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घुड़दौड़ ( कायाकल्प ) complete

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यह एक एकांत और छोटा टापू था और पूरी तरह निर्जन! इसके बीच में काफी पेड़ थे और इसका बीच नरम सफ़ेद रेत का बना हुआ था। मॉरीन ने बताया था की पांच मिनट में ही टापू पर पहुँच जायेंगे, इसलिए हमने कपड़े भी नहीं बदले थे, और ऐसे ही गीले गीले टापू पर पहुंचे। उस समय समुद्र में लहरें काफी ऊंची ऊंची उठ रही थी, इसलिए नाव को थोडा दूर ही लंगर दिया गया और टापू पर जाने के लिए एक बार फिर से समुद्र में कूदना पड़ा। नाविक और मॉरीन हमारे खाने पीने का सामान हमारे पास रखा, और हमें बताया की हम लोग यहाँ पर दो तीन घंटे आराम से रह सकते हैं, और दोनों टापू पर ही हमसे कुछ दूर पर बैठ कर अपना खुद खाने पीने लगे।

रश्मि और मैंने सोचा की इस टापू को थोडा और देखना चाहिए, और तट पर ही चलने लगे। रश्मि और उसका स्विमसूट पूरी तरह से गीला था और हवा के कारण उसको ठण्ड लग रही थी – रह रह कर उसके शरीर में झुरझुरी दौड़ जा रही थी। मैंने ऐसा देखा तो पीछे से उसकी कमर में हाथ डाल कर, उसे अपनी तरफ खींच कर चलना शुरू किया। चलते चलते मैंने देखा की उसका सूट उसके नितम्बो को ढक कम, और प्रदर्शित ज्यादा कर रहा था। अतः, मैंने उसके नितंबो को थोड़े जोश से रगड़ना शुरू कर दिया।

“आप यह क्या कर रहे हैं?”

“गर्मी पैदा कर रहा हूँ, जानू! आपके कपड़े पूरी तरह से गीले हैं, और हवा भी चल रही है। ऐसे में आपको ठंड लग सकती है।"

“आप बहुत ख़याल रखते हैं मेरा!”, रश्मि ने मुस्कुराते हुए कहा।

‘कैसी नासमझ लड़की है यह! – ऐसी अवस्था में कोई लड़की राका डाकू को मिल जाए, तो वह भी इसी प्रकार गर्मी पैदा करेगा।‘ हम लोग चलते चलते एक एकांत वाली जगह पर आ गए – वहां पर बीच काफी चौड़ा और समतल था। सूर्य की गर्म भी अच्छी आ रही थी।

"क्या इसे उतार सकती हो?" मैंने रश्मि को पूछा।

"क्यों?"

"आपकी बॉडी जल्दी सूख जायगी, अगर उसको गर्मी और हवा लगेगी।"

"लेकिन, वो लोग?”

“वो पीछे ही ठहरे हुए हैं। इधर नहीं आयेंगे... चिंता न करो!”

"अरे? ऐसे कैसे? अगर उनमे से कोई भी आ गया... और हमको ऐसी हालत में देखेगा तो क्या सोचेगा? और उनकी छोड़िए... मुझको ऐसे कोई और देखे तो मैं तो शरम से मर ही जाऊंगी!"

"आप भी क्या मरने मारने वाली बातें करती हैं? हनीमून पर आए हैं ... हमको कुछ तो मज़ा करना चाहिए? और पूरे इंडिया में ऐसी सूनसान जगह नहीं मिलेगी! जितना कपड़े उतार सको, उतना ही मस्त!!" मैंने समझाया, "कोई नहीं आएगा ... अब उतार दो न.."

“ठीक है। लेकिन यह डोर आपको खोलनी पड़ेगी...” कहकर रश्मि मुड़ कर खड़ी हो गई।

मैंने उसकी यह बात सुनकर आश्चर्यचकित हो गया। दिमाग में उत्तराँचल की वादियों में नग्न होकर आनंद उठाने का अनुभव याद आ गया। मैंने उसकी सूट की डोर खोली और जैसे केले का छिलका उतारते हैं वैसे ही स्विमसूट को उतार दिया। कुछ ही पलों में रश्मि पूर्ण नग्न होकर बीच पर खड़ी थी। मैंने उसका सूट सूखने के लिए बीच पर फैला दिया, और उसके बाद खुद भी अपना स्विमिंग ट्रंक उतार कर पूर्ण नग्न हो गया।

हम दोनों कुछ देर ऐसे ही नंगे पुंगे वहां पर खड़े होकर पानी सुखाते रहे, लेकिन वहां ऐसे रहते हुए भी (चाहे कितने भी अकेले हों), बेढंगा लग रहा था। खैर, ऐसे निर्जन बीच पर होने का फायदा यह है की वहां पर खूब सारे समुद्री तोहफे ऐसे ही बिखरे पड़े रहते हैं। मैंने रश्मि को बीच-वाक करने और सीपियाँ बीनने के लिए तैयार कर लिया,

“अरे, चलो, यहाँ पर ज़रूर अच्छे वाले शंख और सीपियाँ मिलेंगी – चल कर उनको ढूंढते हैं, और बीनते हैं।“

मैंने कहा और हम दोनों ऐसे ही पूर्ण नग्न, उस वीरान और निर्जन द्वीप पर घूमने चल दिए। अपना सब सामान उसी स्थान पर छोड़ दिया – भला किससे डरना? सूर्य की गर्मी शरीर पर बहुत अच्छी लग रही थी – अब तक सारा पानी सूख गया था और हवा भी थोड़ी सी ऊष्ण लगने लगी थी। मैंने सोचा की एक गलती हो गयी – बिना किसी प्रकार के सन-स्क्रीन क्रीम के ऐसे ही बीच पर घूमने से सन-बर्न हो सकता है। कुछ और नहीं तो सांवलापन बढ़ जाएगा – खैर, यही सोच के संतुष्टि कर ली की चलो कुछ विटामिन D ही बन जायेगा शरीर में।

सबसे आनंददायक बात यह थी की रश्मि इस प्रकार से नग्न होने में पूरी तरह से आश्वस्त थी – यह मैं मान ही नहीं सकता की उसको यह संज्ञान न हो की कम से कम दो अजनबी लोग कभी भी उसके सामने सामने आ सकते हैं और उसको उसकी पूर्ण नग्नता वाली स्थिति में देख सकते हैं। लेकिन मेरे साथ रहते हुए उसको अब ज्यादा आत्मविश्वास हो गया था। खैर, कोई तीन चार मिनट चलते रहते हुए ही हमको बढ़िया किस्म की बड़ी सीपियाँ और शंख मिलने लग गए – एक बार फिर से हमारे पास उनको एकत्र करने के लिए हमारे पास हाथों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था। हम लोग ऐसे ही कोई पंद्रह बीस मिनट तक घूमते रहे और फिर वापस अपने स्थान की ओर चल दिए। वापस आकर हमने खाना खाया और नर्म और गरम रेत पर लेट कर धूप सेंकने लगे और कुछ ही देर में हम दोनों को ही झपकी आ गई।

मॉरीन कब वहां आई, हमको इसका कोई ज्ञान नहीं। लेकिन उसने हम दोनों को न केवल एक दूसरे से गुत्थमगुत्था होकर सोते देखा, वरन उसी अवस्था में मेरे ही कैमरे से हमारी कई तस्वीरें भी उतार लीं।

(मॉरीन, जैसा की मैंने पहले ही बताया है, एक ऑस्ट्रेलियाई है और अंग्रेज़ी में बात करती है। हमारे वार्तालाप को अंग्रेज़ी और हिंदी, दोनों में ही लिखने की ऊर्जा नहीं है मुझमें, इसलिए यहाँ सिर्फ हिंदी में ही लिखूंगा। लेकिन कुछ शब्द अंग्रेजी के भी होंगे)

“अरे सोते हुए बच्चों, उठो... चलना भी है।“

“कक्या? ओह... मॉरीन? क्या हुआ?” मॉरीन ने मुझे ही हिला कर उठाया ... मैं हड़बड़ा गया।

“कुछ हुआ नहीं! लेकिन हमको कभी न कभी वापस भी तो चलना है न? ...और, देख रही हूँ की तुम दोनों बड़े मजे ले रहे हो! है न? हे हे हे!”

“कोई मज़ा वज़ा नहीं, मॉरीन। बस, थोड़ा धूप सेंकते सेंकते सो गए थे।“ मॉरीन के सामने ऐसे ही नग्न पड़े रहना लज्जाजनक तो था, लेकिन चूँकि वह भी ब्रा-पैंटीज में ही थी, इसलिए मैंने खुद को या रश्मि को छुपाने का कोई प्रयास नहीं किया। मॉरीन को जो भी कुछ देखना था, वह अब तक विस्तार से देख चुकी होगी।

“जैसा तुम कहो!” फिर उनींदी रश्मि को देखते हुए उसने मुस्कुरा कर कहा, “वेल, हेल्लो ब्यूटीफुल! नींद हो गई?” फिर मेरी तरफ मुखातिब होकर, “तुम्हारी पत्नी बहुत सुन्दर और सेक्सी है। तुम बहुत ही भाग्यशाली हो, दोस्त...!मेरे कहने का यह मतलब कतई मत निकालना की तुम किसी भी तरह से कम हो... लेकिन, ये बहुत सुन्दर हैं!”

“हाँ – यह बात मुझे मालूम है। इसीलिए तो मैंने इनसे शादी की है।“ हमारी बातों के बीच ही रश्मि ने अपना स्विमसूट उठा कर अपने शरीर पर इस तरह से डाल लिया जिससे उसकी जाहिर नग्नता छुप जाय। “हे! हम लोग यहाँ कुछ देर और नहीं रुक सकते? यहाँ बहुत अच्छा लग रहा है।“ मैंने आगे जोड़ा।

“बिलकुल रुक सकते हैं... लेकिन हमको एक निर्धारित समय के बाद रिसोर्ट में इत्तला देनी होती है। और यहाँ पर कोई दूरसंचार की सुविधा तो है नहीं... लेकिन.. मेरे पास एक विचार है। उसको बताने से पहले मैं तुमको एक बात बताना चाहती हूँ की जब आप लोग सो रहे थे, तो मुझे आप दोनों को ऐसे देख कर इतना अच्छा लगा की मैंने आप लोगो की ऐसी न्यूड फोटोज खींच ली...”

“क्या?!! दिखाना ज़रा!”

“आपके ही कैमरे से ली हैं... देख लीजिये।“ कह कर मॉरीन ने मेरा कैमरा मेरे हाथ में सौंप दिया।

मैंने कैमरा ऑन कर, तुरंत ही रिव्यु बटन दबाया – रश्मि भी अपनी छाती पर अपनी बिकिनी चिपकाए, उत्सुकतावश कैमरे की तस्वीरों को देखने मेरे बगल आ गई... इस बात से बेखबर की उसकी योनि से बिकिनी का वस्त्र हट गया है। खैर, जब हमने वो तस्वीरें देखीं तो हमको लज्जा, आश्चर्य और गर्व तीनों प्रकार के ही भाव आए।

ज्यादातर तस्वीरों में हम पूर्णतः नग्न अवस्था में आलिंगनबद्ध होकर सो रहे थे – मैं रश्मि की तरफ करवट करके लेटा हुआ था, ऐसे की मेरा बायाँ पाँव रश्मि के ऊपर था, और इस कारण मेरा लिंग और वृषण स्पष्ट दिख रहे थे। मेरा लिंग अर्ध स्तम्भन में खड़ा हुआ था और उसकी स्किन थोड़ी पीछे खिसकी हुई थी। रश्मि चित लेटी हुई थी और उसका सारा शरीर प्रदर्शित था। उसके छोटे छोटे स्तन, और उन पर आकर्षक निप्पल! सुन्दर, स्वस्थ और पतली बाहें और सपाट पेट! उसका बायाँ पाँव थोडा अलग हो रखा था जिस कारण उसका योनि द्वार थोडा खुला हुआ था।

“थैंक्स फॉर दीस पिक्चर्स! लेकिन, आप क्या कहने वाली थीं?”

“मैं यह कह रही हूँ की आप दोनों अपने हनीमून पर आये हैं... क्यों न मैं आप दोनों के और भी अन्तरंग फोटोस कैमरे में उतारूँ..? वैसी जैसी 2-एक्स या 3-एक्स फिल्मों में होता है? यू नो... जैसे आपका लिंग, इनकी योनि में...? क्या कहते हैं? वस्तुतः, मेरे ख़याल से आपके हनीमून की यह एक अच्छी यादगार निशानी बनेगी! इन तस्वीरों को जब आप लोग बीस साल बाद देखेंगे तो वापस एक और हनीमून करने का मन हो जायगा!”

मैंने रश्मि को संछेप में मॉरीन के सुझाव के बारे में बता दिया।

“नहीं बाबा! मैं नहीं कर पाऊंगी! इनके सामने कैसे ऐसे...?”

“जानू, देखो न... इनके सामने हम दोनों ही तो नंगे ही हैं...”

“लेकिन अगर उन तस्वीरों को कोई और देख ले तो?”

