S
StoryPublisher
Guest
“मैं आपकी हैसियत बदल दूगा ।"
"जुग-जुग जीजी बेटा !"
"मैं अपने खानदान के रिवाज के बारे में बताना चाहता हूं।"
"'कहो जंवाईं बाबू !"
… "हमारे यहाँ की रीत दुनिया से अलग है ।" भवतारा वेहद मीठे स्वर में कह रहा था---------" हमारे यहां व्याह दिन के बारह बजे तक हो जाता है । दुल्हन दिन में पति के साथ रहती है और रात में अपनी मां के घर ।"
"रात में मां के धर----ये कैसा रिवाज है ?" बसन्ती कह उठी ।
"कई पुश्तों से यही रिवाज चला आ रहा है ।" भवतारा बोला…" हमारे खानदान मैं अगर दुल्हन रात का वत्त अपने पति के साथ बिताती है तो सुबह को मृत पाई जाती है ।"
“ओह !"
"यही वजह है कि दुल्हन दिन में पति के साथ रहती है ओंर रात को अपनी मां के घर ।"
""जंवाई बाबू! ये रिवाज तो हमारे गले से नीचे नहीं उतर रहा ।" बसन्ती ने कहा ।
"मैं आपको रहने को वहुत बडा बंगला ले दूंगा । कामिनी शाम होते ही आपके पास आ जाया करेगी और दिन निकलते ही वो मेरे पास पहुच जाएगी ।" भवतारा के होंठों पर मीठी मुस्कान थी ।
बसन्ती अवतारा को देखने लगी ।
"अरी तू चुप क्यों हो गई, बोलती क्यों नहीं?"
"जंवाई बाबू की बात पर सोच रहीँ थी कि कामिनी की सारी जिन्दगी आने-जाने में ही बीत जाएगी । ऐसे में वो घर और बच्चों को कहां संभाल पाएगी । ये रिवाज तो परेशानी पैदा करने वाला है ।" बसन्ती ने कहा ।
"सब ठीक है, जंवाई बाबू पास ही हमें धर ले देगे ।" दीनू ने कहा ।
" तू चुप कर बूढे !"
" मैंने बाजार जाना था । कुछ सामान खरीदना है । सोचता हूं आपके लिए साडी और कामिनी के लिए कुछ सूट खरीद लूं ।"
" हां-हाँ ।" दीनू कह उठा…"इसमे पूछने की क्या जरूरत है ।"
“इस शहर में नया हूं , रास्तों से वाकिफ नहीँ, इजाजत हो तो कामिनी को साथ ले जाऊ?" भवतारा बोला ।
"क्या हर्ज है क्यों कामिनी की मां!"
बसन्ती ने दीनू को घूरा ।
"जब तुम्हें हर्ज नज़र नहीं आता तो मैं क्या कहूं भेज दो ।"
"तू बोल कामिनी से…मैं जंवाईं बाबू से दो-चार बाते कर लूं !"
बसन्ती उठी और झोपडी में प्रवेश कर गई ।
फीनिश
झोंपड्री के भीतर बैठी कामिनी, सब बाते सुन रही थी ।
बसन्ती ने जव भीतर प्रवेश किया तो कामिनी की निगाह उस पर जा टिकी ।
"सुना तूने?” बसन्ती ने धीमे स्वर में कहा ।
"मुझे ये आदमी अच्छा नहीं लगता ।" कामिनी ने धीमे किंतु तीखे स्वर में कहा ।
" तो ? "
"मैं इससे व्याह नही करूगी ।"
"ज्यादा बड़-बड़ मत कर । वो तेरे को बाजार ले जाना चाहता है, तेरे लिए कपड़े खरीदने को कह रहा है !"
"मुझे नहीं चाहिए कपडे ।"
"अपना मुंह बंद रखा मेरे लिए भी साडी खरीदेगा। कोई बढिया-सी साडी खरीदना------।"
"तुम्हें साडी…कपड़े की पडी है, मैं नहीं जाऊंगी ।
"क्यों ?"
"बोला तो मुझे ये अच्छा नहीं लगता ।"
बसन्ती कामिनी को घूरने लगी ।
"क्या बुराई है उसमें?"
"पता नहीं, लेकिन मन को अच्छा नहीं लगता ।"
"सब ठीक हो जाएगा । जिसके साथ रहो, धीरे-धीरे वो अच्छा लगने लगता है । इन बातो की मेरे को समझ है । वो हमें बंगला खरीदकर देगा । तू खुद ही सोच, हम तो बंगलों की दीवारों के साथ झुग्गी डालकर रहने वाले लोग हैं । हमारी इतनी औकात नहीं कि नखरे दिखाएं । तेरा बाप कपड़े प्रेस करता है, प्रेस किए कपड़े पहनता नहीं ! "
" जो भी हो, मैं इससे व्याह नहीं करूंगी ।"
"जूती उतारू !” बसन्ती ने दांत भीचकर धीमे स्वर में कहा ।
" मां , हमारी औकात बंगले में रहने की नहीं । हम झोंपडी में ही अच्छे लगते हैं । गरीब लोग हैं, हमारा रिश्ता गरीबों के साथ ही बँधे तो जंचता है । झोपडी में रहकर हमे महलों के बुर्ज को नहीं देखना चाहिए !" कामिनी गंभीर स्वर में बोली-----" खाना वो लोग खाते है, वो खाना हमे हजम भी नही होगा । हमे रूखी सूखी खानी ही अच्छी लगेगी ?"
