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गद्दार देशभक्त complete

नगमा की आखों में हैरानी के भाव उभर आए । चौरसिया की तरफ इस तरह देखने लगी वह जैसे चिडियाघर के सबसे बिचित्र जानवर को देख रही हो ! बोली--------" ऐसा क्या सूझ गया तुम्हें ?"

" तुम्हें नहीं उस सूरमा को बताऊंगा !"

" किसे ?"

" तुम्हारे नवाबजादे को !"

" अचानक ही तुम बहुत कांफिडेंस से भरे और रहस्यमय नजर आने लगे हो ! उस चक्रव्यूह में घुसने को पूरी तरह तैयार जिस में फंसकर तुम जैसे तीन हुनरमंद अपनी जान गवां चुके हैं !"

" इसमें कोई शक नहीं कि अब मैं तुम्हारे नवाब से मिलने के लिए बेचैन हूं ! यह अलग बात है कि इसके अलावा मेरे पास कोई चारा भी नहीं है ! भागने के सारे रास्ते उसने बंद कर ही रखे हैं !"

" पता नहीं अचानक ही तुम कौन सी हवा में उड़ने लगे हो फिर भी , मैं एक नेक सलाह देने से खुद को रोक नहीं पा रही हूं !"

" दो !"

" नवाब को धोखा देने की कोशिश मत करना !"

" तो क्या उन तीनों फारेनर हैकर्स ने नवाब को धोखा दिया था, जिन्हें उसने कत्ल कर दिया ?"

" नवाब को धोखा देना इतना आसान नहीं है ! लेकिन वे तीनों विदेशी , नवाब की उम्मीदों से कहीं ज्यादा स्मार्ट बन रहे थे ! उन्होने धोखा देने की कोशिश की और सजा पाई !"

" यानी अगर मैं तुम्हारे कथित नवाब को धोखा देने का इरादा नहीं रखता तो मुझे फिक्र करने की जरूरत नही है ! मेरा हश्र पहले वाले हैकर्स जैसा नहीं होगा ?"

" अपने काम के आदमियों और वफादारों को तो वह सिर आंखों पर बैठा कर रखता है ! तुम्हारे पास भी एक हुनर है , जिसका नवाब इस्तेमाल करना चाहता है , जिसके लिए वह तुम्हें अॉफर करेगा ! मेरी निजी सलाह यही है कि खामोशी से उसका काम कर देना और अपनी कीमत लेकर शहर से निकल जाना ! "

" हूं !" चौरसिया ने सोचपुर्ण भाव से हुकार भरी -----" मेरे एक सवाल का सच सच जबाब दोगी ?"

"पूछो ?"

" क्या तुम्हें नहीं मालुम कि वह मुझ से क्या कराना चाहता है ?"

" नहीं ! यह एक सीक्रेट है , जिसके बारे में नवाब के अलावा और कोई नहीं जानता ! लेकिन यह निश्चित है कि यह कोई कम्प्यूटर की दुनिया से जुड़ा काम ही होगा , जिसके कि तुम एक्सपर्ट हो ! पिछले साल तुमने जिस तरह से मुल्क के बैंक सिस्टम में सेंध लगाकर दिन दहाड़े ढाई सौ करोड़ रूपये लूटे थे, नवाब ने तुम्हारे उसी कारनामे से प्रभावित होकर तुम्हें फोन करके मुम्बई बुलाया है ?"

" अर्थात नवाब का वह कम्प्यूटर हैकिंग के जरिए किसी बैंक को लूटना हो सकता है ?"

" नवाब बैंक रोबर नहीं है, न ही उसने पहले कोई ऐसा ओछा काम किया है ! फिलहाल अपनी जिज्ञासा को शांत रखो !" उसने अपनी रिस्टवॉच देखी ----" नवाब से तुम्हारी मीटिंग का वक्त करीब आ पहुंचा है ! अब केवल बीस मिनट शेष है और हमें ब्रेकफास्ट भी करना है !"

चौरसिया ने एक क्षण सोचा फिर सहमति में सिर हिलाता हुआ बोला -------" ठीक है ! मुझे भी भूख लगी है ! चलती हूं ! मगर ........

" फिर अटक गये ?"

" आखरी सबाल ?"

" जल्दी ?"

" मान लिया कि मैं नवाब का काम कर देता हूं ! क्या उसके बाद भी वह मुझे तुमसे मिलने की परमीशन दे सकता है ?"

" बाद तुम मुझसे मिलना क्यों चाहोगें? मैं एक शादी शुदा औरत हूं और अब तो सही मायने में औरत ही नहीं हूं ----औरत के नाम के नाम को धब्बा लगाने बाली एक जिस्मफरोश हूं ! तबायफ हूं !"

" मुझे नहीं पता ! पर सच यह है कि मै तुमसे बार बार मिलना चाहूंगां, और एक बार दुनिया के उस खुशकिस्मत इंसान को भी जरूर मिलना चाहूंगा, जिसे तुम जैसी पत्नी मिली ! जहां तक जिस्मफरोश और कालगर्ल की बात है तो वह अगर तुम जैसी होती है तो मैं अपने बनाने बाले से यही दुआ करूगां कि मुझे हर जन्म में ऐसी ही जिस्मफरोश और कालगर्ल बीबी मिले ! ऐसी तबायफ पर तो हजार जानें कुर्बान की जा सकती हैं !"

" अच्छा !" पहले झटके में नगमा हंसीं ! फिर संजीदा हुई और फिर चौंककर चौरसिया को देखने लगी ! वैसी ही नजरों से जैसे चिडियाघर के सबसे बिचित्र जानवर को देख रही हो !

मिशन मुस्तफा के लिए कल्यान होलकर ने अपनी जो टीम तैयार की, उसमें होलकर के अलावा कुल पांच लोग शामिल थे ! उन पांचों के नाम थे----प्रताप, शेखरन , भल्ला, गिरीश, और अमरीक !

पाचों आईबी के तेजतर्रार , युवा तथा जोशिले एजेंट थे और इससे पहले भी एक अन्य मिशन पर होलकर के साथ कर चुके थे, पिछला तजुर्बा अच्छा रहा था, इसीलिये होलकर ने उन पांचों का चुनाव किया था !

आईबी चीफ बलवंत राव तथा होलकर की मीटिंग के खत्म होने के करीब एक धंटे भर बाद ही टेरेरिस्टों का अगला संदेश वाया गृहमंत्रालय बंलवत के पास पहुंच गया था , जिसमें मुस्तफा तथा चादनी सिंह की अदला बदली का समय , स्थान और शेष तमाम बातें मुकर्रर कर दी गई थी !
 
बलवंत राव ने उस बारे में होलकर को सूचित कर दिया था ! वस्तुतः टेरेरिस्टों की तरफ से सरकार को जरा भी वक्त नहीं दिया गया था ! इसलिये बलवंत ने होलकर के फौरन अपनी तैयारियां मुकम्ल करने तथा मुस्तफा को साथ लेकर बताई गई जगह पर पहुंचने का निर्देश दिया गया !

डील के लिए टेरेरिस्टों ने जो जगह निर्धारित की थी , वह सचमुच चौंकाने वाली थी ! वह जगह मुम्बई के दक्षिणी तट से काफी दूर बीचों--बीच समुंद्र में स्थित थी ! यह वह जगह थी जहां से महज थोड़ा सा आगे बड़ते ही पाकिंस्तान के हिस्से वाली समुद्री सीमा शुरू हो जाती थी और जहां समुंद्र की छाती पर पाकिंस्तान की नेवी के जवान पुरी तैयारी के साथ हर वक्त दनदनाते रहते थे ! फिर भी , वह जगह थी भारत के समुंद्र में !

होलकर ने प्रताप , शेखरन , भल्ला, गिरीश, और अमरीक की वह छोटी सी मीटिंग इसी सिलसिले में तलब की थी ।

इस वक्त वे सभी होलकर के अॉफिस में उसकी में उसकी विशाल मेज के इर्द---गिर्द मौजूद थे ! मेज पर बीचों----बीच भारत का बड़ा सा नक्शा फैला हुआ था , होलकर ने डील वाले समुंद्री स्थान को रेड इंक से मार्क कर दिया था !

" यह जगह !" होलकर अपने हाथ में मौजूद पेन को मार्क वाले स्थान पर रखता बोला------"यहां से पचास नाटिकल मील की दूरी पर है ! सबसे तेज रफ्तार वाले एक्सप्रेस पोत से अगर हम मुस्तफा को लेकर इस जगह के लिए निकलते हैं और बीच में समुंद्री रास्ते की कोई खास दिक्कत नहीं आती है तो हमें यहां पहुचने में पूरे दो घंटे का वक्त लग जाएगा !"

" रास्ते में कोई दिक्कत आती है तो ?" प्रताप ने सवाल किया !

" जाहिर है कि ज्यादा वक्त लगेगा !"

