि सिर पर आ चुकी थी । उसने कार से बचना चाहा था । परंतु उसी पल घड़ाम!

कार उससे टकराई और अगले ही पल वो कार में उलझता चला गया । फिर फौरन ही कार रुकी, परंतु तव तक मंगलू का काम हो गया था । "

मोना चौधरी सिर से लेकर पांव तक काप उठी थी ।

ये क्या हो गया उससे? अपनी जिन्दगी में जाने कितनों की जान ली थी, याद नहीं था, परंतु इस तरह किसी को कार से कुचलकर मारना, उसके लिए बडी बात थी ।

आज पहली बार उसने खुद को कांपता-सा महसूस किया था ।

सवाल ये नहीं था कि गलती उसकी थी, जो एकाएक ही उसकी कार के सामने सड़क पर आ गया था । मुद्दा ये था कि उसकी कार के नीचे आकर किसी की जान चली गई । जिस बुरी तरह से कार की टक्कर उसे लगी थी, वो किसी भी सूरत में जिन्दा नहीं बचा रह सकता था ।

मोना चौधरी दरवाजा खोलकर बाहर निक्ली ।

अव तक अन्य वाहन भी रुकने लगे थे ।।

दरवाजे को खुला छोड़कर ही आगे बढी और सारा नजारा देखते ही उसका दिल धक से रह गया । मंगलू मरा पड़ा था । कार के नीचे आकर कुचला गया था । कार का पहिया गर्दन पर चढ गया था ।

टाग पर भी चोट आई लग रही थी । उसकी आखें बंद थी । सबसे खास बात तो ये थी कि लेदर केस में फंसा चाकू अभी तक उसके हाथ में दबा हुआ था ।

मोना चौधरी ने भी उस लेदर केस को देखा।

वो सामान्य-सा लेदर केस था ।

मोना चौधरी के चेहरे पर दुख-ही-दुख नजर आ रहा था ।

अपने वाहन रोककर वहीं पाच-सात लोग इकट्ठा हो गए थे ।

" तुमने मार दिया इसे ।।"

" मोना चौधरी ने गर्दन घुमाकर देखा । उसके पास ही चालीस बर्ष की औरत खडी थी ।

"ये अचानक मेरी कार के सामने आ गया था ।"

"तुम्हें कार धीमे चलानी चाहिए थी । मैंने देखा, तुम कार बहुत तेज चला रही थी ।"

"मुझें दुख है इसकी मौत का !"

" ये बात पुलिस से कहना ।"

"पुलिस !" मोना चौधरी चौकी । आस-पास देखा ।

"भागना मत । हम तुम्हें भागने नहीं देगे !" उस औरत ने कहा, फिर वहां खडे लोगों से बोली------" मेरे ख्याल में ये भागने की सोच रही है ।इसे भागने मत देना । मैं पुलिस को फोन करती हूं।" कहकर वो औरत वहां से हट गई।

पुलिस के चक्कर में पड़ने का मोना चौधरी का कोई इरादा नहीं था । पुलिस ने उसे पकड लिया तो वो ये भी पहचान जाएगी कि वो मोना चौधरी है ।

तभी एक युवक पास पहुंचा और धीमे स्वर में बोला ।

"यहां खडी क्या कर रही हो । खिसक लो । पुलिस आ गई तो पकड़ी जाओगी ।"

" मै भी यही सोच रही हूं।" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा ।

"तुम्हारी कार का नम्बर बहुतों ने नोट कर लिया होगा ।" युवक बोला । "

"कार मेरे नाम पर रजिस्टर्ड नहीं है ।" मोना चौधरी ने कहा और मंगलू पर नजर डालकर पलटने लगी कि ठिठकी ।

उसने मंगलू की पलकों में कम्पन देखा था ।

"ये जिन्दा है ।" मोना चौधरी के होंठों से निकला ।

"नहीं मर चुका है ।"

"मैंने पलकें हिलते देखी हैं?"

"तुम्हारा दिमाग खराब हो गयाहै ।" युवक ने मुंह बनाया ।

मोना चौधरी की निगाह एकटक मंगलू-पर थी ।

"वो देखो ।" मोना चौधरी तेज स्वर में बोली------" हाथं की उंगली हिली है ।"

" हां , मैंने भी देखा है ।" वहां खड़े अन्य व्यक्ति ने भी कहा ।

"इसे उठाकर मेरी कार में डालो, मैं इसे अस्पताल में ले जाती हूं। जल्दी करो !" मोना चौधरी के कहते ही वो युवक और दो अन्य आदमी नीचे पड़े मंगलू को उठाने लगे । मोना चौधरी ने कार का पीछे का दरवाजा । खोला । तीनों मंगलू को उठाकर लाए और कार की पीछे की सीट पर लिटा दिया । अजीब बात तो ये थ्री कि चाकू वाला लैदर केस अभी भी उसकी मुट्ठी में ज्रकड़ा हुआ था ।

कार के दरवाजे बंद किए गए ।

मोना चौधरी ड्राइविंग सीट पर बैठी और ज़ल्दी से कार आगे बढ़ा दी

बीस मिनट वाद मोना चौधरी ने कार को शहर के नामी हाँस्पिटल के इमरजेंसी गेट के सामने ले जाकर रोका और जल्दी से दरवाजा खोलकर पीछे की सीट पर निगाह डाली ।

उसी पल ठिठक गई मोना चौधरी।

हैरत से उसकी आंखें फैल गई ।

 


मंगलू पिछली सीट पर आराम से बैठा था ।

"त-----तुम?" मोना चौधरी के होठों से अजीब-सा स्वर निकला…" होश में आ गए?"

"हां ।"

" "तुम धायल होगे------मै अभी डॉक्टर. .!" मोना चौधरी ने कहना चाहा ।

"मैं ठीक हूं । मुझे कोई चोट नहीं लगी ।" मंगलू ने शात स्वर में कहा ।

"ये कैसे हो सकता है?"

"यहां से चलो । मुझे डॉक्टर की जरूरत नहीं है ।"

मोना चौधरी कुछ पल अनिश्चित-सी खडी रही !

