• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

वारदात complete novel

देवराज चौहानं ने अपार्टमेंट कै सामने कार रोकी I महादेव के साथ वह नीचे उतरा I

"यहा कहाँ?" महादेव के होंठों से निकला I

"चलो आओ । पूछो कुछ मत ।"

देवराज चौहान के साथ महादेव आगे बढ गया । पहली मजिल पर मौजूद किराये पर हासिल कर रखे अपार्टमेट कै बन्द दरवाजे . कै सामने ठिठककर देवराज चौहान ने जेब से चाबी निकाली और दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गया ।

महादेव उसके पीछे था । भीतर पहुंचकर जब उसने लाइट ओंन की तो किसी को बंधे पा कर महादेव चौंका I

"यह कौन है?"

"यह दोपहर सै वंधा हुआ है । सबाल कम पूछो ओर इसे चैक करो ।"

महादेव आगे बढकर उसे टटोला उसे चैक किया फिर देवराज चौहान से बोला I

" यह तो बेहोश है I”

" होश में लाओ I "

उसके बन्धन खोलने कै पश्चात् महादेव ने कहा ---- “यह तो बहुत तगडा बेहोश लगता है !"

“बोला तो यह दोपहर से बंधा हुआ हे I अगर यह मर जाता तो मुझे तब भी हैरानी नहीँ होती I तुम इसे होश में लाओ ।" कहने के पश्चात् देवराज चौहान उठा और आगे बढकर दूसरे कमरे मेँ खुलने वाले दरवाजे पर लटका ताला खोला और भीतर प्रवेश कर गया । सामने ही वह दोनों सूटकेस मौजूद थे।

देवराज चौहान ने आगे बढकर सूटकेसों को खोलकर देखा, सब कुछ ठीक ठाक था l

सूटकेसों में वेसे ही माल भरा पड़ा था, जेसे कि वह छोडकर गया था ।

सूटकेसों क्रो बन्द करके कमरे से निकला और दरवाजे पर पुन: ताला लटका दिया ।

महादेव, बेहोश अशोक उर्फ रंजीत को होश में लाने का प्रयत्न कर रहा था I

"दरवाजे से उस पार क्या है ।” महादेव ने अपने काम में व्यस्त, दरवाजे की तरफ इशारा किया I

"कमरा हे I" देवराज चौहान ने कटु स्वर में कहा ।

"अच्छा ।" महादेव की आवाज में व्यंग्य कै भाव थे-“मैँने समझा झील है, तुम तैरने गए हो I"

" अपने काम में कम और दूसरों के मामले में ज्यादा दिलचस्पी लेते हो ।" देवराज चौहान ने तीखे लहजे में कहा-"यह ,आदत ठीक नहीं होती I क्यों बेकार में हरध-पांव तुडबाते हो ।”

"क्या कंरू-आदत से मजबूर हूँ।” महादेव ने गहरी सास ली फिर बौला-----"यह हे कौन?"

"स्वीत श्रीवास्तव !" देवराज चौहान ने कहते हुए सिगरेट का लापरवाही से कश लिया I

"रंजीत श्रीवरस्तव ।।" महादेव चौंका-"वह करोड़पति जिसके यहां पर तुम.....तुम काम करते हो?”

"हां I"

" तुमने इसे यहा क्यों बाघ रखा है? चक्कर क्या है ??" महादेव के होंठों से निकला ।

"कोई चक्कर नहीं है । तुम अपना काम करो I" देवराज चौहान की आवाज में सख्ती उभर आई ।

" लेकिन !"

"सुना नहीं तुमने !" देवराज चौहान कै होंठों से गुर्राहट निकली

“मैँ तुम्हें यहा काम कै लिए लाया हूं। अपने काम से मतलब रखो । बस I मेरे मामले में ज्यादा घुसने की चेष्टा मत करौ I"

"रोब डाल रहे हो I" महादेब ने सिर हिलाया, "ठीक है । तुम्हारा रोब बर्दाश्त करना ही पड़ेगा I आखिर तुमने मोटा माल देने का वायदा किया ‘है I" जवाब में देवराज चौहान कुछ वड़बड़त्या जिसे कि महादेव सुन नही सका I

@@@@@

फीनिश

@@@@@

महादेव की घंटा-भर की कोशिश के पश्चात् किसी प्रकार अशोक उर्फ रंजीत को होश आया I उसकी हालत बुरी हो रही थी I इतनी'हिम्मत नहीं थीं कि उठकर बैठ पाता ।

.. "इसे फ्रिज से निकालकर कुछ खिला-पिला दो I” देवराज चौहान बोला I महादेव उसे खिलाने -पिलाने में व्यस्त हो गया I खाने-पीने कै बाद अशोक की हालत कुछ सुधरी तो उसने क्रोधभरी निगाहों से देवराज चौहान को देखा I

“तुम्हारी इतनी हिम्मत कैसे हो गई कि तुम मेरे साथ ऐसा च्यवहाऱ कर सको?" अशोक गुर्राया ।

“हिम्मत है तभी तो यह सब-कुछ कर सका I तुम्हें कोई एतराज है क्या?”

"तुम.......तुम.....मैं तुम्हें जेल में ठुसवा दूंगा, ऐसी हालत कर दूगा कि तुम कभी जेल से बाहर निकल भी ना सकोगे, तुम… तुमने मेरा अपहरण किया हे ।"

“तुम मेरा कुछ नहीं कर सकोगे रंजीत श्रीवास्तव. I” देवराज चौहान का स्वर सख्त हो गया… “ओंर तुम मुझे कुछ भी करने से रोक नहीं सकते I अभी तो मैंने बहुत कुछ करना हे I”

_ “क्या मतलब?" अशोक की आंखें सिकुंड गयी I

"रंजीत साहब, आप जब इस अपार्टमेंट मे आए, तब अपने हमशक्ल को तो देखा होगा?"

"हां I” अशोक कै होंठों से निकला I

"अब वह रंजीत श्रीवास्तव वना तुम्हारे उस महलनुमा खूबसूरत बंगले पर रह रहा हे । सव उसे रंजीत श्रीवास्तव ही समझ रहे हैं I यानी कि इस समय तुम्हारा कोई वजूद नहीं I” .

अशोक अपनी सारी पीड़ा तकलीफ भूल गया I

" समझे , तुम्हारी जगह पर अब मेरा आदमी, तुम्हारी ही शक्ल में पहुंच गया ।"

"तु-तुम क्या चाहते हो?" हक्के-बक्के से अशोक कै होंठों से निकला I

" कुछ खास नहीं । तुम्हारे पास जो दौलत का समन्दर मौजूद है । उसमें से चद बाल्टिया भरना चाहता हूं।"

“मेरे हमशक्ल के दम पर?"