" कितना ज्यादा ?" गिरिश ने पुछा !

" आने बाली दिक्कत की किस्म पर निर्भर करता है ! वैसे समुंद्री सफर में घंटे दो घंटे की देर हो जाना आम बात है !"

शेखरन ने पुछा ---" टेरेरिस्टों ने हमें कितना समय दिया है ?"

" तीन घंटे !"

" सिर्फ तीन घंटे !" अमरीक हैरान होकर बोला ---" उनमें से पंद्रह मिनट तो बीत चुके होंगे ?"

" हां !" होलकर ने सहमति जताई-----"यकीनन ! हमें इतने ही वक्त में अपनी मंजिल पर पहुचना होगा !"

" यह वक्त तो बहुत कम है !" भल्ला रोष में बोला ! " सरकार को टेरेरिस्टों से और ज्यादा वक्त की मांग करनी चाहिए थी ! समुंद्री रास्तों का सफर आसान नहीं होता ! उसमें अप्रत्याशित बाधाएं पेश आ जाती हैं !"

" सरकार ने पुरजोर ऐतराज जताया था लेकिन टेरेरिस्ट नहीं माने ! उनका कहना है रास्ते में कोई दिक्कत पेश नहीं आएगी ! आज समुंद्र बहुत शांत है और शाम तक उसमें कोई भी बदलाव न होने की मौसम विभाग भविष्यवाणी कर चुका है !"

" मौसम की भविष्यवाणी कभी पूरी तरह सटीक नहीं होती !"

होलकर बोला ----" टेरेरिस्टों का कहना है कि उन्होनें इसीलिये एक घंटे का अतिरिक्त समय दिया है !"

" हूं !" प्रताप ने गम्भीरता से हुंकार भरी------" फिर भी...........

" मैं तुम्हारी उलझन समझ सकता हूं प्रताप !" होलकर प्रताप की बात पुरी होने से पहले ही बोला---" लेकिन अफसोस कि टेरेरिस्ट बहुत ज्यादा शातिर है ! उन्होने हमें सोच विचार के लिए जरा भी समय नहीं दिया है ! डील के लिए उन लोंगों ने पाकिस्तान की सीमा से लगी जिस समुंद्री जगह का चुनान किया है, वह सब भी पूरी तरह प्री प्लान है, उसमें मेरे हर उस सवाल का जबाब छिपा है जो मैनें काफी अंसतोष के साथ चीफ से किया था !"

" कौन सा सवाल सर ?"

" यही कि इस डील के लिए हाफिस लुईस ने सीधे पाकिस्तान को ही क्यों नहीं चुन लिया , उनके लिए तो वही जगह सबसे माकूल रहती ! जरा सा भी जोखिम न हेता उन्हें ! मेरे सवाल के जबाब में चीफ ने कहा था कि अगर , टेरेरिस्ट ऐसा करते तो पाकिस्तान दुनिया के सामने एक्सपोज हो जाता-----उसका असली चेहरा दुनिया के सामने आ जाता !"

" चीफ ने गलत नहीं कहा था !"

" अब मेरी समझ में आगया है ! बहरहाल , पाकिस्तान में डील होने में कसर ही क्या रह गई है ! जो जगह टेरेरिस्टों ने मुकर्रर की है , देख ही रहे हो कि वहां पाकिस्तान की समुंद्री सीमा बिल्कुल सटी हुई है ! यानी किसी खतरे या जोखिम की -स्थिति में मुस्तफा या उसके साथी बिना किसी बोट के अगर तैर कर भी जाऐंगे तो दस मिनट में पाकिस्तान की सीमा में दाखिल होजाएगें ! और मेरा दावा है कि वे करेंगे भी यही !"

" मतलब पाकिस्तान में दाखिल हो जाएंगे ?"

" यकीनन ! और अगर ऐसा हुआ तो हम चाहकर भी उन पर गोली नहीं चला सकेंगें !"

" ऐसा क्यों ?"

" क्योंकि हमें सीमा पर गोली चलाने का अधिकार नहीं है ! यदि ऐसा किया तो पाकिस्तान चीख-चीखकर उसे खुद पर हमला करार देगा , जिसके बदले में समुंद्री सीमा पर तैनात पाकिस्तानी नेवी को जबाबी हमला करने का बहाना मिल जाऐगा और समुंद्री सीमा पर युद्ध के हालात पैदा होएंगें !"

" ओह नो !" भल्ला के मुंह से बरबस ही निकल गया !

" इसीलिये तो मैंने कहा कि यह सब प्री प्लान है---- बहुत पहले से सोची समझी गई साजिश है !"

प्रताप बोला----" ऐसा है तो फिर चाहे भले ही टेरेरिस्टों को कोई जोखिम न हो, आखिरकार तो उन्हें पाकिस्तान की सरहद की तरफ जाना ही पड़ेगा! मुस्तफा के साथ वह हमारी अपनी सीमा में सीमा में ही बापस लौटने की मुर्खता तो कर नहीं सकते !"

" तुमने ठीक कहा प्रताप !" होलकर ने कहा -----" उनकी मंजिल तो पाकिस्तान ही होगा ! यहां से आजाद होने के बाद तो मुस्तफा दोबारा हिंदुस्तान का रूख करने की हिमाकत कभी नहीं करेगा, मैं उसे इतना अहमक कभी नहीं समझता !"

" मुस्तफा अहमक हो भी नहीं सकता !" अमरीक दांत पीसता हुआ बोला था-------" कोई शैतान का बीज अहमक होता भी नहीं है ! अहमक तो बस हम ही होते है ! हम हिंदुस्तानी ! जो उनकी हर मांग के सामने अपने घुटने टेक देते हैं !"

" मैं तुम्हारे जज्बातों को समझता हूं अमरीक !" होलकर उसकी बात काटकर बोला------" मैं तुम सबके जज्बातों को समझता हूं ! लेकिन तुम्हें अपनी भावनाओं पर काबू रखना होगा ! अगर अभी से तुम्हारा यह हाल है तो जरा सोचो , मुस्तफा के सामने आने के बाद क्या होगा ? तब तो--- तुम सब उसकी बोटी बोटी चबा जाने को मचल उठोगे और अंततः वह हो जाएगा, जिसके डर से चीफ ने यह मिशन आईबी के हमसे ऊंचे अफसरों के हबाले नहीं किया ! शायद तुम लोग नहीं जानते कि मुस्तफा के लिए यह जहर हमारे उच्चधिकारियों में हमसे कहीं ज्यादा है और चोटी के अफसर होने के नाते चीफ के लिए उनके अंसतोष को दबा पाना आसान नहीं होता ! अगर मुस्तफा को कुछ होगया तो चांदनी को कोई नहीं बचा सकता और चांदनी इस वक्त मुल्क के लिए प्रतिष्ठा का सबाल है !"
 
सभी पाचों की निगाहें आपस में मिली !

आखों ही आखों में सबने एक दूसरे को समझाया, तसल्ली दी !

प्रताप ने सबसे पहले खुद को सहज करते हुए सबाल किया-------" क्या केवल हम छः लोग ही मुस्तफा को लेकर जाएंगे !"

" पोत का स्टाफ भी होगा ! हम लोग तो पोत चलाने से रहे !"

" पोत क्यों ? पनडुब्बी क्यों नहीं ?" गिरीश ने पहलु बदला !

" पनडुब्बी युद्धक आर्म्स की श्रेणी में आती है !"

" पोत भी युद्धक होता है !"

" होता है लेकिन हमें वो नहीं मालवाहक पोत लेजाने की परमीशन है ! सख्त हिदायत है कि उसमें हम छः लोगों तथा केबिन क्रू के तयशुदा स्टाफ के अलावा एक भी फालतु आदमी नहीं होना चाहिए ! अगर टेरेरिस्टों को जरा भी संदेह हुआ तो वे हमारे सामने ही नहीं आएंगे और यह डील रद्द हो जाएगी !"

" डील रद्द हो जाएगी ?"

" हां !" और फिर नये सिरे से डील होगी ! टेरेरिस्टों की तरफ से धमकी तो ये भी दी गई है कि ------ यह भी हो सकता है कि उसके बाद कोई डील हो ही नहीं ! सीधी चांदनी की बॉडी भेज दी जाए !"

" तो ठीक है !" बुरी तरह झल्लाए हुए शेखरन ने कहा-----" हम भी मुस्तफा की बॉडी भेज देंगें !"

" वो जानते है हम ऐसा नहीं कर सकते !"

" जब बो कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते ?"

" क्योंकि हम.......हम है और वे..........वे !"

" हम क्या हिजड़े है जो.......!" भभकते शेखरन को वाक्य बीच में ही छोड़ देना पड़ा --क्योंकि अमरीक ने कंधा थपथपा कर चुप रहने के लिए कहा था !

