• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

चलते पुर्जे ( विजय विकास सीरीज़ )

S

StoryPublisher

Guest
चलते पुर्जे

सब इंस्पेक्टर हैदर अली ने आतिशबाजी की दुकान में दाखिल होते हुए उसके मालिक से कहा -"एसएसपी साहब के यहां से फोन पर फ्लावर बम और पेपर बम का आर्डर गया था ।"

"ओह यस !" कहने के बाद शापकीपर ने ऊंची आवाज में नोकर से एसएसपी के आर्डर वाला डिब्बा लाने के लिए कहा ।

इधर हैदर अली ने पेमेंट किया, उधर नोकर ने गत्ते का बना एक वर्गाकार डिब्बा लाकर काउंटर पर रख दिया ।

शापकीपर ने पूछा-""क्या मैं जान सकता हूइंस्पेक्टर साहब कि एसएसपी साहब के यहां क्या र्फक्शन है ?'

"उनके पांच वर्षीय बेटे वारिस खान का बर्थ डे हे ।”

“वर्थ डे, तब तो उन्होंने वहुत ही उम्दा किस्म की आतिशबाजी का आर्डर दिया है । फ्लावर बम ओर पेपर बम किसी को नुकसान नहीं पहुँचाएंगे ओर बच्चे इनके फटने पर खुश भी बहुत होंगे । बस हल्की हल्की धमाकों के साथ फूलों और पेपर की कटिंग की बरसात होगी । ये सारे बम केक वाली मेज के चारों तरफ लगवा दीजिएगा और असली मजा देखना चाहें तो इन सबमें एकसाथ आग लगवा दीजिएगा । चारों तरफ से एकसाथ होने वाली फूलों की बारिश को देखकर बच्चे नाच उठेंगे ।"'

हैदर ने बगेर कुछ कहे डिब्बा उठाया ।

दुकान के ठीक सामने पार्किग एरिया में खडी पुलिस जीप की पिछली सीट पर रखा और स्वयं घूमकर अगली बाईं सीट पर बैठता ड्राइवर से बोला…"चलौ ! "

ड्राइवर ने जीप आगें बढा दी ।

शीघ्र ही जीप सड़क से गुजर रहे ट्रेफिक का हिस्सा बन गई और मुश्किल से पंद्रह मिनट बाद वह ऐसी सड़क से गुजर रही थी जिस पर नाममात्र का ट्रेफिक था ।

अचानक वातावरण मेँ किसी महिला के चीखने की आवाज़... उभरी'…“बचाओ...वचाओ ।"'

ड्राइवर और हैदर अली चौंके ।

दोनों ने पलटकर एक दूसरे सरे की तरफ देखा ।

"आवाज़ उधर से आई ।"' हैदर अली ने सामने नज़र आ रहे सड़क के मोढ़ की तरफ इशारा किया…“त्तेज चलो !"

ड्राइवर के पेर का दबाव स्यत: एक्सीलेटर पर बढ़ गया ।

बचाओ...बचाओ की आवाज तेज़ होती जा रही थी।

हैदर अली ने होलेस्टर से रिवाल्वर खींच लिया ।।

जीप ने टायरों की चरमराहट के साथ मोड़ काटा ।

केवल सो गज दूर एक 'ब्लेक हंडरेड' के आगे, सिल्वर कलर की "सीडान' सढ़क पर तिरछी खडी नजर आई। साथ ही नज़र आए शक्ल सूरत से गुंडे से नजर आ रहे वे दो लढ़कै जो एक लड़क्री को स्रीडॉन की तरफ घसीटने की कोशिश कर रहे थे।

विरोध करती लडकी लगातार चीख रही थी ।

जीप कै टायरों की चरमराहट ने लड़कों को चोकाया ।

हैदर अली जोर से चीखा…""रोक्रो...रोक्रो .""

ड्राइवर ने पूरी ताकत से ब्रेक पैडल दबाया ।

टायरों की चिंघाड़ कै साथ जीप ब्लेक हंइरेड की बगल में रुकी ।

जीप कै पूरी तरह रुकने से पहले ही सढ़क पर कूदते हुए हेदर अली ने हवाई फायर किया था ।

लडकी को कब्जाए लडके अवाक मुद्रा में खड़े रह गए । उनकी तरफ लपकता हैदर अली दहाढा'…'"ज़रा भी हिले तो गोली...

