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खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज complete

भवतारा ऐसे आगे बढा जा रहा था जैसे कि उसे पता हो कि कहाँ जाना है । पुलिया से काफी आगे जाकर उसने सडक छोड्री और कच्चे रास्ते पर उतर गया ।

सामने ही कच्चे-पक्के मकानों की कालोनी नजर आ रही थी । वहां पर लोग आते-जाते और छोटे बच्चे खेलते नजर आ रहे थे ।

हल्की-सी धूप खिली हुई थी । वो कच्चा रास्ता पार करके भवतारा कालोनी की बाहरी सढ़क पर ही आगे बढ़ गया । कुछ आगे सड़क किनारे झोंपडी बनी हुई थी । पास ही दो पेडों की छांव: में, एक बूढा-सा आदमी टेबल लगाए प्रेस कर रहा था ।

भवतारा उसके पास आकर रुका । कपडे प्रेस करने वाले ने गर्म प्रेस पत्थर पर रखते हुए उन्हें देखा ।

"कहिए बाबू जी?" वो बोला-" किसका पता पूछना है?”

"नाम क्या है तुम्हारा ?" भवतारा ने मधुर स्वर में पूछा ।

" दीनू।" वो सवालिया नजरों से उसे देखने लगा ।

"कामिनी तुम्हारी बेटी है?”

"हां !" वो अचकचाया----" उससे कोई गलती हो गई बाबूजी?"

"नहीं, मैं मंदिर में रहता हूं । कामिनी वहां कपड़े देने आती है । देखा उसे कई बार ।"

दीनू भवतारा को देखता रहा ।

"मैं तुमसे ही मिलने आया हू बिठाओगे नहीं मुझे?"

"जरूर बिठाऊंगा ।"

फिर उसने झोपड़ी की तरफ मुह करके आवाज लगाई-"कामिनी , ओ कामिनी!"

"आई बापू ।" झोंपडी के भीतर से कामिनी की आवाज आई ।

"कुर्सी लेकर आ बैठने के लिए, साब आए है ।"

चंद पलों बाद कामिनी फोल्डिंग चेयर उठाए झोंपड़े से बाहर निकली । भवतारा को देखते ही वो ठिठकी । पहले चेहरे पर हैरानी आई फिर नापसंदगी के भाव आ ठहरे।

भवतारा उसे देखकर प्यार से मुस्कराया ।

" ला-ला, कुर्सी ला ।" दीनू बोला ।

कामिनी अनमने मन से पास आई और पुरानी-सी कुर्सी खोलकर रख दी !

"बैठो बाबूजी! और तू जा, साबजी के लिए चाय बना ला । मदिर से आए हैं ।"

कामिनी विना कुछ कहे वापस चली गई ।

भवतारा कुर्सी पर बैठा ।।

दीनू उसके पास ही नीचे बैठता हुआ कह उठा ।

"कहिए बाबूजी! वैसे मैं कपड़े ठीक से प्रेस करता हूं। अगर कही कमी रह गई हो तो.. !"

" ऐसी बात नहीं है ।" भवतारा ने मुस्कराकर मधुर स्वर में कहा ।

"तों?”

"मुझे तुम्हारी बेटी कामिनी वहुत अच्छी लगी ।"

"ये क्या कह रहे हैं बाबूजी?" दीनू हैरानी से कह उठा ।।

"क्यो-क्या मुझे तुम्हारी बेटी पसंद नहीं आ सकती?" भवतारा : उसी मधुर अंदाज में बोला ।

"कहां आप, कहाँ हम-----ये नहीं हो सकता ।"

" दीनू मुझ पर भरोसा रखो ।"

"नहीं बाबूजी ये नहीं हो सकता ।" दीनू हाथ सिर हिलाता कह उठा… " हम ठहरे गरीब झोंपडी वाले और...!"

" मैने तुमसे अभी तो जवाब नहीं मांगा ।"

दीनू को समझ न आ रहा था कि क्या कहे और क्या न कहे ।

"ये रख लो ।" भवतारा उसकी तरफ़ ब्रीफकेस बढाता हुआ बोला ।

"क्या है इसमें?" दीनू अजीब-से स्वर में बोला ।

भवतारा ने ब्रीफकेस खोला और उसे दिखाया ।

भीतर ठूंसी नोटों की गड्डियां देखकर दीनू की घिग्गी बंध गई ।

भवतारा ने ब्रीफकेस बंद करके दीनू के पास रखा और उठते हुए बोला ।

"मै फिर आऊंगा दीनू! मेरी बात मानोगे तो कामिनी राज करेगी, राज़ ।" भवतारा ने मधुर स्वर में कहा और बापस चल पडा ।

दीनू फटी-फटी आखों से पास रखे ब्रीफकेस को देखे जा रहा था ।

@@@@@@@@@@@@@

दीनू घबराया-हड़बड़ाया सा ब्रीफकेस थामे झोंपड़े में प्रविष्ट हुआ ।

"कामिनी की मा---" ओ बसन्ती!"

"चिल्ला क्यों रहा है बूढे, दिखता नहीं, तेरे सामने बैठी हूं।"

पचपन बरस की औरत पीली साड्री पहने प्याज काट रही थी । पास ही कामिनी अपनी किताब खोले पन्ने पलट रही थी कि अपने बापु के हाथ में ब्रीफकेस देखकर उसकी आखें सिकुडी ।

"ये हाथ में छोटा बैग क्या थाम रखा है बापू?" कामिनी कह उठी ।

“ये....ये हमारा भाग्य है ।" दीनू खुशी से कहता पास ही बैठ गया ।

"भाग्य?"

“बूढा पागल हो गया लगता है ।" बसन्ती ने मुह बनाकर कहा ।

"हां, मैं पागल हो गया हूं , तुम भी पूरी बात सुनकर पागल हो जाओगी !"

" ऐसा क्या?"

"हाँ ।"

"तो बता-क्या बात है?" बसन्ती ने पूछा ।

" 'बापू! ये बैग तो मैंने उस आदमी के हाथों

में देखा था ।" कामिनी बोली ।

"तू थोडी देर चुप रहेगी ।" दीनू ने कामिनी को झिड़का ।

कामिनी खामोश हो गई ।

दोनों ही दीनू को देख रही थी ।

दीनू ने कांपते हाथों से ब्रीफकेस खोला ।

" ये देख कितने सारे नोट ।

बसन्ती की आखें फैल गई, ब्रीफकेस में पडी नोटों की गड्डिर्यो को देखते ही ।

" हे राम! " बसन्ती के होंठो से निकला ।

बसन्ती के चेहरे पर अजीब-से भाव आ ठहरे थे ।

"एकदम असली है । दीनू खुशी से बोला।

"क्यों बूढे--कहीं चोरी की तूने ?" बसन्ती एकाएक कह उठी ।

"शुभ बोल, शुभ! ! मैं क्या तेरे को चोर दिखता हूं । किसी की कमीज की जेब से प्रेस करते वक्त दस रुपए भी मिलते हैं तो उसे वापस कर देता हू , जबकि तू ही कहती है कि रख लिया करो , लेकिन मै बापस ......!"

"अपनी बडाई मत कर बूढे! काम की बात बता, पैसे कहा से लिए?" बसन्ती प्याज काटना भूल गई थी ।

"साहब आया था अभी, वो दे गया । तूने उसे चाय भी नहीं पिलाई ।"

"क्यों दे गया वो ?"

" उसे कमिनी पसंद आगई है !"

"पसंद आ गई है?" बसंती के होठो से निकला ।

ज़बकि कामिनी चौक पड्री थी।
 
"हां, वो कामिनी से शादी करना चाहता है ।"

'बूढा है वो?"

"नहीँ, एकदम कडक नौजवान सजीला है । कामिनी ने तो देखा भी है उसे, क्यों कामिनी?"

कामिनी हक्की-बक्की थी ।

"जवान है तो इतना पैसा काए को दिया?"

" बहुत पैसा होगा उसने पास तभी दिया । बड़ा अमीर लगता वो ।"

"रहता कहां है?"

