• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज complete

मंगलू थका-थका-सा सड़क के किनोरे आगे बढा जा रहा था । भरे-पूरे बाजार से इस वक्त वो गुजार रहा था, परं लोगों की तरफ़ उसका जरा भी ध्यान न था । मन में कामिनी थी, सोचो मे भवतारा था । वो जानता था कि भवतारा किसी भी तरफ से कामिनी के लायक नहीं है । नर-पिशाच था भवतारा, जो इंसानों का खून पीता था । ये बात कामिनी को नहीं पता थी और वो बता भी न सकता था । बताता तो कामिनी को फिर यही सोचना था कि वो जलन की वजह से भवतारा के खिलाफ बोल रहा है और ये बात उसने भवतारा को भी

बता देनी थी । तब भवतारा ने भी उसे अपना दुश्मन मान लेना था।

भवतारा तो पहले ही स्पष्ट रूप से उसे चेतावनी दे चुका है कि उसकी हकीकत को किसी के सामने बयान करने की जुर्रत न करे । ऐसे में उसने अपना मुंह बंद रखना ही ठीक समझा था ।

मगलू को दिल-ही-दिल में वहुत तकलीफ हुई थी कि कामिनी का झुकाव भवतारा की तरफ़ हो गया है । कामिनी अचानक इस तरह, पलट जाएगी, ये तो उसने कभी सोचा भी न था ।

मंगलू को कुछ अच्छा न लग रहा था । बो बस अपनी मां के पास पहुच जाना चाहता था । भवतारा के काम आकर उसे कुछ भी हासिल नहीं हुआ था, बल्कि कामिनी की वजह से दिल ही टूटा था उसका ।

तभी मंगलू ने अपने कंधे पर हाथ महसूस किया किसी का ।

वो ठिठका तुरंत पलटा ।

अगले ही पल चौका ।

मोना चौधरी ने अपना हाथ उसके कंधे पर रखकर, उसे रोका था । उसके पीछे सतपाल खड़ा था ।

मंगलू बारी-बारी दोनों को देखने लगा ।

"अब तुम हमारे हाथों से बच नहीं सकते मंगलू?" मोना चौधरी ¸ कठोर स्वर में बोली ।

मगलू खामोशी से मोना चौधरी को देखने लगा ।

"शैतान का बेटा कहां हैं ?" सतपाल की आवाज में भरपूर सख्ती थी।

"मुझे क्या पता?"

"तुम सब जानते हो?" मोना चौधरी दात भीचकर कह उठी-" क्योंकि तुम भी इसी शहर में हो और शैतान का बेटा भी इसी शहर में है!"

" वो इस शहर में नहीं ।" मंगलू ने जैसे बात खत्म करनी चाही ।

"झूठ मत बोलो, वो इसी शहर में है ।"

"नहीं ।"

" रात मैं उससे मिली थी । बो मेरे पास, सिर्फ चार कदम की दूरी पर बैठा था ।"

मंगलू मोना चौधरी को देखने लगा ।

"हर रात बो किसी-न-किसी का खून पी रहा है । शहर-भर के लोग उसकी वजह से दहशत में है । आगे भी जाने वो कितनों का खून पीएगा । तुम सव जानते हो, क्योंकि तुम उसके खास साथी हो?"

"मैं किसी का साथी नहीं ।" मंगलू थके-से स्वर में कह उठा ।

"फिर झूठ !"

“ये इस तरह नहीं मानेगा !" सतपाल के होंठ भिंच गए-"आसे अपने साथ ले चलो ।"

संतपाल के इन शब्दों पर भी मंगलू ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई ।

ये बात मोना चौधरी और सतपाल के लिए हैरानी लायक थे ।

मंगलू शांत भाव से दोनों को देखता रहा ।

मोना चौधरी ने आस-पास से निकलते लोगों पर निगाह डाली और छिपे ढंग से रिवॉल्वर निकालकर मंगलू के पेट से लगा दी । मंगलंके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया । मोना चौधरी को अजीब-सा लगा कि मंगलू ज़रा भी विचलित नहीं हो रहा ।

“ये रिवॉल्वर है । गोली चल गई तो तुम मारे जाओगे ।" मोना चौधरी गुर्राई ।

"चला दो गोली ।" मंगलू टूटे-से स्वर में कह उठा ।

मोना चौधरी मंगलू को घूरने लगी ।
 
“क्या बात है, आज तुम हमसे झगड़े पर उतारू नहीं हो रहै?" सतपाल बोला----“और मरने को तैयार हो ।"

"किसके लिए झगडा करूं?" मंगलू पूर्ववत स्वर में बोला !!

"शेतान के बेटे के लिए?" कहते हुए सतपाल ने अजीव-भी नजरों से उसे देखा ।

मंगलू मुस्कराया । फीकी-सी मुस्कान । बोला ।

"बो क्या लगता है?"

“वो तो तुम्हारे बाप से भी ज्यादा हैसियत रखता है । तुम उसके लिए हमसे कई बार बुरी तरह झगड़ चुके हो ।"

"वो वक्त बीत गया ।"

सतपाल और मोना चौधरी की नज़रे मिली ।।

मंगलू का व्यावहार उन्हें पेरेशाली में डालने वाला था ।

मोना चीधरी समझ गई कि कहीं-न-कहीं गडबड है । उसने रिवॉल्वर वापस अपने कपडों में रख ली । मंगलू को क्या हो गया है, ये ही जानने की उत्सुकता उसके मन में थी । जो बात-बात पर जानलेवा झगडे पर उतारू हो जाता था, वै आज ठहरे पानी की तरह शांत क्यों है?

" तुम...!" मोना चौधरी ने बेहद शांत स्वर में कहा---" तुम नाराज-से लग रहे हो मंगलू?”

मंगलू खामोश रहा ।

सतपाल ने सिगरेट सुलगा ली ।

" बोलो क्या वात है?"

एकाएक मंगलू की आंखों में आंसू चमके ।

"उसने मेरी कामिनी को मुझसे छीन लिया ।

मगंलू का दर्द भर्राए स्वर मे बाहर निकला हो जैसे ?

"'किसने !" मोना चौधरी की आंखें सिकुडी ।

“भवतारा ने ।"

"कामिनी कौन है?"

" दीनू की बेटी , लो कपड़े प्रेस करता है---कामिनी मुझे शुरू से ही अच्छी लगी । वो भी मुझे पसंद करती थी ।"

"फिर?"

"भवतारा ने कामिनी को देखा तो वो कामिनी का दीवाना हो गया । उसके मां-बाप को पैसे दिए । उन्हें कपडे लेकर दिए । कामिनी को सोने का हार लेकर दिया । पैसा दिखाकर उसने कामिनी को मुझसे दूर कर दिया ।"

"ओह .....!"