“हां I"

"उसे कुछ भी नहीं मिलेगा ।"

"क्यों?" देवराज चौहान के चेहरे पर कहर कै भाव फैलते चले गए ।

"मेरी दौलत पर, वह मेरा हमशक्ल बनकर मी हक नही जमा सकता I"

"वह तुम्हारी शक्ल लेकर हीवहां नहीं गया, तुम्हारे काफी गुण लेकर भी वहां गया हे I उन गुणों में एक गुण तुम्हारे साईन भी शामिल हैं l तुम्हारे हस्ताक्षर कै दम पर वह काफी कुछ कर सकता है I "

अशोक का दिमाग इस समय तेजी चल रहा था ।

" मैं छोटी-स्री आफर देता हूं जो कि हम दोनों कै लिए ही ठीक I”

“बोलो I अपनी आॅफ़र भी सुना दो।”

" तुम जो चाहते हो वहीँ करो । मुझे कतई कोई एतराज नहीं ।" अशोक उर्फ रंजीत जल्दी से बोला-”बदले में जो मैं कह रहा हूं मान लो । फिर तुम आराम से काम करते रहना I"

“मुह से कुछ फुटोगे भी या बात घुमाते रहोगे ।" देवराज चौहान ने तीखे स्वर में कहा ।
 
अशोक अपनी जगह से उठा । अपने वदन को सीधा किया । फिर उसने जेब से सिगरेट लेकर, उसे सुलगाने के पश्वात् कश लिया ।

महादेव कुर्सी पर पसरा पड़ा था । उसकी की पेनी निगाहें अशोक को घूरे जा रही थीं । महादेव मसले को समझने की कोशिश कर रहा था I

"देवराज चौहान ।।" चंद कदम टहलने कै पश्चात् अशोक ठिठकर बोला-"मेरे दो सूटकेस तुम्हारे पास हैं ।"

उसे देखते देवराज चौहान ने सहमति मेँ अपना सिर हिलाया।

"वह मुझे दो । मैं हमेशा के लिए इस शहर से चला जाना चाहता हूं I पीछे क्या होता है या तुम क्या करते हो, मुझे इससे कोई मतलब नहीं । अगर तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं तो तुम मुझे शहर से बाहर छोड दो । तुम सूटकेसों को खोलकर देख चुके होंगे कि उनमें क्या है । वह सब कुछ, मैंने इकटूठा ही इसलिए किया है कि हमेशा के लिए इस शहर को छोड दूं ।"

"यानी कि रजौत श्रीवास्तव ।" वह आखे सिक्रोड़ व्यंग्य भरे. स्वर में कह उठा-" करोडों-अरबों का मालिक थोड्री सी दौलत , सूटकेसों में भरकर, इस शहर से भागना चाहता हैं I वेरी गुड । बहुत खूब । कौन मानेगा तुम्हारी इस बात को. जो भी सुनेगा । वहीं हंसेगा, या मुझे बेवकूफ वना रहे हो?"

"मेरी बात पर विश्वास करो I में सच कह रहा हू।"

देवराज चौहान ने गर्दन घुमाकर महादेव को देखा ।

" महादेव ।"

" हां !"

"तुम विश्वास करते हो इस बात पर कि रजीत श्रीवास्तव जैसी हस्ती दो सूटकेसों मे थोडी -सी दौलत को भरकर, बाकी सबकुछ छोढ़-छाड़कर, हमेशा के लिए इस शहर से जा रहा हो?”

“ऐसी मजाक बाली बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता I " महरदेव ने सिर हिलाया ।

"लेकिन मैं अब इसकी बात पर विश्वास करूंगा ।"

" क्या?" महादेव ने हेरानी से उसे देखा ।

देवराज चौहान ने गर्दन घुमाई और अशोक पर निगाहे टिका दीं l

“मैं तुम्हें दोनों सूटकेस दे दूंगा। तुम कही भी जाने को आजाद हो।"

अशोक का चेहरा खिल उठा ।

“लेकिन जाने से पहले तुम्हें मेरा एक काम करना होगा l "

"कौन-सा काम?"

"तुम तो हमेशा के लिए इस शहर से जा रहे हो । बापस कभी नहीं आओगे । लेकिन तुम्हारे पीछे जो दौलत पडी रहेगी । उसका मालिक कौन होगा ? तुम जाने से पहले अपना बाकी का सब-कुछ मेरे नाम कर दो । इस पर तो एतराज नहीं होना चाहिए ।"

" य......यह केसे हो सकता है ?" अशोक के होंठों से निकला !!

"क्यों नहीँ हो सकता?"

" मै आज रात ही विशालगढ से बाहर निकल जाना चाहता हूं।" अशोक ने अपने शब्दों पर जोर दिया ।

"आज रात ही क्यों?"

"इस बात से तुम्हें कोई मतलब नहीं होना चाहिए ।"

"बेटे ।।" देवराज चौहान का लहजा खतरनाक हो गया ----"कल दिन निकलने पर मैं तुम्हारी जायदाद कें कागज तैयार कराऊंगा । तुम उस पर साईन करोगे । उसके बाद मैं तुम्हें कार मेँ बिठाकर इस शहर से बाहर छोड आऊगा । इस मामूली सी बात पर तुम्हें कोई एतराज नहीं होना चाहिए ।"

अशोक ने हड़बड़ाकर, अपने सूखे होंठों पर जीभ फेरी ।

देवराज चौहान एकाएक अजीब-से अन्दाज़ में मुस्कराया ।

"तुम्हें शायद याद होगा कि छ: महीने पहले तुम्हारी कार की टक्कर, एक कार से होंगई थी । तब तुमने इसी दौलत कै नशे में चूर अपने आदमियों से उस कार वाले को तबियत से ठुकाया था ।"

अशोक की आखें सिकुर्डी ।

“लगता है याद आ गया ।" देवराज चौहान के दांत भिच गये ।

"तुम्हारा उस बात से क्या वास्ता?"

"सारा वास्ता ही उसी बात में हे ।" देवराज चौहान र्दात भीचकर कह उठा----"तुमने जिसकी ठुकाई की थी , वह इन्सान इस दुनिया में मेरा सबसे खास हे । चाहता तो मैँ तुम्हें खत्म सकता था । इंसलिये मैंने तुम्हें कंगाल बनाने की सोची । ताकि दौलत का घमण्ड तुम्हारे सिर से उतर सके । और इस काम में मेरे छ महीने लग गये । अब वह वक्त आ गया है ।"

अशोक श्रीवास्तव देवराज चौहान को देखता रहा ।

महादेव की उलझन भरी निगाह देवराज चौहान पर थी । वह कुछ पूछना चाहता था । लेकिन अभी खामोश ही रहा ।

"कल तुम जमीन-जायदाद कै पेपर्स साईन करके अपना सब कुछ मेरे नाम करोगे । मैं तुम्हें पैसे… पैसे का मोहताज कर दूंगा ।

“मुझे यहा से चले जाने दो । जो तुम सोच रहे हो । उसका कोई फायदा नहीं होगा ।"

" क्यों ?"

अशोक ने सख्ती' से अपना होंठ भीच लिया ।

"जबाव दो मेरी बात का !"

