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“यहां भले ही चीन की समुद्गी सीमा नहीं है, लेकिन तुम शायद नहीं जानते कि चीन ने अपना एक बड़ा नौसैनिक अड्डा ग्वादर ने वना रखा है, जो कि करांची में ही आता है । सामने की तरफ़ से थोड़ा अागे बढ़ते ही ग्वादर के इलाके की सीमा शुरू हो जाती है, जहाँ चीन की सशक्त नेवी पूरी तैयारी के साथ बैठी हुई है और जो पलक झपकते ही हमारे पोत को तबाह करने की ताकत रखती है । तीसरी तरफ़ से फिर करांची की सीमा शुरू हो जाती है, वहां तैनात नापाक की गश्ती बोटे यहां से भी नजर आ सकती हैं ।"
वे बातें मुस्तफा भी सुन रहा था और उसके खून से सने होंठों पर एक कुटिल मुस्कराहट उभर आई थी ।
“हूं !" होलकर ने गम्भीरता से हुंकार भरी-यह तो हमारी सोच से भी ज्यादा सेंसेटिव जोन है । दुश्मनों ने काफी सोच-समझकर जगह चुनी है ।“
"अब मेरे लिए क्या हुक्म है?” कैप्टन ने पूछा ।
“लंगर डाल दो और अगले आदेश का इंतजार करो ।"' ।
"ठीक है ।”
“और जहाँ तक भी देख सकते हो, हर तरफ़ बेहद पैनी निगाह से देखो । हमे एक पल के लिए भी असावधान नहीं होना है ।"
“बेहतर ।"
कैप्टन जाने को मुड़ा ही था कि होलकर का सेटेलाइट फोन ब्लिंक करने लगा । होलकर कैप्टन से कहा------" जरा ठहरो कैप्टन ।"'
कैप्टन ठिठका और उत्सुक निगाहों से होलकर को देखने लगा ।
होलकर ने फोन अॉन किया ।
"उधर क्या चल रहा है आफिसर?” कान से आईबी चीफ़ बलवंत राव का अधिकार भरा स्वर टकराया।
“सब ठीक है चीफ़ ।" होलकर सावधान स्वर में बोल----" हम मंजिल पर पहुच चूके हैं ।"
"हम देख रहे हैं ।" बलवंत राव बोला----"शिप हर पल हमारे रडार पर है । तुम विल्कुल सही वक्त पर मंजिल पर पहुंचे हो । मगर सावधान रहना, वह हमारी समुद्गी सरहद का बहुत सन्वेदनशील इलाका है । तुम्हारे शिप पर पाकिस्तान के साथ…साथ चीन की भी नजरें लगी हैं । कोई गलती मत कर बैठना । सब कुछ वैसे ही होना चाहिए जैसे प्लान किया गया है ।"
“आप चिंता न करें सर । सब कुछ बिल्कुल वैसे ही हो रहा है लेकिन अब अागे क्या करना है?"
"जाहिर है कि इंतजार ही करना होगा । अच्छे मूवमेंट को लेकर दूसरी तरफ़ से अभी कोई मैसेज नहीं मिला है । जैसे ही मिलेगा तुम्हें फारवर्ड कर दिया जाएगा लेकिन एक बात अच्छी तरह से अपने दिमाग में बैठा लो, जब तक तुम्हें चांदनी मेडम नहीं दिखती, तुम्हें दुश्मन को मुस्तफा का दीदार हरगिज नहीं कराना है । अगर चांदनी हमारी कमजोरी है तो मुस्तफा दुश्मन की कमजोरी है । जैसे हम चांदनी की जान को जोखिम में नहीं डाल सकते बैसे ही दुश्मन मुस्तफा की जान को जोखिम में नहीं डाल सकता । समझे?"
" यस सर ।"
"तुम्हें जरा भी फिक्रमंद होने की जरूरत नहीं है । अगर तुम्हारा शिप दुश्मन के निशाने पर है, तो हमने भी आंखें बंद नहीं कर रखी हैं । हमारे सेटेलाइट भी हर तरफ़ अपनी गिद्ध---दृष्टि जमाए हुए हैं । मजबूरी वश बात अगर ताकत और मुकाबले पर जाएगी तो दुश्मन मुंह की खाएगा । मजे की बात यह है कि दुश्मन इस सच को जानता है और शायद इसीलिए वो नौबत नहीं आएगी । ओवर ।"
" आलराइट सर ।"
"ओवर एंड आल ।"
फोन डिस्कोक्ट हो गया ।
होलकर ने फोन कान से हटा लिया ।
कैप्टन अपलक उसे ही देख रहा था ।
“हम थोडी देर में डेक पर पहुच रहे है ।" होलकर उससे बोला-----" तुम हमें वहीं मिलो ।"
कैप्टन ने सहमति में सिर हिलाया ।
फिर वह वापस घूमा और वहां से चला गया ।
मुस्तफा जख्मी सांप की तरह अपनी सुर्ख आंखों से होलकर और रत्नाकर को देख रहा था । इधर, होलकर और रत्नाकर की नजरें मिलीं । आंखों ही आंखे में बाते हुईं और फिर वे मुस्तफा से दूर, एक एकांत कोने में चले गए ।
" हम दोनों ही अपने वतन के वफादार सिपाही है अॉफिसर ।" रत्नाकर दबे स्वर में होलकर से बोला----“ओंर यह जरूरी नहीं कि वतन का वफादार हुकूमत का भी वफादार हो ।"
"कहना क्या चाहते हो देशपांडे ?" होलकर ने पूछा ।
“मुस्तफा सिर्फ दहशतगर्द नहीं, एक डायनामाइट है । इसके दिल में हिंदुस्तान के लिए नफ़रत नहीं, जहर भरा है, घृणा भरी है । अगर यह आजाद हो गया, तो देख लेना, मुल्क में दहशतगर्दी का ऐसा भयानक अंधड़ उठेगा, जो बेगुनाहों के खून से हमारे वतन की जमीन को सुर्ख कर देगा ।"
होलकर कसमसाया…""म. . .मैं जानता हूं !”