"अब भवतारा और कामिनी शादी कर लेगे ।"

"शादी?" मोना चौधरी चौंकी ।

सतपाल के चेहरे पर बिषैली मुस्कान नाच उठी ।

"कामिनी!" सतपाल बड़बड़ा उठा ।

"क्या हुआ?" मोना चौधरी ने सतपाल को देखा ।

"मिथलेश ने बताया था कि शैतान के बेटे की बर्बादी की वजह कामिनी ही बनेगी, ये वो ही कामिनी है ।"

हंस पड़ा सतपाल ।

मोना चौधरी को भी इस बात का ध्यान आया ।

मंगलू दोनों को देख रहा था ।

"क्या कहा तुमने?” मंगलू बोला------" शैतान के बेटे की बरबादी की वजह कामिनी बनेगी?"

" हां !"

"ये कैसे हो सकता है, वो-दोनों तो शादी कर रहे है ?"

" शैतान का बेटा कभी भी शादी नहीं कर सकता । वो कामिनी का खून पी जाएगा अंधेरा होते ही ।" सतपाल कड़वे स्वर में बोला ।

इसी का अंदेशा था मंगलू कौ ।।

" परंतु वो शादी करने जा रहे है !" मंगलू ने कहा ।

"कब?"

"दो-चार दिन में !"

"दो-चार दिन?” सतपाल कड़वे स्वर में बोला…"दो-चार दिन मे तो पता नही क्या होजाता है।"

तभी मोना चौधरी कह उठी ।

"इस तरह सड़क पर खड़े होकर बातें करना ठीक नहीं, होटल चले तो कैसी रहे?"

"बढ़िया रहेगा" । सतपाल ने मंगलू को देखा-…“तुम हमारे साथ होटल चलो !"

“क्या करूंगा होटल चलकर?"

"तुम कामिनी को पानां चाहते हो ?"

"हां !"

"तो यही मोका है, हमारा साथ दो । बहुत जंल्दी कामिनी वापस तुम्हारे पास होगीं !"

मंगलू सोच-भरी निगाहों से उसे देखने लगा ।
 
"चलो । वाकी बाते होटल चलकर करेगे !" मोना चौधरी ने कहते हुए मंगलू के कंधे पर हाथ रख दिया !!

चलही पडां मगंलू उनके साथ ।।

वे होटल पहुँचे ।।

रास्ते-भर मगतू चुप-धुप-सा रहा था । मोना चौधरी और सतपाल जानते थे कि मंगलू धीरे--धीरे रास्ते पर आ रहा है । कामिनी का झुकाव भवतारा की तरफ हो जाने की वजह से मंगलू का दिल टूट चुका है, इसी बात का वो फायदा उठा लेना चाहते थे, वरना जानते थे कि मंगलू अपनी बात का कितना पक्का है, वो शैतान के देते के बारे कुछ भी नहीं बताने वाला ।

होटल के कमरे में पहुंचते ही मोना चौधरी ने बात शुरू को ।

"तुम कामिनी को पाना चाहते हो, उससे शादी करना चाहते हो?"

" मैं तो चाहता हू परंतु अब कुछ नहीं हो सकता । भवतारा बहुत खतरनाक है ।" मंगलू बोला ।

"शेतान के बेटे की बात तुम हम पऱ छोड दो । क्या तुम कामिनी को पाना चाहते हो?"

"हां ।"

"हमारा साथ दोगे?"

"साथ?" मंगलू बेचैन हुआ ।

"कामिनी को पाना है तो हमारा साथ देना ही होगा बोलो तैयार हो ?" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा ।

" साथ मे-क्या करना होगा-कैसा साथ चाहते हो तुम लोग?”

"शैतान का बेटा कहां हैं?" सतपाल ने कहा-----" बताना होगा ।

मंगलू सतपाल को देखने लगा ।

"तुमने कामिनी को पाना है तो हम शैतान के बेटे को खत्म करेगे । तभी तुम कामिनी को हासिल कर पाओगे ।"

मंगलू ने बैचेनी से पहलू वदला ।

मोना चौधरी कह उठी ।

"शैतान के बेटे ने तुम्हारी कामिनी को तुमसे छीन लिया है, इसकै बाद भी क्या तुम इस बात पर ।"

"वो वो बहुत शैतान है । खतरनाक है, उस पर काबू पाना असंभव बात है । इंसानों का खून पीता है और तब जब वो इंसानों का खून पीता है, उसका रूप पूरी तरह बदल जाता है । सामान्य तौर पर बो खूबसुरत युवक है, परंतु अंधेरा होने पर जब वो खून पीता है तो वहुत भयानक लगता है ।....

..... बो-वो नहीं रहता, दरिन्दा वन जता है । उसका रूप बदल जाता है । चेहरा ऐसे भयावह हो जाता है किं कोई देखे तो मर जाए । उसके आगे के दात बाहर आ जाते है । उँगलियों के नाखून बड़े-बड़े हो जाते हैं, सिर के बार खडे हो'जाते हैं !

उसके होंठों से वहशियों की तरह गुर्राहटैं निकलती हैं और इंसान का खून पी लेने के बाद वो ऐसे चलता है, जैसे नशा कर लिया हो ।

शैतानी ताकतों का स्वामी है वो है जिसका मुकाबला नहीं किया जा सकता ।"

" हम मुकाबला करेगे उसका ।" सतपाल बोला--"" हम खत्म करेगे उसे ।"

" असम्भव तुम दोनों के लिए तो उसे छु पाना भी नामुमकिन हैं । उससे पहले ही वो तुम लोगों को मार देगा ।"

मोना चौधरी और सतपाल की नजरे मिली ।

" मंगलू! " मोना चौधरी समझाने वाले गभीर स्वर में बोली-“तुम हमें शैतान के बेटे का ठिकाना बताओ । उसके बाद जो करना होगा, वो हम ही करेगे, तुम्हें कुछ नहीं करना होगा, तुम्हारी जान नहीं जाएगी !"

“तुम लोग उसे बता दोगे कि मंगलू ने तुम्हें उसके बारे मैं … बताया था !"

”नहीं, हम उसे कुछ भी न बताएंगे ये हमारा तुमसे वादा है ।" सतपाल ने दुढ़ स्वर कहा ।

मंगलू खामोश रहा ।

"कामिनी को पाना है तो तुम्हें हमारा 'खबरी' बनना ही होगा ।" मोना चौधरी कह उठी…"मत भूलो कि वो इंसानी खून पीने वाला शैतान है, वो किसी से शादी नहीं कर सकता, वो कामिनी का खून पी जाएगा । उसकी जान ले लेगा ।"

मगलू के भीतर व्याकुलता ने उछाल मारी ।

"क्या सोच रहे हो?"