"कह रहा था मंदिर में रहता है ।कुछ दिन के लिए मंदिर में रहने आया होगा । हमारे तो भाग्य खुल गए ।"

बसन्ती चमक-भरी नजरों से ब्रीफकेस में पड्री नोटों की गड्डियों को देख रही थी ।

"कितने पैसे हैं ?" पूछा बसन्ती ने।

"मुझे गिनने कहाँ आवे । कामिनी पढी-लिखी है, ये ही गिनती..... !"

"मुझे नहीं करनी उससे शादी !" कामिनी एकाएक कह उठी ।

""क्यों?" बसन्ती ने उसी पल तुनकर पूछा।

" मुझे बो अच्छा नहीं लगता ।"

"दिमाग तो खराब नहीं हो गया तेरा । बूढा ठीक कहता है कि हमारा भाग्य खुल गया है । तू भी क्या प्रेस करने वाले से या ठेला खींचने बाले से व्याह करेगी सारी जिन्दगी उसके साथ खराब कर देगी । तेरी शादी उसी से होगी ।"

"मैँ नहीं करूंगी उससे, वो मुझे अच्छा नहीं लगता ।"

"वो पैसे वाला है । देखे तो कितना दे गया है, अभी तो वो ओऱ देगा । तुझे रानी बनाकर रखेगा !"

"बोला तो .......।" कामिनी ने उठते हुए पांव पटके-----" मै उससे शादी नहीं करूंगी ।"

"तू क्या तेरी तो मां भी करेगी ।" दीनू उखड़कर बोला ।

"तो मां उससे शादी कर ले । मुझे नहीं करनी ।" कामिनी ने पाव पटकते हुए कहा और झोंपड़े से बाहर निकल गई ।

" देखा बूढे! कैसे नखरे दिखा रही है, अब तो टिड्डिर्यो को मी पर लग गए हैं, उडी जा रही है।”

"सब्र रख-सब्र रख !"

"क्या सब्र रखूं । पहली बार तो नोट देखे हैं और तू कहता है कि सब्र रख । कभी खाने देगा भी या नहीं!"

" पेट-भर के खाइयों, रिशतेदारों को भी खिलाइयो, लेकिन सब्र रख । छोरी उखड्री जा रही है, मना तो लेने दे उसे !"

"तू फिक्र मत कर बूढे मैं उसे सीधे रास्ते पर ले आऊंगी !"

“प्यार से, डंडा दिखा के नहीं, छोरी जवान हो रही है, भाग गई तो मुह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे ।"

"दुनिया की छोकरियों भागती हैं, वो क्या मर जाते हैं । कामिनी को मैं समझा दूंगी ।" बसन्ती ने बांह नचा के कहा…"तू जाके कपडे प्रेस कर, ग्राहकों को टेम पे देने हैं ।"

"कामिनी से कहना, नोट गिनकर तो बताइए कि कितने हैं ?"

"तू बाहर जाकर नोटों का ढोल न पीटता फिरियो। कहीं सुबह तक हमारी गर्दनें क्टी पडी हों और काम खत्म हो जाए ।"

"मेरे को क्या बच्चा समझती...!"

"जा बूढे जा, मेरा भेजा मत चाट । जरा नोटों पर हाथ फेर के तो देख लूं।"

"कभी मेरे पे भी हांथ फेर लिया कर.. .मैं...!"

"बेरी के सड़े पेड़, तेरे बदन पर कांटों के अलावा और क्या है जो हाथ फेरू । सठिया गया है तू !"

दीनु ने बाहर निकल जाने में ही भलाई समझी ।

@@@@@@@@@@@@@

भवतारा और मंगलू कल की तरह आज भी सड़को पर घूमते रहे । अब शाम हो रहीं थी । सूर्य पश्चिम की तरफ सरकता जा रहा था । लाली बढती जा रही थी । आखिरकार मंगलू कह उठा ।

" तुमने आज फिर थका दिया ।"

भवतारा ने कुछ नहीं कहा ।

"इस तरह घूमने से तुम्हें क्या मिलता है !"

" मुझे अच्छा लगता है घूमना ।"

" तो मुझे अपने साथ क्यों रखते हो?" मंगलू झल्लाया ।

" तुम दोस्त हो, मेरे साथ नहीं रहोगे तो किधर रहोगे ।" भवतारा मुस्कराकर बोला ।।

"दोस्त…!"

"क्यों, मेरे दोस्त नहीं हो क्या?"

“तुम मुझें दौलत तो देते नहीं, जो देने का वादा किया था, फिर दोस्त क्या हो तुम ?"

" पैसा, मेरी नजरों में तुम्हें पैसे की जरूरत नहीं है ।"

" कयों नहीं है?"

"तुमने करना ही क्या हैं पैसे का । पैसा आ जाने से इंसान अपने मकसद से भटक जाता है । क्या तुम भी भटकना चाहते हो?"

"अजीब बाते कर रहे हो तुम, मेरा मकसद ही क्या है,.जो मै भटक जाऊंगा?"

"तुम्हारा मकसद मेरी सेवा करना है । एक दोस्त की तरह मेरा ख्याल रखना है । पैसा मिलते ही तुम भटक जाओगे ।"

“समझा, तुम ये सोचते हो कि तुमने मुझे पैसा दिया तो मैं तुम्हें छोड़कर चला जाऊंगा?"

"हां ।"

"मैं ऐसा नहीं करूंगा । मैं तुम्हारे पास ही, तुम्हारी सेवा में रहूंगा !"

"पकाका ?"

"हां, पक्का वादा ।"

"ठीक है ।"

"तो लाओ मुझे पैसा दो ।"

"तुम्हारे लिए तो पैसा बेकार की चीज है ।"

"क्यों?"

"क्योंकि तुमने हर पल मेरी सेवा में रहना है। पैसे का तो इस्तेमाल करना ही नहीं है तुमने फिर तुम्हें पैसे की चाह क्यों ?"

" पैसे पास में होगा तो नीद अच्छी आती है ।" उसने कड़वे स्वर कहा ।।

"मैं जानता हु, नींद तुम्हें वैसे भी अच्छी आती है !"

“मैं सब समझता हूं, तुम मुझे पैसा देना नहीं चाहते ।"
 
" नाराज क्यों होता है मंगलू! कुछ दिन ठहर, मेरा पैसा आने वाला हैं, जरूर दूंगा तुम्हें ।"

मंगलू नाराज-सा दूसरी तरफ, देखता रहा ।

“में तुम्हें इतना पैसे दूगा, तुम संभाल नहीं सकोगे ।"

"कब दोगे?"

" जल्दी ही, मेरे कुछ काम हैं, वो पूरे हो लेने दो ।"

" मुझे बताओं क्या काम है?"

"बताने की जरूरत नहीं । वो मैंने ही पूरे करने है, ।" भवतारा ने कहा । दोनों फुटपाथ पर आगे बढे जा रहे थे । सड़क पर वाहन आ जा

रहे थे ।

"मैं तुम्हें अभी तक ठीक से समझ नहीं पाया ।"

"मुझे क्या समझना है, मैं तो तुम्हारा दोस्त हूं।"

मंगलु ने गहरी सांस ली और दूसरी तरफ देखने लगा ।

कुछ देर बाद भवतारा ने कहा ।

वो जगह कितनी दूर है, जहाँ कल शाम वो लडकी हमें मिली थी।

"थोडी ही दूर है------क्यों ?"

“चलो, वहीं चलते है ।"

"नहीं ।"

"क्यों?"

"आज फिर कोई लड़की मिल गई तो तुम फिर उसे मार दोगे, क्योंकि उसे देने को तुम्हारे पास पैसा तो है नहीं । काम हो जाने के बाद वो तुमसे पैसे मांगेगी, झगडा करेगी और तुम्हें गुस्सा आ जाएगा ।"

"आज नहीं मारूगा ।।"

" मुझे तुम विश्वास नहीं ।"

" हम दोस्त है ,तुम्हें मुझ पर भरोसा करना चाहिए !"

" जब तक तुम मुझे पैसा नहीं दोगे, मुझे तुम पर भरोसा नहीं होगा । तुम अपना वादा पूरा करों !"

" अब, इसी वक्त तो वादा पूरा कर नहीं कर सर्कता । दो-चार दिन रुको, तुम्हें पैसा मिल ज़ाएगा !"

