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वारदात complete novel

महादेव क्रो पूरी आशा थी कि देवराज चौहान उससे मिलने वगले में आयेगा । अपने बंगले में पहुंचकर वह देवराज चौहान का इन्तजार करने लगा । तव दिन के दो बजे थे-ओर दो कै छ: बज गये, देवराज चौहान बगले से बाहर नहीं निकला था ।

टैक्सी से आया होता तो जुदा बात थी परन्तु वह कार से आया था और उसकी कार बंगले के बाहर बैसी की बैसी ही खडी थी ।

इतनी देर देवराज चौहान को भीतर नहीं लगनी चाहिए l महादेव के मस्तिष्क में बार-बार यहीँ बात आ रही थी । साथ ही उस आदमी का चेहरा घूम रहा था, जो उन तीनों के सिवाय वहां पर मौजूद था । वह आदमी उसे सिरे से ही ठीक नहीं लगा था । महादेव के मन से आवाज आने लगी, हो ना हो देवराज चौहान के साथ भीतर अवश्य कुछ गड़बड़ हुईं है ।

बहुत सोचने के पश्चात् महादेव बंगले से बाहर निकला और दिवाकर बांले बंगले के बाहर खडी देवराज चौहान की कार के करीब पहुचा ।

पिछली सीट पर सूटकेस मौजूद था i कार के दरवाजे उसने खोलने चाहे तो वह लॉक थे ।

महादेव ने जेब से पतली-सी तार निकालकर कार का दरवाजा खोला और भीतर बैठकर कार स्टार्ट करके आगे बढाई और अपने वाले बंगले के सामने रोककर इन्तजार करने लगा । कार को अपनी जगह से हिलाने के पश्चात् भी बंगले से कोई भी बाहर नहीं निकला था । अब महादेव को विश्वास हो गया कि भीतर देवराज चौहान सही नहीं हे । उसके साथ कुछ हुआ है…ओर वह ठीक नहीं हुआ । इस पर भी महादेव का विश्वास डोल जाता कि हो सकता हे, वह गलत सोच रहा हो । देवराज चौहान बंगले के भीतर दोस्तों में वेठा व्हिस्की उडा रहा हो ।

तभी उसे पिछली सीट पर पड़े सूटकेस का ध्यान आया । उसने सूटकेस चेक किया । वह लॉक था । तार के दम पर उसने लाक हटाया और सूटकेस खोलकर देखा । अगले ही पल उसकी आंखें फ़ट गई । वह नोटों की गड्डियों से ठसाठस भरा पडा था ।

उसने फौरन सूटकेस बन्द किया और सूटकेस सहित कार से उतरकर अपने बंगले में प्रवेश कर गया । अपने कमरे में पहुंचा और सूटकेस एक तरफ़ रखकंर सिगरेट सुलगाकर क्रश लेने लगा । रह-रह कर उसकी निगाह नोटों से भरे सूटकेस पर जा टिकती ।

वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे ?

इतने माल को सड़क पर छोडकर देवराज चौहान दिन-भर बंगले में तो बैठा रह नहीं सकता था । जाहिर हे कि बंगले के भीतर उसके साथ कुछ ऐसा हुआ है कि वह बाहर नहीं आ सका

और बंगले वालों को बाहर खडी उसकी कार का ध्यान नहीं रहा होगा, वरना कार तो वह कब की हटा देते ।

इस बीच महादेव ने कई बार सूटकैस को खोलकर उसमे पडी दौलत को निहारा ।

दौलत का लालच भी उसकै दिमाग पर हावी था l इतनी दौलत एक साथ अपने कब्जे में उसने पहले कभी नहीं देखी थी l मन तो कर रहा था कि सूटकेस लेकर फौरन फूट ले । दूसरी तरफ़ देवराज चौहान कं बारे मेँ जानने की जिज्ञासा भी मन में थी कि वह बंगले से बाहर क्यों नहीँ निकला? वह किस फेर मेँ था और उसके साथ क्या हुआ है?

काफी सोच-दिचार कै पश्चात् उसने सूटकेस को उठाकर बार्डरोब मेँ बन्द किया और चाबी जेब में डाल ली । घडी में समय देखा I आठ बज चुके थे ।

महादेव इस बात का फैसला कर चुका था कि देवराज चौहान पर गुजरे हादसे के बारे में जानने के पश्चात् वह यहां से दौलत के साथ फूट लेगा । कुछ ओर रात्त होने पर वह दिवाकर वाले बंगले में घुसकर देवराज चौहान के बारे में जानने का फैसला कर चुका था ।

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फीनिश

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राजीव मल्होत्रा कै होंठों से कराह निकली और उसने आंखें खोल दी । परन्तु सिर मेँ हो रही पीड़ा कै कारण वह ठीक से आंखें ना खोल पाया । कई पलों की चेष्टा के पश्चात् वह पूरी तरह आंखें खोलने में कामयाब हुआ । खुद को उसने कुर्सी पर वंघे पाया ।

सामने ही डॉक्टर बैनर्जी कमर पर हाथ रखै कहरभरी निगाहों से उसे देख रहा था ।

डॉक्टर वैनर्जी रिवॉल्वर कै दम पर उससे कार ड्राइव करवाकर साधारण-से मकान में ले आया था और मकान में प्रवेश करते ही बैनर्जी ने रिवॉल्वर कै दस्ते की तगडी चोटें उसकै सिर पर कीं तो वह बेहोश हो गया था । अब जब होश आया तो खुद को इस स्थिति में पाया ।

“यह है तुम्हारी असली जगह l” डॉवटर बैनर्जी ने खतरनाक लहजे में कहा-“तुम यहीँ समझते रहे कि ऊंट कभी पहाड के नीचे नहीं आ सकता । आज़ आये हो ना पहाड के नीचे I"

"आप पहाड हो सकते हो लेकिन मै ऊंट नही ।"

“ बहुत खूब ।। अब तुम मुझे आप कह रहै हो --- जब मै तुम्हारी कैद मे था -- तब ....?"
 
“कैद में-भला आप मेरी कैद में कव थे? मैंने तो आपको आज पहली बार देखा हे ।"

"हरामजादा । कुत्ता । " डॉक्टर बैनर्जी ने दांत पीसकर कहा… "बातें तो ऐसे कर रहा है , जेसे इससे शरीफ़ कोई दूसरा हो ही नहीं । जैसे मैं तेरा बुजुर्ग होऊ । दो साल तूने मुझे कैद में रखा था कमीने । उन सालों का हिसाब लूंगा, एकएक पल का हिसाब लूंगा। तू तो यही समझता रहा कि बाजीं हमेशा तेरे ही हाथ में रहेगी कभी पलटेगी ही नहीं । अब देख ले । तेरे हाथ की रेखाआं को मैंने पलट कर रख दिया है ।"

राजीव मल्होत्रा की समझ में कुछ न आया ।

"अब तुझे मे तब तक कैद में रखूंगा जब तक कि तुझे रख सकूंगा और जवं तक तू शराफत से रहना पसन्द करेगा । फिर बाद में तुझे गोली से उडा दूंगा, तेरे जेसे नाग को सम्भालना मुझे अच्छी तरह आता हे । मैँ रंजीत श्रीवास्तव नहीँ जो ~ डरकर-दुबककर बैठ जाऊंगा-मैँ तो..... ।"

' "साहब! " आखिर राजीव मल्होत्रा कह ही उठा-"आप जो कुछ भी कह रहे हैं, मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आ रहा ! परन्तु इतना स्पष्ट जाहिर हे कि आप किसी भारी गलतफहमी , कै शिकार हैं । अगर मेरा क्रोई कसूर हे भी तो वह इतना नहीं कि आप मुझे इतनी बडी बडी बातें सुनाने लगें ।"

“तेरा कोई कसूर नहीं?"

"खास नहीँ ।"

“उल्लू कै पट्टे! मुझसे अपना चेहरा बदलवाकर तूने रंजीत का हक छींना । मुझे कैद में डाल दिया । तु तो रंजीत को ही खत्म कर देना चाहता था, लेकिन मेरे बन्द मुँह ने उसे बचा लिया । अशोक श्रीवास्तव साहब, पैं चाहता तो पुलिस को ख़बर करके तेरे को कई सालों के लिए जेल में ठुंसवा सकता था । परन्तु मैंने ऐसा इसलिए नहीं किया कि तुझे पै अपने हाथों से सजा देना चाहता था और आज वह वक्त आ पहुचा है ।”

राजीव मल्होत्रा की आंखें सिकुड गई ।

“मैंने आपसे अपना चेहरा बदलवाया?"

"हा । मुझे धोखे में रखकर रजीत की शक्ल की प्लास्टिक सर्जरी करवा ली थी तुमने । काश मुझें उस वक्त मालूम होता कि तुम्हारे मन में क्या है,तो में तुम्हारी बात कभी भी नहीं मानेता ।"

"मैंने आपको दो साल कैद में डाला?"

" कुता !" बैनर्जी ने नफरतभरी निगाहों से उसे देखा ।

“मेरा नाम अशोक श्रीवास्तव है?"

“तो क्या अब तुम्हारा नाम भी मुझे बताना पड़ेगा या रंजीत कें रूप में रहते-रहते अपना नाम भी भूल गए हो ।"

"इसका मतलब मैं रंजीत श्रीवास्तब का कोई रिश्तेदार हूं। क्योंकि मैँ भी श्रीवास्तव हूं।" .

"उसर्के चचेरे भाई हो तुम?" 'डॉक्टर बैनर्जी कै स्वर में असमंजसता का भाव उभर आया ।

"आपकी बातों से मैंने जो निष्कर्ष निकाला वह इस प्रकार है कि मैँ अशोक श्रीवास्तव हूं । रंजीत श्रीवास्तव का चचेरा भाई! मैंने आपसे अपने चेहरे पर प्लास्टिक सर्जरी करवाकर अपना चेहरा रंजीत जेसा बनवाया और रंजीत बन बैठा । इस ब्रीच में रंजीत को जान से मार देना चाहता था जोकि आपको पता था कि वह कहां है । आपने मुझे रंजीत कं बारे'में नहीं बताया । दो साल आप मेरौ कैद में रहे । अब किसी प्रकार कैद से आजाद हो गए । फिर आपने मुझे अशोक श्रीवास्तव समझकर आज मुझ पर काबू पाया और असली रंजीत श्रीवास्तव को वापस उसकी जगह भेज दिया हे । यही हे ना-सारी बात?"

"इस बात को तुम नहीं जानोगें तो और कौन जानेगा ।।" बैनर्जी ने कड़े स्वर में कहा-"दो साल तुम्हारी कठोर कैद में रहने के पश्चात् मैं शरीफांना ढंग भूल चुका हू। कैद मेँ जितनी तकलीफें तुमने मुझें दीं, उससे कहीं ज्यादा मै अब तुम्हारा बुरा डाल करूंगा कुत्ते! तुझे तो… ।"

"आपका शुभ नाम क्या है?"

