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खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज complete

“मैं आपकी हैसियत बदल दूगा ।"

"जुग-जुग जीजी बेटा !"

"मैं अपने खानदान के रिवाज के बारे में बताना चाहता हूं।"

"'कहो जंवाईं बाबू !"

… "हमारे यहाँ की रीत दुनिया से अलग है ।" भवतारा वेहद मीठे स्वर में कह रहा था---------" हमारे यहां व्याह दिन के बारह बजे तक हो जाता है । दुल्हन दिन में पति के साथ रहती है और रात में अपनी मां के घर ।"

"रात में मां के धर----ये कैसा रिवाज है ?" बसन्ती कह उठी ।

"कई पुश्तों से यही रिवाज चला आ रहा है ।" भवतारा बोला…" हमारे खानदान मैं अगर दुल्हन रात का वत्त अपने पति के साथ बिताती है तो सुबह को मृत पाई जाती है ।"

“ओह !"

"यही वजह है कि दुल्हन दिन में पति के साथ रहती है ओंर रात को अपनी मां के घर ।"

""जंवाई बाबू! ये रिवाज तो हमारे गले से नीचे नहीं उतर रहा ।" बसन्ती ने कहा ।

"मैं आपको रहने को वहुत बडा बंगला ले दूंगा । कामिनी शाम होते ही आपके पास आ जाया करेगी और दिन निकलते ही वो मेरे पास पहुच जाएगी ।" भवतारा के होंठों पर मीठी मुस्कान थी ।

बसन्ती अवतारा को देखने लगी ।

"अरी तू चुप क्यों हो गई, बोलती क्यों नहीं?"

"जंवाई बाबू की बात पर सोच रहीँ थी कि कामिनी की सारी जिन्दगी आने-जाने में ही बीत जाएगी । ऐसे में वो घर और बच्चों को कहां संभाल पाएगी । ये रिवाज तो परेशानी पैदा करने वाला है ।" बसन्ती ने कहा ।

"सब ठीक है, जंवाई बाबू पास ही हमें धर ले देगे ।" दीनू ने कहा ।

" तू चुप कर बूढे !"

" मैंने बाजार जाना था । कुछ सामान खरीदना है । सोचता हूं आपके लिए साडी और कामिनी के लिए कुछ सूट खरीद लूं ।"

" हां-हाँ ।" दीनू कह उठा…"इसमे पूछने की क्या जरूरत है ।"

“इस शहर में नया हूं , रास्तों से वाकिफ नहीँ, इजाजत हो तो कामिनी को साथ ले जाऊ?" भवतारा बोला ।

"क्या हर्ज है क्यों कामिनी की मां!"

बसन्ती ने दीनू को घूरा ।

"जब तुम्हें हर्ज नज़र नहीं आता तो मैं क्या कहूं भेज दो ।"

"तू बोल कामिनी से…मैं जंवाईं बाबू से दो-चार बाते कर लूं !"

बसन्ती उठी और झोपडी में प्रवेश कर गई ।

फीनिश

झोंपड्री के भीतर बैठी कामिनी, सब बाते सुन रही थी ।

बसन्ती ने जव भीतर प्रवेश किया तो कामिनी की निगाह उस पर जा टिकी ।

"सुना तूने?” बसन्ती ने धीमे स्वर में कहा ।

"मुझे ये आदमी अच्छा नहीं लगता ।" कामिनी ने धीमे किंतु तीखे स्वर में कहा ।

" तो ? "

"मैं इससे व्याह नही करूगी ।"

"ज्यादा बड़-बड़ मत कर । वो तेरे को बाजार ले जाना चाहता है, तेरे लिए कपड़े खरीदने को कह रहा है !"

"मुझे नहीं चाहिए कपडे ।"

"अपना मुंह बंद रखा मेरे लिए भी साडी खरीदेगा। कोई बढिया-सी साडी खरीदना------।"

"तुम्हें साडी…कपड़े की पडी है, मैं नहीं जाऊंगी ।

"क्यों ?"

"बोला तो मुझे ये अच्छा नहीं लगता ।"

बसन्ती कामिनी को घूरने लगी ।

"क्या बुराई है उसमें?"

"पता नहीं, लेकिन मन को अच्छा नहीं लगता ।"

"सब ठीक हो जाएगा । जिसके साथ रहो, धीरे-धीरे वो अच्छा लगने लगता है । इन बातो की मेरे को समझ है । वो हमें बंगला खरीदकर देगा । तू खुद ही सोच, हम तो बंगलों की दीवारों के साथ झुग्गी डालकर रहने वाले लोग हैं । हमारी इतनी औकात नहीं कि नखरे दिखाएं । तेरा बाप कपड़े प्रेस करता है, प्रेस किए कपड़े पहनता नहीं ! "

" जो भी हो, मैं इससे व्याह नहीं करूंगी ।"

"जूती उतारू !” बसन्ती ने दांत भीचकर धीमे स्वर में कहा ।

" मां , हमारी औकात बंगले में रहने की नहीं । हम झोंपडी में ही अच्छे लगते हैं । गरीब लोग हैं, हमारा रिश्ता गरीबों के साथ ही बँधे तो जंचता है । झोपडी में रहकर हमे महलों के बुर्ज को नहीं देखना चाहिए !" कामिनी गंभीर स्वर में बोली-----" खाना वो लोग खाते है, वो खाना हमे हजम भी नही होगा । हमे रूखी सूखी खानी ही अच्छी लगेगी ?"

" बाते करने लगी है तू.". !"

" मेरे हाल पर छोड़ दो मां । मेरे पीछे मत पडो । किसी गरीब साथ ब्याह करोगी तो मैं खुशी खुशी कर लूंगी, लेकिन इस आदमी साथ मैं किसी भी हाल मे व्याह न करूंगी । तुम लालच छोड दो ।"

बसन्ती कुछ चुप रही,फिर धीमे स्वर मेँ बोली।

"ठीक है । मै सोचुगी । बो बाहर बैठा है, अब तो तू जा उसके साथ बाजार । तेरी बात पर एक बार फिर मैं सोच लूंगी ।"

"उसके साथ तो एक कदम भी चलने का मन नहीं करता ।"

" जाती है या जूती उतारू ।"

कामिनी बेमन उठी और बाहर निकल गई ।

पांच मिनट बाद दीनू भीतर आया ।

"गए दौदोनों ?"पूछा बसन्ती ने।

"हां, दोनों की जोडी कितनी अच्छी लग रही है ।"

"तेरा तो दिमागों खराब हो गंया है बूढे बैठ तेरे से बात करनी है ।" बसन्ती बोली ।

दीनू बैठ गया ।

"मेरे को उसके रिवाज पसंद नंहीँ।"

"रिवाज?"

"हां,दिन मे पति कै पास रहना ओर रात में मां के घर चले जाना ! ये क्या बात हुई?"

"उनका रिवाज--!"

"चूल्हे में गया उनका रिवाज । हम कब तक जिन्दा हैं! हमारे बाद कामिनी को कितनी परेशानी आएगी । कल को बच्चे भी होने हैं और उन्हें पढाना-लिखाना होगा तो क्या कोई रात को अपने पति के पास रह ही नही सकेगी ।"

"तो क्या हो गया…वो दिन में !"

"एक ही बात की तरफ़ मत सोच और भी पचासों बातें है ।" बसन्ती ने गंभीर स्वर में कहा----"मान ले कि कभी कामिनी को रात … मे बहां रहना पड़ गया तो क्या होगा सुबह वो मरी मिलेगी ।"

दीनू चुप ।
 
"क्या पता उसके खानदान को क्या अभिशाप मिला हुआ है, इस तरह अपनी बेटी को कुएं में कैसे धक्का दे दे !"

दीनू व्याकुल!

"सारी उम्र कामिनी बच्चों को लिए ससुराल-मायके ही दौडती रहेगी । दिन में वहाँ रात में यहां, लोग क्या कहेंगे, पूछेंगे तो हम क्या जवाब देगे कि ये क्या हो रहा है । तमाशा है कोई------कामिनी का बुरा हाल होग! "

दीनू परेशान!

"शादी-ब्याह न हो गया, खेल होगया ये तो ।"

"तू क्या कहना चाहती है?"

" मुझें नहीं जंचा ये सब......!"

" तो ?"

"बूढे! सब कुछ सुनकर भी तो-तो कर रहा है, पल्ले नहीं पडी सारी बात या नियत खराब है ।" बसन्ती झल्लाई ।

“कह लिया तूने जो कहना था?"

“हां”

"अब मेरी सुन, कामिनी की शादी उसी के साथ होगी !"

" बूढे तू… !"

