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खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरीcomplete
Khabari.jpg
जानलेवा, तीखी गर्मी पड़ रही थी ।
जहाँ तक भी नजर जाती, सव कुछ सुलगता-सा लग रहा था ।
ये बंजर मेदान था और जमीन के साथ-साथ देखने से ऐसा लग रहा था, जैसे जमीन से धुआं निकल रहा हो, सूर्य जैसे अपनी सारी गर्मी इसी मैदान पर फेंक रहा हो । यूं तो हवा थमी-सी थी, पंरंतु एकाएक जव हवा उठती तो अपने साथ मैदान की मिट्टी को भी आगोश में लेकर उड़ा देती और वो धूल का छोटा-सा गुब्बार उड़ता हुआ दूर तक जाता दिखाई देता रहता ।
वो दो युवक थे जो इस जानलेवा गर्मी में वहां मौजूद थे ।
दोंनों की उम्र बीस-इक्कीस के करीब थी, परंतु वे फटेहाल थे । जिस्म पर पड़े कपडे फट रहे थे । बात इस तरह उलझे हुए थे जैसे उन्हें नहाए महीना बीत गया हो ।
पांवों में फटे जूते थे । गालो पर शेव के बाल भी बड़े हुए थे । उनकी हालत से स्पष्ट था कि लम्बे समय से भरपेट खाना भी उन्होंने. नहीं खाया है । कोई ट्रक उस मेदान में कूडा फेक गया होगा वे दोनों युवक उसी कूड़े की छानबीन कर रहे थे ।
वे इतने व्यस्त लग रहे थे कि तपती गर्मी का जैसे उन्हें अहसास ही नहीं हो रहा था ।
तभी एक युवक ने दूसरे से कहा।
“मंगलू! हमें दस दिन हो गए झुग्गी में गए ।"
" मैं मां से नहीं मिलूंगा । तुझे जाना है, तो जा ! मगंलू ने कहा ।
" क्यों ?"
"देख !" मंगलू अपने काम में व्यस्त बोला…" मां हमेशा बोलती रहती कोई काम करने को । वो समझती है कि मैं काम नहीं करना चाहता, जबकि मुझे काम मिलता नहीं । तेरे को तो सब पता है ।"
"इसमें मां का तो कोई कसूर नहीं ।" भानू ने कहा ।
"तो मेरी कहां गलती है? तू बेशक वापस चला जा, तेरा बापू अच्छा है ।"
"खाक अच्छा है ।" भानू ने मुंह बनाया-"दिन में पीता नहीं तो खाना भी खिलाता है, बात भी करता है । रात में जब पी लेता है तो गालियां देता है, मारता है । तूने तो देखा ही है, पचासों बार ।"
मंगलू कूडे के ढेर से छांट-छांटकर काम की चीजे एक तरफ रख रहा था ।
भानू भी ऐसा ही कर रहा था ।
"अगर मुझे कमाने की इच्छा न होती तो मैं कूड़े के ढेर में हाथ क्यों मारता? हम दोनों यही कोशिश कर रहे हैं कि यहां से इकट्ठा किए सामान को कबाडी के हाथ बेचकर दस-बीस रुपए मिल जाएंगे !"
"तू ठीक कहता है, लेकिन हमारी बात समझता कौन है?"
कूड़े को छानने में दोनों के हाथ तेजी से काम कर रहे थे ।
तभी मंगलू का हाथ किसी ठोस चीज से टकराया ।
वो रुका ।
उसने उंगलियों में पकडकर उस चीज को बाहर खींच लिया ।
पुराने-से कपड़े में लिपटी वो पतली-लम्बी चीज लगी कोई । उसने फौरन कपड़े के बल खोलने शुरू कर दिए । कुछ ही पलो बाद, लेदर के केस में फंसा उसके हाथ में चाकू थमा था ।
जो कि दस इंच लम्बा और करीब डेढ़ इंच चौडा था । उस चाकू की धार एक तरफ़ थी ।
अब तक मंगलू चाकू को लेदर के केस से बाहर निकाल चुका था । चाकू का फल पुराना हो रहा था । उसके आगे के हिस्से पर अभी भी सूखा हुआ खून लगा हुआ था, जो कि पुराना होकर दाग जैसा लग रहा था । स्पष्ट था कि वहुत पहले चाकू का इस्तेमाल किया गया और उसे साफ किए विना केस में रख दिया गया । उस पर तब का लगा खून सूखकर काला पड़ा और फिर जंग जैसा लगने लगा था ।
"चंद कदम दूर कूड़े के ढेर के पास बैठा भानू कह उठा ।
"ये क्या है?"