"क्या सोच रही हो?”

"तुम्हारे बारे में कि तुम कैसे ठीक हो गए । तुम तो जख्मी थे ।"

" कितनी बार कहूं कि मैं ठीक हूं।" मगंलू का स्वर तीखा हो गया ।

मोना चौधरी ने गहरी निगाहों से उसे देखा ।

"चलो यहां से !"

अजीब-सी हालत में फंसी मोना चौधरी वापस स्टेयरिंग सेट पर बैठी और कार आगे बढा दी ।

देखते-ही-देखते कार अस्पताल से निकलकर, सड़क पर आ गई ।

"मंगलू. !" तभी भवतारा की फुसफुसाहट, उसके कानों पडी ।

"हां ।" मंगलू के होंठ हिले ।

मंगलू की मद्धिम-सी आवाज सुनकर मोना चौधरी ने शीशे के द्वारा पीछे बैठे मंगलू को देखा ।

"मेरी शक्तियों ने तुम्हें ठीक कर दिया है, परंतु अभी तुम्हें आराम की जरूरत है 1"

"मुझें क्या हुआ था?" मगलु ने पूछा ।

" तुम मर गये थे. .।" भवतारा की फुसफुसाहट कानों मे पड़ी ।

मंगलू ने गहरी सांस ली ।

" क्या हुआ ?" वो ही अवतारा की सरगोशी ।

"मुझे भी कुछ समय पहले कुछ अजीब-सा महसूस हुआ था । मुझे लगा जैसे जलती हुई जगह में पहुच गया हूं । वहां हर तरफ आग ही आग लगी है । लोग चीख-पुकार कर रहे । जाने क्या कह रहे थे बो, मेरी समझ में न आया ।"

" तुम नर्क में पहुच गए थे ।"

"नर्क मे?"

"हां । मौत के पश्चात तुमने नर्क में प्रवेश किया था । नर्क का ही दृश्य था, जो तुमने बताया ।"

"ओह तो मैं सच में मर गया था?”

"हां, परंतु मैंने तुम्हें नर्क से वापस भेजकर तुम्हारी जान बचा ली । तुम आसानी से नहीं मर सकते । तुमने शैतान के बेटे भवतारा की सरप्ररस्ती कबूल कर ली है । मेरे हुक्म के गुलाम बन चुके हो तुम और मैं अपने गुलामों की खूब देखभाल करता हूं । क्योकि मेरे गुलाम सलामत रहेंगे, मेरे हक में बढिया काम करेगे तो मेरा नाम और भी ज्यादा होगा ।"

मंगलू ने कुछ नहीं कहा ।

"मृत्यु में प्रवेश करने के वजह से तुम कमजोर पड़ गए हो । अगले तीन दिन तक तुम्हें आराम करना होगा । उसके बाद तुम पहले के तरह स्वस्थ हो जाओगे ।"

"कहां आराम करूं मैं ?"

"जो युवती कार चला रही है, इसके घर में आराम करो तीन दिन तक?”

“ये मुझे अपने घर ले जाएगी?"

"तुम कहो इसे-बात करो ।"

मोना चौधरी बारम्बार शीशे के द्वारा पीछे बैठे मंगलू को देख रही थी और हैरान थी कि वो किससे बाते करं रहा है ।

मंगलू की मद्धिम-सी आवाज उसके कान में पड़ रही थी ।

“सुनो !" मंगलू बोला…" क्या नाम है तुम्हारा?"

" मोना चौधरी. . .!"

"मैं मंगलू हूं।”

"तुम अभी किससे बाते कर रहे थे?" मोना चौधरी ने पूछा ।

मैं किसी से भी नहीं ।"

"तुम बातें कर रहे थे !"

"शक में न पडो । मेरी आदत है, अपने से बाते करते रहने की !'

मोना चौधरी के चेहरे पर संदेह की परछाइयां व्याप्त थी ।

" तुम मेरी कार के नीचे आकर लगभग मर ही गए थे ! मैंने जब देखा तो तुम मेरे हुए थे !"

मंगलू हंस पड़ा !!

"क्यों हंसे?”

" अगर मैं मर गया था तो फिर जिंदा कैसे हो गया? मरे हुए भला कभी जिन्दा होते हैं!"

"तुम धायल भी हुए थे । कई जगह से तुम्हारा खून निक्ला ।"

“अच्छा फिर?"

"फिर तुम अचानक ही ठीक हो गए।”

"अच्छा मजाक कर लेती हो । तुम्हें खुश होना चाहिए कि तुम्हारी कार के नीचे आकर मैं मरा नहीं !"

"खुश हूं ।" मोना चौधरी के माथे पर उलझन के बल नजर आ रहे थे ।

" मेरी तबीयत ठीक नहीं है । मुझे तीन दिन आराम करना है ।" मंगलू ने कहा ।

" तो ?"

"मेरा कोई धर नहीं है । क्या मैं तुम्हारे घर पर आराम कर सकता हु!" मगंलू ने कहा ।

“ठीक, मैं तुम्हें अपने घर ले चलती हूं।"

"मेहरबानी… !"

"ये तुमने हाथ में क्या पकड रखा है?"

"चाकू है ।"

“क्यों पकडा है?"

"ये मेरा नहीं, किसी का है । उसे वापस लौटाना है ।" मंगलू ने कहा ।

"इस तरह चाकू पकडकर सड़को पर घूमोगे तो पुलिस पकड लेगी ।"

मंगलू चुप रहा।

 


"तुम्हारे कपडे वहुत गंदे है ।"

"जानता हूं । तुम चाहो-तो मुझें नए कपडे ले देना । मैं महीने भर से नहाया भी नहीं । तुम्हारे घर में नहाने को पानी है?"

"वहुत है । तुम सारा दिन नहा सकते हो?"

कार तेजी से दौडी जारही थी।

“मंगलू !" एकाएक उसके कानों में भवतारां की फुसफुसाहट , गूंजी…“अव तीन दिन तुम इसके घर पर ही आराम करोगे । एक बात मेरी खास याद रखना कि तुम इन तीन दिनों में किसी भी हाल में घर से बाहर नहीं निक्लोगे ।"

" .… "ठीक है ।"

"और मेरी अमानत यानी क्रि इस चाकू को अपने पास सुरक्षित ही रखोगे ।"

"तुम तो ऐसे का रहे हो जैसे कहीं जा रहे हो?"