" बूढा होगा तेरा बाप, मेरी सुन ।" दीनू भडका----"पैसे बाला है वो, लाखों रुपया दे गया है । अभी भी वो कितना पैसा हमेँ देगा । हमें बंगला लेकर देगा। नौकर होंगे-कार होगी, हम ऐश . करेंगे । सारी उम्र इस तरह प्रेस करते हए झोंपड़े में नहीं रहेगे । दिन बदल जाएँगे हमारे । बाबुओं की तरह रहेंगे हम ।"

" और हमारी लड़की सुबह यहां और रात बहां भटकती रहे !"

"क्या फर्क पड़ता है? आज कल फुर्सत किसके पास पडी है कि दूसंरे को कोई देखे । क्या पता शादी के अगले ही दिन वो मर जाए और सारी जमीन जायदाद हमें मिल जाए । किसी गऱीब के हाथ में, कामिनी का हाथ दे दिया तो पता नहीं पेट-- रोटी भी नहीं खा पाएगी । ढंग का कपड़ा भी पहनने को मिले या न मिले । बच्चे आवारा हो जाएंगे । दौलत पास में हो तो सारे अवगुण ढक जाते हैं । बुराई होते हुए भी लोग इज्जत देते हैं ।"

बसन्ती की निगाह दीनू पर थी ।

267

" सारा दिन खड़े रहकर प्रेस करनी पड़ती है । मुझे पता है कि मेरा क्या हाल होता है !"

"तो तूने पक्का सोच रखा है?"

"अब सोचने को कुछ नहीं है । हम उसके साथ कामिनी की शादी तय कर चुके है । पैसों है तो सव कुछ है ।"

" कामिनी से पूछ लिया ?"

" उससे क्या पूछना ?"

“वै इससे शादी नहीं करना चाहती ।"

"वो क्या उसकी मां भी शादी करेगी उससे.....!" दीनू ने गुस्से से कहा ।

" उसकी मां तो कर लेगी, लेकिन बात कामिनी की, है, उसने स्पष्ट मना कर दिया है कि.... !"

" उसकी मना को मानता ही कौन है ।"

" वो अब बच्ची नहीं रही, जबर्दस्ती करोगे तो भाग जाएगी ।" वसन्ती ने कहा ।

“तू किस लिए है, समझा उसे…रास्ते पर ला । वो तो नादान है । अच्छे…भले की समझ नहीं है उसमें!"

"बहुत समझाया है उसे…फिर भी उसे समझाने की कोशिश करूगी ।"

"मैँ तो दो-चार दिन में ही उसका व्याह कर देना चाहता हू।"

" ये गुडूडी-गुडूडे का खेल नहीं, जो तू उसे दो-चार दिन में व्याह देगा सब्र से काम ले ।"

@@@@@@@@@@@@@@@

भवतारा और कामिनी पैदलं चलते हुए बाजार में आ पहुचे थे ।

रास्ते में भवतारा ने कामिनी से बात करने की चेष्टा की, परंतु वो जवाब में हूं हूं करके ही रह गई । भवतारा महसूस कर चुका था कि कामिनी को उसका साथ पसंद नहीं है ।

"आज तू औंर मंगलू पुलिया पर नहीं बैठे?" भवतारा ने मीठे स्वर में कहा ।

"नहीं ।"

"क्यों ?"

"यूं ही ।"

"कहां बैठे फिर?"

"इधरैम-उधर घूमते रहे !" कामिनी ने अनमने मन से-कहा ।

"मैं जानता हूं तुम दोनों पुलिया पर क्यों नहीं बैठे !" भवतारा ने हौले से हस कर कहा !

"क्यों नहीं बेठे?”

"क्योंकि मेरा वहां आ जाना तुम दोनो को अच्छा नहीं लगता !"

" ऐसी बात तो नहीं !" कामिनी ने बात संभालने का प्रयत्न किया ।

"मुझें तो लगता है कि ये ही बात है । मंगलू मेरे बारे में क्या बात कर रहा था?"

"कुछ भी नहीं !"

* झूठ ......!*

“मैं झूठ क्यों बोलूंगी !" कामिनी ने उसे देखा-" मंगलू ने ये ही कहा था कि उसका मालिक वहुत अच्छा है !"

दोनों भीड़ भरे बाजार में घूम रहे थे !

"जानती हो कामिनी, मैंने जव से तुम्हें देखा है, अपनी नीद गवा बैठा हूं।

कामिनी ने जवाब में कुछ नहीं कहा ।।

"तुम मुझे बहुत प्यारी लगती हो, लगता हैँ जैसे दुनिया में मैं तुम्हारे लिए ही आया हूं।" भवतारा ने गहरी सांस लेकर कहा----" बहुत बड़े-बड़े घरों से मेरे लिए रिश्ते आ रहे थे, लेकिन मुझें तुम पसंद आई। देखते ही दिल दे बैठा !"

जाने क्यों कामिनी के चेहरे पर शर्म की लाली आ ठहरी ।।

"मैने तो पक्का सोच लिया है कि जव तक हमारी शादी नहीं हो. जाती, तब तक मैं यहीं रहूंगा ।"

कामिनी सिर झुकाए उसके साथ आगे बढी जा रही थी ।

"शादी के बाद मैं मंगलू को नौकरी से निकाल दूगा !"

"क्यों?" कामिनी ने सिर उठाकर उसे देखा ।

"क्योंकि तब तो तुम मेरा ध्यान रखोगी, मंगलू का क्या काम बचेगा । कुछ भी नहीं ।।"

कामिनी चुप रही ।

“तुम्हें मंगलू कैसा लगता है !"

"अच्छा है !"

“मैं कैसा लगता हूं !"

"तुम भी अच्छे हो !"

"तुम्हें मगलू अच्छा लगता या मैं---ज्यादा कौन अच्छा लगता ' है !!" भवतारा ने मुस्कराकर पूछा ।

"ये तुम कैसा सवाल कर रहे हो ?"

"जवाब दो ।"

भवतारा की बाते जैसे जादू करती जा रही थी कामिनी पर ।

हर पल अब कामिनी को भवतारा अच्छा लगता जा रहा था ।

"खामोश क्यों हो गई ? क्या मैं ये समझू कि मंगलू तुम्हें ज्यादा अच्छा लगता है?”

"गलत बात क्यों कहते हो?"

"तो?”

" तुम अच्छे लगते हो मुझें । मगलू तो मेरा दोस्त भर है बस ।" कामिनी मुस्कराकर कह उठी ।

वो खुद नहीं समझ पा, रही थी कि उसके होठों से ये सब बाते कैसे निकल रहीँ हैं । ये बात तो वो सपने में भी न सोच सकती थी कि उसके साथ ऐसा शैतान चल रहा है, जो अपनी ताकत के दम पर उससे कोई भी मनचाहा काम करवा सकता है ।

" मैं तुम्हें रानी बनाकर रखूंगा, बहुत शानदार जिन्दगी दुगा तुम्हें, सब तुम्हारे आगे झुकेंगे ।"

"सच ।"

"हां तुम्हारी कसम कामिनी ।"

"लेकिन मुझे तुम्हारी बात पसद नहीं आई ।" कामिनी के होंठों से निकला ।

"क्या? "

" दिन में तुम मेरे पास रहोगे और रात को नहीं, ऐसा भी भला कही होता है?”

" ये मेरी मजबूरी है प्रिय कामिनी!" भवतारा ने अफसोस जताते हुए मीठे स्वर में कहा--" तुमसे जुदा होना मुझे भी अच्छा नंही लगेगा, परंतु ऐसा करना हमारे खानदान पर ये श्राप है कि जो औरत रात के वक्त मर्द के साथ रहेगी, वो सुबह मर जाएगी ।"

" ओह......!"

" प्यार में तो लोग क्या-क्या नहीं करते, क्या तुम ये छोटी-प्ती बात भी सहन नहीं कर सकति । अगर तुम मुझे प्यार करती हो तो मेरी ...... मेरी इस बात से तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी । रात की अपेक्षा हम दिन में सेज सजाया करेंगे ।"

कामिनी का चेहरा शर्म से भर उठा ।
 
"हां कहो कामिनी!"

"हा ।"

"मैं दिन में तुम्हारे पास आया करूगा और अंधेरा होने से पहले चला जाया करूंगा । तुम्हारे पास नौकर-चाकर रहेगे । तुम्हें कोई परेशानी नहीं होने दूंगा । क्या तुम ये छोटा-सा त्याग नहीं कर सकती?" भवतारा की आवाज में आग्रह के भाव थे ।

"क्यों नहीं कर सकती, तुम जो कहोगे वो ही करूंगी !"