"मैं......मैं तो उन दोनों को छोड़ वापस अपनी मां के पास जा रहा था ।" मंगलू ने गहरी सांस लि ।

" अजीब प्यार है तुम्हारा । कामिनी को तुम खून पीने वाले दरिन्दे कें हवाले करके जा रहे हो । तुम्हें......!"

“ मै कुछ कर भी तो नही सकता !"

"हम तो कर सकते हैं, तुम हमें बताओ कि शैतान का बेटा कहां है, किधर ठिकाना है उसका?”

मंगलू ने मुंह खोला ।

ऐसा खोला कि सब कुछ बताता चला गया वो ।

'खबरी’ बनकर हर बात की खबर उन्हें देने लगा था ।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@
 
मोना चौधरी और सतपाल ने उसकी सारी बातें सुनी ।

सारी स्थिति उनके सामने स्पष्ट हो गई! !

शैतान का बेटा अब उनकी पहुच में था ।

उसका ठिकाना और उससे वास्ता रखती हर बात को जान चुके थे । उनकी नज़रे मंगलू के चेहरे पर टिकी हुई थी ।

मंगलू उखडा-सा गभीर-सा था ।

" अगर तुम हम पर भरोसा रखकर चलो तो कामिनी फिर से तुम्हें मिल सकती है ।" सतपाल बोला ।

"झूठी बात कहकर तुम !"

"मैं सच कह रहा हूं।"

"तुम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सक्से । शैतान है । वो. .!"

“काम थोड़ा कठिन अवश्य है, तुम्हारा साथ मिले तो शायद हम कुछ कर गुज़रे ।" सतपाल _ने गंभीर स्वर में कहा ।

"मेरा साथ?”

"हां।"

"इससे ज्यादा और क्या साथ दे सकता हूं कि उसके बारे में तुम्हें सब कुछ बता दिया है ।" मंगलू बोला ।।

" थोड़ा सा और साथ !"

" वो कैसे?"

मोना चौधरी ने सतपाल के चेहरे पर नजर डाली ।

सतपाल मंगलू से बोला ।

"वो चाकू कहां है?”

"चाकू?" मंगलू की आंखें सिकुड्री ।

"वो ही चाकू जिसकी सहायता से शैतान का बेटा अपने शरीर में पहुंचकर जीवित हो उठा था ।"

"उस चाकू का तुम क्या करोगे?"

"पहले तुम मेरी बात का जवाब दो ।"

"मैं नहीं जानता, मैंने उस चाकू को दोबारा नहीं देखा, ।" मंगलू ने कहा ।

"शैतान के बेटे के पास तो देखा होगा?"

" नहीँ नहीं देखा ।"

सतपाल के होंठ भिंच गए ।

" क्या तुम उस चाकू की तलाश कर सकते हो?" सतपाल ने पूछा ।

"में अब वहां नहीं जाना चाहता ।"

"वो चाकू हासिल करना हमारे लिए बहुत जरूरी है ।" सतपाल ने अपने शब्दों पर जोर देकर कहा !?

“क्यों ?"

" क्योकि उसी चाकू से शैतान के बेटे को मारा जा सकता है !"

"उसी चाकू से?”

"हां !"

"अजीब बात कह रहे हो तुम ।"

"बात अजीब हो सकती है, परंतु सत्य है । शैतान का बेटा शक्तियो का मालिक है । उसे उसके ही चाकू से मौत दी जा सकती है, अन्य चाकु , हथियार या गोली से भी वो नहीं मरेगा । इसलिए वो चाकु हर हाल में चाहिए ही चाहिए ।"

मंगलू सतपाल को देखता रहा ।

"मैं तुम्हें शैतान के बेटे से छुटकारा दिलने की आसान विधि बताता हू बोलूं क्या?"

“क्या?"

"तुम्हारे लिए ये आसान है, चुटकी में तुम इस काम को अंजाम दे सकते हो !" सतपाल की आवाज में तेजी आ गई थी-“उसकै चाकू से, दिन के वक्त में उसे आसानी से मार सकते हो । तुम्हारे लिए तो उस पर बार करना वहुत आसान होगा । बगल में बैठकर गद्दारी आसानी से की जा सकती है । तुम कर सकते हो?"

"तुम्हारा मतलब कि मैं-----मै भवतारा को चाकू मार दूं।” उसके होंठों निकला । "

सतपाल ने सिर हिलाया ।

"पागल हो बया, वो क्या चाकू से मरेगा…वो-वो.....!"

"हम पे विश्वास करके, तुम एक बार हमारा साथ दो ।" मोना चौधरी ने कहा ।

"नहीँ ।" मंगलू ने दृढता-भरे स्वर में कहा ।

"ये आसान काम है तुम्हारे लिए…तुम उसे....!"

“ मै......मैं उसे नहीं मार सकता ।" मंगलू के स्वर में कम्पन उभरा----"तुम लोगों ने उसका असली रूप नहीं देखा । वो दरिन्दे से भी भयानक है । वो इंसान नहीं, सच में दरिन्दा है, मैं . .मैं उसे मारने की सोच भी नहीं सकता ।" पल-भर के लिए मंगलू कांप उठा था ।

मोना चौधरी और सतपाल की नजरे मिली ।

“ठीक है । तुम उसे मत मारो ।" मोना चौधरी ने कहा-"परंतु हमारा साथ तो दे सकते हो?"

मोना चौधरी ने पहलू बदला ।

" शैतान के बेटे का चाकू तलाश करो वो हमें दे दो !" मोना चौधरी ने कहा ।।

" तुम क्या करोगे ?"

"हम मारेगें उसे !"

"तुम ?"

" हां , किसी को तो ये काम करना ही है । तुम न सही , हम करेंगे ये काम ?" मोना चौधरी बोली ।।

मंगलू मोना चौधरी की और देखने लगा ।
 
"वो नहीं मरेगा और बाद में सारी मुसीबत मेरे सिर पर आ जाएगी । वो समझ जाएगा कि मैंने तुम लोगों की सहायता की है ।" कहते हुए मंगलू ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी------" वो मेरी जान ले लेगा । मुझें मार देगा !"

