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खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज complete



" मेरे साथ आओ ।" तांत्रिक बेतीराम ने कहा ।

तांत्रिक बेलीराम ने मंगलू को लेकर एक ऐसे कमरे में पहुंचा जो कि अन्य कमरे के नीचे वना हआ था । तहखाने जैसा था वो कमरा । उस कमरे में शैतान के बेटे की फीट भर ऊचाई की खूबसूरत मूर्ति बीचो बीच खड्री थी है इसके अलावा कमरे में कुछ भी नहीं था ।

"ये मूतिं किसकी हैं?" मंगलू ने पूछा ।

"शेतान के देते भवतारा की ।" बेलीराम ने जवाब दिया ।

"कितनी खूबसूरत है । कितने अच्छे रंग भरे हैं मूर्ति में ।" मंगलू ने कहा ।

तांत्रिक बेलीराम आगे बढकर पूर्ति के पास बैठा और एक हाथ मे से मूर्ति के साथ छेढ़छाड़ करने लगा । दूसरे हाथ में शैतान के बेटे का लेदरकैस युक्त चाकू थाम रखा था ।

"अब हमने कहां जाना है…क्या करना मंगलू ने पूछा । "

"हम शेतान के बेटे के मृत शरीर के पास जाएंगे ।"

"मृत शरीर ?"

"हां । 210 बरस से, शैतान के बेटे के शरीर को सभाल कर रखा-हुआ है !"

" तुमने ?"

" जो भी इस डेरे को संभालता है, शैतान के बेटे के शरीर की भी देख-रेख करता है ।। यहां सव शैतान के बेटे के सेवक हैं । जव मुझे इस डेरे का मालिक बनाया गया तो सब कुछ मेरी निग़रानी में आ गया ।"

तभी वहां वेहद मद्धिम सी आवाज़ गूंजी और सामने की दीवार का एक हिस्सा एक तरफ सरकने लगा । मंगलू ने चौककर उधर देखा और उसके होंठों से निकला ।

“ये क्या हो रहा है?"

" मैने किया है ।" बेलीराम, शैतान के बेटे की मूर्ति के पास खडा होता हुआ बोला---------"शैतान के बेटे के मृत शरीर के पास जाने का ये रास्ता । गुप्त रास्ता, इसे मेरे अलावा और कोई नहीं जानता !"

" ओह.......!"

"मेरे पीछे आओ !!" तांत्रिक बेलीराम उस रास्ते की तरफ बढ गया । मंगलू पीछे था।

आगे सीढ़ियाँ थी । वे नीचे उतरने लगे ।।

दस सीढियों के पश्चात फर्श-सा कुछ आ गया । वहां घोर अंधेरा था । हाथ को हाथ दिखाई न दे रहा था । आखें फाड़कर देखने पर भी, कुछ नजर न आया ।

"ये कैसी जगह है?" मंगलू ने पूछा । "

" चुप रहो ।" तांत्रिक बेलीराम ने कहा। तभी एक कड़कड़ाती आवाज गूजी ।

"कौन है?"

"मैं हूँ बॉथम । बेलीराम ।"

"ओह आज बरसों बाद इधर आना कैसे हुआ?"

“शेतान के बेटे के शरीर के पास जाना है ।"

"साथ कौन है तेरे"

“मंगलु !"

"समझा तो भवतारा के जीवित होने का वक्त आ गया । हमारा देवता फिर जिन्दा हो रहा है !!”

“मुझे आगे बढने के लिए रास्ता दे।"

"क्या करना होगा मुझे?”

“सारा रास्ता प्रकाश से भर दे । हमें कुछ दिखाईं नहीं दे रहा।"

अगले ही पल वहां प्रकाश हों गया ।

वे एक कमरे जैसी जगह थी, परंतु हर जगह धूल और जाले की वजह से गदी हो रही थी । इस कमरे में भी फर्श के बीचो बीच शैतान के देवता की मूर्ति लगी हुई थी । देखरेख न होने की वजह से मूर्ति पर धुल और जाला लगा नजर आ रहा था ।

तात्रिक बेलीराम आगे बढा और झुककर उस मूर्ति को घूमाया ।।

उसी पल वो रास्ता बंद हो गया ,जहाँ से वे इस तरफ आए ।

मंगलू की निगाह हर तरफ़ फिर रही थी ।"

सामने ही दो रास्ते जाते नजर आ रहे थे, परंतु वे अंधेरे से भरे थे । अगले ही पल वे रास्ते रोशनी से जगमगा उठे । जाने वो रोशनी कहाँ से आ रही थी । वहाँ मकडी के जाले लगे दिखाई दे रहे थे ।

"जा बेलीराम, अव तेरे को हर रास्ते में रोशनी मिलेगी !" बॉथम की आबाज वहां गूंजी ।

"कहां जाऊ ?"

" तेरे सामने दो रास्ते हैं, किसी भी एक रास्ते पर चला जा ।" बॉथम की आवाज गूजी ।

“मजाक करता है मुझसे?"

"मजाक------नही तो. ..!"

"रास्ता खोल, ये दोनों रास्ते तो दुश्मनों को धोखा देने के लिए वना रखे हैं, जो इधर आ जाएं तो इन दोनों रास्तों पर आगे बढते हुए मौत के मुह में चले जाएं ।"

"तो सव याद है तुझे?"

“याद क्यों न रखूंगा ।"

"मुझे भी सावधानी से काम लेना पड़ता है । कोई तेरा चेहरा, तेरे रंग-रूप में यहाँ आ जाए तो मैं उसे कैसे पहचानूंगा । इसी वास्ते तेरे को इन दोनों में से किसी एक रास्ते पर जाने को कहा ।"

"रास्ता खोल ।"

उसी पल एक तरफ की दीवार थोड्री सी सरकी और भीतर जाने की जगह दिखी ।

“आ मंगलू !"

बेलीराम मंगलू के साथ उस रास्ते में प्रवेश कर गया । वो वहुत हद तक साफ़-सुथरां रास्ता था । वहां इतनी रोशनी थी कि वे रास्ता देखते आगे बढ़ सके ।

तेजी से आगे बढने लगे ।

कहीं पर रास्ता तंग हो जाता तो कहीं खुला । यहीं सांस लेने के लिए हवा का पूरा इंतजाम था । जाने किधर से हवा जा रही थी, अलबत्ता कहीं-कहीं मंगलू को घुटन-स्री महसुस होती ।

"ये कैसा अजीब-सा रास्ता है ।" मंगलू ने आगे बढते हुए कहा ।

तांत्रिक बेलीराम आगे की जा रहा था । शैतान के बेटे के चाकू को उसने कपडों में ऱख लिया था ।

" तुम कहते हो कि शैतान के बेटे का शरीर 210 बरस से रखा हुआ! ” मंगलू बोला ।

"हां ।”

"तो अब तक वो खराब हो गया होगा ।"

"'नहीं । शरीर सुरक्षित है ।"

" ऐसा कैसे हो सकता है?”

"शैतान के बेटे के शरीर को कई तरह के रसायनों का लेप लगाकर सुरक्षित रखा हुआ है । वो कभी भी खराब नहीं हो सकता । वक्त वक्त पर रसायनों के लेप से मरम्मत होती रहती ।”

एकाएक वो रास्ता आगे बंद दिखा । वे दोनों ठिठके ।।

“ये क्या!"' मंगलू बोला…“आगे तो रास्ता ही नहीं है ।"

"ये सब दुश्मनों को धोखा देने के लिए है !" तांत्रिक बेलीराम ने गंभीर स्वर में कहा…“अगर कोई हमारी सुरक्षा को पार करके इधर आ भी जाए तो वो यहां से आगे न बढ सके !”

"बहुत पक्के इंतजाम कर रखे है । "

"करने पडते हैं । शैतान के बेटे के दुश्मन बहुत हैं । वे शैतान के बेटे के शरीर को नष्ट कर देना चाहते हैं ।"

"ऐसे लोगों को तो खत्म कर देना चाहिए ।"

"गिनती के लोग हों तो खत्म कर दे, परंतु दुश्मन तो असंख्य हैं । जिनके चेहरों से हम परिचित भी नहीं । ऐसे में किस-किसको खत्म करें ।" कहते हुए बेलीराम नीचे बैठा और फर्श के एक पत्थर को हटाया तो भीतर छोटा-सा गड्ढा दिखा उसने गड्ढे में हाथ डालकर भीतर जाने क्या किया कि सामने की दीवार हटती चली ।

रास्ता नजर जाने लगा ।

 


वे दोनों पुन: आगे बढने लगे ।

"लोग शैतान के बेटे के दुश्मन क्यों हैं?"

"सारे सवाल अभी पुछेगा क्या । व्याकुल न बनो । धीरे धीरे तुम्हें सब सवालों के ज़वाब मिलते जाएंगे । हमारा शैतान का बेटा बहुत बडी शैतानी ताकत का मालिक है । कोई उसका मुकाबला नहीं कर सकता । कोई उसे मार नहीं सकता ।"

“तो 210 बरस पहले कैसे मर गया था शैतान का बेटा." पूछा मंगलू ने !"