"ओह, मेरी रानी! तुम कितनी अच्छी हो । तुम्हारा चेहरा ही नही , तुम्हारा दिल भी सुन्दर है ।"

"तुम भी तो अच्छे हो ।"

"सच? "

" हां, पहले मैंने तुम्हें ठीक से पहचाना नहीं । मेरी ही गलती थी ये ।"

"आह ,मैं कितना भाग्यवान वन गया हूं तुम्हें पाकर, तुम अनमोल हो ।" भवतारा ने गहरी सांस ली ।

"मुझे मूख लगी है" । एकाएक कामिनी हक-भरे स्वर में कह उठी ।

"मुझें तो भूख जरा ही नहीं है ।"

"क्यों ?"

"मैंने सुबह बहुत ज्यादा खा लिया था । अब रात की ही पेट भरूगां , परंतु तुम खा लो।"

“क्या खाऊं ?"

" जो भी तुम्हें पसंद हो । बाजार की जो भी जगह तुम्हें अच्छी लगे, वहीं से खाना । उसके बाद तुम्हारे लिए सूट तुम्हारी मां के लिए साडी खरीद दूंगा । तुम्हें सोने का हार भी लेकर दूगा ।"

" सोने का हार? कामिनी चहक उठी ।

" हां, दुनिया की हर कीमती चीज तुम्हारे कदमों में बिछा दूगा, लेकिन एक-शर्त है ।" भवतारा मुस्कराया र!"

" क्या?

"तुम्हें मेरे कदमों में बिछ जाना होगा ।"

भवतारा ने इस तरह कहा कि कामिनी खिलखिलाकर हंस पड्री ।

"तुम बहुत अच्छे हो भवतारा !" कामिनी ने हंसी रोकते हुए कहा ।

कामिनी भवतारा की दीवानी होती जा रही थी । ये सव शैतान के बेटे की ताकतों का कमाल नहीं तो और क्या था । सुबह तक वो भवतारा का चेहरा भी नहीं देखना चाहती थी और अव उसके लिए पहला और आखिरी मर्द भवतारा ही रह गया था ।

@@@@@@@@@@@@@@@

कामिनी झोंपडी में पहुंची तो बहुत खुश थी । खुशी छिपाए न छिप रही थी । हाथ में सामान से भरे लिफाफे थे, साथ में था सोने का भारी हार । दुकान पर पहनकर देखा था उस हार को, वो खूब उसे जंच रहा था ।

बसन्ती की निगाह उसके चेहरे पर पड्री तो वो अजीब-से स्वर में बोली ।

"ये क्या हो गया तेरे को…बहुतं खुश है?”

"हां मां ।"

बसन्ती ने होंठ सिकोड़कर उसे देखा ।।

" ये देखो मां, तुम्हारे लिए चार साड्रियां लाई हू। अपने लिए पाच सूट और सोने का भारी हार ।"

"सोने का भारी हार?" बसन्ती के होंठों से निकला ।

"बात क्या है, खुश क्यों नजर आरही है वो तेरे को पसंद आ गया क्या?"

"हां मां, वो बहुत अच्छा है, मैं शादी करूंगी उससे. ..!"

बसन्ती का चेहरा खिल उठा । वो झोपड़े में -बैठे बैठे चिल्लाई ।

"ओ बूढे! सुना तूने कामिनी क्या का रही है?"

झोंपडी के द्वार पर दीनू नजर आया ।

"क्या आफत आ गई ?"

("कामिनी को बो पसंद आ गया है, शादी को तेयार है !"

"हमारे बुरे दिन खत्म हुए ।" दीनू मुस्करा उठा।

@@@@@@@@@@@@@@@
 
भवतारा के शरीर में एकाएक ऐठन-सी हुईं, परंतु तुरंत ही ठीक होगई । शाम ढल रही थी ।

दिन की अंतिम रोशनी और अंधेरे का मिलन हो रहा था । वक्त अंधेरे की तरफ सरकना आम हो गया था । सुरमई क्षितिज अब कालिमा में बदल चुका था । रात का अंधेरा, उजाले के अंतिम हिस्से को अपने जागोश में लेता जा रहा था ।

एकाएक मंगलू ठिठका और थकान-भरे स्वर में बोला ।

" बस, अब नहीं चला जाता ।"

"थक गया मंगलू.. !"

" हा वापस चलते हैं !"

"मेरे भोजन का वक्त होता जा रहा है । अंधेरा हो गया है । भोजन के पश्चात मैं वापस चलूगा ।"

" दिन-भर हम घूमते रहे, क्या तुम तब भोजन नहीं कर सकते थे, जो...."

"मुझें अंधेरे में ही भोजन करने की इच्छा जाग्रत होती है ।"

"अजीब हो तुम ।"

भवतारा के जिस्मं में बेचैनी भरने लगी थी । अपने शरीर में होते,. अजीब-से बदलाव की अनुभूति महसूस कर रहा था । अब उसकी पैशाचिक इच्छाएं, उसके मस्तिष्क में कुलवुलाने लगी थीं ।

एकाएक पुन उसके जिस्म में ऐठन उठी ।

तन-सा गया भवतारा का शरीरा ।

अगले ही पल उसके चेहरे का रूप बिगड़ने-सा मुट्ठिया मिच-सी गई । आखें जैसे किसी दरिन्दे की लगने तनी । उसकी सासों मे गुर्राहट का भाव समा गया था जैसे ।

वे दोनों इस वक्त भीड़ भरी सडक पर थे । मंगलू भवतारा को न देखकर, बाजार को देख रहा था, वरना भवतारा में होते परिवर्तन को उसने फौरन भांप जाना था

। भवतारा ने जल्दी से खुद को संभाला। अपनी इच्छाओं को दबाया।

कुरूप होता उसका रूप पुन: सामान्य हो गया । तनाव कुछ कम हुआ ।

वो गहरी-गहरी सासे लेने लगा ।

मंगलू ने उसे देखा और कह उठा ।

"क्या हुआ तुम्हें…तुम लम्बी-लम्बी सांसे क्यो ले रहे हो?"

"शायद थक गया हूं ।" भवतारा का चेहरा गंभीर था ।

"सारा दिन घूमते रहे हैं, थकान तो होगी ही । मेरी मानो वापस चलते हैं । भोजन पैक करा लो ।"

"मैँ कुछ आराम करना चाहता. . . !"

"वो सामने रेस्टोरेंट है, वहां चलकर बैठते हैं । आराम भी हो जाएगा और कुछ खा भी. ..!"

"वहां नहीं, उधर चलते हैं अंधेरे में ।" भवतारा ने शांत स्वर में कहा…"अंधेरे में मुझें आराम मिलेगा ।"

"अंधेरे में आराम, कितनी अजीब बात कह रहे...!"

" चलो !"

दोनों अंधेरे की तरफ बढ गए।

कुछ देर बाद अंधेरे में ठिठके और भवतारा चैन-भरे स्वर में कह उठा ।

"यहां ठीक. है !"

मंगलू भवतारा पर नजर डालकर कह उठा ।

"" तुम्हारी हरकते मेरी समझ से बाहर है । आराम करना था तो कहीं बैठकर करते । इस तरह अंधेरे में खड़े होकर... ।"

"मेरा यहीं आराम है मंगलू?" भवतारा का स्वर गंभीर था…""मुझे अंधेरे में रहकर आराम मिलता है ।"

"तो दिन में क्यों घूमते रहे ।"

"दिन में मैं ठीक रहता हू।"

"तो रात को क्या हो जाता है?"

भवतारा चुप रहा ।

मंगलू ने गहरी सांस ली और इधर-उधर नजरो को दौड़ाता बोला ।

"वापस चलते हैं । रास्ते से भोजन पैक करा लेना । मै भी वहुत थक गया हूं।"

भवतारा खामोश रहा ।

“बोलो, तुम खामोश क्यों हो?"