“अरे कौन देखेगा? हमारे बच्चे? हा हा! तो उनको बताएँगे की हमने उनको ऐसे बनाया था।“ मैंने शरारत भरी दलील दी।

रश्मि वैसे भी मेरी किसी भी बात का कोई विरोध तो करती नहीं... अतः उसने अंत में हामी भर दी। लेकिन एक शर्त पर की मॉरीन भी हमारे साथ निर्वस्त्र होकर कुछ तस्वीरें निकलवाए। मॉरीन ने कुछ सोचने के बाद हामी भर दी।

“अच्छी बात है!” मैंने कहा, “हम लोग क्या करें?”

“सबसे पहले तो रिलैक्स होने की कोशिश करिए... आपकी पत्नी तो अभी भी नर्वस लग रही हैं। पहले इन्ही की कुछ तस्वीरें निकाल लेती हूँ... ठीक है न?” अभी भी हम तीनों में सिर्फ मॉरीन ने ही कपड़े पहने हुए थे।

मॉरीन रश्मि को कभी मुस्कुराने, तो कभी कोई पोज़ बनाने को कहती – ‘हैंड्स इन एयर... हैंड्स ऑन हिप्स... लिक योर लिप्स... मेक अ पाउट.. शो सम ब्रैस्ट..’ रश्मि की इन झिझक और लज्जा भरी अदाओं का असर मुझ पर होने लग गया और मेरा लिंग जीवित होने लगा। रश्मि इस समय मॉरीन के निर्देशन में एक पेड़ के तने से टिक कर अपने दाहिने हाथ से खुद को और बाएँ हाथ से अपने बाएँ पैर को घुटने से मोड़ कर ऊपर की तरफ खींच रही थी। इसका प्रभाव यह था की रश्मि की पूरी सुन्दरता अपने पूरे शबाब पर प्रदर्शित हो रही थी।

ऐसा तो मैंने कभी सोचा ही नहीं... ‘यह मॉरीन तो वाकई एक कलाकार है!’

‘पिंच योर निप्पल’ रश्मि पर भी इस प्रकार के देह प्रदर्शन का अनुकूल प्रभाव पड़ रहा था। उसके निप्पल उत्तेजना से खड़े हो गए थे। ‘टर्न अराउंड... शो में सम हिप्स..’

फोटो खींचते हुए मॉरीन अब मेरी तरफ मुखातिब हुई – मैं सम्मोहित होकर रश्मि के उस नए रूप को निहार रहा था और अपने उत्तेजित लिंग पर प्यार से हाथ फिरा रहा था।

मॉरीन: “एक्साइटेड? अब तुम्हारी बारी...” मेरे किसी प्रतिक्रिया से पहले ही मेरी चार-पांच फोटो उतर चुकी थी। “ये इसकी देखभाल कैसे कर पाती है? उसके लिए बहुत बड़ा है! उसके क्या, मेरे लिए बहुत बड़ा है...” एक पल को जैसे मॉरीन फोटो लेना ही भूल गयी – और फिर जैसे तन्द्रा से जाग कर उसने मेरे लिंग की कुछ क्लोज-अप तस्वीरें भी ले डालीं।

फिर उसने रश्मि को रेत पर लेटने को कहा और मुझको रश्मि के दोनों ओर अपने घुटने टिका कर इस तरह बैठने को कहा जिससे मेरा स्तंभित लिंग रश्मि के मुख के ऊपर आ जाय। अब रश्मि को कुछ बताने की आवश्यकता नहीं थी – उसने स्वतः ही मेरा लिंग अपने मुँह में भर लिया और इस पूरी हरकत को मॉरीन ने पूरी निपुणता से कैमरा में कैद कर लिया। मुझसे रहा ही नहीं जा पा रहा था – मैंने अपने लिंग को रश्मि के मुख में थोडा और अन्दर तक घुसेड दिया।

“एनफ़ नाउ! प्लीज लिक हर निप्पल्स...”
 
मैंन रश्मि के ऊपर आकर उसको अपनी बाहों में कस कर चूमना शुरू कर दिया – प्रतिक्रिया स्वरुप संद्य ने अपना हाथ बढ़ा कर मेरे लिंग को पकड़ लिया और सहलाने लगी। मैं कभी उसके होंठो को चूमता, तो कभी उसके स्तनों को। मॉरीन हमारे बिकुल करीब आकर बेहद अन्तरंग तस्वीरें उतारने में व्यस्त थी। मेरी और रश्मि की हालत बहुत खराब थी – मेरा लिंग इस समय ऐसा अकड़ा हुआ था जैसे की बस एक हलके से दबाव से फट जाए। रश्मि की योनि भी पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। मुझसे रहा नहीं जा रहा था और मैंने बिना किसी निर्देशन के रश्मि के होंठ चूमते हुए अपने लिंग को रश्मि के योनि द्वार पर सटा कर एक ज़ोर का धक्का लगाया .... लिंग उसकी योनि में ऐसे सरकता चला गया जैसे मोम में गरमागरम चाकू घुसा दिया गया हो। रश्मि के मुँह से एक कामुक सीत्कार निकल गई।

“मेरी जान... आह! मेरी हिरनी..” मैं न जाने क्या क्या बड़बड़ाते हुए पूरी गति से रश्मि के साथ सम्भोग करने में व्यस्त हो गया। हमारा खेल 3-4 मिनटों में अपने पूरे शबाब पर पहुँच गया। मैंने रश्मि को भोगते हुए उसके घुटनों को ऊपर की तरफ उठा कर मोड़ दिया और उसके नितम्बों को सहलाना आरम्भ कर दिया। मैं जल्दी ही स्खलित होने वाला था, लेकिन कुछ और देर यह खेल खेलना चाहता था। इसलिए मैंने धक्के लगाना रोक कर, अपने लिंग को बाहर निकाल लिया। योनि रस से सना हुआ मेरा लिंग, सूर्य की रौशनी में शामक रहा था। मैंने रश्मि के नितम्बों के नीचे अपनी हथेलियाँ रखीं और उस हिस्से को ऊपर की तरफ़ इस तरह उठाया की उसकी योनि मेरे मुख के सामने आ जाय। और फिर उसकी योनि पर अपने मुख को ले जाकर उसको चूमा। रश्मि किलकारी भरने लगी।

कुछ देर चूमने के बाद, मैंने खुद को व्यवस्थित किया और अपने लिंग को रश्मि की योनि में पुनः समाहित कर के धक्के लगाने आरम्भ कर दिए। अगले 2-3 मिनटों की मेहनत में मेरा वीर्य रश्मि की योनि में की गहराइयों में छूट गया। आहें भरते हुए मैंने रश्मि की कमर को कस कर अपने जघन क्षेत्र से चिपका लिया। रश्मि भी संयत होकर गहरी साँसे भारती हुई लेट गई – मैं उसके ऊपर ही लेट गया। लेकिन उसके होंठों, आँखों, कानों, गले और स्तनों पर चुंबनो की झड़ी लगा दी। कुछ ही देर बाद मेरा लिंग सिकुड़ कर खुद ही रश्मि की योनि से बाहर आ गया।

मॉरीन का परिप्रेक्ष्य

सेक्स के इस सजीव प्रसारण ने मुझे इस प्रकार मन्त्र-मुग्ध कर दिया की मैं अपनी सुध-बुध ही खो बैठी। मेरे हाथों से कैमरा गिरते गिरते बचा। मैं एक समलैंगिक हूँ, लेकिन इस इतर्लैंगिक मैथुन ने मुझे बहुत प्रभावित कर दिया था। रूद्र अब उठ कर बैठ गया था और मेरी तरफ मुखातिब था, और रश्मि अपने अभी अभी संपन्न हुए मर्दन के कारण थक कर लेटी हुई थी और सुस्ता रही थी। आखिरी कुछ तस्वीरें लेटे समय मुझे झुक कर बैठना पड़ा, जिसके कारण मेरे स्तन ब्रा के कपों से थोड़ा बाहर ढलक रहे थे। रूद्र नजरें इस समय उनको ही सहला रही थी। मैंने उसकी आँखों का पीछा किया तो तुरंत समझ गयी की वो कहाँ घूम रही हैं। मैं हांलाकि थोड़ा सचेत हो गई, लेकिन मैंने उनको छिपाने की कोई कोशिश नहीं की – वैसे भी मैंने वायदा किया था की हम तीनों नग्न तवीरें खिचायेंगे – तो देर-सबेर इन वस्त्रों से छुट्टी तो होनी ही थी। रूद्र ने इशारे से मुझे अपने पास बुलाया और मैं यंत्रवत उसके पास आकर बैठ गई। रूद्र है भी कितने आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक! और इसकी पत्नी, रश्मि, जब कम उम्र में ऐसी बला की सुन्दर है, तो फिर जब उसका यौवन पूरा निखरेगा, तब क्या होगा!!?

रूद्र ने अपनी बाहें मेरी कमर में डाल कर मुझे कस कर दबोच लिया और अपने होंठों से मेरे होंठ सटा कर चूमने लगा। इस स्त्यंत अप्रत्याशित हमले से मैं सकते में आ गई। उसने मेरे होंठ काट लिये और उनको चूसने लगा। एक क्षण को तो मैं अपनी लैंगिकता और सुध-बुध दोनों भूल गई और चुम्बन में उसका सहयोग करने लगी। उनके सम्भोग के दृश्य से मेरा शरीर पहले से ही कामाग्नि भड़क उठी थी, और अब इस चुम्बन ने मुझे दहकाना शुरू कर दिया। उसने मेरे होंठों को अपने दांतों के बीच दबा कर धीरे धीरे काटना शुरू किया, और फ़िर अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल दी। मैंने भी भीना इनकार किये उसकी जीभ को रसीले फल के जैसे ही चूसना शुरू कर दिया।

कुछ देर तक इसी प्रकार चूमने के बाद जब उसके हाथ मेरी ब्रा को खोलने लगे... तब मैंने अपने होंठ झटक कर उससे अलग किए।

“यह क्या कर रहे हो...? बस अब बहुत हुआ... अब चलते हैं यहाँ से!” मैंने नाटक किया।

पर वह ऐसे मानने वाला नहीं था – उसने ब्रा के ऊपर से ही मेरे दोनों स्तन अपनी गिरफ़्त में ले लिया। उसकी पकड़ बहुत मज़बूत थी – और उनको इस प्रकार दबा रहा था की मेरी उत्तेजना बढ़ती ही जा रही थी। मेरे दिल की धड़कन तेज होती जा रही थी। वैसे चाहती तो मैं वहां से हट सकती थी, लेकिन वस्तुतः मेरी कोशिश भी बस सतही तौर पर ही थी, और मैंने उसकी हरकतों का कोई ख़ास विरोध नहीं किया। कुछ ही पलों में उसने मेरी ब्रा खींच कर मेरे शरीर से अलग कर दी और मैं ऊपर से पूरी नंगी हो गई। मेरे स्तन उभर कर बाहर हो आये – निप्पल पहले ही उत्तेजना के मारे कठोर हो गए थे।

मेरे गोरे बदन पर तने हुये स्तनों देख कर उसकी आँखों में एक चमक आ गई। उसने मेरे स्तनों को अपनी उंगली से हल्के हल्के सहलाते हुए कहा, “तुम बहुत ख़ूबसूरत हो।“

उसने मुझे खीच कर अपनी गोद में बैठा लिया, ऐसे जिससे मेरे दोनों पांव उसकी कमर के अगल बगल होते हुए उसकी पीठ के पीछे आ गए। उसकी हिम्मत की दाद देनी होगी – इस समय वह मेरे बाएँ स्तन के निप्पल को अपने मुँह में भर कर बच्चों की तरह चूस रहा था और उत्तेजनावश मेरे होंठों पर सिस्कारियां फूटने लगी। मैंने उत्तेजनावश रूद्र के सर को अपने स्तनों में भींच लिया। मेरे दिमाग में इस समय गहरी उलझन हो रही थी – मैं समलैंगिक हूँ, इतर्लैंगिक हूँ, या उभयलैंगिक हूँ? इस लड़के ने मुझे भरमा दिया है।

अपने स्तनों के चूषण के आनंद के दौरान मेरी आँख अचानक ही खुली – देखा की रश्मि मेरी तरफ कुछ अजीब से भाव से देख रही है। क्या वह गुस्सा है? लगता तो नहीं! उत्सुक? नहीं! लालसा? पता नहीं! रश्मि की नज़र देख कर उसके भाव कुछ समझ नहीं आये – मैंने अपने आपको उसके किसी भी प्रकार के आवेग के लिए मन ही मन तैयार कर लिया। रश्मि उठी, मेरे पास आकर मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा और आँखों में उसी प्रकार के भाव लिए मेरी तरफ गहरी दृष्टि डाली।

‘कहीं ये मेरी गर्दन तो दबाने वाली नहीं है?’ मैंरे मन में एक तनाव देने वाला विचार कौंधा। लेकिन बस एक दो क्षणों के लिए ही। मैं लगभग तुरंत ही तनाव मुक्त हो गई – रश्मि की छरहरी उंगलियाँ मेरे दाहिने स्तन को छू रही थीं। ऐसे ही दो तीन बार छूने के बाद उसने मेरे स्तन को अपनी हथेली में भर कर दबाया। मेरे स्तन का आकार उसकी हथेली के लिए काफी बड़ा था, लेकिन फिर भी उसकी पकड़ दृढ़ थी। बीच बीच में वह मेरे निप्पल को अपने अंगूठे और उंगली के बीच पकड़ कर चुटकी ले रही थी।