गिरीश ने अपेक्षाकृत शांत स्वर में पूछा------" जब सरकार ने सरेंडर कर ही दिया है तो टेरेरिस्टों को कोई भी संदेह होगा ही क्यों ?"

" उन्हेॉ होने वाली किसी गलतफहमी को हम नहीं रोक सकते !"

" अगर टेरेरिस्टों ने रास्ते में ही पोत पप हमला करके मुस्तफा को छुड़ा लिया तो हम गिनती के लोग उन्हें कैसे रोकेंगे ?"

"सरकार के प्रतिनिधी ने यह सम्भावना जताई थी !"

" क्या बोले ?"

" टेरेरिस्टों ने उसकी खिल्ली उड़ाते हुए कहा था कि अगर ऐसा होता है तो इंडियन नेवी को खुदकुशी कर लेनी चाहीए , जो अपनी ही सीमा में अपने पोत की हिफाजत नहीं कर सकती !"

" बहुत लम्बी जुबान है हरामजादों की !" भल्ला कलपकर बोला-----"एक बार हमारी उंगली निकल आई तो ऐसी काटूंगा कि औलादें भी बिना जीभ के पैदा होंगी !"

" पोत पर हमें कोई खतरा नहीं होगा !" होलकर ने भल्ला की बात ध्यान दिए बगैर कहा-----" --क्योंकि वहां मशीनगन से लेकर मिसाईल लांचर तक मौजूद होंगें , जो हवा में उड़ते विमान को भी मार गिरा सकते है !"

" क्या उन्होने इस बारे में मनाही नहीं की ?" गिरीश ने पुछा !

" नहीं !"

" कमाल है !"

" कोई कमाल नहीं है ! वे अच्छी तलर जानते हैं कि वे इस फ्रंट पर हमें रोक नहीं सकते , --क्योंकि उनके पास हमारे पोत के अंदर झांकने का कोई तरीका नहीं है !"

" शायद हो ?"

" नहीं होगा ! वरना इस बारे में भी उन लोगों ने अड़चन जरूर लगाई होती ! और फिर , अपनी सिक्योरिटी के बारे में सोचने का हमें भी अख्तियार है ! सारी मांगें इकतरफा नहीं मानी जा सकती !" कहने के बाद होलकर चुप हुआ तो पल भर के वातावरण में गहरा सन्नाटा छा गया !

" वह पोत कहां है , जिस पर हमें मुस्तफा को डिलीबर करना है ?" फिर शेखरन ने सन्नाटे को भंग किया !

" खुश्की पर खड़ा है ! उसके अंदर सारी तैयारियां मुकम्मल की जा चुकी है और मुस्तफा को भी उसमें शिफ्ट किया जा चुका है !"

" तो फिर हम देर क्यों कर रहे हैं ?"

" देर नहीं रिवीजन कर रहे है-----इस बात को अच्छी तरह से अपने दिमाग में बैठा रहे हैं कि कब , क्या , कैसे करना है !"

" क्यों बैठा रहे हैं ?" गिरीश क्षुब्द होकर बोला-------" जब हमारे अंदर खोट नहीं , कोई कूटनीति नहीं है , तो फिर इसकी जरूरत ही क्या है ? उन्हें मुस्तफा जिंदा चाहीए और हमें चांदनी , फिर समस्या ही क्या है ?"

" समस्या तो है !" होलकर एकाएक अर्थपूर्ण स्वर में बोला !

" क्या ?"

" मेरा जमीर-------मेरी निष्ठा----अपने मुल्क के लिए मेरी तड़प ! मुल्क के दुश्मनों के खिलाफ मेरे अंदर धधकती नफरत !"

" इसका मतलब क्या हुआ बॉस !" प्रताप सहित सभी के चेहरों पर उलझन के भाव उभर आए थे !"

" तुम लोग जानते हो !"

" बॉस !" भल्ला कशमकश में उलझता हुआ बोला-----" कही तुम वहीं तो नहीं कह रहे हो जो हम समझ रहे हैं ?"
 
" मुझे नहीं पता तुम क्या समझ रहे हो !" होलकर भावहीन स्वर में बोला----" मगर हाईकमान ने यह काम हमारे सीनियरों को केवल इसलिए नहीं सौंपा क्योंकि उन्हें डर था कि सीनियरों की नफरत आड़े आ जाएगी ओर मिशन फेल हो जाएगा मगर हमारे अंदर भी कम नफरत नहीं है ! क्या तुम लोगों को रहा है कि मैं यह सब खुशी से कर रहा हूं ?"

"बॉस !" अमरीक सशंक भाव से बोला-----" अगर मैं गलत नहीं सोच रहा तो तुम्हारे अंदर कुछ पक रहा है ! कुछ ऐसा है जो तुम करना चाहते हो लेकिन हम पर जाहिर नहीं कर रहे ?"

" अमरीक सच कह रहा है !" भल्ला ने समर्थन किया !

" ऐसा कुछ नहीं है !" होलकर ने सपाट स्वर में बोला !

" आप झूठ बोल रहे हो बॉस !"

" शटअप ! स्टाप दिस टॉपिक !"

प्रताप ने विषय चेंज किया------"टार्गेट प्वांइन्ट पर पहुच हमें किसे कांटेक्ट करना होगा ?"

" किसी को भी नहीं !" होलकर ने बताया------" हमें वहां पहुचकर बस लंगर डाल देना है ! टेरेरिस्ट खुद कांटेक्ट करेंगें !"

" अर्थात वे लोग वहां पहले से मौजूद होंगें ?"

" इसमें क्या शक है !" भल्ला का स्वर कड़वा होगया-------"उनके घर की सीमा तो वहां से तो लगी हुई है ! वह तो एक तरह से उन का घर ही है !"

होलकर ने पूछा------"कोई और सबाल ?"

सभी चुप रहे !

जाहिर था कि किसी के पास अब और सबाल नहीं था !

" ठीक है !" कल्यान होलकर गहरी सांस भरकर समापन के अंदाज में बोला-----" अब हमें पोत पर पंहुचना चाहिए !"

नगमा ने राजा चौरसिया की आंखों पर बंधी पट्टी खोल दी ! चौरसिया ने खुद को एक ऐसे हॉल में पाया , जो टयूब्स की दूधिया रोशनी में जगमगा रहा था !

दीबारों के सहारे चारों तरफ किसी डैसबोर्ड जैसी कबर्ड डैस्क लगी थी , उन पर कई कम्प्यूटर रखे थे ! उन कम्प्यूटर्स को एक नजर देखते ही कम्प्यूटर की दुनिया का हुनरमंद चौरसिया भांप गया कि वे आम कम्प्यूटर नहीं थे ! ऐसे खास कम्प्यूटर थे, जिनकी गति आश्चर्यजनक रूप से बेहद तेज थी और उनका इस्तेमाल मुल्क में केवल कुछ खास जगहों पर ही किया जाता था !

वहां मौजूद वाई फाई राउटर इस बात की तरफ स्पष्ट इशारा कर रहा थे कि उन कम्प्यूटर्स में दुनिया का सबसे तेज गति वाला इंटरनेट कनेक्शन मौजूद था ! कम्प्यूटर की दुनिया से सम्बंध रखते और भी दुर्लभ उपकरण मौजूद थे , जिन्हें कोई दुर्लभ शख्सीयत ही हासिल कर सकती थी ! समूचे हाल में एयरकंडीशनिंग की पैऩी खामोशी फैली हुई थी ! नगमा तथा चौरसिया के अलावा वहां अन्य कोई भी मौजूद नहीं था !

चौरसिया आश्चर्य से आखें फाड़ फाड़ हॉल में चारों तरफ निहारने लगा था , वहां मौजूद कम्प्यूटर की दुनिया से सम्बंध रखती एक---एक चीज को परखने लगा ! उस नजारे में वह इतना खो गया कि नगमा से यह शि्कायत करने का भी होश न रहा कि उसे आंखों पर पट्टी बांधकर वहां तक लाया गया था !

होटल में ब्रेकफास्ट के दरम्यान हीं नहीं बल्कि राजा ने हर पल महसूस किया था कि उस पर हर दिशा से नजर रखी जा रही है !

कभी कोई उसे खुद को घूरता नजर आता, कभी कोई !

होटल स्टाफ के लोगों तक को उसने खुद को रहस्यमय अंदाज में मुस्कराते देखा था !

अपनी हालत ऐसी महसूस की उसने जैसे केवल देखने में ही आजाद नजर आ रहा हो जबकि वास्तव में रस्सियों से जकड़ा हो लेकिन जल्दी ही इस बात की किक्र करनी बंद कर दी और नगमा के साथ ब्रेकफास्ट इंज्वॉय करने लगा !

ब्रेकफास्ट से फारिग होते ही नबाब की भेजी कार वहां पहुंच गई थी, उसमें ड्राईवर के अलावा दो अन्य लोग भी मौजूद थे, जो डील डौल में कमांडो जैसे मालूम पड़ते थे !