"कुछ देर चुप रहो ।"

उसी पल भवतारा के शरीर में ऐठन उठनी शुरू हुई ।

अवतारा ने अपने पर काबू पाना चाहा ।

परंतु ऐठन ज्यादा ताकतवर थी । शरीर में ज्यादा तनाव-भर गया था । उसने मंगलू की तरफ पीठ करली । मुटिठयां भिचने लगा । एकाएक चेहरा कुरूप-सा होने लगा । सिर झटककर उसने अपने पर काबू पाने की चेष्टा की ।

फिर धीरे--धीरे वो सामान्य अवस्था में आने लगा ।

अगले कुछ ही पलो में वो सामान्य हो गया ।

भवतारा पलटा, मंगलू को देखा।

मंगलू लापरवाह-सा इधर-उधर देख रहा था ।

तभी मंगलू को सड़क के किनारे-किनारे चलकर आती युवती दिखी । वो इसी तरफ़ आ रही थी । उसके सैडिलो की ठक-ठक, हल्की सी कानों में पड़ रही थी ।

भवतारा भी उसे पास आते देखने लगा । वो पास आई । उसके होंठों पर लाल लिपिस्टिक पुती थी । गालों पर भी लाली लगा रखी थी । बाल कलर से सुनहरी वना रखे थे । सैडिलो के साथ वो स्कर्ट और टॉप पहने थी । पच्चीस की उम्र होगी उसकी । पास से निकलते हुए उसने मंगलू ओंर भवतारा पर मुस्कान फेंकी और पंद्रह कदम दूर जाकर खडी हो गई । फिर बार-बार उन्हें देखने लगी । दर्शा वो ये रही थी जैसे उसे किसी का इंतजार हो यहां ।

"ये. . .! ये कौन है?” भवतारा ने मंगलू से पूछा ।

" ***** ! "
 
"वो क्या होती है?"

" पैसे लेकर पराए आदमी की वन जाती है ।" मंगलू ने मुंह बनाकर कहा ।

"ये यहाँ क्यों खडी है?” भवतारा का हाथ अपने गाल पर पहुचा और गाल मसलने लगा ।

"इस आशा में खडी है कि शायद हम इसकी रात के ग्राहक, बन जाएं । ये हमे नोटों वाला समझ रही है ।"

भवतारा ने आस-पास नजरे दौड़ाईं ।

कुछ दूर उसे गली दिखाई दी ।

"मंगलू!" भवतारा बोला-" वो गली देख रहे हो ना उधर, तीन सौ कदम दूर ।"

“हां !"

"मैं वहीं जा रहा हूं उसे तुम गली में भेजो । इसे कहना बहुत सारे पैसे मिलेंगे ।"

" कामिनी का भूत सिर से उतर गया ।" मंगलू ने व्यंग्य से कहा ।

"मैं जा रहा है । तुम इसे गली में भेजो" ।

"लेकिन तुम्हारे पास पैसे तो है नहीं देने को !"

" तुम्हें जो कहा है, वो ही करो ।" एकाएक भवतारा का स्वर कठोर हो गया और पलटकर वो चल पड़ा ।

मंगलू वहीँ खड़ा भवतारा को गली की तरफ जाते देखता रहा । वो अभी तक उसे ठीक से समझ नहीं पाया था । कभी-कभी भवतारा की हरकतें तो बडी अजीब-सी लगती ।

मगलं ने गर्दन घुमाकर युवती को देखा।

लगा जैसे युवती उसे अपनी ओर देखते पाकर मुस्कराई हो।

मगलू उसकी तरफ़ बढ गया और युवती के पास पहुंचकर ठिठका ।

"हैलौ !" युवती कह उठी…"अपने यार को क्यों भेज दिया? मैं दोनों को निबटा देती ।"

" वो तुमसे मिलना चाहता है !" मंगलू ने मुह बनाकर कहा ।

" मुझसे , लेकिन वो तो चला गया ।" युवती ने भवतारा को दूर गली प्रवेश करते देखा ।

"वो मुझे कह गया है कि तुम्हें गली में भेज दूं ।"

"ओहा तो ये बात है । मेरी फीस पता है?" वो बोली ।

"वो अमीर आदमी है । मेरा दोस्त नहीं है, मैं उसके लिए काम करता हूँ ।"

"अमीर है वो?”

"हां ।"

"पांच हजार देगा !"

"बात कर लेना पहले, मेरे ख्याल में तो दस भी दे सकता है !" । मंगलू ने गहरी सांस ली…“मेरे को भी वहुत पैसे देता है, कभी तो मुझे ही कहना पड़ता है कि बस, और मत दो ।"

"ऐसाँ, फिर तो मैं उससे यारी गांठ लूंगी और तुम्हें मुफ्त में मजे दिया करूंगी ।"

"जाओं वो तुम्हारा इंतजार कर रहा है !"

"जाती हूं---कैसी लग रही हू?"

"अंधेरे में ठीक से नजर नहीं आ रही ।"

" कुछ तो दिख ही रही होऊगी !"

" जितनी दिख रही हो, उतनी अच्छी लग रही हो !"

"कपडों के बिना तो मैं और भी अच्छी लगती हु, दिखाऊंगी तुम्हें......!" वो उत्साह-भरे स्वर में बोली ।

" पहले उसे तो दिखा आओ ।"

"अभी जाती हूं।" उसने मगलू का गाल थपथपाया और गली की तरफ़ बढ गई ।

वो वहीं खड़ा उसे जाते देखता रहा, फिर गहरी सांस लेकर मुंह फेर लिया ।। वो जानता था कि भवतारा से लडकी को फूटी कौडी नहीं मिलने वाली, उसके पास पैसा है ही नहीं ।

तभी स्कूटी पर सवार एक लडकी मंगलू के पास आकर रुकी ।

" ऐ हीरो चलना है क्या?"

"पैसे नहीं हैं ।" मगलू ने मुस्कराकर कहा ।

"भाड में जा ।" लड़की ने कहा और स्कूटी आगे दौडा ले गई ।

लडकी गली के किनारे पल भर के लिए ठिठकी और नजर दौड़ाई गली में । एक-दो लोग आ-जा रहे थे, परंतु वो न दिखा, जिसके लिए आई थी वो । यहीं कहीं होगा, ये सोचकर वो गली में प्रवेश कर गई । उसके सैडिलो की ठक-ठक सुनसान गली मे गूंजने लगी । जो एक-दो लोग आ-जा रहे थे, वो गली में से बाहर निकल गए थे । वो गली मे ठक-ठक करती आगे वढ़ती जा रही थी । आधी गली तय करने पर वो रूकी । वो उसे कहीं भी न दिखा ।

" हैलो !" नजरे दौड़ाती वो शांत स्वर में कह उठी-----" कहां हो तुम मैं आ गई ।"

जवाब में खामोशी छाई रही, कोई जवाब नहीं ।

" हैलो !" उसने पुकारा ।

इस बार ही कोई जवाब नहीं ।

"डरपोक कहीं का । मुझे बुलाकर खुद भाग गया । खामखाह धंधे का टेम खराब किया ।"

वो वड़बड़ा उठी । इसके साथ ही युवती पलटकर बापस बढी ।

ठक-ठक पुन: शुरू हो गई ।

ठीक इसी पल पास ही अंधेरे में दुबका साया उस पर झपट पड़ा ।

" ओह! " युवती के होंठों से निकला-"शरारती कहीं के, तुम हो यहां छिपे हो और मैं तुम्हें दूंढ़........"

वो युवती के भीचे अंधेरे में पुन: दीवार के पास दुबक गया ।

"सब्र करो, मैं भागी तो नहीं जा रही, पूऱी रात अपनी है. . .तुम तो . . ।"

तभी युवती को लगा, जैसे बो जमीन पर बैठ गया हो और अपनी दोनों टांगो में फंसाकर उसे भीच लिया ।

"बहुत ज़ल्दबाज हो, ज़रा भी सब्र नहीं, अव कपड़े फाडोगे क्या--रुको जरां...!” उसी पल युवती को बालों से पकडकर उसका सिर एक तरफ़ को झुकाया और होंठों से निकले दोनों लम्बे दांत, गले पर उभरी खून की नली मे धुसेड़ दिए।

एक पल के लिए सिर्फ एक पल के लिए युवती को अंधेरे में उसके चेहरे की झलक मिली थी । उस झलक ने उसके भीतर इतनी दहशत भर दी कि दो चीख भी न सकी । ये उसकी जिन्दगी की आखिरी झलक थी । उसके बाद क्या हुआ, उसे कछ याद न रहा ।

बो खून पी रहा था और वो बेहोश होती चली गई थी ।

@@@@@@@@@@@@@@
 
मंगलूको वहाँ खड़े-खड़े काफी देर हो चुकी थी।

भवतारा लौटा न था ।

कुछ और इंतजार किया उसने भवतारा का । उसके बाद वो गली की तरफ़ चल पड़ा । अव तक तो हर हाल में आ जाना चाहिए था भवतारा को, आखिर इतनी देर कैसे लग गई?

मंगलू गली में पहुंचा । गली में एक जगह पांच-छ: लोग खड़े है । रोशनी न के बराबर थी । मंगलू को लगा कि लोगों ने भवतारा को लडकी के साथ गड़बड़ करते पकड लिया है और अच्छी ठुकाई की होगी । तभी ये लोग खडे है !"