उधर रूद्र आँखें बंद किये मजे से मेरे बाएँ स्तन का पान कर रहा था, और इधर उसकी पत्नी मेरे दाहिने स्तन से खेल रही थी। उसकी आँखों के भाव मुझे अब समझ आये – वह भी अपने पति की ही तरह मेरे स्तनों का पान करना चाहती है! मैंने रूद्र के सर को ज़रा हिलाया, तब जाकर वह अपने उन्माद से बाहर निकला, लेकिन उसकी सिर्फ आँखें ही खुली, मुँह में अभी भी मेरा निप्पल भरा हुआ था। उसने एक नज़र मेरी तरफ देखा तो उसको भान हुआ की रश्मि मेरे दूसरे स्तन से खिलवाड़ कर रही थी। वह मेरे निप्पल को मुँह में लिए मिलये ही मुस्कुराया, और फिर रश्मि को कुछ बोला। ज़रूर उसने उसको मेरे स्तन पीने को कहा होगा क्योंकि अगले ही पल रश्मि ने मेरे निप्पल को अपने मुँह में रख लिया।

रश्मि के मुँह की गर्मी का एहसास रूद्र से अलग था और बहुत अच्छा भी। कुछ देर उसने अपनी जीभ से उस पर दुलराया और फिर चूसना शुरू किया। मेरे दोनों निप्पल पूरी तरह से कड़े हो गए थे, अतः रश्मि को वह पूर्ण सुगमता से उपलब्ध हो गया। रश्मि निप्पल को मुँह में भरे हुए अपने दोनों हाथों से मेरे स्तन को धीरे धीरे दबाने और सहलाने लगी।

"तुमको यह पसंद है?" रश्मि बिना निप्पल को छोड़े मुस्कुराई। "जब तक मन करे, पियो" मैंने कहा। यह सीन बड़ा ही हास्यास्पद था – मेरे दोनों स्तनों से दोनों इस प्रकार चिपके थे जैसे अबोध बच्चे! कुछ देर चूसने के बाद रूद्र ने मेरे स्तन को छोड़ दिया और मेरे पीछे जा कर मेरी चड्ढी उतारने लगा। एक तरीके से यह सही भी था – हम तीनों में सिर्फ मैं ही थी, जिसने कुछ भी पहन रखा था। मैंने भी अपने पैर इधर उधर उठा कर उसकी मदद करी – अब हम तीनों ही पूर्ण निर्वस्त्र हो गए।

मैं तो एक समलैंगिक हूँ, और जब रश्मि जैसी सुन्दर, सेक्सी लड़की मेरे सामने इस प्रकार रहे, तो मेरा मन भी कुछ तो करने का बनेगा ही। मुझे यह नहीं मालूम था की हम तीनों की इस कामुक क्रिया की निष्पत्ति कैसे होगी, लेकिन उसके बारे में कुछ सोचना भी बेकार था। मैंने रश्मि के मुख से अपना स्तन मुक्त कर उसको पीछे ही तरफ धकेला, जिससे वह रेत पर पीठ के बल गिर गयी। मैंने कुछ पल उसको निहारा, फिर अपना चेहरा रश्मि के पास ला कर अपने होंठ उसके होंठो से सटा दिए। तुरंत ही मुझे दो अत्यंत कोमल होंठो का स्वाद मिलने लगा।

मैं नहीं चाहती थी की रश्मि इस नए अनुभव से डर जाए या घबरा जाए, इसलिए मैंने उसके होंठों पर हलके हलके कई चुम्बन जड़ दिए। मैंने देखा की रश्मि बुरा नहीं मान रही हैम तो थोड़ी और तेज़ी और जोश के साथ उसको चूमना आरम्भ कर दिया। मैंने उसके दोनों गाल अपने हाथो में लेकर से थोडा दबा दिया, जिससे उसके होंठ खुल गए। मैंने अपनी जीभ रश्मि के मुँह में डाल कर अन्दर का जायजा लेना और चूसना शुरू कर दिया।
 
मैंने एक हाथ उसके गाल से हटाया तो रश्मि का मुँह फिर से बंद हो गया – हो सकता है की उसको मेरा इस तरह से चूमना पसंद न आया हो। खैर, मुझे भी उसके स्तनों का स्वाद चाहिए था – मेरा हाथ इस सामय उसके एक स्तन पर टिका हुआ था, और उसको धीरे धीरे दबा रहा था। अब एक साथ ही उसके होंठों और दोनों स्तनों का मर्दन आरम्भ हो गया। रश्मि का पूरा शरीर पहले से ही कामोन्माद के कारण काफी संवेदनशील हो गया था, और अब इस नए प्रहार के कारण अब वह असहज होने लगी। उसके मुँह से कराहें निकलने लगीं। फिर भी, मैंने उसके दोनों निप्पल बारी बारी से अपने मुँह में भर कर चूसना आरम्भ कर दिया। वो अब बहुत कड़े हो गए।

फिर मैंने उसकी योनि पर अपनी उंगलियाँ सटा दी, और उसे मसलने लगी। मेरी खुद की हालत कोई ख़ास अच्छी नहीं थी – रश्मि और रूद्र के मैथुन, मेरी खुद की यौन भ्रान्ति (पता नहीं की मैं समलैंगिक हूँ या इतरलैंगिक?), और अब रश्मि जैसी सुंदरी को इस प्रकार दुलारने से मेरी खुद की योनि भी काम रस टपकाने लगी। मुझ पर भी रश्मि के सामान ही मदहोशी छा रही थी। मुझे रश्मि की योनि का स्वाद भी लेना ही था – मैंने उसके पैरों के बीच में अपना मुँह लाकर उसकी योनि से सटा दिया और जीभ से उसका रस चाटने लगी। रश्मि की योनि से बहुत सारा तरल निकल रहा था – उसकी योनि का रस, जिसमे रूद्र का वीर्य भी सम्मिश्रित था! अनोखा स्वाद!

मुझे अचानक ही अपने पीछे एक और जिस्म की अनुभूति हुई – किसी ने मेरे कंधे को पकड़ कर खुद को मुझसे चिपका लिया था। और उसी के साथ ही मुझे मेरी योनि की दीवार पर अभूतपूर्व खिंचाव महसूस हुआ। मुझे समझ आ गया की क्या हुआ है – रूद्र का लिंग मेरी योनि की दीवारों को फैलाता हुआ अंदर घुस रहा था। थ्रीसम का ऐसा अनुभव तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

जैसे ही उसका लिंग मेरी योनि में आगे बढ़ा मेरे मुँह से एक गहरी आआअह्ह्ह निकल पड़ी। उसका लिंग मेरी योनि की गहराइयों में उतर गया, और फिर बाहर भी निकल पड़ा – लेकिन मेरे राहत की एक भी सांस लेने से लहले ही वह वापस घुस गया। मुझे यकीन हो गया की रूद्र मेरे साथ सम्भोग कर ही लेगा, लेकिन फिर भी मैंने उसको रोकने की एक आखिरी कोशिश करी।

“रूद्र.... आह्ह्ह! आई ऍम अ लेस्बियन!”

“हह हह हह ... ट्राई स्ट्रैट सेक्स वन्स। देन डिसाइड... ओके?”

फिर शायद उसको कुछ याद आया,

“आर यू सेफ? आई मीन...”

“यस... आह! आई ऍम सेफ! एंड आर यू?”

“यस! नो एस टी डी!”

कह कर रूद्र ने धक्के लगाने आरम्भ कर दिए। क्या बताऊँ! उस वक्त मुझे ऐसा मज़ा आ रहा था जैसे की मैं आसमान मैं उड़ रही हूँ। मेरे मुँह में रश्मि की क्लिटोरिस थी, जिसको मैं अपनी जीभ से सहला रही थी और उधर मेरी योनि की कुटाई हो रही थी।

“आह ऊह! इट इस हर्टिंग! इट इस सो बिग! माई वेजाइना इस स्मार्टिंग! हाऊ डस शी टेक इट इन?”

मैंने उसके आगे पीछे वाले धक्के से अपनी लय मिलानी शुरू कर दी। हर धक्के से उसका लिंग मेरी योनि के पूरी भीतर तक घुस जाता। वो जोर-जोर से मुझे भोगने लगा – और मैं रश्मि को भोगना भूल गई। वह मुझे पीछे से होकर मेरे स्तनों को दबोच दबोच निचोड़ रहा था। उसके रगड़ने से मेरे पूरे शरीर में सिहरन सी दौड़ने लगी। उसके जोरदार धक्के मुझे पागल बना रहे थे। कोई चार पांच मिनट तक वह मुझे ऐसे ही ठोंकता रहा - उसके धक्कों से मैं निढाल होकर पूरी तरह थक गई। फिर मुझे मेरी योनि में गरम गरम वीर्य की बूँदें गिरती महसूस हुई। कम से कम बीस साल बाद किसी पुरुष ने मुझे भोगा था – लेकिन ऐसा मज़ा मुझे पूरे जीवन में कभी नहीं आया।

हम तीनों बुरी तरह से थक कर वही गिर कर एक दूसरे की बाहों में कुछ देर लेटे रहे। और फिर सुस्ताने के बाद हमने कैमरे को ऑटो-मोड में सेट कर हम तीनों की वैसी ही नग्नावस्था में विभिन्न प्रकार की तस्वीरें खींची, एक दूसरे के गले लगे और फिर अपने कपड़े पहन कर वापस रिसोर्ट जाने के लिए तैयार हो गए। अगले दस मिनट में हम लोग वापस हेवलॉक द्वीप के लिए रवाना हो गए।

जैसे जैसे हम लोग अपने रूम की तरफ आ रहे थे, मैंने देखा, की रश्मि का चेहरा उतरता जा रहा था। उसके चेहरे पर उदासी, गुस्सा, निराशा, खीझ, घृणा, और जुगुप्सा जैसे मिले जुले भाव आते और जाते जा रहे थे। उसके चेहरे को देख कर मेरे खुद के मजे का नशा पूरी तरह से उतर गया था और समझ नहीं आ रहा था की क्या करूँ! मैं जानना चाहता था की उसके मन में क्या चल रहा है, लेकिन उस समय मैंने खुद तो जब्त कर लिया और रूम तक पहुँचने तक का इंतज़ार किया। हम दोनों जैसे ही अन्दर आये रश्मि के सब्र का बाँध टूट गया,

“आपका अपनी बीवी से मन भर गया?”

जैसे जैसे हम लोग अपने रूम की तरफ आ रहे थे, मैंने देखा, की रश्मि का चेहरा उतरता जा रहा था। उसके चेहरे पर उदासी, गुस्सा, निराशा, खीझ, घृणा, और जुगुप्सा जैसे मिले जुले भाव आते और जाते जा रहे थे। उसके चेहरे को देख कर मेरे खुद के मजे का नशा पूरी तरह से उतर गया था और समझ नहीं आ रहा था की क्या करूँ! मैं जानना चाहता था की उसके मन में क्या चल रहा है, लेकिन उस समय मैंने खुद तो जब्त कर लिया और रूम तक पहुँचने तक का इंतज़ार किया। हम दोनों जैसे ही अन्दर आये रश्मि के सब्र का बाँध टूट गया,

“आपका अपनी बीवी से मन भर गया?”

“क्या! ... आप ऐसे क्यों कह रही हैं, जानू?” मुझे तो जैसे काटो खून नहीं।

“आप प्लीज सच सच बताइये... मैं बुरा नहीं मानूंगी! मुझसे आपका मन भर गया है न?”

“क्या बकवास कर रही हो?”

“बकवास नहीं है! देखिये.... आपने मुझ पर पहले कभी भी गुस्सा नहीं किया.. और आज यह भी शुरू हो गया। क्या मैं आपके लिए ठीक नहीं हूँ?“ कह कर रश्मि सुबकने लगी।

“जानू, मैं आप पर नहीं, आपकी बात पर गुस्सा हो रहा हूँ! आप ऐसा सोच भी कैसे सकती हैं? क्यों भरेगा मेरा मन आपसे? इसका तो सवाल ही नहीं उठता! आप यह सब क्या बातें कर रही हैं?” अब तक मेरी हवाइयां उड़ने लगी।

“क्या सोच रही हैं आप? क्या चल रहा है दिमाग में? प्लीज बताइए न? ऐसे मत करिए मेरे साथ!” मैं गिड़गिड़ाया।

“आप वो मॉरीन के साथ .... कर रहे थे! अब मैं इसको क्या समझूं?”

“ओह गॉड! ... शिट! तो यह बात है!?” मैंने माथा पीट लिया।

“जानू! मैंने वो सब कुछ प्लान नहीं किया था - ऑनेस्ट! गॉड प्रोमिस! वो कुछ भी नहीं है! मॉरीन कोई भी नहीं है! मैंने मॉरीन को कुछ भी नहीं कहा – वो हम दोनों को सेक्स करते देख कर खुद भी उत्तेजित हो गई..... और इसलिए उसने आपके साथ...... दरअसल, आप दोनों को ऐसी हालत में देख कर मेरा खुद पर कोई काबू ही नहीं रहा। वह सब कुछ ऐसा लग रहा था जैसे की किसी ने मुझ पर सम्मोहन डाल दिया हो। सच में जानू! प्लीज... मुझ पर विश्वास करो!” मैंने अपनी तरफ से सफाई दी।

“आप दोनों ने मेरे साथ यह करने का प्लान किया था?”