"म......मैँ रंजीत श्रीवास्तव नहीं हूं।"

वह चौंका ।

महादेव हैरान-सा उसका मुह देखने लगा ।

“क्या कह रहे हो?" देवराज चौहान असंमजसता में घिरा कह उठा l

"मैं सच कर रहा हू मैँ रंजीत श्रीवास्तव नहीँ हू । मेरा नाम अशोक है । अशोक श्रीवास्तव । मैं रंजीत का चचेरा भाई हू। मैंने अपने चेहरे को प्लास्टिक सर्जरी करवाकर रजीत जैसा वना रखा है I"

" झूठ बोलते हो तुम l तुम रंजीत श्रीवास्तव ही हो । पिछले छः महीने से में तुम्हारे पास रह रहा हूं।"

"तुम ठीक कहते हो , लेकिन मैं दो सालों से रंजीत कै वेष में वहा रह रहा हूं । तुम चाहो तो मेरे चेहरे पर की गई प्लास्टिक सर्जरी साफ कराकर देख सकते हो ।"

देवराज चौहान उसे देखता रह गया ।

बोला कुछ नहीं I

“हो सकता हे यह सच कह रहा हो t" महादेव कह उठा I

"ठीक है । मैं तुम्हारी बात की सत्यता की जांच करूंगा । लेकिन आज की रात तो तुम्हें यही रहना पडेगा । कल से पहले तुम इस शहर से बाहर नहीँ निकल सकोगे I"

अशोक ने होंठ भीच लिए ।
 
"एक बात का जबाव और दे दो ।"

“ क्या ?”

. . “असली रंजीत श्रीवास्तव कहां है?”

"मैं नहीं जानता ।"

“क्या मतलब? ” _

" मुझे नहीं मालूम रंजीत श्रीवास्तव कहा है । जब मैँने उसका वेष अपनाया तो उसे मालूम हो गया, उसके बाद तो वह ऐसा गायब हुआ कि ना तो वह नजर आया ना ही कहीँ उसका जिक्र सुना ।"

"तुमने उसे तलाश तो करवाया होगा?"

"करवाया, लेकिन उसकी कोई खोज-खबर हासिल नहीँ हुई !!"

देवराज चौहान ने नई सिगरेट सुलगाई और महादेव को देखा ।

"महादेव इसका ध्यान रखना । इस समय सुबह कै चार बज रहे हैं । जल्दी आने की चेष्टा करूंगा ।"

"यहां की तुम फिक्र ना करो । मैं सब-कुछ सम्भाल लूंगा ।" महादेव ने अशोक को घूर कर कहा ।

अशोक ने महादेव पर नजर मारी फिर देवराज चौहान की देखने लगा ।

देवराज चौहान पलटा और तेज-तेज कदम उठातां हुआ बाहर निकल गया ।

@@@@@

फीनिश

@@@@@

"देवराज चौहान ने वह दोनों सूटकेस कहां रखे हैं, जो तुमसे लिए थे ?" महादेव ने पूछा ।

“क्या मतलब?" अशोक ने आखे मिचमिचाकर उसे देखा I महादेव दांत भींचकर आगे बढा ।

“मैं वहुत खतरनाक आदमी हुँ, कईं कत्ल कर चुका हू। मैं हर उस इंसान क्रो कत्ल कर देता हूं जो मुझे पसन्द नही आते, मेरी बात का जवाब तक नहीं देते I जो पूछता हू सीघी तरह उसका जवाब देते जाओ । मतलब-वतलब मत पूछ नहीं तो . तुझे लाश में बदलकर रख दूमा । बोल-" कहां हैं वह सूटकेस?"

"मुझे..... मुझे नहीं मालूम I" अशोक ने सूखे होठो पर जीभ फेरी I

“क्यों नहीं मालूम?” महादेव दहाड़ा ।

“उसने मुझे यहां लाते ही बेहोश कर दिया था । तब सूटकेस उसके पास थे I अब मुझे क्या पता कि मुझे बेहोश करने कै बाद उसने सूटकेस कहां ऱखे I तुमने देवराज चौहान से ही यह बात क्यों नहीं पूछ ली?"

“ज्यादा बकवक मत कर ।" महादेव ने दांत भींचे----"हूं । जव तू बेहोश हुआ था सूटकेस यहीँ पर थे ?”

“हां, । कहने के साथ अशोक ने खुश्क अंदाज में सिर हिलाया ।

महादेव ने आगे बढकर मेन द्वार ताले में चाबी घुमाकर उसे वन्द किया और चाबी जेब में डालने के बाद उसे जेब के हवाले किया । फिर जेब से महीन… सी तार निकाल ली l अशोक आंखें फाडे उसकी हरकतों को देखे जा रहा था ।

महादेव ने सख्त निगाहो से उसे देखा ।

"कुर्सी पर बैठ जा और हिलने की कोशिश मत करना, वरना टुकड़े करके रख दूगा I"

उसे खतरनाक मूड मे देखकर अशोक फौरन कुर्सी पर बैठ गया I

महादेव आगे बढा ओर दूसरे कमरें में खुलने वाले दरवाजे पर लटक रहे ताले को तार के दम पर खोलने कै पश्चात् कमरे में प्रवेश कर गया I

अगले हीं पल वह ठिठका ।

सामने ही दो बडे बड़े सूटकेस पडे नजर आ रहे थे I महादेव की आखों में तीव्र चमक लहरा उठी । वह जल्दी से आगे लपका और तार से सूटकेस के ताले खोलकर उनके भीतर झांका,

फिर फौरन ही उन्हें बन्द कर दिया । उसका दिल धाड धाड बजने लगा । दोनों सूटकेस माल से भरे पडे थे ।

एक में तो पूरी की पूरी नोटों की गड्डियां थीं दूसरे में कुछ नोटों की गड्डियां और बाकी सोना हीरे जवाहरांत भरे पड़े थे ।

"यही हैँ मेरे सूटकेस ।”

आवाज सुनते ही महादेव नै देखा, दरवाजे के बीचों बीच अशोक खडा था उसकी विवशता-भरी निगाह बारी-बारी दोनों सूटकेसों पर फिर रही थी ।

महादेव उठा और ख़ड़ा हुआ I उसकी कहर भरी निगाह अशोक पर जा टिकी थी ।

"एक बात कहूं ।।"

महादेव उसे घूरता रहा ।

"यह हम दोनों के लिए बहुत है । आधा आधा बांटकर भाग चलते हैं । अगर देवराज चौहान आ गया तो तुम्हारे पल्ले कुछ नहीं पडेगा । न ही मुझे कूछ मिलेगा । इस समय बहुत खूबसूरत मौका है I"

"राय तो तुम्हारी बहुत अच्छी हे I” महादेव कड़वे स्वर में कह उठा-“लेकिन इस काम में मैं तुझे साथ क्यों मिलाऊ? तेरी गर्दनं काटकर सारा माल लेकर में रफूचक्कर हो जाता हू।" .

अशोक का चेहस फक्क पड़ गया । उसने सूखे होंठों पर जीभ फेरी l

“मेँने तुझे कुर्सी पर बैठने को कहा था 1 यह भी कहा था कि उठना मत ।"

अशोक एक कदम पीछे हट गया । महादेव का चेहरा वहशी भावों से भर चुका था ।

महादेव आगे बढा । अशोक पीछे हटता हुआ पहले वाले कमरे में पहुच गया । तभी महादेव का जोरदार घुसा अशोक के पेट में जा धसा । अशोक चीखकर पेट पकड़ते हुए दोहरा हो गया ।

@@@@@

फीनिश

@@@@@
 
देवराज चौहान जब रंजीत श्रीवास्तव के महलनुमा बंगले पर पहुंचा तो भोर का उजाला फूट पडा था । वह सीधा रजीत कै बेडरूम में पहुचा ।

रजीत ने बेडरूम का दरवाजा खोला था । तीन घण्टे पहले ही वह आकर सोया था ।

राजीव को वह खामोशी से अपने साथ ते आया था कोई भी उसे देख न सका था ।

उसको बगल बाला कमरा दे दिया था जिसका एक दरवाजा उसके बेडरूम में खुलता था ।

दरवाजा खुलते ही देबराज चौहान भीतर पहुचा और दरवाजा बन्द करते हुए बोला- " सब ठीक है !"