" कभी-कभी भारी चोटे पड़ जाती हैं, जो नहीं होना होता, वो जाता है । जीवन के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जीवन है । ये चक्र तो चलता ही है, जो आज हैं वो कल नहीं, जो कल हैं, वो आज नहीं । कुछ देर के लिए जीवन मिलता है । उसके बाद मृत्यु से सामना करना ही पड़ता है ।"

तांत्रिक बेलीरांम और मंगलू तेजी से आगे बढ़े जा रहे थे ।

@@@@@@@@@@@@@@@@@

मंगलू को थकान होने लगी थी।

बो छोटी-सी सुरंग का रास्ता इतना लम्बा था कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था । वो अब ये भी हिसाब लगा रहा था कि उसे चलते कितनी देर हो चुकी है । सुरंग में हर जगह मद्धिम-सी रोशनी फैली हुई थी । बाहरी दिन-रात तो थे नहीं कि उसे वक्त का अनुमान होपाता। "

"अभी और कितना चलना होगा !" आखिरकार मंगलू ने पूछा ।

" हम आ पहुँचे है !"

"तुमने इतनी दूर शैतान के बेटे का शरीर क्यो रखा है?"

"सुरक्षा के नाते । कोई सोच न सके कि मैंने पास ही में कहीं भवतारा के शरीर को रखा-है ।"

"ये जगह पहले बनाई थी या तुम्हारा ठिकाना?"

"ठिकाना बाद में बना..!"

" तो जिन लोगों ने रास्ता बनाया होगा, वो तो जानते होंगे कि .!"

"वे कुछ नहीं जानते । उन मजदूरों से ये रास्ता बनवाने के बाद शैतानी शक्तियों ने उन्हें पागल वना दिया ताकि इस बारे में वे किसी को कुछ न बता सकें।" तांत्रिक बेलीराम ने बताया ।

"ओह फिर तो इस रास्ते के बारे मे कोई भी नहीं जानता ।"

बेलीराम ने कुछ न कहा ।

“मुझे थकान होने लगी है !"

" फिक्र मत करो । अब आराम ही आराम है । कुछ ही देर में हम वहां पर होंगे, जहां शैतान के बेटे का शरीर रखा है । उसके बाद तुम्हें आराम करने का भरपूर वक्त मिलेगा । तुम वास्तव में बहुत भाग्यशाली हो !"

 
"वो कैसे?"

“तुम्हें शेतान के बेटे के साथ रहने का सुनहरी अवसर मिल रहा है । तुम उसके सबसे करीबी सेवक बन जाओगे । शैतान का बेटा जब भी जन्म लेता है, तब वो किसी एक को अपने पास रखता है, इस बार वो भाग्यशाली तुम हो ।" .

"मुझें कैसी सेवा करनी होगी शैतान के बेटे की !"

"इस बात का जवाब तुम्हें शैतान का बेटा ही देगा ।"

"तुम नहीं जानते?"

“कुछ-कुछ जानता हूं परंतु इस बारे में तुमसे बात करना उचित न होगा ।"

कुछ देर बाद वे दोनों ठिठक गए ! आगे का रास्ता बंद था।

"हम आ पहुंचे है ।" तांत्रिक बेलीराम सामने की दीवार को देखता कह उठा ।

"यहां कहां?"

“इस दीवार के पार हमारी मंजिल है ।” कहते हुए वेलीराम नीचे झुका और फर्श का एक पत्थर हटाकर, भीतर हाथ डाला। चंद पल ही बीते कि सामने की दीवार गड़गड़ाहट की आवाज के साथ एक तरफ सरकने लगी।

मिनट-भर में दीवार पूरी सरक गई ।

आगे अंधेरे से भरी जगह थी ।

दोनों ने भीतर प्रवेश किया तो वो दीवार गढ़गड़ाहट के साथ पुन: बंद होती चली गई । । वहां गहरा अंधेरा था । कुछ भी दिखाई न दे रहा था ।

"यहां रोशनी नहीं है?” मंगलू ने पूछा ।

"अभी करता हूं ।" कहने के साथ ही बेलीराम आगे वढ़ गया ।

मंगलू वहीं खड़ा रहा ।

चमगादड़ की फडफड़ाहट गूंजी ।

चंद पलों के लिए मंगलू सहम-सा गया । उसके बाद पुन: उसने हिम्मत इकट्ठी की ।

तभी माचिस की तीली चलने का अहसास हुआ और वहाँ पीली-सी रोशनी चमकी । मंगलू ने देखा कि बेलीराम लालटेन का शीशा उठाए बत्ती को जला रहा है ।

अगले ही पल लालटेन का अपर्याप्त-सा प्रकाश वहां उभरा ।

"यहां आओ मंगलू !!" बेलीराम ने पुकारा ।

मंगलू आगे बढा । नीचे पडी चीजों से एक-दो बार ठोकर भी लगी । वो बेलीराम तक जा पहुंचा ।

"यहां दो और लालटेन है । उन्हें जलाओ ।"

मगंलू ने उस लालटेन के प्रकाश में दो अन्य लालटेन को तलाशा और उन्हें जला दिया ।

अब वहाँ की धुंधली चीजें अस्पष्ट-दिखाई देने लगी थीं ।

ये गोल कमरा था । जिसमें जगह-जगह मकडियों के जाले लगे हुए थे बहां उल्टे लटके चमगादड़ भी दिखे । एक तरफ शैतान के बेटे की आदमकद प्रतिमा खडी थी, जिस पर जाले लगे हुए थे । यहाँ बैठने के लिए सोफे जैसी कुर्सियां और मेज थी, जो कि धूल की वजह से अपनी चमक खोए हुए थीं ।

कैमरे में एक तरफ़ ऊपर जाती सीढियां थीं । उपर बालकनी भी थी ।।

"अब तुम्हें यहाँ रहना होगा-शैतान के बेटे के साथ !" बेलीराम ने कहा ।

"यहां? यहां तो रोशनी भी नहीं है ।"

"शैतान फे बेटे में जीवन आते ही ये जगह जगमगा उठेगी ।"

"ओह लेकिन जीवन आएगा कैसे?"

'उसका भी इंतजाम करते हैं । ये सारी जगह अच्छी तरह साफ करके, चमका देना । यहां पानी भी मिलेगा और रोशनी भी । भौतिक जीवन की हर चीज तुम्हें हासिल होगी, जब शैतान के बेटे में जीवन के लक्षण आ जाएंगे ।"

“यहां पानी-रोशनी कैसे?"

"तुम नादान हो । अभी कुछ भी नहीं जानते । शैतान के बेटे की शक्तियां अदभुत्त हैं । समझने में वक्त लगेगा, परंतु धीरे-धीरे तुम्हें सव समझ में आ जाएगा ।" बेलीराम ने गंभीर स्वर में कहा ।"

न जाने क्यों मंगलू का दिल धड़क रहा था । अजीब-सा माहौल था यहाँ का ।

"आओ . . . ! "

"कहां?"

"शैतान के बेटे के शरीर के पास । मुझें अपना काम करके वापस जाना है यहां रुकने का हुक्म नहीं है मुझें ।"

बेलीराम मंगलू को लिए सीढियों की बगल से होकर पीछे बने कमरे में पहुचा । साथ में एक लालटेन थी । कमरा पूरी तरह खाली था और एक तरफ चार फीट चौडा और आठ फीट लम्बा चबूतरा बना हुआ था।

बाहर गोल कमरे में एकाएक चमगादडों के चीखने का स्वर सुनाई देने लगा था । ऐसे माहौल में चमगादडों के चीखने की आवाजें मंगलू का दिल धड़का रही थी । सब कुछ अजीब-सा, भयावह-सा लग रहा था ।

"लालटेन को दीवार पर लगी खूंटी पर लटका दो ।" बेलीराम ने कहा ।

मंगलू ने ऐसाही किया, फिर पूछा ।

"शेतान के बेटे का शरीर कहां है?”

"इधर आओ । इस चबूतरे पर बड़ा-सा पत्थर टिका रखा-है । उस तरफ से तुम पकडो, इस तरफ़ से मैं पकड़ता हूं ।। भारी पत्थर -उठाकर उधर दीवार के साथ खडा कर देना है ।"

मंगलू ने सिर हिलाया ।

फिर दोनों ने ऐसा ही किया ।

चार फीट चौडा और आठ कीट लम्बा भारी पत्थर चबूतरे से उठाया और पास की दीवार के पास ही खडा कर दिया । पत्थर इतना भारी था कि मंगलू हांफ़ने लगा था । जबकि बेलीराम सामान्य दिख रहा था ।

" तुम थके नहीं?" मंगलू ने पूछा । "

“नहीं । मैं कभी भी थक नहीं सकता क्योंकि मैं सच्चे मन से शैतान के बेटे की सेवा करता हूं । वो मुझमें इतनी, शक्तियाँ डाल देता है कि मुझे कभी भी थकान का अहसास नहीं होता । शायद तुम्हें विश्वास न आए कि ये पत्थर मै अकेला ही जाने कितनी वार उठा चुका हूं । शैतान का बेटा तब मुझमें शक्ति डाल देता है !"

" ओहू क्या वो मुझमें भी शक्ति डाल सकता है?" मंगलू ने उत्सुकता ले पूछा ।

"क्यों नहीं, अगर तुम तन मन से उसकी सेवा करते हो तो यो वो तुम्हारा भी ख्याल रखेगा !"