“नहीं जानू! मैंने आपको कहा न! और तो और, मॉरीन एक लेस्बियन है ... मतलब वह आदमियों से नहीं, औरतों से सेक्स करती है। पहले तो हम दोनों को सेक्स करते देख कर, और फिर आपको देखकर ... आई मीन, आप इतनी सेक्सी हैं की वह अपने आपको रोक नहीं पाई।“

“तो आपने उसको मेरे साथ यह सब इसलिए करने दिया?”

“मैंने उसको यह सब करने को नहीं कहा था जानू! प्लीज बिलीव मी!!” मेरी दलील उलटी पड़ रही थी।

“तो इसका मतलब उसने मेरे साथ वह सब कुछ यूँ ही कर लिया?”

“हाँ!” मैंने अनिश्चय के साथ हामी भरी।

“और आपने उसको रोका भी नहीं?” रश्मि की आँखों से आंसू गिरने लगे।
 
“जानू... अररर ... आपको देख कर ऐसा लग रहा था की आप भी एन्जॉय कर रही हैं.. इसलिए मैंने नहीं रोका।“ इससे बे-सर-पैर वाला बहाना या सफाई मैंने कभी नहीं दी!

“तो आपका यह कहना है की कोई भी मेरे साथ सेक्स कर लेगा.... क्योंकि मैं.... सेक्सी हूँ?”

“ऐसे कैसे कर लेगा, कोई भी! मेरे कहने का मतलब था की कोई भी आपके साथ सेक्स करना चाहेगा! आप सुन्दर हैं, जवान हैं...! कोई क्यों नहीं चाहेगा? हाँ – कुछ एक अपवाद हो सकते हैं।”

“इसका मतलब आप भी किसी सुन्दर और जवान लड़की को देख कर उसके साथ सेक्स करना चाहेंगे?”

“मैंने कहा न, कुछ एक अपवाद हो सकते हैं?”

“मतलब आप एक अपवाद हैं?”

“हाँ!”

“कैसे?”

“क्योंकि मैं आपसे प्यार करता हूँ!”

“अच्छा! और कोई कारण?”

“और हम दोनों मैरिड हैं!”

“हम्म... और?”

“और क्योंकि मैं आपसे झूठ नहीं बोलूँगा, और आपको किसी भी तरह की तकलीफ नहीं होने दूंगा!”

“अच्छा – तो आप किसी और लड़की को ‘मेरे लिहाज’ के कारण नहीं .... करेंगे! नहीं तो कर लेते?”

“जानू... मैं आपका गुस्सा समझ सकता हूँ.. लेकिन यह सब क्या है?”

“आप मुझे सीधा सीधा जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं? अच्छा, सच सच बताइए, जब आप किसी सुन्दर दिखने वाली लड़की को देखते हैं, तो उसके साथ सेक्स करने का मन नहीं होता?”

“जानू, मैंने कभी आपसे मेरे पिछले अफेयर्स के बारे में छुपाया? चाहता तो छुपा लेता! आपको कैसे मालूम होता? बताइए?”

“आपने मेरी बात का जवाब नहीं दिया?”

“क्या जवाब चाहिए आपको?”

“सच..”

“सच जानना है आपको? तो सुनो – हाँ बिलकुल मन में आता है की ऐसी लड़की दिखे तो पटक कर चोद दूं! लेकिन मुझमें और किसी रेपिस्ट या जानवर में कोई अंतर है... और वह अंतर है की मैं मानवता के बताये रास्ते पर चलता हूँ। मेरे अपने संस्कार हैं... और किसी की मर्ज़ी के खिलाफ जोर-जबरदस्ती करना गलत है।“

“.... और अगर लड़की चाहे, तो?”

“ज्यादातर लड़कियाँ ऐसे नहीं चाहती!”

“अच्छा! तो अब आपको ज्यादातर लड़कियों के मन की बातें भी पता हैं! वह! और आप ऐसा कह सकते हैं क्योंकि?”

“क्योंकि, मेरे ख़याल से, आदमी और औरतों की प्रोग्रामिंग बिलकुल अलग होती है!”

“अच्छा जी! आदमी चाहे तो कितनी ही लड़कियों की कोख में अपना बीज डालता रहे .. लेकिन औरतें बस एक ही आदमी की बन कर रहें, और उनके बच्चे पालें?”

“नहीं ... यह तो बहुत ही रूढ़िवादी सोच है! इस तरह से नहीं, लेकिन मेरे ख़याल से लड़कियाँ पहले प्रेम चाहती हैं, और फिर सेक्स!”

“अच्छा, एक बात बताइए.... अगर मॉरीन की जगह कोई आदमी होता तो?” रश्मि लड़ाई का मैदान छोड़ ही नहीं रही थी।

“तो उसकी टाँगे तोड़ कर उसके हाथ में दे देता। मैं आपसे सबसे ज्यादा प्रेम करता हूँ... और आपके प्यार को किसी के साथ नहीं बाँट सकता।“ मैंने पूरी दृढ़ता और इमानदारी से कहा।

“मतलब जो मॉरीन ने किया वह गलत था.. है न?”

“नाउ दैत यू पुट इट लाइक दैत (अब जब आप ऐसे कह रही हैं तो)... यस! हाँ .. वह गलत था।“ मैंने अपना दोष मान लिया।

“आपके लिए इतना काफी नहीं था की अपनी बीवी की नुमाइश लगा रखी थी...?” लेकिन रश्मि का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था, “.... शी वायलेटेड मी!” रश्मि चीख उठी! दिल का गुबार उस एक चीख के साथ निकल गया... रश्मि अब शांत होकर रो रही थी। मैंने उसको रोने दिया – मेरी गलती थी ... लेकिन मेरी माफ़ी के लिए उसको संयत होना आवश्यक था।

मैंने आगे बढ़ कर रश्मि को अपने आलिंगन में बाँध लिया और कहा,

"श्ह्ह्ह्ह .... प्लीज मत रोइये। मेरा आपको ठेस पहुचाने का कोई इरादा नहीं था। आई ऍम सो सॉरी! ऑनेस्ट! आपको याद है न, मैंने आपको प्रोमिस किया था की मैं आपको किसी भी ऐसी चीज़ को करने को नहीं कहूँगा, जिसके लिए आप राज़ी न हों? मैं आपको बहुत प्यार करता हूँ, और आपको कभी दुखी नहीं देख सकता।"

ऐसी बाते करते हुए मैं रश्मि को चूमते, सहलाते और दुलारते जा रहा था, जिससे उसका मन बहल जाए और वह अपने आपको सुरक्षित महसूस करे। जिस लड़की को मैं प्रेम करता हूँ, वह मेरे मूर्खता भरी हरकतों से दुखी हो गयी थी।

"रश्मि ... मेरी बात सुनिए, प्लीज!"

“जानू, आई ऍम सॉरी! आई ऍम वेरी सॉरी! प्लीज मुझे माफ़ कर दीजिये। मैंने कभी भी यह सोच कर कुछ भी नहीं किया जिससे की आपकी बेइज्जती हो। मैं आपको बहुत प्यार करता हूँ – अपनी जान से भी ज्यादा! और आपकी बहुत रेस्पेक्ट भी करता हूँ। प्लीज मेरी बात पर विश्वास करिए।“

“एंड, आई ऍम रियली वेरी सॉरी! अपने मज़े की धुन में मैंने यह नहीं सोचा की आपको और आपकी भावनाओं को ठेस लग सकती है। काम के वशीभूत होकर मैंने न जाने क्या क्या गुनाह किए हैं। मैं सच कहता हूँ मेरे मन में बस एक ही धुन सवार रहती है की किसी तरह आपके साथ सेक्स किया जाय..”

मैंने कहते हुए उसके माथे को चूमा और उसके बालों को सहलाया, “... पर अब मुझे लगने लगा है की मैं अपनी परी के साथ ठीक नहीं कर रहा हूँ। मैं सच कहता हूँ की मैं आपको प्यार करता हूँ – और इसका मतलब है की सिर्फ आपके शरीर को नहीं .. आपके मन, दिल और पूरी पर्सनालिटी को! लेकिन आप मेरे पास रहती हैं तो अपने को रोक नहीं पाता – और सेक्स को स्पाइसी बनाने के लिए न जाने क्या क्या करता हूँ।“

रश्मि का रोना, सुबकना अब तक ख़तम हो गया था। वह अब तक संयत हो गयी थी और मेरी बातें ध्यान से सुन रही थी। उसने कुछ देर तक मेरी आँखों में देखा – जैसे, मेरे मन की सच्चाई मापना चाहती हो।

“जानू.. मैं भी आपके साथ प्यार की दुनिया बनाना चाहती हूँ। मेरा मन है की जैसे आपने मुझे अभी पकड़ा हुआ है, वैसे ही हम एक दूसरे को बाहों में जकड़े सारी जिन्दगी बिता दें। और आप मेरे साथ जितना मन करे, सेक्स करिए – जैसे मन करे, वैसे करिए। मुझे अपनी प्यार की बारिश से मेरे तन मन को इतना भर दीजिये कि मैं मर भी जाऊं तो मुझे कोई गम ना हो। ... बस, मुझे किसी और के साथ शेयर मत करिए!”

"हाँ मेरी जान! अब मैं ऐसी गलती कभी नहीं करूँगा! आई ऍम सॉरी!"

मैं रश्मि को आलिंगनबद्ध किये हुए ही बिस्तर पर बैठने लगा, और रश्मि भी मेरी गोद में आकर बैठ गई और अपनी बाहें मेरे गले में डाल दी। वो इतनी प्यारी लग रही थी की मैंने उसके होंठों को चूम लिया।

“आई लव यू! एंड, आई ऍम सॉरी! अब ऐसी गलती कभी नहीं होगी।”

“आई लव यू टू! और आपको सॉरी कहने की ज़रुरत नहीं।”

रश्मि को चूमने के साथ साथ मुझे समुद्री नमकीन स्वाद महसूस हुआ – मतलब, नहाने का उपक्रम करना चाहिए था। लेकिन उसको चूमने – उसके होंठो का रस पीने – से मेरा मन अभी भरा नहीं था। रश्मि मेरी गोद में बैठी थी और हमारे होंठ आपस में चिपके हुए थे। हम दोनों ही इस समय अपनी जीभें एक दूसरे के मुंह में डाल कर इस समय कुल्फी की तरह चूस रहे थे। मैं कभी उसके गालों को चूमता, तो कभी होंठो को, तो कभी नाक को, तो कभी उसके कानो को, या फिर उसकी पलकों को। इसी बीच मैंने कब उसकी बीच मैक्सी उतार दी, उसको शायद पता भी नहीं चला (ढीला ढाला हल्का कपड़ा शरीर पर पता ही नहीं चलता)। कोई 5 मिनट के चुम्बन के आदान प्रदान के बाद जब हमारी पकड़ कुछ ढीली हुई तो रश्मि को अपने बदन पर मैक्सी न होने का आभास हुआ।

“जानू, आँखें खोलो।”

“नहीं पहले आप मेरी मैक्सी दीजिये.... मुझे शर्म आ रही है।”

“अरे शरम! मेरी रानी .... कैसी शरम? तुम इस कास्ट्यूम में कितनी खूबसूरत लग रही हो! मेरी आँखों से देखो तो समझ में आएगा!”

“धत्त!”

“और वैसे भी यह भी उतरने ही वाला है... नहाना नहीं है?”

उसने मुझे चिढ़ाते हुए कहा, “अच्छा जी... और आपको नहीं नहाना है? आपके कपडे तो ज्यों के त्यों हैं।”
 
मुझे क्या आपत्ति हो सकती थी? मैं तो इसी ताक में था। रश्मि को अलग कर मैंने लगभग तुरंत ही कपडे उतार दिए और बेड पर सिरहाने की ओर आकर बैठ गया। मेरा लिंग इस समय अपने पूरे आकार में आकर निकला हुआ था। रश्मि ने पहले तो अपनी उँगलियों से उसे प्यार से छुआ और फिर सहलाया और फिर अप्रत्याशित रूप से उस पर एक चुम्बन रसीद कर दिया। मेरे लिंग ने उसकी इस क्रिया के अनुकूल उत्तर दिया और पत्थर की तरह कठोर हो गया। अब रश्मि मेरे ऊपर लगभग औंधी लेट कर मेरे लिंग के साथ खेल रही थी, और मैं उसके चिकने नितम्बों के साथ - मैंने उन पर कपड़े के ऊपर से ही प्यार से हाथ फिराना शुरू कर दिया। मैंने उसकी स्विमसूट को थोडा सा खिसका कर अपनी उँगलियों से उसकी नितम्बों के बीच की दरार पर सहलाना शुरू कर दिया। और उधर, रश्मि मेरे लिंग को मुँह में रख कर चूस रही थी।

उसकी नरम मुलायम जीभ का गुनगुना अहसास मेरे लिंग पर महसूस कर के मुझे फिर से मदहोशी छाने लगी। दोस्तों, कुछ भी हो – अपने जीवन में कम से कम एक बार अपनी प्रेमिका/पत्नी को अपने लिंग का चूषण करने को अवश्य कहिये। यह एक ऐसा अनुभव होता है, जिससे आगे और कुछ भी नहीं। उसने कोई 5-6 मिनट उसने मेरा लिंग चूसा होगा, फिर वो अपने होंठो पर जीभ फेरती हुई उठ खड़ी हुई। उसकी आँखों में एक शैतानी चमक थी।

मैंने रश्मि को पुनः अपनी बाहों में भर लिया, और फिर से उसके होंठो पर अपने होंठ रख दिए। उसके मुंह से मुझे मेरे ही रस की खुशबू और स्वाद महसूस हुई।

मैंने उसके स्विमसूट के ऊपर से उसके स्तन को छूते हुए कहा, “मेरी जान, अब इसका क्या काम है? ज़रा अपने मीठे मीठे, रसीले संतरों को आज़ाद करो ना... प्लीज!”