" ओह ।।" बैनर्जी की आवाज में जहरीलापन भर आया-"तेरा कोई नाटक-कोई ड्रामा मेरे सामने नहीं चलने वाला । डॉक्टर बैनर्जी अब पहले जैसा भीतर-बाला इंसान नहीं रहा कि तुम्हारी बातों में आ जायेगा ।"

"डॉक्टर बैनर्जी ।" राजीव मल्होत्रा बडबडा उठा ।

डॉक्टर बैनर्जी ने उसे घूरते हुए सिगरेट सुलगाई ।

राजीव मल्होत्रा जैसी बातें कर रहा था वैसी बातों ने उसे चक्कर में डाल दिया था ।

वह तो इस तरह से बातें कर रहा था. जैसे कुछ जानता ही ना हो और जेसे हर बात उसने अब जानी हो ।

" डॉक्टर बैनर्जी. . आप इसे समय बहुत बडे धोखे कै शिकार . हैं I" राजीव मल्होत्रा बोता ।

"बकबास मत कर, कुते मैं.....!"

"मेरी पूरी बात तो सुन लीजिए । उसके बाद आपने जो कहना-करना हो कर लीजिएगा, दरअसल आप जो मुझे समझ . रहे हैं, में बो नहीं । मैं अशोक श्रीवास्तव नहीं हू।" .

डाक्टर बैनर्जी के चेहरे पर जहरीले भाव फैलते चले गए I

“तुम अशोक श्रीवास्तव नहीं?"

"नहीँ । "

"तो फिर रंजीत श्रीवास्तव हो?"

"वह भी नहीं ।"

"ज़रा पैं भी तो सुनूं कि तुम हो कौन?"

"मेरा नाम राजीव मल्होत्रा हे i"

डाक्टर बैनर्जी कडवी हंसी हंस पड़ा ।

“तू क्या समझता हे मेरा दिमाग चल गया है जो पैं तेरी बातों में आ जाऊगा । दो साल मैं त्तेरी कैद में रहा हू तुझे तो में कभी भी नहीं भूल सकता । अब-अब तू भी हरदम मुझे याद रखेगा ।"

"मैँ साबित कर सकता हू कि मैं राजीव मल्होत्रा हू !"

डाँक्टर बैनर्जी की आंखें राजीव पर जा टिकीं ।

"क्या साबित कर सकता हे तू ?"

" यहीँ कि मै रंजीत या अशोक श्रीवास्तव नहीं हू।"

"साबित कर ।” डॉक्टर बैनर्जी के होंठ सख्ती से र्भिच गए--- " दरअसल मुझे कोई जल्दी नहीँ । मेरे पास बहुत वक्त है l फुर्सत है । मेरे पास सिर्फ एक ही काम है, तुझे ज्यादा से ज्यादा तकलीफ देनी और इस काम के लिए मेरे पास बहुत वक्त हे । बोल…सुना अपनी कहानी I” डॉक्टर बैनर्जी ने विषेले स्वर में कहा और आगे बढकर कुर्सी पर जा बैठा-"कितना मजा आ रहा है मुझे कि तुम अब मेरे रहमो-करम पर रहोगे ।"

"थोडी देर का मजा हे । ले लो । कुछ ही देर बाद तुम्हारे सारे मजे खराब होने वाले हैं ।" राजीव मल्होत्रा ने कहा फिर बोला सिर्फ एक बात का जवाब दे दो ।"

" बोलो । कुछ भी बोलो ।"

"अगर मैं रंजीत, अशोक श्रीवास्तव ना हुआ तो मेरा क्या करोगे?" .

"फालतू बात मत करो । जो भी बकना चाहते हो फौरन बकौ I" बैनर्जी गुर्राया ।

राजीव मल्होत्रा ने सिर हिलाया फिर कहा ।

“तुमने मेरे चेहरे पर प्लास्टिक सर्जरी की थी?"

"हां I ”

"प्लास्टिक सर्जरी को हटा सकत्ते हो । मेरा चेहरा साफ कर सकते हो?"

, . “क्यों नहीं । वह तो मैँ अभी करने ही वाला हू।"

"ठीक है । पहले मेरा चेहरा साफ करो । बाकी बातें हम फिर करेंगे डॉक्टर बेनर्जी !"

डॉक्टर बैनर्जी कईं पलो तक राजीव मल्होत्रा को देखता रहा। फिर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ !"

“सिर्फ आधे घण्टे में मैं तुम्हारे प्लास्टिक सर्जरी साफ करके तुम्हें तुम्हारे असली में ला दूंगा । तुम्हारा असली और कमीनगी से भरा चेहरा देखने का तो कब से मेरा मन कर रहा हे I"

राजीव मल्होत्रा के होंठों से गहरी सांस निकल गई ।

@@@@@

फीनिश

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खाने का कौर उन्होंने देवराज चौहान कै मुह मे गले तक ठूंस दिया । देवराज चौहान को अपना दम रूकता सा महसूस हुआ ।

वह तढ़पा और मुह में पडा सारा खाना बाहर निकाल दिया और खांसने लगा I उसके हाथ पीछे बांधे हुए थे । उसे कुर्सी पर बिठाकर खाना खिलाया जा रहा था । जबकि देवराज चौहान कई बार खाना खाने को मना कर चुका था ।

देवराज चौहान की मुंह से खाना उगलते देखकर तीनों बदमाश ठहाका मारकर हंस पड़े I

उनकी इस हंसी ने देवराज चौहान पर जले पर नमक का काम किया । उसके होंठों से गुर्राहट निकली आंखों में क्रोध की लाल सुर्खी उभर आई, मुंह घुमाकर बांह से उसने होंठ साफ किए I

"क्यों !" एक ने देवराज चौहान को नाक पकडकर हिलाया-“इतना बडा हो राया हे तुझे तेरी मां ने खाना खाना नहीँ सिखाया जो उसे मुंह से बाहर उगले जा रहा है?"

"हरामजादे ।” देवराज चौहान के होंठों से फुफकार निकली…

"मेरी माँ ने खाना खाना सिखाया था । बहुत ही अच्छी तरह सिखाया था I लेकिन तेरी मां ने तुझे खाना खिलाना नहीं सिखाया ।"

"फालतू बात मत करो । जो भी बकना चाहते हो फौरन बकौ I" बैनर्जी गुर्राया ।

राजीव मल्होत्रा ने सिर हिलाया फिर कहा ।

“तुमने मेरे चेहरे पर प्लास्टिक सर्जरी की थी?"

"हां I ”

"प्लास्टिक सर्जरी को हटा सकत्ते हो । मेरा चेहरा साफ कर सकते हो?"

, . “क्यों नहीं । वह तो मैँ अभी करने ही वाला हू।"

"ठीक है । पहले मेरा चेहरा साफ करो । बाकी बातें हम फिर करेंगे डॉक्टर बेनर्जी !"

डॉक्टर बैनर्जी कईं पलो तक राजीव मल्होत्रा को देखता रहा। फिर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ !"

“सिर्फ आधे घण्टे में मैं तुम्हारे प्लास्टिक सर्जरी साफ करके तुम्हें तुम्हारे असली में ला दूंगा । तुम्हारा असली और कमीनगी से भरा चेहरा देखने का तो कब से मेरा मन कर रहा हे I"

राजीव मल्होत्रा के होंठों से गहरी सांस निकल गई ।

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फीनिश

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खाने का कौर उन्होंने देवराज चौहान कै मुह मे गले तक ठूंस दिया । देवराज चौहान को अपना दम रूकता सा महसूस हुआ ।

वह तढ़पा और मुह में पडा सारा खाना बाहर निकाल दिया और खांसने लगा I उसके हाथ पीछे बांधे हुए थे । उसे कुर्सी पर बिठाकर खाना खिलाया जा रहा था । जबकि देवराज चौहान कई बार खाना खाने को मना कर चुका था ।

देवराज चौहान की मुंह से खाना उगलते देखकर तीनों बदमाश ठहाका मारकर हंस पड़े I

उनकी इस हंसी ने देवराज चौहान पर जले पर नमक का काम किया । उसके होंठों से गुर्राहट निकली आंखों में क्रोध की लाल सुर्खी उभर आई, मुंह घुमाकर बांह से उसने होंठ साफ किए I

"क्यों !" एक ने देवराज चौहान को नाक पकडकर हिलाया-“इतना बडा हो राया हे तुझे तेरी मां ने खाना खाना नहीँ सिखाया जो उसे मुंह से बाहर उगले जा रहा है?"

"हरामजादे ।” देवराज चौहान के होंठों से फुफकार निकली…

"मेरी माँ ने खाना खाना सिखाया था । बहुत ही अच्छी तरह सिखाया था I लेकिन तेरी मां ने तुझे खाना खिलाना नहीं सिखाया ।"

'देवराज चौहान के शब्द सुनते ही बदमाश दांत भींचकर आगे बढा और देवराज चौहान कै सिर के बाल मुट्ठी में पकडकर उसे कुर्सी से उठाया और चेहरे पर जोरदार घूंसा जड दिया ।

देवराज चौहान के होंठों से कराह निकली और वह दूर जा … लुढका ।

घूंसा इतना जबरदस्त था कि उसके होंठों के कोनों से खून की पतली-सी रेखा बह निकली । भीतर से गाल फट गया या ।

नीचे पड़े ही पड़े देवराज चौहान ने खूनी निगाहों से उसे निहारा ।

तभी दूसरा आगे बढा और उसकी बांह पकडकर .उसे जबरदस्ती ही उठाया । साथ ही त्तगड़ा घूंसा पुन: उसकै चेहरे पर जड़ा I

इस बार देवराज चौहान लडखड़ाया गिरा नहीं ।

"हमसे ठीक तरह बात कर ।" उसने शब्दों क्रो चबाकर सख्त स्वर में कहा I

"तुम जैसों से ऐसे ही बात की जाती है ।" देवराज चौहान गुर्राया I

तभी उस आदमी का घूंसा चला I

देवराज चौहान इस बार होने वाले हमले कै प्रति सावधान था I उसके हाथ बंधे हुए थे परन्तु टांगें अवश्य आजाद थी । इससे पहले कि वह घूंसा उसे पडता उसने फौरन ही अपनी जगह छोडी । सामने वाले का घूंसा खाली गया I

इससे पहले कि वह संभल पाता . देवराज चौहान के जूते की ठोकर तुफान के वेग की भाति उसकी कमर पर पडी । वार इतना जबरदस्त था कि उसके पांव उखड गये I दो क्षण के लिए उसका शरीर हवा में लहराया फिर दीवार से उसका चेहरा जा लगा ।

धप ।

उसके होंठों से तीव्र चीख निक्ल गई I

चेहरा दीवार से लगने के कारण उसकी बुरी हालत हो गई थी । नाक टूट गई थी । आगे के दो दांत मुह मे घूमने लगे थे ।

नाक ओर मुंह से बेइन्तहा खून बहने लगा था I दोनों हाथों से चेहरा ढापा तो पल-भर में ही दोंनों हाथ खून से भर गये थे I

उसकी चीखें बराबर गूंज रही र्थी । तड़पते हुए वह नीचे बैठ गया था । , .