"ऐसा कुछ नहीं होगा ।" सतपाल ने कहा……" दिन के उजालै में वो आम इंसान की तरह कमजोर और साधारण इंसान हैं। उसकी शैतानी शक्तियां अंधेरे में जागती हैं-. हम दिन में आसानी से उसे घेरकर मार सकते हैं । तुम हम पर भरोसा रखो ।" मंगलू जरूरत से ज्यादा बेचैन हो उठा था ।।

" मैं खामखाह इस मामले में फंस गया । वो मुझें पैसा देगा, इसलिए. .उसका काम किया और अब !"

"हमारा साथ देकर तुम्हें कामिनी मिलेगी ।"

"लेकिन तुम उसे क्यों मारना चाहते हो?"

“यूं तो शैतानी शक्तियों से मेरी दुश्मनी हमेशा रही है ।" सतपाल दांत भीचकर बोला-----"परंतु अब शैतान के बेटे से मेरी व्यक्तिगत दुश्मनी हो गई है । कल रात उसने मेरे छोटे भाई की जान ली और उसका खून पीया । मैं उसे किसी कीमत पर नहीं छोडूंगा। अपने भाई की मौत का बदला उससे लेकर रहूंगा । उसकी मौत के साथ, वो सब बच जाएंगे, जो उसका शिकार बनेंगे भविष्य में । ये एक भलाई का काम है । हम इंसानों को कोई तो अच्छा काम करना चाहिए कि ऊपर जाकर हम बता सकें कि हमने क्या किया है ।"

मंगलू चुप हो गया ।

"तुम हमारा साथ देकर वहुत अच्छा करोगे ।" मोना चौधरी ने कहा ।

कई पलो तक वहाँ खामोशी छाई रही ।

तीनों बेचैनी से एक-दूसरे को देख रहे थे ।

" इसमें सोचने की क्या बात है जो इतना वक्त ले रहे हो !" मोना चौधरी धे खामोशी तोडी----"तुम शैतान के बेटे को मारने की हिम्मत नही रखते तो कोई बात नही ,ये काम हम करेंगे तुम हमे वो चाकू ला दो।"

"ठीक है ।" मंगलू सिंर नीचा किए अपने जूते को देखता कह उठा…"मैं उस चाकू को तलाश करूगा ।"

"वो जरूर चाहिए हमें।"

"भेरी पूरी कोशिश होगी कि मैं वो चाकू तुंम दोनों को लाकर दे सकूं !" मगंलू ने नजरे उठाई ।

" कब--कब करोगे ये काम?" सतपाल ने पूछा।

"आज शाम को !" मंगलू ने सोच-भरे स्वर में कहा----"अंधेरा होने के पश्वात वो शिकार के लिए चला जाता है !"

मोना चौधरी और सतपाल की निगाह मंगलू पर टिकी थी ।।

" और चाकू न मिला तो?" मंगलू पूछ बैठा ।

“क्यो नहीं मिलेगा वो चाकू वहीं है । तुम तलाश करोगे तो जरूर मिलेगा !" मोना चौधरी कह उठी ।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@

भवतारा और कामिनी वापस झोंपड़े पर पहुचे । कामिनी ने सामान के, ढेर सारे लिफाफे उठा रखे थे । उसके चेहरे पर खुशी ही खुशी फूट रही थी । भवतारा भी खुश था । आज बाजार में दोनों ने बहुत वक्त बिताया था । सोने का हार, कपड़े और कामिनी ने भरपेट पानी-पूरी खाई थी ।

सारा वक्त दोनों हंसी-मजाक करते रहे, बाते करते रहे थे ।

बसन्ती बाहर ही दीनू के पास बैठी थी । दीनू प्रेस कर रहा था ।

"आओ जंबाई बाबू !" बसन्ती मुस्कराकर बोलि--" तुम्हें खुश देखकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है ।"

" मां , आज मैने पेट-भर कर गोल-गप्पें खाए ।" कामिनी खुशी से बोली ।।

"जंबाई बाबू ।" बसन्ती कामिनी के हाथों में ढेर सारे लिफाफे देख कर कह उठी----" तुम तो हमारे घर को भरे जा रहे हो !"

भवतारा मुस्कराया ।

"मां! आज़ एक और सोने का हार खरीदा । चार सूट मैंने अपने लिए !"

"और मेरी पीले रंग की बनारसी साडी?"

“वो भी लाई हूं!"

"अब तो तेरे को चैन मिल गया होगा भाग्यवान !" दीनू बोल पड़ा । बसन्ती ने दीनू को घूरा, दीनू उधर को देखने लगा ।

"जंवाई बाबू !" बसन्ती प्यार से कह उठी-----"ये खरीददारी तों सारी उम्र होती रहेगी । मेरी मानो तो शादी कर लो !"

"परसों हम शादी को लेगे ।" भवतारा ने कहा ।

"कल क्यों नहीं, जो काम निबट जाए, वो ही अच्छा है” बसन्ती ने हाथ हिलाकर कहा ।

"परसो का दिन अच्छा है ।"

"कोई बात नहीं जवाई बाबू! परसों ही सही ।" दीनू ने कहा…"एक दिन में क्या फर्क पड़ता है?”

" हा-हा !" बसन्ती ने सिर हिलाया-…" एक दिन में क्या फर्क पड़ता है ।"

"कामिनी को मै मंदिर ले जा रहा हूं । एक घंटे बाद आ जाएगी ये ।" भवतारा ने कहा ।

"हां-हां, क्यों नहीं! तेरी ही तो है कामिनी । ले जा-एक क्या दो घंटे भी हो जाए तो कोई बात नहीं।"

दीनू ने बसन्ती को घूरा ।

कामिनी ने सारे लिफाफे बसन्ती के पास रखे और बोली ।

"मैं मंदिर होकर आती हूं !" भवतारा और कामिनी चले गए ।

दीनू जल्दी से कहं उठा ।

" ये तूने क्या किया?"

" क्यो बूढे, क्या कर दिया मैने? तेरे को तो हर बक्त मैरे मेँ खोट नजर आती है ।"

" कामिनी को उसके साथ नहीं भेजना चाहिए था ।"

" क्यों?”

" मंदिर में वो रहता है, उसका घर है इन दिनों मंदिर वहां बिस्तर भी होगा, कुछ कर लिया उन्होंने तो?”

“कर लिया? तो क्या हो गया, कर लिया तो, परसों तो वो कामिनी, के साथ शादी कर रहा है ।"

"अभी शादी की तो नहीं ।"

"हो जाएगी, तू क्यों मरा जा रहा है? कुछ कर लिया तो भी क्या फ़र्क पड़ता है, इतना सामान लाकर दिया है उसने ।"

“सामान----तेरा मतलब कि ......!"

" तूने मेरे साथ शादी की, तों तेरे को पता था कि मैंने कुछ कर रखा है कि नहीं?”