"हा' r रंजीत ने गर्दन हिलाईं---“सब ठीक है तुम रात भर कहा रहे?”

"कहीँ फस गया था !" देवराज चौहान ने सिर. हिलाया-"आज से तुम्हे काम शुरू करना हे I"

"काम इसे नहीं मुझे शुरू करना है I"

देवराज चौहान ने चौंककर आवाज की दिशा में गर्दन घुमाई तो ठगा -सा खड़ा रह गया i बगल वाले कमरे में खुलने वाले के बीच वाले दरवाजे पर राजीव खडा था ।

देवराज चौहान हैरानी से बारी-'बारी दोनों को देखता रह गया ।

तुम मेँ से राजीव कौंन है ? " देवराज चौहान के होठो से निकला ।

" मै हू।” दरवाजे के बीच खडा राजीव मुस्कराता हुआ आगे आ गया----"देवराज चौहान तुमने मुझे यहा तक पहुंचाने कै लिए बहुत मेहनत की, परन्तु अफसोस तो इस बात का है कि तुम जो चाहते थे वह अब नहीँ हो सकेगा ।”

देवराज चौहान ने फौरन खुद पर काबू पाया और सामान्य अवस्था में आ गया । उसका दिमाग तेजो से चल रहा था । राजीव के साथ उसके हमशक्ल को देखकर वह बेहद हैरान था ।

" तुम कौनं हो?" देवराज चौहान ने दूसरे से पूछा ।

" मै रंजीत श्रीवास्तव हू। असली वाला ।" उसने मुस्कराते … लहजे में जवाब दिया ।

देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई और कश लेकर गम्भीर स्वर पें कह उठा ।

“मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा हू बेहत्तर होगा कि मुझे खुलकर समझाओ कि क्या चक्कर है?”

देवराज चौहान को रंजीत श्रीवास्तव ने सारी बात बताईं ।

तव देवराज चौहान को मालूम हुआ वह ठीक कह रहा था कि वह रंजीत नहीं अशोक है और अब वह फंसने वाला था तो हाथ लगी दौलत को लेकर खिसकने जा रहा था ।

"मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं कि तुम छ: महीने से प्लान करके मेरी दोलत को हथियाने के चक्कर में लगे हुए हो । क्योंकिं त्तव मैं यहा था ही नहीं ।" रजीत श्रीवास्तव गम्भीर स्वर मे कह उठा----" मै सिर्फ इतना जानता हू कि तुम्हारे कारण मेरा बचपन का बिछड़ा भाई मिला जोकि मुझे अपनी जान से भी ज्यादा अजीज है । अन्जाने मेँ तुमने मुझ पर ऐसा ऐहसान का दिया है जिसका बदला नहीं चुकाया जा सकता । फिर भी में इस ऐहसान का बदला एक हद मेँ रहकर अवश्य चुकाऊंगा बोलो-कितना पैसा चाहिए तुम्हे ? मेरे पास बहुत दौलत है मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा । तुम्हे इतना पैसा दूंगा कि सारी जिन्दगीं तुम ऐश करोगे I किसी चीज की तुम्हें कमी नहीं होने दूंगा ।"

"देवराज चौहान को खैरात लेने की आदत नहीं है रंजीत श्रीवास्तव साहब । मैं सिर्फ मेहनत से कमाया घन लेने में विश्वास करता हूं । चाहे वह मेहनत बुरी हो या अच्छी इस बात से मुझे कोई सरोकार नहीं । अगर मैँ तुम्हारे भाई को खोजने निकाला होता तो आज अवश्य तुमसे मुहमांगी दौलत लेता । लेकिन राजीव कै दम पर तो मैं दूसरा ही खेल खेल रहा था जोकि अब पिट चुका है । और इस बात का कोई गम भी नहीं मुझें !" यह सब तो हमारी दुनिया में चलता ही रहता है । अब नहीँ तो अगली बार सही l"

,"देवराज चौहान !" राजीव कह उठा-“क्या बेवकूफी वाली बातें कर रहे हो, आती दौलत-क्रो ठुकराना नहीं चाहिए । जो पैसा तुम्हें रंजीत दे रहा है, वह तुम्हें ले लेना चाहिए ।"

"मैं आती दौलत को नहीं, आती भीख को ठकरा रहा हू I” देवराज चौहान राजीव को देखकर मुस्कराया----" मेरे अपने उसूल हैँ, जिन्हें मैं कभी भी तोड नहीं सकता । दौलत इकटूठी करना मेरा इकलौता मकसद है l सिर्फ वहीँ दौलत, जिसे मैंने मेहनत से हथियाया हो । हाथ फैलाकर मैंने कभी दौलत हासिल नहीं की ।"

“अजीब आदमी हो तुम I” रंजीत श्रीवास्तव ने उसझन-भरे .स्वर में कहा----"जो दौलत हम तुम्हें दे रहे हैं, उसे भीख कह रहे हो और चोरीं-चकारी, हेरा-फेरी से हासिल की गई दौलत तुम्हें मेहनत कीं लगती है l"

"हां । क्योंकि चोरी-चकारी और हेरा-फेरी में दिमाग लगता है, मेहनत लगती है । जान की बाजी लगाते हैं हम । बड़े-बड़े रिस्क लेते हैँ , समझे तुम, बहुत मेहनत करनी पडती हे हमें । उदाहरण तुम्हारे सामने है I इस राजीव पर मैंने कितनी मेहनत की ओर इसे यहां तक पहुंचाया I लेकिन आखिर में सब-कुछ खत्म हो गया । लेकिन कोई बात नहीं । अगली बार कहीं और कामयाब हो ज़ाऊंगा ।"

“वास्तव में आज तक तुम जैसा आदमी नहीं देखा कभी ।" रजीत ने गहरी सांस ली।

"एक बात तो बता दो ।" राजीव एकाएक बोला ।

देवराज चौहान ने प्रश्नभरी निगाहों से उसे देखा l

"वह नकाबपोश कौन था?"

" वह !" देवराज चौहान ने गहरी सांस लेकर कहा-"वह था कोई I मेरे कहने पर, तुम्हें जिन्दा करवाने में उसने बहुत मेहनत की थी I उसके बारे में जानने का तुम्हें कोई फायदा नहीं ।”

राजीव देवराज चौहान को देखता रहा ।

बोला कुछ नहीँ I

"अब यहां पर मेरा कोई काम् नहीँ रहा । इसलिए चलूंगा I" देवराज चौहान हौले से हंसा ।

"रात-भर मे इन्सपेक्टर सूरजभान का तुम्हारे लिए दो वार फोन आ चुका हे ।"

* मेरे लिए?"