देवराज चौहान की आंखों में मौत के शोले नाच रहे थे ।

.अन्य दोनों बदमाशों कै चेहरों पर क्रूरता से भरे खतरनाक भाव छा गये I

"यह तो हम पर वार करता हे I”

"मरना तो इसे है ही । पहले इसके हाथ-पांव तोडते हैं । " दूसरे ने कहते हुए जेब से चाकू निकाल लिया ।

“यह चीखेगा आवाज बाहर तक जाएगी ।"

"नहीं जाएगी । बंगले से सडक दूर है I"

"जा तो सकती है I”

"ठीक हे ज़ब यह चौखे तो साले की गर्दन दबा देना, मरना तो इसे है ही ।"

दूसरे ने सिर हिलाते हुए जेब से चाकू निकालकर हाथ में लिया । फिर दोनों हाथ में थाम रखे चाकुओं क्रो हिलातें हुए देवराज चौहान की तरफ बढे ।

देवराज चौहान की आखें धधक उठी । आंखों में बसे शोले जेसे बाहर निकलने लगे । वह उसी प्रकार खडा आगे बढते उन्हें देखता रहा और फिर जैसे बिजली कोंधी हो । देवराज चौहान का शरीर कब हवा में लहराकर आगे बढते दोनों पर गिरा वह समझ ही न सके ।

देवराज चौहान उनसे टकराने के बाद सीधा अपने पांवों पर खड़ा हो गया । उनके हलक से चीख निकली और वह कमरे में पड़े सामान से टकराते हुए नीचे जा गिरे ।

एक कै हाथ से चाकू छूटकर देवराज चौहान कै पांचों के पास ही गिरा । देवराज चौहान फौरन पीठ के वल झुका और अपने बंधे हाथों से चाकू उठाकर हथेली में कसकर पकड लिया ।

तत्पश्चात् घूमा और उठकर उन दोनों को देखने लगा जो उठकर खडे हो चुके थे । देवराज चौहान के होंठ मौत की मुद्रा मे भीचे हुए थे । उसकी निस्तेज हो रही मोत के भावों से भरी आंखें उन दोनों से हटने का नाम नहीं ले रही थीं ।

“इसने मेरा चाकू उठा लिया हे ।"

“उठा लेने दो । खुश होने दे बेचारे क्रो I" दूसरा खतरनाक लहजे में कह उठा-“वंधे हाथों से वह चाकू का क्या इस्तेमाल करेगा । अब मैं इसे जिन्दा नहीं छोहंगा । ग्यारह बज चुके हैँ । इसका काम तमाम करके लाश कौं ठिकाने लगा आते हैं । हरामजादा हमसे टकराता हे ।"

जिसका चेहरा दीवार से टकराया था वह तो अर्द्ध बेहोशी की सी हालत में नीचे पड़ा गहरी-गहरी सांसें ले रहा था ।

उसे डाँक्टर की फौरन आवश्यकता थी परन्तु इन दोनों के पास इतनी फुर्सत नहीं थी कि अपने साथी की हालत की तरफ ध्यान दे पाते ।

चाकू थामे वह बदमाश धीरे-धीरे आगे वढा ।

ऐसा करते ----हुए वह एकटक देवराज चौहान की आंखों में झांके जा रहा था और देवराज चौहान उसकी आंखों में ।

~ दोनों एक-दूसरे की जान लेने पर आमादा थे I

उसका साथी वहीँ खड़ा था । उसे पूरा बिश्वास था कि देवराज चौहान अब तो गया ।

एकाएक वह देवराज चौहान पर झपटा । होंठों से अजीब-सी गुर्राहट निकली ।

देवराज चौहान फौरन उछलकर उसके रास्ते से हट गया । वह अपनी झोंक में आगे गया और सोफे से टकराकर सीधा हो गया I अगले ही क्षण होंठों से गुर्राहट निकालकर पलटा । अब

उसके चेहरे पर क्रोध हो क्रोध नजर आ रहा था ।

देवराज चौहान आंखों में मौत के भाव लिये उसे देखे जां रहा था । पीठ पीछे बंधे हाथों में उसने चाकू को कसकर थाम रखा था । इस समय उसका चेहरा कोई देखता तो भय से कदम-भर तो अवश्य पीछे हो जाता ।

वह पुन: देवराज चौहान की तरफ बढा ।

एकबार फिर जैसे बिजली कौधी देवराज चौहान का जिस्म हवा मे लहराया I चाक्रू चाले को संभलने का जरा भी मौका नहीं मिला ।

ठक ।

देवराज चौहान के जूते की ठोकर वेग के साथ उसकी कनपटी पर पड्री I

उसकै होंठों से कराह निकली I
 
चाकू हाथ से निकलकर बन्द खिढ़की से जा टकराया । दोनों हाथों से उसने अपना सिर थाम लिया ।

कनपटी पर चोट करने के पश्चात् देवराज चौहान हवा में हो सीधा होते हुए जूतों के वल फर्श पर आ खडा हुआ । दुसरे कै प्रति वह सावधान था कि कहीं वह कोई हरकत न कर दे निगाह उस पर भी थी जिसकी कनपटी पर उसने ठोकर मारी थी I

उसने दोनों हाथों से सिर क्रो थाम रखा था । आंखें वन्द थीं ।

चेहरे पर पीडा के चिन्ह थे I वह हक्का-बक्का घूमे जा रहा था I देवराज चौहान फोरन समझ गया कि वह काफी दमदार व्यक्ति है ।

वस्ना जैसी ठोकर उसने मारी थी उससे अब तक उसे बेहोश हो जाना चाहिए था I यह खतरे का लक्षण था I उतने फौरन ही खुद को संभालकर उसके सामने आ खड़े होना था और उसका यह अन्दाज तव और भी खतरनाक होना था ।

देवराज चौहान ने छोटी सी छलांग भरी और सांड की भाँति अपने सिर की चोट उसके माथे पर मारी I उसके होंठों से चीख निकली I पछाड खाकर वह पीठ के बल गिरा ।

फिर न उठ सका I बेहोश हो गया था वह । कम से कम घण्टा-भर तो वह होश में आने वाला नहीँ था ।

देवराज चौहान पलटा और तीसरे को देखने लगा l पीछे बंधे हाथों में अब भी उसने चाकू थाम रखा था ।

आँखों में मौत कै भाव समाए हुए थे ।

"मानना पडेगा ।" तीसरा दरिन्दगी से भरे स्वर में कह उठा----“हो जिगर वाले आदमी । इन दोनों की तुमने जो हालत बनाई इससे पहले किसी दूसरे ने नहीं बनाई थी I"

देवराज चौहान होंठ भीचे उसी मुद्रा में उसे घूरता रहा I

“मैं बचा हू अभी । देखूं तो सही, मेरा भी तुम यही हाल करते हो ।" तीसरे का स्वर वेहद खतरनाक था ।

उसने अकेले हीँ देवराज चौहान से टकराने का फैसला कर लिया था-“इसे अपने चाकू पर भरोसा था लेकिन मैं खाली हाथों से हीँ तुम्हारी ऐसी-तैसी करूंगा I तुम्हारे हाथ पीछे बंधे हूए हैं । तुम्हारी टांगों के वारों का I मैं ध्यान रखूंगा । फिर देखूंगा तुम मुझ पर वार करने में कैसे कामयाब होते हो । सुपरमैन तो तुम हो नहीँ I”

देवराज चौहान के र्भिचे होंठ जरा भी न हिले । आखों में मौत के भाव विद्यमान थे ।

दोनों हाथों को फैलाये वह बदमाश खतरनाक अन्दाज़ में देवराज चौहान की तरफ बढा ।

देवराज चौहान बुत की तरह खडा उसकी आखो मे झाकता रहा । करीब पहुचते ही उसने देवराज चौहान पर घुसा चलाया। देवराज चौहान फौरन नीचे झुका । उसका घूंसा खाली गया । इधर नोचे झुकते ही देवराज चौहान ने अपना सिर पूरी शक्ति के साथ उसके पेट में दे मारा । सिर का वार पेट में होते ही उसने गले से भैंसे की डकार निकाली और वह पछाड़खाकर नीचे जा गिरा । दोनों हाथउसने पेट पर दवा लिये थे । पीड़ा के मारे वह तड़पने लगा I

देवराज चौहान ने उसे संभलने का मौका नहीं दिया । वह फोरन आगे बढा और उसकी छाती पर चढ बैठा I पीठ पीछे बंधे हाथों में थाम रखा चाकू नीचे दबे व्यक्ति के पेट में चुभने लगा था । चाकू की चुभन का अहसास पाकर वह अपनी पीडा को भूल गया । आंख खोलीं तो अपनी छाती पर सवार देवराज चौहान के चेहरे कै भाव देखकर वह मन ही मन कांप उठा I

देवराज चौहान के चेहरे पर दरिन्दगो का गहरे भान विद्यमान थे ।

मौत की काली छाया में उसकी आंखें डूबी हुई थी I जबड़े कसे हुए थे I होंठ सख्ती से र्मिचे हुए थे I इस समय वह किसी खतरनष्क भेड्रिये से कम नहीं लग रहा था ।

"डाल दूं चाकू पेट में?" देवराज चौहान खूंखारता-भरे स्वर में कह उठा ।

"न....न.....नही l" वह कांप उठा ।

"तुम रहम कै काबिल नहीं हो l”

"भगवान कै लिए मुझें माफ कर दो मैं.....मैं ।"

"खोल मुझे I"

"क्या ? ”

"मेरे हाथ खौल I” देवराज चौहान ने वहशी स्वर में कहा-----"ध्यान रखना चाकू मेरी मुट्ठी में दबा रहेगा और नोक तेरे पेट के साथ सटी रहेगी । जहां तूने गड़चड़ की बंही चाकू तेरे पेट में धंस जाएगा । अपने हाथ सिर्फ मेरे हाथों पर बँधी रस्सी पर ही रखना । चाकू पर हाथ डालने को चेष्टा की तो अपनी मौत का तू खुद जिम्मेदार होगा । समझ गया न मेरी बात?"

"हा....हां....सपझ गया I” घबराहट में उसका स्वर कांप रहा था ।

"खोल मेरे हाथ के बन्धन I"

"मुझे उठने तो दो I"

“नहीं । तू ऐसे ही मेरे बन्धन खोलेगा I मैँ तेरी छाती पर बैठा हू। इसी प्रकार लेटे ही लेटे तेरे हाथ आसानी से मेरे हाथों कै बन्धनों तक पहुच सक्रता हैँ शुरू हो जा।"

देवराज चौहान की बात मानने के सिवाय उसके पास और कोई रास्ता नहीं था । इन्कार करने का मतलब था चाकू का पूरा फल पेट में घुस जाना । चाकू की नोक-निरन्तर उसके पेट में चुभ रही थी । दोनों हाथ सीघे किए और देवराज चौहान की क्लाई पर बंधी नाइलोन की रस्सी को खोलने की चेष्टा करने लगा ।

"मुझे चाकू दो तो में एक सेकण्ड में बंधनों को काट दूं ।" वह बोला I

“बकवास मत कर । तू हाथ से ही बन्धन खोलेगा I चाकू देककर मैं अपनी पीठ पर चाकू नहीं खाना चाहता I" देवराज ने गुर्राकर मौत से भरे स्वर में कहा ।

तत्पश्चात् उसने पांच मिनट लगाये, कलाइर्यो पर बंधी रस्सी खोलने में ।

वन्धन खुलते ही देवराज चौहान की आंखों में चमक भर आई । वह' उछलकर उसकी छाती से खडा हुआ और .....