मंगलू उनके पास पहुचा ।

"क्या हुआ भाई साहब?" मंगलू ने शराफ़त भरे स्वर मे पूछा !

"लडकी की लाश पडी है इधर ।"

"किधर?" मंगलू के होंठो से निकला ।

"वो देखो, अंधेरे में, उसके दो पैर रोशनी, में नजर आरहे हैं ।"

मंगलू की निगाह अब तक रोशनी में नज़र आते पेरों पर टिक चुकी थी ।

पैरों में इस वक्त कुछ पहना हुआ नहीं था ।

तभी वहां से निकलते दो आदमी और वहां रूके । लाश की बात सुनते ही एक ने जेब से माचिस निकाली और तीली जलाई ताकि मरने वाली युवती का चेहरा देख सके ।

तीली की रोशनी चमकी तो मंगलू ने भी पल-भर के लिए मृत युवती का चेहरा देखा ।

ये वो ही युबती थी, जिसे उसने गली में भेजा था ।

लेकिन ये मरी कैसे?

कई सवाल मंगलू के मस्तिष्क में उठने लगे ।

सबसे वड़ा सवाल तो उसके सामने ये आया कि क्या भवतारा ने उसे मारा है?

अगर मारा है तो क्यों?

मगलू का दिमाग खराब-सा होने लगा ।

ऐसी क्या बात हो गई कि भवतारा को इसकी जान लेनी पडी । अवश्य पैसे पर झगडा हुआ होगा । युवती पैसे मांग रहीं होगी ओर भवतारा के पास तो पैसे हैं नहीं कि उसे दे देता, ऐसे मे भवतारा उसे मारकर चला गया ।

"पुलिस को खबर कर दी?” पूछा किसी ने ।

"हां, मैंने अपने मोबाइल फोन से पुलिस को खबर की है । वो आती ही होगी ।" जवाब मिला ।

मंगलू के चेहरे पर गंभीरता थ्री । व्याकुलता थी ।

तभी वातावरण में पुलिस सायरन की आवाज़ गूंजी !"

मंगलू ने वहाँ से निकल जाना ही उचित समझा और आगे बढ गया ।।

@@@@@@@@@@@@@@

मंगलू वापस मंदिर पहुचा तो रात के दस बज रहे थे । मंदिर का गेट बंद हो चुका था । उसे समझ न आया कि अब कैसे भीतर प्रवेश करे, मद्धिम-सी ठंडी हवा चल रही थी । मंदिर के भीतर, दो तीन जगह बल्बो का प्रकाश हो रहा था । मंदिर के भीतर एक-दो लोग उसे दिखे भी, परं किसी से गेट खोलने को कहना ठीक नहीं था । क्योंकि मंदिर की के भीतर पांव रखते ही वो दुसरों की निगाहो से गायब हो जाता और हड़कम्प मच जाता, वो सब घबरा जाते ।

मंगूल वहीं टहलता सोचता रहा कि कैसे भीतर प्रवेश करे?

मंदिर तक जाती सडक सुनसान थी । अब रात के वक्त कौन मंदिर मे जाएगा कि गेट खुले।

मंगलू मंदिर की दीवार के साथ साथ आगे बढ गया । वो भीतर प्रवेश का कोई रास्ता तलाश कर लेना चाहता था और रास्ता मिला भी । दाई तरफ मंदिर की दीवार के साथ वहुत सारा मलबा डाल रखा था । वो मलवे पर जाकर खडा हुआ तो दीवार की मुंडेर अब ज्यादा ऊंची न थी ।

मंगलू ने छलांग भरी और दीवार की मुंडेर थाम ली, फिर दीवार पर चढा और उसके बाद खुद को संभालते हुए दूसरी तरफ कूद गया । ये मंदिर का छोटा सा बाग था, वहां कुछ पेड़ और फूलों की क्यारियां लगी थी । मंगलं आगे बढ गया । सामने से एक व्यक्ति आता दिखाई दिया, परंतु मंगलू निश्चित था कि मंदिर के भीतर अदृश्य है,उसे नहीं देख सकेगा वो ।

फिर मंगलू ने तरकीब से उस दीवार को सरकाकर भीतर प्रवेश किया और भीतर खूंटी को खीचने से दीवार अपनी जगह पर आकर टिक गई । मंगलू ने गहरी सांस ली और आस-पास देखा ।

वो ही गोल कमरा था ।

हर तरफ खामोशी छाई हुई धी ।

शायद भवतारा अभी आया नहीं है । इस विचार के साथ वो सीढियों की तरफ बढ गया । एक बार वो भवतारा के कमंरे मैं नजर डाल लेना चाहता था । रह-रहकर उसकी आंखों के सामने मृत युवती का चेहरा घूम रहा था । यही सोच रहा था कि जो भी हो, भवतारा को उसकी जान नहीं लेनी चाहिए थी । किसी और तरह से मामले को निबटा लेता ।

सीढियां तय करके मंगलू ऊपर पहुचा ।

भवतारा के कमरे का दरवाजा खुला था ।

दरवाजे के बीचो-बीच जा खडा हुआ मगंलू ।

भवतारा बैड पर पीठ के बल पस्त होकर लेटा हुआ था । बांहें बैड पर ऊपर की तरफ फैली हुई थी और टांगें भी दाएं-बाएं को फैली हुई थीं । बहुत चैन की नींद ले रहा था वो । होंठों से मद्धिम-से खुर्राटे निकल रहे थे । मंगलू वहीँ खड़ा देखता रहा उसे । चेहरे पर गभीरता भरे शांत भाव थे ।

फिर जव पलटने लगा कि ठिठक गया ।

छाती पर से कमीज का कुछ हिस्सा लाल-सा नजर आ रहा था । पैट पर भी लाल बड़ा-सा धब्बा दिखा ।

मंगलू कमरे के भीतर प्रवेश कर गया ।

बैंड के मास जाकर रुका और कमीज पर उभरे बड़े-से लाल धब्बे को ध्यान से देखने लगा । पहचानने में ज्यादा देर न लगी कि वो खून का धब्बा है, जो कि सुख चुका था ।

पैंट पर लगे खून के धब्बे को पहचाना ।

उस युवती का ही खून लगा होगा । उसने सोचा, परंतु तभी उसकी निगाह अवतारा के चेहरे पर पडी तो माथे पर बल आ ठहरे ।

मुह होंठ, गाल, हर जगह पर खून लगा था, जो कि सूख गया था ।

चेहरे पर खून कहां से आ गया? उसने सोचा ।

कल रात भी भवतारा जब वापस लौटा था तो उसकी कमीज़ पर खून के दाग थे । मंगलू की सोचो में सवाल तो थे, परंतु ज़वाब न था ।

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अगले दिन मंगलू की आंखों खुली तो आठ बज रहे थे । नहा-धोकर वो तैयार हुआ । नए कपड़े पहन, तब दस बजने जा रहे थे । उसकी आखों के सामने बार-बार कामिनी की सुरत नाच रही थी । भोली-भाली खूबसूरत कामनी । मुस्कराती तो दांत लड़ी की तरह चमकने लगते । उसकी बातों मे रस था । वो आज़ कामिनी को फिर अपने सामने देखाना चाहता था ।

भवतारा करवट लिए गहरी नीद में था ।।

मंगलू वहाँ से निकला और मंदिर से बाहर जाकर पुलिया पर जा पहुचा।

वहां गुनगुनी-सी धूप फैली हुई थी ।

लोग मंदिर में आ-जा रहे थे ।

कामिनी ने भला वहां कहां होना था । पुलिया को खाली पाकर मंगलू के चेहरे पर बैचेनी-सी आ ठहरी । पुलिया पर बैठकर वह रह-रहकर बेचैनी से पहलू बदलने लगा । निगाह हर पल कामिनी की तलाश में इधर-उधर फिर रही थी ।

वक्त बीतने लगा । तब साढे ग्यारह-बारह का समय रहा होगा, जब उसे कामिनी दिखी ।

मंगलू का चेहरा खिल उठा ।

वो इधर ही आ रही थी । कल वाला सूट ही उसने पहन रखा था । आज उसने प्रेस किए कम कपडे उठा रखे थे । वो ही झुमके । वो ही सव कुछ । उसने भी मंगलू को देख लिया था । वो मुस्कराई उसे देखकर ।।

चेहरे पर मुस्कान समेटे मंगलू उठ खड़ा हुआ ।

" तुम आज भी यहां बैठे हो?" पास आते कामिनी कह उठी।

" मै तो दस बजे का यहां बैठा, तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।" मंगलू ने जैसे शिकायत की ।

" मेरा इंतजार?"

" हां, तो और क्या?"