"हाँ l वह तुमसे मिलना चाहता है । उसने कहा था कि तुम्हारे आते ही उसे इत्तला कर दूं।"

देवराज चौहान के होंठों से गहरी सांस निकल गई I

" कह देना उसे मैं यहा आया ही नहीं ।" देवराज चौहान ने कहा और पलटकर बाहर निकल गया I

रंजीत्त और राजीव ने एक-दूसरे को देखा ।

"आतीं दौलत को कोई ठुकराये ऐसा तो मैंने पहले कभी भी देखा सुना नहीं था l” रंजीत कह उठा I

वास्तव में अजीब ही उसूल हैं देवराज चौहान कै I” राजीव कंधे उचकाकर बोला I

"जो भी ही देवराज चौहान मुझे पसन्द आया I"

@@@@@

फीनिश

@@@@@

देवराज चौहान की कार बंगले के फाटक से बाहर निकली ही थी कि एकाएक उसे कार रोक देनी पडी क्योंकि ठीक सामने पुलिस की जीप आकर रुकी थी । जीप से सूरजभान नीचे उतरा I उसकी आंखों में नींद भरी हुई थी I

सिर से पांव तक वह थकान से भरा हुआ था I देवराज चौहान उसे देखते ही खुलकर मुस्कराया ।

तुमने रात को फोन पर मुझे दिवाकर, हेगडे और खेड़ा के बारे मे ख़बर दी थी I" सुरजभान उसके करीब आ पहुचा I

" हां !" देवराज ने जीप से उतर आये अन्य पुलिस वालों पर निगाह मारी I

" तुम्हें इन तीनों के बारे मे कैसे पता चला ?" सुरजभान की पैनी निगाहे देवराज चौहान कै चेहरे पर टिकी थी ।।

" तुम आम खाने से मतलब रखो l क्यों फालतू की बातें सोचते हो ।"

"तुम्हें मेरे साथ पुलिस स्टेशन चलना होगा I" क्रहने के साय ही इन्सपेक्टर सूरजभान ने होलस्टर से रिवॉल्वर निकाल ली ।

“क्यों ?” देवराज चौहान कै होठों पर छाई मुस्कान ओर भी ‘गहरी हो गई I

"दिवाकर, हेगडे और खेडा ने तुम्हारे खिलाफ़ बयान दिया है I उनका कहना है कि तुम उनकें बारे में मुंह बंद रखने कै लिए दिवाकर के बारे में ब्लैकमेल करके उससे एक करोड रुपया मांग रहे थे । परन्तु स्कम तुम्हें हासिल नहीं हुइं1 फिर खुन्दक में तुमने पुलिस को उनके बारे में इन्कार्न कर दिया'।"

देवराज चौहान हंसा ।

"ओर इन्सपेवटर, तुमने उन नशेड्रिर्यो कै बयान पर विश्वास कर लिया?" . .

"नहीं करूं तो भी तुम नहीं वच सकते ।"

"क्यों ?"

"क्योकि तुमने तारासिहं और उसकै साथियों की पेट फाढ़कर हत्या की है । नृशंस हत्या । तुम वहुत हीँ खतरनाक मुजरिम हो I अब तो शक हो रहा हे कि उस दिन ट्रक कै नीचे आये आदमी की हत्या मी तुमने ही की होगी । जो भी होगा, सच तो मै तुम्हारे मुंह से निकाल ही लूंगा । चलो जीप पैं बैठो I बाकी बातें पुलिस स्टेशन जाकर करेंगे I" सूरजभान ने हाथ में थमी रिवॉल्बऱ से जीप की तरफ इशारा किया I

देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई और कश रोका गम्भीर मे स्वर यें बोला ।

" इंस्पेक्टर, तुम वहुत जल्दबाज हो I कुछ कहने से पहले सोच' तो लिया करो ।"

"क्या कहना चाहते हो?" सूरजभान सतर्क था I

. "मैँने किसी की हत्या नहीं की । तुम बेकार में तंग करके अपनी एनर्जी वेस्ट कर रहे हो । अगर उन हत्याओ के बारे मे सच जानना चाहते हो तो तुम्हें साथ चलना होगा I”

" कहां ?”

"दिवाकर वाले मंगते पर ही ।"

" क्यों? वहां ऐसा क्या हैं?"

"वहां बहुत कुछ है और वह वहुत कुछ तुम्हें वहीं चलने पर पता चलेगा । उन चारों को मारने वाले को भी जान जाओगे । यह मामला इतना सीधा नहीं है जितना कि तुम समझ रहे हो I" देवराज चौहान कहते हुए बेहद गम्भीर था-“लेकिन तुम्हें वहां अकेले ही चलना होगा । मैँ ढेर सारे पुलिस बालों को साथ नहीं ले जाना चाहता । अगर ले गया तो उन चारों का हत्यारा वहां से फरार हो जाएगा ।"

"'हत्यारा अभी भी उसी बंगले में हे?" सूरजभान चौंका ।

"हां ।"

"ठीक है । बाकी बातें बाद में करेंगे । हम अभी वहीं चलते हैं I" सूरजभान बोला पुलिस वाले हमारे साथ चलेंगे, परन्तु यह कुछ पहले ही ठहर जाऐगे ।”

"नहीं इन्सपेक्टर मै तुम्हारी इस बात क्रो नहीं मानूंगा । तुमने देखा ही होगा कि चारों को पेट फाड़कर किस बेदर्दी से मारा है l वह इंसान बहुत खतरनाक और चालाक हे । मैं नहीं चाहता कि वह फरार हो जाये और बाद में तुम मुझे ही हत्यारा ठहराते फिरो । हम एक घण्टे में वापस भी `आ जायेंगे उसे गिरफ्तार करके । चूंकि उन हत्याओं का हज्जाम तुम मुझ पर लगा रहे हो, इसलिए उसे गिरफ्तार करवाने में मैं खुद तम्हारी सहायता करूंगा । जो मैं कहता हूं वह मानते जाओ, फायदे मे रहोगे I"

"तुम किसी प्रकार को चालाकी तो नहीं कर रहे?" सूऱजभान ने होंठ भी'भीचकर कहा ।

“चालाकी तो क्या, पुलिस वालों से मैं मजाक करने का हौसला भी नहीं रखता । जाती तौर पर पैं बहुत ही शरीफ इंसान हू' । अगर मैं अच्छा नागरिक नहीं होता तो कभी भी तुम्हें फोन करके दिवाकर, हेगड़े और खेडा कै बारे में न बताता । अगर मैँने ही उन चारों को मारा होत्ता तो तुम्हें उन तीनों के बारे मेँ फोन करके खुद को शक कै दायरे में क्यों लाता ?"