.......अगले ही पल उसने जो किया वह किसी को भी कंपा देने कै लिए काफी था । हाथ में पकडा चाकू खच के साथ पुरा का पूरा उसके पेट में घुसेड़ दिया । वह चीख भी न सका ।

फिर देवराज चौहान ने चाकू की मूठ को कसकर पकड़ा और पेट में ऊपर से नीचे तक चीरा दे दिया l

वह तढ़पा और उसी पल शांत हो गया ।

इस काम मे जरा भी शोर नहीं हुआ था ।

देवराज चौहान एकदम दरिन्दा लग रहा था ।

हाथ में थमा खुन से सना चाकू जिसकी नीक से बूंद-बूंद खून टपक रहा था । हाथ भी जैसे खून से नहाया लग रहा था ।

इन लोगों के प्रति उसके मन में जरा भी हमदर्दी नहीं थी । क्योकि यह लोग कुछ ही देर में उसकी हत्या करके उसकी लाश किसी चौराहे पर फेंकने वाले थे और अपनी जान बचाना उसकी निगाहों मेँ कोई जुर्म नहीँ था ।

मौत का पुतला बना देवराज चौहान आगे बढा और नीचे बेहोश पड़े सरे आदमी के पास पहुचा । चाकू वाला हाथ उठा और 'खच' का साथ उसके भी पेट में जा धंसा । उसी पल ही उसके पेट में भी चाकु का चीरा दे दिया ।

बेहोशी मे ही वह तड़पा और देवराज-चौहान के चाकू बाहर निकालने से पहले ही ठण्डा हो गया ।

पेट से खून उबल-उबल कर बाहर आने लगा । देवराज चौहान तीसरे कै पास पहुचा चेहरे पर वहशी मौत नाच रही थी ।

वह करवट लिए पड़ा था । चौहान ने जूते की करवट से उसे सीधा किया । उसके होंठों से तीव्र कराह निकली ।

दीवार से टकराने के कारण उसकी नाक पूरी पिचक गई थी । उसके दांत टूटे पड़े थे ।

बहुत बुरी हालत थी उसकी ।

परन्तु देवराज चौहान कै मन में इन दरिन्दो कै प्रति जरा भी हमदर्दी नहीं थी । देवराज चौहान ने उसका भी वहीँ हाल किया जो पहले दो का किया था ।

फिर वह कमरे से लगे बाथरूम में गया और अपने हाथ मुंह धोये । खून से सना चाकू साफ किया । चाकू से अपनी उंगलियों के निशान साफ किए । फिर चाकू को बाथरूम में ही फेंककर हाथ पोंछने के पश्चात् जव कमरे में पहुंचा तो ठिठक गया । चेहरा पुन: मौत कै भावों से भर उठा ।

आंखों में वहशीपन झलक उठा ।

दरवाजे के ठीक बीचों-बीच तारासिंह खडा था । उसके चेहरे पर वेहद खतरनाक भाव थे और हाथों मेँ दबी रिवॉल्वर का रुख देवराज चौहान की तरफ था ।

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फीनिश

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डॉक्टर बैनर्जी हक्का बक्का , बेहद परेशान और व्याकुल हो रहा था । पिछले तीन घण्टों में वह तरह-तरह कै रसायन, वैज्ञानिक घोल लेकर, राजीव मल्होत्रा के चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी हुतारने की चेष्टा कर रहा था I परन्तु वहां प्लास्टिक सर्जरी होती तो उतरती ।

थक-हारकर अजीब सी निगाहों से वह राजीव मल्होत्रा को देखने लगा ।

राजीव्र मल्होत्रा मुस्कराया ।

" तो आपको विश्वास हो गया होगा कि यह मेरा असली चेहरा हे I"

"ये नहीं मान सकता ।" डॉक्टर बैनर्जी ने बांह से अपने चेहरे पर आए पसीने को पोंछा I

" क्यों, अभी भी आपको मेरी बात पर अविश्वास है?" राजीव मुस्करा रहा था ।

"हां । क्योकि मैँने खुद तुम्हारे चेहरे पर प्लास्टिक सर्जरी की थी ।"

"नहीं । आपने मेरे चेहरे पर नहीं, अशोक श्रीवास्तव के चेहरे पर सर्जरी की थी । मैं अशोक नहीं हूं।"

डॉक्टर बैनर्जी ने अजीब-सी निगाहों से उसे देखा । अब उसका विश्वास भी डोलने लगा था कि उसने जिसके चेहरे पर प्लास्टिक सर्जरी की थी, वह यह नहीं, कोई और हीँ होगा । क्योंकि सर्जरी उतारने की, तीन धँण्टे की अथाह मेहनत जो उसने की थी, उसमें उसे क्रोई सफलता नहीं मिली थी । अब तक इतना तो पूर्णतया विश्वास हो गया था कि सामने बैठा चेहरा प्लास्टिक सर्जरी वाला नहीँ हे ।

* तुम अशोक नहीं हो?" डॉक्टर बैनर्जी ने गहरी सांस ली ।

"नही !"

"फिर कौन हो ।"

" एक बात पहले आप बता दीजिए ।"

" क्या ?"

"अगर मैँ अशोक न निकला तो आप मेरे साथ कैसा सलूक करेंगे ?"

डॉक्टर बैनर्जी ने उसकी आखों में झाकते हुए सिगरेट सुलगाई ।

"इस बात का जबाव में नहीँ दे सकता । अगर तुम अशोक नहीं हो तो तुम्हारा फैसला मेरे डाथ में नहीं है । सिर्फ अशोक .का फैसला हाथ में है।”

"तो मेरा फैसला कौन करेगा?”

"खुद रंजीत श्रीवास्तव I”

राजीव मल्होत्रा चंद पलों तक खामोश रहा फिर गहरी सांस लेकर कह उठा ।

"मेरा नाम राजीव मल्होत्रा है I मैं दिल्ली का रहने वाला हू ।”

" तुमने अपना चेहरा, रंजीत जैसा क्यों बना रखा हे ?” डाॅक्टर बैनर्जी तीखे स्वर मेँ कहा ।

"इस बात का जबाब तो भगवान ही दे सकता है ।" राजीब मुस्कराया ।

"क्या मतलब ?"

"यह मेरा असली चेहरा ही है । इसमें कोई बनावट नहीं I" राजीव ने कहा ।

"झूठ बोलते हो तुम, मैं.....I”

“डाक्टर बैनर्जी?" राजीव ने उसकी बात काटकर, अपने शब्दों पर जोर देका कहा-"अगर मैं झूठ कह रहा होता तो अब तक मेरा झूठ खुल चुका होता I आपने मेरे चेहरे को हर प्रकार से साफ़ करने की चेष्टा की है । अगर मेरे चेहरे पर किसी प्रकार का नकलीपन होता तो वह अब तक पक्रड़ में आ गया होता ।"

डॉक्टर बैनर्जी ने गहरी सांस ली, फिर कश लेकर कह उठा I

"रंजीत श्रीवास्तव कं वेष में कब से तुम वहां रह रहे थे?”

"जब आपने मुझें पकडा उससे सिर्फ चंद घण्टे पहले से I”

“और जो रजीत श्रीवास्तव बना हुआ था, वह कहा' है?”

"'मुझें नहीं मालूम I" राजीव ने जान…बूझकर अपार्टमेंट का पता नहीं बताया, जहा पर देवराज चौहान रजीत उर्फ अशोक को बांध आया था-वह देवराज चौहान के मामले में किसी प्रकार का दखल नहीं देना चाहता था । वह नहीं चाहता था कि उसके मुँह में ऐसी कोई बात निकले जो देवराज चौहान के लिए नुकसान देह हो ।

डॉक्टर बैनर्जी ने उसकी आंखों में झांका सख्त स्वरं से कहा ।

"तुम अपने बारे में मुझे सबकुछ बताओ । यह भी बताओ कि तुम रंजीत कैसे बन गए?"

राजीव मल्डोत्रर्य ने दिल्ली में की वैंक-डकैती वगेरह कै बारे में … सव कुछ बत्ताया ।

नकाबपोश और अपनी मौतका भी जिक्र किया ।

. बिशालगढ़ कैसे आया यह, नहीं बताया तो सिर्फ देवराज चौहान के बारे में नहीँ बताया । बाकी की हर बात सच कह डाली थी उसने ।

"अगर आपको मेरी बात पर यकीन न हो तो दिल्ली जाकर पता कर सकते हैं । आज सुबह ही इन्सपेक्टर सूरजभान जो कि दिल्ली में यह केस डील का रहा था,, वह विशालगढ़ में है और उसने राजीव मल्होत्रा के रूप मेँ मुझे पहचाना भी । परन्तु तब मैँ रंजीत था और वह मुझ पर हाथ डालने का हौसला नहीँ कर सका . था । लकिन वह चुप नहीं बैठने वाला वहुत जल्द कुछ-न कुछ तो करेगा ही, यानी कि मैँने जो कहा है,सच कहा है ।"

“तो फिर रंजीत बना अशोक कहां हैं?"

"कहा तो, मैं नहीँ जानता इस बारे में कि उस नकाबपोश ने उसे कहां रखा । बस इतना जानता हूं कि उसने अशोर्क उर्फ रंजीत क्रो वहां से हटाकर, मुझे वहां रंजीत श्रीवास्तव बनाकर भेज दिया । ताकि रंजीत की दोलत इकट्ठी करके उसे सौंप सकू । इससे ज्यादा बताने को मेरे पास कुछ भी नहीं है । अगर आप मुझें पुलिस मे देना चाहते हैं, तो आपकी मर्जी । लेकिन इससे आपको कुछ हासिल नहीं होगा I आप लोगों के साथ जो भी बीती और अब आप जो भी करना चाहते हैं, इन बातों का मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं । मैं तो यही कहूंगा कि पुलिस में देने की अपेक्षा आप मुझे छोड़ दीजिए । क्योंकि मेरी आप लोगों से कोई दुश्मनी नहीं I”

“मैँने तुम्हें पहले भी कहा था कि अगर तुम अशोक नहीं तो तुम्हारे बारे में फैसला रंजीत करेगा l” डॉक्टर बैनर्जी ने गम्भीर स्वर में कहा क्योंकि मैं सिर्फ अशोक को ही सजा देने का हकदार हू I ’*

"ठीक है । आप रंजीत से बात कर लीजिए, मै यहीँ पर इन्तजार करता हूं।”

"ऐसे नहीं । तुम मेरे जाने के नाद यहां से फरार भी हो सकते हो, भाग सकते हो I"

“निश्चित रहिये । मैं कहीँ नहीं जाऊंगा, आपके आने तक I"

"मेंने अब लोगों पर विश्वास करना छोड दिया है I" डॉक्टर बैनर्जी ने एक-ऐक शब्द चबाकर कहा ।

राजीव मल्होत्रा प्रश्नभरी निगोहौं से डॉक्टर बैनर्जी को देखने लगा I

“में तुम्हें बांधकर जाऊंगा I"

"आपक मर्जी ।"

कुछ ही देर मे डॉक्टर बैनर्जी, राजीव सल्होत्रा के हाथमांव अच्छी तरह बांध चुका था ।

"जा रहे हो ?"