वे हथियार बंद थे !

उनमें से एक ने चौरसिया को बताया था उसकी आखों पर पट्टी बांधकर ही आगे का सफर करना था और इसमें हुज्जत उसे मंजूर नहीं थी !

चौरसिया ने हुज्जत की भी नहीं !
 
समझ जो चुका था कि वैसी किसी कोशिश के कोई मायने नहीं थे !

आखों पर पट्टी बांध दी गई !

सफर शुरू हुआ !

करीब तीन घंटे के सफर के बाद उसने खुद को उस लम्बे-चौड़े कंट्रोलरूम सरीखे हाल में पाया था !

" पंसद आया ? " एकाएक नगमा ने पुछा , वह बड़ी दिलचस्प नजरों से चौरसिया को देख रही थी !

" क.......क्या ?" चौरसिया ने हड़बड़ा कर उसकी तरफ देखा !

" यह नजारा ? यह मंजर ?"

" बहुत बहुत ज्यादा !" चौरसिया मुग्ध होकर बोला-----"मैंनें पहली बार कोई सुपर कम्प्यूटर देखा है !"

" यह सुपर कम्प्यूटर नहीं है , लेकिन उससे किसी तरह कम भी नहीं है ! अॉपरेट करोगे तो समझ में आ जाएगा !"

" और इंटरनेट ?"

" वह भी लाजबाव है ! मेरा दावा है कि आज से पहले तुमने इतनी फास्ट स्पीड वाला इंटरनेट यूज नहीं किया होगा !"

" बहुत खूब ! लेकिन....यहां इन चीजों का इस्तेमाल कौन करता है और ......ओर यह कौन सी जगह है ?"

उसने अर्थपूर्ण ढंग से कहा था----"यही बताना होता तो क्या तुम्हारी आंखों पर पट्टी बांधी गई होती ?"

" हूं !" चौरसिया ने हुंकार भरी ! निगाह एक बार फिर कक्ष में चारों तरफ पैन हुई-----तुमने तो कहा था कि ११ बजे नवाब के साथ मेरी मीटिंग है ! अब तो वक्त काफी उपर हो गया है !"

" मैनें तुमसे केवल वही कहा था , जो कहने के लिए कहा गया था ! वैसे नवाब जैसे लोग केवल जुबानी भाषा में ही वक्त के पाबंद होते है ! असल में तो उनके अगले पल की सटीक खबर खुद उनको भी नहीं होती !"

" नवाब से मेरी मुलाकात कब होगी ?"

" पीछे मुड़कर देखो बर्खुरदार !" सहसा एक नई और प्रभावशाली आवाज हॉल में गुंजी---"नवाब तुम्हारे सामने खड़ा है !"

चौरसिया चौककर आवाज की दिशा में पलटा !

प्रवेश द्वार के समीप एक अजनबी शख्स खड़ा था । उसकी बड़ी बड़ी आखों में ऐसी चमक थी , जो सामने बाले को बेधती महसूस होती थी ! होंठों पर एक निर्दोष तथा सादगी पूर्ण मुस्कान !

नगमा ने उसका अभिवादन किया और चौरसिया को कोहनी मारकर वैसा ही करने का इशारा किया !

चौरसिया ने भी हड़बड़ा कर नवाब का अभिवादन किया !

" जीते रहो बेटा, तुम्हें यहां देखकर मुझे बहुत खुशी हुई ! वैसे तो नगमा बहुत काबिल और समझदाऱ बच्ची है ! फिर भी मेजबान के फर्ज से पुछ रहा हूं , तुम्हें यहां आने में कोई दिक्कत तो नहीं हुई ?"

"अगर आखें बाधंकर किसी को कहीं जाने में दिक्कत नहीं होती तो मुझे भी कोई दिक्कत नहीं हुई !"

" तो यह तुम्हें बुरा लगा ! लगना भी चाहिए ! उसके लिए खुद नवाब तुमसे क्षमा मांगता है लेकिन अपने मेहमानों की नराजगी के लिए अपने उसुलों से समझौता नहीं कर सकता ! बैठो !"

" मैं यहां बैठने नहीं आया ! काम बताओ !"

" काम ?"

"वही, जिसके लिए मुझे यहां लाया गया है और ...... और मुझसे पहले भी तीन अन्य लोंगों को लाया जा चुका है ! जिन बदकिस्मतों की लाशों का पोस्मार्टम हो चुका है !"

" शिकायत कर रहे हो साहबजादे ?"

" क्या मुझे शिकायत नहीं करनी चाहिए ? क्या मुझे यह नहीं सोचना चाहिए कि अगर मैं आपका काम नहीं कर पाया अथवा कर लिया तब भी, दोनों सूरतों में मेरी मौत निश्चित है ?"

" यह सब जानते थे , फिर भी बुलावे पर चले आए ?"

" क्योकि जब आपका फोन पहुचां था , तब उन तीनों फारेनर्स की पहचान उजागर नहीं हुई थी, यह पता नहीं चल सका था कि वे तीनों मेरे हमपेशा थे------कम्प्यूटर की दुनिया के कुख्यात हैकर थे !"

"पता चल जाता तो क्या न आते ?"

" मैं क्या आपको पागल नजर आता हूं ?"

नगमा खामोशी से उन दोंनों का वार्तालाप सुन रही थी और टकटकी लगाए उन्हें देख रही थी !

" कब पता लगा ?" नवाब ने पुछा !

" उसे छोडो़ ! काम की बात करो !"

" अगर मैं कहूं की मैंने उन तीनों को नहीं मारा, तो ?"

" मुझे आपकी दाढ़ी और मुंछ नकली लग रही है !" चौरसिया ने उसकी बात पर ध्यान दिए बगैर कहना शुरू कर दिया------" आपने अपनी आखों में कांटेक्ट लैंस लगा रखे है ! आपकी असाधारण रूप से फूली तथा बेडोल नाक बता रही है इसके अंदर आपने स्प्रिंग फंसा ऱखे हैं और अब तो मुझे पूरा यकीन है कि आपके नाम में भी कोई भेद है ! मतलब आपका यह नाम , नवाब भी आपके चेहरे की तरह नकली है ! असल में आप उतने उम्रदराज नहीं है, जितने नजर आने की कोशिश कर रहें है !"

नवाब के चेहरे पर हैरानी के भाव उभर आए ! उसने चौंककर नगमा की तरफ देखा तो पाया , वह भी हैरान नजर आ रही थी !

" तुम्हारा दिमाग ही नहीं, नजरें भी तीखी हैं बर्खुरदार !" नवाब प्रभावित स्वर में बोला-----" मैं उन तीनों हैकरों के सामने इसी रूप में आया था , परन्तु उन तीनों में से किसी को भी मेरे हुलिए पर जरा भी शक नहीं हुआ ! लगता है मेरी तलाश पुरी हो गई ! कम से कम इस बार मैंने गलत आदमी को नहीं चुना !"

" प्लीज काम की बात करें तो बेहतर होगा ! मुझे तो अभी तक यह भी नहीं पता कि आपको मुझसे काम क्या है ?"

नवाब ने सपाट स्वर में कहा----" वह काम उस काम से ज्यादा कठिन नहीं है , जो पिछले साल कर चुके हो !"

" क्या मुझे फिर वैसे ही किसी साइबर क्राइम को अंजाम देना होगा ? हैकिंग के जरिए बैंक लुटना होगा ?"

" ऐसा ही समझ लो ! पर बहुत बड़ा फर्क है ! मैनें तुम्हें जिस रकम पर हाथ साफ करने के लिए बुलाया है वह किसी और की या सरकारी रकम नहीं है ! वह मेरी अपनी रकम है !"

" आपकी अपनी रकम ?"

" मैं तुमसे अपने ही एकाऊन्ट से रूपये निकलबाना चाहता हूं ! यह कोई लूट या डकैती नहीं होगी !"

" पहेली मेरी समझ में नही आई !"
 
" स्विस बैंक के सिस्टम से तुम अंजान नहीं होंगे ! बस यूं समझ लो कि स्विस बैकिंग की तर्ज पऱ़ चलने बाले एक विदेशी बैंक में मैं अपनी एक बहुत बड़ी रकम जमा करके उसकी यूजर आईडी और पासवर्ड भूल गया हूं और ऐसे बैंकों में एकाउंट होल्डर की नहीं बल्कि केवल उसके यूजर आईडी और पासवर्ड की ही अहमियत होती है ! अगर ये दोंनों चीजें मुझे नहीं मिलती है तो वह बैंक मेरा रूपया नहीं लौटाएगा ! ये ऐसे बैकिंग सिस्टम का नियम होता है, जिसे वह बदल नहीं सकता ! तुम्हें इन तमाम बातों की अच्छी समझ होगी !"

" मामला कुछ ज्यादा ही टेढ़ा लग रहा है !" राजा बुदबुदाने के बाद बोला----" कितना रूपया जमा कर रखा है आपने उस बैंक में ?"