“ये बात तो तुम कब से कह रहे हो?"

"तुम्हारी शिकायत जल्दी ही दूरकर दूंगा !"

मंगलू चुप रहा !

"चलो, आज फिर कल वाली जगह पर चलते हैं !"

"कल तो तुमने उस लड़की के साथ किया था, आज फिर क्या जरूरत पड़ गई ?"

"मन कर रहा है 1"

"ये अच्छी बात नहीं है !"

“चलों भी मंगलू! तुम बहस वहुत करते हो !"

" जब मेरे पैसे दे दोगे तो तब बहसं नहीं करूगा !"

“दे दूंगा । मैं दोस्तों से दगा नहीं करता, ,परंतु जब तुम अड जाते हो तो अच्छा नहीं लगता !"

"आओं सड़क पार करै । कल वाली जगह पर जाने के लिए हमें उस तरफ चलना होगा !" मंगलू ने कहा !!

दोनों ने रास्ता बदला और उस तरफ बढ़ गए ।

सूर्य पश्चिम में छिप चुका था !! अब लाली ही बहा बची थी ।

"तुमने बताया नहीं कि आज कामिनी से तुम्हारी क्या वात हुई ?" भवतारा कह उठा ।

"मुझसे कामिनी की बात मत करो !"

"क्यों ?"

"बो मुझे अच्छी नहीं लगती !”

" उसमें बुराई क्या है, मुझे तो काफी अच्छी लगती है !"

"तुम्हें लगती होगी, मुझे नहीं अच्छी लगती !" मंगलू ने, मुंह बनाकर कहा !

भवतारा मुस्कराकर रह गया । कहा कुछ नहीं ।

@@@@@@@@@@@@@

अंधेरा धिर चुका था।

कुछ पहले ही उजाला छुई-मुई-सा अंधेरे की गोदने जा सिमटा था । आकाश में तारे चमकते नजर आने लगे थे । मद्धिम सी ठंडी हवा चलने लगी थी ।

भवतारा और मंगलू कल वाली जगह पर ही खडे थे । भवतारा के शरीर में कई बार ऐठन उठ चुकी थी । इस दौरान चेहरे का स्वरूप बदला, किसी दरिंदे जैसा लगने लगा था बो, परंतु शीघ्र ही उसने अपने आप पर काबू पा लिया था ।

मंगलू अंधेरे में उसके बदले रूप को नहीं देख पाया था । उसका ध्यान दूसरी तरफ था ।

"क्या पता आज कल की तरह कोई लड़की न मिले ।" मंगलू कह उठा ।

"क्या पता मिल जाए ।" भवतारा के शरीर में रह-रहकर ऐठन के भाव उठ रहे थे।

मगंलू की नज़रे आस-पास को उठ रही थीं ।

यही वक्त था कि स्कूटी पर कल वाली युवती वहाँ से निकली । उन्हें देखा । मंगलू को उसने पहचान लिया था । घूमकर पुन: वापस आई और उसके पास स्कूटी रोककर बोली ।

"क्यों हीरों आज तो नोट लाया होगा, चलना है क्या ?"

भवतारा मंगलू के कानों में बोला ।

"ये ठीक है ।"

“तुम गली में चलो , मैं इससे बात करके उस तरफ़ भेजता हूं।" मंगलू ने कहा ।

भवतारा वहां से हटा और कुछ दूर नजर आ रही, कल वाली गली की तरफ चल पड़ा ।।

"उसे कहां खिसका दिया , वो भी चल जाता ।"

मंगलू उसके पास पहुँचा !

"मैं आज उसे खास तौर से तुम्हारे लिए यहाँ लायां हूँ ।" मंगलू ने कहा ।

"मेरे लिए?"

"हां । कल मैंने तेरे को देखा तो तू मुझे अच्छी लगी । वो मेरा मालिक है । उसे ले आया ।“

"तो वो चला किधर गया?" लडकी ने दूर भवतारा को जाते देखा ।

"शर्म आती है उसे मेरे से । मैंनै उसे गली में भेज दिया, तू स्कूटी यही खडी कर और उसके पीछे जा ?"

" नोट कौन देगा ?"

" वो ही देगा । वहुत पैसे वाला है, बात तय करके नोट उससे पहले है ही ले लेना ।"

"समझी, परंतु गती में कोई आ जाएगा । मेरे पास जगह है, मैं उसे वहीं ले जाती हूं !"

"आज तो गली मे निबटा ले, आगे की बात पक्की करके उसे अपने ठिकाने का पता दे देना ।"

"ठीक है । ऐसे ही सही !" वो स्कूटी से उतरी और उसे सड़क किनारे खड़ा किया----"तू यहीं है ना ।"

"हां ।"

"स्कूटी का ध्यान रखना । कोई उठाकर न ले जाए इसे ।"

“फिक्र मत कर ।"

"नाम क्या है उसका?"

"भवतारा ।। "

"बहुत अजीब नाम है ।" कहने के साथ ही युवती उस तरफ बढ गई, जिधर भवतारा गया था ।

मंगलू अपनी जगह खडा युवती को जाते देखता रहा ।

जब वो कुछ आगे चली गई तो मंगलू दबे पाव उसके पीछे चल पड़ा । आज वो देख लेना चाहता था कि लड़की के पैसे मांगने पर भवतारा क्या करेगा । उसे डर था कि कही आज भी वो युवती का खून न कर दे ।

@@@@@@@@@@@@@
 
लडकी ने गली में कदम रखा। सिर्फ एक लैम्प पोस्ट जल रहा था, जिसकी रोशनी अपर्याप्त थी । अधिकतर गली अंधेरे में थी । युवती कछ आगे सर्व, परंतु भवतारा उसे न दिखा । वो ठिठकी ।

"कहां हो तुम?" युवती ने पुकारा।

कोई जवाब नहीं ।

"शरमाकर छिप क्यों गए, सामने आ जाओ ।" युवती होले-होले आगे बढने लगी ।

उसके आगे वढ़ने की आहट कमी-कभार गूंज जाती थी ।

वो लगभगं आधी गली तक आ पहुची थी ।

"अगर अब तुम सामने न आए तो मैं चली....... !" युवती अपने शब्द पूरे न कर सकी । पास ही के अंधेरे से कोई दरिंदा युवती पर झपटा और उसे अंधेरे में खींचकर ले गया।

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दुर गली के किनारे से झाकते मंगलू ने ये सब देखा ।

"साला" मंगलू बड़बड़ाया-----"नोर्टों की बात किए बिना ही लड़की को पकड लिया । काम के बाद झगडा होगा । वो नोट मांगेगी और वो देगा नहीं ।" मंगलू गली के भीतर नजरे ट्रिकाए खड़ा रहा। देखता रहा ।

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"छोड भी ये क्या कर रंहा है?" युवती का स्वर गूंजा ।

"थोड़ा और ।"

"नहीं, मैं थक गई हूं । पीछे हट, कपड़े पहनने दे मुझे।"

ये बातें हो रही थी गली में । अंधेरे में दीवार के साथ खडी कार के भीतर । कार की पीछे वाली सीट पर 18 बरस की कमसिन युवती और बीस बरस का लड़का मौजूद था । घुप्प अंधेरा था कार में ।

लडकी के पक्के इनकार के बाद युवक ने जिद नहीं की । दोनों कपड़े पहनने लगे ।

"मजा आया?” लडके ने पेछा ।

मुझे मम्मी की चिंता हो रही बहुत देर हो गई घर से निकले ।" युवती की आवाज सुनाई दी ।

" पढने निकली हो तो देर हो ही जाती है ।”

"मम्मी ने उस सहेली के यहाँ फोन कर लिया, जिसका नाम लेकर निकली हूँ तो क्या होगा?"

" तुम तो खामखाह घबराती हो ।"

"सुबह मुझे फोन करना ।"

"क्यों ?"

"मम्मी दो दिन के लिए मौसी के घर जा रही हैं । दिन में मैं घर में अकेली रहूंगी ।"

" वाह! ये हुई बात !"