"हा I रजीत श्रीवास्तव से बात करूगा तुम्हारे बारे में I"

“कब तक लौटेंगे?"

"जल्दी ही I"

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फीनिश

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रंजीत श्रीवास्तव ने डॉक्टर बैनर्जी की सारी बात दी तो वह ठगा सा खडा रह गंया I कई पलों तक तो उसके मुंह से कोई बोल ही न फूटा ।

अवाक्-सा बैनर्जी का चेहरा देखता रह गया ।

“क्या बात है रंजीत साहब?" डॉक्टर बैनर्जी ने ही उसे टोका ।

"वह मेरा हमशक्ल है?” रंजीत के होंठों से निक्रत्ता l

"हां । वह आपका हमशक्ल हे I"

रंजीत कै होंठ कांपे, लेकिन कुछ कह न सका ।

"आपकी तबियत तो ठीक है?" डॉक्टर बैनर्जी ने ध्यानपूर्वक उसके चेहरे के चढते-उतरते भादों को देखा।

रंजीत श्रीवास्तव के होंठों से गहरी सांस निकल गई ।

आगे बढकर वह कुर्सी पर जा बैठा ।

“डॉक्टर तुम इस बात क्रो नहीँ'जानते, मैं भी नहीँ जानता था परन्तु मेरे पिताजी बताया करते थे हम दो 'भाई पैदा हुए थे । बिल्कुल एक जैसे I एक ही चेहरे कै । कई बार तो हमारी मां भी धोखा खा जाया काली थी ।" _

"क्या कह रहे हैं आप?" अब बैनर्जी कै हैरान होने की बारी थी ।

"सुनते जाओं डॉक्टर I" रंजीत श्रीवास्तव धीमे स्वर में कहे जा रहा था-" यह तव की बात है जब हम दो साल कै हो गए थे, दोनों माई । हमारे यहा एक नौकर हुआ करता था, बनारसी . दास नाम था उसका I शराबी-जुआरी था । उसकी आदतें बिगड़ती जा रही थी ।

अपनी आदतों से ही मजबूर होकर एक दिन उसने पिताजी की पैंट की जेब से पांच सौ रुपये निकाले तो पिताजी ने उसे पकड लिया । तब पिताजी ने उसे बहुत मारा और उसे निकल जाने को कहा । बनारसी दास मन का मी काला था, जाते-जाते .मेरे भाई को वह उठा ले गया । पिताजी ने बहुत तलाश करवाई उसकी, त्तेक्लि वह नहीं मिला । कई साल वह अपने बेटे की खोज में लगे रहे । आओ, मै तुम्हें पिताजी के हाथ की डायरी दिखाता हू । उसमें यह सब बातें उन्होंने लिख रखी हें ।"

रंजीत श्रीवास्तव, डॉक्टर बैनर्जी को बंगले के नौचे बने तहखाने मे ले गया ।

"इस तहखाने का अशोक को पता नहीं था । नहीं तो यहां की कोई भी चीज अब सलामत न मिलती !" रंजीत ने कहा ।

एक तरफ रखीं आलमारी खोलकर उसमें से डायरी निकाली ।

डायरी में षोजूद एक तस्वीर निकालकर, बैनर्जी को दिखाता हुआ बोला !

"यह देखो । हम दोनों भाइयों की तस्वीर है । बनारसी दास जव मेरे भाई को उठाकर ले गया था । उससे चद रोज़ पहले ही यह तस्वीर ली गई थी । पिताजी बताया करते थे ।"

डॉक्टर बैनर्जी ने तस्वीर देखी । तस्वीर में दो साल की उम्र कै दो बच्चे, एक जैसे कपड़े पहने दिखाई दे रहे थे । उनके चेहरों मे अदूभूत समानता थी । ऐसा लगता था जैसे एक ही बच्चे की तस्वीर को, तस्वीर'बनाने वाले ने, दो जगह छाप दी हो ।

बैनर्जी कई पलों तक तस्वीर को देखता रह गया ।

“यह डायरी पढो डॉक्टर पिताजी ने अपने हाथों से इस बारे मे सब लिखा था ।"

डॉक्टर ने डायरी पढी ।

“ अब क्या कहते हो?"

"मैं इस समय किसी भी प्रकार की राय देने की स्थिति में नहीं हू।" बैनर्जी बोला ।

"वह मेरा बचपन का बिछड़ा भाई है ।"

“में इतनी आसानी से आपकी बात का यकीन नहीं कर सकता रंजीत साहब ।।"

"क्यों?"

"क्या मालूम, वह आपका' भाई न हो ।"

"सबकुछ जानबै के बाद भी तुम ऐसा कह रहे हो I" रंजीत ने व्याकुलता से कहा । , .

" आजकल सच्चाई को पहचान पाना बहुत कठिन होता है । कभी कमी तो बड़े-बड़े झूठ सच से ज्यादा सच लगते हैं ।आप हमशक्ल होने की बिनाह पर उसे भाई कह रहे हैँ I"

"मेरे भाई को बनारसी दास उठाकर ले गया था । वह मेरा हमशक्ल ही था I"

डॉक्टर बैनर्जी कुछ न बोला ।

"और जिसकी बात कर रहे हो; वह भी मेरा हमशक्ल डै । रत्ती-भर भी फर्क न होने का मतलब हें कि वह मेरा माई ~ ही है । परायों की शवलें हूबहू नहीं मिलतीं। वह कहां है?" . .

"मकान पर ही है । उसे बांधकर आया हू।"

"चलो डॉक्टरा मैँ उससे बात करूंगा । उसके बाद तुम ही फैसला करना । बनारसी दास की तस्वीर भी यहां मौजूद है । वह भी-मैं साथ ले चलूंगा । सब-कुछ सामने आ जाएगा।" रंजीत ने बेसब्री से कहा-"अगर वास्तव में वह मेरा बचपन का बिछड़ा भाई है तो मैं समझूगा, मुझे खजाना मिल गया l”

“अब तो रात हो रही है । आप सुबह आकर उससे बात कर लीजिए ।"

“नहीं । मैं अभी उससे बात करूंगा । उससे बात किए बिना तो अब मुझे नींद भी नहीं आएगी।"

"रंजीत साहब ।” क्षण-भर की चुप्पी के पश्चात् डॉक्टर बैनर्जी बोला-“उसने खुद स्वीकार किया है कि दिल्ली में अपने दोस्तों के साथ मिलकर, बैंक-डकैती की I ऐसे इन्सान को दुनिया के सामने आप अपना भाई कह सकेंगे?"

" डॉक्टर बैनर्जी !” रंजीत श्रीवास्तव के स्वर में विश्वास का पुट था-“अगर वह मेरा भाई है तो ढोल पीटकर उसे भाई कहूग़ा । मेरे पास बहुत दोलन हे I मैं उसकै जुर्म पर दौलत की चादर बिछाकर उसे ढक दूंगा । आप चलिए मैं उससे बात करता हूं। पहले मुझे यकीन तो हो जाए कि वह मेरा माई डै ।”

"बनारसी दास की तस्वीर साथ ले चलिएगा ।"

पन्द्रह मिनट बाद रंजीत श्रीवास्तव डॉक्टर बैनर्जी के साथ बाहर निकला । वह दोनों कार में सवार होने जा ही रहे थे कि फाटक पर गाडी की हेडलाइट चमकी । वह ठिठक गए । कुछ ही देर बाद पुलिस-जीप उसके पास पोर्च में आकर रुकी और इन्सपेक्टर सूरजभान नीचे उतरा । साथ मे दो पुलिस वाले थे ।

सूरजभान उसके पास पहुचा । उसके चेहरे पर नींद और थकावट के भाव छाए हुए थे । आज ही वह दिल्ली जाकर दिल्ली से वापस लौटा था । दिल्ली से वह राजीव मल्होत्रा से सम्बन्धित फाइल ले आया था ।

“माफ कीजिएगा ।" सूरजभान बोला-“आपको बेवक्त तक्लीफ दी ।"

"कोई बात नहीं l" रंजीत श्रीवास्तव स्थिर लहजे में बोला----"बोलो क्या काम है?"

"मुझे आपकी उंगलियों , निशान चाहिएं मिस्टर राजीव मल्होत्रा?" सूरजभान ने कहा !

रंजीत श्रीवास्तव के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान उभरी !

“मैं रंजीत श्रीवास्तव हू।"

“अवश्य होंगे । लेकिन पहले मैं आपको राजीव मल्होत्रा के रूप में जान चुका हूं जब तक मेरी तसल्ली नहीं होती, तब तक मैं आपको राजीव मल्होत्रा ही समझूगा l" सूरजभान ने स्थिर लहजे मेँ कहा---"मुझे पूरा बिश्वास हे कि आप मेरी बात का बुरा नहीं मानेंगे ओर अपने फिगरप्रिट देंगे ।"

"'कानून की तसल्ली के लिए मैँ सब-कुछ करने को तैयार हूं ।"
 
. रंजीत श्रीवास्तव ने मुस्कराकर र्कहा। वह जानता था उसकी उँगलियों के निशान राजीव मल्होत्रा की उंगलियों से नहीं मिलेंगे और बाद में इस इन्सपेक्टर को मानना ही पड़ेगा कि यहां सिर्फ रंजीत श्रीवास्तव ही रहता है-"कहा लेंगे आप मेरी ऊंगलियों कै निशानं ।"'

“अगर आप शीशे के गिलास पर दे र्दे तो आपकी बडी मेहरबानी होगी ।"

“शीशे के गिलास पर ही क्यों?”