"हां, मुझे किसी दूसरे काम में भी व्यस्त होना है, परंतु मेरी अदृश्य शक्तियां तुम्हारे भीतर मौजूद रहेगी और जरूरत पड़ने पर मैं भी तुम्हारे पास आ जाऊंगा । अव तुम मेरी सरपरस्ती में हो । तुम्हें डरने की जरूरत नहीं । जहाँ शेतान का बेटा भवतारा होता है, वहां कोई खतरा नहीं आता !"

मंगलू खामोश रहा ।

मोना चौधरी कार ड्राइव करते कह उठी ।

"तुम अब फिऱ किसी से बातें कर...?"

"कितनी बार कहू कि मुझें अपने से बाते करने की आदत है । लोग मन-ही-मन सोचते हैं, परंतु मै सोचता नहीं, बोलता हूं । मेरे लिए ये सामान्य बातं है, तुम्हें चिंता नहीं करनी चाहिए ।"

मोना चौधरी जानती थी कि बहुत अजीब बाते उसके-सामने आ रही हैं । ये मर गया, परंतु फिर जिन्दा हो गया । घायल था ये, परंतु अब कहीं कोई जख्म नजर नहीं आ रहा ।

मिनटों में सारे जखत्म कहां चले गये !!

मौत के पश्चात ये जीवित कैसे हो गया?

और ये बातें करने के अंदाज में ये अपने से क्या बाते करता है

बहुत बातें न समझ में आने वाली थी ।

" धर में और कोन कौन-हैं?" मंगलू ने पूछा ।

" कोइ नहीं ।"

" अकेली हों"

"हां !"

"मां-बाप ?"

"नहीं हैं ।"

" शादी?"

"नहीं की !"

"लेकिन तुम खूबसूरत हो । मुझे अच्छी लगने लगी हो ।" मंगलू मुस्कराया ।

“क्या तुम मेरे घर पर मेरी खूबसूरती देखने चल रहे हो?” मोना चौधरी ने पूछा ।

"मुझें तीन दिन आराम करना है । नए कपडे ले देना । शेव करने का सामान तो तुम्हारे घर पर होगा ही ।"

" मैं क्या शेव करती हू जो मेरे पास शेव का सामान होगा ही?" मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा ।

“नहीं है तो बाजार से ले लो ।" मंगलू मुस्कराया।

" कुछ देर बार मोना चौधरी ने एक दुकान के सामने कार रोकी और उतरकर दुकान मे चली गई । दस मिनट बाद शेव के सामान के साथ वापस आई और भीतर बैठकर कार को पुन आगे बढा दिया ।।

"तुममें मुझे क्यों कोई अजीब बात लग रही है!" मोना चौधरी ने कहा ।

"मुझमें कुछ भी अजीब नहीं है । तुम क्या करती ही?”

"तुम्हें मेरे काम से क्या मतलब? तुमने तीन दिन आराम करने के लिए, मेरे धर में जगह मागी तो जगह तुम्हें दे रही हूं । इससे ज्यादा मेरे भीतर घुसने की चेष्टा न करो ।"

"अहसान नहीं कर रही मुझ पर तुमने मुझें कार कै नीचे, कुचला । इसी से मेरी तबीयत खराब हुई है । अगर मैं मर गया होता अब तक तुम्हें पुलिस ने पकड़ लिया होता ।"

" ये बात है तो शाबाशी किसे मिले----तुम्हें कि तुम मरे नहीं या मैंने तुम पर पूरी तरह कार नहीं चढाई?" मोना मुस्करा पडी ।

मगलू खिडकी से बाहर देखने लगा । "

"कभी तुम मेरे परिवार के बारे में पूछते हो तो कभी शादी के बारे में ! कभी मेरी खूबसूरती की तारीफ़ करने लगते हो और तुम्हारी हालत देखकल लगता है जैसे तुमने दस दिन से खाना न खाया हो।”

" अब सव ठीक हो जाएगा ।" मंगलू बड़बड़ा उठा ।।

"क्या ठीक हो जाएगा?" मोना चौधरी ने उसकी बड़बड़ाहट सुन ली थी। शीशे में से मंगलू को देखा ।।

मंगलू मुस्कराया और बेहद रहस्यमय लगा ।

कुछ देर बार ही मोना मंगलू के साथ अपने अपार्टमेंट पर आ पहुंची थी ।

मोना चौधरी सीढियां चढकर अपने फलैट के दरवाजे पर पहुंची, पीछे मंगलू था उसके एक हाथ में लेदर केस था चाकू सहित और दूसरे हाथ में शेव के सामान का लिफाफा था ।

मोना चौधरी ने दरवाजे पर चाबी लगाई कि नंदराम की आवाज कानों से पड्री ।

“साईं, ये तेरे को किया हो गया है नी.. .!"

मोना चौधरी ने गर्दन घुमाकर देखा।

 


नंदराम अपने फ्लैट का दरवाजा जरा-सा खोले, उसमें से मुर्गे की तरह गर्दन बाहर निकाले नाराजगी भरी नजरों से उसे देख रहा था ।

"क्या हो गया?"

"तेरा स्टैंडर्ड इतना डाउन हो गया नी, ये गंदे से छोकरे को अपने साथ ले आई ।"

"तूने इसे पहचाना नहीं?" मोना चौधरी ने चाबी लगाकर दरवाजा खोला ।

“पहचाना नेई-क्यों वडी कौन सी तोप है नी?"

"कासिम खान है । नया सुपर स्टार है मेकअप में है । सीधा शूटिंग से आ रहा है ।"

"हाय नी-----नए सुपर स्टार की ये हालत होगई, क्यों साईं कीचड को में गिर गया था क्या?"