परंतु

वाक्य पूरा न हो सका ।

जिन्न की तरह सीडान की बैक से प्रकट होकर तीसरे लड़के ने उस पर जम्प लगा दी ।

जम्प भी ऐसी कि हैदर अली को साथ लिए "धड़ाम' से सडक पर गिरां ।

रिवाल्वर हाथ से निकल गया । लडकी क्रो कब्जाए दोनां लड़कै भी लडकी क्रो छोडकर हैदर पर झपट पड़े । इस दृश्य को देखकर ड्राइवर तेजी से सब इंस्पेक्टर की मदद के लिए लपका ।

 
चीखती हुइ लड़की अपनी गाडी की तरफ भागी ।

सीडान का ड्राइविंग डोर झटके से खुला ।

चोथे लडके ने लडकी की तरफ रेस लगाईं । तीन हैदर अली और ड्राइवर से भिड़े हुए थे ।

मगर यह दृश्य ज्यादा लंबा न चला । हेदर अली तीन में से एक को हवा में उछाला ।

वह सीडान के नजदीक जाकर गिरा,, उठा और ड्राइविंग डोर की तरफ लपकता बोला -"भाग टोटे !"

सबसे पहले लड़की के पीछ पढा लड़का वापस अपनी कार की तरफ दौडा । फिर। उन दोनों ने भी यहीँ कोशिश की जो ड्राइवर और हैदर अली से भिड़े हुए थे ।

हैदर अली ओर ड्राइवर ने अपने-अपने शिकार को जकढ़ लिया । तभी, कार की तरफ लपकते हुए लडके की नज़र सडक पर पड़े रिवाल्वर पर पडी । उसने झपटकर रिवाल्वर उठा लिया और हैदर अली पर तानकर चीखा…"'खबरदार...गोली मार दूंगा ।”

हेदर अली हढ़बड़ा गया।

ड्राइवर की समझ में नहीं आया कि क्या करे ? “छोडो उन्हें !" रिवाल्वर वाला गुराया ।

गुस्से की ज्यादती के कारण हैदर अली का चेहरा भभक रहा था, वह दहाड़ा…“खैरियत चाहता हे तो रिवाल्वर फेंक दे ।”

"उसे छोढ़ता हे या नहीं। ”

फिललहाल हैदर अली के पास अपनी गिरफ्त में र्फसे लडके को छोढ़ने के अलावा क्रोई चारा न था अत: गिरफ्त ढीली करता हुआ बोला…"इस वक्त तो छोड दूंगा हरामजादे...लेकिन वहुत जल्द तुम सब पुलिस के चंगुल में होंगे । उस वक्त तुम्हारा वो हाल करूंगा कि शेतानियत भी पनाह मांग जाएगी ।”

लडका उसकी गिरफ्त से निकलते ही रिवॉल्वर वाले की बगल में जा खडा हुआ । रिवाल्वर वाले ने गुर्राकर ड्राइवर से कहा…"तू भी छोड़। ”

ड्राइवर ने हैदर अली की तरफ देखा, जैसे इजाजत चाहता हो ।

हैदर अली ने रिवाल्वर वाले क्रो चेतावनी दी-“ये सब तूठीक नहीं कर रहा ! बेहतर हे इसी वक्त खुद को मेरे हवाले कर दे । शायद रहमदिली से पेश आऊं । बाद में पकडा तो... ड्राइवर की गिरफ्त में फसे लढ़कै ने खुद क्रो आजाद करते हुए कहा…"वाद में तेरे फरिश्ते भी हम तक नहीं पहुंच सकते ।"

"पुलिस से बचकर कहा जाओगे हरामजादो...