"क्योंकि वहां पर निशान बहुत स्पष्ट आते हैं I"

नौकर को बुलाकर रंजीत ने शीशे का गिलास मगवाया I जिसे कि इन्सपेक्टर सूरजभान ने अपने हाथों से रुमाल निकालकर साफ किया फिर उस पर रंजीत की उंगलियों की छाप ली ।

" अब तो खुश हो ना इन्सपेक्टर?" रंजीत बोला ।

" मुझे पूरा यकीन है कि इस मामले को लेकर भबिष्य में तुम इस तरफ नहीं आओगे I"

“अगर उंगलियों कै निशान नहीं मिले तो नहीं आऊंगा I" सूरजभान ने मुस्कराकर कहा और गिलास क्रो रूमाल में लपेटे दोनों पुलिस चालों कै साथ जीप मे वहां से चला गया ।

“इन्सपेक्टर की इस हरकत से साबित होता है कि राजीव मल्होत्रा जो कहता हे-वह ठीक है ।" बैनर्जी बोला ।

रंजीत श्रीवास्तव सोचभरे अन्दाज मै सिर हिलाकर रह गया ।

"आपके फिगरप्रिंट दे देने से राजीव मल्होत्रा निर्दोष साबित हो जायेगा I” बैनर्जी-ने कहा I

“हां । यूं समझो पुलिस की निगाहों में तो वह निर्दोष साबित हो ही गया । क्योकि मेरी उंगलियों के निशान उसकी उंगलियों कै निशानों से नहीं' मिलेंगे और इस इन्सपेक्टर को तसल्ली हो जाएगी कि वह गलत राह पर है. I चलो डॉक्टर, राजीव मल्होत्रा से मैं जल्दी बात करना चाहता हूं I"

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फीनिश

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'"तुम तो वास्तव मे वहुत खतरनाक हो I” तारासिंह दांत भींचकर बोला । ।

"तुमने क्या सोचा था कि तुम्हारे ये तीन आदमी मुझे बाँध कर रख सकते हैं?" देवराज ने दात मींचकर कहा ।

"हां l अब मैं तुम्हारी बात का यकीन करता हूं ।" तारासिहे ने कहा -----" तुम वास्तव र्मे बहुत खतरनाक हो ।"

“ठीक कहा तुमने I" देवराज चौहान के गले से मौत क्री-सी गुर्राहट निक्ली----" इन्हें बेहोश ही करता अगर - इन्होंने मेरी जान लेने का इरादा ना बनाया होता I यह मुझे जान से मारने जा रहे थे, इसलिए इन्हें जिन्दा छोडना मेरे उसूल कै खिलाफ था।"

"जान तो मै भी तुम्हारी लेने चाला हूँ।" तारासिंह 'ने हाथ मे दबी रिवॉल्बर हिलाई।

"जब ले लो, तब कहना l" देवराज चौहान ने खूनी स्वर में कहा…“अभी तो मैँ तुम्हारे सामने जिन्दा खडा हूं ,,गोली तुम्हारी रिवॉल्वर के चैम्बर से बाहर नहीं निकली I"

"गोली निकलने में देर कितनी लगती है ।" तारासिह मौत की सी हंसी हँसा ।

"गोली निकलने में तो देर नहीं लगती तारासिह, हा परन्तु कभी कभी ट्रेगर दबाने में देर लग जाती हैं I जैसे अब होती जा रही है I" देवराज चौहान के स्वर में वहशीपन झलकने लगा ।।

'"तुम तो वास्तव मे वहुत खतरनाक हो !” तारासिंह दांत भींचकर बोला ।

"तुमने क्या सोचा था कि तुम्हारे ये तीन आदमी मुझे बाँध कर रख सकते हैं?" देवराज ने दात मींचकर कहा ।

"हां l अब मैं तुम्हारी बात का यकीन करता हूं ।" तारासिहे ने कहा -----" तुम वास्तव र्मे बहुत खतरनाक हो ।"

“ठीक कहा तुमने I" देवराज चौहान के गले से मौत क्री-सी गुर्राहट निक्ली----" इन्हें बेहोश ही करता अगर - इन्होंने मेरी जान लेने का इरादा ना बनाया होता I यह मुझे जान से मारने जा रहे थे, इसलिए इन्हें जिन्दा छोडना मेरे उसूल कै खिलाफ था।"

"जान तो मै भी तुम्हारी लेने चाला हूँ।" तारासिंह 'ने हाथ मे दबी रिवॉल्बर हिलाई।

"जब ले लो, तब कहना l" देवराज चौहान ने खूनी स्वर में कहा…“अभी तो मैँ तुम्हारे सामने जिन्दा खडा हूं ,,गोली तुम्हारी रिवॉल्वर के चैम्बर से बाहर नहीं निकली I"

"गोली निकलने में देर कितनी लगती है ।" तारासिह मौत की सी हंसी हँसा ।

"गोली निकलने में तो देर नहीं लगती तारासिह, हा परन्तु कभी कभी ट्रेगर दबाने में देर लग जाती हैं I जैसे अब होती जा रही है I" देवराज चौहान के स्वर में वहशीपन झलकने लगा था--------" एक बात का ध्यान रखना, यह जंगली इलाका है । गोली की आवाज दूर-दूर तक जायेगी । फायर करके तुम बचे नहीं रह सकते I”

"आज तक तो मैंने ना जाने कितने फायर किए हैं I फिर भी बचा हुआ हूं।"

"तो फिर आज आखिरी फायर करके देख लो ।" देवराज चौहान गुर्रांया ।

तारासिह ने दांत भीचकर रिवॉल्वर वाला हाथ सीधा किया कि तभी उसे अपनी पीठ पर चुभन महसूस हुईं । उसका हरकत करता जिस्म ठिठक' गया । पीछे से महादेव का वेहद खतरनाक स्वर उसके कानों में पड़ा----,"खवरदार एक इंच भी हिले तो मैं तुम्हारी पीठ मैं छः की छः गोलियां उतार दूंगा ! इसी तरह खड़े रहों-अगर खैरियत चाहते हो तो !"

तारासिंह ठगा-सा खडा रह गया । उधर देवराज चौहान जव तारासिह से बातें कर रहा था तो तारासिंह कै पीछे उसने महादेव की झलक पा ली थी , इसी कारण उसने तारासिंह को बातों मे लगाए रखा और वह चाहता था कि महादेव भी वात सुनकर स्थिति भांप ले और उसी के मुताबिक कदण उठाए।

"कौन हो तुम?" तारासिंह होंठ र्मीचकर कह उठा ।।

"छोडी इस बात को कि मै कौन हूं I" महादेव का लहजा खतरनाक था-"अपने हाथ में पकडी रिवॉल्वर ढीली करो । मेरा हाथ रिवॉल्वर लेने कै लिए आगे आ रहा है !"

इसके साथ महादेव का दूसरा हाथ आगे आया और तारासिंह कै हाथ में दबी रिवॉल्वर को लेकर, सामने खडे देवराज चौहान की तरफ उछालते हुए तारासिंह को धक्का दिया ।

तारासिंह लड़खड़ाता हुआ कमरे के भीतर आ गया । चुकी देवराज चौहान कै हाथ में महादेव की फेंकी रिवॉल्वर दब चुकी थी !

तारासिंह ठिठका और पलटकर महादेव को देखा तो चोंक पडा । * तुम तो दिन में यहां आये थे ।" पडोस में रहते हो !”

" तो ?"

"तुम्हारा इस मामले से क्या मतलब?" तारासिह कै चेहरे असमंजसता कै भाव थे ।

“कोई मतलब नहीं । कोई वास्ता नहीं । यूं ही टहलते हुए इस तरफ निकल आया था l" महादेव ने लापरवाही से कहा ।

“तुम्हारी रिवॉल्वर कहां है?" तारासिंह ने एकाएक होंठ भींचकर कहा ।”

"रिवॉल्वर-कैसी रिवॉल्वर?" महादेव होले से हंस पड़ा l

"जो तुमने मेरी पीठ पर लगाई थी I"

"मैंने कब कहा कि मैंने कोई रिवॉल्वर तुम्हारी पीठ से लगा रखी थी । मैँ तो मजाक कर रहा था । रिवॉल्वर का मेरे पास क्या काम , मैंने तो अपनी उंगली तुम्हारी पीठ पर गड़ाई थी I"

तारासिंह का चेहरा क्रोध से स्याह पड़ गया । उसके दांत भिच गए ।
 
"तारासिंह देवराज चौहान मोत कै-से स्वर में कह'उठा----"मैंने तुम्हें कहा था ना कि तुम ट्रेगर दबाने में देर कर रहे हो । देख लिया अपनी देरी का नतीजा । बाजी तुम्हारे हाथों से निकल चुकी हे l"

"हां ।" तारासिंह ने फौरन अपने सिर को हिलाया-"मानता हू। तुम वास्तव में जीत गये ।"

"और तुम्हारी हार का मतलब तुम्हारी मौत है ।"

“छोडो इन बातों को । मैं अभी फोन पर चन्द्रप्रकाश दिवाकर से बात करके कल तुम्हारी रकम मंगवा लूंगा । तुम कितना कह रहे थे ! एक मुश्त में एक करोड की बात कही थी तुमने !"

“रहने दो तारासिह ।।" देवराज चौहान मौत से भाव में मुस्कराया-"इस सौदे में मेरी दिलचस्पी समाप्त हो गई हे । अब मुझे कुछ भी नहीं चाहिए सिवाय तुम्हारी जान के ।"

"पागलपन मत करो ।" तारासिंह जल्दी से बोला-"तुम्हें बहुत बही रकम मिलेगी ।”

"मैंने अपनी जिन्दगी में वहुत वड्री बडी रकमें देखी हैं। मैँ ऐसे किसी लालच मे नहीं पड़ना चाहता कि दोबारा किसी प्रकार का खतरा मेरे सिर पर आ जाये I"

"बेकार की बात मत करो । इन बातों में यह सव तो चलता ही रहता हे I”

"नहीं तारासिंह मेरे उसूलों में एक बात शामिल हैं कि मौत का खेल खेलो या फिर शराफत के साथ चलू l तुम शराफत के साथ नहीं चले तो अब मौत का खेल ही सहीं I दौलत से मुझे प्यार है । बहुत प्यार है ।। दौलत कै लिए हर समय खतरे के कुएं में टांगें लटकाये बैठा रहता हुं, परन्तु दौलत के लिए पैं अपने उसूलों को तोडकर तुझ जैसे धोखेबाज क्रो जिन्दा नहीं छोड सकता ।"

तारासिंह ने पहली बार सुखे होंठों पर जीभ फेरी ।

महादेव उनकी बातें सुनकर मामला समझने की चेष्टा करते हुए कमरे में पडी तीनों पेटकटी विक्षिप्त लाशों को देख रहा था और सोच रहा था कि देवराज चौहान इंसान है या शैतान, क्योंकि . … आजकी तारीख मे उसने चार कत्ल कर दिए थे और पांचबां भी शायद होने चाला था ।

"मेरी जान लेकर तुम्हें कोई फायदा नहीं होगा, अलबत्ता , मुझसे दोस्ती करके दिवाकर सेठ से दौलत को हासिल का सकते हो ।" तारासिंह की आवाज में व्याकुत्तला का पुट था ।

"'तुम जैसे कुतों से देवराज चौहान बहुत दूर रहता हैं । दोस्ती नही करता । तुमने मेरी जान लेने की चेष्टा को है; बदले में अब तुम अपनी जान दोगे ।"