"मैंने कब कहा था कि मैं आज मिलूगी । तुम अपने मन से ही मेरा इंतजार करने लगे हो, मेरा क्या कसूर---!"

"मेरा मन कहता था कि तुम आज भी जरूर आओगी ।"

"मन तो जो भी कहे, मैंने तेरे से कुछ नहीं कहा ।" कामिनी हंसी ।।

हंसते हुए कामिनी की खूबसूरती और भी बढ गई थी ।
 
मंगलू मंत्रमुग्ध सा उसे देखने लगा ।

"वो मैने कल भी कहा था, मुझे ऐसे मत देखा कर !"

"दिल में कुछ-कुछ होता है ।"

" हां, होगा नहीं क्या, बापू कहते हैं अब मैं बडी हो गई हूँ । मुझे यूं ही किसी से बात नहीं करनी चाहिए ।"

"मेरे से तो बात कर सकती है?"

" हां , तेरे से तो बात कर सकती हूं ।" कामिनी ने सिर को दाएं-बाएं हिलाया ।

"तू मुझे वहुत अच्छी लगती है ।"

"धत ।"

"बैठ जा, कपड़े थामे ऐसे ही खडी रहेगी क्या?" मंगलं ने कहा ।

"ओह! मैं तो मूल गई । तू यहीं बैठ मैं… अभी कपडे देकर आती हूं।" कहकर बो आगे बडी ।

" जल्दी आना ।"

"हां-हाँ, जल्दी आऊंगी ।"

मंगलू पुलिया पर बैठ गया और जाती कामिनी को देखने लगा । दस मिनट बाद कामिनी लौटी । हाथ में पैसे पकड़े हुए थे ।

"मैं आ गई ।"

"बैठ-बैठ !", मंगलू ने पुलिया पर हाथ मारा---" आज जब मैं सोकर उठा तो मुझे तेरा ख्याल आया कि शायद तू यही पर मिले मुझे ।"

"मेरे बापू को तेरा ख्याल पता चल गया तो वो मुझे घर बिठा लेगा । बाहर ही नहीं निकलने देगा !"

"तेरे बापू को कैसे पता चलेगा? हम बताएंगे ही नहीं ।"

"हा , ये बात तो तूने ठीक कही !"

मंगलू कामिनी को निहारने लगा ।

" फिर-फिर तू मुझे वैसे ही देख रहा है ।" कामिनी ने जैसे शिकायत की ।

" तू मुझे देखने से रोका मत कर।"

"क्यों?"

"तेरे को देखकर मुझे अच्छा लगता है !"

"याद आया कल जो तेरा मालिक आया था , जिसके पास तु नौकरी करना है, वो मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता ।"

“क्यों?"

"देखा नहीं था कल कि कैसे आखे फाड़-फाडकर मुझे देख रहा था । मुझे तो डर लगा उससे !"

मंगलू ने गहरी सांस लेकर कहा।

" मुझे भी वो अच्छा नहीं लगता !

"तो छोड़ दे उसकी नौकरी, क्यों उसके पास काम करता है?” कामिनी ने सलाह दी ।

"नहीं छोड़ सकता । उससे पैसा लेना है ।"

"कितना पैसा?"

बहुत-सा।"

" तो देता क्यों नहीं?”

" कल कह रहा था कि दो-चार दिन में दे देगा ।" मंगलूने कामिनी की देखकर कहा ।

"ठीक है । तू उससे पैसा लेकर, उसकी नौकरी छोड देना । वो जरा भी अच्छा नहीं है ।"

" ऐसा ही करूण, लेकिन तब तेरे से कैसें मिलूंगा?"

"इसी पुलिया पर आकर बैठ जाना । मैं तो रोज ही मंदिर मे कपडे देने जाती हूं।" कामिनी ने सरल स्वर में कहा ।

इसी तरह भोलेपन से भऱी उनकी बाते होती रहीं ।

@@@@@@@@@@@@@@

सबसे पहले सुबह मोना चौधरी की आंखें खुली थी । सुबह के सात बज रहे थे । उसने सतपाल और राजन पर निगाह डाली, जो कि गहरी नींद में थे, फिर उसने रूम सर्विस में तीन कप चाय का आर्डर किया और कमरे का दरवाजा खोला । रोज की तरह दरवाजे के बाहर आज़ का अखबार मौजूद था । अखबार लेकर मोना चौधरी ने दरवाजा बंद कर दिया ।

मोना चौधरी कुर्सी पर बैठी और अखबार खोला । अगले ही पल उसकी नज़रे अखबार पर जा टिकी । आखें सिकुड गई । अखबार में रात हुई युवती की हत्या का जोर-शोर के साथ जिक्र था । मृत युवती के चेहरे की तस्वीर जो अखवार में छपी और खबर कुछ इस प्रकार थी---

"एक लाश पिछली रात मिली और दूसरी रात को । दोनों ही लाशों के शरीर में खुन की एक बूंद नहीं थी । दोनों लाशों के गले पर किसी तीखी चीज के चुभोए जाने के निशान मिले । हत्यारा अपने शिकार के शरीर मे से खून की आखिरी बूद तक निकाल लेता है । कौन है हत्यारा और क्यों ये हत्याएँ कर रहा है? खौफ का सिलसिला कब तक चलेगा? अब तो लोग रात के अंधेरे मे धर से बाहर निकलने में भी डरने लगे है !"

इसी सिलसिले में अखबार का यह पना भरा हुआ था । पुलिस वालों का इंटरव्यू भी छाप रखा था । अखबार में तरह-तरह की अटकलों को जन्म दे रखा था ।

मोना चौधरी ने व्याकुलता से भरी सांस ली और अखबार एक तरफ रख दिया ।

वही हुआ जिसका डर था ।

भवतारा जिन्दा हो चुका था । इंसानी लहू उसका प्रिय भोजन था । इंसानी खून पीने के लिए ही वो पुन: जीवित हुआ था । अब उसने अपने काम को अंजाम देना शुरू कर दिया था । वो रात को ही बाहर निकलता था अपनी जगह से और किसी एक को शिकार बनाकर, अपने ठिकाने पर वापस चला जाता था ।

सतपाल ने ठीक कहा था कि वो जिन्दा हो गया तो कहर वरपा देगा ।

उसंने इंसानों का खून पीना शुरू कर दिया था ।

खौफनाक हकीकत थी ये ।

इसे जैसे भी हो, रोकना होगा।

और शैतान के बेटे को रोक पाना आसान न था ।

मोना चीथरी अपने ही विचारों में उलझे बेचैन होती जारही थी ।

तभी दरवाजा खटखटाकर वेटर ने भीतर प्रवेश किया और चाय-के तीन प्याले रखकर चला गया ।

वेटर के आने-जाने के बीच सतपाल की आख खुल गई ।

"बढिया किया चाय मंगवा ली ।" सतपाल उठता हुआ बोला और साथ सोए राजन को थपथपाया----" उठ जा । बहुत सो लिया ।"

राजन भी उठा।

वे तीनों वेड टी लेने लगे !

"अखबार पढ़ तो ।" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा ।

"खास खबर है क्या?" अखबार उठाता सतपाल कह उठा।

"शैतान के बेटे ने रात एक ओंर शिकार किया !" मोना चौघऱी ने गहरी सांस ली।

"क्या?" राजन चिंहुक उठा ।

"फिर तो ये बात पक्की होगई कि भवतारा जीबित ही नही हुआ, बल्कि इंसानों का खून पीना भी शुरु कर द्रिया है ।" कहने के साथ अखबार खोला और खबर पर नजरें दौडाता चला गया ।।

राजन ने भी अखबार पढा ।

वे तीनों ही अब गभीर नजर आने लगे ।
 
"अब ऐसी लाशें मिलती रहेगी ।" राजन बोला-…"भवतारा ये सिलसिला कभी खत्म न होने देगा ।!

"हमें उसे रोकना होगा !"

" कैसे रोकेंगे?" राजन ने सतपाल को देखा।

"वो खबरी.. .!" सतपाल ने कहना चाहा ।

" जाने वो खबरी कब मिलेगा हमें ।" मोना चौधरी उठि----" हम उसके भरोसे नहीं बैठे रह सकते !"

"मोना चौधरी ठीक कहती है ।" राजन ने कहा ।

"क्या पता तात्रिक मोहम्मद की वात सही भी है या नहीं !" मोना चौधरी ने पुन: कहा !