मोना चौधरी मंगलू के साथ भीतर आई और दरवाजा बं कर दिया ।

मंगलू ने उस शानदार फ्लेट में नजरे घुमाई ।

"तुम जैसे आराम करना चाहते हो करों । तीन दिन के लिए इसे अपना ही धर समझो" ।

"अच्छी जगह है । मैं पहले शेव करूंगा, फिर नहाऊगा ।"

" चलो बाथरूम दिखा दुं वहां तुम शेव भी कर सकते हो ।"

"तुम मेरे लिए कपडे नहीं लाई । नहाकर क्या ये ही गदे कपड़े पहनूंगा?"

मोना चौधरी पीछे वाले बेडरूम में पहुंची ।

मंगलू उसके साथ था ।

अलमारी में से मोना चौधरी ने महाजन की प्रेस हुई कमीज़ और पैंट निकाली और उसे दे दी।

" नहा-धोकर इन कपडों को पहन लेना । शाम को मैं तुम्हें नए कपड़े ला दूगी ।"

"ये किसके कपडे हैं!"

"मेरे दोस्त के ।"

"बो आता रहता है यहा-मेरां मतलब क्यों आता है ?" मंगलू ने पूछा ।

" मोना चौधरी ने सख्त निगाहों से उसे देखा ।

"मैं तो यूं ही पूछ रहा था ।" मुस्कराकर बोला मंगलू।

तभी मोना चौधरी के मोबाइल फोन की वेल बजी ।

मोना चौधरी ने फोन निकालकर स्क्रीन पर आया नम्बर देखा वो पारसनाथ का था ।

“मैं अभी नहीं आ रही पारसनाथ ।।" मोना चौधरी ने फोन पर कहा ।

“लेकिन तुमने तो फोन पर घंटा-भंर पहले कहा था कि चल रही हो ।"

"हां , कहा था । चली थी , परंतु रास्ते मे एक्सीडेंट हो गया और .....!"

"एक्सीडेंट-क्या तुम ठीक हो ?"

"हां, ठीक हूं । अब मैं दो घंटे बाद ही आ पाऊंगी 'म। वोहरा कहाँ है?"

"पकड रखा है मैंने उसे । वो तुम्हारा पैसा देने को तेयार हो गया ।"

"तो ले लो।" मोना चौधरी ने कहा।

"सबक नहीं सिखाना उसे क्या ?"

" वार्निग दे दो । समझा दो कि हैरा-फेरी का क्या अंजाम होता है !"

" मोना चौधरी ने फोन बंद करके जेब में डाला ।

मंगलू महाजन वाले कपड़े लिए बाथरूम में जा चुका था । मोना चौधरी वापस ड्राइंगरूम में आकर बैठी और सिगरेट सुलगाकर कश लेने लगी । रह-रहकर उसका मस्तिष्क मंगलू की तरफ़ जा रहा था कि उसमें क्या अजीब बात है?

क्यों दो कार के नीचे कुचले जाने के बादे भी बच गया ?

कैसे उसके जख्म शरीर से लुप्त हुए और वो सामान्य नजर आने लगा ।

मंगलू रहस्यमय था ।

ये ही विचार बार-बार मोना चोघरी कै मन में आ रहा था ।

सिगरेट के कश लेते मोना चौधरी उठी और ड्राइंगरूम से बाहर निकलकर बाथरूम के दरवाजे पर पहुंची, जो कि खुला हुआ था ।

भीतर झांककर देखा तो मंगलू को शीशे के सामने शेव करते पाया ।

"किसी चीज की जरूरत तो अबाज दे देना ।" मोना चौधरी ने कहा ।

"सब कुछ है यहां. .!" मंगलू ने शीशे से दरवाजे पर खडी मोना चौधरी को देखा ।

मोना चौधरी वहां से हटी और वापस कमरे मे आ गई ।

एकाएक वो ठिठकी । उसकी निगाह लेदरकेस पर पडी जिसमें चाकू मौजूद था । वो सामने ही दीवार के साथ लगा रखी तिपाई पर रखा हुआ धा । क्या है खासे इसमें कि मंगलू इसे हर वक्त अपने पास रखे हुए है । उत्सुकता से भरी मोना चौधरी आगे बढी और चाकू का केस उठा लिया ।

उसे खोला । उसमें पड़ा चाकू खींचकर बाहर निकाला ।

चाकू के फल पर सूखा हुआ खून-देखकर मोना चौधरी की आंखें सिकुड्री । उसकी निगाह चाकू के दस्ते पर, चाकू पर जाने लगी । जल्दी ही उसे इस बात का अहसास होने लगा कि चाकू वहुत पुराना है । दस्ता सोने की तरह चमकता हुआ पीला था और उस पर नक्काशी के अलावा, नगीने शायद हीरे जड़े हैं रंग-विरंगे । चाकू के सवा इंच चौडे फल पर खोपडी का निशान बना हुआ-था ।

शेव करते-करते मंगलू एकाएक ठिठका

सिर में खिंचाव-सा महसूस हुआ, फिर कानों में एक सरगोशी पडी ।

"मंगलू-है..तू !" ये आवाज उसने पहली बार सुनी थी ।

"कौन है तू ?"मगंलू के होंठों से निकला ।

“शेतान के बेटे भवतारा का छोटा-सा सेवक! ”

"नाम क्या तेरा?"

"जंगला !"

"मेरे पास क्यों आया है?”

"शेतान का बेटा, किसी काम में व्यस्त हो चुका है तीन दिन के लिए, मुझे उसने तेरे पास छोडा है, कि तू गलती करने लगे तो मैं तेरे को वक्त पर समझा दूं।" जंगला की आवाज कानों में धीमे से पड़ रही थी ।

 


"मैंने कोई गलती कर दी क्या?"

"बहुत बडी! शैतान के बेटे की अमानंत कहां है?"

"अमानत..... वो .... चाकू... .?"

“हां ।"

"बाहर तिपाई पर रखा !”

"उसे मोना चौधरी ने उठा रखा है और उसे खोलकर भी देख रही है !"

"ओह !"