"मैं सच्चे मन से ही तो ये सब कर रहा हूं।"

"जानता हूं। लालटेन यहां लाओ! "

 


मंगलू दीवार के खूंटे से लालटेन उतारकर लाया । उसने चबूतरे के नीचे देखा ।

वहां से छोटी-सी सीढियां नीचे जा रही थीं ।

"ये क्या?" मंगलू बोला ।

" हमे नीचे जाना है । ये दस सीढियां हैं । तुम सावधानी से उतरना !" कहने के साथ ही बेलीराम ने चबूतरे को लांघकर पाव सीढी पर रखा, . खडा हुआ, फिर नीचे उतरने लगा ।

उसके पीछे-पीछे मंगलू भी आने लगा । चंद पलों में ही वे नीचे थे ।

नीचे बाला कमरा छोटा-सा था । घुटन-भरा । कमरे की छत इतनी थी कि उसे हाथ बढाकर छुआ जा सकता था । वो दस फीट चौड़ा आठ फीट लम्बा कमरा था । मंगलू के हाथ मे पकड़ी लालटेन के मद्धिम-सी रोशनी में वहां का नजारा स्पष्ट-अस्पष्ट सा नजर रहा था । छत के आस-पास बड़े-बड़े मकडियों के जाले लगे हुए उनके वहां पहुचते ही दो-तीन चूहों को भागते देखा । तभी सीढियों के रास्ते एक चमगादड़ उड़ता हुआ, ची-ची करता वहां पहुचा और दीवार के साथ रखे आठ फीट लम्बे ताबूत जैसे लकडी के बक्से के साथ चिपककर लटकने लगा और ची-ची करता रहा । दमघोटू कमंरे में उस चमगादड़ की आवाजें सिहरने कों मजवूर कर रही थीं ।

तांत्रिक वेलीराम पर इन बातों का कोई असर नहीं पड़ रहा था, परंतु मंगलू को अपना दम घुटता-सा महसूस हो रहा था । सब कुछ अजीब-सा लग रहा था ।

"कहा है शैतान के बेटे का शरीर !" मंगलू ने पूछा ।

“इस लकडी के बक्से में. ॰!"

" ओह.......!"

"लालटेन को दीवार पर लगी खूंटी पर लटकाओ और इस बक्से का ढक्कन उठाओ !"

मगंलू ने ऐसा ही किया… ।

फिर बेलीराम के साथ मिलकर बक्से का ढक्कन उठाया, जो कि काफी भारी था । ढक्कन को दीवार के पास रख दिया । चमगादड़ चीं-चीं करता उस छोटे से कमरे में उड़ता हुआ चक्कर लगाने लगा ।।।

कई बार उसके पंख, पंजे मंगलू के सिर पर लगे । परेशान सा मंगलू चमगादड़ को देखता कह उठा ।

" शोर कर रह्य है ये।"

" ये शैतान का बेटा , भवतारा ही तो है !" बेलीरामं ने मुस्कराकर है कहा !!

"भवतारा'..ये?" मंगलू ने चौंककर चमगादड़ को देखा।

"हां, ये अपनी खुशी का इजहार कर रहा है इस तरह, क्योंकि इसे अब जीवन मिलने बाला है । ये मनुष्य योनि में प्रवेश कर जाएगा !"

"ओह...कैसै...?"

" देखते रहो ।"

मंगलू ने उस-बक्से के भीतर निगाह डाली ।

काले कपड़े से ढांपा हुआ था किसी चीज को ।

“जय महागुरु. . .!" बेलीराम ने मुस्कराकर कहा और उस पर पड़ा कपड़ा उठाने लगा ।

लालटेन की सीधी रोशनी बक्से के भीतर ही पड़ रही थी कपडा हटते ही मंगलू को वहां किसी के शरीर की आकृति दिखी ।मगंलू ने नजरे वहीं टिका रखी थी । उसकी आंखें अंधेरे की अभ्यस्त हो चुकी थी । मंगलू ने स्पष्ट पहचाना कि वो मानवीय आकृति है । जाने क्यों मंगलू के शरीर में सिहरन दौड़ती चली गई ।

उस आकृति का पुरा शरीर पट्टियों जैसे कपडे से लपेटा हुआ था ।

न सिर नजर आ रहा था, न पैर ।

तभी बेलीराम ने आकृति के पांवों की तरफ़ से पहिटयां खोलनी शुरू कर दीं ।

मंगलू दर्शक-सा वना चुप्पी से देखता रहा ये सब । मद्धिम-सी रोशनी में, उस कमरे का वातावरण रहस्य-भरा महसूस हो रहा था । खास तौर से उस मानवीय आकृति को देखकर तो उसका दिल तेजी से धडक रहा था । कई बार मन में विचार उठा कि यहा से भाग जाए, परं अपने विचारों को वो हकीकत् का जामा न पहना सका । पांव जड़ से हो गए थे जैसे किसी शक्ति ने उसे यहीं खडे रहने को मजबूर कर दिया हो ।

बेलीराम उस शरीर पर से पट्टियां उतारता जा रहा था । नीचे मानवीय शरीर दिखना आरंभ होगया था । उसके शरीर पर अजीब-से रंगों वाला लेप किया महसूस हो रहा था ।

कभी शरीर नीला-सा ।होता तो कभी सुनहरी तो कभी सिन्दूरी-सा ।

ऐसा लगता था जैसे शरीर पर किया लेप रंग-बिरंगी चमक मार रहा हो ।

"जय महागुरु...!" बेलीराम रह-रहकर बड़बड़ा उठता था । चमगादड़ उसी तेज रफ्तार में ची-ची करता कमरे के चक्कर लगा रहा था । अब उसके शोर से जैसे कान अभ्यस्त हो गए थे, परंतु वहां घुटन का अहसास मंगलू क्रो हर पल हो रहा था, शायद ऐसा इसलिए कि ये कमरा मुद्दत बाद खोला गया था और खुली हवा की यहाँ कमी थी । दोनों टांगों से पट्टिया खोल चुका था बेलीराम । अब वो कमर वाले हिस्से की पट्टिया खोल रहा था । चूंकि वो मानवीय शरीर लेटा हुआ था, इसलिए कमर के पीछे से पट्टी का चक्करदार घुमाव निकालर ऩे में, अब मंगलू भी उसकी सहायता करने लगा था ।

"ये पट्टिया क्यों बांधी जाती हैं?” मंगलू ने पूछा।

"शरीर को किसी तरह की क्षति न पहुंचे ।"

"शरीर जो चमक मार रहा है वो रासायनिक लेप की वजह से है ?"

"हां ।" कमर की पट्टियां खुल गई ।

फिर वे पेट और छाती की पट्टियां खोलने लगे ।

"कंपड़े भी तो पहनाए जा सकते थे इस शरीर क्रो !" मंगलू ने कहा ।

"कपडे ज्यादा देर तक सलामत न रहते" ।

"ये पट्टी भी' तो कपड़े की हैं ।"

" अवश्य परंतु इसे कई तरह के रसायनों में भिगोकर तेयार किया है और शरीर से लिपटी रहती हैं । इनकी हालत देखो । ये मैली अवश्य हो गई हैं, परंतु कपडे पे किसी तरह की खराबी नहीं आई।"

मंगलू ने मन-ही-मन माना कि बेलीराम ठीक कह रहा है, परंतु मंगलू का शरीर धक-धक कर रहा था ।

शैतान का बेटा भवतारा अब जिन्दा होगा ।

जिन्दा होगा तो कैसा लगेगा. . .क्या करेगा?

वे उसकी उत्सुकता से भरे सवालों के जवाब, भविष्य के गर्म में थे ।।

सब कुछ समझकर भी वो कुछ भी, समझ नही पा रहा था ।

और फिर वो वक्त भी. आया, जब दोनों ने मिलकर उस शरीर पर से सारी पट्टियां उतार दीं । शैतान के बेटे का शरीर अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुका था ।

पांच फीट दस इंच का शरीर था ।।

नैन…नक्श स्पष्ट कर रहे थे कि वो किसी आकर्षक चेहरे के व्यक्तित्व का स्वामी है । इस वक्त चेहरे पर रसायनों का लेप लगा था ।

"जय महागुरु. . .!" तांत्रिक बेलीराम ने प्रणाम किया और लेदर केस वाला चाकू निकला ।

मंगलू के देखते-देखते उसने लेदर केस को एक तरफ़ रखा, फिर चाकू थामे शैतान के बेटे के शरीर के पास आया और उसकी देह को टटोलने लगा । लालटेन की मद्धिम-सी रोशनी पूरी तरह उस शरीर पर पड रही थी ।

अगले ही पल बेलीराम पेट पर हाथ रखे, चाकू थामे कोई मंत्र बुदवुदाने लगा ।

मंगलू कभी बेलीराम को देखता तो कभी उस शरीर के पेट पर रखे हाथ को वो समझ न पा रहा था कि बेलीराम क्या करना चाहता है ।

वहां चमगादड़ की ची चीं और बेलीराम के होंठों से निकलने वाले मंत्रों की बुदबुदाहट गूंज रही थी । मंगलू को जैसे अपने कान बंद होते महसूस हो रहे थे । बो व्याकुल-सा इधर-उधर नजरे घुमाने लगा । जाने क्यों यहां उसका मन नहीं लग रहा था । मन बार बार चाह रहा था, यहां से जाने को । परंतु जाने के लिए वो पलट न पा रहा था ।

एकाएक बेलीराम के होंठों से निकलने वाले मंत्र किसी चीख में बदले और उसका चाकू वाला हाथ उठा ।

दूसरे ही पल हाथ नीचे आया और

चाकू शेतान के बेटे के पेट के बीचोबीच धंसता चला गया ।

“ये तुमने क्या किया?" मंगलू चीखकर कह उठा ।

 
कमरे में घूमते चमगादड़ की आवाज अब और भी तेज हों गई थी । ऐसा लगता था जैसे वो पागल हो गया हो, कुछ इसी तरह तेजी से वो कमरे के चक्कर लगा रहा था ।

तांत्रिक बेलीराम का चेहरा आवेश में लाल-सा हो उठा था जैसे उसे चाकू घोंपने में बहुत मेहनत करनी पडी हो ।

"तूने शैतान के बेटे के शरीर में चाकू क्यों मार दिया?" मगलू ने देखा, चाकू का पूरा फल पेट में धंसा हुआ था…" तुम तो इसके सेवक हो, फिर तुमने ऐसा क्यों किया…पागल तो नहीं गए तुम ?"