"क्या?" दीनू अचकचाय् ।

"आज तक तेरे को कुछ पता चला?" बसन्ती हाथ हिलाकर है बोली ।

"..क्या क्या पंता लगा?”

"रहने दे बूढे! बसन्ती कामिनी का लाया सामान समेटकर उठते हुए बोली----"मेरा मुह बंद ही रहने दे । मुह खुल गया तो धोती पकड़कर इधर-- भागता फिरेगा । ढक्कन लगा ही रहने दे !"

बसन्ती सामान के साथ झोंपडी में चली गई ।

दीनू मुँह खोले अभी तक खडा था ।।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@
 
भवतारा और कामिनी मंदिर कें गेट के भीतर प्रवेश कर गए ।

शैतानी हवा कामिनी को अपने घेरे में ले चुकी थी ।

इसलिए वहाँ मौजूद लोग भवतारा की तरह कामिनी को भी… नहीं देख पा रहे थे ।

दोनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ रखा था ।

"मेरा हाथ छोडो, वो पुजारी आ रहा है ।" कामिनी कह उठी-----"मुझे जानता है, वो क्या सोचेगा!"

" कुछ नहीं सोचेगा ।"

" छोडो भी ।"

परंतु भवतारा ने उसका हाथ नहीं छोडा । दोनों आगे बढते रहे ।।

पुजारी पास से गुजर गया । पुजारी ने मुझे देखा क्यों नहीं? मैं तो हमेशा उसे हाथ जोड़ती हूं ।"

"वो जल्दी में था। इसलिए नहीं देख पाया ।"

दोनों मंदिर के बरामदे की के पास पहुंचकर ठिठके ।

“ये दीवार के पास क्यो रुक गये !" कामिनी ने भवतारा को देखा । भवतारा ने दीवार का एक हिस्सा अंगूठे से दबाया तो दीवार बीच में से इतनी सरक पाई कि एक-एक करके दोनों भीतर प्रवेश कर सके ।

कामिनी हैरान रह राई ।

"ये क्या?"

"आओ !" भवतारा कामिनी का हाथ पकडकर भीतर प्रवेश कर गया । भवतारा ने भीतरं से खूटी घुमाई तो दीवार वापस आ गई । कामिनी अचरर्ज से वहां दीवार पर हर तरफ़ नजरे दौड़ाती कह उठी ।

"ये कैसी जगह हैँ?"

"यहां रहता हूं मै ।"

"तभी तुम्हें कभी बाहर नहीं देखा । ये तो बहुत अच्छी जगह है ।" कामिनी खुशी से कह उठी ।

"परसो हम शादी कर लेगे । उसके बाद तुम यही रहा करोगी !"

“लेकिन तुमने तो कहा था कि बंगला. !"

"वो भी लेगे, परंतु पहले कुछ वत्त यहीँ पर रहेंगे ।" भवतारा ने प्यार-भरे स्वर में कहा ।

"'मैं तो तुम्हारे साथ यहां भी सारी उम्र बिता सकति दूंगी।"

"आओ, मै तुम्हें सारी जगह द्विखा दूं।”

उसके बाद भवतारा ने कामिनी का हाथ पकड़े उसे नीचे, ऊपर सारी जगह दिखाई ।।

कामिनी मुस्कराकर भवतारा को देखने लगी।

“क्या देख रही हो?” भवतारा ने उसका हाथ पकडा ।

" अपने पति को देख रही हूं और सोच रही हूं कि परसों ब्याह करके यहां पर आ जाऊंगी ।"

"व्याह तो बहाना है, तुम तो अभी भी मेरे दिल में बसती हो ।"

"इतना प्यार करते है मुझसे !"

"इससे भी ज्यादा, तुम्हें दिखा नहीं सकता बता नहीं सकता, मेरा प्यार असीमित है ।"

"मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करती हूं।”

एकाएक भवतारा ने अपनी दोनों बांहें फैला दीं ।

"आओ कामिनी, मेरी बाहों में समा जाओ ।"

कामिनी का चेहेंरा शर्म से सुर्ख-सा हुआ । नजरे झुका ली ।

"ठहरो मत, आ जाओ, मैं अपनी बांहों में ले लेना चाहता हूं !"

"अभी नहीं ।" कामिनी खिलखिलाकर पीछे हटी…“शादी के बाद ।"

भवतारा ने बांहें नीचे कर ली और कामिनी को देखने लगा ।

"नाराज हो गए ।" एकाएक कामिनी जल्दी से बोली…"ऐसा है तो मैं तुम्हारी बांहों मैं आ जाती दूंगी।”

" मै नाराज-नहीं हुआ । तुमसे नाराज हो ही नहीं सकता ।" भवतारा मुस्करा पडा…"मुझे तुम्हारी वात अच्छी लगी कि शादी के बाद . . . ।"

कामिनी खिलखिला उठी ।

“तुम वहुत अच्छे हो ।" कामिनी ने प्यार से कहा ।

दोनों गोल कमरे में आ बैठे और प्यार-भरी बाते करने लगे । अपनी कहने लगे, दूसरे की सुनने लगे ।

कभी हाथ पकड़ते तो कभी एक दूसरे के कंधे पर सिर रखते ।

कितना वक्त बीता, पता ही न चला ।
 
एकाएक भवतारा के शरीर में ऐठन ने उछाल मारी ।

भवतारा फौरन सतर्क हो गया । वो उठा और वेहद शांत स्वर में कह उठा ।

"अब जाओं कामिनी, वक्त वहुत हो गया है, तुम्हारे माता-पिता इंतजार कर रहे होंगे ।"

"ये अचानक तुम्हें क्या हो गया ?" कामिनी ने-भवतारा को देखा । बहुत जरूरी काम याद आ गया है । जाना होगा मुझे ।" भवतारा ने मुस्कराने की चेष्टा की ।

“तुमने तो मुझे चाय भी नहीं मिलाई ।" कामिनी हंसी-“भूल गए ।"

" हां ! भूल ही गया, कल पिलाऊगा, अब तुम जाओ ।" भवतारा ने गंभीर स्वर में कहा ।

" आज रात तुम हमारे यहां खाना खाओ ।"

"तुम जाओ, मुझे जल्दी जाना है ।"

"ठीक है, तुम मुझे भगाना चाहते हो तो चली जाती दूंगी। कल तो मिलोगे ना !"

" हां !"

" कब ?"

"आज के वत्त ही-तुम्हारे पास आऊंगा ।"

"पानी पूरी भी खिलाओगे?"

भवतारा के शरीर में पुन: ऐठन उठी । उसके भीतर छिपा शैतान दरिन्दा जैसे बाहर आने को तेयार था !!