"खबरदार !'" रिवाल्वर वाला गर्जा…"ज्यादा गालियां वकीं तो भेजा उड़ा दूंगा । ये त्तेरा थाना नहीं है ।"

हैदर अली कसमसाकर रह गया ।

रिवॉल्वर वाले ने अपने साथियों से कहा -“गाडी में बेठो । ”

एक लपककर गाडी में समा गया पर दूसरा ब्लेक हंडरेड के नजदीक सहमी खड्री लडकी की तरफ बढता बोला-“हुस्न की इस परी को भी तो साथ ले चलें, जिसकी वजह से…

"नहीं। " आतंकित लड़की दौड़कर हेदर कै पीछे जा छुपी ।

थर थर कांप रही थी वह ।

"टोटे ."" रिवाल्वर वाले ने कहा…"इस वक्त छोड ! फिर देखेंगे । हमेँ पसंद आ ही गई है तो बचेगी कब तक ? हमने इसका घर भी देखा है और कालेज भी । रोज़ ये इंस्पेक्टर इसे बचाने नहीं आएगा ।"'

टोटे ने लडकी को इस तरह घूरा जेसे आंखों ही आखा' में निगल जाएगा । रिवाल्वर वाले ने उसे पुकारा-“टोटे !" अजीब नामधारी लड़कै ने इरादा बदला ।

घूमा ।

और रिवाल्वर वाले कै साथ गाडी में समा गया ।

चाहता तो हेदर अली वहुत कुछ करना था। रिवाल्वर उनके कब्जे में होने कै कारण कुछ न कर सका ।

साथियां के बैठते ही ड्राईविंग सीट पर बैठे लडके ने सीडान को यूटर्न दिया और विपरीत दिशा में दोड़ा दी ।

जीप की तरफ लपकता हेदर अली चीखा…"ड्राइवर...पीछा करो ।"'

ड्राइवर भी जीप की तरफ लपका ।

4

मगर तभी, दूर जाती सीडान से हैदर अली का रिवाल्वर उनकी तरफ़ फेंका गया । जीप की तरफ लपकता हैदर अली ठिठका ।

सड़क पर पड़े रिवात्वर की तरफ दौड़ा ।

उसे उठाया और उठाते ही स्रीडान के पिछले टायर का निशाना लेकर ट्रेगर दबाया ।

मगर कोई गोली न चली ।

वातावरण में क्लिक की आवाज गूंज़कर रह गई थी ।

लगातार कई बार ट्रेगर दबाया ।

हर बार वही हश्र ।

झुंझला उठा हैदर अली ।

तब तक सीडान अगले मोढ़ पर गुम हो चुकी थी ।

ड्राइवर चीखा…"पीछा करते हैं सर। ”

“अब कोई फायदा नहीं लेकिन. . .बच कर कहां जाएंगे साले ! मेरे दिमाग में उनकी गाडी का नंबर नीट हो चुका हे ।” “उसे तो मैं भी नोट कर चुका हूं सर !"

अब. ..हैदर अती ने लड़की पर तवज्जो दी ।

वह अभी तक न केवल सहमी हुईं थी बल्कि भय की ज्यादती के कारण कांप भी रही थी ।

चेहरा ही नहीँ संपूर्ण जिस्म पसीने से भरभराया हुआ था ।

हैदर उसकी चकाचौंध कर देने वाली खूबसूरती से प्रभावित हुए बगैर न रह सका ।

लड़की कै नजदीक पहुंचकर ठिठका ।

वह गोरी थी । खूब गोरी ।

ऐसा रंग जैसे माखन में एक चुटकी सिंदूर मिला हो ।

आंखें नीली ! झील सी गहरी ।

चमकदार नीले रंग कै हीरों जैसी ।

लंबी । गोरी । गोल तथा केले के तने जैसी चिकनी टांगें जांघ तक नग्न थीं । कंधे तक बाजुओं पर कोई आवरण न था । वक्ष प्रदेश का उभार टाप से फूटा पड रहा था ।

बहुत ही पुष्ट और कसे हुए वक्ष थे उसके ।।

 
गोल मुखड़े पर गुलाब की पंखड्रियों से होंठ ।

भरे हुए कपोल, छोटी सी नाक, ऊंचे मस्तक और कमान सी भवों चाली लड़की थी वह ।।

"थ...थैक्यू..थैक्यूवेरी मच ।” लरजते लहजे में जब लडकी ने कहा तो हैदर अली इस तरह उछल पड़ा जैसे बिच्छु ने डंक मारा ।

और फिर…झेंप सा गया वह ।

लगा…पिछले चंद क्षण उसने किसी ओर दुनिया में गुजारे हैं ।

खुद को उसकी खूबसूरती की जादूनगरी से निकालने का प्रयत्न करता बोला…“आपका नाम ?”