"छोडी भी, तुम्हें तो इन कामों के अलावा कुछ आता ही नहीं ।” उसकी हंसने की आवाज़ सुनाई र्दी।।

"उम्र ही ऐसी है ।"

"चलो अब आगे वाली सीट पर चलते हैं । जल्दी से निकलो यहा से, मुझें धर पहुंचना है ।"

" दिल नहीं करता कि तुम जाओ !"

" ऐसा है तो मेरे से शादी क्यों नहीं कर लेते ?" युवती बोली ।

"दो बडी बहने हैं घर में, उनकी शादी से पहले मेरी शादी तो हो ही नहीँ सकती । चलो अब चले !"

दोनों पीछे बाती सीट से आगे वाली सीटों पर आए ।

युवक ने कार स्टार्ट की ।

हैडलाइट आँन की ।

उसी पल पूरी गली प्रकाश से जगमगा उठी ।

अगले ही क्षण युवक और युवती जड़ रह गए । नजारा ही ऐसा था ।।

उनकी कार से पंद्रह फीट आगे वो दरिन्दा युवती को अपनी टांगों में भीचे नीचे बैठा था । उसके मुंह से निकले दात युवती के गले में धंसे थे । सिर के बोल खडे थे । चेहरा ऐसा भयानक कि ऐसे … चेहरे को देखने की किसी ने कल्पना भी न की होगी ।

उगलिर्यो के नाखून इंच-इंच भर बढे हुए थे । आखे लाल सुर्ख ।।

रोशनी होने पर भी वो दरिन्दा अपने काम में व्यस्त रहा, परंतु उसकी आखें टेढी होकर कार पंर जा टिकी थी । होठ-मुह पर खुन लगा रोशनी में चमक रहा था ।

उसी क्षण युवती के होठो से खौफ भरी चीख निकली ।

दरिन्दे ने युवती के गले से दांत हटाए और कार को देखकर गुर्राया ।

अगले ही पल गश खा चुके युवक ने किसी तरह कार दौडा दी ।

देखते-ही-देखते कार गली से बाहर निकलती चली गई ओंर गली पुन अंधेरे में डूब गई ।

@@@@@@@@@@@@@

इतना ही वक्त काफी था मंगलू कै लिए ।

मंगलू ने रोशनी में जो देखा, उसे देखकर वो सन्न रह गया था । जिस्म में रह-रहकर सिहरन दौड़ऩे लगती । आखों पर विश्वास न आ रहा था, परंतु कार की हैडलाइट की रोशनी में उसने जो देखा था, उसे झुठला भी न सकता था ।

वो दरिन्दा, उस युवती का खून पी रहा था ।।

राक्षस जैसा-दो दात बाहर को निकले हुए

युवती को उसने स्पष्ट तौर पर पहचाना था ।

वो ही स्कूटी वाली युवती थी, जिसे उसने गली में भेजा था, भवतारा के पास; क्या वो दरिन्दा ही अवतारा है?

नहीँ नहीं, ऐसा नहीं हो सकता ।

भवतारा दरिन्दा थोडे न है! वो इस तरह खून क्यों पीएगो?

वो कोई और है !

भवतारा किधर गया !

सकते की-सी हालत में खड़ा मंगलू गली में ही, उसी जगह पर देखता रहा ।।

पाच मिनट और बीत गए।

फिर उसने दरिंदे को, उठते देखा । कुछ क्षणों वाद उसे गली के दूसरी तरफ़ जाते देखा । वो झूम -सा रहा था जैसे बहुत शराब पी ली हो । आकृति उसे भवतारा की ही लगी वो ।

एकाएक मंगलू गली में प्रवेश कर गया और दवे पांव आगे बढा ।

वो अंत तक अपनी तसल्ली कर लेना चाहता था । मन में कोई वजह न छोड़ना चाहता था कि जो कुछ उसने देखा, उसके बीच शायद जैसा शब्द आ लगे । मंगलू दूर रहकर उसका पीछा कर रहा था ।

जव गली के लैम्प पोस्ट के नीचे से निकला तो उसने स्पष्ट पहचाना कि वो कपडे भवतारा के ही हैं । चलने का ढंग भी भवतारा जैसा ही है, परंतु चेहरा जो उसने देखा था, कार की हेडलाइट की रोशनी में?

मंगलू के दिलो-दिमाग में खलबली मची हुई थी।

दिल धाड़-धाड बज रहा था ।

सब कुछ देख समझकर भी उस पर विश्वास न करना चाहता था ।

वो गली से बाहर निकलकर मुडा तो मंगलू ने दौड़कर गली पार की और किनारे पर रुककर थोडा सिर आगे करते हुए झांका । वो आगे जा रहा था । एकबार भी उसने पीछे मुड़कर न देखा था ।

मंगलू सावधानी से उसके पीछे लगा रहा।।

करीब पंद्रह मिनट बाद वो सडक किनारे बहती हुई टूटी के सामने रुका और पानी के छींटे अपने चेहरे पर मारने लगा । पास ही दुकान थी ।

जहाँ से आती रोशनी वहाँ पड़ रही थी और उसने रोशनी में स्पष्ट पहचाना कि के भवतारा ही है ।

मंगलू का मस्तिष्क सांय-ब करने लगा ।

@@@@@@@@@@@@@
 
मंगलू को चक्कर-से आ रहे थे।

सब कुछ देख-समझकर भी उस पर विश्वास करने को मन नहीं कर रहा था, परंतु सत्य को झुठलाए भी तो कैसे?

मंगलू तब तक अंधेरे में दुबका रहा, जब तक भवतारा ह्यथ-मुंह धोकर आगे न बढ गया ।

वो उसे तब तक देखता रहा, जब तक कि वो नजरों से ओझल न होगया।

मंगलू ने गहरी सांस ली और वापस चल पड़ा । जाने क्यों अपनी टांगों में हल्का हल्का सा कम्पन महसूस कर रहा था । उसे ऐसा लग रंहा था जैसे पांव ठीक से जमीन पर न पड़ रहे हों ।

भवतारा उसकी आंखों के सामने उस युवती के गले पर दांत टिकाए उसका खून पी रहा था । उसके दो दांत भी उसने बाहर निकले देखे थे । उसके मुंह पर खून लगा देखा था । युवती की गर्दन एक तरफ लुढ़की पड़ी थी और उसकी आखें खुली थी । शायद बो मर चुकी थी या-या जिन्दा थी ?

कल भी अवतारा ने उस युवती के साथ ऐसा ही कुछ किया होगा, तभी उसकी जान गई ।

उसी पल उसे याद आया कि बीती दोनों सुबह उसने भवतारा की कमीज पर खून लगा देखा था । तो क्या पिछली दोनों राते उसने इसी तरह किसी का खून पिया था ।

सच को स्वीकार करने में मंगलू को कठिनाई आ रही थी ।

शैतान का बेटा?

सच में भवतारा शैतान था ।

थके-से अंदाज में मंगलू ने उसी गली में प्रवेश किया और आगे बढ़ने लगा । वो एक बार युवती की लाश देख लेना चाहता था । जाने क्यों बो पूरी तरह अपनी तसल्ली कर लेना चाहता था।

गली में सामने से उसे दो व्यक्ति भी आते दिखे । युवती की लाश अंधेरे में पडी होने की वजह से वो दोनों नहीं देख सके और आगे निकलते चले गए ।

मंगलू लाश के पास पहुचा और सिर घुमाकर उन दोनों आदमियों को देखा । वो गली से बाहर निकल चुके थे ! मंगलू ने अंधेरे में पडी युवती की टांग खींचकर उसे रोशेनी मे किया ।

युवती की आंखें फटी हुई थी ।

चेहरा सफेद, पीला-सा लग रहा था ।

गले पर उसने दो निशान देखे, जहाँ दांत धसें थे । वो मरी पडी थी । मंगलू के चेहरे पर दुख के भाव उभरे और वो गली मे आगे बढ गया । उसे डर था कि कहीं कोई आ न जाए ।

अब उसके सामने ये बात स्पष्ट थी कि भवतारा सव में शैतान था ।

वो इंसानों का खून पीता था और शायद यहीं उसका भोजन था। बीती रात भी इसी गली में उसने युवती का खून पीया था ओंर आज भी । उससे पहले की रात वो अकेला गया था, तब भी वो किसी का खून पीकर आया था, क्योंकि उसकी कमीज पर खून लगा हुआ था ।