बेलीराम के चेहरे का तनाव अब कम होने लगा था । वो थोड़ा-सा मुस्कराया ।

"यही तो काम था इस चाकू का ।"

"यही काम ।"

"इस चाकू को खास मंत्र के उच्चारण के साथ पेट के ठीक बीचोबीच घोंपना` था । अब इसी चाकू को आधार बनाकर शैतान के बेटे की आत्मा अपने शरीर में प्रवेश कर सकेगी । पुराना चाकू है, पुराना शरीर है, ऐसे में भवतारा कों बहाना मिल गया अपने शरीर में प्रवेश करने का ! चाबी लग गई शरीर को ।"

"तुम अजीब-सी बाते कर रहे हो ।"

"मेरी बाते सामान्य हैं, परंतु तुम्हारी समझ से बाहर हैं” । बेलीराम पुन: मुस्कराया!!

"मेरी समझ से बाहर...... !"

" मेरा काम पूर्ण हुआ, अव मेरा यहाँ रुक पाना सम्भव नहीं । मुझे वापस जाना होगा ।" तात्रिक वेलीराम ने कहा।

"हां हां, वापस चलते है, मैं भी .....!"

" अगर तुम भी मेरे साथ चले गए तो महागुरु की सेवा कौन करेगा?"

"किसी और को भेज देगे ।" मंगलू ने जल्दी से कहा ।।

बेलीराम पास आया और मुस्कराकर उसके कंधे पर हाथ रखता बोला ।

"घबरा रहे हो?"

"ह. . .हां ।"

"चिंता मत कर मंगलु यहां पर सब कुछ तुझे जल्दी ही अच्छा लगने लगेगा । तूने ये सब कुछ पहले नहीं देखा, इसलिए घबराहट हो रही है, जल्दी ही तुझे यहां की हर चीज से प्यार हो जाएगा । किस्मत वाला है तू जो तेरे को महागुरू की सेवा करने का अवसर मिल रहा है । शैतानी ताकते अब तेरे आगे भी झुका करेंगी ।"

"इस सेवा में किसी और को लगा दे।"

"लेकिन महागुरु ने तेरे को यहीं स्कने को बोला है इसलिए तू ही यहां रूकेगा । बार बार जाने को न कह ।"

मंगलू सूख चुके होंठों पर जीम फेरकर रह गया ।

"अब सुन. . ...!" तांत्रिक बेलीराम गंभीर होते हुए कह उठा…"अभी कुछ घंटे लगेंगे, महागुरु को जीवन पाने में । तब तक तू यहां की अच्छी तरह सफाई कर । उपर भी बहुत धूल मिट्टी है, सब कुछ साफ…!"

"पानी तो है नहीं. . .मैं कैसे साफ़…!"’ .

“मह्मगुरु के जीवित होते ही यहां आवश्यकता की हर चीज मौजूद होगी, वो वक्त आने तक तू काम चला ले ।"

मंगलू कुछ न बोला ।"

"चलता हूं मैं ।"

"य.. .ये चाकू ?" मंगलू ने पेट में धंसे चाकू की तरफ इशारा किया ।

"तूने किसी चीज को नहीं छेड़ना । महागुरु अपने पेट से चाकू स्वयं ही निकाल लेंगे ।"

मंगलू ने चाकू की तरफ देखा ।

"खून!! तुमने चाकू मारा तो खून तो निकला नहीं ।" एकाएक मंगलू कह उठा है ।।

बेलीराम मुस्कराया और पलटकर ऊपर जाने वाली सीढियों की तरफ़ बढ गया ।

बेलीराम चला गया ।

खुद को वहां अकेला पाकर मंगलू के शरीर में रह-रहकर सिहरन दौढ़ने लगी ।

वो चमगादड़ शैतान के बेटे के सिर की तरफ लकडी के बक्से में पांव फसाए, उल्टा लटककर अब खामोश हो गया था ।

यहाँ का जर्रा-जर्रा भय दिलाने वाला, रहस्य से भरा लगा । एकाएक उसे अहसास हुआ कि इन खौफनाक हालात में बो अकेला है । इस अहसास के साथ ही वो सिर से पाव तक कांप उठा, परंतु वो कुछ नहीं कर था रहा था । मन में तीव्र इच्छा थी यहीं से चले जाने की, परंतु अपनी इस इच्छा को वो जाने क्यों लागू नहीं कर पा रहा था ।

मगंलू ने बक्से के भीतर पड़े शैतान के बेटे के शरीर को देखा ।

कोई कपड़ा नहीं था उसके शरीर पर ।

पेट में चाकू धंसा हुआ था ।

रसायनों के लेप में लिपटा उसका शरीर रंग-बिरंगी चमक मार रहा था !

मगंलू ने अपने पर काबू पाने की चेष्टा की और इस सोच के साथ उसे राहत मिली कि उसे यहां रहना नहीं है । शैतान के बेटे से दौलत लेकर यहां से चले जाना है । एक-दो दिन ऐसे माहौल में विताने भी पडे तो बिता लेगा ।

परंतु शेतान का बेटा जिन्दा कैसे होगा?

ये बात उसकी समझ से बाहर थी । …

उसके वाद मंगलू वहा की साफ-सफाई में लग गया । मकड्रिर्यो के जाले, धूल साफ करते हुए उस सारी जगह को इस लायक वनाने लगा कि यहाँ बैठा-उठा जा सके, परंतु दिल जाने क्यों बार-बार धड़क उठता था ।

@@@@@@@@@@@@@@@

मोना चौधरी और सतपाल होटल मे एक कमरा ले चुके थे । कुछ आराम करने के बाद वे उठे तो शाम को ढलते पाया । सतपाल ने अपना माथा टटोला, जहाँ पट्टी बंधी हुई थी । आराम करके वो बेहतर महसूस कर रहा था ।

"कॉफी लोगे?" मोना चौधरी ने पूछा ।

सतपाल ने हां में सिर हिलाया ।

मोना चौधरी ने रूम सर्विस को इंटंरकॉम करके दो कॉफी के लिए कहा ।।

"मंगलू तो कब का बेलीराम के पास पहुच गया होगा !" सतपाल कह उठा ।

"वहाँ मोजूद तुम्हारे भाई ने उसे देखा होगा ।”

"उससे बात करता हूं।" सतपाल ने कहा और मोबाइल फोन निकालकर नम्बर मिलाने लगा ।"

राजन से फौरन ही बात होगई।

"कहो ।" राजन ही आवाज कानों में पडी ।

"मंगलू को देखा ?"

“मुझे नहीं दिखा ।"

" तुम मगंलू को पहचानते भी तो नहीं ।" सतपाल बोला ।

" लेकिन किसी नए आदमी को आते भी नहीं देखा मैनें…!"

“वो कब का पहुच चुका है, शायद तुम्हारी नज़रों में नहीं आया ।"

" ऐसा हो सकता है, इसका मतलब बेलीराम, मंगलू के साथ अब शैतान के बेटे के शरीर के पास जाएगा ।"

" हां, तुम सतर्क रहकर हर तरफ नजर रखो।" सतपाल ने कहा और फोन बंद कर दिया ।

मोना चौधरी कह उठी ।

"तात्रिक बेलीराम, अपने डेरे पर भी किसी को नजर नहीं आता । तुमने ही बताया था, ऐसे मेँ उसने कहीं जाना हुआ तो वो चुपके से जाएगा । मेरे खयाल में उसके जाने का किसी को पता भी नहीं चलेगा ।"

सतपाल होंठ सिकोड़कर रह गया, बोला कुछ नहीं ।

तभी-दरवाजा थपथपाया गया ।
 
सतपाल उठा और दरवाजे की तरफ वढ़ गया ।

"वेटर होगा कॉफी लाया होगा ।"

सतपाल ने दरवाजा खोला तो तांत्रिक मोहम्मद, सफेद कुर्ता-पायजामा में खडा था ।

"आप?" सतपाल के होंठो से अविश्वास भरा स्वर निकला ।

"मुझे भीतर आने दो ।"

सतपाल के एक तरफ हटते ही तात्रिक मोहम्मद भीतर आ गया ।

सतपाल दरवाजा की करके पलटा।

मोना चौधरी ने मोहम्मद को देखा ।

"कौन है?"