"मोहम्मद ने ठीक कहा या गलत, ये बात नहीं है । बात ये है कि हमें कुछ करना होगा ।"

सतपाल ने दोनों को देखा । वो बेचैन दिख रहा था ।

"अगर हमने कुछ नहीं किया तो शैतान का बेटा ऐसी लाशे बिछाकर शहर को हिला देगा ।" राजन ने पुन: कहा ।

"हम कर भी क्या सकते हैं?" सतपाल गंभीर स्वर में बोला ।

"शेतान के बेटे का ठिकाना तलाश करना होगा ।"

“इतने बड़े शहर में हम उसके ठिकाने को कहाँ तलाश करेगे?"

"कोशिश तो कर सकते हैं । हम तीन हैं, तीनों अलग-अलग दिशाओं में भाग-दौड़ कर सकते हैं ।" मोना चौधरी बोली ।

" माना कि हमने उसे तलाश कर लिया. ..फिर......?" सतपाल ने दोनों को देखा ।।

" तुम कहना क्या चाहते हो ?" राजन बोला ।

"क्या हम शैतान के बेटे का मुकाबला कर पाएंगे?"

"क्यों नहीं कर सकते ?" मोना ने कहा-----" हम मुकाबला कर सकते हैं । तांत्रिक मोहम्मद हमारे साथ है । उसने कहा था कि हम लोग जब भी मुसीबत में पडेगे, तो उसे अपने पास ही पाएंगे ।"

सतपाल के होंठ भिंच गए ।

"एक मिनट!" राजन ने टोका और सतपाल से कहा…"क्या हम मोहम्मद पर भरोसा कर सकते हैं?"

"हां ।" सतपाल ने गंभीरता से सिर हिलाया ।

"क्या मोहम्मद शैतान के बेटे से टकराने का हौंसला रखता है?” मोना चौधरी ने पूछा ।

" पता नहीं ।" सतपाल बेचैन हुआ ।

उसी पल कमरे का दरवाजा खुला और दरवाजे पर तांत्रिक मोहम्मद खड़ा दिखा ।

वे तीनों चिहुक पड़े ।

"आप?'" सतपाल के होंठों सै निकला ।

तात्रिक मोहम्मद भीतर आया और मोना चौधरी को देखते हुए कहं उठा ।

"मैं पूरी तरह भवतारा का मुकाबला नहीं कर सकता क्योंकि उसकी शैतानी ताकतों की पहुच वहुत है ।"

"फिर तुम हमें किस बात की तसल्ली दे रहे थे कि तुम हमारे साथ हो ।" मोना चौधरी कह उठी ।

"हम उस पर बार कर नहीं सकते तो कम-से-कम उसके बारों से अपना बचाव तो कर सकते हैं ।। बचाव का मतलब, उस पर वार करना ही है । उसके द्वारा किए गए वार खाली जाएंगे तो वो उसकी हार ही है !" तांत्रिक मोहम्मद ने शांत स्वर में कहा ।

"फिर भी इस तरह हम ज्यादा देर तक उसका मुकाबला नहीं कर सकेंगे । उसका कोई भी वार हम पर सफल हो सकता, है ।"

तात्रिक मोहम्मद गंभीर दिखा ।

"तुम्हारी इस बात को मैं स्वीकार करता । मोना चौधरी! जब दुश्मन ताकतवर हो तो उसे चालाकी से मारा जाना चाहिए ।"

"चालाकी-मैँ समझी नहीं?”

"तुम्हारी सब बातों का जवाब 'खबरी' देगा ।"

"आखिर खबरी है कौन?"

"ये तो मैं भी नहीं जानता । इस बात का रहस्य तो वक्त आने पर ही खुलेगा है"

"और वक्त कब आएगा ?"

"कभी भी आ सकता है । आज भी आ सकता है और महीने बाद भी ।। कई बातों का ज़वाब मेरे पास भी नहीं ।"

"क्या हम बाहर निकलकर शैतान के बेटे के ठिकाने की तलाश करने की चेष्टा कर सकते हैं?"

“अवश्य, परंतु ये इतना आसान नहीं होगा, उसके बारे मे कोई जानकारी पा लेना असंभव जैसा है । फिर भी कोशिश कर सकते हो ।"

"क्या हम शैतान के बेटे को, खत्म कर पाने में सफ़ल होंगे?" राजन ने पूछा ।

" तुम लोगों की बुद्धि पर निर्भर है !"

" बुद्धि ?"

" मैने पंहले ही कहा है कि दुश्मन ताकतवर हो तो चालाकी से काम लेना चाहिए ।"

"तुम एकाएक कैसे हम तक पहुच जाते हो या पास ही में कहीं हो?" सतपाल ने पूछा।

"मेरे तार तुम लोर्गो से बंधे हुए है अब । जब तुम मेरी बात करोगे या खतरे में महसूस करोगे तो मुझे खबर हो जाएगी । तब मैं आना

चाहूं तो उसी पल अपने सूक्ष्म शरीर के साथ हाजिर हो सकता हूं . . । जैसे कि अब हुआ हूं।”

“ये तुम्हारा सूक्ष्म शरीर है?” सतपाल ने अजीब-से स्वर मे कहा ।

तांत्रिक मोहम्मद के चेहरे पर रहस्य से भरी मुस्कान उभरी और लुप्त हो गई ।

वे तीनों उसे ही देख रहे थे

तात्रिक मोहम्मद पलटा और खुले दरवाजे से बाहर निकल गया ।

उसी पल मोना चौधरी तेजी से दरवाजे की तरफ़ बढी और फिर दरवाजे से बाहर झांका परंतु तांत्रिक मोहम्मद कहीं भी न दिखा ।

वो गायब से चुका था ।

" हमें…!" तभी राजन ने कहा---“शेतान के बेटे का ठिकाना तलाश करने की चेष्टा करनी चाहिए ।"

मोना चौधरी और सतपाल उसकी बात से सहमत थे, परंतु ये भी मानते थे कि ये वेहद कठिन काम है ।

@@@@@@@@@@@@@@
 
भवतारा जब तैयार हुआ तो दिन का एक बज रहा था । आईने के सामने खड़े होकर उसने बाल संवारे । नए कपडे पहने हुए थे । होंठों के बीच मीठी मुस्कान तैर रही थी । दो घंटे पहले जब नीद से उठा था तो मंगलू को वहां नहीं पाया था । वो समझ गया कि मंगलू मंदिर के बाहर वाली पुलिया पर ही होगा । पुलिया के विचार के. साथ ही उसकी आंखों सामने कामिनी का चेहरा उभरा और गहरी सांस लेकर रह गया । सच में उसकी सुंदरता काबिले-तारीफ थी ।।

भवतारा ने अलमारी के नीचे बाले खाने मे रखा छोटा सा ब्रीफकेस निकाला, जो कि पुराना था, परंतु नए के हाल में था । उसने अच्छी तरह ब्रीफकेस साफ़ किया और उसे खोला।

वो खाली था । भवतारा ने ब्रीफकेस सामने रखा । उसे बंद किया, फिर ब्रीफ्लोस पर हाथ रखे आखें बंद किए होठों-ही-होंठों में कुछ बड़बड़ाने लगा ।

ये सिलसिला करीब दो मिनट तक चला।

उसके बाद वो रुका, ब्रीफकेस पर हाथ फेरा, फिर उसे खोला । अब ब्रीफकेस में ठसाठस नोटों की गडिडया भरी थी ।

भवतारा मुस्कराया । ब्रीफकेस बंद किया और उसे साथ लिए उठ खडा हुआ ।

ठीक इसी पल वहां जंगला की आवाज गूंजी ।

"शेतान के बेटे को जंगला का नमस्कार ।"

भवतारा ठिठका और शान्त स्वर में बोला ।

"कहो जंगला !"

"मालिक-बेलीराम बहुत परेशान हो रहा है ।"

"क्यों? "

"तांत्रिक मोहम्मद उसे धमकियों दे रहा है क्योंकि मैंने उसकी शक्तियों वाला धागा तोड दिया था, आपके चाकूकी रक्षा करते हुए ।"

"हूं !"

"रात मोहम्मद ने बेलीराम को मारा मी !"

"मुझसे क्या चाहते हो?”

“बेलीराम आपसे मोहम्मद की शिकायत करना चाहता था ।। रात की बात है, आप नीद में थे तो मैंने बेलीराम से बात की । वो चाहता है कि आप स्वयं मोहम्मद से निबटे । मोहम्मद मानने वाला नहीं । वो और तंग करेगा।”

शैतान के बेटे का चेहरा बिल्कुल शांत था ।

"मुझें इस मामले में आने की क्या जरूरत है । बेलीराम को चाहिए कि बौ मोहम्मद को समझाए ।"

"मोहम्मद मानने वाला नहीं ।"

"क्या चाहता है वो?" भवतारा ने पूछा ।

"ये स्पष्ट नहीं है, परंतु वो बेलीराम को तंग करने में लगा हुआ है ।" जंगला की आवाज गूंज रही थी ।"

“बेलीराम से कहो कि वो मोहम्मद से निबट ले ।"

"मोहम्मद ज्यादा ताकत रखता है मालिक... ।"

भवतारां के माथे पर वल उभरे ।

“तो बेलीराम ताकते इकट्ठी करके मोहम्मद का मुकाबला कर सकता है ।"

"बेलीराम के बस का नहीं लगता, मोहम्मद से निबटना।"

"बेलीराम चाहता है कि ये काम मैं करूं?”