स्पष्ट बात तो ये थी कि भवतारा की हकीकत जानने के पश्चात मंगलू खौफ से भर उठा था। उसका मन नहीं कर रहा था वापस जाने को, लेकिन लालच अभी भी मन में सवार था ।

भवतारा से पैसा लेने का लालचा ये बात तो मंगलू-कै मन में एक बार भी नहीं आई कि भवतारा उसका खून भी पी सकता है । अगर ये सोचा होता उसने तो लालच भाग जाता और वो किसी भी कीमत पर बापस न जाता ।

@@@@@@@@@@@@@

मंगलू वापस पहुचा ।

मंदिर का गेट बंद था । आज भी वो कल की तरह दीवार फलांगकर अंदर पहुंचा और दीवार सरकाकर गोल कमरे में प्रवेश कर गया ।

सब कुछ बैसा ही था, जैसा वो छोडकर गया था ।

नजरे उठाकर उसने ऊपर वाले दोनों कमरों की तरफ देखा ।

वहां खामोशी छाई हुई थी । कहीं से कोई आवाज नहीं आ रहीँ थी ।

न चाहते हुए भी उसके कदमं सढियों की तरफ बढ गए । आज सीढियां चढते उसका दिल जोरो से धड़क रहा था । मस्तिष्क में भवतारा का खौफ प्रवेश कर चुका था ।

ऊपर पहुंचकर उसने भवतारा के कमरे में झांका ।

वो गहरी नीद में डूबा हुआ था । उसके होंठों से खरटि गूंज को रहे थे ।

. . . . उसकी कमीज पर आज भी खून लगा हुआ था ।

मंगलू की टांगे कांपी और वो पीछे हट गया । गहरी-गहरी सांसे लेने लगा । आंखों के सामने रह-रहकर वो ही भवतारा का दरिंदों वाला चेहरा नाच रहा था और इस वक्त सोया हुआ वो कितना मासूम . . लग रहा था ।।

कहां फंस गया वो ??

परंतु भवतारा से मिलने वाली दोलत का लालच उसे वहीं रुकने पर मजबूर कररहा था ।।।।

@@@@@@@@@@@@@

अगले दिन सुबह मंगलू उठा और नहा-धोकर कल की तरह पुलिया पर जा बैठा । आज वो गंभीर था । रात की घटना वो भूल नहीं पा रहा था । इसी बारे में सोच-सोचकर वो बेचैन हो रहा था ।

ज्यादा देर न बीती होगी कि उसे कामिनी आती दिखी ।

मंगलू की निगाह उस पर टिक गई, परंतु उसके चेहरे पर खुशी न झलकी जो रोज झलकती थी ।।

कामिनी के हाथों में आज कपडे न थे, बल्कि गोल किया हुआ अखबार था । वो भी ज्यादा खुश न नजर आ रही थी । चुप-चुप ही थी वो , पास आते ही वो कह उठी ।।

" आज हम यहां नही बैठेंगे ।"

" क्यों ?"

"तुम्हारा मालिक आ जाएगा । मुझे बो अच्छा नही लगता!" कामिनी ने मंदिर के गेट पर नजर डाली ।

मंगलू उठ खडा हुआ ।

" चौधरी के बाग की तरफ चलते है ।" कामिनी बोली ।

"ठीक है ।!

दोनों सडक का रास्ता छोड़कर कच्चे रास्ते की तरफ बढ गए ।

दोनों ही चुप थे । कोई बात न कर पा रहे थे ।

"तेरे हाथ में क्या है?" मंगलू बोला ।

"ओह । हां, अखबार है आज की खबर पढी तूने, कोई शहर में इंसानों का खून पी रहा है ।" कामिनी बोली ।

"इंसानों का खुन ?" मंगलू के होंठों से निकला ।

"हां । ये देख अखबार ।" चलते-चलते कामिनी ने अखबार खोलकर उसे दिखाया----.." पूरा इसी बारे में लिखा है । बीच के पन्नो पर भी कई जगह ये खबर है । मैंने सब पढा है, तेरे को पढाने लाई हूं ।"

" तू ही बता दे, क्या लिखा है?" मंगलू ने गंभीरता से कहा ।

" तीन रार्तों से पुलिस को हर रात ऐसी लाश मिल रही है, जिसमे खून नहीं होता । अखबार वाले कहते हैं कि कोई उनका खून पी लेता है, इसी कारण मौत हो जाती है, अखबार वालों ने तो खून पीने वाले को नर-पिशाच और ड्राकुला का नाम भी दे दिया है । शहर के लोग घबराए हुए हैं, अब तो रातों को भी बाहर निकलना बंद कर रहे है !"

"अच्छा !"

" हां, पहली बार नर-पिशाच ने एक आदमी का खून पिया, उसके बाद अगली दो राते उसका शिकार दो युवतियां वनी ।"

मंगलू ने होंठ भीच लिए।

"तेरे को क्या लगता है कि वो कौन होगा मगंलू ?"

मंगलू का दिल किया भवतारा के बारे में बता दे कि वै ही शेतान का बेटा है । वो ही ये सब कर रहा है, परंतु अपनी बात दिल मे ही दबाकर रह गया ।

वो कामिनी को डराना नहीं चाहता था और इससे बात खुल जाने का भी खतरा था । भवतारा को पता चला कि बात उसने खोली है तो कहीं उसे भी न मार दे ।।

" पता नहीं वो कौन होगा, जो ऐसा कर रहा है । पहले तो मैं रात को कहीं झोपडी से बाहर भी आ जाती थी, लेकिन अब नहीं निकलूंगी मुझे तो डर लगता है कि के कहीं मेरा खून पी गया तो?"

मंगलू जबरन मुस्कराया ।
 
"वो यहाँ पास में थोडे न रहता है जो तेरा खून पीएगा" । मगलू के होंठों पर जबरन वाली मुस्कान छाई थी ।

"क्या फ्ता बो किधर रहता है । मैं तो अखबार पढ़ते ही डर गई ।" कामिनी ने गहरी सांस लेकर उसे देखा ।

चलते-चलते मगंलू ने उसका हाथ थाम लिया !

कामिनी ने शरमाकर मंगलू को देखा, पंरतु कहा कुछ नहीं । न ही हाथ छुड़ाया ।

वो दोनों सुनसान जैसे रास्ते पर चलते रहे ।

"मंगलू! तेरा मालिक बहुत गंदा है । तू उसके पास काम न कर ।" एकाएक कामिनी गभीर-सी कह उठी ।

“क्यों?" भवत्तारा का जिक्र आते ही मंगलू संभला ।

"कल वो झोपड़े पर आया था, बापू से मिला और.........!"

"तुम्हारे झोंपड़े पर आया था ।" मंगलु अचकचाकर ठिठकं गया-" ये क्या कह रही है कामिनी?"

" 'ठीक कह रही हूं ।" कामिनी ने परेशान स्वर में कहा…“उसके इरादे ठीक नहीं हैं ।"

"मैं समझा नहीं ।"

" कल वो ब्रीफकेस में नोट भरकर लाया और बापू को नोट देकर बोला कि वो मेरै से शादी करना' चाहता है ।"

मंगलू हक्का-बक्का-सा कामिनी को देखने लगा ।

"मंगलू । "

"वो ब्रीफकेस में नोट भरकर लाया । तेरे बापू को दे गया सारे नोट?"

"हां ।"

"क कब?"

" जब मैं तेरे पास से, पुलिया से गई थी । तभी आ गया था वो !" कामिनी बोली ।

मंगलू को ध्यान आया कि कल भवतारा ने ब्रीफकेस पकडा हुआ था, जब वो पुलिया के पास आया था और उसे ये कहकर कि अभी आता है, आगे चला गया था । तो तब वो कामिनी के बाप से मिलने गया था ।

ब्रीफ़केस में नोट भी पड़े थे और उसे कहता है कि पैसा कहीं से आएगा तो उसे देगा ।

कांमेनी से शादी करना चाहतां है भवतारा?

