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Guest
भवतारा ऐसे आगे बढा जा रहा था जैसे कि उसे पता हो कि कहाँ जाना है । पुलिया से काफी आगे जाकर उसने सडक छोड्री और कच्चे रास्ते पर उतर गया ।
सामने ही कच्चे-पक्के मकानों की कालोनी नजर आ रही थी । वहां पर लोग आते-जाते और छोटे बच्चे खेलते नजर आ रहे थे ।
हल्की-सी धूप खिली हुई थी । वो कच्चा रास्ता पार करके भवतारा कालोनी की बाहरी सढ़क पर ही आगे बढ़ गया । कुछ आगे सड़क किनारे झोंपडी बनी हुई थी । पास ही दो पेडों की छांव: में, एक बूढा-सा आदमी टेबल लगाए प्रेस कर रहा था ।
भवतारा उसके पास आकर रुका । कपडे प्रेस करने वाले ने गर्म प्रेस पत्थर पर रखते हुए उन्हें देखा ।
"कहिए बाबू जी?" वो बोला-" किसका पता पूछना है?”
"नाम क्या है तुम्हारा ?" भवतारा ने मधुर स्वर में पूछा ।
" दीनू।" वो सवालिया नजरों से उसे देखने लगा ।
"कामिनी तुम्हारी बेटी है?”
"हां !" वो अचकचाया----" उससे कोई गलती हो गई बाबूजी?"
"नहीं, मैं मंदिर में रहता हूं । कामिनी वहां कपड़े देने आती है । देखा उसे कई बार ।"
दीनू भवतारा को देखता रहा ।
"मैं तुमसे ही मिलने आया हू बिठाओगे नहीं मुझे?"
"जरूर बिठाऊंगा ।"
फिर उसने झोपड़ी की तरफ मुह करके आवाज लगाई-"कामिनी , ओ कामिनी!"
"आई बापू ।" झोंपडी के भीतर से कामिनी की आवाज आई ।
"कुर्सी लेकर आ बैठने के लिए, साब आए है ।"
चंद पलों बाद कामिनी फोल्डिंग चेयर उठाए झोंपड़े से बाहर निकली । भवतारा को देखते ही वो ठिठकी । पहले चेहरे पर हैरानी आई फिर नापसंदगी के भाव आ ठहरे।
भवतारा उसे देखकर प्यार से मुस्कराया ।
" ला-ला, कुर्सी ला ।" दीनू बोला ।
कामिनी अनमने मन से पास आई और पुरानी-सी कुर्सी खोलकर रख दी !
"बैठो बाबूजी! और तू जा, साबजी के लिए चाय बना ला । मदिर से आए हैं ।"
कामिनी विना कुछ कहे वापस चली गई ।
भवतारा कुर्सी पर बैठा ।।
दीनू उसके पास ही नीचे बैठता हुआ कह उठा ।
"कहिए बाबूजी! वैसे मैं कपड़े ठीक से प्रेस करता हूं। अगर कही कमी रह गई हो तो.. !"
" ऐसी बात नहीं है ।" भवतारा ने मुस्कराकर मधुर स्वर में कहा ।
"तों?”
"मुझे तुम्हारी बेटी कामिनी वहुत अच्छी लगी ।"
"ये क्या कह रहे हैं बाबूजी?" दीनू हैरानी से कह उठा ।।
"क्यो-क्या मुझे तुम्हारी बेटी पसंद नहीं आ सकती?" भवतारा : उसी मधुर अंदाज में बोला ।
"कहां आप, कहाँ हम-----ये नहीं हो सकता ।"
" दीनू मुझ पर भरोसा रखो ।"
"नहीं बाबूजी ये नहीं हो सकता ।" दीनू हाथ सिर हिलाता कह उठा… " हम ठहरे गरीब झोंपडी वाले और...!"
" मैने तुमसे अभी तो जवाब नहीं मांगा ।"
दीनू को समझ न आ रहा था कि क्या कहे और क्या न कहे ।
"ये रख लो ।" भवतारा उसकी तरफ़ ब्रीफकेस बढाता हुआ बोला ।
"क्या है इसमें?" दीनू अजीब-से स्वर में बोला ।
भवतारा ने ब्रीफकेस खोला और उसे दिखाया ।
भीतर ठूंसी नोटों की गड्डियां देखकर दीनू की घिग्गी बंध गई ।
भवतारा ने ब्रीफकेस बंद करके दीनू के पास रखा और उठते हुए बोला ।
"मै फिर आऊंगा दीनू! मेरी बात मानोगे तो कामिनी राज करेगी, राज़ ।" भवतारा ने मधुर स्वर में कहा और बापस चल पडा ।
दीनू फटी-फटी आखों से पास रखे ब्रीफकेस को देखे जा रहा था ।
@@@@@@@@@@@@@
दीनू घबराया-हड़बड़ाया सा ब्रीफकेस थामे झोंपड़े में प्रविष्ट हुआ ।
"कामिनी की मा---" ओ बसन्ती!"