सूरजभान कई पलों तक देवराज चौहान कै भोले-भाले खूबसूरत चेहरे को देखता रहा । फिर पलटकर अपने साथ आये पुलिस वालों से बोला----" तुम लोग यहीँ ठहरो, मैं एक घटे में वापस आता हू।"

" आओ इन्सपेवटर t” देवराज चौहान ने कहा-"अब देर मत करो । जल्दी चलो ।”

देवराज चौहान ड्राइविंग सीट पर बैठा, सूरजभान उसकी बगल में I उतने तेजी से कार आगे दौडा दो ।

"इन्सपेक्टर! " देवराज चौहान ने उखड़े लहजे में कहा…"भगवान के लिए रिवाल्बर जेब में डाल लो I”

सूरजभान ने क्षण भर सोचा फिर रिवॉल्वर होलस्टर में डाल ली । उसी पंल देवराज चौहान के हाथ में रिवॉल्वर चमक उठी---"डोंट मूव इन्सपेक्टर !" उसके होंठों से गुर्राहट निकली । चेहरे पर जहानभर की सख्ती सिमटी पडी थी ।

होंठ भिचे हुए एकाएक ही वह दरिन्दा लगने लगा था ।

"यह-क्या है?" सूरजभान के होंठों से निकला ।

"रियॉल्बर !" देवराज चौहान ने कार को सडक के किंनारे रोकते हुए कहा ।

" पूछा क्या कर रहे हो?" सूरजभान कै होंठ भिंच चूकै थे ।

" मालूम हो जांएगा !” कार रोकने के पश्चात् देवराज चौहान ने रिवॉल्वर की नाल सूरजभान की कमर से सटा दी---- “अब तुम स्टेयरिग सीट पर वैठोगे I मेरे ऊपर से तुम इस तरफ़ सरकोगे और तुम्हारे नीचे से मै उस तरफ सरकूंगा । इस बीच मेरी रिबॉंल्बर हर समय तुम्हारी कमर से चिपकी रहेगी । इस भ्रम मैं मत रहना कि यह भीड़ भाड़ वाला इलाका हे किसी भी तरह की चालाकी की तो तुम्हारी कमर के चिथड़े उड़ा कर रख दूंगा । यानी कि चालाकी की स्थिति में तुम बचोगे नहीं । अगर समझदार हुए तो सारा काम शराफत से करोगे ।" कहने कै साथ ही देवराज चौहान ने उसके होलस्टर से रिवॉल्वर निकाल ली ।

"तुम कानून कं खिलाफ जा रहे ही ।" सूरजभान गुर्राया ।

“सूरजभान ।।" देवराज चौहान एकाएक मीठे स्वर में बोला----. "अभी तुम मेरे बारे में कुछ नहीं जानते । तुम स्टेयरिंग सीट संभालो, फिर मैँ तुम्हें अपनी जन्मपत्री का छोटा हिस्सा बताकर अभी ठंडा करता हूं I" कमर से सटी रिवॉल्वर के सामने सूरजभान मज़बूर था ।

"कार आगे बढाओ और यूं ही सडक में इधर-उधर घुमाते रहो I" देवराज चौहान बोला ।

मजबूरी के तहत इन्सपेक्टर सूरजभान ने कार आगे बढा दी ।

"तुम वास्तव में बहुत समझदार हो सूरजभान !" देवराज चौहान ने व्यंग्य से कहा ।

"मेरी बारी आने दो ।” सूरजभान शब्दों को चबाकर बोला----"तब तुम्हें मी समझदार बना दूंगा l"

"तुम्हारा यह अरमान कभी पूरा नहीँ होगा इन्सपेक्टर ।"

"मैंने आज तक अपनी हर सोची बात पूरी की है I"

"खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे I"

"बहुत जल्द यह खिसियानी बिल्ली तुम्हारी गर्दन भी नोचेगी I"

"जो मर्जी कहो, मेरी सेहत पर कोई फ़र्क नहीं पडने वाला I मैँ तुम्हें अपनी जन्मपत्री का छोटा-प्ता हिस्सा बताता हूं। कभी जोधपुर गये हो?”

"हां । एक बार गया था ।"

“जोधपुर में गोहाटी एन्कलेव हे । वहां पर दो साल पहले बैंक-डकैती हुई थी । पुलिस आज तक उस डकैती की तह में नहीं पहुंच सकी I वह डकैती इस खाकसार ने ही की थी ।"

सूरजभान ने चौककर उसको देखा ।

"सामने देखो एक्सीडेंट हो जाएगा I"

सूरजभान होंठ भीचकर सामने देखने लगा ।
 
“अब हम बम्बई की तरफ आते हैं । बम्बई में कालबा देवी रोड पर आर्य निवास होटल है । आर्य निवास कै ठीक सामने मैंने गोली से एक गुजराती सेठ को शूट किया या । क्योंकि दो दिन पहले हुई उसकी ज्जैलरी शाप में अस्सी लाख की डकैती कै मुजरिम के तौर पर मुझे पहचानकर शोर मचा डाला था कि मैं डकैत हूं। मैँने उसे चिल्लाने से मना किया । समझाया, लेकिन वह नहीं माना । . वल्कि अपना रिवाल्वर निकालकर मुझे मारने की भी कोशिश की I वह सिर्फ दो वार ही चिल्ला पाया था कि तीसरी बार चिल्ताने के लिए उसका मुंह खुला का खुला ही रह गया था । मेरी गोली उसकी . गर्दन में जा धंसी । बम्बई पुलिस आज भी गुजराती सेठ कै हत्यारे की तलाश में है I हत्यारे का नाप भी जानती है देवराज चौहान I

परन्तु उसका यानी कि मेरा चेहरा नहीं जानती ।"

“ सूरजभान का चेहरा बेहद गम्भीर हो उठा था । उसने एक बार देवराज चौहान के कठोर हो चूकै चेहरे पर निगाह मारी फिर सामने देखने लगा I

"गोवा वास्तव में खूवतूरत्त जगह है I जव बहां गया तो मेरा वहां मन लगा I जिस होटल में ठहरा था, वह डिसूजा का होटल कहलाता था । अब भी है वहां पर I उस होटल के ठीक सामने बैंक था I हर रोज मेरे सामने सस्कारी ट्रंकों में नोट आते । आखिरकार मैने वेंक-डकैती करने का फैसला कर डाला । अपने जैसे चन्द शरीफ साथियों को इकट्ठा किया और फुलपूफ प्लान बनाकर बैंक-डकैतो कर डाली I

सफल रहा I परन्तु मेरे साथी हेराफेरी पर उत्तर आये । मुझें धोखा देकर वैंकडकैती की सारी दौलत ले उड़े I वह चार थे I तब मैंने एक-एक को ढूंढकर तीन को शूट कर दिया । परन्तु चौथा नहीं मिला । शायद वह दौलत के साथ गोवा से बाहर निकल गया था । जब पुलिस का जोर पड़ा तो मैं खामोशी से गोवा से निकल गया ।"

"अगर यह सव मुझे मालूम होता तो मैं तुम्हें कब का शूट कर चुका होता I" सुरज़भान सख्त स्वर में बोला I

"सपने मत देखो ।" देवराज चौहान ने तीखे स्वर में कहा, "खैर-विशालगढ़ आया तो रंजीत श्रीवास्तव ने दौलंत के घमण्ड में चूर जगमोहन की धुनाई कर दी तो मैंने उसे कंगाल बंनाने की सोच कर, किसी प्रकार उसके यहा ड्राइवर की नौकरी पाकर धीरे-धीरे उसका खास आदमी बन बैठा लेकिन अब किसी वजह से मेरा सारा प्लान फेल होगया । इस काम में मुझे कामयाबी नहीं मिल सकी सुना तुमने?"