“आप ही आज़ाद कर दो...” रश्मि ने कहा।

मैंने झटपट उसकी कास्ट्यूम की डोरी खोल दी और उसके तन से उतार कर अलग कर दी। रश्मि के दोनों स्तन तन कर ऐसे खड़े हो गए, मानो उन्हें बरसों के बाद आजादी मिली हो। मैंने आगे बढ़ कर उन पर तड़ातड़ उनपर चुम्बनों की बरसात कर दी। रश्मि के पूरे शरीर में सिहरन को लहर दौड़ गयी। मैंने उसके निप्पल पर धीरे से जीभ फिराई और उसको पूरे का पूरा अपने मुंह में भर कर चूसने लगा। रश्मि सिसकारियां गूंज उठीं। वह मेरी गोद में बैठी थी - मेरा एक हाथ उसके नग्न नितम्बों पर घूम रहा था, तो दूसरा हाथ उसका दूसरा स्तन दबा-कुचल रहा था।

मेरे चूसने के कारण उसके निप्पल तन कर पेन की तरह एकदम तीखे हो गए। मैंने उसे बेड पर लिटा दिया और उसके एक हाथ को थोडा ऊपर उठा कर उसकी कांख पर चूमने और चाटने लगा। समुद्री पानी की महक, और नमकीन स्वाद से मेरे मन में मादकता और भर गयी। मेरे चाटने और चूमने से रश्मि उतेजना और गुदगुदी से रोमांचित हो चली। उसको वहां पर चूमने के बाद, मैंने पुनः उसका चेहरा अपनी हथेलियों में थाम कर उसके होंठ, माथे, आँखों, गालों, नाक और कानों को चूमता चला गया। रश्मि पलकें बंद किये एक अलग ही दुनिया की सैर कर रही थी - उसकी साँसे तेज चल रही थी होंठ कंपकपा रहे थे। मैंने उसके गले और फिर उसके स्तनों को चूमा, और फिर दोनों स्तनों के बीच के हिस्से को जीभ लगा कर चाटा। रश्मि बस सिसकारियां भर रही थी।

मैंने धीरे से उससे कहा, “जानू, आँखें खोलो!”

लेकिन उससे हो नहीं पाया। खैर, मैंने उसे एक बार फिर बाहों में भर कर पुनः उसकी पलकों पर एक चुम्बन दिया। काम और प्रेम का मिश्रित प्रभाव रश्मि पर अब साफ़ देखा जा सकता था। सचमुच, ऐसी अवस्था में लिप्सा रस में डूबी, नवयौवना, नवविवाहिता भारतीय नारी सचमुच रति का ही अवतार लगती है। मैंने उसके गालों को चूमते हुए उसके होंठों पर फिर से होंठ लगा दिए। उसने भी मुझे चूम लिया और अपनी बाहों में मुझे जोर से कस लिया। उसका शरीर कांप रहा था। मैंने धीरे धीरे उसके गले को चूमा और फिर से नीचे की तरफ उतरते हुए उसके स्तनों को चूमता हुआ उसकी नाभि के छेद को चूमने और अपनी जीभ की नोक से सहलाने लगा – रश्मि बस मीठी सीत्कार किये जा रही थी।

“आह! ओह..! जानू! ये आप क्या कर रहे हो? प्लीज बस करो! मैं मर जाउंगी।”

मैं बिना कुछ बोले उसकी नाभि में अपनी जीभ की नोक लगा कर झटके दे रहा था। रश्मि ने कस कर अपनी जांघें भींच ली और मेरे सिर के बाल पकड़ लिए। फिर नीचे आते हुए मैंने जैसे ही उसके पेडू पर जीभ लगाई, उसने एक जोर की किलकारी मरी – उसमे हंसी, पीड़ा, आनंद और वासना की मिश्रित ध्वनि निकली। उसका शरीर बेकाबू होकर कांपने लगा और कांपता ही गया। मुझे समझ आ गया की रश्मि अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गयी है। मैंने इतनी देर में पहली बार उसकी योनि पर चुम्बन लिया – वह हिस्सा कामरस से पूरी तरह से भीग गया था। जैसे ही मैंने वहां पर अपने होंठ रखे, उसकी जांघें चौडी होती चली गई।

मैने अपनी दोनों हाथों की उँगलियों से उसकी योनि की पंखुडियों को थोडा फैलाया – उत्तेजना के मारे रक्तिम हो चली उसकी क्लिटोरिस और वाकई रश्मि की छोटी उंगली की परिधि वाली योनि छेद मेरे सामने उपस्थित हो गयी। मैं अब भला कैसे रुक सकता था? मैने अपने होंठ उन फंको पर रख दिए – इस छुवन से रश्मि का पूरा शरीर काँप गया, और मुंह मीठी सिसकारियां निक़ल रही थी। मैने उसके भगनासे को जैसे ही अपनी जीभ से टटोला, उसकी योनि से कामरस की आपूर्ति होने लगी। रश्मि का ओर्गास्म अभी भी जारी था – कमाल है! मैंने दो तीन मिनट तक उसका योनि-रस-पान किया और फिर उठ कर अपने लिंग को उसके द्वार पर स्थापित किया।

इस लम्बे फोरप्ले के दौरान मेरा खुद की उत्तेजना अपने शिखर पर थी, लिहाजा, मेरा स्वयं पर काबू रखना बहुत ही मुश्किल था। कोई तीन-चार मिनट तक जोरदार ताबड़-तोड़ धक्के लगाने के बाद मैं उसके अन्दर ही स्खलित होकर शांत हो गया। आज यह तीसरी बार था – इसलिए वीर्य की मात्रा अत्यल्प थी। ऊपर से थकावट बहुत अधिक हो गयी थी, इसलिए मैं रश्मि के ऊपर ही गिर गया।

“हटो गंदे बच्चे!” रश्मि ने मुझे अपने ऊपर से हटाया, और आगे कहना जारी रखा, “आपने तो मुझे मार ही डाला।“ रश्मि अपनी योनि को सहलाते हुए बोली, “कोई इतनी जोर से करता है क्या? आःहह..!”

“हा हा हा!”

दूसरे हाथ की उँगलियों से उसने मेरे सिकुड़ते हुए लिंग को पकड़ कर मुझे चिढाते हुए कहा, “हाँ हाँ ... हँस लीजिये! मुसीबत तो मेरी है न! ये आपका जो केला है न, उसको काट कर छोटा कर देना चाहिए... और कटर से छील कर पतला भी कर देना चाहिए! मेरी तकलीफ़ कम हो जाएगी!”

“ये केला कट गया तो आपकी तकलीफ़ के साथ साथ आपका मज़ा भी कम हो जायेगा!” फिर थोड़ा रुक कर,

“क्या वाकई आपको बहुत तकलीफ होती है?”

“नहीं जानू... मजाक कर रही थी मैं। ऐसी कोई तकलीफ तो नहीं होती – मुझे अभी ठीक से आदत नहीं है न.. इसलिए, लगता है की थोड़ा .... कैसे कहूँ... उम्म्म... जैसे घिस गया हो, ऐसा लगता है। वो भी काफी बाद में!”

कुछ देर हम लोग बिस्तर पर पड़े हुए अपनी साँसे ठीक करते रहे, और फिर रश्मि ने बोला,

“जानू, हमको थोड़ा सावधान रहना होगा।“ वह थोड़ा शरमाई, “... पिछले एक हफ्ते से हम दोनों बिना किसी प्रोटेक्शन के सेक्स कर रहे हैं।“ मेरे कान सावधानी में खड़े हो गए। “अगर आप चाहते हैं तो ठीक है... लेकिन मैं.... प्रेग्नेंट... हो जाऊंगी!”

बात तो सही है – मैं भी इतना भोंपा हूँ की बिना किसी जिम्मेदारी के बस पेलम-पेल मचाये डाल रहा हूँ और एक बार भी नहीं सोचा की इतनी छोटी लड़की के कुछ अरमान होंगे जिंदगी जीने के! अगर इतनी छोटी सी उम्र में वह माँ बन गयी तो सब चौपट!

“आप माँ बनना चाहती हैं?”

“अगर आप कहेंगे तो मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी।“

“लेकिन अभी नहीं... है न?”

“कम से कम.. पढाई पूरी हो जाए?” रश्मि ने शर्माते हुए कहा।

“आपके पीरियड्स कब हैं?”

“तीन चार दिन बाद...!” यह इतना व्यक्तिगत सवाल था की रश्मि को और नग्नता का एहसास होने लगा – उसके चेहरे पर शर्म की लालिमा साफ़ दिख रही थी।

“आई ऍम सॉरी जानू! आई ऍम वेरी सॉरी! मैं बहुत ही गैर-जिम्मेदार आदमी हूँ!”

“आप ऐसा न कहिए.. प्लीज! मैं भी आपसे बहुत प्यार करती हूँ। आप जैसे कह रहे थे... लड़कियाँ वैसे नहीं होतीं... कम से कम मैं नहीं हूँ... जैसे आप नहीं रह पाते हैं, वैसे ही मैं भी नहीं रह पाती हूँ... तो क्या हुआ की आप मुझे इस तरह से झकझोर देते हैं...”

“दिस इस द सेक्सिएस्ट थिंग आई एवर हर्ड इन माई होल लाइफ! (यह मेरे जीवन की सबसे कामुक बात है, जो मैंने सुनी है)।“ कह कर मैंने उसको अपनी बाहों में समेट लिया।

“बस... हमें सतर्क रहना चाहिए।“ रश्मि ने मुस्कुराते हुए कहा।
 
हमने साथ में ही नहाया – कोई और समय होता तो संभव है की सम्भोग का एक और दौर चलता... लेकिन शरीर में खुद की एक सुरक्षा प्रणाली होती है, जिसके कारण आप लगातार सम्भोग नहीं कर सकते। वैसे भी आज जो भी कुछ हुआ वह अत्यंत अप्रत्याशित था, इसलिए मैं खुद भी जल्दी जल्दी उत्तेजित होकर तैयार भी हो गया। यदि किसी बहुत भूखे इंसान को अचानक ही छप्पन भोग परोस दिया जाय तो वह पागल कुत्ते के समान उसको निबटा लेगा... लेकिन वही छप्पन भोग यदि उसको रोज़ परोसा जाय, तो उसकी भूख नियंत्रण में आ जाती है।

नहा धोकर मैंने सिर्फ अपना अंडरवियर पहना और फोन कर के हल्का फुल्का खाना मंगाया – खाकर आराम करने की इच्छा हो रही थी। रश्मि ने कफ्तान स्टाइल वाला बीच वियर पहना हुआ था – यह पॉलिएस्टर का बना एक पारदर्शी पहनावा था, जो समुद्री नीले-हरे रंग का था और जिस पर फूलों के प्रिंट बने हुए थे। गले के नीचे एक लूप जैसा था जहाँ पर डोर से इसको बाँधा जा सकता था। काफी ढीला ढाला परिधान था - उसकी लम्बाई जाँघों के आधे हिस्से तक आती थी और हाथ का ऊपर वाला हिस्सा ही ढकता था। उसके अन्दर रश्मि ने काले रंग की विस्कोस और एलास्टेन की पैडेड पुश-अप ब्रा और काले ही रंग की पैंटीज पहनी हुई थी। उसने अपने बाल शैम्पू किये थे, जिसके कारण वह अभी भी गीले थे और उनसे रह रह कर पानी टपक रहा था। बाला की ख़ूबसूरत!

इस समय वह अपने बालों को तौलिये से रगड़ कर सुखाने की कोशिश कर रही थी। मेरे मुँह से अनायास ही यह गाना निकल गया,

“ना झटको ज़ुल्फ़ से पानी, ये मोती फूट जायेंगे।

तुम्हारा कुछ न बिगड़ेगा, मगर दिल टूट जायेंगे।“

“हा हा! आपको हर सिचुएशन के लिए कोई न कोई गाना याद है!”

“आप हैं ही ऐसी – हर सिचुएशन को एकदम से सेक्सी बना देती है, तो गाना ख़ुद-ब-ख़ुद निकल पड़ता है! आपकी इस हालत में कुछ फोटो निकालने का तो बनता है! इजाज़त है?”

रश्मि ने सर हिला कर अनुमति दे दी।

मैंने उसकी कई सारी तस्वीरें निकाली, की इतने में ही परिचायक खाना लेकर आ गया। मैंने उसको कैमरा देकर हम-दोनों की कुछ तस्वीरें लेने को बोला। मुझे पक्का यकीन है की साले ने कैमरे के व्यू-फाइंडर से रश्मि के जिस्म से अपनी खूब नैन-तृप्ति करी होगी...