उसी पल तारासिंह ने किसी चीते के समान देवराज चौहार्तो पर छलांग लगा दी ।

देवराज चौहान सावधान था , जिन्दगी कै उस आखिरी पल में उसे तारासिंह से ऐसी ही किसी हरकत की उम्मीद थी I इससे पहले कि देवराज चौहान से तारासिंह टकराता, देवराज चौहान ने दांत खींचकर अपना हाथ जोर से घुमाया । हाथ में दबा रिवॉल्वर वेग के साथ तारासिंह की कनपटी से टकराया । तारासिंह चीखकर दाई तरफ लुढक गया । नीचे गिरते ही उसने संभलने को चेष्टा की तो, उसी क्षण देवराज चौहान के जूते की ठोकर उसके चेहरे पर पडी । तारासिंह तीव्र: कराह के साथ लुढ़कता हुआ महादेव कै करीब जा पहुंचा I

महादेव ने झुककर उसे थामना चाहा तो देवराज चौहान ने सख्त स्वर में उसे रोक दिया ।

"नहीँ महादेव ।" देवराज चौहान अपना शिकार खुद करता है ।

, महादेल ने फिर तारासिंह को थामने की चेष्टा नहीं की।

तभी देवराज चौहान हाथ में रिवॉल्वर दबाए उसकी तरफ बढा ।।

तारासिंह उसके चेहरे पर छाए पांवों को देखकर मन ही मन सिहर उठा । इससे पहले कि वह नीचे से उठ पाता ।

ठक-ठक ।

देवराज चौहान की टांग बिजली की गति की भाँति दो बार घूमी और जूते की एडी दोनों बार तारासिंह की कनपटी से टकराई ।

तारासिंह को चीखने का भी मौका नहीं मिला और वह बेहोशी की गर्तं में डूबता चला गया ।

देवराज चौहान दांत भीचे क्रूरता-भरी निगाहों से कई पलों तक बेहोश तारासिंह को देखता रहा । फिर रिवॉल्वर जेब में डालकर पलटा और आगे बढकर बाथरूम में प्रवेश कर गया । वहां छोडा चाकू लेकर जब बाथरूम से बाहर निकला तो चेहरे पर वहशीपन के भाव विद्यमान हो चुके थे I

महादेव ने उसे देखा I उसके हाथ में पकडे चाकू क देखा ।

“जो तुम करने जा रहे हो, वह करना जरूरी हे क्या?" महादेव कै होंठों से वेचेनी से भरा-स्वर निकला I

देवराज चौहान ने महादेव को देखा भी नहीं और चाकू थामे फर्श पर बडोश पड़े तारासिह की तरफ बढने लगा ।

महादेव कै होंठ र्भिच गये I वह पलटा और आगे बढकर खिडकी खोली और बाहर देखने लगा । कमरे में जो होने जा रहा धा, उसे देखना वह जरूरी नहीं समझता था ।

पीछे से आती उसके कानों में आवाजें पडी । उन आवाजों में तारासिंह की पीड़ा भरी कराह भी मौजूद थी, जोकि बेहोशी में उसकै होंठों से निकली थी ।

फिर चन्द पलों के बाद कमरे में गहरा सन्नाटा व्याप्त हो गया । कदमों की आहट सुनकर उसने पलटकर देखा ।

देवराज चौहान बाथरूम से बाहर निकल रहा था, हाथों को धोकर । अब उसका चेहरा सामान्य था ।

महादेव की निगाह तारासिंह पर टिकी I जो कि मरा पडा था I

उसका पेट खुल चुका था । अब वहां तीन की अपेक्षा पेट कटी चार लाशें मौजूद थीं ।

“अगर तुम नहीं आते तो इसकी जगह मेरी लाश पडी होती I" देवराज चौहान बोला I"

" मै समझता हूं।" महादेव ने गम्भीरता से सिर हिलाया ।"

"लेकिन तुम यह बात भूल रहे हो कि एक ही दिन में तुमने पांच हत्याएं की हैं I एक को जिन्दा ट्रक के आंगे फेंक दिया और चार का पेट चाकू से फाढ़कर, उन्हें मार डाला । बहुत खतरनाक हो तुम ।"

"गलतफहमी है तुम्हारी ” देवराज चौहान ने उसकी आंखों मैं झांका----"इन पाँचों में किसी की भी जाने लेने का मेरा इरादा नहीं था । परन्तु इन पांचों ने मेरी जान लेने की चेष्टा की थी । तभी तो यह मेरे हाथों से मरे । अपनी निगाहों मेँ मैंने इन्साफ ही किया हैं? "

"मैँ इस बारे में अपनी राय देना ठीक नहीं समझता l तृमने जो कर दिया । कर दिया । बात खत्म । अब एक वात मेरी सुन लो I यहाँ तक तो ठीक है । परन्तु बंगले कै भीतर उन तीनों युवकों को तुमने खामखाह हाथ लगाने की चेष्टा की तो फिर ठीक नहीं होगा I”

"चिन्ता मत करो I उनके लिए मेरे मन में ऐसा कोई विचार नहीं है । वह मेरी जान के दुश्मन नहीं बने I इसलिए मैँ उनका यह हाल नहीं करूंगा I यूँ समझो की वह तीनों मेरे लिए अनजान हैं I”

महादेव कै चेहरे पर तसल्ली कै भाव आये ।

“ तम यहां कैसे आ पहुचे?”

"बातें बाद मेँ I यहां से निकलो।"

जवाब पें देवराज चौहान ने सिर हिला दिया I

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फीनिश

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दोनों खामोशी से बंगले से बाहर निकले और बगल…वाले बंगले कै बाहर खडी कार तक पहुंचे I महादेव ने देवराज चौहान को बताया कि किस प्रकाऱ उसे शकं हुआ और वह बंगले में जा पहुचा । सबकुछ तो बताया महादेव ने, परन्तु नोटों से भरे सूटकेस की बात गोल कर गया ।

"तुमने वास्तव में मुझ पर अहसान किया हे । मैं तुम्हारे इस अहसान का बदला चुकाना चाहता हू।"

"वह कैसे?" महादेव ने देवराज चौहान को देखा I

"तुम मेरा थोड़ा-सा साथ दो । एक-दो दिन के लिए एक , आदमी की निगरानी करनी है । वह इस समय मेरी कैद में हे । बदले में तुम जो चाहोगे मिलेगा I मोटा माल मिलेगा ।"

"पक्की बात?"

"देवराज चौहान का वायदा है यह l” उसके चेहरे पर पहली बार मुस्कान उभरी ।

“ठीक है । मोटा माल देने का वायदा कर रहे हो तो फिर इन्कार नहीं कर सकता । वेसे भी एक भारीं गड़बड़ हो गई हे ।" महादेव ने लम्बी सांस लेते हुए कहा ।

"क्या ? "

"जिस बुढिया का भाई बनकर में रह रहा था , सोच रहा था उसकी जमीन जायदाद अपने नाम करवा लूगा I उसका कोई दूर का रिश्तेदार निकल आया हे I उसका खत आया है वह तोन-चार दिन में आ रहा है I"

"यानी कि तुम्हारा पत्ता साफ?" देवराज चौहान हंसा l

"हां ' मेरी सारी कोशिश बेकार गई । वह अपना सबकुछ उस रिश्तेदार को देगी ।"

"किस्मत अपनी-अपनी । ऐसे खेल खत्म होने मे देर नही लगती ।" देवराज चौहान कार का दरवाजा खोलकर भीतर बैठता' हुआ बोला--------"आओ वेठो । चलें I"

महादेव भीतर बैठा तो देवराज चौहान ने कार आगे बढा दी ।

“महादेव ।" कार ड्राईव करते हुए देवराज चौहान सिगरेट सुलगाते हुए बोला-"मेरा सुटकैस कहां रख आये?"

"सूटकैस? कौन-सा सूटकेस?" महादेव ने लापरवाहीँ से कहा ।

" वही जो कार की पिछली सीट पर पड़ा था ।"

"मुझे नहीँ पता । ना हीँ मैंने कोई सूटकैस कार में पड़ा देखा था I"

“झूठ बोलना बुरी बात हे, महादेव । उसमें नोट भरे पड़े थे । यह तो तुम जान ही चुके होंगे ।"

“अच्छा । मुझे नहीं मालूम था l कितने नोट थे उसमें?"

"नब्बे लाख I”

“नब्बे लाख ......!" क्षण-भर के लिए महादेव हड़बड़ा उठा ।

" लगता है सूटकेस में तुमने झांक तो लिया, लेकिन नोटों को गिना नहीं I”

महादेव की समझ में नहीं आया कि क्या कहे ।

"बैसे मुझे तुम पर इतना तो परोसा हैं कि तुमने सूटकेस जहां भी रखा होगा वहां किसी दूसरे का हाथ नहीं पहुच सकेगा I" देवराज चौहान ने बगल मैं बेठे महादेव पर निगाह मारी ।

“तुम खामखाह मुझ पर शक कर रहे हो । मुझे क्या मालुम तुम्हारा सूटकेस कहां है ।" महादेव ने जल्दी से कहा-“किसी के नोटों को तो छूना भी मै पाप समझता हूं !"

"सूटकेस को तो छूना पाप नहीँ हे-। बैसे महादेव जहा तुमने सूटकेस रखा हे वहां तक कोई दूसरा पहुंच गया तो जानते हो पूरा नब्बे लाख हाथ से निकल जायेगा ।"

"उस तक कोई नहीं पहुंच सकेगा-मैँने..... ।" महादेव ने तुरन्त होंठ भींच लिए !"

देवराज चौहान हौले से हंस पडा ।

"वंगले में रखा है ना?"

" हां ।" महादेव ने गहरी सांस लेकर कहा । जो बात बह कबूल नहीँ करना चाहता था, वह गलती से उसके मुंह से निकल गई थी ।

"तुम नोटों से भरा सूटकेस लेकर भागे नहीं! मुझें देखने. आ गए, क्यों?"

“गलती हो गई I मुझे वास्तव में सूटकेस के साथ खिसक जाना चाहिए था I लेकिन मन में उत्सुकता थी कि नोटों से भरा सूटकेस बाहर कार मेँ छोड़कर तुम दोपहर से भीतर क्या कर रहे हो I" महादेव ने सिर हिलाकर कर कहा ------" मैंने तुम्हारी जान बचाई है I तुम्हारी जानकी कीमत नोटों से भरा वह सूटकेस तो होना ही चाहिए । अब वह मेरा हे I तुम उसके हकदार नहीं रहे I भूल जाओ उसे ।"

"इसका मतलब तुमने जबरदस्ती ही अपने अहसान की कीमत वसूल कर ली I" वह बोला I

"और क्या I मांगने की मेरी आदत नहीं है I”

"अगर मैं कहूं , सूटकेस मुझे बापस दे दो तो?"

"सवाल ही नहीं पैदा होता I अब वह सिर्फ मेरा है I”

देवराज चौहान मुस्कराकर रह गया । एक शब्द भी नहीं बोला फिर I

कुछ आगे जाकर पब्लिक फोन बूथ के सामने उसने कार रोकी I

नीचे उतरने लगा तो बोला महादेव ।

“कहां जा रहे ही?"