"चिल्ला क्यों रहा है बूढे, दिखता नहीं, तेरे सामने बैठी हूं।"
पचपन बरस की औरत पीली साड्री पहने प्याज काट रही थी । पास ही कामिनी अपनी किताब खोले पन्ने पलट रही थी कि अपने बापु के हाथ में ब्रीफकेस देखकर उसकी आखें सिकुडी ।
"ये हाथ में छोटा बैग क्या थाम रखा है बापू?" कामिनी कह उठी ।
“ये....ये हमारा भाग्य है ।" दीनू खुशी से कहता पास ही बैठ गया ।
"भाग्य?"
“बूढा पागल हो गया लगता है ।" बसन्ती ने मुह बनाकर कहा ।
"हां, मैं पागल हो गया हूं , तुम भी पूरी बात सुनकर पागल हो जाओगी !"
" ऐसा क्या?"
"हाँ ।"
"तो बता-क्या बात है?" बसन्ती ने पूछा ।
" 'बापू! ये बैग तो मैंने उस आदमी के हाथों
में देखा था ।" कामिनी बोली ।
"तू थोडी देर चुप रहेगी ।" दीनू ने कामिनी को झिड़का ।
कामिनी खामोश हो गई ।
दोनों ही दीनू को देख रही थी ।
दीनू ने कांपते हाथों से ब्रीफकेस खोला ।
" ये देख कितने सारे नोट ।
बसन्ती की आखें फैल गई, ब्रीफकेस में पडी नोटों की गड्डिर्यो को देखते ही ।
" हे राम! " बसन्ती के होंठो से निकला ।
बसन्ती के चेहरे पर अजीब-से भाव आ ठहरे थे ।
"एकदम असली है । दीनू खुशी से बोला।
"क्यों बूढे--कहीं चोरी की तूने ?" बसन्ती एकाएक कह उठी ।
"शुभ बोल, शुभ! ! मैं क्या तेरे को चोर दिखता हूं । किसी की कमीज की जेब से प्रेस करते वक्त दस रुपए भी मिलते हैं तो उसे वापस कर देता हू , जबकि तू ही कहती है कि रख लिया करो , लेकिन मै बापस ......!"
"अपनी बडाई मत कर बूढे! काम की बात बता, पैसे कहा से लिए?" बसन्ती प्याज काटना भूल गई थी ।
"साहब आया था अभी, वो दे गया । तूने उसे चाय भी नहीं पिलाई ।"
"क्यों दे गया वो ?"
" उसे कमिनी पसंद आगई है !"
"पसंद आ गई है?" बसंती के होठो से निकला ।
ज़बकि कामिनी चौक पड्री थी।
सामने ही कच्चे-पक्के मकानों की कालोनी नजर आ रही थी । वहां पर लोग आते-जाते और छोटे बच्चे खेलते नजर आ रहे थे ।
हल्की-सी धूप खिली हुई थी । वो कच्चा रास्ता पार करके भवतारा कालोनी की बाहरी सढ़क पर ही आगे बढ़ गया । कुछ आगे सड़क किनारे झोंपडी बनी हुई थी । पास ही दो पेडों की छांव: में, एक बूढा-सा आदमी टेबल लगाए प्रेस कर रहा था ।
भवतारा उसके पास आकर रुका । कपडे प्रेस करने वाले ने गर्म प्रेस पत्थर पर रखते हुए उन्हें देखा ।
"कहिए बाबू जी?" वो बोला-" किसका पता पूछना है?”
"नाम क्या है तुम्हारा ?" भवतारा ने मधुर स्वर में पूछा ।
" दीनू।" वो सवालिया नजरों से उसे देखने लगा ।
"कामिनी तुम्हारी बेटी है?”
"हां !" वो अचकचाया----" उससे कोई गलती हो गई बाबूजी?"
"नहीं, मैं मंदिर में रहता हूं । कामिनी वहां कपड़े देने आती है । देखा उसे कई बार ।"
दीनू भवतारा को देखता रहा ।
"मैं तुमसे ही मिलने आया हू बिठाओगे नहीं मुझे?"
"जरूर बिठाऊंगा ।"
फिर उसने झोपड़ी की तरफ मुह करके आवाज लगाई-"कामिनी , ओ कामिनी!"
"आई बापू ।" झोंपडी के भीतर से कामिनी की आवाज आई ।
"कुर्सी लेकर आ बैठने के लिए, साब आए है ।"
चंद पलों बाद कामिनी फोल्डिंग चेयर उठाए झोंपड़े से बाहर निकली । भवतारा को देखते ही वो ठिठकी । पहले चेहरे पर हैरानी आई फिर नापसंदगी के भाव आ ठहरे।
भवतारा उसे देखकर प्यार से मुस्कराया ।
" ला-ला, कुर्सी ला ।" दीनू बोला ।
कामिनी अनमने मन से पास आई और पुरानी-सी कुर्सी खोलकर रख दी !