‘खैर, कर ले बेटा, अपनी नैन-तृप्ति! तुझे यह लड़की बहुत दूर से सिर्फ देखने को नसीब होगी। ऐसे ही तरसते रहियो!’

कोई सात-आठ तस्वीरें क्लिक करने के बाद उसने बेमन से विदा ली। उसको ज़रूर कल रात वाले परिचायक ने बताया होगा, लेकिन हर-एक की किस्मत सामान थोड़े न होती है।

हमने अपना खाना पीना समाप्त किया और फिर मैंने रश्मि को कहा की वो चाहे तो आराम कर ले, क्योंकि मैं भी कैमरे से तस्वीरें अपने कंप्यूटर में कॉपी कर के आराम करने के मूड में हूँ!

“कंप्यूटर? किधर है कंप्यूटर?”

“मेरा मतलब मेरा लैपटॉप!”

“वो क्या होता है?” अच्छा, अब समझा – रश्मि ने अभी तक वो बड़े वाले डेस्कटॉप के बारे में ही जाना होगा। खैर, मैंने लैपटॉप बाहर निकाल कर उसको दिखाया। वो उसको देख कर प्रत्यक्ष रूप से काफी उत्साहित हो गयी।

“आप मुझे इसके बारे में सिखायेंगे?”

“अरे! क्यों नहीं... बिलकुल सिखाऊँगा!”

मैंने अपना लैपटॉप ऑन कर के उसे इसके बारे में बताना शुरू किया। रश्मि को थोड़ा-बहुत ज्ञान था, लेकिन वह सब पुराना और किताबी ज्ञान था। मैंने उसे कंप्यूटर चालू करने, ऑपरेट करने, और फिर बंद करने के बारे में विस्तार से बताया। फिर मैंने उसे विन्डोज़, इन्टरनेट और ईमेल के बारे में भी बताया – दरअसल आम आदमी के काम की चीज़ें तो यही होती हैं! फाइल्स कैसे खोली जाएँ, प्रोग्राम्स कौन कौन से होते हैं, गाने सुनना, फिल्म देखना, विडियो-चैट इत्यादि! उसको सबसे ज्यादा उत्साह ईमेल और इन्टरनेट के बारे में जान कर हुआ।

खैर, फिर मैंने कैमरे को लैपटॉप से जोड़ कर तस्वीरें कॉपी करनी शुरू करी। कोई पंद्रह मिनट बाद सारी तस्वीरें जब कॉपी हो गईं तो वह जिद करने लगी की चलो तस्वीरें देखते हैं। मेरा मन था की कोई आधे घंटे की नींद ले ली जाय, लेकिन उसके उत्साह को देखकर उसको मना करने का मन नहीं हुआ। कैमरे में हमारी शादी की तस्वीरें (जो मेरे दोस्तों ने खींची थीं), कुछ तस्वीरें उसके कसबे की, कुछ हमारे रिसेप्शन की (जो मेरे दोस्तों और पड़ोसियों ने खींची थीं), और फिर ढेर सारी तस्वीरें हमारे हनीमून की! हमारी जो तस्वीरें मॉरीन ने खींची थी, उनको देख कर रश्मि के मुँह से ‘बाप रे’ निकल गया.... वाकई, सारी की सारी बहुत ही कलात्मक और कामोद्दीपक तस्वीरें थीं। वाकई यादगार तस्वीरें! खैर, कॉपी कर के मैंने चुपके से उन तस्वीरों का एक बैक-अप भी बना लिया की कहीं ऐसा न हो की रश्मि शरम के मारे उनको डिलीट कर दे। इसके बाद हम दोनों लैपटॉप पर ही गाने सुनते हुए कुछ देर के लिए सो गए।

डिनर के लिए हमने सोचा की नीचे सबके साथ करेंगे - लाइव म्यूजिक के कार्यक्रम, और अन्य युगलों और अतिथियों के साथ बैठ कर मदिरा, संगीत और भोजन का आनंद उठाएंगे। रश्मि ने आज मदिरा पीने से साफ़ मना कर दिया – तो मैंने मोकटेल और मसालेदार खाना मंगाया।

“सीईईई हाआआ!”

“क्या हुआ? कुछ तीखा था?”

“उई माँ!.... सीईई! मिर्ची खा ली... बहुत तीखी है...!”

“अरे! देख कर खाना था न! जल्दी से पानी पी लो! नहीं... एक मिनट.. जब मिर्ची लगे, तो दूध पीना चाहिए।”

मैंने जल्दी से वेटर को बुलाया और थोड़ा दूध लाने को बोला।

पानी पीने से रश्मि के मुँह की जलन कुछ कम हो गई। लेकिन मेरे दिमाग में एक कीड़ा कुलबुलाया, “वैसे, मिर्ची की जलन का एक बहुत अचूक इलाज है मेरे पास!”

“क्या? सीईईई!” उसकी जलन कम तो हो गई थी पर फिर भी वो सी... सी.... कर रही थी।

“आपके होंठों और जीभ को अपने मुँह में लेकर चूस देता हूँ, जलन ख़त्म हो जायेगी... क्या कहती हो?” मैंने हंसते हुए कहा। मैं जानता था की सबके सामने ऐसा करने से वह मना कर देगी, लेकिन जब उसने अपनी आँखें बंद करके अपने होंठ मेरी ओर बढ़ा दिए, तो मेरी हैरानी की कोई सीमा न रही। मैंने देखा उसकी साँसें भी तेज़ हो गई थी और उसके स्तन साँसों के साथ साथ ही ऊपर-नीचे हो रहे थे। मैंने आगे बढ़ कर उसके नर्म होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

रश्मि को चूमना तो खैर हमेशा ही आनंददायक अनुभव रहता है, लेकिन ऐसे सबके सामने उसको चूमना – मानो नशे के समान था। उसके नर्म, गुलाब की पत्तियों जैसे नाज़ुक होंठो की छुअन से मेरा तन मन पूरी तरह तक तरंगित हो गया। रश्मि ने भी अपनी बाहें मेरे गले में डाल दी और मेरे होंठों को चूसने लगी। मैंने भी दोनों हाथों से उसके गाल थाम कर पता नहीं कब तक चूमता रहा, मुझे ध्यान नहीं। लेकिन जब हमारा चुम्बन टूटा तो हमारे चारों तरफ लोगो ने ताली बजा कर हमारा हौसला बढाया। मैंने भी हाथ हिला कर सभी का अभिवादन किया।

खाने के बाद हम दोनों ने कोई एक घंटे तक संगीत का आनंद उठाया और फिर उठ कर समुद्र के किनारे नारियल के पेड़ों पर बंधे हमक (जालीदार झूलों) पर लेट कर रात्रि-आकाश का अवलोकन करने लगे। हम दोनों के झूले सामानांतर बंधे हुए थे, कुछ ऐसे जैसे प्रेमी युगल आपस में हाथ पकड़ कर आराम कर सकें। नवचन्द्र (क्रेसेंट मून) निकला हुआ था, इसलिए आकाश में चमकते, टिमटिमाते तारे और नक्षत्र साफ़ दिख रहे थे। मुझे खगोलशास्त्र में खासी रूचि भी है और ज्ञान भी। लिहाजा, मैंने तुरंत ही बीवी पर इम्प्रैशन झाड़ने के लिए अपना ज्ञान बघारना शुरू कर दिया।

“वह देखिये.. वो जो लाल सा सितारा दिख रहा है, वो मंगल ग्रह है... और वहां पर वृहस्पति या जुपिटर! वही जहाँ से साबू आया है...”

“साबू?”

“अरे.. वो चाचा चौधरी वाला? आप कॉमिक्स नहीं पढ़तीं?” मुझे निराशा हुई... चाचा चौधरी तो मेरे बचपन में लगभग हर बच्चे को मालूम था।

“नहीं... लेकिन चाचा चौधरी नाम सुना तो ज़रूर है..”

“ओके.. अच्छा उधर देखिये.. वहां है उम्म्म्म... कृत्तिका नक्षत्र... दिखने में जैसे हीरे के चमकते गुच्छे हों! और वो देखो... उधर है तुला नक्षत्र..”

“हाँ.. कहते हैं की तुला राशि धरती पर हो रहे पाप-पुण्य का पूरा लेखा जोखा उधर स्थित ध्रुव तारे को देती

जाती है.. ध्रुव तारा अपना स्थान नहीं बदलता..”

“अरे वाह! आपको मालूम है!?”

“हाँ... कुछ कुछ मालूम है!” रश्मि ने उत्साह से कहा।

“गुड! तो मुझे भी बताइए...?”

“ह्म्म्म.. अच्छा... वह जगमग रेखा.. वहाँ ... उधर... वह आकाश-गंगा है। इसके जल में स्नान कर के देवी-देवता और अप्सराएं हमेशा युवा बने रहते हैं...”

‘क्या बात है!’ मैंने सोचा, ‘ऐसा काव्यात्मक दृष्टिकोण?’

रश्मि ने कहना जारी रखा, “इसी के जल से घड़ा भर कर रोहिणी, आषाढ़ मास में धरती पर उड़ेल देती है.. जिससे धरती पर जीवन हरा-भरा हो जाता है.. पेड़ पौधे खेत सब हरे भरे हो जाते हैं...”

“अरे वाह! क्या बात है!!”

रश्मि अपनी प्रशंसा सुन कर उत्साह से बोली, “वहाँ उस ध्रुव तारे को आधार बना कर चलने वाले सप्तर्षि तारा-मंडल हैं... आप की भाषा में शायद उनको ‘बिग डिपर’ कहते हैं... उसमें वो हैं वशिष्ठ और उनके बगल हैं अरुंधती... कहते हैं की विवाहित जोड़े को इनके दर्शन करने चाहिए! शुभ होता है!”
 
मैंने विस्मय से देखा.. जिन तारों को मैं मिज़ार और अल्कोर के नाम से जानता हूँ, उनको रश्मि एकदम सही पहचान कर एक भिन्न दृष्टिकोण रख रही है। मैंने उसको आगे उकसाया,

“ऐसा क्यों?”

“एक कहानी है.. आप सुनेंगे?”

“हाँ हाँ.. बिलकुल!”

“ये जो सातों ऋषि हैं, दरअसल उन्ही सूर्य का उदय-अस्त नियंत्रित करते हैं। इन सभी का विवाह सात बहनों से हुआ था जिनको कृत्तिका कहते हैं। ये सभी साथ साथ रहते थे। लेकिन एक दिन एक हवं के दौरान अग्नि देवता प्रकट हुए और उन सातों कृत्तिकाओं के रूप से मुग्ध हो गए और उसी पागलपन में इधर उधर भटकने लगे। ऐसे में एक दिन उनकी मुलाकात स्वाहा से हुई। स्वाहा को अग्नि से प्रेम हो गया और उनका प्रेम पाने के लिए स्वाहा एक एक कर उन सातो बहनों के रूप में अग्नि से मिलन करने लगी। उसने छः बहनों का रूप तो धर लिया, लेकिन अरुंधती का रूप नहीं ले पाई। और वह इसलिए क्योंकि अरुंधती इतनी पतिव्रता थीं, की उनका रूप लेना असंभव हो गया। इस संयोग से स्वाहा ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम स्कंद पड़ा... बात फ़ैल गई की उन छः बहनों में से कोई उसकी माता है। सिर्फ अरुंधती और वशिष्ठ ही साथ रह गए।“

“क्या बात है! यह सच है की इस प्रकार के तारों में एक तारा स्थिर और दूसरा उसके चक्कर लगाता है... लेकिन ये दोनों साथ में चक्कर लगाते हैं..।“

“हाँ.. इसीलिए अरुंधती को देखना शुभ है.. पति और पत्नी – उन दोनों को हर काम साथ में करना चाहिए। यही तो विवाह की नींव है!” रश्मि कुछ देर तक रहस्यमयी ढंग से रुकी और फिर आगे बोली, “आपको एक बात पता है?”

“क्या?” जाहिर सी बात है की मुझे नहीं पता!

“शिव-पुराण में अरुंधती को... रश्मि कहा गया है... और, वे ब्रह्मा की पुत्री थीं। वशिष्ठ के कहने पर उन्होंने तप करके शिवजी को प्रसन्न कर लिया और स्वयं को काम से मुक्त करने का आग्रह किया। शिव जी ने उनको मेधातिथि ऋषि के हवन-कुण्ड में बैठने को कहा। ऐसा करने से रश्मि उनकी पुत्री के रूप में पैदा हुई और फिर उन्होंने वशिष्ठ से विवाह किया।“

“बाई गॉड! तो मेरी जानू स्वयं ब्रह्मा की पुत्री हैं?”

रश्मि मुस्कुराई, “नहीं.. मैं तो बस अपने पापा की पुत्री हूँ.. और अब आपकी पत्नी!” फिर कुछ रुक कर, “और मैं हमेशा आपकी निष्ठावान रहूंगी – ठीक अरुंधती की तरह!”