"बीस हजार करोड़ !"

" बीस हजार करोड़ !" चौरसिया के होठों से चीख सी निकल गई थी--------"यह तो बहुत बड़ी रकम है !"

नवाब ने एक बार फिर सपाट स्वर में कहा----" अगर यह रकम मुझे वापस मिल जाती है तो तुम्हारा कमीशन भी बहुत बड़ा होगा !"

" यह काम नहीं हो सकता !" राजा चौरसिया ने एक झटके से कह दिया------"दुनिया का कोई कम्प्यूटर हैकर नहीं कर सकता !"

" य.........ये तुम क्या कह रहे हो !" नवाब के हलक से चीख सी निकल गई थी !" ऐसा लगा था जैसे एक ही झटके में उसके सारे सपने बिखर गए हों------"ये बात वो शख्स कह रहा है जिसने........

" बात को समझने की कोशिश कीजिए नवाब साहब !" राजा चौरसिया उसकी बात को काटकर कहता चला गया-----" मैं कम्प्यूटर हैकर हूं , कोई जादूगर नहीं ! हैकिंग का कारनामा हबा में अंजाम नहीं दिया जा सकता ! उसके लिए एक बेस की जरूरत होती है--------एक धरातल की जरूरत होती है ! हम लोगों को जिसके खाते में सेंध लगानी होती है , सबसे पहले उसकी यूजर आईडी और पासवर्ड ही उड़ाते हैं क्योंकि उनके बगैर कुछ नहीं हो सकता ! और आप कह रहें है आपके पास आपके एकाऊन्ट की यूजर आईडी और पासवर्ड ही नहीं है ! जिस एकाऊन्ट की यूजर आईडी और पासवर्ड ही नहीं मालुम उसे भला हैक कैसे किया जा सकता है ! अगर इस तरह खाते हैक हो जाया करते तो दुनिया भर के सभी बैंकों में जमा सारा धन मेरी या मेरे जैसे किसी हैकर की जेब में होता !"

" तुमने मेरी पूरी बात नहीं सुनी बर्खुरदार !" नवाब पूर्ववतः मंद मंद मुस्कराता हुआ बोला-------" मैं तुम्हें अपने उस एकाऊन्ट को हैक करने के लिए नहीं कह रहा हूं जिसकी मेरे पास यूजर आईडी और पासवर्ड नहीं है !"

" और क्या कह रहे हैं ?" उसके चेहरे पर उलझन के भाव उभरे !
 
" मेरे चार्टर एकाउंटेंट से मेरे एकाऊन्ट की यूजर आईडी और पासवर्ड डिस्ट्रॉय नहीं हुए थे बल्कि इंटरनेट पर कोई एक खास प्रोग्राम है जिस पर उसने वह यूजर आईडी और पासवर्ड छुपा दिए और उस प्रोग्राम के बारे में कुछ भी बताने के लिए वह जीवित ना रहा । मुझ तक पहुंचने से पहले ही एक जानलेवा दुर्घटना का शिकार हो गया था ! तुम्हारा काम केवल उस इंटरनेट प्रोग्राम क् पता लगाना है, जिसमें उसने मेरे एकाउंट का डाटा सुरक्षित रखा है और उस डाटा को ढूंढ कप हमारे हबाले करना है, बस ! एक बार यूजर आईडी और पासवर्ड मिल जाएं, उसके बाद भला हमें अपने खाते को अॉपरेट करने में भला क्या दिक्कत होगी !"

चौरसिया के नेत्र सोचने वाले अंदाज में सिकुड़े !

" अब बोलो बर्खुरदार !" नवाब ने उसे कुरेदा ----" क्या तुम मेरा यह काम कर सकते हो ?"

" कर सकता हूं !"

" क.......क्या कहा तुमने बर्खुरदार , जरा फिर से कहना !"

" मैंनें कहा कि ये काम मैं कर सकता हूं !" राजा चौरसिया पूरे आत्मविश्वास के साथ बोला-----" अगर सचमुच आपके एकाऊन्ट की डिटेल किसी इंटरनेट प्रोग्राम में छुपाई गई है तो मैं उसे ढूंढ कर आपके हबाले कर सकता हूं ! यह किसी एकाउंट को हैक करने से ज्यादा आसान काम है!"

" तो फिर करो ! करके दिखाओ !" नवाब की आवाज खुशी के पंखों पर सवार होकर नाच रही थी------" मेरे एकाउंट की डिटेल ढूंढ कर मेरे हबाले कर दो ! बदले में मैं तुम्हें वो दुंगा जो तुम कहोगे !"

" बगैर मांगे मौत भी तो मिल सकती है मुझे !" चौरसिया ने एक झटके से कहा----" जैसे पिछले तीन हैकर को मिली !"

" नहीं मैं तुम्हें नहीं मरने दूंगा !" नवाब का चेहरा भभकने लगा था-----" इससे पहले ही मौत के घाट उतार दूंगा उन्हें !"

चौरसिया ने चौंककर पूछा----" किन्हें ?"

" जिन्होंने उन हैकर्स को मारा है !"

" अब कौन सी कहानी सुनाने की तैयारी है नवाब साहब !" चौरसिया ने नगमा की तरफ देखते हुए कहा-------"मुझे मालूम है कि उन्हें आपने ही इस दुनिया से रूखसत किया था !"

" मुझे मालूम है कि कहां से मालूम है !" कहने के साथ उसने भी नगमा की तरफ देखा---------" लेकिन गलत मालूम है ! इसीलिये गलत मालूम है क्योकि उसे ही गलत मालूम है जिसने तुमसे ऐसा कहा !"

" मतलब ?"

" उन तीनों को अंडरवर्ल्ड के मेरे प्रतिद्वंद्वियों में से किसी ने हलाक किया ! किसने ? यह जानने के लिए मैंने अपना जाल बिछा रखा है ! जैसे ही पता लगेगा , मैं उसे नहीं छोडूंगा !"

" पर सर !" नगमा बोली -----" आपने तो मुझसे कहा था कि उन्हें आपने इसलिए मार डाला क्योंकि उन्होंने आपको धोखा देने की कोशिश की थी !"

" अंडरवर्ल्ड की कुछ मजबूरियां होती है , उन्हीं मे से एक मजबूरी के कारण मैंने तुमसे झूठ बोला था !"

चौरसिया ने व्यंग सा किया-----"क्या मैं उस मजबूरी के बारे में जान सकता हूं ?"

" अंडरवर्ल्ड में यह स्वीकार करना कि प्रतिद्वंद्वी ने मेरे आदमी को मार डाला है , अपनी कमजोरी को उजागर करना होता है और इस दुनिया में कमजोरी को उजागर करके नहीं जिया जा सकता !"

" मेरे आदमी !" वे तीनों आपके आदमी थे !"

" मैंने बुलाए थे मेरे ही आदमी हुए !"

" और बुलाने के बाद मरने के लिए छोड़ दिया !"

" मरने के लिए क्यों छोड़ता ! मुझे क्या ख्वाव चमकना चाहिए था कि कोई उन्हें मार डालेगा !" नवाब कहता चला गया ----" वो तो जब मैनें महसूस किया मेरे काम के नहीं है तो जिस तरह आखों पर पट्टी बांधकर लाए गये थे वैसे ही यहां से उनके होटल लेजाकर छोड़ दिया गया ! बाद में किसी ने उनकी हत्या कर दी !"

" चलो !" चौरसिया बोला----" पहले के बारे में आपको वैसा इल्म नहीं हुआ था ! दूसरे के बारे में तो हुआ होगा !" तीसरे के बारे में तो हुआ होगा ! उन्हें कैसे मर जाने दिया आपने ?"

" पहला मरा तो मुझे शक नहीं हुआ कि उसे इसलिए मार दिया गया है कि क्योंकि उसे मैंने बुलाया था ! सोचा , होगा कोई उसका व्यक्तिगत पंगा ! इसीलिये , दूसरा भी मेरे दुश्मनों का शिकार हो गया लेकिन जब दूसरे का मर्डर हुआ तो लगा-----हो न हो उन दोंनों को मेरे सम्पर्क में आने के कारण कत्ल किया गया है !" तब मैंने जब तीसरे को उसके होटल छोड़ा तो अपने आदमियों से उसकी निगरानी करने के लिए कहा लेकिन वे चूक गये ! एक बार फिर मेरे दुश्मनों ने अपना काम कर दिया और मेरे आदमीयों को यह तक पता ना लग सका कि ऐसा करने वाले आखिर हैं कौन ?"

" तब तो मेरा भी यही अंजाम होगा !"
 