मगलू को जैसे पावों तले से जमीन निकलती महसूस होने लगी ।

"तू चुप क्यों है मंगलू?"

मगलू ने खुद को संभाला । कामिनी को देखा । कामिनी उसे ही देख रही थी ।

"क्या हुआ ?" कामिनी ने पूछा ।।

"त.. तू उससे शादी कर लेगी कामिनी?" मंगलू ने हड़बड़ाए स्वर में पूछा ।

"कभी नहीं ।" कामिनी दृढ़ स्वर में बोली…"मैंने मां और बापू को मना कर दिया है कि मै उसेसे शादी नहीं करूंगी लेकिन मा और बापू मेरे पर बराबर जोर डाल रहे हैं कि मैं उससे व्याह कर लूं ।”

" क्यों ?"

"जो नोट वो दे गया है, उससे मां और बापू का दिमाग खराब हो गया है । कल से मेरा मां और बापू से झगडा हो रहा है, इसी बात पर ।" कहते-कहते कामिनी के चेहरे पर गुस्से के भाव आ गए थे ।

"वो अच्छा इंसान नहीँ है, तू उससे शादी मत करना ।" मंगलू ने जल्दी से कहा ।

"नहीं करूगी मैं.......!"

"पक्का वादा करती है?"

“वादा तो है, परंतु......!"

"क्या परंतु? "

"आखिर कब तक मां और बापू का सामना कर सकूगी। थक-हारकर हां तो कहनी पडेगी ।"

"नहीं कामिनी! नहीं !* मंगलू जैसे तड़प उठा----" वो बहुत बुरा है, तू उससे व्याह मत करना ।"

कामिनी मंगलू को देखकर कह उठी ।

"मैं जानती हूं कि वो बुरा है, लेकिन तू तो बुरा नहीं है ।"

"क्या मतलब ?"

"तू मुझसे शादी कर ले... । "

मंगलू कामिनी को देखता रह गया ।

" मै अच्छी नहीं लगती क्या?"

"बहुत अच्छी लगती है !"

"तो फिर मेरे से ब्याह क्यों नहीं कर लेता?" कामिनी ने प्यार से कहा ।

"वो नहीं करने देगा ।" मंगलू के होंठों से निकला ।

"कौन तेरा मालिक!!"

"हां ।"

"तू डरता है उससे?"

"पहले नहीं डरता वा, लेकिन अव डरने लगा हू। बहुत बुरा हैं वो । मैंने उसे अब पहचाना है!!"

" उसकी नौकरी छोड दे !”

"वो मुझे जाने नहीं देगा ।”

" तो हम यहां से कहीं भाग चलते हैं, तव कोई भी… !"

"वो हमे दूंढ़ लेगा ।" मगंलू ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी…“मेरे ख्याल में बो ताकतवर..... वो बहुत ताकतवर . .है !"

" इतना डरते क्यों हो उससे ?"

" वो शैतान का बेटा है ।"

"शेतान का बेटा-----ये क्या होता है?"

"मेरा मतलब! " मंगलू ने तुरंत बात संभाली…" बो बुरा है, शैतान है, वो तुमसे शादी करना चाहता है तो उंसे ये बात कैसे पसंद आएगी कि तुम उससे शादी न करके, मुझसे शादी कर लो ।"

"बात तो तेरी सही है । पैसे वाला हैं, कुछ भी कर सकता है । -तभी कह रहीं हू , हम भाग चलते हैँ।"

"नहीँ, भाग जाने से बात नहीँ बनेगी !"

"मैं समझ गई, तू मुझे प्यार नहीं करता .....तभी !"

"ये बात नहीं है कामिनी! ", मंगलू उसके दोनों हाथ पकडकर प्यार से कह उठा----"मुझे बहुत अच्छी लगती है, मैं तुझे बहुत प्यार करता हूं , लेकिन लेकिन जैसी जल्दबाजी तू चाहती है, बो करना ठीक नहीं होगा ।"

"मां-बापू मेरे को.......!"

"तू कोई बहाना बना, ऐसा बहाना कि हमे कुछ वक्त मिल जाए कोई रास्ता निकालने का ।"

"वो तो मैं ये भी कह सकती हू कि ये क्लास पास करने के बाद ही मैं शादी करूंगी ।"

"हां । ठीक है तू ऐसा ही कहना, इसी बात पर अडी रहना । इस तरह हमें वक्त मिल जाएगा कि हम इस मुसीबत का सामना कर सके । बचने का कोई रास्ता निकल सकें ।" मंगलू ने कहा ।

"वो तो ठीक है , पर तू अपने मालिक से डरता बहुत है ।"

मंगलू की आखों पर भवतारा का रात बाला रूप आ ठहरा ।

" तू क्रोई और बात कर, उसकी बात ही मत कर ।" मंगलू ने अपने सूख रहे होंठों पर जीभ फेरी ।

"डरपोक कहीं का ।" एकाएक कामिनी खिलखिलाकर हंस पडी ।

मंगलू भी मुस्कराया । जबरन मुस्कराया । व्याकुलता और परेशानी भरी मुस्कराहट ।।

@@@@@@@@@@@@@

दोपहर हो रही थी ।

दीनू कल की तरह ही आज भी झोंपडी के बाहर रखी लकडी की टेबल पर कपड़े प्रेस कर रहा था । कुल देर पहले ही कामिनी आई थी और वो झोपडी के भीतर थी ।

भवतारा वहां पहुचा ।

उसे देखते ही दीनू खिल उठा । सव काम छोड़कर उसकी सेवा में लग गया ।

" अरी ओ कामिनी की मां! देख तो कौन आया है । कामिनी! कुर्सी ला, जल्दी से ।"

भवतारा मुस्कराता हुआ उसे देख रहा था ।

"आप कैसे हैं जंबाई बाबू?" दीनू प्रसन्नता से बोला ।

"अच्छा हूं।"

“कामिनी की मां आपको बहुत याद करती है । हर वक्त आपके ही गुणगान करती रहती है ।"

तभी कामिनी झोंपडी से निकली, उसके हाथ में कल वाली ही कुर्सी थी । भवतारा को वहाँ आया पाकर उसके चेहरे पर नापसंदगी के भाव उभरे । कुर्सी लेकर वो आगे बढ़ी ।

" जल्दी कर, जंबाई बाबू कब से ख़ड़े हैं ।" भवतारा मीठी मुस्कान साथ कामिनी को देख रहा था ।

कामिनी ने कूर्सी रखी ओर झोंपड्री के भीतर चली गई ।
 
भवतारा कुर्सी पर बैठा।

कल की भांति दीनू पास ही नीचे बैठ गया ।

तभी बसन्ती झोंपडी से निकली । भवतारा को देखा ।

"आ. आ शरमाती क्यों हैं? अपने जंवाई बाबू हैं । कल ही तो आए थे ।"

" कितनी खुशी हुई है तुम्हें देखकर जंवाई बाबू!" बसन्ती तुरंत पास आ पहुँची------" मै तुम्हे देखना चाहती थी । आह, लाखों में एक है हमारा जंवाई वावू। नजर न लगे किसी की । कामिनी का भाग्य कितना अच्छा है?"

"राज करेगी हमारी बेटी ।" दीनू कह उठा ।

"क्या लोगे जंवाई बाबू ठण्डा-गर्म?"

"कुछ नहीं ।"

'यै कैसे हो सकता हे कि कुछ नहीँ, क्या हमे सेवा का मौका नही दोगे?"

"हमारे यहां रिवाज है कि रिश्ता तय होने से पहले हम लड़की के घर का नहीं खाते ।" भवतारा बोला ।

"रिश्ता तय ही तय है, क्यों कामिनी की मा..!"

"हां, हां, हमने मनाही तो नहीं की ।"

"कामिनी ने हां कह दी !" भवतारा ने पूछा ।

"कह देगी, बच्ची है, धीरे-धीरे हां कहेगी, अभी शरमाती है ।" बसन्ती मुस्कराकर बोली ।

"मुझें उसकी हां की ज्यादा ज़रूरत है ।" भवतारा बोला ।

"हमारी जुबान पर विश्वास करो, वो भी हां कह देगी ।" बसन्ती ने जल्दी से कहा ।

"क्या कहती है अब?"