“आरती !" आवाज अभी तक कांप रहीँ थी ।

" ओह ! हिंदू हो ! "

“हू ।" उसने धीमे से कहा ।

"कहां रहती हो ?'

उसने थोडा लजाते हुए बताया-"आशियाना कॉलोनी । चांदनी बिल्डिंग । फ्लैट नंबर चार सौ बारह ।"

"आपके पापा ? "

“अमीचंद खत्री ! लोहे कै व्यापारी हैं ।"

“कहां से आ रही थीं?”

“कालेज से ।"

"क्या आप उन लडकों क्रो जानती हैं? ”

5

"नहीं । "

“डैली इसी रास्ते से लौटती हैं ?”

" जी। "

"पहल कभी उन्हें अपने पीछे देखा?”

“ध्यान नहीं दिया ! "

“आज क्या हुआ था ?"

“उनकी कार मेरे पीछे थी। साइड देने कै लिए लगातार हार्न वजा रहे थे । मैने साइड दी तो आगे निकलकर कार मेरी गाडी के आगे तिरछी करके रोक दी। एक्सीडेंट बचाने क लिए मुझ जोर से ब्रेक लगाने पड़ेऔर फिर...इससे पहले कि मैकुछ समझ पाती.....

इससे आगे वह कुछ बोलने कै स्थान पर फूट फूटकर रो पडी ।

हेदर अली को कहना पड़ा-“डरिए नहीं । अब आपका कुछ नहीं बिगाड सकते !"

आरती न आंसू पौंछे ।

"आपको अकेले सुनसान रास्ते से नहीं गुज़रना चाहिए ।"

"पहले कमी एसा नहीं हुआ ।"" आरती अभी भी सुवक रही थी-“वो तो आज ही पता नहीं कहां से...

“छाडिए !” हेदर अली ने कहा…“आकाश पाताल एक कर दूंगा मै । वहुत जल्द वे गिरफ्त में होंगे और. ..आपके कदमों में गिरकर माफी मांगनी होगी उन्हें ।"

"आप न आते तो जाने क्या हो जाता ! मै आपका एहसान...

"एहसान काहे का। ” हदर अली ने फिल्मी स्टाइल में मुस्कराते हुए कहा…"ये तो मेरा फर्ज था । आइए आपको चांदनी तक छोड दें । आशियाना काँलानी हमारे रास्ते में पढ़ेगी !”

हालांकि आरती ने मुंह से कुछ नहीं कहा परंतु आंखों से ऐसे शुक्राना अंदाज़ में हैदर अली की तरफ देखा कि हैदर अली के दिलो दिमाग का फ्यूज एक ही झटक में उड़ गया ।

अभी तक शादी नहीं हुई थी उसकी ।

दिमाग में बवंडर की तरह ख्याल उठा…"हिंदू हैतो क्या हुआ ! इस्लाम कुबूलवाने में कितना वक्त लगता है ! अगर ये लडकी मेरी बीबी वन जाए तो दुनिया का सबसे खुशनसीब शख्स कहलाऊंगा में ।" शब्द फूटते चले गए-…“एक वात कहू?”

" कहिए ।"

"कसूर उन लडकों का नहीं हे ।" कहते वक्त वह उसकी आंखों में झांक रहा था…“आप हैं ही इतनी खूबसूरत कि...