"हरगिज नहीं !" ऐसा हरगिज नहीं होने दूंगा मैं !" नवाब के चेहरे पर ज्बालामुखी सा धधकता नजर आया-----" अगर उन्होंने तुम्हारे नाखुन को भी क्षति पहुचाने की कोशिश की तो मैं न सिर्फ उन्हें नाकाम कर दूंगां बल्कि मुम्बई शहर को उनकी लाशों से पाट दूंगा ! बहरहाल , मेरा नाम भी नवाब है ! लोग मुझे यूं ही अंडरवर्ल्ड का बादशाह नहीं कहते !"

" क्या पता वे सफल होंगे या आप !" चौरसिया ने कहा-----" मगर धार पर तो मेरी जान होगी !"

" विश्वास करो, मैं तुम्हारा बाल भी बांका ना होने दूंगा !"

" हालांकि मुझे आपकी इस कहानी पर यकीन नहीं आया है कि उन तीनों हैकर्स को आपने नहीं , आपके किसी नामालूम दुश्मन् ने मारा है फिर भी सवाल कर रहा हूं ----- उन्होनें ऐसा क्यों किया ? क्यों मारा उन तीनों को ? इस बारे में आप क्या सोचते हैं ?"

" शायद उन्हें भनक लग गई थी कि उन तीनों हैकर्स से मैंने कोई गुप्त और बड़ा काम लिया है ! शायद उन्होने हैकर्स से उस काम के बारे में जानना चाहा और टार्चर के बाबजूद वे कुछ बता ना सके इसलिए मारे गये !"

" क्यों ना बता सके ?"

" --क्योंकि उन्हें कुछ मालूम ही न था !"

" मतलब ?"

" यहां आकर , मेरे मुंह से उन्हें सिर्फ इतना मालूम हो सका था कि मैं इंटरनेट से अपनी यूजर आईडी और पासवर्ड खोजने की कोशिश कर रहा हूं ! ज्यादा से ज्यादा वे मेरे दुश्मनों को यही बता सकें होंगें ! उन्हें शक हुआ होगा कि उनके चंगुल में फंसे शख्स को और भी बहुत कुछ मालूम है लेकिन बता नहीं रहा है इसलिए उन्हें उस अंजाम तक पहुंचाया !"

" उन्होनें आपका काम करने की कोशिश भी नहीं की ?"

" नहीं !"

" क्यों ?"

" शायद वे सक्षम नहीं थे ! या तुम्हारी तरह खुद पर कॉन्फिडेन्स नहीं था उन्हें ! वे तो सुनते ही बोले कि ---- नहीं , हम अंतरिक्ष की तरह चारों तरफ फैले इंटरनेट से आपकी यूजर आईडी और पासवर्ड ढूंढने में सक्षम नहीं है !"

" फिर भी आप लगे रहे और मुझे फोन किया ?"

" --क्योंकि मैं जानता हूं इस दुनिया में कोई भी कां नामुमकिन नही है ! जरूरत केवल टेलेंटिड आदमी को ढूंढ निकालने की होती है और देखो , मैं कामयाब हो गया ! तुमने कहा है कि तुम ये काम कर सकते हो !"

" चौरसिया एक पल चुप रहा ! फिर बोला-----" जहां तक मैं पहुंच चुका हूं वहां पहुचने के बाद आपका काम करूं या ना करूं , आपके किसी दुश्मन् द्वारा खतरे में तो दोंनो ही हालात में हूं-----क्यों न काम कररे ही मरा जाये !"

" गुड !" नवाब की आंखों मे चमक उभर आई थी--------" एक बार फिर कहता हूं , 'तुम्हारी' जान को कोई खतरा नहीं होगा । मेरी तरफ से तो सबाल ही नहीं उठता ! उन्हें भी कामयाब नहीं होने दूंगा !"

" कीमत क्या मिलेगी मुझे ?"

" ढाई सौ करोड़ !"

" राजा चौरसिया यूं हंसा जैसे कोई बचकानी बात सुनी हो ! बोला-----" नवाब साहब , मेरी कामयाबी की सूरत मे आपको बीस हजार करोड़ मिलेगें !"

" वो मेरे अपने रूपए है चौरसिया !"

" पहले तो मुझे इसी बात का यकीन नहीं है कि वे बीस हजार करोड़ आपके अपने रूपए हैं ! लेकिन खैर, मैं इस पचड़े में क्यों पडूं ! हकीकत ये है कि वे रूपए आपके भी है तो आपको मेरी मदद के बगैर नहीं मिल सकते !"

" तुम बोलो !"

" केवल पांच सौ करोड़ !"

" क......क्या ?" नवाब उछल पड़ा----" यह तो बहुत ज्यादा है !"

" अब आप चालाक बनने की कोशिश कर रहें हैं ! जबकि मैं जानता हूं कि अगर मैं इस काम के मैं एक हजार करोड़ भी मागूंगा तो आपके पास मान जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है !"

" ओ.के ! मंजूर है !"

चौरसिया ने स्पष्ट शब्दों मे चेतावनी देते हुए कहा-------" काम हो जाने के बाद भी आप या वकौल आपके जो भी आपके दुश्मन् हैं, अगर इनमें से किसी ने मुझे नुक्सान पहुचाने की कोशिश की तो मेरा यकीन मानो , उस हालात में वे बीस हजार करोड़ रूपये आपके हाथों में आकर भी आपके किसी काम नहीं आ पाएंगें !"

" मतलब ?"

" मतलब यह कि..." वह कहता चला गया----" मैं ऐसा इंतजाम कर जाउंगा रि मेरी मौत होते ही आपका घन हमेशा-हमेशा के लिए इंटरनेट प्रोग्राम में ही भटकता रहेगा ! मुमकिन है आप उसे देख भी सकें मगर इस्तेमाल नहीं कर सकेंगें !"

नगमा को होटल में कहे गए चौरसिया के शब्द याद आए और जेहन ने कहा-----तो अपनी सुरक्षा का यह जाल बिछाया था इस शातिर शख्स ने ! इसीलिये मस्त और संवच्छंद नजर आ रहा था ये ! उसे मानना पड़ा-----राजा चौरसिया वास्तव में दिमाग का खिलाड़ी है !

इधर नवाब ने कहा था -----" इस सम्बंध मे मुझे इसलिए कोई फिक्र नहीं है क्योकि जिस तरह तुम जानते हो तुम इंटरनेट के जंजाल से मेरे यूजर आईडी और पासवर्ड निकाल लोगे उसी तरह मैं भी जानता हूं कि मैं तुम्हें किसी भी तरह का नुक्सान नहीं पहुचने दूंगा !"

" बेहतर है कि अब हम दोनों अपना अपना काम करें !"

" ओके !"

" मुझे अकेला छोड़ दीजिए !"

मुस्तफा एक मालवाहक जहाज के तहखाने में था !

उसे एक कुर्सी पर बैठाया गया था ! दोंनो हाथ कुर्सी के मजबूत हत्थों के साथ बांधे गए थे और दोनों पैरों को भी वैसी ही मजबूती के साथ कुर्सी के पायों से जकड़ दिया गया था !

वह अपने जिस्म को जुम्बिश तक नहीं दे सकता था !

केवल सिर को दाएं--बाएं घुमा सकता था !

फिर भी, दो एके सैंतालीसधारी उसके दाएं--बाएं सतर्कता की प्रतिमुर्ति बने खड़े थे ! वे दोनों भल्ला ओर गिरीश थे !

कल्याण होलकर और प्रताप भी तहखाने में ही थे !
 
अमरीक और शेखरन अभी--अभी डेक की तरफ निकल गये थे !

मालवाहक पौत के चालक दल के सभी सदस्य हालांकि इंडियन नेवी के प्रशिक्षित कमांडो थे लेकिन उनसे से किसी को भी वगैर इजाजत तहखाने में जाने की परमीशन नहीं थी !

सिवाय रत्नाकर देशपांडे के ।

रत्नाकर देशपांडे चालीस साल की उम्र का एक नेवी अफसर था, वह भारतीय नोसेना में एओसी जैसे बड़े ओहदे पर तैनात था ।

रत्नाकर को भारत की समुद्गी सीमाओं से लगी दूसरे मुल्कों की सीमाओं की शानदार जानकारी थी !

समुद्री रास्तों की भी उसे अच्छी समझ थी, इसलिए उसे इस मिशन में शामिल किया गया था !

पोत इस वक्त अरब सागर में चौसठ अंश अक्षांश पर माउंट आँफ द इंडस वाले भारतीय सीमा से लगे समुद्र में पचास नाटिकल मील प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ा जा रहा था और तयशुदा वक्त से थोड़ा पहले ही मंजिल पर पहुंच जाने की पूरी उम्मीद थी ।

होलकर रत्नाकर तथा टीम के हर सदस्य के पास सेटेलाइट फोन थे , उनके जरिए वे मुम्बई स्थित कट्रोल रूम के सम्पर्क में थे !