"तात्रिक मोहम्मद ।" अपने पर काबू पाते हुए सतपाल ने कहा ।

तात्रिक मोहम्मद आगे बढकर कुर्सी पर बैठा औंर सतपाल से कह उठा ।

"मुझे देखकर हैरान हो रहे हो?”

“हां, मैंने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि आप यहां, मेरे पास आएंगे ।"

"आना पड़ा ।"

"मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं?”

"'मेरा दिया धागा कहां है?"

"बो मोना चौधरी के गले में था और मंगलू ने तोड़ दिया था ।" सतपाल ने कहा । '

"जानता हूं ।"

कुछ पलों के लिए उनके बीच चुप्पी रही ।

सतपाल वहीं खडा रहा ।

"तुम मंगलू से चाकू नहीं ले सके !!" तांत्रिक मोहम्मद बोला ।

"नहीं, अभी तक हम सफल नहीं हुए । मेरा भाई बेलीराम के डेरे पर है, शायद वो कुछ…!"

"अब कुछ नहीं हो सकता !"

"क्या मतलब?"

"शैतान का बेटा शीध्र ही पुन: जीवित होने वाला है । अपने चाकू का वो इस्तेमाल कर चुका है !"

" कर चुका है?"

"हां ।"

"असम्भब वो कहीं गया होता तो मेरे भाई ने उसे जाते अवश्य देखा होता या खबर सुनी होती कि वो कंही गया है ।"

तांत्रिक मोहम्मद मुस्कराया, फिर कह उठा ।

"बेलीराम के सामने अभी बच्चे हो सतपाल !"

"ओह .! कहीं ऐसा नहीं कि शैतान के बेटे का शरीर उसने पास ही अपने डेरे पर रखा हो ।"

"नहीं, वहां से काफी दूर है शैतान के बेटे का शरीर हैं !"

"आप जानते हैं, कि कहां है?"

" नहीं, मैं नहीं जानता । जानने की कोशिश की, परंतु मेरी शक्तियां वहां तक पहुचने में असफल रहीं ।"

" ऐसा क्यों?”

"कभी-कभी शैतानी शक्तियां ज्यादा ताकतवर हो जाती है । इस वक्त भी ऐसा ही हो रहा है, क्योंकि शैतान के बेटे में पुन: जीवन आने वाला है । शैतानी शक्तियां उसे सुरक्षा दे रही है !" तांत्रिक मौहम्मद ने कहा ।

" आपका मेरे पास, आना कैसे हुआ?"

" ज़रूरत खींच लाई ।"

" कैसी जरूरत?”

"मुझे ऐसा कंधा चाहिए, जिसका इस्तेमाल करके मैं शैतानी ताकतों को तबाह कर सकू।”

"मैं समझा नहीं तांत्रिक मोहम्मद! " सतपाल के माथे पर बल पड़े ।

" मगंलू के भीतर, जंगला नाम की शैतानी आत्मा का प्रवेश आ पड़ा था, जब मोना चौधरी के गले में पड़ा मेरा धागा तोड़ा गया । अपनी शक्तियों से उस धागे को सिद्ध कर रखा वा, जिस पर शैतानी ताकतें अपना असर नहीं दिखा सकती थी । जंगला तब इसी धागे की वजह से अपनी ताकतों का इस्तेमाल मोना चौधरी पर न कर पा रहा था, इसलिए उसने धागा तोड़ दिया, ये जानते हुए भी कि धागा तोड़ने की उसे सख्त सजा भुगतनी, पड़ सकती है !"

सतपाल मोहम्मद को देखता रहा।

मोहम्मद का चेहरा बेहद शांत था ।

"जों भी मेरे नियमों के खिलाफ चलेगा, उसे मैं चाहकर भी माफ़ नहीं कर सकता, क्योंकि माफी देने का मतलब है मेरी ताकर्तों का कमजोर हो जाना और मै कमजोर नहीं होना चाहता ।"

" तो इसमें दिक्कत क्या है?” सतपाल कह उठा--"जंगला को आसानी से सजा दे सकते हैं आप ।"

मोना चौधरी ध्यानपूर्वक दोनों की बाते सुन रही थी ।

"जंगला को तो मैं सजा दे सकता हुँ, परंतु मेरे सामने तुम भी हो, जो शैतान के बेटे से टकराने की सोच रहे हो । उसे खत्म कर देना चाहते हो, जबकि वो तुम्हें तिनके की तरह मसलकर रख सकता है । मै अपनी सजा शैतान बेटे को भी दे सकता हूं । क्योंकि जंगला उसी का तो सेवक है । मुझे तो बस बहाना चाहिए भाग-दौड का ।"

सतपाल सतर्क नजर आने लगा ।

"आप कहना क्या चाहते हे?"

"तुम शैतान के बेटे को खत्म करने के लिए उससे टकराओगे?"

"हां ।"

“मैं तुम्हारे साथ हुं !"

" क्या आपका इस तरह दखल देना ठीक रहेगा?"

"मेरे पास वजह है दखल देने की ! शैतान के बेटे के सेवक ने मेरी ताकतों का धागा तोड़कर मुझे ललकारा है ।"

"आपके दखल देने से मामला गंभीर हो जाएगा ।"

. "मैं प्रत्यक्ष रूप से इस मामले में दखल नहीं दे सकता । पीछे रहकर ही तुम्हारा साथ दूंगा । तुम भारी खतरे में पड़े जा रहे हो है और मैं तुम्हें सुरक्षा दूंगा । शैतानी ताकतों के हमलों से तुम्हें बचाऊंगा ।"

कहने के साथ ही तांत्रिक मोहम्मद उठा और अपने गले से नीले रंग के दो धागे निकाले और एक सतपाल के गले में डाला, दूसरा मोना चौधरी के गले में ।

सतपाल गंभीर नजर आ रहा था ।।

"जब भी तुम कठिन वक्त में होओगे तो मैं पूरी कोशिश करूंगा कि उसी पल तुम तक पहुंच सकू । तुम अब अपने को अकेला मत समझना। मुकाबला तुम करोगे,परंतु तुम्हारे पीछे मैं होऊंगा ।"

"अब हम क्या करे ?" सतपाल ने पूछा ।

“कुछ भी नहीं । यहीं रहो…कुछ वक्त तुम्हें यहीं बिताना होगा । अभी कुछ करने का वक्त नहीं आया, फिर भी कुछ करना ही चाहते हो तो मुझे कोई ऐतराज नहीं । वहुत जल्द तुमसे 'खबरी' मिलेगा ।"

" खबरी ।" सतपाल की आंखें सिकुडी ।

“हां 'खबरी' । मैं आने वाला थोडा सा ही वक्त देख पाया हूं। वो खबरी तुम्हें आगे बढने का रास्ता दिखाएगा, उस खबरी की वजह से ही तुम शैतान के बेटे तक पहुंच पाओगे ।"

"लो खबरी-कौन होगा ?"

"वक्त आएगा तो तुम्हें तुम्हारे सवालों का जवाब मिल जाएगा ।"
 
तांत्रिक मोहम्मद ने कहा और आगे बढते हुए दरवाजा खोलकर बाहर निकलता चला गया ।

सतपाल ठगा-सा अपनी जगह पर मौजूद था ।

उसने मोना चौधरी को देखा । मोना चौधरी होंठ सिकोड़े बैठो थी ।

तभी दरवाजे पर थाप पडी ।

सतपाल ने दरवाजा खोला तो वेटर को आया पाया ।

वेटर दो कॉफी के प्याले रखकर चला गया ।

सतपाल ने दरवाजा बंद किया और आगे बढकर कुर्सी पर बैठा ।

मोना चौधरी ने कॉफी का प्याला उठाकर घूंट भरा ।

"तांत्रिक मोहम्मद तुमसे क्या कहना चाहता था?"

सब कुछ समझते हुए भी मोना चौधरी ने पूछा ।

" वो अपनी लडाई मेरे कंधे पर बंदूक रखकर लड़ना चाहता है । वैसे उसके और मेरे रास्ते एक है । मैं पहले से ही शैतान के बेटे के पीछे हूं और जंगला ने उसका धागा तोड़कर उसे मौका दे दिया कि शैतान के बेटे के पीछे पड़ सके ।"

“मोहम्मद के दखल देने से हमे फायदा ही मिलेगा" । मोना चौधरी ने कहा ।

"हां, बहुत फायदा मिलेगा, परंतु अब ये लडाई खतरनाक हो जाएगी ।" सतपाल गंभीर हो उठा----“एक तरफ़ तांत्रिक मोहम्मद होगा तो दूसरी तरफ शैतान का बेटा भवतारा होगा । हम बीच में पिस सकते हैं ।"

“मोहम्मद हमेँ बचाएगा ।"

“मेरे ख्याल में वो ज्यादा कुछ नहीं कर पाएगा क्योंकि सीधा वार शैतान के बेटे पर शायद ही करें । वो जो भी करेगा हमारे ही माध्यम से करेगा यानी कि इस झगड़े का सारा बोझ हम पर ही आ पड़ेगा ।”

"खबरी को भूल गए ?"