. … "सब" सुन रहा हूं I" सूरजभान ने होंठ भींचे जवाब दिया ।

"ऐसे भी कई किस्से हैं मेरे काबिले तारीफ, बताऊंगा तो काफी टाईम वेस्ट हो जाएगा, जबकि मुझे जल्दी ही कहीँ पहुचना है I फिर कभी मुलाकात हुईं तो अवश्य बताऊंगा I अब तुम सडक कै किनारे कार रोको और नीचे उत्तरो ।" देवराज चौहान ने कहा । सूरजभान ने उसके हाथ में थमी रिवॉल्वर को देखा फिर होंठ भीचकर सडक के किनारे कार रोकी और दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया I देवराज चौहान खिसककर ड्राइविंग सीट पर पहुचा और करीब ही खडे सूरजभान को देखकर मुस्कराते हुए बोला----"मैरे साथ हुई मुलाकात क्रो तुम कभी नहीं भ्रूलोगे इन्सपेक्टर । यह हमेशा तुम्हें याद रहेगी ।"

"सही कह रहे हो I " सूरजभान विवश स्वर में कह उठा----"उन चारों के पेट तुमने फाड़े थे?"

"हाँ । "

"तुम तो वास्तव में वहुत खतरनाक इन्सान हो ।" सूरजभान के होंठों से निकला ।

"इन्सान तो मैं तुम जैसा ही हूं लेकिन…खैर छोडो I बाय इन्सपेक्टर ! चलता हू अब I”

"मेरी रिवॉल्वर तो दे दो I”

देवराज चौहान ने क्षण-भर लोचा फिर सूरजभान की रिवॉल्वर के चैम्बर मेँ मौजूद सारी गोलियां निकालकर रिवॉल्वर उसकी तरफ बढाया । सूरजभान ने रिवॉल्वर थामकर होलस्टर में ठूंसते हुए सख्त स्वर में कहा… . ,

"देवराज चौहान ! इस बात का में तुमसे वायदा करता हूंकि एक दिन मैँ तुम्हें ,जेल में पहुंचाऊंगा I आज कै बाद तुम जब भी मुझे नजर आये, मैं तुम्हें छोडने वाता नहीं ।"

“देवराज चौहान क्रो पकडना इतना आसान नहीँ जितना कि तुम सोच रहे हो I" वह हंसा ।

"मेरे लिए कोई भी काम कठिन नहीं I " सूरजभान एक-एक शब्द चबाकर बोला ।

उसने हंसते हुए कार आगे बढा दी I

@@@@@

फीनिश

@@@@@

देवराज चौहान जब अपार्टमेट में पहुंचा तो शाम कै तीन बज रहे थे I हाथ में एक सूटकेस पकढ़ा हुआ था I महादेव ने दरवाजा खोला I

“क्या हुआ था?" देवराज चौहान ने महादेव को देखा ।

"खास नहीं I साला हीरो बनने की चेष्टा कर रहा था l ठोंक-पीटकर बिठा दिया ।" महादेव ने लापरवाही से कहा-"तुमने जो डूयूटी दी है, उसे अच्छी तरह पूरा करना मेरा फर्ज है !"

अशोक खौफपूर्ण और क्रोध से भरी निगाहों से दोनों को देख रहा था I

देवराज चौहान ने दूसरे कमरे में खुलने वाले दरवाजे पर निगाह मारी l उसे ठीक प्रकार-से बन्द पाकर चैन की सांस ली I

सूटकेस नीचे रखकर उसने सिगरेट सुलगाई । महादेव ने सूटकेस देखा तो उसकी आंखें सिकुड़ गईं ।

कुछ पलो तक वह सूटकैस को घूरता रहा ।

“यह सूटकेस?” महादेव ने सूटकेस पर निगाहें टिकाये कहा ।

" वहीँ हे जो कार मेँ पड़ा था !"

“क.......कार में पड़ा था?" महादेव हड़बड़ाकर उसे देखने लगा I

"हाँ I” 'देवराज चौहान मुस्कराया-"जिसे कार से उठाकर उस बुढिया के बंगले मे मौजूद अपने कमरे के बार्डरोब में छिपाकर रख लिया था ।"

महादेव का मन किया, वह अपना सिर पीट ले ।

"तुम इसे क्यों लाये?" महादेव हड़वड़ाकर चीखा ---"यह तुम्हारा नहीं मेरा है । यह मुझे वापस दे दो I”

"तुमने मुझसे बिना पूछे लिया था; हेरा-फेरी करने वाले लोग मुझे पसन्द नहीं । मेरी जान बचाने कै बदले मुझसे पूछ कर लेते . कि यह सूटकैस मैं ले लू कि नहीँ ?"

"तुम मुझे हेरा-फेरी वाला समझते हों?”

"वह तुमने खुद ही साबित कर दिया, इस सूटकेस को कार से निकालकर !"

"वास्तव में ।” महादेव एक-एक शब्द चबाकर बोला-----"मुझसे बहुत बडी गलती हो गई ।"

“वह भी बता दो I” देवराज चौहान के स्वर में व्यंग्य भरा था ।

"अब तक मुझें दूसरे कमरे में पड़े दोनों सूटकेसों को लेकर विशालगढ़ से बाहर निकल जाना चाहिये था l” महादेव गुस्से से बोला-

“ऐसा न करके मैंने बहुत बडी गलती कर दी हैं ।"

"ओह " देवराज चौहान के होंठ सिकुड गये-“तुम उस कमरे मेँ गये थे?"

'"गया । ताला खोला I सूटकैसों कें भीतर झांका I फिर ताला बन्द कर दिया !"

"अब तो उन सूटकेसों को न ले जाने की गलती तुम कर ही बैठे हो I"

महादेव ने कसकर होंठों को भीच लिया ।

देवराज चौहान ने अशोक को देखा I

"तुम ठीक कहते थे कि तुम रंजीत श्रीवास्तव नहीं हो I"

"अब तो तुम्हें मैरी बात का विश्वास आ गया । अब तो मुझे जाने दो । वह दोनों सूटकेस मुझे दे दो I”

" तुम दो साल रंजीत श्रीवास्तव के चेहरे में रहे । बहुत ऐश क्री तुमने ।"

"क्या मतलब?"

, . . "मतलब यह क्रि अगर तुमृ पुलिस कै हत्थे चढ़ गये तों जिन्दगी-भर जेल से बाहर नहीं निकल सकोगे । तुम वास्तव में रंजीत श्रीवास्तव होते तो मैं अवश्य यह दोनों सूटकेस तुम्हारे हवाले कर देता । परन्तु अशोक के रूप में तुम इन सूटकेसों में मौजूद दौलत को पाने के हकदार नहीं हो । मैं तुम पर सिर्फ इतनी ही मेहरबांनी कर सकता हूं कि तुम्हारे बारे में पुलिस को नहीं बताऊ-और मै अपने दोस्त की ठुकाई को भी इसलिए भूल रहा हूं कि तुम्हारी हालत अब कंगालों से भी बुरी हो चुकी है । अपनी जान बचाना चाहते हो तो चुपचाप इस शहर से खिसक जाओ । नहीं तो मुझे तुम्हारे बारे में पुलिस को खबर करनी पडेगी । फिर तो तुम जानते ही हो कि तुम्हारा वया हाल होगा I”

"यह बीटिंग हे r" अशोक गला फाड़कर चीखा !