उसने यह बात इतनी ईमानदारी और भोलेपन से कही, की दिल में एक टीस सी उठा गई.. मन भावुक हो गया। सच में, रश्मि जैसी जीवनसाथी पाकर मैं धन्य हो गया था, और मुझे यकीन हो चला था की मेरे अच्छे दिनों का आरम्भ उसके आने के साथ ही हो गया।

“मैं भी...” कह कर मैंने उसके हाथ को अपने हाथ में ले लिया, और उसके साथ ही देर तक जगमगाते आकाश को यूँ ही देखते रहा।

रात का समय

रश्मि का परिप्रेक्ष्य

पिछले कुछ दिनों से मिल रहे अनवरत सुख के कारण मुझमें अपार स्फूर्ति और ताज़गी आ गई जान पड़ती है। नींद ही नहीं आ रही है। कमरे में बाहर से हल्का हल्का उजाला आ रहा है – ‘कितना बजा होगा?’ मैंने घड़ी में देखा : रात के साढ़े बारह ही बजे थे अभी तक। ‘ये’ तो सो गए जान पड़ते हैं! हमको सोए हुए कोई एक घंटा ही तो हुआ है अभी तक! और मुझे लग रहा है की जैसे न जाने कितनी देर तक सो गई! ‘एकदम फ्रेश लग रहा है.. क्या करूँ?’

‘क्यों न खिड़की खोल दी जाए!? समुद्र का शोर बहुत सुहाना होता है।‘ ऐसा सोच कर मैं उठी और समुद्र के सामने खुलने वाली खिड़की के पल्ले खोल दिए और पर्दे हटा दिए, और वापस आकर बिस्तर पर सिरहाने की टेक लेकर बैठ गई। समुद्र की लहरों की गर्जना, रात्रिकाल की चुप्पी और रिसोर्ट की लाइटों से उठने वाले मृदुल उजासे से माहौल और भी शांतिमय हो चला था। नींद तो बिलकुल ही गायब थी, इसलिए मैं बैठे बैठे बस पिछले कुछ दिनों की बातें सोचने लग गई...

वास्तव में, यह सबकुछ एक परिकथा जैसा ही तो था! परिकथा! सपनों का राजकुमार!!

एक सजीला, सुन्दर, और नौजवान राजकुमार घोड़े पर सवार होकर आया और एक गरीब लड़की को अपनी रानी बना कर अपने महल में ले गया! शायद ही कोई ऐसा हो जिसने अपने बचपन में ऐसी, या इससे मिलती-जुलती कहानी न सुनी हो! और इन कहानियों को सुनते सुनते बचपन में ही लड़कियों के मन के किसी कोने में एक लालसा जागृत हो ही जाती है की एक दिन उनके भी सपनो का राजकुमार आएगा और उन्हें अपने साथ अपने महल ले जाएगा।

पर यथार्थ में क्या ऐसा कहीं होता है? मुझे तो मालूम भी नहीं की मेरे सपनो का राजकुमार कैसा होता! इसके बारे में मैंने वाकई कुछ भी नहीं सोचा था। अभी तक मैंने देखा ही क्या था? पिछले साल की ही तो बात है जब मैंने माँ और पापा को खुसुर-पुसुर करते हुए चुपके से सुना था – चर्चा का विषय था ‘मेरी शादी’! पापा मेरे लिए आये किसी विवाह प्रस्ताव की बात माँ को बता रहे थे... उस दिन मुझे पहली बार महसूस हुआ की लड़कियां अपने माँ-पापा के लिए चिंता का विषय भी हो सकती हैं। उस दिन मैंने निर्णय किया की अपने बूते पर कुछ कर दिखाऊंगी और अपनी ही पसंद के लड़के से शादी करूंगी... माँ बाप की चिंता ही ख़तम! लेकिन अगर सोचो तो कैसी बचकानी बात है? एक पिछड़े इलाके के छोटे कस्बे रहने वाले औसत परिवार की लड़की भला क्या ढूंढेगी अपने लिए पति! हमको क्या अधिकार है? अपनी हैसियत के हिसाब से जैसे तैसे कोई मिल जाय, वही बहुत है। लेकिन सोचने में क्या कोई दाम लगता है? मैं भी अपने लड़कपन में कुछ भी सोचती, ओर सोच सोच कर खुश होती की यह कर दूँगी, वह कर दूँगी।

लेकिन रूद्र ने अचानक ही हमारे जीवन में आकर यह सारे समीकरण ही बदल डाले। सच कहूं तो रूद्र कोई मेरे सपनो के राजकुमार नहीं हैं... वे उससे कई गुणा ज्यादा बढ़-चढ़ कर हैं... मैं सपने में भी उनके जैसा सुन्दर वर सोच नहीं सकती थी। इसके साथ साथ ही वह एक योग्य और लायक हमसफर भी हैं। उन्होंने अपना सब कुछ अपने ही हाथों से बनाया है... उनमें इंसानियत हैं... उनमें सभी के लिए उचित सम्मान भाव है और आत्म-सम्मान भी। और सबसे बड़ी बात, जो उनके सभी प्रकार के योग्यता और धन- दौलत से अधिक है – और वह है उनका चरित्र! उन्होंने ही बताया था की उन्होंने मुझे विद्यालय जाते हुए देखा था... अगले दिन मैंने कई बार पीछे मुड़ कर देखा, की शायद वो कहीं से मुझे देख रहे हों, लेकिन वो दिखे ही नहीं। खैर, फिर उनके बारे में पता लगाने के लिए पापा ने कई लोग भेजे, और जैसे जैसे उनके बारे में और पता चला, मेरे मन में उनके लिए प्रेम और आदर दोनों बढ़ते चले गए।
 
पापा सभी को कहते फिर रहे थे की रश्मि के लिए रूद्र के जैसा वर वो ढूंढ ही नहीं सकते थे.. मजे की एक बात यह है की रूद्र और मेरे पापा की उम्र में कोई खास अंतर नहीं है... मुश्किल से सात-आठ साल का! लेकिन वो देखने में एकदम नौजवान लगते हैं, और पापा बूढ़े! और तो और, मेरी और इनकी उम्र में तो कोई बारह तेरह साल का अंतर है! लेकिन फिर भी कभी कभी ऐसा लगता है की ये एक बच्चे ही हैं।

पापा को शुरू शुरू में उन पर बहुत शक हुआ – न जाने कहाँ से आया है? क्या पता कोई लम्पट, शोहदा या उचक्का हो – हमें ठगने आया हो? बेचारी रश्मि को ब्याह कर ले जाय, और कहीं बेच दे – अखबार तो ऐसे अनगिनत किस्सों से आते पड़े हैं! मेरी फूल सी बच्ची! अगर उसको कुछ भी हो गया तो उसकी माँ को क्या जवाब देंगे! ऐसे न जाने कैसे बुरे बुरे ख्याल पिताजी को दिन-रात आते.... लोगो ने उनको समझाया की सब के बारे में सिर्फ बुरा नहीं सोचा जाता.. सतर्क रहना अच्छी बात है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं की सभी को बुरी और शक की निगाह से जांचा जाय। और फिर, बंगलौर में तो हमारे कस्बे और जान-पहचान के कितने सारे लोग हैं.. पता लगा लेंगे। सब कुछ। रश्मि तो पूरे कस्बे की बिटिया है.. ऐसे ही उसका बुरा थोड़े न होने देंगे!

फिर आई हमारी शादी.....

हमारी शादी जैसे एक किंवदंती बन गई... पूरा गाँव शामिल हुआ – सिर्फ दिखाने के लिए नहीं, बल्कि सभी ने अपनी अपनी तरफ से कुछ न कुछ मदद भी करी। पापा ने तो सब की सब रीतियाँ निभा डालीं – कहीं भी कोई कोर कसर नहीं! सब के सब देवताओं की पूरी दया बनी रहे बिटिया और दामाद पर! ऐसी शादी होती है कहीं भला? देखने वाले हम दोनों को राम-सीता जैसी जोड़ी बताते। सभी ने मन से ढेरों आशीर्वाद दिए – सच में, भाग्य हो तो ऐसा! और सभी ने हमको बोला की शादी ऐसी होनी चाहिए!

हमारे मिलन की रात!

वैसे तो लड़की शादी के बाद ससुराल चली जाती है, लेकिन ये तो इतनी दूर रहते हैं! इसीलिए हमारे लिए घर में ही सारी व्यवस्था कर दी गई थी.. कहा जाता है की पति-पत्नी की यह पहली अन्तरंग रात उनके वैवाहित जीवन के भविष्य का निर्णय कर देता है। सुहागरात में पति-पत्नी का यह पहला मिलन शारीरिक कम, बल्कि मानसिक और आत्मिक अधिक होता है। इस अवसर पर दो अनजान व्यक्तियों के शरीरों का ही नहीं बल्कि आत्माओं भी मिलन होता है। जो दो आत्माएँ अब तक अलग थीं, इस रात को पहली बार एक हो जाती हैं।

एक बार टीवी पर मैंने वो गाना देखा था... “आज फिर तुम पे प्यार आया है...” उसमें माधुरी दीक्षित और विनोद खन्ना के बीच प्रथम प्रणय का संछिप्त दृश्य दिखाया गया था। उस दृश्य को देख कर मेरे मन में भी एक अनजान तपन, एक बेबस इच्छा और न जाने कितने कोमल सपने अंकुर लेने लगे। रूद्र से विवाह की बात पक्की हो जाने पर वह सारे सपने परवान चढ़ गए ... लेकिन, भाभियों के बताये यौन ज्ञान ने सब पर पानी फेर दिया। ज्यादातर स्त्रियों के यौन जीवन, या कह लीजिये वैवाहिक जीवन की सच्चाई तो वैसी ही है... मुझे उनकी बातों से जो एक बात समझ में आई थी वह यह थी की स्त्रियों के लिए सेक्स का आनंद उठाने जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। पतिदेव आयेंगे, और कुछ कुछ करके सो जायेंगे! स्त्री के लिए तो बस पूरे दिनभर चौका-चूल्हा, सेवा-टहल, बस यही सब चलता रहता है। हमारी (स्त्रियों की) तो बस नींद ही पूरी हो जाय, यही बहुत है।

‘क्या रूद्र भी ऐसे ही होंगे?’ यह विचार मेरे मन में अनगिनत बार आता... लेकिन मुझे इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिल पाता.. मिलता भी कैसे? आखिर उनके बारे में मुझे मालूम ही क्या था? मन में बस डर सा लगा रहता। मेरा भविष्य तो तय हो गया था। ठीक है, रूद्र अच्छे इंसान हैं, और मैं संभवतः बहुत भाग्यशाली हूँ की मुझे उनसे विवाह कर उनकी संगिनी बनने का अवसर मिला था। परन्तु फिर भी, समाज में स्त्रियों की स्थिति और अन्य भाभियों के अनुभव – इन सबने मेरे मन में एक अनजान सा डर भर दिया था।

माँ ने हमारी सुहागरात से पहले मुझे इनकी हर बात मानने की हिदायद दे दी और फिर सभी मुझे कमरे में अकेला छोड़ कर चले गए। मैं अकेली ही डरी, सहमी सी उनका इंतजार करने लगी। समय के एक एक पल के बढ़ते हुए मेरे दिल की धड़कन भी बढती जा रही थी और इंतजार का एक-एक पल मानो एक-एक घंटे जैसा बीत रहा था। खैर, अंततः रूद्र कमरे में आये और मेरे पास आकर बैठ गए। उनकी उपस्थिति मात्र से ही मेरे शरीर का रोम रोम रोमांचित हो गया।

"मैं आपका घूंघट हटा सकता हूँ?" उन्होंने पूछा...

‘आप को जो करना है, करेंगे ही!’ ऐसा सोचते हुए मेरे दिमाग में भाभियों की बताई हुई शिक्षा, सहेलियों की नटखट चुहल और छेड़खानी और मेरी खुद की न जाने कितनी ही कोमल इच्छाएँ कौंध गईं ... मैंने सिर्फ धीरे से हाँ में सर हिलाया।

‘क्या मैं इनको पसंद आऊंगी? इन्होने तो मुझे दूर से ही देख कर पसंद कर लिया! आज इतने पास से मुझे पहली बार देखेंगे..’ वो मुझे आँखें खोलने को बोल रहे थे – लेकिन रोमांच के मारे मेरी आँखें ही नहीं खुल रही थीं। जब मेरी आँखें खुली तब इनका मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखाई दिया। राम-सीता का नहीं मालूम, लेकिन ये सचमुच मेरे लिए कृष्ण का रूप थे... मेरी आँखें तुरंत ही नीचे हो गयीं। फिर उन्होंने मुझे चुम्बन के लिए पूछा! कहाँ दूँ चुम्बन? गाल पर, या होंठ पर? फिल्मों में देखा है की हीरो-हेरोइन होंठों पर चूमते हैं.. लेकिन, क्या इनको यह पसंद आएगा? खैर, मैंने इनके होंठो पर जल्दी से एक चुम्बन दिया, और पीछे हट गयी। शरम आ गई...।

लेकिन इनका मन नहीं भरा शायद... इन्होने मेरी ठुड्डी पकड़ कर मुझे कुछ देर निहारा और फिर मेरे होंठो को चूमना शुरू कर दिया। मैं तो सिहर ही गई, मेरे शरीर पर किसी मर्द का यह पहला चुम्बन था। मेरा उनके होंठों के स्पर्श से ही कांप गया, गाल लाल हो गये, और रौंगटे खड़े हो गए। उनके गर्म होठों का स्पर्श – एकदम नया अनुभव! मेरे पूरे बदन में झुरझुरी सी दौड़ गई। समय का सारा एकसास न जाने कहीं खो गया। कुछ याद नहीं की यह चुम्बन कब तक चला। लेकिन, उतनी देर में मेरा हाल बहुत बुरा हो चला था – मैं बुरी तरह कांप रही थी, उसके गालों से गर्मी छूट रही थी और साँसे भारी हो गयी थी।