हेदर अली ने वाक्य जानबूझकर अधूरा छोड़ दिया ।

आरती का संपूर्ण मुखड़ा लाज की सुर्खी से तमतमा उठा ।

अपनी गाडी की तरफ बढी वह मगर अंतिम वार ऐसी नजर हैदर अली पर डाली कि हैदर अली के होशो हवास तक लूट गई ।

वह अपनी गाडी की डाइविंग सीट पर बैठ चुकी थी ।

हैदर अली अपना सब कुछ गंवा कर स्टेचूकी मानिंद खडा रह गया ।

"चलें सर?” ड्राइवर न पूछा ।

उछल पड़ा हैदर अली । झेंपता सा बोला…"चलो !”

ड्राइवर मुस्कराया !

"आप हमार पीछ-पीछे आ जाएं ।" ऊंची आवाज में कहने के साथ हैदर अली जीप में समा गया ।

"बेवकूफ !” आरती ब्लैक हंड्रेड को फर्स्ट गेयर में डालती हुई वड़वड़ाई-“पता नहीं किसने पुलिस में भर्ती कर लिया ! लडकी की आखों में अपने लिए निमंत्रण देखा नहीं कि दिमाग को खापडी से निकालकर खुंटी पर टांग बैठा ।”

°°°°°°

¶¶¶¶¶

°°°°°°°

°°°°°°°

¶¶¶¶¶

°°°°°°°
 
शाम का धुंधलका रात के अंधेरे में वदल गया मगर लाॅन और एसएसपी मिस्टर शफ्फाक शाही की कोठी बल्ब, टूयूब लाइटस आर हलाज़नों की रोशनी से जगमगा रही थी ।

ये सारा इंतजाम पहले ही कर दिया गया था क्योंकि मालूम था, केक क्टने के टाइम तक सूरज डूब जाना है ।

केक कटने की तयारिया हो गई ।

नौकरों ने कक पर पांच जलती हुई मोमबत्तियां लगा दी थीं ।

6

शाम का धुंधलका रात के अंधेरे में वदल गया मगर लाॅन और एसएसपी मिस्टर शफ्फाक शाही की कोठी बल्ब, टूयूब लाइटस आर हलाज़नों की रोशनी से जगमगा रही थी ।

ये सारा इंतजाम पहले ही कर दिया गया था क्योंकि मालूम था, केक क्टने के टाइम तक सूरज डूब जाना है ।

केक कटने की तयारिया हो गई ।

नौकरों ने कक पर पांच जलती हुई मोमबत्तियां लगा दी थीं ।

पांच वर्षीय वारिस खान ने 'मुँह मारकर उन्हें बुझाया तो मेज के चारों तरफ इकटठे सभी मेहमानों ने जोरदार तालियां बजाईं ।

अब.....

वारिस खान ने छुरी उठाई ।

केक काटा ।

ठीक यही क्षण था जब हैदर अली के निर्देश पर केक वाली मेज़ के चारों तरफ रखे बमों में उन पुलिसवालों ने एक साथ आग लगाइ जिनकी डयूटी इस काम पर लगाइ गई थी ।

विस्फोटों की आवाज तो हालांकि धीमी ही थी लेकिन कोई पुश्प वर्षा नहीं हुई, कोई पेपर बम नहीं फ़टा बल्कि उसकी जगह अचानक ही बमों से निकलकर बहुत ही गाढा घुवा चारों तरफ़ फैल गया।

बहुत ही तीखा वां था वह ।

आंखों में जलन करने लगा ।

मुंह में घुसा तो लोग खांसते खांसते बेहाल हो गए ।

एक तो थुवें के कारण किसी को कुछ नहीँ दिख रहा था । ऊपर से एक झटके के साथ लाइट गुल हो गई ।

हाथ को हाथ सुझाई न देने वाला अंधकार छा गया ।

किसी की आवाज गूंजी…"ये शरारत शायद वारिस की है ।”

उसी क्षण, वारिस की चीख की आवाज़ उभरी । यह आवाज ऐसी थी जैसे किसीने उसका मुंह भींच लिया हो ।

कई लोगों ने अंधेरे ही में आवाज़ की दिशा में जम्प लगा दी ।

नतीजा ये कि वे एक…दुसरे से टकरा गए ।

मगर वारिस खान किसी के हाथ न लगा ।

"वारिस !" ये आवाज शफ्फाक शाही की थी-"तुम कहां हो ?'