"कहना क्या है, ऐसे ही ना नुकर । मुझे अभी शादी नहीं करनी, खामखाह के नखरे ।"

"उसे तैयार करना आपका काम है ।"

"वो ही तो, उसे तैयार ही कर रहे हैं । दो-चार दिन में उसकी भी हां हो जाएगी । एक बात तो बताओ जंवाई बाबू?"

" क्या?"

"ऐसे क्यों लगता है मुझे कि तुम मंदिर में बने उस शेतान के बुत जैसे हो ?"

भवतारा मुस्कराया ।

"सच कहा आपने । मेरा चेहरा बहुत हद तक उस बुत से मिलता है । कुछ और लोगों ने भी कहा ।"

बसन्ती रे फौरन दाएं-बाएं सिर हिलाकर कहा ।

" सा हो जाता है कभी-कभी, तुम्हारे घर में और, कौन-कौन है ?"

"कोई नहीं है, मैं हू ! जमीन-जायदाद और बंगला है । कामिनी को किसी तरह की कमी नही होगी।"

"मंदिर में क्यों ठहरे हो?"

"कुछ काम था तो मंदिर में आ गया ।"

"हमारे रहने की जगह ऐसी नहीं है कि तुम्हें अपने पास रख ले ।" बसन्ती ने कहा ।

"मैं जानता हूं !! कोई बडी जगह ले लीजिए ।"

" तुम्हारी मेहरबानी रही तो वो भी ले लेंगे, वरना हमारी क्या औकात?"

"तू ठीक कहती है कामिनी की मां ।"

"जंवाईं बाबू !" कामिनी की मां बोली-" ये तो तुमने देख ही लिया है कि हमारी हैसियत क्या है?"

“मैं आपकी हैसियत बदल दूगा ।"

"जुग-जुग जीजी बेटा !"

"मैं अपने खानदान के रिवाज के बारे में बताना चाहता हूं।"

"'कहो जंवाईं बाबू !"

… "हमारे यहाँ की रीत दुनिया से अलग है ।" भवतारा वेहद मीठे स्वर में कह रहा था---------" हमारे यहां व्याह दिन के बारह बजे तक हो जाता है । दुल्हन दिन में पति के साथ रहती है और रात में अपनी मां के घर ।"

"रात में मां के धर----ये कैसा रिवाज है ?" बसन्ती कह उठी ।
 
"कई पुश्तों से यही रिवाज चला आ रहा है ।" भवतारा बोला…" हमारे खानदान मैं अगर दुल्हन रात का वत्त अपने पति के साथ बिताती है तो सुबह को मृत पाई जाती है ।"

“ओह !"

"यही वजह है कि दुल्हन दिन में पति के साथ रहती है ओंर रात को अपनी मां के घर ।"

""जंवाई बाबू! ये रिवाज तो हमारे गले से नीचे नहीं उतर रहा ।" बसन्ती ने कहा ।

"मैं आपको रहने को वहुत बडा बंगला ले दूंगा । कामिनी शाम होते ही आपके पास आ जाया करेगी और दिन निकलते ही वो मेरे पास पहुच जाएगी ।" भवतारा के होंठों पर मीठी मुस्कान थी ।

बसन्ती अवतारा को देखने लगी ।

"अरी तू चुप क्यों हो गई, बोलती क्यों नहीं?"

"जंवाई बाबू की बात पर सोच रहीँ थी कि कामिनी की सारी जिन्दगी आने-जाने में ही बीत जाएगी । ऐसे में वो घर और बच्चों को कहां संभाल पाएगी । ये रिवाज तो परेशानी पैदा करने वाला है ।" बसन्ती ने कहा ।

"सब ठीक है, जंवाई बाबू पास ही हमें धर ले देगे ।" दीनू ने कहा ।

" तू चुप कर बूढे !"

" मैंने बाजार जाना था । कुछ सामान खरीदना है । सोचता हूं आपके लिए साडी और कामिनी के लिए कुछ सूट खरीद लूं ।"

" हां-हाँ ।" दीनू कह उठा…"इसमे पूछने की क्या जरूरत है ।"

“इस शहर में नया हूं , रास्तों से वाकिफ नहीँ, इजाजत हो तो कामिनी को साथ ले जाऊ?" भवतारा बोला ।

"क्या हर्ज है क्यों कामिनी की मां!"

बसन्ती ने दीनू को घूरा ।

"जब तुम्हें हर्ज नज़र नहीं आता तो मैं क्या कहूं भेज दो ।"

"तू बोल कामिनी से…मैं जंवाईं बाबू से दो-चार बाते कर लूं !"

बसन्ती उठी और झोपडी में प्रवेश कर गई ।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@

झोंपड्री के भीतर बैठी कामिनी, सब बाते सुन रही थी ।

बसन्ती ने जव भीतर प्रवेश किया तो कामिनी की निगाह उस पर जा टिकी ।

"सुना तूने?” बसन्ती ने धीमे स्वर में कहा ।

"मुझे ये आदमी अच्छा नहीं लगता ।" कामिनी ने धीमे किंतु तीखे स्वर में कहा ।

" तो ? "

"मैं इससे व्याह नही करूगी ।"

"ज्यादा बड़-बड़ मत कर । वो तेरे को बाजार ले जाना चाहता है, तेरे लिए कपड़े खरीदने को कह रहा है !"

"मुझे नहीं चाहिए कपडे ।"

"अपना मुंह बंद रखा मेरे लिए भी साडी खरीदेगा। कोई बढिया-सी साडी खरीदना------।"

"तुम्हें साडी…कपड़े की पडी है, मैं नहीं जाऊंगी ।

"क्यों ?"

"बोला तो मुझे ये अच्छा नहीं लगता ।"

बसन्ती कामिनी को घूरने लगी ।

"क्या बुराई है उसमें?"

"पता नहीं, लेकिन मन को अच्छा नहीं लगता ।"

"सब ठीक हो जाएगा । जिसके साथ रहो, धीरे-धीरे वो अच्छा लगने लगता है । इन बातो की मेरे को समझ है । वो हमें बंगला खरीदकर देगा । तू खुद ही सोच, हम तो बंगलों की दीवारों के साथ झुग्गी डालकर रहने वाले लोग हैं । हमारी इतनी औकात नहीं कि नखरे दिखाएं । तेरा बाप कपड़े प्रेस करता है, प्रेस किए कपड़े पहनता नहीं ! "

" जो भी हो, मैं इससे व्याह नहीं करूंगी ।"

"जूती उतारू !” बसन्ती ने दांत भीचकर धीमे स्वर में कहा ।

" मां , हमारी औकात बंगले में रहने की नहीं । हम झोंपडी में ही अच्छे लगते हैं । गरीब लोग हैं, हमारा रिश्ता गरीबों के साथ ही बँधे तो जंचता है । झोपडी में रहकर हमे महलों के बुर्ज को नहीं देखना चाहिए !" कामिनी गंभीर स्वर में बोली-----" खाना वो लोग खाते है, वो खाना हमे हजम भी नही होगा । हमे रूखी सूखी खानी ही अच्छी लगेगी ?"

" बाते करने लगी है तू.". !"

" मेरे हाल पर छोड़ दो मां । मेरे पीछे मत पडो । किसी गरीब साथ ब्याह करोगी तो मैं खुशी खुशी कर लूंगी, लेकिन इस आदमी साथ मैं किसी भी हाल मे व्याह न करूंगी । तुम लालच छोड दो ।"

बसन्ती कुछ चुप रही,फिर धीमे स्वर मेँ बोली।

"ठीक है । मै सोचुगी । बो बाहर बैठा है, अब तो तू जा उसके साथ बाजार । तेरी बात पर एक बार फिर मैं सोच लूंगी ।"

"उसके साथ तो एक कदम भी चलने का मन नहीं करता ।"

" जाती है या जूती उतारू ।"

कामिनी बेमन उठी और बाहर निकल गई ।
 
पांच मिनट बाद दीनू भीतर आया ।

"गए दौदोनों ?"पूछा बसन्ती ने।

"हां, दोनों की जोडी कितनी अच्छी लग रही है ।"

"तेरा तो दिमागों खराब हो गंया है बूढे बैठ तेरे से बात करनी है ।" बसन्ती बोली ।

दीनू बैठ गया ।

"मेरे को उसके रिवाज पसंद नंहीँ।"

"रिवाज?"