"खामोश ।'" देवराज चौहान मौत से भरे लहजे में कह उठा ।

"मुझे वह दोनों सूटकेस दे दो I" अशोक क्रोध से कांपते स्वर में कह उठा ।

"तुम्हें खोटा सिक्का भी नहीं मिलेगा ।" देवराज चौहान ने होंठ भीचकर सख्त स्वर मे कहा----"इस समय तो तुम्हें यहां से जाने ' .. का मौका दे रहा हू । बाद में यह मौका भी नहीं मिलेगा ।" कहने के साथ ही उसने टांगों कै पास रखा सूटकेस उठाया । आगे बढ़कर दुसरे कमरे का दरवाजा खोलने के पश्चात् उसमें प्रवेश कर गया ।

महादेव उसके पीछे-पीछे आ गया ।
 
“तुम यह सूटकेस मुझे दिये बिना नहीं जा सकते ।" महादेव ने शब्दों क्रो चबाकर कहा ।

"'दूसरों की चीज पर नजर रखना अच्छी बात नहीं है !” देवराज चौहान ने सूटकेसों क्रो खोलकर, उसमें पडी दौलत को चैक किया फिर उन्हें वन्द कर दिया l

"यह सूटकेस मेंने तुम्हारी जान बचाने कै बदले हासिल किया था ।"

"तुमने मुझसे ऐसा कोई सौदा नहीं किया था कि तुम मेरी जान बचाओगे और ये तुम्हें नब्बे लाख के नोटों से भरा सूटकेस दे दूंगा । यह सौदा तो तुम अपनी तरफ से ही बनाये जा रहे हो !"

“देखो । अगर तुमने मेरा सूटकेस नहीं दिया तो मैँ तुम्हारा सिर फोड दूंगा ।"

"सिर फोड़कर तुम्हें कुछ नहीं मिलने वाला ।"

" तुम तो बहुत वडे अहसानफरामोश हो I"

" वहुत कुछ हूं । तुम मुझे जरा भी नहीं जानते I”

"वास्तव में बडे उत्तरे बदे हो I" महादेव ने झल्लाकर उखड़े लहजे में कहा-“तुमसे तो बात करने में भी सौ का घाटा हे । सामने वाले को तो तुम घास बराबर समझते हो I"

"ऐसी बात नहीं ।" देवराज चौहान ने व्यंग्य से कहा---" भैं तुम्हें घास नहीं, इन्सान समझकर बात कर रहा हूँ l"

"तुम तो... .! कहते कहते महादेव रूका I उसकी आंखे फैल गई I

वह चीखा------" ब.......चो I”

जैसे'बिज़ली-सी कौधी हो । देवराज चौहान फौरन से भी पेश्तर एडियो के बल घूम गया । ठीक उसकी आखों कै सामने मुट्ठी में जकड़ा हुआ चाकू गुजरा, जोकि अगले ही पल उसकी छाती में पूरा-का-पूरा धसने जा रहा था । इससे पहले कि चाकू उसकी छाती में धंसता, चाकू वाली कलाई उसके हाथ में थी ।

कलाई को उसने खास अन्दाज में झटका दिया ।

हेवान, विक्षिप्त से नजर आने वाले अशोक के हाथ से चाकू निकला और देवराज चौहान के हाथ में आ गया I उसी पल चाकू का खुला फल अशोक कै पेट में गया और सारे पेट में चाकू घूमता चला गया I अशोक कै होंठों से चीख भी न निकल सकी I

धड़ाम से वह पेट के बल नीचे जा गिरा ।

उसका पेट चाकू ने बुरी तरह फाड़ डाला था |

पेट से बहता खून फर्श क्रो रंगता जा रहा था ।

देवराज चौहान चेहरे पर मौत के भाव लिए कई पलों तक अशोक के मृत शरीर को देखता रहा, फिर हाथों में पकड़े खुन से रंगे चाकू क्रो देखने लगा । यह किचन का चाकू था I अशोक इस चाकू को किचन से उठा लाया था ।

देवराज चौहान ने चाकू को अशोक… की लाश पर फेंका और कमरे से निकलकर बाथरूम में प्रवेश कर गया । फिर हाथ वगैरह धोकर बाहर निकला । अब उसका चेहरा पहले की ही तरह सामान्य लग रहा था ।

महादेव अभी. तक हक्का-बक्का अशोक की लाश क्रो देखे जा रहा था ।

अगर वह चीखा नहीं होता तो इस समय यहा देवराज चौहान की लाश पडी होनी थी ।

देवराज चौहान ने कमरे में प्रवेश किया I

महादेव ने उसे देखा, देवराज चौहान कं होंठों पर मीठो' मुस्कान उभर आई ।

@@@@@

फीनिश

@@@@@

"अब कहा जा रहे हो?” महादेव के स्वर में व्याकुलता का भाव था I

देवराज चौहान के होंठों के बीच सुलगती सिगरेट फंसी हुइ थी । सामान्य स्पीड से वह कार ड्राइव कर रहा था I

महादेव उसकी बगल में बैठा था । कार की पिछली सीट पर तीनों सूटकेस मौजूद थे l

"कुछ ही दूरी पर मैंने एक कमरा किराये पर ले रखा है । वहीं पेर कुछ सामान पड़ा है । उसे लेकर अब मैं फौरन विशालगढ़ से बाहर निकल जाना चाहता हू । तुम कहा उतरोगे?"

"म.....में भला मुझे कहा उतरना है I ” महादेव हडबडाकर बोला।

"आखिर कहीं तो उत्तरोगे I”

“मुझे माल तो दो सूखे-सूखे उतार रहे हो I कुछ तो शर्मं करौ मैने तुम्हारा हर कदम पर साथ दिया है । दो बार तुम्हारी जान बचाई l एक बार तारासिंह से, दूसरी बार अशोक से ।"

"पिछली सीट पर पडा नब्बे लाखं वाला सूटकेस तुम्हारा. हुआ I"

"व..... वह नब्बे लाख मैं ले लूं?" महादेव को विश्वास नही हो रहा था I

“हा I वह तुम्हारा है ।" देवराज चौहान मुस्करा रहा था I

“यार ।” महादेव खुशी से उछल पड़ा-----"तुम तुम तो वास्तव में ग्रेट हो I"

“अब बोलो कहा उतारू ।"

"'मैं तुम्हारे साथ ही चलूँगा । विशालगढ़ मेँ अब में भी नहीं रहना चाहता I"

“मर्जी तुम्हारी ।” देवराज चौहान ने उसके साथ चलने पर कोइ एतराज नहीं उठाया ।

देवराज चौहान नें किराये कै कमरे से सामान समेटकर कार में रख लिया । बूढा चचा उस वक्त घर में नहीं था । देवराज चौहान के पास इतना समय भी नहीँ था कि चचा के आने का इन्तजार करता औरै उसकै हाथ की बनी चाय पीता I

कुछ देर बाद ही उनकी कार विशालगढ़ से बाहर जाने वाली सडक पर दौड रही थी ।

देवराज चौहान की बगल में बेठे महादेव की निगाह रह-रह कर कार की पिछली सीट कीं तरफ उठ जाती, खासतौर से उस सूटकेस की तरफ, जिसमें नब्बे लाख रुपया मौजूद था-और देवराज चौहान के मुताबिक अब वह उसका अपना था । सूटकेस कै प्रति महादेव की व्याकुलता और बेसब्री देखकर देवराज चौहान मन-ही मन मुस्कराये जा रहा या | जो भी हो महादेव उसे ठीक लगा था ।

I I समाप्त I I

the end
 
Back
Top