"चली जाओ, मुझे देर हो रही है ।" भवतारा के लहजे में इस बार कुछ खुरदरापन उभरा और आगे बढकर उसने बाहर जाने का रास्ता खोला ।।

प्यार में डूबी कामिनी ने उसके खुरदरे स्वर पर ध्याध न दिया और बाहर निकल गई ।

भवतारा ने दरवाजा बंद किया और लम्बी सास ली ।। अब वो स्वयं भी शिकार के लिए बाहर चला जाना चाहता था ।

उसी पल वहां मद्धिम-स्री आवाज उभरी ।

"भवतारा !"

"ओह गुरुदेव!" भवतारा के होंठों से निकला ।

"आज कामिनी बच गई । वो चली गई, वरना कुछ उर देर होने पर बो तेरा भोजन वन सकती थी !"

"वक्त का ध्यान नहीं रहा मुझे ।"

"शादी के बाद भी एक दिन ऐसा अएगा कि तेरे को वक्त का ध्यान नहीं रहेगा और कामिनी तेरी खून की प्यास वुझाएगी ।"

भवतारा के चेहरे पर कटोरता आ गई।

" ऐसा कभी नहीं होगा ।"

" ऐसा होगा भवतारा, अवश्य होगा । एक दिन कामिनी के खून से ही तू अपनी प्यास बुझाएगा ।"

" ऐसी फाते करके आप मुझे कीमिनी से दुर कर देना चाहते है !! भवतारा ने तीखे स्वर में कहा ।

" मैंने तेरे को हकीकत का नजारा करवा रहा हुँ।"

"ये झूठी हकीकत है ।"

"तेरे इनकार करने से सच, झुठ तो नहीं बन जाएगा भवतारा !"

गुरूदेव की आवाज उसके कानों पड्री ।

भवतारा के दांत भिंच गए ।

"मेरे भोजन का समृय हो रहा है 'गुरुदेव, !" भवतारा के होंठो है से गुर्राहट निकली !

"में जानता हू कि अभी तू सब्र रख सकता है । कुछ वक्त यूं ही बिता सकता है ।"

"क्या आप कोई बात करना चाहते हैं?"

" हां !"

"बात कल भी हो सकती है ।"

"मैं अभी करना चाहता दूंगी। मेरे पास इतना वक्त नहीं कि बार-बार तेरे पास आ सकू । मैं तो कब से इस इंतजार में खडा था कि कामिनी तेरे पास से जाए तो तेरे से बात करू ।" गुरुदेव की आवाज बेहद शति थी ।

"बात कहिए ।"

“कामिनी को छोड दे ।”

"फिर वहीँ बात ।" भवतारा और भी गुस्से से भर उठा ।

"तू नहीँ मानेगा तो मुझें दोबारा ही बात करने की जरूरत पडेगी । तू पहले मान जाता तो दोबारा क्यों आता?"

"आप चले जाइए।"

"बात करके चला जाऊंगा और दोबारा तेरे पास आऊंगा भी नहीं । तब तू जैसा करेगा, वेसा ही भरेगा ।"

"कामिनी मेरी जिन्दगी है ।"

" ये तेरे को लगता है, लेकिन कभी भी कामिनी तेरी मौत बन सकती है, क्योंकि तीन सौ साल की उम्र तक तेरे लिए स्त्री का संसर्ग है ही नहीं । शैतानी धर्म की परंपरा के खिलाफ मत चल भवतारा! "

"अभी मेरी उम्र कितनी है?"

"दो सौ नब्बे बरस ! स्त्री के लिए तेरे को दस बरस का इंतजार करना होगा ।"

"इसका मतलब कि दस बरस के लिए मैं कामिनी को अपने से दूर कर दू ।"

"ये ही मैं कहना चाहता हूं जो वस्तु ग्रहों में न हो, उसे पाने की चेष्टा करना भूर्खता है ।"

" आपने तो मुझे धर्मसंकट में डाल दिया है ।"

" इसी वक्त से अपने मन से कामिनी को दूर कर दे । बुरे वक्त का पता नहीं कब आ जाए । स्त्री तेरे पास आएगी तो तेरे ग्रह विपरीत दिशा में भड़केंगे । आज तू दिन-भर कामिनी के साथ रहा ये बात तेरे ग्रहों पर असर डालेगी। कुछ भी हो सकता है।"

भवतारा खामोश रहा ।
 
एकाएक भवतारा के शरीर में ऐठन ने उछाल मारी ।

भवतारा फौरन सतर्क हो गया । वो उठा और वेहद शांत स्वर में कह उठा ।

"अब जाओं कामिनी, वक्त वहुत हो गया है, तुम्हारे माता-पिता इंतजार कर रहे होंगे ।"

"ये अचानक तुम्हें क्या हो गया ?" कामिनी ने-भवतारा को देखा । बहुत जरूरी काम याद आ गया है । जाना होगा मुझे ।" भवतारा ने मुस्कराने की चेष्टा की ।

“तुमने तो मुझे चाय भी नहीं मिलाई ।" कामिनी हंसी-“भूल गए ।"

" हां ! भूल ही गया, कल पिलाऊगा, अब तुम जाओ ।" भवतारा ने गंभीर स्वर में कहा ।

" आज रात तुम हमारे यहां खाना खाओ ।"

"तुम जाओ, मुझे जल्दी जाना है ।"

"ठीक है, तुम मुझे भगाना चाहते हो तो चली जाती दूंगी। कल तो मिलोगे ना !"

" हां !"

" कब ?"

"आज के वत्त ही-तुम्हारे पास आऊंगा ।"

"पानी पूरी भी खिलाओगे?"

भवतारा के शरीर में पुन: ऐठन उठी । उसके भीतर छिपा शैतान दरिन्दा जैसे बाहर आने को तेयार था !!

"चली जाओ, मुझे देर हो रही है ।" भवतारा के लहजे में इस बार कुछ खुरदरापन उभरा और आगे बढकर उसने बाहर जाने का रास्ता खोला ।।

प्यार में डूबी कामिनी ने उसके खुरदरे स्वर पर ध्याध न दिया और बाहर निकल गई ।

भवतारा ने दरवाजा बंद किया और लम्बी सास ली ।। अब वो स्वयं भी शिकार के लिए बाहर चला जाना चाहता था ।

उसी पल वहां मद्धिम-स्री आवाज उभरी ।

"भवतारा !"

"ओह गुरुदेव!" भवतारा के होंठों से निकला ।

"आज कामिनी बच गई । वो चली गई, वरना कुछ उर देर होने पर बो तेरा भोजन वन सकती थी !"