इस बार कोई आवाज़ न उभरी ।

अनहोनी की आशंका ने सभी के होश फाख्ता कर दिए थे ।

वारिस को पुकारते सभी अंधेरे मेँ हाथ पांव मारते रहे ।।

भटकते रहे ।।

एक दूसरे से टकराते रहे ।।

फिर भी, शफ्फाक शाही ने एक रचनात्मक काम किया ।

जैसे ही यह इल्म हुआ कि जो हो रहा हे वह वारिस की शरारत नहीं है तो वह पोर्च की तरफ लपका ।

जाने किस किस टकराता हुआ वहां खडी अपनी गाडी के अंदर पहुंचा और उसकी हेडलाइट आँन कर दी ।

लान में अच्छी खासी रोशनी हो गई ।

मगर धुवें के कारण वे एक दूसर को सायों के रुप में देख सकते थे । सबके द्वारा वारिस को बार-बार पुकारे जाने के बावजूद किसी तरफ से उसकी आवाज़ सुनाइ न दे रही थी ।

गाडी की लाइट आन करने के बाद शफ्फाक शाही पुन: लान में आ चुका था मगर दूसरों की तरह वारिस भी तलाश मेँ भटकने से ज्यादा कुछ न कर सका । और फिर...ठीक उसी तरह एक झटके से लाइट आन हो गई जेसे गुल हुइ थी ।

तीव्र प्रकाश कै कारण आंखे चुधिया गई ।

धुवां भी धीरे धीरे छंट रहा था ।

देखने लायक हुए तो देखा…पेज और कुर्सियां औंधी पडी थीं ।

वारिस क्रो तलाश करने की कोशिश की गई ।

किसी को कहीं नजर न आया वह।

लान में एक कागज ज़रूर पड़ा मिला ।

सबसे पहले उस पर शफ्फाक शाही की नजर पडी।

उसने झपटकर कागज उठाया ।

सभी लपककर उसके पीछे इकटठा हो गए ।

सबने एक साथ पढा ।

बड़े बडे अक्षरों में एक नाम लिखा था…

जावेद कश्मीरी शफ्फाक शाही का चेहरा पीला पड़ गया ।
 
7

अकेले उसी का क्यों !

ऐसा लग रहा था जेसे हर मेहमान के चेहरे पर हल्दी पोत दीं गई हो ओर शफ्फाक शाही की बीवी तो जैसे पागल हो गई थी । अपने दोनों हाथों से शफ्फाक शाही का गिरेबान पकडकर वह उसे जोर से झंझोड़ती हुई चीखती चली गई…"वारिस को क्यों उठाया हे उसने ? हमारे बेटे से क्या दुश्मनी है जावेद कश्मीरी की? "

शफ्फाक शाही के मुंह में मानो जुबान ही न थ्री ।

आखों के आगे अंधेरा ही अंधेरा नजर आ रहा था । मगर नहीं, इस अंधेरे कै बीच उसे एक चेहरा भी नज़र आ रहा था… जावद कश्मीरी का चेहरा ।

वह चेहरा जिससे उसका गहरा रिश्ता था मगर उस रिश्ते के बारे में कम से कम अपनी बीवी को कुछ नहीं बता सकता था वह ।

********************

अगर आपने "कश्मीर का वेटा' नहीं पढा है तो जरूर सोच रहे होंगे कि जावेद कश्मीरी कौन है? उसने वारिस खान को किडनेप क्यों किया और कौन हे वह जावेद कश्मीरी जिसके नाममात्र से वहा' मोजूद सभी लोगां के चेहरों पर हल्दी पुत गई थी? क्या कारण था इसका? वेसे तो जावद कश्मीरी के रोमांचक कारनामों के बारे मेँ जानने के लिए आपको कश्मीर का बेटा पढना चाहिए मगर फिर भी, संक्षेप मेँ उसके वारे मेँ लिखा जा रहा हे ताकि आपको "चलते पुर्जे" का कथानक समझने में आसानी रहे ।

कश्मीर का बेटा की शुरूआत वहां से होती हे जब जावेद नामक लड़के ने पाकिस्तान में आतंक मचा रखा था ।

पाकिस्तानी सरकार उसके कारनामों से हिली पडी थी । पीछे तो उसने जो किया, सो किया ही था लेकिन उन दिनों उसने गुलहसन नामक पाकिस्तानी आर्मी के एक ब्रिगेडियर को कत्ल करने की धमकी दे रखी थी ।

क्यों ?