" खबरी ?" बड़वड़ा उठा सतपाल । मोना चौधरी को देखा ।

"ये 'खबरी' कौन होगा ।"

"क्या पता, परंतु 'खबरी' कोई भेदिया होना चाहिए तभी तो वो शेतान के बेटे की खबर हमें दे पाएगा ।"

"शैतान के बेटे का कोई साथी भेदिया क्यों बनेगा?"

"ये उसकी अपनी वजह होगी । हमें इसी में खुश होना चाहिए कि कोई 'खबरी' के रूप में हमे शैतान के बेटे की खबर देगा ।"

“मोहम्मद को ये बात कैसे पता चल गई ?"

“आगे का वक्त जानने के लिए उसने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया होगा, वो काफी ताकत रखता है ।"

"अब तुम क्या करोगे?"

" इंतजार----- आने वाले वक्त का इंतजार ।"

"और ये इंतजार लम्बा भी हो सकता है ।" मोना चौधरी बोली ।

सतपाल ने सहमति से सिर हिला दिया, फिर बोला ।

"राजन का अब बेलीराम के डेरे पर कोई काम नहीं । उसे यहीं बुला लेना ठीक है !" कहकर सतपाल ने फोन निकाला और राजन का नम्बर डायल करने लगा । फोन लग गया, बात हो गई----" तुम वहां से हमारे पास आ जाओ !"

“क्यों ?"

"वेलीराम चाकू के, साथ शैतान के बेटे के शरीर के पास पहुंच चुका है अब वहां रहने का कोई फायदा नहीं ।"

"ओह लेकिन बेलीराम तो अपनी जगह से कहीं नहीं निकला । मैं बराबर वहीं नजर रख रहा हूं !"

“बेलीराम ने किसी अन्य रास्ते का इस्तेमाल किया है । अब तुम्हें वहां खतरा हो सकता है!"

“तुम कहां हो-----बहा जाता हूं।"

सतपाल ने होटल का नाम और कमरा नम्बर बताया ।

"मैं जल्दी पहुंचने की कोशिश करता हूं।”

सतपाल ने फोन बंद करके जेब में रखा ।

"भवतारा के जीवित होते ही खून पीने का खूनी सिलसिला चल निकलेगा । बहुत भयानक वक्त होगा वो ।।" सतपाल कह उठा।

मोना चौधरी खामोश रही ।

ये मामला उसके लिए न्ए जैसे था ।

हर पल वॅ हालात को समझ रही थी ।

@@@@@@@@@@@@@@@

मंगलू को ऐसा लग रहा था, जैसे अनजानी-सी शक्ति उसके भीतर आ गई हो !

कई घंटों तक वो लगातार वहां की सफाई में लगा रहा । शायद सात-आठ घंटे, परंतु जरा भी थकान नहीं हुई, बल्कि खुद को वो फुर्ती से भरा महसूस कर रहा था । बहरहाल वो थकान से दुर, खुश था इस समय ।

नीचे के गोल कमरे के अलावा वहां के तीन कमरे और ऊपर बने दो कमरों को भी अच्छी तरह झाड़-पोंछकर साफ कर दिया था । वाथरूमों में जो बाथटब, बाल्टियां पडी थी । वो सब भी साफ कर दी थी । अगर वहां उसे पानी मिल जाता तो उसने अब तक सारी जगह को चमका देना था ।

अलबत्ता इस बीच उसे कुछ अजाब-सा अहसास हुआ ।

उसे लगा कि जैसे ऊपर छत पर कोई है और वहां कुछ लोगों के चलने की आवाजे भी आ रही हैं । ये अहसास उसे तब हुआ, जब वो ऊपर वाले कमरे को साफ कर रहा था । कभी आहटें थम जाती तो कभी सुनाई देने लगतीं ।

अब जैसे वो उपर से आने बाली आहर्टों का अभ्यस्त हो गया था ।

मन में रह-रहकर ये ही विचार उठता था कि इस जगह के ऊपर आखिर क्या है?

नीचे वाला छोटा कमरा भी बो साफ़ कर चुका था, जहाँ शैतान के बेटे का शरीर पड़ा था ।

सब कामों से फुर्सत पाकर उसके मन में आया कि नीचे जाकर शैतान के बेटे का शरीर देखे कि वहां क्या हो रहा है, परंतु नीचे जाने के विचार से उसका मन जाने क्यों घबरा-सा जाता था, फिर उसने अपना इरादा पक्का किया और नीचे जाने के लिए उस कमरे की तरफ़ बढा, जिधर नीचे जाने की सीढियां थी ।

चंद कदम ही उस तरफ ब्रह्म था कि एकाएक वो ठिठक गया ।

उसके कानों में अजीब-सी आवाज पड़ने लगी ।

ठिठका मंगलू!

भय की लहर उसके शरीर में दौडती चली गई ।

उसके-कानों में वो अजीब-सी आवाज बराबर पड़ रही थी ।

अगले ही पल उसे लगा कि के आवाज दाईं तरफ़ से आ रही है । डरा-डरा-सा वो उस तरफ़ बढने लगा । अब धीरे धीरे उसके कानों में तो आवाज स्पष्ट होने लगी ।

वो पानी गिरने की आवाज थी ।

उधर बाथरूम था ।

उधर तो कोई भी नहीं है, फिर पानी गिरने के आवाज…मंगलू का दिल धड़क उठा ।
 
मंगलू दिल में डर बिठाए बाथरूम की तरफ़ बंढ़ने लगा । डर किस चीज का था, ये भी वो नहीं जानता था, परंतु इस बात का अहसास उसे हर पल था कि इस अजीब-सी जगह पर वो अकेला है । नीचे वाले कमरे मे किसी मनुष्य का शरीर पड़ा है, जिसे कि तांत्रिक

बेलीराम शेतान का बेटा कह रहा था । जाने कौन है शेतान का बेटा?

बाथरूम के दरवाजे पर पहुंचकर ठिठका और धड़कते दिल से भीतर झांका ।

बाथरूम खाली था । कोई न था भीतर ।

नल से पानी निकलकर, टब में गिरे जा रहा था ।

मगलू हैरानी से नल से पानी निकलते देखने लगा । कहां से आ गया पानी कैसे आया?

मंगलू वहा से हटा और गहरी-गहरी सांसें लेने लगा ।

उमका मन किया कि यहां से भाग जाए ।

इस विचार के साथ ही वो उधर पहुंचा, जहाँ से बेलीराम के साथ भीतर प्रवेश किया था ।

वहां अब दीवार ने रास्ता बंद कर रखा था ।

मंगलू ने भरपूर चेष्टा की कि दीवार को सरका सके । तभी उसे ध्यान आया कि बेलीराम किसी तरकीब का इस्तेमाल करके दीवार को हटाता था । वो तरकीब वाली खूंटी को दूढ़ने लगा ।

काफी देर तक चेष्टा करने के पश्चात भी वो खूंटी को तलाश न कर पाया ।

वो समझ गया कि यहां फंस चुका था । रास्ता बनता न पाकर अब यहां से निकल जाने की इच्छा और भी जोर मारने लगी, परंतु निकलने का रास्ता उसे कहीं भी नजर न जा रहा था ।

परेशान-सा मंगलू उस गोल कमरे में कुर्सी पर आ बैठा ।

एकाएक वो थकान-सी महसूस करने लगा । कुर्सी पर बैठे ही बैठे उसकी आख लगने लगी ।

"मंगलू… !"

नीद में डूबते जेहन को ऐसा लगा, जैसे कोई उसे पुकार रहा हो ।

"नींद आ गई मंगलू !"

सच में कोईं पुकार रहा था उसे ।

मंगलू ने जेहन से नींद की चादर हटाई और कठिनता से अपनी आंखें खोली । सामने नजर पड़ते ही वो अचकचाकर खडा हो गया । नींद से भरी आंखें पूरी तरह फैल गई ।

सामने वो खडा था ।

वो जो लकडी की उस पेटी में लेटा हुआ था ।

इस वक्त उसके पेट में चाकू धंसा हुआ नहीं था और न ही पेट पर ऐसा निशान था जिससे ये लगता कि उसके पेट मे चाकू धंसा है !

बहुत अजीब-सा लग रहा था वो ।-उसने कुछ भी नहीं पहना हुआ था ।

लालटेन की मद्धिम-सी रोशनी में उसके पूरे शरीर पर सिर से लेकर पांव तक वो ही अजीव-सा लेप लगा हुआ था, जो कि बार-बार, जगह-जगह से रंग-विरंगी चमक मार रहा था ।

उसकी आखों में तीव्र चमक थी ।

"ऐसी चमक कि देर तक मंगलू उन आखो के सामना न कर पाया और उसकी आखों पर से नजर हटाकर उसके शरीर के दूसरे हिस्सों पर टिका दी ।

एकाएक वो मुस्कराया, फिर बोला ।

"क्या देख रहे हो मगंलू ?"

मंगलू तो जैसे अभी तक खुद को संयत नहीं कर पाया था ।

"त..... तुम..... तुम… !"

"मैं ही हूँ शैतान का बेटा, भवतारा नाम है मेरा । उसके स्वर में भरपूर मिठास थी ।

" तुम तो नीचे वाले कमरे में लकडी की पेटी में लेटे हुए थे ।” मंगलू के होंठों से निकला ।

"वो मैं नहीं था, मेरा शरीर था । अब मैं अपने शरीर के भीतर प्रवेश कर गया हूं ।"

"क कैसे .....!"