"वक्त का ध्यान नहीं रहा मुझे ।"

"शादी के बाद भी एक दिन ऐसा अएगा कि तेरे को वक्त का ध्यान नहीं रहेगा और कामिनी तेरी खून की प्यास वुझाएगी ।"

भवतारा के चेहरे पर कटोरता आ गई।

" ऐसा कभी नहीं होगा ।"

" ऐसा होगा भवतारा, अवश्य होगा । एक दिन कामिनी के खून से ही तू अपनी प्यास बुझाएगा ।"

" ऐसी फाते करके आप मुझे कीमिनी से दुर कर देना चाहते है !! भवतारा ने तीखे स्वर में कहा ।

" मैंने तेरे को हकीकत का नजारा करवा रहा हुँ।"

"ये झूठी हकीकत है ।"

"तेरे इनकार करने से सच, झुठ तो नहीं बन जाएगा भवतारा !"

गुरूदेव की आवाज उसके कानों पड्री ।

भवतारा के दांत भिंच गए ।

"मेरे भोजन का समृय हो रहा है 'गुरुदेव, !" भवतारा के होंठो है से गुर्राहट निकली !

"में जानता हू कि अभी तू सब्र रख सकता है । कुछ वक्त यूं ही बिता सकता है ।"

"क्या आप कोई बात करना चाहते हैं?"

" हां !"

"बात कल भी हो सकती है ।"

"मैं अभी करना चाहता दूंगी। मेरे पास इतना वक्त नहीं कि बार-बार तेरे पास आ सकू । मैं तो कब से इस इंतजार में खडा था कि कामिनी तेरे पास से जाए तो तेरे से बात करू ।" गुरुदेव की आवाज बेहद शति थी ।

"बात कहिए ।"

“कामिनी को छोड दे ।”

"फिर वहीँ बात ।" भवतारा और भी गुस्से से भर उठा ।

"तू नहीँ मानेगा तो मुझें दोबारा ही बात करने की जरूरत पडेगी । तू पहले मान जाता तो दोबारा क्यों आता?"

"आप चले जाइए।"

"बात करके चला जाऊंगा और दोबारा तेरे पास आऊंगा भी नहीं । तब तू जैसा करेगा, वेसा ही भरेगा ।"

"कामिनी मेरी जिन्दगी है ।"

" ये तेरे को लगता है, लेकिन कभी भी कामिनी तेरी मौत बन सकती है, क्योंकि तीन सौ साल की उम्र तक तेरे लिए स्त्री का संसर्ग है ही नहीं । शैतानी धर्म की परंपरा के खिलाफ मत चल भवतारा! "

"अभी मेरी उम्र कितनी है?"

"दो सौ नब्बे बरस ! स्त्री के लिए तेरे को दस बरस का इंतजार करना होगा ।"

"इसका मतलब कि दस बरस के लिए मैं कामिनी को अपने से दूर कर दू ।"

"ये ही मैं कहना चाहता हूं जो वस्तु ग्रहों में न हो, उसे पाने की चेष्टा करना भूर्खता है ।"

" आपने तो मुझे धर्मसंकट में डाल दिया है ।"

" इसी वक्त से अपने मन से कामिनी को दूर कर दे । बुरे वक्त का पता नहीं कब आ जाए । स्त्री तेरे पास आएगी तो तेरे ग्रह विपरीत दिशा में भड़केंगे । आज तू दिन-भर कामिनी के साथ रहा ये बात तेरे ग्रहों पर असर डालेगी। कुछ भी हो सकता है।"

भवतारा खामोश रहा ।
 
"मैं दोबारा तेरे को समझाने कभी न आता, परंतु तैरे पिता ने मज़बूर किया कि तुम्हें पुन: समझाऊ ।"

" वो क्यों नहीं आए !"

"अभी धरंती पर उनका आना सम्भव नहीं । र्वो सबसे वड़े शैतान है और शैतानी धर्म का पूरी तरहे सम्मान करते हैं ।"

"गुरुदेव-कोई रास्ता निकालिए कि कामिनी को मैं अपना सकू ।"

"अपने भले की, बात सुनना चाहता है !"

"हाँ ।"

“कामिनी को मंगलू के हवाले कर दो । वो मंगलू है लायक हैं, तू अपने को स्त्री से दुर कर ले ।"

“मेरा दिल तोड़ने वाली बात कह रहैं है आप !" भवतारा तड़पं उठा ।

"अगर तूने मेरी बात नहीं मांनी तो जो नुकसान होगा उसकी जिम्मेदारी तेरे पर ही आएगी !"

"क्या नुकसान होगा ?"

" मैं भी नहीं जानता भवतारा, लेकिन इतना सच है कि स्त्री का करीब पाते ही तू नुकसान में धिर जाएगा । अभी भी सब ठीक हो सकता है, अगर तू कामिनी की इच्छा को अपने मन से निकाल दे ?" गुरूदेव की आवाज कानों में पडी ।

"इससे वहुत कष्ट होगा मुझे !"

"बड़ा कष्ट न हो, इसलिए छोटा कष्ट खुशी-खुशी सह ले । तेरे को समझाकर मैंने अपना फर्ज पूरा किया ।"

भवतारा खामोश रहा ।

"मंगलू मंदिर में आ रहा है, उसे कह दे कि कामिनी उसकी है तो वो खुश हो जाएगा तू भी नुकसान से बच जाएगा । मैं जा रहा हूं , अब नहीं आऊंगा तेरे को समझाने ।" इसके साथ ही गुरुदेव की आवाज आनी बंद हो गई ।

भवतारा होंठ भीचे खड़ा रहा ।

चेहरे पर परेशनी नाच रही थी ।

सच बात तो ये थी कि वो समझ नहीं पा रहा था, कि गुरुदेव की बात माने या दिल की बात माने?

कामिनी कै अपने से दूर करने की बात सोचकर ही उसका दिल डूबने लगता था ।

कहाँ वो अभी सोच रहा था कि परसों कामिनी से शादी करेगा । कहाँ अब मंन में ये चल रहा था कि कामिनी को हमेशा के लिए अपने से दूर करें या नहीं?

तभी सामने की दीवार एक तरफ़ सरकी और मंगलूं ने प्रवेश किया । भवतारा को सामने देखते ही ठिठका और सामान्य स्वर में कह उठा ।

यहाँ देखकर मुझे अजीब-सा लग रहा है । बाहर तो कब का अंधेरा हो चुका है ।। मैने सोचा तुम यहां नही होगे !"

भवतारा के शरीर में ऐठन उठी । अपने पर काबू पाया उसने ।

" जाऩे ही वाला था ।” भवतारा ने मुस्कराकर कहा…"तुम चलोगे साथ मे ?"