"चाकू है, पुराना है लेकिन प्चास रुपए मिल जाएंगे । साफ करके बेच देंगे । तब चमक जाएगा ।"
"ठीक है । साफ कर दे चाकू को. . !" कहकर भानू अपने काम में व्यस्त हो गया ।
मंगलू चाकू को साफ करने लगा ।
उसी पल उसके कानों में सरसराती आवाज़ गूंजी ।
"ये क्या कर रहा है मंगलू?”
मंगलू के हाथ रूके ।
चौंककर उसने आस-पास देखा । कोई न दिखा ।
“क्या देख रहा है, मुझे दूढ़ रहा है? मैं नहीं दिखूंगा तेरे को !" शब्दों की सरसराहट पुन: कानों में पड्री ।
" कौन है तु?" मंगलू के होंठों से निकला ।
"भवतारा हूं मैं । शैतान का बेटा ।"
"कौन शैतान?"
भानू अपना काम छोड़कर हैरानी से उसे देखने लगा था ।
"किससे बातें कर रहा है?" भानू ने उससे पूछा ।
मंगलू ने उसकी बात का ज़वाब न दिया ।
“ये चाकू मेरा है ।" शब्दों की सरसराहट पुन: कानों में पडी ।
"तुम्हारा?" मंगलू आस-पास देखता, चेहरे का पसीना पोंछते हुए कह उठा ।
"हां मेरा । मैंने इसे वहुत छिपाकर रखा था, लेकिन आज ये कूड़े के ढेर में पहुंच--।"
"मैं तुम्हें चाकू नहीं दूगा ।"
" क्यों ?"
" ये अब मुझे मिला है, मेरा है । मैं इसे प्चास रुपए में बेच दूंगा । ये तुम्हारा नहीं है ।"
"तुम्हें दौलत चाहिए?”
"हां ।”
"में दूंगा…बहुत दौलत दूंगा, लेकिन तुम्हें मेरा एक काम करना होगा !"
"क्या ?"
" ये चाकू लेक़र मेरी बताई जगह पऱ आना होगा ।"
"मैं ऐसा करूंगा तो तुम मुझे दौलत दोगे?"
"हां । दौलत के साथ-साथ अपना आशीर्वाद भी दूगा । आशीर्वाद तो तुम्हें अभी से मिल गया है ।"
"आशीर्वाद से क्या होगा?"
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जानलेवा, तीखी गर्मी पड़ रही थी ।
जहाँ तक भी नजर जाती, सव कुछ सुलगता-सा लग रहा था ।
ये बंजर मेदान था और जमीन के साथ-साथ देखने से ऐसा लग रहा था, जैसे जमीन से धुआं निकल रहा हो, सूर्य जैसे अपनी सारी गर्मी इसी मैदान पर फेंक रहा हो । यूं तो हवा थमी-सी थी, पंरंतु एकाएक जव हवा उठती तो अपने साथ मैदान की मिट्टी को भी आगोश में लेकर उड़ा देती और वो धूल का छोटा-सा गुब्बार उड़ता हुआ दूर तक जाता दिखाई देता रहता ।
वो दो युवक थे जो इस जानलेवा गर्मी में वहां मौजूद थे ।
दोंनों की उम्र बीस-इक्कीस के करीब थी, परंतु वे फटेहाल थे । जिस्म पर पड़े कपडे फट रहे थे । बात इस तरह उलझे हुए थे जैसे उन्हें नहाए महीना बीत गया हो ।
पांवों में फटे जूते थे । गालो पर शेव के बाल भी बड़े हुए थे । उनकी हालत से स्पष्ट था कि लम्बे समय से भरपेट खाना भी उन्होंने. नहीं खाया है । कोई ट्रक उस मेदान में कूडा फेक गया होगा वे दोनों युवक उसी कूड़े की छानबीन कर रहे थे ।
वे इतने व्यस्त लग रहे थे कि तपती गर्मी का जैसे उन्हें अहसास ही नहीं हो रहा था ।
तभी एक युवक ने दूसरे से कहा।
“मंगलू! हमें दस दिन हो गए झुग्गी में गए ।"
" मैं मां से नहीं मिलूंगा । तुझे जाना है, तो जा ! मगंलू ने कहा ।
" क्यों ?"