"ये न पूछो । तुम्हें खुश होना चाहिए कि तुम्हारी कोशिश सफल हुई ।"

"म.......मेरी कोशिश?"

" हां , तुमने मेरी बहुत सहायता की मंगलू। अगर तुम चाकू को बेलीराम तक न लाते तो मेरा अभी जीवित हो पाना सम्भव न हो पाता । तुमने हर पेरेशानी का मुकाबला किया ।"

मंगलू भवतारा को देखता रहा ।

" भवतारा के खास दोस्त बन गए हो?" '

" दोस्त ?" मंगलू अपने को जैसे संयत न कर पा रहा था ।

"क्या तुम्हे मेरा दोस्त बनना पसंद नहीं?"

" न.....ही....है....तुम्हारा दोस्त बनना मुझें पसंद है ।" मंगलू अब अपने पर काबू पाने लगा था ।

"मैं तुम्हें क्रई ताकतें दूगा !"

"ताकतें ?"

"हा ,हां उन ताकतों से तुम बहादुर बन जाओगे । कई काम तुम पलक झपकते ही करलिया करोगे।"

"मैं कुछ नहीं समझा ।"

"धीरे-धीरे समझ जाओगे । मेरे ख्याल में, मेरे अचानक सामने आ जाने से तुम हैरान हो रहे हो?"

"हां। मंगलू ने सिर हिला दिया।

"सब ठीक हौं जाएगा ।" कहकर भवतारा फ्तटा और सामने की दीवार की तरफ बढ गया ।

वो खाली बीवार थी ।

परंतु उस दीवार पर छोटी-सी खूंटी लगी थी ।

भवतारा ने हाथ बढ़ाकर उस खूंटी को दबाया और दीवार मे नन्हा-सा छिद्र उत्पन्न होगया !

भवतारा ने उस छिद्र पर आंख लगा दी ।

ये देखकर मगलू हैरान हुआ । उसके कदम खुद-ब-खुद उसकी तरफ़ बढ गए ।

मंगलू के पावों की आहट आई तो भवतारा छिद्र में आख लग़ाए कह उठा ।

" आह । , कितना खूवसरत नजारा है । 210 बरस बाद के इन नजारों को देखकर मन को चैन मिला ।"

" कैसा नजारा?"

“आओ ।" अवतारों पीछे हटता कह उठा---"तुम भी देखो मंगतू.. !"

मंगलू हिचक-भरे अंदाज में वहीं खडा रहा। है

"घबराओ मत, देखो तुम भी ।" भवतारा का स्वर मीठा था ।

मंगलू आगे बढा और उस छेद में आंख लगा दी ।

बाहर का नजारा देखते ही मगलू चौका ।

बाहर की जगह किसी मंदिर या मठ जैसो थी । कोई आश्रम था । जैसे धोतियों में लिपटे कई लोग आ-जा रहे थे । शाम होने को थी , कुछ दूर हरे-भरे पेड़ खडे नजर आए ।

मंगलू ने पीछे होकर भवतारा को देखा ।

" ये क्या है?"

भवतारा ने खूंटी खींची तो वो छेद पुनः दीवार वन गया ।

"ये मेरा मंदिर है । शैतान को पूजते ये लोग यानी कि मुझे ।"

"तुम्हें पूजते हैं?" मंगलू ने हैरानी से पूछा।

भवतारा ने मुस्कराकर सहमति से सिर हिलाया ।

“तुम्हें क्यों पूजते हैं?"

"क्योंकि मैं शेतान का बेटा हूं ,मेरे पास शैतानी ताकतों का अम्बार है । ये लोग शैतानी ताकतों को हासिल करके ताकतवर बन जाना चाहते हैं कि सामान्य लोगों पर अपना हुक्म चला सके ।"

“क्या तुम्हें पूजने से इन्हें शैतानी ताकत मिल जाती है?"

“क्यों नहीं, किसी-किसी को शैतानी ताकत देनी पड़ती है, ताकि इनकी आस्था शैतान पर वनी रहे और शैतानी ताकते दुनिया में मौजूद रहे । ताकते बांटने में शैतान का ही फायदा है!"

"मेरे लिए ये सब नया है ।"

"जल्दी ही तुम्हारे लिए सव पुराना हो जाएगा !" भवतारा मुस्कराया ।

मंगलू उलझन में फंसा देखता रहा भवतारा को ।

"मैं नहा लूं।” भवतारा बोला ।

"इस वक्त तुम वहुत बुरे लग रहे हो । तुमने कपड़े नहीं पहने है !" मंगलू कह उठा ।
 
" मेरे पास वहुत कपड़े हैं ।"

"कहां?"

"ऊपर के कमरे में तुमने शायद मेरी अलमारी नहीं देखी?"

"वो तुम्हारी अलमारी है ।"

"हां ।"

" जब मैंने सफाई की थी तो वो खाली थी !"

"अब भर चुकी है कपडों से । उधर नीचे बाले कमरे में तुम्हारे साइज के कपडों से भी अलमारी भरी पडी है ।"

"वो मेरे कपडे है?"

“हां !"

मगंलू खामोश उलझन में रहा ।

"मैं नहाकर अता हु, मंगलू !"

"मुझे बता जाओ कि रात को क्या खाओगे, मैं कुछ बनाने की तैयारी करता हूं।”

भवतारा मुस्कराया ।

पैशाचिक मुस्कान थी उसके चेहरे पर ।

आखों की चमक एकाएक बढ गई थी ।

"मै अपना भोजन शाम ढलने के बाद लेता हूं और तुम्हें कष्ट करने की जरूरतृ नहीं, मेरा भोजन बाहर ही मिलेगा ।"

"ठीक है तुम नहा लो ,जिससे तुम्हारे शरीर का ये अजीब-सा, लेप साफ हो जाएगा !"

भवतारा मुस्कराता हुआ बाथरूम की तरफ़ बढ गया ।

मगंलू हक्का बक्का वहां खड़ा रहा । उसके चेहरे पर जाने क्यों परेशानी-सीं दिखाई देने लगी थी, एकाएक वो पलटा और सीढियां पार करके, नीचे वाले उस कमरे मे पहुचा जहाँ अलमारी थी । उसने लकडी की अलमारी का पल्ला खोला तो अचकचा उठा । वो कपडों से भरी हुई थी ।

कपडे कीमती और शानदार थे ।

मंगलू ने जब ये अलमारी साफ़ की थी तो खाली थी ।

मंगलू ऊपरी मंजिल पर बने भवतारा के कमरे में पहुचा और और वहां की अलमारी देखी । वो अलमारी भी कीमती कपडों से भरी हुई थी ।

मंगलू के लिए ये हैरान कर देने बाती बात थी ।

@@@@@@@@@@@@@@@

एक घंटे बाद भवतारा बाथरूम से बाहर निकला ।

उसके इंतजार में मंगलू देर से गोल कमरे में टहल रहा था । उसे बाहर आते पाकर ठिठका । नजर भवतारा पर टिकी की टिकी रह गई मानो वक्त ठहर गया हो ।

भवतारा ने कुछ नहीं पहना हुआ था ।

उसके शरीर पर मौजूद रसायनों का लेप हट चुका था ।

वो सांवले रंग का आकर्षक नैन-नक्श वाला, खूबसूरत नौजवान था । उसके सिर के छोटे बाल धुंघराले थे । उसकी उम्र बीस बरस के आस-पास थी । उसका व्यक्तित्व ऐसा था कि जो देखे बो ही मोहित हो जाए । भवतारा मुस्कराया । उसके पास पहुचा ।

" कहाँ खो गए?" भवतारा होले से हंसा ।

तुम्हारा रूप देखकर हैरान हुआ कि तुम तो काफी आकर्षक हो ।" मंगलू कह उठा ।

"मैं जानता हूं अपने रूप को मैंने खुद ही बहुत मेहनत करके बनाया था ।" भवतारा बोला ।

" तुमने बनाया था ! हैरानी है कि तुमने अपना रूप कैसे बना लिया?"

" तुम्हारी समझ में नहीं आएगी ये बात !"

" लेकिन एक बात तो पक्की है ।" मंगलू मुस्कराया ।

"क्या ?"

"तुम बेशर्म हो ।"

" कैसे?"

"मेरे सामने नंगे खड़े हो और तुम्हें इस बात की जरा भी परवाह नहीं !"

"औह, ये बात है तो मैँ अभी कपड़े पहनकर आता हूं। बहुत देर हो गई कपडे पहने । मैं भी देखना चाहता हूं कि कपडों में मैं कैसा लगता हूं।” कहने के साथ ही बो सीढियों की तरफ बढ़ गया । मंगलू वही खड़ा रहा । ऊपर पहुंचकर भवतारा ऊँची आवाज में मंगलू से बोला ।

"तुम भी नहा तो । कपड़े पहन लो । हमेँ बाहर चलना है” ।

"ठीक है ।" मंगलू ने कहा और अपने कपरे की तरफ़ बढा । अलमारी से उसने पेट कमीज निकली और बाथरूम में जा पहुचा ।

@@@@@@@@@@@@@@@

मगलू नहाकर कपडे पहने बाथरुम से निकला तो ठिठक गया । सामने ही भवतारा टहल रंहा था । उसने चेक शर्ट और काली पैंट पहन रखी थी । जूते भी काले थे और वहुत अच्छा लग रहा था ।

" तुम वहुत अच्छे लग रहे हो ।" मंगलू बोला ।

भवतारा ठिठका , मुस्कराकर मंगलू को देखा: फिर कह उठा ।

“कम तुम भी नहीं ।"

"मजाक मत करो । मेरा और तुम्हारा कोई मुकाबला हो ही नहीँ सकता !" मंगलू बोला----" एक बात तो बताओ!"