" आज तो मैं वहुत थक गया हूँ।" मंगलू गहरी सांस लेकर बोला---" कल अवश्य तुम्हारे साथ चलूंगा ।"

“तुम कल भी मेरे साथ नहीं गए?"

" कल से पक्का जाया करूंगा, आज सारा दिनं घूमता रहा ।" मंगलू मुस्कराया --- " पहले तुम्हारे साथ घूमा करता था, परंतु अब

तुमने दिन का वक्त कामिनी के साथ बिताना शुरू कर दिया तो मैँ अकेला क्या करूं, इसलिए दिन-भर घूमता रहा ।"

भवतारा मुस्कराया ।

“तुमने आने में देर करदी ।"

" देर ----- मै समझा नही ?"

"कुछ देर पहले आ जाते तो कामिनी से तुम्हारी मुलाकात हो जाती !" भवतारा ने हंसकर कहा ।

"कामिनी यहाँ आई थी?" मंगलू के होंठों से निकला ।।

"वै यहीं थी दिन भर ।"

भवतारा को देखता रहा ।

" परसो हम व्याह कर रहे हैं ।"

" बधाई हो ।" मगलू चेहरे पर जबरन मुस्कान लाया ।

" सुनकर तुम्हें अच्छा तो नहीं लगा होगा?"

"मुझें बुरा क्यों लगेगा?" मंगलू ने लापरवाही से कहा---तुम राजी, कामिनी राजी, किर तो शादी हो ही जानी चाहिए ।"

" तुम आओगे शादी में?"

" हां, क्यों नहीं आऊंगा।।” मंगलू मुस्कराया----"शादी की सारी तैयारियां मैं ही तो करूंगा ।"

भवतारा के शरीर में ऐठन-भी उठी ।
 
"मैं बाहर जा रहा हूँ !" अवतारा ने कहा और दीवार की तरफ वढ़ गया । मंगलू उसे देखता रहा ।

खूंटी का इस्तेमाल करके, भवतारा बाहर निकला और दीवार अपनी जगह पर आ गई । मगलू दीवार को देखता रहा।

" कामिनी से परसों व्याह करेगा भवतारा?" बहुत बुरा लगा था मंगलू को ये सुनकर, परंतु वो कंर भी क्या सकता था । उन्हें रोक, तो नहीं सकता था, लेकिन एक कोशिश कर सकता था । मोना चौधरी औरे सतपाल का साथ देकर भवतारा को खत्म करने की चेष्टा तो कर सकता था । इसके लिए उन दोनों को भवतारा के उस चाकू की ज़रूरत थी । मंगलू तय कर चुका था कि ये काम करने के बाद वो यहाँ से भाग जाएगा, बेशक भवतारा मेरे या न मरे योंकि वो वच गया तो समझ जाएगा कि उसने ही गड़बड़ की है, इसलिए उसकी जान ले लेगा । मंगलू को शैतान के बेटे का चाकू तलाश करना होगा ।

वो जानता था कि अब भवतारा आधी रात से पहले नहीं लौटेगा । चाकू तलाश करने का ये सबसे बेहतरीन वक्त है और मगतू चाकू की तलाश में लग गया । दिल धडक रहा था, रह-रहकर आशका, मस्तिष्क में उठती कि कहीं भवतारा न आ जाए । उसने देख लिया तो उसे क्या कहेगा कि क्या तलाश कर रहा ।

रह-रहकर उसके कान खामखाह की आहट सुनते तो उसे बहम होता कि भवतारा लौट आया है ।

इसी घबराहट में वो पसीने से भरता जा रहा था ।

परंतु चाकू की तलाश में लगा रहा ।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@

चाकू नहीं मिला'।

मंगलू परेशान हो उठा । इस सारे काम में उसे दो घंटे लग गए थे । नीचे की सब जगह देख ली थि और ऊपर के दोनों कमरे भी । कहाँ रख दिया चाकू भवतारा ने?

भवतारा जब से जीवित हुआ, तब से चाकू उसने देखा भी नहीं था । एकाएक ठिठका । उसकी परेशानी को राहत मिली , ये सोचकर कि सबसे नीचे उन गुप्त कमरों तो देखा नहीं,

जहां लकडी के बक्से में भवतारा का शरीर पड़ा हुआ था । अतिम बार बाकू उसने वहीं देखा था, भवतारा के पेट में धंसे हुए।

वहीं होगा चाकू ! मंगलू जल्दी से उस कमरे में पहुचा, जहां से नीचे जाने के लिए सीढियां थी । रास्ता खुला हुआ था । मंगलू जानता था कि वत्त नहीं है, भवतारा कभी भी वापस आ सकता था । एक बारंगी तो उसका मन किया कि आज की अपेक्षा कल ही चाकू की तलाश करे, परंतु जैसे वो सारे काम को निबटा लेना चाहता था । उसके भीतर जल्दबाजी भर चुकी थी । मगलू जल्दी से सीढिया उतरा और नीचे वाले कमरे में जा पहुचा ।

यहां पहुंचते ही जैसे उसका दम-सा घुटा ।

कमरे में कम रोशनी का बल्ब जल रहा था । उस रोशनी में हर चीज नजर आ रही थी, परंतु अस्पष्ट-सी । वहीं ठिठका मंगलू हर तरफ नजरे घूमाने लगा । धीरे धीरे उसकी आंखें कम रोशनी में देखने की अभ्यस्त होती जा रहीथीं।

मंगलू लकडी के बक्से के पास पहुंचा ।

वो खुला पड़ा था । बल्ब की रोशनी ठीक उसके भीतर तक पड रही थी । चाकू कहीं भी न दिखा, फिर भी उसने हाथ मारकर भीतर की जगह अच्छी तरह चेक की । कोई फायदा न हुआ ।

आखिर कहां गया चाकू? मगलू पलटा । उसी पल उसके पैर से कोई चीज टकराई तो उसने फौरन नीचे देखा ।

पैर से टकराने बाली चीज 'चाकू' ही था ।

वो नीचे पड़ा था ।

चाकू को पहचानते ही मगलू का दिल धडक उठा । वो फौरन नीचे झुका और चाकू उठा लिया । खुला हुआ था बो चाकू । चाकू क्रो देखते, हुए मगलू का दिल धाड़-धाड़ बज रहा था । मोना चौधरी और सतपाल इसी चाकू को तो माग रहे थे । उसने जल्दी से चाकू क्रो बंद करके जेब में डाला और आगे वढ़कर सीढियां तय करके ऊपर पहुचा ।

चाकू मिल गया था । काम हो गया था ।
 
Back
Top