"अगर उस चाकू पर से तेरा अधिकार छिन गया तो जानता है शेतान का बेटा तुझे कितनी बुरी मौत मारेगा । तेरी जो आवभग़त वो कर रहा है, अपनी अमानत की वज़ह से कर रहा है, वरना तू इस लायक नहीं है कि तेरे को शैतान का बेटा अपनी सरपरस्ती में ले ले । भवतारा ने वहुत बड़ा अहसान किया है तुम पर...... !"

मगलू का चेहरा गुस्से से भर उठा । वो तेजी से दरवाजे की तरफ बढा ।

"कहा जा रहा है?” जंगला की सरगोशी उसके कानों में पडी ।

"मोना चौधरी से वो चाकू लेने जा रहा हूं।"

“तो गुस्से में क्यों है । अन्तिम से काम ले अभी तेरे को तीन दिन यहां रहना है ।"

मंगलू ठिठका दो-तीन लम्बी सांसे लेकर उसने खुद पर.काबू पाया और चेहरा शांत करते बाथरूम से निकला कि ठिठक गया। सामने ही मोना चौधरी दिखी ।

मोना चौधरी बाथरूम के दरवाजे की तरफ़ ही देख रही थी !

"किससे बाते कर रहे थे ?" मोना चौधरी ने पूछा ।

मंगलू की निगाह उसके हाथ में थमे चाकू पर जा टिकी । वो आगे बढा । उसके हाथ से चाकू और लेदर केस लेकर, चाकू उसमे रखा और मोना चौधरी से कहा ।

"तुम्हें इस चाकू को नहीं छेड़ना चाहिए था ।"

"क्यों?"

" तुम जानती हो कि ये चाकू किसी की अमानत है । ये बात तुम्हें पहले भी बता चुका हूं . . , !"

मोना चौधरी की निगाह मंगलू पर टिकी थी ।

" तुमने बताया नहीं कि बाथरूम में किससे बाते कर रहे थे ?"

"ये बात भी तुम्हें बता चुका हूं कि मुझे अपने से बाते करने की आदत है !"

"मैंने तुम्हारे शब्द सुने ।"

" क्या ?"

"तुम कह रहे थे-मोना चौधरी से चाकू लेने जा रहा हूं-इसका मतलब कि तुम्हें किसी ने बताया कि चाकू मैंने उठा रखा ।"

"तुमने. ..!" मंगलु-मुस्कराया-------" मेरे अलावा किसी और की आवाज सुनी !"

"नहीं ।"

" तो, फिर?"

"लेकिन तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि चाकू मेरे हाथ में है ।" मोना चौधरी कह उठी ।

मंगलू मोना चौधरी को देखने लगा ।

"क्या तुम दीवारों के पार देखते हो?"

"पागल तो नहीं हो गई हो तुम?"

"तो फिर तुम्हें कैसे पता चला कि मैंने चाकू उठा लिया है?"

"तुम्हारे कान बज रहे हैं क्योकिं मैंने ऐसा नहीं कहा । मैं तीन दिन आराम करना हूं और तुम बातें करके मुझे परेशान कर रही हो ।" मंगलू ने शात स्वर में कहा---"मैं जाऊं यहां से ?"

" तुम मेरी कार टकराए हो इसलिए तीन दिन मेरे घर पर आराम से रह सकते हो । मैं बाहर जा रही हूं । तुम दरवाजा भीतर से बंद कर लो ।" मोना चौधरी ने पलटते हुए कहा ।

"कहा जा रही हो?"

"तुम्हारे कपडे लेने । कोई फोन बजे तो तुमने नहीं उठाना है । डोर बेल बजे तो दरवाजे में लगी आई मैजिक देख लेना कि बाहर कौन है, मैं हुईं तो दरवाजा खेलना, नहीं तो मत खोलना । कुछ खाने का मन हो तो फिज में देख लेना । वहीं खाने का सामान रखा है ।"

मंगलू उसके पीछे चलता ड्राइंगरूम में आ गया ।

मोना चीधरी ड्राइंगरूम के प्रवेश द्वार के पास पहुंचकर ठिठकी । उसे देखा ।

मंगलू की निगाहों को उसने अपने शरीर पर फिर से पाया ।

मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े । मंगलू ने सकपकाकर मुंह फेर लिया ।

"तुम मेरे यहां मेहमान हो । अपने स्तबे की कद्र करो । कोई भी ऐसी हरकत्त मत करना कि तुम्हें बाहर निकलना पड़े ।"

"मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया !"

"लेकिन करने की नीयत रखते हो !" मोना चौधरी ने उसे घूरा ।

"नहीं मेरी नीयत बित्कल साफ है ।”

मोना चौधरी ने दरवाजा खोला और मगंलू के हाथ में दवे केसयुक्त चाकू को देखा ।

"बंद करों ।" कहकर मोना चौधरी बाहर निकल, गई ।

मंगलू ने दरवाजा बंद कर लिया ।

मोना चौधरी कुछ पलों तक बंद दरवाजे को देखती रही ।

वो ये न देख सकी कि दरवाजे पर लगी आई मैजिक में से मंगलू उसे देख रहा है । फिर मोना चौधरी पलटी और नीचे जाने वाली सीढियों की तरफ बढ़ गई । सीढियां उतरकर नीचे पार्किग में खडी अपनी कार के पास पहुची और मोबाइल निकालकर पारसनाथ का नम्बर मिलाया ।

दो-तीन बार काई करने कै बाद नम्बर मिला ।

" हैलो !" पारसनाथ की आवाज़ कानों में पड्री ।

" तुम अपने रेस्टोंरेट में हो?"

"हां ।"

"में वहीं आरही हूं।"

“डिसूजा वोहरा के साध गया है पैसे लेने ।"

"कोई बात नहीं, मैं पैसे के लिए नहीं आ रही ।"

 


पारसनाथ ने मोना चौधरी की कही सारी बात सूनी !

मोना चौधरी के खामोश होते ही वो कह उठा ।

"अजीब-सी बात बता रही हो तुम ।"

“सच में अजीब है।" मोना चौधरी के चेहरे पर सोच के भाव मंडरा रहे थे ।

"बो तुम्हारी कार के नीचे कुचला गया । मर गया था?"