" क्या ?"

"ये ऊपर से लोगों के चलने-फिरने की आवाजे कैसी आती हैं?”

"वहा ।" अवतारा ने छत की तरफ देखा-----"मेरी समाधि है ।"

" समाधी ?”

"हां । समाधि के साथ मेरा बुत भी है । वहां लोग माथा टेकते है शक्ति मांगते हैं ।"

"ओह! तो उन्हें इस जगह के बारे में भी पता है ।"

"कुछ को पता है, परंतु वे इधर आते नहीं । मना है इधर आना । वे यहीं सोचते हैं कि भवतारा की असती समाधि नीचे है, ऊपर तो समाधि का स्वरूप भर है ।" भवतारा ने शांत स्वर में कहा ।

"तुम्हारी बाते अजीब-सी हैं ।"

"कुछ दिन बाद तुम्हें हर बात सामान्य, लगने लगेगी !" भवतारा ने सामान्य स्वर में कहा ।

मंगलू कछ नहीं बोला ।

एकाएक भवतारा ने अपने शरीर में ऐठन महसूस की । उसकी मुट्ठियां बंद हो गई । चेहरा बिगड़ने लगा । बदन में कम्पन्न के तीव्र लहर उठी । फिर उसका हाथ गले पर पहुंचा और गला मसलने लगा ।

"क्या हुआ तुम्हें?” मंगलू घबराकर बोला--------“डॉक्टर को बुलाता हूं !"

मंगलू के शब्द होंठों में ही रह गए । आखें भय से फैलकर चौडी हो गई ।

देखते-ही-देखते भवतारा के अगे के दो दांत इंच-इंच -भर बाहर को आ गए ।

खौफ से लिपटा मंगलू सिर से पांव तक कांप उठा ।
 
भवतारा अपने गले पर हाथ फेरे जा रहा था जैसे दम घुट रहा हो ।

मंगलू आंखें फाडे उसे देखे जा रहा था ।

करीब आधा मिनट भवतारा का यही रूप रहा, और फिर वो सामान्य होने लगा ।

बाहर निकले उसके दोनों दांत वापस चले गए । उसका बदसूरत-सा हुआ चेहरा सामान्य होने लगा ।

शरीर की ऐठन , कोमलता में बदलने लगी । दोनो बांहें उसने ढीली छोड दी ।

भवतारा ने मंगलू को देखा ।

मंगलू की आंखों मे भय था ।

"ये.......ये क्या हो गया था तुम्हें?" मंगलू ने अपने सूख रहे होठो पर जीभ फेरी ।

" कभी-कभी मुझें ऐसा हो जाता है !" भवतारा ने शात, परंतु गंभीर स्वर में कहा । "बीमारी है ।"

" नहीं, जब मुझे प्यास और भूख लगती है तो ऐसा होता है !"

"मैं तुम्हें ला देता हूं।”

"पानी..... नहीं, रहने दो । यहां से बाहर चलते हैं । मेरी प्यास कही बाहर बुझेगी ।" भवतारा अजीब-से रवंर में बोला ।

"ठीक है, लेकिन तुम अपना वादा कव पूरा करोगे?"

"कैसा वादा?"

"तुमने मेरे को दोलत देने को कहा.... !"

" इस बारे में बाद में बात करेगे । मेरे भोजन का वक्त पास आता जा रहा है । मुझे बाहर जाना होगा ।"

"ठीक है । वापस आकर इस बारे में बात करेंगे!"

भवतारा एक दीवार के पास पहुचा और नीचे झुककर उसने जाने क्या किया कि दीवार दो फीट तक एक तरफ़ सरक गईं । बाहर की रोशनी भीतर, लकीर के रूप में आती दिखी ।

सामने लोग आते-जाते दिखे ।

अंधेरा हो चुका था ।

"आओ मंगलू !!"

“ये लोग हमें यहाँ से निकलते देखेंगे तो क्या सोचेंगे !" पास आते मंगलू कह उठा ।

"ये हमे नहीं देख सकते ।” भवतारा मुस्कराया।

"क्या मतलब-हमें क्यों नहीं देख सकते ?"

" हम सुरक्षा कवच में धिरे हुए हैं । हमे कोई नहीं देख सकता । दीवार को सरकते कोई नहीं देख सकता । जव हम इस मंदिर से बाहर चले जाएगे । तब लोग हमे देख सकेंगे । ऐसा ही वापसी पर होगा । लोग हमें इस मंदिर के बाहरी गेट तक ही देख सकेंगे । जब हम मंदिर के हद में प्रवेश करेगे तो कोई भी व्यक्ति हमें देख नहीं सकेगा !"

"हैरानी है पर ऐसा क्यों?"

" सुरक्षा के नाते, ताकि कोई जान न सके कि हम यहां रहते हैं ।"

" लेकिन ये होता कैसे है?"

"मेरी शक्तियों का कमाल है ये । आओ, मेरे साथ आओं ।"

भवतारा बाहर निकला । मंगलू भी बाहर आ गया । फिर वो रास्ता खुद ही बंद हो गया । सामने ही लोग आ-जा रहे थे, परंतु किसी का भी ध्यान उनकी तरफ़ न था । दोनों आगे बढने लगे । इस वात का ध्यान रख रहे थे कि किसी से उनकी टक्कर न हो ।

चंद पलों में ही वे मंदिर के गेट से बाहर थे ।

" अब लोग हमें देख सकते हैं?" मंगतू ने पूछा।

"हां ।" भवतारा को ज्यों ही बाहरी ठंडी हवा का झोकां टकराया तो वो बांहें फैलाकर कह उठा…“कितना अच्छा मौसम है ।"

"ये अच्छा मौसम है?"

"बहुत ।"

"ठंडी हवा तो चल नहीं रही ।" मंगलू बोला ।

"फिर भी मुझे वहुत अच्छा लग रहा है । कितनी देर बाद आजाद हुआ हूं । कितना अच्छा लग रहा है !"

" समझ नहीं आई कि तुम मरे कैसे और जिन्दा कैसे हुए? " मंगलू ने पूछा ।

उसी पल भवतारा के शरीर में ऐठन-सी हुई ।

अजीब-भी लहर सिर से पांव तक दौड्री ।

भवतारा ठिठक गया ।

"क्या हुआ?"

"'मुझे प्यास लगी है । गला सूख रहा. ..!"

"चलो यहीं से पानी पी लेते ।"

“तुम यहीं रुको ।"

" यहां?"

'"हां, मैं कुछ देर बाद वापस आऊंगा ?"

"कहा जा रहे हो? मैं भी तुम्हारे साथ वापस.....!"

"सुना नहीं तुमने कि यहीं रुको ।" एकाएक भवतारा के होंठों से हल्की-सी गुर्राहट निकली ।

गुर्राहट में जाने क्या था, मंगलू सहम-सा गया ।

भवतारा उसे वहीं छोड़कर बढ़ गया ।

मंगलू अपनी जगह पर खडा उसे देखता रहा । जाने क्यों उसे ये सब ठीक नहीं लग रहा था । भवतारा जिस तरह उसके सामने जिन्दा हुआ था,, वो सब भी उसे हजम नहीं हो रहा था ।

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रात का अंधेरा हर तरफ फैला था । साढे आठ बज रहे थे । रट्रीट लाइट की रोशनियां हर तरफ़ चमक रही थी ।

सडकों पर वाहन आ जा रहे थे । वाहनों के दौडने की रफ्तार अपनी चरम सीमा पर थी । बाजार खुले थे । धीरे-धीरे वल बीतने के साथ-साथ कई इलाकों में अंधेरा होता जा रहा था । सव कुछ रोजमर्रा की तरह ही था ।

भवतारा सडक किनारे फुटपाथ पर मध्यम-सी गति से इधर-उधर नजरें डालता आगे बढा जा रहा था ।

रह-रहकर उसके शरीर में ऐठन के भाव उठने लगते के मुट्रिठया भिच जाती । अजीब-सा तनाव शरीर में भर जाता । बीते एक घंटे से वो चला जा रहा था । एकाएक ही वो ठिठका । नज़रे उस व्यक्ति पर जा टिकी, जो अंधेरी गली में प्रवेश कर रहा था ।

वो व्यक्ति गली में प्रवेश कर गया था ।

भवतारा ने भी गली में प्रवेश किया और दबे पांव उसके पीछे बढने लगा। अब उसके शरीर से उठती ऐठन तेज़ हो गई थी। अजीब-सा खिंचाव उसके शरीर में उठ-बैठ रहा था । जाने क्यों उसके चेहरे के भाव भी बदल रहे थे । रह-रहकर उसका चेहरा कुरूपता से भर उठता था ।

गली के भीतर एक ही लैम्प पोस्ट था, जो कि दूर था और उसकी रोशनी भी मद्धिम थी ।

एकाएक भवतारा का रूप बदलने लगा ।
 
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