यह बात पौत पर मौजूद आईबी टीम तथा गृहमंत्रालय से जुड़े कुछ अहम लोंगों के अलावा और किसी को भी मालूम नहीं थी कि मुम्बई के कंट्रोल रूम से सागर की छाती पर दनदनाते हुए मालबाहक पर सेटेलाइट के जरिए रर पल निगाह रखी जा रहा थी और

उन सभी समुद्री रास्तों पर सिक्योरिटी के बेहद पुख्ता इंतजाम है, जिन रास्तों से पोत गुजर रहा था, वे खुफिया इंतजाम किसी को भी नजर नहीं आ सकते थे ।

बंधनों में जकड़ा होने के बावजूद तंदुरुस्त जिस्म के मालिक मुस्तफा का चेहरा किसी कठोर शिलाखंड-सा प्रतीत हो रहा था ।

सुलगती आंखों से कटाक्ष झांक रह था ।

एक छुपी हुई आशंका भी थी लेकिन उसके हाव-भावों में खौफ, बेचैनी या अधीरता के दूर-दूर तक कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे थे ।

सीने तक लटकती लम्बी दाढ़ी तथा मूंछो के पीछे छुपे मुस्तफा के क्रूर से नजर जाने वाले होठों पर ऐसी मुस्कान थी जो आईबी के अधिकारियों के जले पर नमक छिड़कती-सी प्रतीत हो रही थी ।

उसने अभी-अभी होलकर से कहा था---------'"तुम्हारा निकाह तो हो गया होगा अॉफिसर ?"

"क्यों पूछ रहा है?" होलकर ने कलपकर पूछा------"और तुझे मेरे निकाह की इतनी फिक्र क्यों है?"

"इस मुल्क के हर बाशिंदे की फिक्र करना मेरा फर्ज है?"

" तू क्या यहाँ का वजीरे आजम है?" रत्नाकर गुर्राया था ।

" हमें चौबीस घंटे दे दो ।" मुस्तफा ने उसे चिढ़ाने वाले अंदाज में कहा था------""न वन जाऊं तो जमीन में जिंदा दफन कर देना ।"

"क्या मतलब हुआ इसका?"

"तुम्हारे पोलिटीशियंस अक्सर कहते रहते हैं कि पाकिस्तान में तुम्हारे मुल्क से युद्ध लड़ने का हौंसला और ताकत नहीं है, इसीलिए हम छदम युद्ध लड़ रहे हैं----प्राक्सी वार कर रहे हैं ।"

"क्या गलत कहते हैं वो! सच यही है ।"

"यह सच नहीं है नामाकूल ।" मुस्तफा तैश में आकर बोला था------"यह सच नहीं है । अगर तुम्हारे मुल्क के हुक्मरानों में कलेजा है तो महज चीबीस घंटे के लिए इस मुल्क की आर्मी और पुलिस को हटा लो है ! हम केवल बीस करोड़ हैं, लेकिन तुम एक सौ करोड़ के लिए काफी ।चौबीस घंटे पूरे होने से पहले ही तुम पूरे सौ करोड़ को गाजर-मूली की तरह काटकर फेंक देंगे हम । कश्मीर का लाल चौंक तो वहुत छोटा टार्गेट है । हम तो दिल्ली के लाल किले पर पाकिंस्तानी झंडा फहरा देंगें ! सुना तुम लोगों ने ! हम चौबीस घंटे में दिल्ली फतह कर लेंगें !

उन सभी समुद्री रास्तों पर सिक्योरिटी के बेहद पुख्ता इंतजाम है, जिन रास्तों से पोत गुजर रहा था, वे खुफिया इंतजाम किसी को भी नजर नहीं आ सकते थे ।

बंधनों में जकड़ा होने के बावजूद तंदुरुस्त जिस्म के मालिक मुस्तफा का चेहरा किसी कठोर शिलाखंड-सा प्रतीत हो रहा था ।

सुलगती आंखों से कटाक्ष झांक रह था ।

एक छुपी हुई आशंका भी थी लेकिन उसके हाव-भावों में खौफ, बेचैनी या अधीरता के दूर-दूर तक कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे थे ।

सीने तक लटकती लम्बी दाढ़ी तथा मूंछो के पीछे छुपे मुस्तफा के क्रूर से नजर जाने वाले होठों पर ऐसी मुस्कान थी जो आईबी के अधिकारियों के जले पर नमक छिड़कती-सी प्रतीत हो रही थी ।

उसने अभी-अभी होलकर से कहा था---------'"तुम्हारा निकाह तो हो गया होगा अॉफिसर ?"

"क्यों पूछ रहा है?" होलकर ने कलपकर पूछा------"और तुझे मेरे निकाह की इतनी फिक्र क्यों है?"

"इस मुल्क के हर बाशिंदे की फिक्र करना मेरा फर्ज है?"

" तू क्या यहाँ का वजीरे आजम है?" रत्नाकर गुर्राया था ।

" हमें चौबीस घंटे दे दो ।" मुस्तफा ने उसे चिढ़ाने वाले अंदाज में कहा था------""न वन जाऊं तो जमीन में जिंदा दफन कर देना ।"

"क्या मतलब हुआ इसका?"

"तुम्हारे पोलिटीशियंस अक्सर कहते रहते हैं कि पाकिस्तान में तुम्हारे मुल्क से युद्ध लड़ने का हौंसला और ताकत नहीं है, इसीलिए हम छदम युद्ध लड़ रहे हैं----प्राक्सी वार कर रहे हैं ।"

"क्या गलत कहते हैं वो! सच यही है ।"

"यह सच नहीं है नामाकूल ।" मुस्तफा तैश में आकर बोला था------"यह सच नहीं है । अगर तुम्हारे मुल्क के हुक्मरानों में कलेजा है तो महज चीबीस घंटे के लिए इस मुल्क की आर्मी और पुलिस को हटा लो है ! हम केवल बीस करोड़ हैं, लेकिन तुम एक सौ करोड़ के लिए काफी ।चौबीस घंटे पूरे होने से पहले ही तुम पूरे सौ करोड़ को गाजर-मूली की तरह काटकर फेंक देंगे हम । कश्मीर का लाल चौंक तो वहुत छोटा टार्गेट है । हम तो दिल्ली के लाल किले पर पाकिंस्तानी झंडा फहरा देंगें ! सुना तुम लोगों ने ! हम चौबीस घंटे में दिल्ली फतह कर लेंगें !

"बकता रह हरामजादे ।" होलकर दांत किटकिताता हुआ बोला था-------“हम तेरा हर लफ्ज गोर से सुन रहे है ।"

"सुनना भी चाहिए, क्योंकि तुम सव वहुत खुशकिस्मत हो जो तुम्हें मुस्तफा को सुनने का मौका मिला है । एक बार यहां से छूटने की देर है, फिर तुम्हें केवल मेरे कारनामे ही सुनने को मिलेंगे । मेरे द्वारा किए जाने वाले बारूद के धमाके तुम्हारे कानों को बहरा कर देंगे । हमारी यह जिंदगी हम पर अल्लाह का करम है, जो उसने हमें फतह हासिल करने के लिए दी है । हम जीएंगे तो सारी दुनिया पर अपनी फतह का परचम लहराएंगे और इस धरती से काफिरों का नामोनिशान मिटा देंगे और मरेगें तब भी दो गज जमीन अपने साथ लेकर जाएंगे । तुम्हें तो एक मुट्ठी राख के अलावा और कुछ भी हासिल नहीं होगा । या फिर होता है? बोलो, जवाब दो ।"'

रत्नाकर के धैर्य का बांध जैसे टूट गया । उसके हाथों में उसका फौजी पिस्टल चमक उठा । यह पिस्टल मुस्तफा की तरफ़ तानकर भभकते स्वर में बोला------"अब मरने लिए तैयार हो जा और मेरी गारंटी है, तुझे साथ ले जाने लिए दो गज जमीन हासिल नहीं होनी । समुद्र के मगरमच्छ तेरी बोटी-बोटी चबा जाएंगे ।"

"न..........नहीँ देशपांडे ।" होलकर रत्नाकर के पिस्टल तथा मुस्तफा के बीच दीवार की तरह खड़ा होता हुआ सख्ती से बोला-----"तुम ऐसा नहीं करोगे । यह जानबूझकर हमें भड़का रहा है । इसके पीछे जरूर इसकी कोई शैतानी चाल है । यह जानता है मैं तुम्हे इसका खून नहीँ करने दूंगा, भले ही इसके लिए मुझे तुम्हें शूट करना पड़े और शायद यह ऐसा ही कराना चाहता है । मैंने इसकी फाइल पूरी पढी़ है । वहुत शातिर है ये । यह हमारी कैद में होकर भी इस शिप पर हम हिंदुस्तानियों की लाशें गिराकर जाना चाहता है । इसकी चाल को समझने की कोशिश करों ।"

रत्नाकर के जेहन को झटका लगा ।

"हा. . .हा......हा.........।" मुस्तफा शैतानी अट्टहास कर उठा, फिर होलकर से मुखातिब होकर बोला-------""तेरी समझदारी और तेरा धैर्य कांबिले तारीफ़ है आईबी के पिट्ठू लेकिन तेरी काबिलीयत का तेरा यह दंभ उस ववत्त टूट जाएगा जब मैं आजाद होकर इस शिप को अलविदा कहूंगा और खुली हवा में सांस लूगा ।"

"क्या होगा उस वक्त न चाहते हुए भी होलकर ने एक-एक शब्द चबाया था------“क्या करेगा तूं ?"'