"हां ।"

"तब तुमने चेक किया था कि वो मर गया है?" पारसनाध ने पूछा ।।

"बिना चेक किए ही मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि तव वो मर गया था ।" मोना चौधरी ने दुढ़ स्वर में कहा ।

"और फिर वो जिन्दा हो गया?" पारसनाथ ने उसे देखा ।। मोना चौधरी ने सहमति मे सिर हिलाया ।

दोनों कई पलों तक खामोश निगाहों से एक-दुसरे को देखते रहे ।

“क्या ये सम्भव है कि कोई मर जाए और फिर जिन्दा हो जाए?"

"ये सम्भव हुआ है । इतना ही नहीं, उसके शरीर की सांरी टूट फूट ठीक हो गई । इसके अलावा उसके शरीर पर जो ज़ख्म वने थे , वो भी जाने कहां गायब हो गए । एकदम ठीक नजर आने लगा वो !"

"हेरानी है।”

" इसी हैरानी के वजह से मैंने उसे अपने घऱ में ठहरा लिया है । कहने लगा कि मुझें तीन दिन आरास की जंरूरत है । उसका एक्सीडेंट हुआ है, इसीलिए उसे आराम की आवश्यकता है ।"

मोना चौधरी गंभीर स्वर में बोली-------"सबसे बडी हैरत की बात वो चाकू है, जिसे उसने हर पल थाम रखा था । एक्सीडेंट के वक्त भी उसकी मुट्ठी मे ज़कड़ा था । दिखने मे वो साधारण-सा चाकू है, परतु वो पुराना है !"

"पुराना है?”

" हां ,जैसे कि सौ साल पहले का हो या इससे भी ज्यादा । चाकू का दस्ता रंग-बिरंगे हीरे-पन्नों से ज़ड़ा हुआ है और दस्ते पर इंसानी खोपड्री का निशान वना हुआ है ।"

"खोपडी का निशान?" पारसनाथ अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरने लगा ।

"वो जब मुझे मिला तो बुरे हाल में था । मैले-पुराने फ़टे हुए कपडे । बढी हुई शेव । बालो की ये हालत कि जैसे महीने-भर से नहाया न हो । वो उस जैसा लग रहा था, जैसे कागज़ बीनने वाले, गरीब लड़के घूमतें हैँ ।" मोना चौधरी का स्वर, धीमा हो गया----" मै दावे के साथ कह सकती हू कि वो युवक रहस्यमय है ।"

पारसनाथ ने सिगरेट सुलगाई । कश लिया ।

"मन नहीं करता कि तुम्हारी बात पर विश्वास करू?"

"मैं सच कह रही हूं ।"

"मुझे मालूम है कि तुमं सच कह रही हो ।" पारसनाथ ने कश लिया--“ चाकू पर खोपडी का निशान क्या साबित करता है, मैं समझ नहीं पा रहा हूं।”

"खोपडी का निशान कुछ खास तरफ इशारा करता है, जो कि हम समझ नहीं पा रहे हैं ।"

" ऐसे निशान अपराधी संस्था के लोग भी रखते हैं, जो,..... !"

"वो युवक किसी अपराधी संस्था से वास्ता नहीं रखता । अजीब-सा है वो । उसकी आंखों में भी अजीब-से भाव हैं । मुझे लगता है कि जैसे उस चाकू में कोई रहस्य है जिसे वो अपने से जुदा नहीं करना चाहता ।"

“कैसा रहस्य?"

"यही तो मेरी समझ में नहीं जा रहा वो मर गया, फिर जिन्दा हो, गया । उसके जख्म पलक झपकते ही ठीक हो गए । शरीर की जो जो हड्रिडयां टूटीं, वो जादुई ढंग से ठीक हो… गई…क्या ये रहस्यमय बात नहीं हुई पारसनाथ?"

तुम बहुत खतरनाक बात की तरफ इशारा कर रही हो?"

“कहीं ये तात्रिर्कों जैसा मामला तो नहीं?”

"कुछ भी हो सकता है । मुझे वो साधारण इंसान नहीं लाता ।।"

"मैं किसी से इस बारे में पता करने की कोशिश करता हू।"

मोना चौधरी उठ खडी हुई ।

" तुम जा रही हो?"

"उसके लिए कपडे लेने और ये बाते तुम्हें बताने आई थी !" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा----" यकीन के साथ कह सकती हु कि वो चाकू जो कि लेदर केस में है, जिसे वो अपने से जुदा नहीं कर रहा, वो चाकू कोई खास है । ऐसा लगता है, जैसे उस चाकू मे उसकी जान हो?”

 


मोना चौधरी वापस अपने फ्लैट पर पहुंची । हाथ में कपडे का लिफाफा थाम रखा था । बेल बजाने लगी कि दरवाजा खोले मुर्गे की तरह नंदराम दरवाजे से बाहर झाकता दिखा ।

"साईं वो भिखारी किधर है नी?” नंदराम ने पूछा…“चला गया नी?"

"भीतर है ।"

"वड्री अपनी इज्जत का तो खयाल कर । अपनी नेई तो आस-पडोस की इज्जत रख ले । अब तेरा स्टैंडर्ड इतना नीचे गिर गया कि तू गंदे छोकरे को पकडकर लाने लगी?"

" वो गंदा नहीं है, मेकअप किया हुआ है ।"

"तेरा मतलब वो नया फिल्म स्टार है?"

"हा ।"

"तब तो मैं, कभी भी स्टार ऩेईं बनूंगा । ये तो बोत गंदे होते हैं ।"

मोना चौधरी ने कॉलबेल पर उंगली रखी और बटन दबा दिया । भीतर वेल बजने का स्वर सुनाई दिया ।

" इधर आ जा नी । चिल्ड बीयर मारते हैं । सिंगापुर की बीयर है । मेरी बीबी लाई थी ।"

"तू पी ले नंदराम !"

"मैं तो पीता ही रहता हूं। अब दोनों बैठकर…!"