"जानते हो, फिर भी सरकार के वफादार बनकर दिखा रहे हो ।" रत्नाकर हैरान हुआ था ।
“दूसरे शब्दों से मुझे बगावत की बू नज़र आ रही है देशपांडे ।"
" सूंघा तुमने ?"
"मुझसे क्या चाहते हो?"
“क्या मेरी चाहत पूरी होगी?"
"चाहत जानने के बाद ही बता पाऊंगा ।"
"तो फिर सुनो ।" रत्नाकर निर्णायक स्वर में बोला-----'"यह खूनी दरिंदा यहाँ से जिंदा वापस नहीं जाना चाहिए ।"
"चांदनी मैडम की कीमत पर भी नहीं?" उसने पूछा !
"चांदनी सिंह को बचाने की पूरी कोशिश करेगे ।”
"हम इस वक्त वहुत खतरनाक जगह पर खड़े है ।”
"आईबी के आंफिसर होकर जोखिम से डरते हो!"
"डरना तो हमें सिखाया ही नहीं जाता ।”
"तो फिर तुमने कहाँ से सीख लिया ।"
"मैँ डर नहीं रहा देशपांडे बल्कि सोच रहा हूं कि जो हम करना चाहते हैं उसके बाद दोनों मुल्कों में कितना बडा़ बवंडर उठेगा !"
"उसके बारे में मत सोचो ! अपना फैसला बताओ ।”
“वही, जो तुम चाहते हो?"
"साफ-साफ़ बताओ ।"
"मुस्तफा जिंदा नहीं जाएगा ।"
।
रत्नाकर का चेहरा हजार बांट के बल्ब की तरह चमक उठा ।
वह खुशी से चहकता हुआ बोला.........…“ये हुई न बात । मगर...........
"मगर ?"
"होग कैसे ये ?"
होलकर बोला…....“मेरे दिमाग में प्लान है ।"
"क्या ?"
"वक्त आएगा तो बता दूगां ।"
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वे बातें मुस्तफा भी सुन रहा था और उसके खून से सने होंठों पर एक कुटिल मुस्कराहट उभर आई थी ।
“हूं !" होलकर ने गम्भीरता से हुंकार भरी-यह तो हमारी सोच से भी ज्यादा सेंसेटिव जोन है । दुश्मनों ने काफी सोच-समझकर जगह चुनी है ।“
"अब मेरे लिए क्या हुक्म है?” कैप्टन ने पूछा ।
“लंगर डाल दो और अगले आदेश का इंतजार करो ।"' ।
"ठीक है ।”
“और जहाँ तक भी देख सकते हो, हर तरफ़ बेहद पैनी निगाह से देखो । हमे एक पल के लिए भी असावधान नहीं होना है ।"
“बेहतर ।"
कैप्टन जाने को मुड़ा ही था कि होलकर का सेटेलाइट फोन ब्लिंक करने लगा । होलकर कैप्टन से कहा------" जरा ठहरो कैप्टन ।"'
कैप्टन ठिठका और उत्सुक निगाहों से होलकर को देखने लगा ।
होलकर ने फोन अॉन किया ।
"उधर क्या चल रहा है आफिसर?” कान से आईबी चीफ़ बलवंत राव का अधिकार भरा स्वर टकराया।
“सब ठीक है चीफ़ ।" होलकर सावधान स्वर में बोल----" हम मंजिल पर पहुच चूके हैं ।"
"हम देख रहे हैं ।" बलवंत राव बोला----"शिप हर पल हमारे रडार पर है । तुम विल्कुल सही वक्त पर मंजिल पर पहुंचे हो । मगर सावधान रहना, वह हमारी समुद्गी सरहद का बहुत सन्वेदनशील इलाका है । तुम्हारे शिप पर पाकिस्तान के साथ…साथ चीन की भी नजरें लगी हैं । कोई गलती मत कर बैठना । सब कुछ वैसे ही होना चाहिए जैसे प्लान किया गया है ।"
“आप चिंता न करें सर । सब कुछ बिल्कुल वैसे ही हो रहा है लेकिन अब अागे क्या करना है?"