"हां,दिन मे पति कै पास रहना ओर रात में मां के घर चले जाना ! ये क्या बात हुई?"

"उनका रिवाज--!"

"चूल्हे में गया उनका रिवाज । हम कब तक जिन्दा हैं! हमारे बाद कामिनी को कितनी परेशानी आएगी । कल को बच्चे भी होने हैं और उन्हें पढाना-लिखाना होगा तो क्या कोई रात को अपने पति के पास रह ही नही सकेगी ।"

"तो क्या हो गया…वो दिन में !"

"एक ही बात की तरफ़ मत सोच और भी पचासों बातें है ।" बसन्ती ने गंभीर स्वर में कहा----"मान ले कि कभी कामिनी को रात … मे बहां रहना पड़ गया तो क्या होगा सुबह वो मरी मिलेगी ।"

दीनू चुप ।

"क्या पता उसके खानदान को क्या अभिशाप मिला हुआ है, इस तरह अपनी बेटी को कुएं में कैसे धक्का दे दे !"

दीनू व्याकुल!

"सारी उम्र कामिनी बच्चों को लिए ससुराल-मायके ही दौडती रहेगी । दिन में वहाँ रात में यहां, लोग क्या कहेंगे, पूछेंगे तो हम क्या जवाब देगे कि ये क्या हो रहा है । तमाशा है कोई------कामिनी का बुरा हाल होग! "

दीनू परेशान!

"शादी-ब्याह न हो गया, खेल होगया ये तो ।"

"तू क्या कहना चाहती है?"

" मुझें नहीं जंचा ये सब......!"

" तो ?"

"बूढे! सब कुछ सुनकर भी तो-तो कर रहा है, पल्ले नहीं पडी सारी बात या नियत खराब है ।" बसन्ती झल्लाई ।

“कह लिया तूने जो कहना था?"

“हां”

"अब मेरी सुन, कामिनी की शादी उसी के साथ होगी !"

" बूढे तू… !"

" बूढा होगा तेरा बाप, मेरी सुन ।" दीनू भडका----"पैसे बाला है वो, लाखों रुपया दे गया है । अभी भी वो कितना पैसा हमेँ देगा । हमें बंगला लेकर देगा। नौकर होंगे-कार होगी, हम ऐश . करेंगे । सारी उम्र इस तरह प्रेस करते हए झोंपड़े में नहीं रहेगे । दिन बदल जाएँगे हमारे । बाबुओं की तरह रहेंगे हम ।"

" और हमारी लड़की सुबह यहां और रात बहां भटकती रहे !"

"क्या फर्क पड़ता है? आज कल फुर्सत किसके पास पडी है कि दूसंरे को कोई देखे । क्या पता शादी के अगले ही दिन वो मर जाए और सारी जमीन जायदाद हमें मिल जाए । किसी गऱीब के हाथ में, कामिनी का हाथ दे दिया तो पता नहीं पेट-- रोटी भी नहीं खा पाएगी । ढंग का कपड़ा भी पहनने को मिले या न मिले । बच्चे आवारा हो जाएंगे । दौलत पास में हो तो सारे अवगुण ढक जाते हैं । बुराई होते हुए भी लोग इज्जत देते हैं ।"

बसन्ती की निगाह दीनू पर थी ।

" सारा दिन खड़े रहकर प्रेस करनी पड़ती है । मुझे पता है कि मेरा क्या हाल होता है !"

"तो तूने पक्का सोच रखा है?"

"अब सोचने को कुछ नहीं है । हम उसके साथ कामिनी की शादी तय कर चुके है । पैसों है तो सव कुछ है ।"

" कामिनी से पूछ लिया ?"

" उससे क्या पूछना ?"

“वै इससे शादी नहीं करना चाहती ।"

"वो क्या उसकी मां भी शादी करेगी उससे.....!" दीनू ने गुस्से से कहा ।

" उसकी मां तो कर लेगी, लेकिन बात कामिनी की, है, उसने स्पष्ट मना कर दिया है कि.... !"

" उसकी मना को मानता ही कौन है ।"
 
" वो अब बच्ची नहीं रही, जबर्दस्ती करोगे तो भाग जाएगी ।" वसन्ती ने कहा ।

“तू किस लिए है, समझा उसे…रास्ते पर ला । वो तो नादान है । अच्छे…भले की समझ नहीं है उसमें!"

"बहुत समझाया है उसे…फिर भी उसे समझाने की कोशिश करूगी ।"

"मैँ तो दो-चार दिन में ही उसका व्याह कर देना चाहता हू।"

" ये गुडूडी-गुडूडे का खेल नहीं, जो तू उसे दो-चार दिन में व्याह देगा सब्र से काम ले ।"

@@@@@@@@@@@@@@@@@@

भवतारा और कामिनी पैदलं चलते हुए बाजार में आ पहुचे थे ।

रास्ते में भवतारा ने कामिनी से बात करने की चेष्टा की, परंतु वो जवाब में हूं हूं करके ही रह गई । भवतारा महसूस कर चुका था कि कामिनी को उसका साथ पसंद नहीं है ।

"आज तू औंर मंगलू पुलिया पर नहीं बैठे?" भवतारा ने मीठे स्वर में कहा ।

"नहीं ।"

"क्यों ?"

"यूं ही ।"

"कहां बैठे फिर?"

"इधरैम-उधर घूमते रहे !" कामिनी ने अनमने मन से-कहा ।

"मैं जानता हूं तुम दोनों पुलिया पर क्यों नहीं बैठे !" भवतारा ने हौले से हस कर कहा !

"क्यों नहीं बेठे?”

"क्योंकि मेरा वहां आ जाना तुम दोनो को अच्छा नहीं लगता !"

" ऐसी बात तो नहीं !" कामिनी ने बात संभालने का प्रयत्न किया ।

"मुझें तो लगता है कि ये ही बात है । मंगलू मेरे बारे में क्या बात कर रहा था?"

"कुछ भी नहीं !"

* झूठ ......!*

“मैं झूठ क्यों बोलूंगी !" कामिनी ने उसे देखा-" मंगलू ने ये ही कहा था कि उसका मालिक वहुत अच्छा है !"

दोनों भीड़ भरे बाजार में घूम रहे थे !

"जानती हो कामिनी, मैंने जव से तुम्हें देखा है, अपनी नीद गवा बैठा हूं।

कामिनी ने जवाब में कुछ नहीं कहा ।।

"तुम मुझे बहुत प्यारी लगती हो, लगता हैँ जैसे दुनिया में मैं तुम्हारे लिए ही आया हूं।" भवतारा ने गहरी सांस लेकर कहा----" बहुत बड़े-बड़े घरों से मेरे लिए रिश्ते आ रहे थे, लेकिन मुझें तुम पसंद आई। देखते ही दिल दे बैठा !"

जाने क्यों कामिनी के चेहरे पर शर्म की लाली आ ठहरी ।।

"मैने तो पक्का सोच लिया है कि जव तक हमारी शादी नहीं हो. जाती, तब तक मैं यहीं रहूंगा ।"

कामिनी सिर झुकाए उसके साथ आगे बढी जा रही थी ।

"शादी के बाद मैं मंगलू को नौकरी से निकाल दूगा !"

"क्यों?" कामिनी ने सिर उठाकर उसे देखा ।

"क्योंकि तब तो तुम मेरा ध्यान रखोगी, मंगलू का क्या काम बचेगा । कुछ भी नहीं ।।"

कामिनी चुप रही ।

“तुम्हें मंगलू कैसा लगता है !"

"अच्छा है !"

“मैं कैसा लगता हूं !"

"तुम भी अच्छे हो !"

"तुम्हें मगलू अच्छा लगता या मैं---ज्यादा कौन अच्छा लगता ' है !!" भवतारा ने मुस्कराकर पूछा ।

"ये तुम कैसा सवाल कर रहे हो ?"

"जवाब दो ।"

भवतारा की बाते जैसे जादू करती जा रही थी कामिनी पर ।
 
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