तभी दरवाजा खुला । मंगलू दिखा ।

उसने शेव कर रखी थी । नहा-धोकर महाजन की पेट-कमीज पहन रखी थी । सांवला रंग था उसका । पहले से अब वो बहुत अच्छा नजर आ रहा था ।

"अब तो वहुत अच्छे लग रहे हो ।” मोना चौधरी ने मुस्कराकर कहा ।

मंगलू दरवाजे से हट गया ।

मोना चौधरी ने भीतर आकर दरवाजा बंद किया । इस लिफाफे में तुम्हरि लिए कपड़े हैं ।" मोना चौधरी ने लिफाफा एक तरफ़ रखा ।

, "अभी तो ये ही कपड़े ठीक हैं ।" मंगलू ने कहा ।

मोना चौधरी ने गहरी निगाहों से मंगलू को देखा । वो शांत-सा लग रहा था ।

"कुछ खाया तुमने?"

"नहीं ।"

"क्यों?"

"भूख नहीं लगी ।" मंगलू ने कहा और सोफे पर जा बैठा ।

"मैं चाय बनाने जा रही हूं। क्या तुम पीओगे?"

"न ।"

"पानी पिया तुमने?" जाने क्यों मोना चौधरी ने पूछा ।

"नहीं, प्यास नहीं लगी ।"

"ठीक है । मैं अपने लिए चाय बना लाऊं ।" कहकर मोना चौधरी किचन की तरफ बढ़ गई ।

किंचन में चाय बनाते हुए मोना चौधरी ने मोबाइल से पारसनाथ को फोन किया ।

"कहो ।"

"एक और अजीब बात देखी है उस मंगलू में ।"

"क्या?"

"बो जब से आया है, कुछ भी खाया-पीया नहीं है, पानी तक नहीं पिया, कहता है प्यास नहीं लगी ।"

"सच में हैरत की बात है ।"

" उसमे कुछ खास है पारसनाथ! "

"मुझे भी वैसा ही लग रहा है । मैं ऐसे किसी व्यक्ति की तलाश कर रहा हूं जो इस बारे में कुछ बता सके !"

मोना ने फोन बंद किया और चाय बनाकर ड्राइंगरूम में आ बैठी ।

मगंलू उसी सोफे पर बैठा था ।

अब मंगलू का हुलिया बदल चुका था । पहले की तरह बो मैला…कुचैला न लग रहा था ।

मंगलू दरवाजे से हट गया ।

मोना चौधरी ने भीतर आकर दरवाजा बंद किया । इस लिफाफे में तुम्हरि लिए कपड़े हैं ।" मोना चौधरी ने लिफाफा एक तरफ़ रखा ।

, "अभी तो ये ही कपड़े ठीक हैं ।" मंगलू ने कहा ।

मोना चौधरी ने गहरी निगाहों से मंगलू को देखा । वो शांत-सा लग रहा था ।

"कुछ खाया तुमने?"

"नहीं ।"

"क्यों?"

"भूख नहीं लगी ।" मंगलू ने कहा और सोफे पर जा बैठा ।

"मैं चाय बनाने जा रही हूं। क्या तुम पीओगे?"

"न ।"

"पानी पिया तुमने?" जाने क्यों मोना चौधरी ने पूछा ।

"नहीं, प्यास नहीं लगी ।"

"ठीक है । मैं अपने लिए चाय बना लाऊं ।" कहकर मोना चौधरी किचन की तरफ बढ़ गई ।

किंचन में चाय बनाते हुए मोना चौधरी ने मोबाइल से पारसनाथ को फोन किया ।

"कहो ।"

"एक और अजीब बात देखी है उस मंगलू में ।"

"क्या?"

"बो जब से आया है, कुछ भी खाया-पीया नहीं है, पानी तक नहीं पिया, कहता है प्यास नहीं लगी ।"

"सच में हैरत की बात है ।"

" उसमे कुछ खास है पारसनाथ! "

"मुझे भी वैसा ही लग रहा है । मैं ऐसे किसी व्यक्ति की तलाश कर रहा हूं जो इस बारे में कुछ बता सके !"

मोना ने फोन बंद किया और चाय बनाकर ड्राइंगरूम में आ बैठी ।

मगंलू उसी सोफे पर बैठा था ।

अब मंगलू का हुलिया बदल चुका था । पहले की तरह बो मैला…कुचैला न लग रहा था ।

" तुम कहां के रहने वाले हो?" मौना चौधरी ने पूछा ।

"मेरे से कोई फालतू सवाल न पूछो ।"

मोना चौधरी ने चाय का घूंट भरा और बोली ।

"वो चाकू कहां है?”

मंगलू की आंखें सिकूडी ।

"क्यों पूछ रहीं हो?"

"मैं उसे देखना चाहती हूं।" मोना चौधरी का स्वर शात था ।

मंगलू उसी पल उठा और अपनी पैंट खोलने लगा ।

मोना चौधरी की निगाह उस पर टिक चुकी थी ।

मंगलू ने ..पैट की जिप खोली और उसे नीचे सरका दिया ।

पैंट पैरों के पास जा गिरी ।

" मौना चौधरी की निगाह उसके घूटने के ऊपर टाग पर बधे चाकू पर जा टिकी । लेदर केस में लिपटा वो चाकू टांग पर टेप लगाकर फंसा रखा था । ये टेप उसी की थी और टेबल की ड्रॉज में पडी यी ।

मोना चौधरी समझ गई कि उसके जाने के बाद मंगलू ने उसकी चीजों की तलाशी ली है ।

" देख लिया चाकू !" मंगलू बोला ।

"ऐसे नहीं, मैं अपने हाथ मे लेकर चाकू देखनां चाहती हूं।”

"एक बार तो तुम्हारे हाथ में चाकू आ गया था परंतु अब तुम चाकू को छू भी सकतीं ।"

" क्यों ?"

"मेरा काम इस चाकू की हिफाजत करना हैं ।"

"हिफ़ाजत?"

"हां, ये किसी की अमानंत है और उसे सौंपना है ।"

मोना चौधरी के चेहरे पर अजीब-से भाव उभरे ।

"किसकी अमानत है?”

"भवतारा की।”

"वो कौन है?”