" बाते करने लगी है तू.". !"
" मेरे हाल पर छोड़ दो मां । मेरे पीछे मत पडो । किसी गरीब साथ ब्याह करोगी तो मैं खुशी खुशी कर लूंगी, लेकिन इस आदमी साथ मैं किसी भी हाल मे व्याह न करूंगी । तुम लालच छोड दो ।"
बसन्ती कुछ चुप रही,फिर धीमे स्वर मेँ बोली।
"ठीक है । मै सोचुगी । बो बाहर बैठा है, अब तो तू जा उसके साथ बाजार । तेरी बात पर एक बार फिर मैं सोच लूंगी ।"
"उसके साथ तो एक कदम भी चलने का मन नहीं करता ।"
" जाती है या जूती उतारू ।"
कामिनी बेमन उठी और बाहर निकल गई ।
पांच मिनट बाद दीनू भीतर आया ।
"गए दौदोनों ?"पूछा बसन्ती ने।
"हां, दोनों की जोडी कितनी अच्छी लग रही है ।"
"तेरा तो दिमागों खराब हो गंया है बूढे बैठ तेरे से बात करनी है ।" बसन्ती बोली ।
दीनू बैठ गया ।
"मेरे को उसके रिवाज पसंद नंहीँ।"
"रिवाज?"
"हां,दिन मे पति कै पास रहना ओर रात में मां के घर चले जाना ! ये क्या बात हुई?"
"उनका रिवाज--!"
"चूल्हे में गया उनका रिवाज । हम कब तक जिन्दा हैं! हमारे बाद कामिनी को कितनी परेशानी आएगी । कल को बच्चे भी होने हैं और उन्हें पढाना-लिखाना होगा तो क्या कोई रात को अपने पति के पास रह ही नही सकेगी ।"
"तो क्या हो गया…वो दिन में !"
"एक ही बात की तरफ़ मत सोच और भी पचासों बातें है ।" बसन्ती ने गंभीर स्वर में कहा----"मान ले कि कभी कामिनी को रात … मे बहां रहना पड़ गया तो क्या होगा सुबह वो मरी मिलेगी ।"
दीनू चुप ।
"जुग-जुग जीजी बेटा !"
"मैं अपने खानदान के रिवाज के बारे में बताना चाहता हूं।"
"'कहो जंवाईं बाबू !"
… "हमारे यहाँ की रीत दुनिया से अलग है ।" भवतारा वेहद मीठे स्वर में कह रहा था---------" हमारे यहां व्याह दिन के बारह बजे तक हो जाता है । दुल्हन दिन में पति के साथ रहती है और रात में अपनी मां के घर ।"
"रात में मां के धर----ये कैसा रिवाज है ?" बसन्ती कह उठी ।
"कई पुश्तों से यही रिवाज चला आ रहा है ।" भवतारा बोला…" हमारे खानदान मैं अगर दुल्हन रात का वत्त अपने पति के साथ बिताती है तो सुबह को मृत पाई जाती है ।"
“ओह !"
"यही वजह है कि दुल्हन दिन में पति के साथ रहती है ओंर रात को अपनी मां के घर ।"
""जंवाई बाबू! ये रिवाज तो हमारे गले से नीचे नहीं उतर रहा ।" बसन्ती ने कहा ।
"मैं आपको रहने को वहुत बडा बंगला ले दूंगा । कामिनी शाम होते ही आपके पास आ जाया करेगी और दिन निकलते ही वो मेरे पास पहुच जाएगी ।" भवतारा के होंठों पर मीठी मुस्कान थी ।
बसन्ती अवतारा को देखने लगी ।
"अरी तू चुप क्यों हो गई, बोलती क्यों नहीं?"
"जंवाई बाबू की बात पर सोच रहीँ थी कि कामिनी की सारी जिन्दगी आने-जाने में ही बीत जाएगी । ऐसे में वो घर और बच्चों को कहां संभाल पाएगी । ये रिवाज तो परेशानी पैदा करने वाला है ।" बसन्ती ने कहा ।
"सब ठीक है, जंवाई बाबू पास ही हमें धर ले देगे ।" दीनू ने कहा ।
" तू चुप कर बूढे !"
" मैंने बाजार जाना था । कुछ सामान खरीदना है । सोचता हूं आपके लिए साडी और कामिनी के लिए कुछ सूट खरीद लूं ।"
" हां-हाँ ।" दीनू कह उठा…"इसमे पूछने की क्या जरूरत है ।"
“इस शहर में नया हूं , रास्तों से वाकिफ नहीँ, इजाजत हो तो कामिनी को साथ ले जाऊ?" भवतारा बोला ।
"क्या हर्ज है क्यों कामिनी की मां!"