न जाने क्या सोच कर उन्होंने मेरी नथ उतार दी। पारंपरिक विवाहों में सुहागरात में पति सम्भोग से पहले अपनी पत्नी की नथ उतारता है। सम्भोग! सहसा ही मुझे ऐसा एहसास हुआ जैसे मुझे किसी ने नग्न कर दिया हो। डर और लज्जा की मिली-जुली भावाना के कारण सेक्स क्रिया तो दूर की बात है, उनका आलिंगन, चुम्बन और स्पर्श में भी मेरे दिल को दहला दे रही थी। मन में बस यही भावना आ रही थी की उनके सामने पूरी नंगी न होना पड़े। लेकिन जिस निर्लज्जता से उन्होंने मेरा ब्लाउज उतारा था, मैं तो समझ गई की मेरी भी दशा मेरी भाभियों जैसी ही होने वाली है। उन्होंने धीरे-धीरे एक-एक करके मेरे सारे कपड़े मेरे शरीर से उतार दिए और मुझे उसी डर की खाईं में धकेल दिया। सब कुछ बहुत ही अस्वाभाविक प्रतीत हुआ। जिस आकर (खज़ाना) को मैं अब तक सुरक्षित रखे हुए थी, वह उसी पर सीधी सेंधमारी कर रहे थे। लेकिन जब उन्होंने मुझे प्रेम से आलिंगनबद्ध कर दुलराया, तो मन में कुछ साहस आया।

और फिर वह हुआ जिसकी कल्पना मैंने अपने सबसे सुखद स्वप्न में भी नहीं करी थी... उनके होंठ, जीभ, हाथ, उँगलियों और लिंग ने एक समायोजित ढंग से मेरे सर्वस्व पर कुछ इस प्रकार आक्रमण किया की मैं सब कुछ भूल गई। मेरे यौवन के खजाने को पहली बार कोई मर्द ऐसे लूट रहा था, और उस समय होने वाले सुखद अहसास को मेरे लिए शब्*दों में बयान करना नामुमकिन है। मेरे चुचक पहले भी कभी-कभी कड़े हो जाते थे – जब अधिक ठंडक होती, या फिर तब जब मैं नहाते समय अपने स्तनों पर कुछ ज्यादा ही साबुन रगड़ लेती.. लेकिन उस समय तो कुछ और ही बात थी। मेरे चुचक उनके मुँह में जाकर पत्थर के सामान कड़े हो गए थे। वह उनको किसी बच्चे की तरह चूसते हैं.... मैं तो जैसे होश ही खो देती हूँ। पता नहीं उनको मेरे स्तन इतने स्वादिष्ट क्यों लगते हैं! उनको पिए जाने पर मेरा मन भी नहीं भरता... मन में बस यही आता है की रूद्र मेरे दोनों चुचक लगातार पीते रहें। हालांकि उनके चूसने और पीने से मेरी दोनों निप्पलों में दर्द होने लगता है, लेकिन उनके ऐसा करने से जो मुझे जो असीम आनन्द का अनुभव होता है, उसके लिए यह दर्द कुछ भी नहीं।

मैंने सोते हुए रूद्र को देखा – वो एकदम से बेख़बर, एक भोले बच्चे के समान सो रहे थे। नींद में भी वो कितने मासूम और प्यारे लग रहे थे... चेहरे पर संतोष के भाव एकदम स्पष्ट। मैं मुस्कुराई... इतने दिनों में यह एक अनोखी रात थी, जब मेरे शरीर पर कपड़े थे!

‘मेरे कपड़ो के दुश्मन...!’
 
मैंने प्यार से सोचा और उनके गाल पर धीरे से अपनी उंगलियाँ फिराईं। मेरे स्पर्श से वे थोड़ा कुनमुनाए और फिर अपने गाल को स्वतः ही मेरी उँगलियों से सटा कर सो गए।

‘अरे मेरे मासूम साजन!’ मैंने मन ही मन सोचा और मुस्कुराई, ‘....कैसे बच्चों के सामान सो रहे हो! यही बच्चा रोज़ मेरे क्रोड़ में उथल पुथल मचा देता है! ’

‘और इनका लिंग! बाप रे! पहली बार उनके लम्बे तगड़े अंग को देखते ही मुझे दहशत सी हो गई! इतना मोटा! मेरे कलाई से भी अधिक मोटा! उसकी त्वचा पर नसें फूल कर मोटी हो रही थी और आगे का गुलाबी हिस्सा भी कुछ कुछ दिख रहा था... आखिर यह मुझमें समाएगा कैसे?’ उस समय मुझे पक्का यकीन हो गया की आज तो दर्द के मारे मैं तो मर ही जाऊंगी! यह सब सोचते हुए मेरी दृष्टि रूद्र के जघन भाग पर चली गई, जहाँ चद्दर के नीचे से उनका अंग सर उठा रहा था।

मेरे होंठों से एक हलकी सी हंसी छूट पड़ी, ‘हे भगवान्! क्या ये कभी भी शांत नहीं रहता?!’

मुझे याद है जब मैंने इसको पहली बार छुआ था... मैंने छुआ क्या था, दरअसल उन्होंने ही मेरे हाथ को पकड़ कर अपने आग्नेयास्त्र पर रख दिया।

आग्नेयास्त्र! हा हा! सचमुच! मानो अग्नि की तपन निकल रही थी उसमें से!! मेरी हथेली उनके लिंग के गिर्द लिपट तो गई, लेकिन घेरा पूरा बंद ही नहीं हुआ। इतना मोटा! बाप रे! और तो और, उनके लिंग की लम्बाई का कम से कम आधा हिस्सा मेरी पकड़ से बाहर निकला हुआ था। शरीर और मन की इच्छाएँ जब अपने मूर्त-रूप में जब इस प्रकार उपस्थित हो जाती हैं, और उनसे दो-चार होना पड़ता है तो डर और लज्जा – बस यही दो भाव मन में आते हैं। मैं भी डर गई...!

लेकिन उनके अंतहीन मौखिक प्रेम प्रलाप ने मेरा सारा डर खींच कर बाहर निकाल दिया! ऐसा तो कुछ भी भाभियों ने नहीं बताया था। न जाने कितनी देर बाद अंततः वह समय आ ही गया जब हम दोनों संयुक्त होने वाले थे। मन में अनजान सा डर था की उनका लिंग मेरी क्या दुर्दशा करेगा, लेकिन एक विश्वास भी था की वे मुझे कोई परेशानी नहीं होने देंगे। एक आशंका थी की अगर भाभियों की बात सच हो गई तो..? और साथ ही साथ एक चिंता थी की यदि उनकी बात सच न हुई तो..?? इस प्रकार के विरोधी भाव आते जाते गए, और फिर मैंने स्वयं को उनकी निपुणता के हवाले कर दिया।

जब उन्होंने मेरी जांघें फैला दीं तो मुझे लगा की जैसे मेरी योनि तरल हो गई है... पूरी तरह से भिन्न आभास! जब उन्होंने अपनी उँगलियों से उसको फैलाया, तब जा कर मुझे वापस आभास हुआ की मेरी योनि स्नायु, ऊतकों और पेशियों से बनी है। वो कुछ कहते, लेकिन मुझे कुछ भी सुनाई न देता! मानो, सब इन्द्रियों की संवेदनशीलता सिमट कर मेरी योनि और चुचक में ही रह गई हो।

उनका लिंग!

पहली बार उसको अपनी योनि में महसूस करना अद्भुत था! उनके जोर लगाने से वह धीरे-धीरे मेरे अन्दर आने लगा। मुझे लगा की जैसे एक नया जीव मेरे अन्दर घर बना रहा हो। भराव का ऐसा अनुभव मेरी कल्पना से परे था। मैंने नीचे देखा – अभी तो लिंग के आगे के हिस्से का सिर्फ आधा भाग ही अन्दर घुसा था! उन्होंने एक क्षण रुक कर एक जोरदार धक्का लगाया और उनके विकराल अंग का आधा हिस्सा मेरी योनि के भीतर समा गया।

"आआह्ह्ह..." ऐसी क्रूरता! मेरी चीख निकल गयी – जो की मुझे भी सुनाई दी। वो एक दो पल ठहर कर मुझे देखने लगे.. उनकी आँखों में चिंता थी – किस बात की यह तो नहीं मालूम, लेकिन इतना कह सकती हूँ की मेरे लिए नहीं। क्योंकि एक दो पल रुकने के बाद ही उन्होंने अपना लिंग मेरी योनि से थोड़ा बाहर निकाला और फिर पुनः और अन्दर डाल दिया। ऐसे ही उन्होंने कई बार अन्दर बाहर किया। ह्म्म्म.. दर्द कुछ कम तो हुआ! लेकिन उनके हर धक्के से मेरी कराह ज़रूर निकल रही थी। फिर अचानक ही उन्होंने पूरे का पूरा लिंग मेरे भीतर ठेल दिया और मेरा विधिवत भोग करना आरम्भ कर दिया। वासना और आनंद के सम्मिश्रण से मेरी आँखें बंद हो गईं – सांस और कराह का आवागमन मुंह से ही हो रहा था। उत्तेजना के मारे मैंने उनके कन्धों को जोर से जकड रखा था। अजीब अजीब सी आवाजें – कुछ हमारी कामुक आहों की, तो कुछ पलंग के पाए के भूमि पर घिसने की, तो कुछ हमारे जननांगों के घर्षण की! मुझे अचानक ही मेरे अन्दर गर्म तरल की बूँदें गिरती महसूस हुईं – और ठीक उसी समय मुझे एक बार पुनः कामुक आनंद के अनोखे स्वाद का आभास हुआ। मेरी पीठ एक चाप में मुड़ गयी.. और मेरे भोले साजन मेरे चुचक को एक बार फिर से पीने लग गए और मुझ पर ही गिर कर सुस्ताने लगे! मुझे नहीं मालूम था की मर्दों को स्त्रियों के स्तनों का स्वाद लेने की ऐसी इच्छा हो सकती है। मैंने उनके लिंग को अपने अन्दर मुलायम होते महसूस किया; ऊपर से उनका दुलार, चुम्बन और चूषण जारी रहा।

रति निवृत्ति जहाँ अति आनंददायक हो सकती है, वहीँ पहली बार करने पर एक प्रकार की लज्जा भी होती है। उनको तो खैर नहीं हो रही थी, लेकिन मैं शरम से दोहरी हुई जा रही थी और उनसे आँखे ही नहीं मिला पा रही थी। पता नहीं क्यों! आखिर इस खेल में हम दोनों ही बराबर के भागीदार थे, लेकिन फिर भी शरम मुझे ही आ रही थी। एक वो दिन था, और एक आज का दिन है! मैं भी किसी छंछा (निर्लज्ज स्त्री) की तरह निर्बाध यौन आनंद उठा रही हूँ।

सपनों के ब्रह्माण्ड में विचरण करते हुए अगला पड़ाव मेरी विदाई का आया...

अप्रत्याशित रूप से मुझे एक दिन पहले ही अपने पिया के घर को निकलना पड़ा। एक पल के लिये भी मुझे अपने पिता के घर को छोड़ने का मलाल नहीं हुआ। रूद्र के साथ जीवन के हसीन सपने संजोंते हुए मैंने सबसे खुशी-खुशी विदा ली। मन में कई प्रकार की खुशियाँ घर करने लगी। मुझे मालूम था की रूद्र जैसे पति को पाकर मैं धन्*य हो गई थी। बंगलौर पहुँच कर मेरा ऐसा स्वागत हुआ कि मैं खुद को किसी राजकुमारी से कम नहीं मान रही थी। लेकिन इस घर का अहसास कुछ ही घंटों में मुझे अपना सा लगने लगा। मैं तो एक दिन में ही पापा का घर भूल गई। यह मेरा घर था... अद्वितीय वास्*तु शिल्*प से निर्मित घर! मैं दंग रह गई थी। सब कुछ जैसे मीठा स्वप्न हो! मुझे ऐसा लगा जैसे मैं एक ऐसे स्थान में हूँ, जहां रिश्*तों की तपिश का संसार बसाया जा सकता है। प्रेम के इन्*द्रधनुषी रंगों की वितान (शामियाना) के नीचे हम दोनों की देहों के मिलन से सृष्*टि सृजन को गति दी जा सकती है।

सच है.... एक वो दिन था, और एक आज का दिन है! निर्बाध यौन आनंद! जब मैं उनकी बांहों में जाती हूँ तो पूर्णतः तनाव मुक्*त हो जाती हूँ। साहचर्य की कायापलट करने वाली ऊर्जा की कांति मानो मेरी त्*वचा से फूट फूट कर निकलने लगी है। सचमुच, यौन क्रिया, संसर्ग के अतिरिक्त भी ऐसी प्राप्*य है जो चेतना को सुकून और शरीर को पौष्*टिकता देती है। कुछ लोग कहते हैं की जब स्*त्री शरीर, पुरुष रसायन प्राप्त करता है, तो देह गदरा जाती है।
 

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