"बैठो बाबूजी! और तू जा, साबजी के लिए चाय बना ला । मदिर से आए हैं ।"
कामिनी विना कुछ कहे वापस चली गई ।
भवतारा कुर्सी पर बैठा ।।
दीनू उसके पास ही नीचे बैठता हुआ कह उठा ।
"कहिए बाबूजी! वैसे मैं कपड़े ठीक से प्रेस करता हूं। अगर कही कमी रह गई हो तो.. !"
" ऐसी बात नहीं है ।" भवतारा ने मुस्कराकर मधुर स्वर में कहा ।
"तों?”
"मुझे तुम्हारी बेटी कामिनी वहुत अच्छी लगी ।"
"ये क्या कह रहे हैं बाबूजी?" दीनू हैरानी से कह उठा ।।
"क्यो-क्या मुझे तुम्हारी बेटी पसंद नहीं आ सकती?" भवतारा : उसी मधुर अंदाज में बोला ।
"कहां आप, कहाँ हम-----ये नहीं हो सकता ।"
" दीनू मुझ पर भरोसा रखो ।"
"नहीं बाबूजी ये नहीं हो सकता ।" दीनू हाथ सिर हिलाता कह उठा… " हम ठहरे गरीब झोंपडी वाले और...!"
" मैने तुमसे अभी तो जवाब नहीं मांगा ।"
दीनू को समझ न आ रहा था कि क्या कहे और क्या न कहे ।
"ये रख लो ।" भवतारा उसकी तरफ़ ब्रीफकेस बढाता हुआ बोला ।
"क्या है इसमें?" दीनू अजीब-से स्वर में बोला ।
भवतारा ने ब्रीफकेस खोला और उसे दिखाया ।
भीतर ठूंसी नोटों की गड्डियां देखकर दीनू की घिग्गी बंध गई ।
भवतारा ने ब्रीफकेस बंद करके दीनू के पास रखा और उठते हुए बोला ।
"मै फिर आऊंगा दीनू! मेरी बात मानोगे तो कामिनी राज करेगी, राज़ ।" भवतारा ने मधुर स्वर में कहा और बापस चल पडा ।
दीनू फटी-फटी आखों से पास रखे ब्रीफकेस को देखे जा रहा था ।
@@@@@@@@@@@@@
दीनू घबराया-हड़बड़ाया सा ब्रीफकेस थामे झोंपड़े में प्रविष्ट हुआ ।
"कामिनी की मा---" ओ बसन्ती!"
"चिल्ला क्यों रहा है बूढे, दिखता नहीं, तेरे सामने बैठी हूं।"
पचपन बरस की औरत पीली साड्री पहने प्याज काट रही थी । पास ही कामिनी अपनी किताब खोले पन्ने पलट रही थी कि अपने बापु के हाथ में ब्रीफकेस देखकर उसकी आखें सिकुडी ।
"ये हाथ में छोटा बैग क्या थाम रखा है बापू?" कामिनी कह उठी ।
“ये....ये हमारा भाग्य है ।" दीनू खुशी से कहता पास ही बैठ गया ।
"भाग्य?"
“बूढा पागल हो गया लगता है ।" बसन्ती ने मुह बनाकर कहा ।
"हां, मैं पागल हो गया हूं , तुम भी पूरी बात सुनकर पागल हो जाओगी !"
" ऐसा क्या?"
"हाँ ।"
"तो बता-क्या बात है?" बसन्ती ने पूछा ।
" 'बापू! ये बैग तो मैंने उस आदमी के हाथों
में देखा था ।" कामिनी बोली ।
"तू थोडी देर चुप रहेगी ।" दीनू ने कामिनी को झिड़का ।
कामिनी खामोश हो गई ।
दोनों ही दीनू को देख रही थी ।
दीनू ने कांपते हाथों से ब्रीफकेस खोला ।
" ये देख कितने सारे नोट ।
बसन्ती की आखें फैल गई, ब्रीफकेस में पडी नोटों की गड्डिर्यो को देखते ही ।
" हे राम! " बसन्ती के होंठो से निकला ।
बसन्ती के चेहरे पर अजीब-से भाव आ ठहरे थे ।
"एकदम असली है । दीनू खुशी से बोला।
"क्यों बूढे--कहीं चोरी की तूने ?" बसन्ती एकाएक कह उठी ।
"शुभ बोल, शुभ! ! मैं क्या तेरे को चोर दिखता हूं । किसी की कमीज की जेब से प्रेस करते वक्त दस रुपए भी मिलते हैं तो उसे वापस कर देता हू , जबकि तू ही कहती है कि रख लिया करो , लेकिन मै बापस ......!"
"अपनी बडाई मत कर बूढे! काम की बात बता, पैसे कहा से लिए?" बसन्ती प्याज काटना भूल गई थी ।
"साहब आया था अभी, वो दे गया । तूने उसे चाय भी नहीं पिलाई ।"
"क्यों दे गया वो ?"
" उसे कमिनी पसंद आगई है !"
"पसंद आ गई है?" बसंती के होठो से निकला ।
ज़बकि कामिनी चौक पड्री थी।