बसन्ती ने दीनू को घूरा ।
"जब तुम्हें हर्ज नज़र नहीं आता तो मैं क्या कहूं भेज दो ।"
"तू बोल कामिनी से…मैं जंवाईं बाबू से दो-चार बाते कर लूं !"
बसन्ती उठी और झोपडी में प्रवेश कर गई ।
फीनिश
झोंपड्री के भीतर बैठी कामिनी, सब बाते सुन रही थी ।
बसन्ती ने जव भीतर प्रवेश किया तो कामिनी की निगाह उस पर जा टिकी ।
"सुना तूने?” बसन्ती ने धीमे स्वर में कहा ।
"मुझे ये आदमी अच्छा नहीं लगता ।" कामिनी ने धीमे किंतु तीखे स्वर में कहा ।
" तो ? "
"मैं इससे व्याह नही करूगी ।"
"ज्यादा बड़-बड़ मत कर । वो तेरे को बाजार ले जाना चाहता है, तेरे लिए कपड़े खरीदने को कह रहा है !"
"मुझे नहीं चाहिए कपडे ।"
"अपना मुंह बंद रखा मेरे लिए भी साडी खरीदेगा। कोई बढिया-सी साडी खरीदना------।"
"तुम्हें साडी…कपड़े की पडी है, मैं नहीं जाऊंगी ।
"क्यों ?"
"बोला तो मुझे ये अच्छा नहीं लगता ।"
बसन्ती कामिनी को घूरने लगी ।
"क्या बुराई है उसमें?"
"पता नहीं, लेकिन मन को अच्छा नहीं लगता ।"
"सब ठीक हो जाएगा । जिसके साथ रहो, धीरे-धीरे वो अच्छा लगने लगता है । इन बातो की मेरे को समझ है । वो हमें बंगला खरीदकर देगा । तू खुद ही सोच, हम तो बंगलों की दीवारों के साथ झुग्गी डालकर रहने वाले लोग हैं । हमारी इतनी औकात नहीं कि नखरे दिखाएं । तेरा बाप कपड़े प्रेस करता है, प्रेस किए कपड़े पहनता नहीं ! "
" जो भी हो, मैं इससे व्याह नहीं करूंगी ।"
"जूती उतारू !” बसन्ती ने दांत भीचकर धीमे स्वर में कहा ।
" मां , हमारी औकात बंगले में रहने की नहीं । हम झोंपडी में ही अच्छे लगते हैं । गरीब लोग हैं, हमारा रिश्ता गरीबों के साथ ही बँधे तो जंचता है । झोपडी में रहकर हमे महलों के बुर्ज को नहीं देखना चाहिए !" कामिनी गंभीर स्वर में बोली-----" खाना वो लोग खाते है, वो खाना हमे हजम भी नही होगा । हमे रूखी सूखी खानी ही अच्छी लगेगी ?"
" बाते करने लगी है तू.". !"
" मेरे हाल पर छोड़ दो मां । मेरे पीछे मत पडो । किसी गरीब साथ ब्याह करोगी तो मैं खुशी खुशी कर लूंगी, लेकिन इस आदमी साथ मैं किसी भी हाल मे व्याह न करूंगी । तुम लालच छोड दो ।"
बसन्ती कुछ चुप रही,फिर धीमे स्वर मेँ बोली।
"ठीक है । मै सोचुगी । बो बाहर बैठा है, अब तो तू जा उसके साथ बाजार । तेरी बात पर एक बार फिर मैं सोच लूंगी ।"
"उसके साथ तो एक कदम भी चलने का मन नहीं करता ।"
" जाती है या जूती उतारू ।"
कामिनी बेमन उठी और बाहर निकल गई ।
पांच मिनट बाद दीनू भीतर आया ।
"गए दौदोनों ?"पूछा बसन्ती ने।
"हां, दोनों की जोडी कितनी अच्छी लग रही है ।"
"तेरा तो दिमागों खराब हो गंया है बूढे बैठ तेरे से बात करनी है ।" बसन्ती बोली ।
दीनू बैठ गया ।
"मेरे को उसके रिवाज पसंद नंहीँ।"
"रिवाज?"
"हां,दिन मे पति कै पास रहना ओर रात में मां के घर चले जाना ! ये क्या बात हुई?"
"उनका रिवाज--!"
"चूल्हे में गया उनका रिवाज । हम कब तक जिन्दा हैं! हमारे बाद कामिनी को कितनी परेशानी आएगी । कल को बच्चे भी होने हैं और उन्हें पढाना-लिखाना होगा तो क्या कोई रात को अपने पति के पास रह ही नही सकेगी ।"
"तो क्या हो गया…वो दिन में !"
"एक ही बात की तरफ़ मत सोच और भी पचासों बातें है ।" बसन्ती ने गंभीर स्वर में कहा----"मान ले कि कभी कामिनी को रात … मे बहां रहना पड़ गया तो क्या होगा सुबह वो मरी मिलेगी ।"
दीनू चुप ।