"शेतान का बेटा ।"

"शेतान का बेटा?" मोना चौधरी ने अजीब-से स्वर में कहा…" कहां रहता है ये?"

“मैं नहीं जानता ।" मोना चौधरी ने चाय का घूट भरा ।

दिमाग तेजी से दौड रहा था उसका ।

"तुम मेरी कार के नीचे आकर मर गए थे ।"

मोना चौधरी ने कहा ।

मंगलू ने मोना चौधरी को देखा । कहा कुछ नही ।

"तुम् बोलते क्यों नहीं मंगलू?"

“शायद तुम्हारी बात सच हो । ठीक से मुझे याद नहीं ।" मंगलू ने कहा…"परंतु इस बात का अहसास है मुझे कि जैसे मैं किसी और दुनिया में चला गया था लेकिन फिर वापस आ गया ।

" मुझे हैरानी कि तुम जीवित कैसे हो गए !"

" शैतान के बेटे की कृपा से !"

"कौन है शैतान का बेटा?"

"मैं नहीं जानता ।"

मोना चौधरी को ये बातचीत अजीब-सी लग रही थी ।

" ये चाकू तुम्हें कहां से मिला?"

"मंगलू ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला कि उसी पल, उसके कानों में जंगला ने सरगोशी की ।

"बेवकूफ तू क्यों इसके सवालो के जवाब दे रहा है?"

" तूने मुझें बताया क्यों नहीं, कि मैंने इसके सवालों के ज़वाब नहीं देने है ।"

"इतनी समझ तो तेरे में होनी चाहिए ।"

"तुम किससे बाते कर रहे हो?" मोना चौधरी कह उठी ।

"किसी से नहीं ।" कहते हुए मगलू नीचे झुका और पैट सरकाकर ऊपर चढाई और बांधने लगा ।

"एक बार मुझे चाकू देख लेने दो ।" मोना चौधरी ने कहा ।

"कभी नहीं । अब तुम मुझसे कोई फालतू बात नहीं करोगी ।"

"तुम्हें किसी ने रोक दिया है मेरे से बात करने क्रो?"

"मुझे कौन रोकेगा । क्या तुमने किसी को देखा!"

"नहीं, लेकिन इस बात का मुझें पूरा विश्वास है कि तुम्हें केसी ने रोका है कि मुझसे बात ध करो।"

मंगलू ने कुछ न कहा और पलटकर पीछे वाले बेडरूम में चला गया ।

मोना चौधरी चेहरे पर गंभीरता समेटे चाय पीती रही ।

 


कुछ बात तो है ।

शेतान का वेटा----नाम भवतारा-चाकू उसे सौंपना है मंगलू ने ।।

आखिर कौन है शैतान का बेटा? मोना चौधरी ने चाय समाप्त की और मोबाइल फोन निकालकर पारसनाथ का नम्बर मिलाया ।

बात हुई तो मोना चौधरी ये सब बाते बताने लगी । सव कुछ सुनने के बाद पारसनाथ ने कहा कि वो ऐसे किसी आदमी की तलाश कर रहा है, जो इन बातों का मतलब जानता हो ।

मगलू उस कमरे में वेड पर लेटा तो जंगला की फुसफुसाहट कानों मे पडी ।

"तूने वहुत गलत काम किया है?"

"मोना चौधरी से बात करके?" मंगलू धीमे स्वर में बोला ।

"उसे शेतान के बेटे के बारे में बताकर । उसका नाम बताकर ।"

"मैं नया हुं, मुझें नहीं पता था कि क्या नहीं बताना है?"

“अब ये बात पल्ले बाध ले कि हम लोग दूसरे लोगों से ज्यादा बात नहीं करते ।"

"समझ गया ।"

" बहुत जरूरत पडे तो बात करते हैं ।"

"ठीक !"

“अब तुझे सुधार करना होगा ।"

"कैसा सुधार?"

"शेतान का बेटा भवतारा पसंद नहीं करता कि कोई उसके बारे में जाने ।"

"समझ गया ।"

"मोना चौधरी उसके बारे में जान गई हैं ।"

"तो ।"

"तेरे को मोना चौधरी को खत्म करना होगा ।" जंगला की फुसफुसाहट कानों मे पड़ रही थी।

"अभी कर देता हूं।" कहते हुए मगलू ने उठना चाहा।

"अभी नही ।"

"तो ?"

" जब तू यहां से चलने लगे-तीन दिन बाद-तब मोना चौधरी को तूने खत्म कर देना है।"

"समझ गया ।"

" तीन दिन तू आराम क्रंर । शेतान का बेटा तुझे आकर बताएगा कि कब यहां से चलना है !"

"शेतान का बेटा इस वक्त कहां है?”

" अपनी दुनिया में ।”

" अपनी दुनिया…मैं समझा नहीँ ! "

"नर्क मेँ…नर्क के बादशाह का बेटा है वो !"

"तो वो इस दुनिया में नहीं है?” मंगलू के होंठों से निकला ।

"इस दुनिया मे आने की ही तो चेष्टा कर रहा है !"

" तो वो मुझें पैसे कहां से देगा, उसने तो कहा था कि मुझे बहुत पैसे देगा ।"

"बेवकूफ, इस दुनिया की दौलत उसके लिए कोई कीमत नहीं रखती । जितनी चाहेगा, उतनी देगा तुझे। उसकी सेवा करता रह और दौलत से खेलता रह ।" जंगला की सरगोशी कानो में गूंजी ।

" सेवा ?”

"जो काम भवतारा तेरे को कहे, उसे तू पूरा कर ।"

" हां, मैं करूंगा ।”

"याद रख । यहां से जब चले तो इसी से तूने मोना चौधरी को खत्म करना है, जैसे तूने अपने दोस्त भानू को मारा था । तू शेतान का सेवक बनने के गुण रखता है ।"

" हां , मैं सेवक बनूंगा । मुझे पैसे चाहिए । सब काम करूंगा मैं ।"

"अब आराम कर । शेताने के बेटे के लिए इस चाकू की हिफाजत करनी है तूने । ये काम करके दिखा । अपने को साबित कर कि शैतान की खिदमत करने के लायक है तू?”

 
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