. "फोन करने I" कहने के पश्चात् देवराज चौहान कार से निकला और बूथ में प्रवेश कर गया ।

कुछ ही पलों के बाद सम्बन्ध बनने पर वह इन्सपेक्टर सूरजभान से बात कर रहा था I

इन्सपेक्टर सूरजभान के पास कुछ देर पहले ही रंजीत श्रीवास्तव के उंगलियों के निशानों का रिजल्ट आया था I

साथ में रिपोर्ट भी नत्थी थी कि उसकी उंगलियों…कै निशान फाइल में मौजूद राजीव मल्होत्रा की उंगलियों से नहीं मिलते । दोनों जगहों पर उंगलियों के निशान अलग-अलग व्यक्तियों के हैं I इस रिपोर्ट के साथ ही सूरजभान का सारा जोश एकाएक ठण्डा पड़ गया था । वरना वह तो सोचे हुए था कि राजीव मल्होत्रा जिन्दा है ।

" हैलो , इन्सपेक्टर सूरजभान । मैं देवराज चौहान बोल रहा हूं I"

"मैं तुम्हें बहुत ही जबरदस्त खबर देना चाहता हू" I सुनना चाहोगे?"

" क्या ??" सूरजभान की आबाज में सतर्कता भर आई थी I

“दिल्ली में बैंक डकैती और हत्याओं कै तीन मुजरिम इंस समय विशालगढ़ में …छिपे हुए हैं । अगर तुम फौरन मूव करो तो उन्हें पकढ़ सकते हो । सुबह तक वह भाग भी सकते हैँ I"

“तीन मुजरिम .....? कौन-से तीन मुजरिम !"

"दिबाकर, हेगड़े और खेडा।”

"क्या !! यह तीनों बिशालमढ़ मे ?!" सूरजभान उत्तेजित होकर चीखा----“कहां हैं वह?"

देवराज चौहान ने सूरजभान को उनके बंगले का पता बताया और रिसीवर रखकर बूथ से बाहर आ गया । चेहरे पर मुस्कान फैली थी ।

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फीनिश

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राजीव मल्होत्रा की निगाहें डॉक्टर बैनर्जी के साथ आये रजीत श्रीवास्तव पर जा टिकीं । दोनों कईं पलों तक एक-दूसरे क्रो देखते रहे । रंजीत कठिनता से खुद पर काबू पाए हुए था क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि सामने बैठा इंसान उसका जुड़वां बचपन से बिछड़ा भाई है ।

और राजीव मल्होत्रा अपने हमशक्ल को देखकर हैरान हो रहा था ।

"कौन हो लुम?" आखिरकार रंजीत श्रीवास्तव ने वहां छाई खामोशी को तोडते हुए पूछा l

"डाक्टर बैनर्जी को बता चुका हू कि मै कौंन हूं !" कहने के बाद उसने बैनर्जी को देखा ---" आप कब तक मुझे इस तरह बांधे रखेंगे? मेरे जिस्म का एक-एक हिस्सा टूट रहा है !"

डॉक्टर बैनर्जी ने प्रश्नभरो निगाहों से रंजीत को देखा !

"डाँक्टर-खोल दो इसे ।" रंजीत ने कहा।

बैनर्जी ने राजीव को खोल दिया ।

'तुम दिल्ली के रहने वाले हो?”

" हा I"

“तुम्हारे पिता का नाम वया था?"

राजीव मल्होत्रा ने असमंजसताभरी निगाहों से उसे देखा ।

“तुम्हें मेरे पिता से क्या लेना-देना, जो भी बात करनी हो मैरा से करो I"

"जो मैँने पूछा हे, उसका जबाव दो फिर पैं तुम्हारी बात का जबाव भी दे दूगा । तुम्हारे पिता अब कहा हैं?”

"नहीं हैं ।” राजीव मल्होत्रा ने गहरी सांस लेकर कहा---"दस-बारह साल पहले ही उनका स्वर्गवास हो चुका है ।"

"उनका नाम क्या है?"

"बनारसी दास !"

रंजीत श्रीवास्तव का शरीर जौरों से कांपा आले हीँ पल उसने खुद पर काबू पा लिया । चेहरे पर एकाएक ही प्रसन्नत्ता के भाव नाचने लगे । उसने गर्दन घूमाकर बैनर्जी को देखा जो उसे ही देखे जा. रहा था ।

फिर बैनर्जी ने गहरी सांस लेकर सिगरेट सुलगाई ।

"तुम्हरि पिता बनारसी दास ने तुम्हें अपने बारे में और कुछ नहीं बताया ?"

“और क्या बताते वह?" राजीव मल्होत्रा की आंखें सिकुड गई ।

रंजीत ने सिर हिलाया और फिर जेब से बनारसी दास की पुरानी तस्वीर निकालकर राजीव के सामने करते हुए कहा… "यह तुम्हारे पिता की तस्वीर तो नहीं है l"

राजीव ने तस्वीर देखी तो चौक पड़ा।

"यह तो मेरे पिता की तस्वीर है । तुम्हारे पास कहां.-से आई?" राजीव के होंठों से निकला ।

रंजीत ने डॉक्टर बैनर्जी को देखा ।

"अब बताओ डॉक्टर-क्या अब भी शक की कोई गुंजाइश है?"

"नहीं । आप ठीक कर रहे हैं कि यह......!" बैनर्जी एकाएक खामोश हो गया ।

"बात क्या है ।" राजीव असंमजसता मे घिरा बोला---- "मेरे पिता की तस्वीर आपकै मास कहां से आई? मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आ रहा । यह तस्वीर दिखाकर तो'आप लोगों ने मुझे… ।"

“राजीब ।" रंजीत ने गम्भीर स्वर में कहा-----"बनारसी दास कभी मेरे पिताजी के पास बंगले में नौकर हुआ करता था । एक दिन उसे पिताजी ने चोरी करते पक्रड़ लिया । उसे मारा । अपनी बेइज्जती और मार का बदला लेने के लिए बनारसी दास मेरै जुड़वां भाई को उठाकर भाग गया ।"

“क्या मतलब?" राजीव का मुंह -खुला का खुला रह गया ।

"मतलब यह कि तुम और कोई वहीँ हो जिसे बनारसी दास लेकर भागा था l तब तुम दो साल के थे । तुम मेरे भाई । मेरे हमशक्ल हो I" कहते हुए रंजीत श्रीवास्तव की आवाज में भारीपन आ गया

तुम्हें पिताजी ने वहुत्त ढूंढा I कई साल ढूढते रहे l लेकिन तुम कहीं भी नहीं मिले, जव वह आखिरी सांस ले रहे ये, तन भी तुम्हें याद कर रहे थे कि जाने तुम किस हाल मेँ-होगे । आ मेरे भाई-मेरे गले से लग जा । मै तो आशा ही छोड बैठा था कि कभी दूसरा भाई मुझे मिलेगा ।" रंजीत की आंखों में पानी चमक उठा ।

राजीव अपनी जगह से नहीं हिला । रंजीत क्रो देखता ही रहा वह I

"देख क्या रहा डै, मेरे गले से नहीं लगेगा?" कहने कै साथ ही रंजीत ने आने बढकर राजीव क्रो अपनी बांहों में समेट लिया । राजीव्र की बाहें भी खुद ब-खुद उससे सिमटती चली गईं--“तुम पिले भी तो किस मोड पर सब-कुछ होते हुए भी… l”

"दो बातें ऐसी हैँ कि जिस पर मैँ अविश्वास नहीं कर सकता ।" राजीव मल्होत्रा ने उसकी बात. काटकर गम्भीर स्वर में कहा-“एक तो मेरे पिताजी-थानी की बनारसी दास की तस्वीर का तुम्हारे पास होना और दूसरी बात तुम ठीक मेरी शक्ल कै हो । तीसरी'वात एक और पैदा होती है कि तुम वहुत पैसे वाले ही । इसलिए मुझे भाई कहने के पीछे तुम्हारा कोई स्वार्थ नहीं हो सकता । मतलब कि इस बात पर मैं विश्वास करता हूं कि तुन वास्तव में मेरे बचपन कै बिछडे हुए भाई हो ।"

रंजीत श्रीवास्तव का चेहरा उठा ।

"लेकिन-मुझे दुनिया के सामने तुम भाई ना ही कहो तो ठीक होगा ।”

"क्यों ?" रंजीत कै होंठों से निकला ।

राजीव ने गहरी सांस लो फिर गम्भीर स्वर में कह उठा ।

"मैं बेंक-डकैती और हत्याओं का मुजरिम हूं। अगर मेरा नाम तुम्हारे साथ जुड गया तो तुम्हारी बहुत ही ज्यादा बदनामी होगी । बेहतर होगा मुझसे रिश्ता कायम मत करो ।” .

" बदनामी की वजह से मैं बरसों से बिछड़े भाई को नहीं छोड -सकता ।" रंजीत श्रीवास्तव ने दृढ़ स्वर में कहा-" तुम मेरे भाई हो और भाई ही रहोगे । चूंकि अभी बैंक-डकैती का मामला ताजा . हैं इसलिए दो तीन साल तुम्हारे रहने का इन्तजाम कही और कर दूंगा । बाद में मामला ठण्डा पड़ जाएगा। वेसे जो इन्सपेक्टर दिल्ली में तुम्हारे केस की तफत्तीश कर रहा था, उसने मुझे राजीव मल्होत्रा समझकर कुछ घण्टे पहले ही मेरी उंगलियों निशान लिए है

अब तक उसे'तसल्ली हो गई होगी कि दिल्ली पें रहने वाले राजीव का कोई भी बजूद विशालगढ़ में नहीं हे । बिशालगढ़ मे उसकी शक्ल का रंजीत् रहता है ।यह बात भविष्प , में हमारे लिए फायदेमंद रहेगी । यह इंस्पेक्टर तुम्हें देखेगा , रंजीत श्रीवास्तव ही समझेगा । तुम किसी बात की फिक्र मत करो णै सब ठीक कर देंगा ।"

राजीव कुछ कहना चाहकर मी कह ना सका I

"तुम अभी मेरे साथ चलोगे I कुछ दिन तक मैं तुम्हारे ठिकाने का इन्तजाम कर दूंगा ।तब तक हम एक साथ किसी . को नजर नहीं आयेंगे । हम को चोंकाना नहीं चाहते । तुम . कमरे में बन्द रहोगे तो मैं बाहर रहूंगा । मैं भीतर रहूगा तो तुम बाहर रहोगे। एक बार तो तुम्हें खो दिया पस्तु अब पैं तुम्हें किसी मी मौके पर खोना नहीं चाहूगा I"

राजीव कै होंठों पर बरबस हीँ मुस्कान उभरती चली गई I दोनों भाइयों के मिल जाने से डॉक्टर कै चेहरे पर तसल्ली से भरे भाव फैले हुए थे ।

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फीनिश

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