“उसकी यहीं इच्छा है !"

"क्या में लड़ाई-झगाडों के लिए जीवित हुआ हूं। क्या इन्हीं कामो के लिए मैंने इतनी मेहनत की?"

जंगला की तरफ से कोई आवाज नहीं आईं ।

"मैं अपने आराम के लिए जीवित हुआ हूं । इंसानी खून पीने की इच्छा को शांत करने के लिए जीवित हुआ हू। इंसानी जीवन का आनन्द लेने के लिए मैं पुन: अपने शरीर आया हूं । ऐसे में मैं अपना सुनहरी वक्त झगडों में क्यों खराब करूं !"

"आप ठीक कह रहे हैं मलिक !"

"इंसानी खून मेरी शक्तियों को बढाएगा । मेरा शैतान और ताकतवर होगा । बेलीराम को अच्छी तरह समझा दो कि मैं झगडों के लिए अपने शरीर में नहीं आया । मेरे अपने कुछ लक्ष्य है । उन्हें पाना है मैंने ।" भवतारा का स्वर तीखा था ।

"जी मालिक !"

" उससे कहो कि अपने तौर पर मोहम्मद से निबटे, शैतानी शक्तियों को इकटूठा कर ले । तब मोहम्मद बच नहीं पाएगा ।"

"में कह दूगा ।"

"मोहम्मद पर विजय हासिल करने के बाद, मुझें अवश्य खबर करे ।"

"जी मालिक!"

"मैं सिर्फ एक से ही झगडा करूंगा ।‘"

"किससे?"

"सतपाल से । उसने मेरे शैतानों को यहां से वापस हमारी धरती पर भेजा है । मेरे जो शैतान धरती पर आकर, इंसानी शरीरों में प्रवेश करके यहाँ का मजा लेना चाहते हैं, सतपाल उन्हें अपनी ताकतों से वापस भेज देता है । गलत करता है वो । वहुत शिकायतें मेरे पास आई हैं उसकी । उसका जीवित रहना नुकसानदेह है हमारे लिए । मेरे लिए उसकी जान लेना जरूरी है ।"

"बो तीन भाई है ।"

"तीनों ही मरेंगे । मैं अपने चंद खास काम कर लूं, फिर इन तीनों को मौत दूंगा । इनके अलावा और किसी से मैं झगडा नहीं करू'गा । मुझे इंसार्नी खून पीकर अपनी ताकतों को मजवूत करना है । इतना मजबूत कि जव यहां से वापस जाऊं तो इतना ताकतवर बन जाऊं कि पूरा शैतान वन जाऊं । अपने पिता से भी ज्यादा ताकतवर ।"

" ऐसा ही होगा मालिक!"
 
"मेरे पिता अब बूढे हो चुके हैं । शायद डरने भी लगे है । उन्होंने मुझे बहुत रोका कि मैं अभी अपने शरीर में वापस न जाऊं, ये समय उचित नहीं है । मेरे ख्याल में ये उनका डर बोल रहा था । समय तो अपने हाथ में होता है । समय को उचित या अनुचित बनाना भी अपने हाथ में होता है । मेरे पिता अब कमजोर होते जा रहे हे`। जल्द ही मुझें उनकी जगह संभालनी होगी ।"

" ऐसा ही होगा मालिक ।"

"बेलीराम को समझा दो कि मोहम्मद का मुकाबला करे। उसे खत्म कर दिया जाए । इस काम में तुम भी बेलीराम की सहायता करो । बेशक नर्क से कुछ और शैतानों को बुला लो, परंतु मोहम्मद को सबक सिखाकर रहो ।" भवतारा ने कठोर स्वर में कहा ।

"अवश्य मालिक! मैं अभी बेलीराम से इस बारे में बात करता हूं !"

भवतारा ने, कुछ न कहा और ब्रीफकेस थामे कमरे से बाहर निकल गया ।

@@@@@@@@@@@@@

" ओह मा! "कामिनी एकाएक बडबडाकर पुलिया से उठ गई-----“मैँ जाती हूं।"

"इतनी जल्दी?" मंगलू के होंठों से निकला ।

"बहुत देर हो गई और वो भी आ रहा है, तुम्हारा मालिक !"

मंगलू ने फौरन गर्दन घुमाकर देखा ।

भवतारा ब्रीफकेस थामे इसी तरफ़ बढता आ रहा था ।

" तुम जाओ ।" मंगलू बेचैनी से कह उठा-"कल मिलना-----यहीं पर ।”

“ठीक है !" कामिनी ने कहा औंर पलटकर तेजी से आगे बढती चली गई ।

भवतारा पास आ पहुचा ।

“कामिनी को क्यों भेज दिया तुमने !" भवतारा ने मुस्कास्कऱ पूछा ।

"मैंने कहां भेजा,वो तो अपने आप गई है ।" मगलू कह उठा।

भवतारा जवाब में सिर्फ मुस्कराकर रह गया।

"रात तुमने क्या किया ?” एकाएक मंगलू ने पूछा ।

" रात' "

"हां, उस लडकी के साथ गली में .......?" मंगलू का स्वर तीखा हो गया ।

"क्या किया?" भवतारा ने उसे देखा !

"तुम्हें अच्छी तरह पता होगा, क्योंकि जो किया, तुमने किया है !" मगलू की निगाह उस पर थी ।

“रात गई, बात गई ।"

"तुमने उसे मार दिया । रात तुम्हारे कपडों पर खून लगा हुआ था ।"

" अच्छा मुझे नहीं पता ।"

" कैसे मारा उसे तुमने-------क्यों मारा? मैंने पास जाकर उसकी लाश देखी थी । तुम्हे दूढ़ने गया था वहां मैं !"

"रात की बात मत करों !"

"क्यों न करूँ ? तुम्हारे कहने पर मैंने उसे भेजा, लेकिन तुमने उसकी जान ले ली ।"

भवतारा मुस्कराया ।

मगंलू गुस्से से उसे देखता रहा ।

कुछ पल ऐसे ही बीत गए ।।

मंगलू ने उसके हाथ में पकड़े ब्रीफकेस को देखा ।

"इसमें क्या है?"

"कुछ सामान है !"

"कहा जाना है है !"

" तुम यहीं रहो, मुझे अकेले ही जाना है । जल्दी वापस आऊंगा, उसके बाद एक साथ चलेगे !"

"एक साथ----- आज फिर थकाओगे मुझे।"

भवतारा पुनः मुस्कराया ।

" मेरे पैसे कब दोगे ?"

" जल्दी ही , रोज रोज पैसों की बात मत किया करो !"

" मुझे जरूरत है पैसों की !"

" अच्छा !" भवतारा होले से हंसा…" क्या करना है तुम्हें पैसौं का ?"

मंगलू होंठ भीचकर रह गया ।

" जब नाराज होते हो तो मुझे बहुत अच्छे लगते हो ।" भवतारा बोला ।।

"एक तो मेरे पैसे नही दे रहे, ऊपर से मेरा मजाक उड़ा रहेहो।"

"तू मेरा दोस्त है मंगलू .! मैँ तेरा मजाक कैसे उडा सकता हूं ? ये तो हमारे बीच प्यार-भरी बाते होरही हैं।"

मंगलू मुह फेरे रहा ।

" कामिनी क्या कह रही थी ?"

"कुछ नहीं ।"

"मेरे वारे में कोई बात तो कर रही होगी?"

"कह रही थी तुम्हारे मालिक से डर लगता है ।" मगलू ने तीखे स्वर में कहा-"तुम क्यों पूछ रहे हो?”

" यूं ही ।" भवतारा होले से हंसा--"कामिनी मुझे अच्छी लगती है । तुम्हें भी अच्छी लगती है क्या?"

" वो बंदरी मुझे क्या अच्छी लगेगी? खामखाह यहां जाकर बैठ जाती है ।" मंगलू मुंह बनाकर कह उठा ।

भवतारा विना कुछ कहे आगे बढ गया ।

मंगलू पीछे से, भवतारा को खा जाने वाली नजरों से देखता रहा ।

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