"जाहिर है कि इंतजार ही करना होगा । अच्छे मूवमेंट को लेकर दूसरी तरफ़ से अभी कोई मैसेज नहीं मिला है । जैसे ही मिलेगा तुम्हें फारवर्ड कर दिया जाएगा लेकिन एक बात अच्छी तरह से अपने दिमाग में बैठा लो, जब तक तुम्हें चांदनी मेडम नहीं दिखती, तुम्हें दुश्मन को मुस्तफा का दीदार हरगिज नहीं कराना है । अगर चांदनी हमारी कमजोरी है तो मुस्तफा दुश्मन की कमजोरी है । जैसे हम चांदनी की जान को जोखिम में नहीं डाल सकते बैसे ही दुश्मन मुस्तफा की जान को जोखिम में नहीं डाल सकता । समझे?"
" यस सर ।"
"तुम्हें जरा भी फिक्रमंद होने की जरूरत नहीं है । अगर तुम्हारा शिप दुश्मन के निशाने पर है, तो हमने भी आंखें बंद नहीं कर रखी हैं । हमारे सेटेलाइट भी हर तरफ़ अपनी गिद्ध---दृष्टि जमाए हुए हैं । मजबूरी वश बात अगर ताकत और मुकाबले पर जाएगी तो दुश्मन मुंह की खाएगा । मजे की बात यह है कि दुश्मन इस सच को जानता है और शायद इसीलिए वो नौबत नहीं आएगी । ओवर ।"
" आलराइट सर ।"
"ओवर एंड आल ।"
फोन डिस्कोक्ट हो गया ।
होलकर ने फोन कान से हटा लिया ।
कैप्टन अपलक उसे ही देख रहा था ।
“हम थोडी देर में डेक पर पहुच रहे है ।" होलकर उससे बोला-----" तुम हमें वहीं मिलो ।"
कैप्टन ने सहमति में सिर हिलाया ।
फिर वह वापस घूमा और वहां से चला गया ।
मुस्तफा जख्मी सांप की तरह अपनी सुर्ख आंखों से होलकर और रत्नाकर को देख रहा था । इधर, होलकर और रत्नाकर की नजरें मिलीं । आंखों ही आंखे में बाते हुईं और फिर वे मुस्तफा से दूर, एक एकांत कोने में चले गए ।
" हम दोनों ही अपने वतन के वफादार सिपाही है अॉफिसर ।" रत्नाकर दबे स्वर में होलकर से बोला----“ओंर यह जरूरी नहीं कि वतन का वफादार हुकूमत का भी वफादार हो ।"
"कहना क्या चाहते हो देशपांडे ?" होलकर ने पूछा ।
“मुस्तफा सिर्फ दहशतगर्द नहीं, एक डायनामाइट है । इसके दिल में हिंदुस्तान के लिए नफ़रत नहीं, जहर भरा है, घृणा भरी है । अगर यह आजाद हो गया, तो देख लेना, मुल्क में दहशतगर्दी का ऐसा भयानक अंधड़ उठेगा, जो बेगुनाहों के खून से हमारे वतन की जमीन को सुर्ख कर देगा ।"
होलकर कसमसाया…""म. . .मैं जानता हूं !”
"जानते हो, फिर भी सरकार के वफादार बनकर दिखा रहे हो ।" रत्नाकर हैरान हुआ था ।
“दूसरे शब्दों से मुझे बगावत की बू नज़र आ रही है देशपांडे ।"
" सूंघा तुमने ?"
"मुझसे क्या चाहते हो?"
“क्या मेरी चाहत पूरी होगी?"
"चाहत जानने के बाद ही बता पाऊंगा ।"
"तो फिर सुनो ।" रत्नाकर निर्णायक स्वर में बोला-----'"यह खूनी दरिंदा यहाँ से जिंदा वापस नहीं जाना चाहिए ।"
"चांदनी मैडम की कीमत पर भी नहीं?" उसने पूछा !
"चांदनी सिंह को बचाने की पूरी कोशिश करेगे ।”
"हम इस वक्त वहुत खतरनाक जगह पर खड़े है ।”
"आईबी के आंफिसर होकर जोखिम से डरते हो!"
"डरना तो हमें सिखाया ही नहीं जाता ।”
"तो फिर तुमने कहाँ से सीख लिया ।"
"मैँ डर नहीं रहा देशपांडे बल्कि सोच रहा हूं कि जो हम करना चाहते हैं उसके बाद दोनों मुल्कों में कितना बडा़ बवंडर उठेगा !"
"उसके बारे में मत सोचो ! अपना फैसला बताओ ।”
“वही, जो तुम चाहते हो?"
"साफ-साफ़ बताओ ।"
"मुस्तफा जिंदा नहीं जाएगा ।"
।
रत्नाकर का चेहरा हजार बांट के बल्ब की तरह चमक उठा ।
वह खुशी से चहकता हुआ बोला.........…“ये हुई न बात । मगर...........
"मगर ?"
"होग कैसे ये ?"
होलकर बोला…....“मेरे दिमाग में प्लान है ।"
"क्या ?"
"वक्त आएगा तो बता दूगां ।"
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