"देख !" मंगलू अपने काम में व्यस्त बोला…" मां हमेशा बोलती रहती कोई काम करने को । वो समझती है कि मैं काम नहीं करना चाहता, जबकि मुझे काम मिलता नहीं । तेरे को तो सब पता है ।"
"इसमें मां का तो कोई कसूर नहीं ।" भानू ने कहा ।
"तो मेरी कहां गलती है? तू बेशक वापस चला जा, तेरा बापू अच्छा है ।"
"खाक अच्छा है ।" भानू ने मुंह बनाया-"दिन में पीता नहीं तो खाना भी खिलाता है, बात भी करता है । रात में जब पी लेता है तो गालियां देता है, मारता है । तूने तो देखा ही है, पचासों बार ।"
मंगलू कूडे के ढेर से छांट-छांटकर काम की चीजे एक तरफ रख रहा था ।
भानू भी ऐसा ही कर रहा था ।
"अगर मुझे कमाने की इच्छा न होती तो मैं कूड़े के ढेर में हाथ क्यों मारता? हम दोनों यही कोशिश कर रहे हैं कि यहां से इकट्ठा किए सामान को कबाडी के हाथ बेचकर दस-बीस रुपए मिल जाएंगे !"
"तू ठीक कहता है, लेकिन हमारी बात समझता कौन है?"
कूड़े को छानने में दोनों के हाथ तेजी से काम कर रहे थे ।
तभी मंगलू का हाथ किसी ठोस चीज से टकराया ।
वो रुका ।
उसने उंगलियों में पकडकर उस चीज को बाहर खींच लिया ।
पुराने-से कपड़े में लिपटी वो पतली-लम्बी चीज लगी कोई । उसने फौरन कपड़े के बल खोलने शुरू कर दिए । कुछ ही पलो बाद, लेदर के केस में फंसा उसके हाथ में चाकू थमा था ।
जो कि दस इंच लम्बा और करीब डेढ़ इंच चौडा था । उस चाकू की धार एक तरफ़ थी ।
अब तक मंगलू चाकू को लेदर के केस से बाहर निकाल चुका था । चाकू का फल पुराना हो रहा था । उसके आगे के हिस्से पर अभी भी सूखा हुआ खून लगा हुआ था, जो कि पुराना होकर दाग जैसा लग रहा था । स्पष्ट था कि वहुत पहले चाकू का इस्तेमाल किया गया और उसे साफ किए विना केस में रख दिया गया । उस पर तब का लगा खून सूखकर काला पड़ा और फिर जंग जैसा लगने लगा था ।
"चंद कदम दूर कूड़े के ढेर के पास बैठा भानू कह उठा ।
"ये क्या है?"
"चाकू है, पुराना है लेकिन प्चास रुपए मिल जाएंगे । साफ करके बेच देंगे । तब चमक जाएगा ।"
"ठीक है । साफ कर दे चाकू को. . !" कहकर भानू अपने काम में व्यस्त हो गया ।
मंगलू चाकू को साफ करने लगा ।
उसी पल उसके कानों में सरसराती आवाज़ गूंजी ।
"ये क्या कर रहा है मंगलू?”
मंगलू के हाथ रूके ।
चौंककर उसने आस-पास देखा । कोई न दिखा ।
“क्या देख रहा है, मुझे दूढ़ रहा है? मैं नहीं दिखूंगा तेरे को !" शब्दों की सरसराहट पुन: कानों में पड्री ।
" कौन है तु?" मंगलू के होंठों से निकला ।
"भवतारा हूं मैं । शैतान का बेटा ।"
"कौन शैतान?"
भानू अपना काम छोड़कर हैरानी से उसे देखने लगा था ।
"किससे बातें कर रहा है?" भानू ने उससे पूछा ।
मंगलू ने उसकी बात का ज़वाब न दिया ।
“ये चाकू मेरा है ।" शब्दों की सरसराहट पुन: कानों में पडी ।
"तुम्हारा?" मंगलू आस-पास देखता, चेहरे का पसीना पोंछते हुए कह उठा ।
"हां मेरा । मैंने इसे वहुत छिपाकर रखा था, लेकिन आज ये कूड़े के ढेर में पहुंच--।"
"मैं तुम्हें चाकू नहीं दूगा ।"
" क्यों ?"
" ये अब मुझे मिला है, मेरा है । मैं इसे प्चास रुपए में बेच दूंगा । ये तुम्हारा नहीं है ।"
"तुम्हें दौलत चाहिए?”
"हां ।”
"में दूंगा…बहुत दौलत दूंगा, लेकिन तुम्हें मेरा एक काम करना होगा !"
"क्या ?"
" ये चाकू लेक़र मेरी बताई जगह पऱ आना होगा ।"
"मैं ऐसा करूंगा तो तुम मुझे दौलत दोगे?"
"हां । दौलत के साथ-साथ अपना आशीर्वाद भी दूगा । आशीर्वाद तो तुम्हें अभी से मिल गया है ।"
"आशीर्वाद से क्या होगा?"