“बीते तीन साल में, तेरे मुल्क की जेल मे, मैंने बहुत गहरे जख्म खाए है । हर एक जख्म का हिसाब लिया जाएगा । मौत कितनी सख्त होती है और दहशतगर्दी की दहशत क्या होती है-----यह कयामत मैं तुझे तेरी आंखों से दिखाऊँगा और यकीनन दिखाऊँगा । चुन-चुनकर, तेरे देश के देश भक्तों को मौत के घाट उतार दूंगा मैं ।"

रत्नाकर फिर भड़का ।

चेहरा फिर तमतमाने लगा ।
 
"जी करता है कि इस गन की सारी की सारी गोलियां इसकी छाती में उतार हूँ ।" पहली वार एके सैंतालीस लिए गिरीश ने अपना मुंह खोला था------"लेकिन चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकता ।"

भल्ला ने भी ठंडी आह भरी ।

उनकी बेबसी और छटपटाहट पर मुस्तफा ठहाका लगा उठा ।

"कुछ नहीं कर सकते तुम लोग ।" यह उनका उपहास उड़ाता हुआ बोला------" जब तक अपोजीशन लीडर की बीबी मेरे आदमियों के कब्जे में है, तुम लोग चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते । अगर किसी ने मुझे नुकसान पहुचाने की हिमाकत की, तो कसम खुदा की, मैं कुछ भी नहीं करूंगा । उस नेता की बीबी तो मरेगी-ही-मरेगी, तुम सवको भी फांसी पर चढा़ दिया जाएगा और ऐसा तुम्हारे अपने मुल्क की सरकार करेगी । तुम्हारे वो अाका केरेंगे जिन्होंने तुम्हें इस मिशन पर भेजा है । वे कहेंगे कि तुम नाकारा हो । जाहिल हो ।"

रत्नाकर का चेहरा उत्तेजना से सुर्ख हो गया । गिरीश तथा भल्ला की हालत भी ऐसी ही थी । होलकर भी अंदर ही अंदर गीली लकड़ी की तरह सुलग रहा था, लेकिन वह अपने ज़ज्जार्तों पर सख्ती से काबू किए हुए था । यह तो स्पष्ट था कि मुस्तफा उसे उकसाने की कोशिश कर रहा था पर यह नहीं समझ पा रहा था कि क्यों? वह ऐसी कोशिश क्यों कर रहा था? चाहता क्या था वह?

"जहर से भी ज्यादा कड़वा है, मगर सच है ।" मुस्तफा एक बार फिर कहता चला गया-----"हम कश्मीर सुलगा सकते हैं----"असम धघका सकते हैं । उत्तर प्रदेश को खून से नहला सकते हैं-मुबई को हाइजैक कर सकते है । तुम्हारी संसद में घुसकर अातिशबाजी फोड़ सकते हैं । तुम्हारे सिरों को काटकर ले जा सकते हैं । इस मुल्क में जहां चाहै पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगवा सकते हैं और तुम हमें टेढ़ी नजरों से भी देख नहीं सकते, बंदर घुड़की भी नहीं दे सकते । बोलो, क्या मैं गलत कह रहा हूं ?"

रत्नाकर देशपांडे इस बार अपने अाप पर काबू न रख सका और होलकर की सारी चेतावनियां के बावजूद अपना आपा खोकर मुस्तफा पर झपट पड़ा ।

“भड़ाक...... ! "

उसका प्रचंड पूंसा मुस्तफा के चेहरे से टकराया ।

मुस्तफा के हलक से चीख निकल गई ।

रत्नाकर तो जैसे पागल हो गया था । ।

वह मुस्तफा पर इस तरह पिल पड़ा मानो वह हाड…मांस का इंसान नहीं, कोई बोरा हो । रत्नाकर के उस अप्रत्याशित रिएक्शन पर होलकर उठा ।

वह तेजी से उसकी तरफ़ झपटा ।

बडी़ मुश्किल से बिफरे हुए रत्नाकर को काबू में किया ।

महज इतनी ही देर में रत्नाकर ने मुस्तफा के चेहरे का भूगोल बदल दिया था । उसके गाल व होंठ फट गए थे ।

कई जगह से खून बहने लगा था ।

मुस्तफा चीखने के अलावा और कुछ भी नहीं कर सका था ।

गिरीश तथा भल्ला तटस्थ थे ।

उन्होंने रत्नाकर को रोकने का जरा भी प्रयास नहीं किया था ।

उनके चेहरों के भाव ही बता रहे थे कि रत्नाकर वही कर रहा था, जो वे चाहते थे ।

"त...तुम क्या पागल हो गए हो देशपांडे!" होलकर अपनी गिरफ्त में मचलते रत्नाकर को डापटता हुआ बोला

"मैंने तुम्हें पहले ही वार्न किया था कि यह हरामजादा किसी मकसद के तहत जहर उगल रहा है । यह जानबूझकर हमें उकसा रहा है और तुम इसकी उस शातिर चाल को कामयाब बना रहे हो । मैँ कहता हूं होश में आओ । म. . .मैं तुम्हें आजाद कर रहा हूँ । पर खबरदार, दुबारा ऐसी हरकत मत करना मेरे दोस्त, प्लीज ।"

रत्नाकर का विरोध एकदम से शांत हो गया ।

होलकर ने उसे आजाद कर दिया ।

उन्होंने देखा-मुस्तफा की चीखे अव थम गई थी ।

वह गहरी-गहरी सांसे ले रहा था ।

चेहरे पर गहन पीडा़ के भाव उभर आए थे ।

लेकिन जैसे ही उन दोनों से निगाहें मिली, मुस्तफा के होठो पर एकाएक फिर उन्हें सुलगाने वाली मुस्कान उभर आई ।

पीड़ा के बावजूद उसके चेहरे पर व्यंग उभर आया था, वो व्यंग जो रत्नाकर को ही नहीं, होलकर को भी लहुलुहान कर गया ।

"तेरे हाथ वहुत सख्त हैं अॉफिसर ।" मुस्तफा गहरी-गहरी सांसें भरता हुआ बोला------"लैंकिन तुम हिंदुस्तानियों की कैद में मैंने इससे कई गुना ज्यादा सख्ती देखी है । मेरे जिस्म से बहते इस लहू को आखिरी वार ठीक से देख ले । कसम है मुझे खुदाबंद करीम की, इस खून के एक-एक कतरे का हिसाब लूंगा । हर बूंद के बदले में एक हिंदुस्तानी की लाश गिराऊंगा ।"

"उससे पहले मैं ही तेरी लाश गिरा दूंगा ।" रत्नाकर फिर उबला लेकिन फिर तुरंत ही संभल भी गया ।

" देखते हैं हिंदुस्तानी सियारों कि कौन किसकी लाश गिराता है ।"

रत्नाकर रिएक्ट करता, उससे पहले ही पोत को एक झटका लगा । कोई कुछ समझ पाता, उससे पहले ही कप्तान वहां पहुचा ।

उसने सरसरी निगाह से वहां का मुआयना किया, फिर कल्याण होलकर से मुखातिब हुआ-----“हम मंजिल पर पहुच गए हैं सर ।"

"पोत यहीं रोक दो ।" होलकर बोला ।

"रुकवा दिया है ।"

"ओह !"होलकर के मुंह से निकला । तब उन सबकी समझ में अाया कि वह झटका पोत रुकने का ही था ।

"अब हमारी क्या स्थिति है?" होलकर ने कैप्टन से पूछा ।

"हम ठीक उस जगह खडे़ है, जहां पहुंचने को कहा गया था । लेकिन इंटरनेशनल सीमा की बात करें यह एक निहायत ही सम्वेदनशील अंतर्राष्टीय सीमा है, एक तरफ़ साठ अंश अक्षांक्ष पर ओमान देश की समुद्री सीमा लगी हुई है और दूसरी तरफ. . .

"जाहिर है पाकिस्तान होगा !"

“यकीनन पाकिस्तान है ।"' इस बार रत्नाकर देशपांडे बोला था-----" परंतु इस जगह को सम्बेदनशील पाकिस्तान नहीं बल्कि चीन बनाता है । यहाँ हमें असली खतरा चीन से है ।"

"रत्ऩाकर, भूगोल मैंने भी पढ़ा है ।"' होलकर ने कहा था-------""यहां चीन कहाँ से अा गया?"
 
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