जावेद जाने ।

ब्रिगडियर होने के नाते गुलहसन की सिक्योरिटी स्वाभाविक रूप से ही इतनी सुदृढ थी कि कोइ आसानी से उस तक नहीं पहुंच सकता था लेकिन जावेद कश्मीरी के पूर्व के कारनामों से सरकार इस कदर डरी और थराईं हुई थी कि गुलहसन की सिक्योरिटी सीधे आईएसआई की इस्लामाबाद शाखा के चीफ मिस्टर आफताब खान को सौंप दी गई थ्री । परंतु जावेद कश्मीरी अपने दिमाग के बूते पर हर सिक्योरिटी को बेंधता हुआ न केवल गुलहसन तक पहुच गया बल्कि आफताब कै हर चक्रव्यूह को त्तोड़ता हुआ, उसे अपने साथ ले गया । और फिर, उसने बहुत ही बेरहमी से न सिर्फ गुलहसन का कत्ल किया वल्कि यह भी प्रचारित किया कि…"मैं इडियन सीक्रेट सर्विस का एजेंट हू और तब तक इसी तरह पाकिस्तानी अफसरों को मौत के घाट उतारता रहूंगा जब तक पाकिस्तान आए दिन इंडिया में की जाने वाली आतंकवादी वारदातें नहीं रोकेगा ।'

जावेद के कारनामों ने तो केवल पाकिस्तान में ही तहलका मचा रखा था मगर उसके उपरोक्त शब्दों ने पूरी दुनिया क्रो हिलाकर रख दिया ।

खासतोर पर भारत को ।

क्योकि उसने खुद को इंडियन सीक्रेट सर्विस का एजेंट बताया था जबकि इंडियन सीक्रेट सर्विस से दूर दूर तक उसका कोई संबंध न था।।

आप जानते हैं कि…इंडियन सीक्रेट सर्विस के प्रमुख सदस्यों कै नाम

विजय,

अजय,

बिकास,

अशरफ,

विक्रम,

परवेज,

नाहर

और

आशा

आदि थे ।

जावेद कश्मीरी के बयान के आधार पर एक तरफ पाकिस्तान ने सारी दुनिया में दिंढोरा पीट दिया था कि-देख लो, इडिया हमारे मुल्क में क्या कर रहा हे ।

दूसरी तरफ हिंदुस्तानी सरकार सांसत में पड गई । यह सफाई देते देते जुबान घिस गइ कि जावेद नाम कै किसी लड़के से हमारा कोइ संबंध नहीं हे । मगर, बात जब अंतराष्ट्रीय पटल पर पहुच जातौ हे तो केवल बातों से कुछ नहीँ होता । ठोस करके दिखाना पड़ता हे । है माहोल ऐसा लगा कि अगर जावेद कश्मीरी ने पाकिस्तान में अपने कारनामे नहीं रोके तो हिंद पाक युद्ध छिड सकता है।

और.. .इस युद्ध कै छिड़ने का मतलब था…परमाणु युद्ध।

परमाणु युद्ध का मतलब था…पूरी दुनिया का प्रभावित होना ।

भारत पर पूरी दुनिया का दबाव पढ़ने लगा क्योंकि पाकिस्तान लगातार चिंघाड़े जा रहा था कि अगर भारत ने अपने सीक्रेट एजेंट जावेद को नहीं रोका तो युद्ध तय हे ।

ऐसे संवेदनशील समय में इडियन सीक्रेट सर्विस के चीफ व्लैक व्वाय ने अपने सवसे काबिल जासूस बिजय को याद किया । और...बिजय दी ग्रेट को तो आप जानते ही हैं वह अपनी कारगुजारियों में मस्त था ।

तभी , बिकास ओर मोंटी उसके घर आ पहुंचे। उसकी चुहलबाजी चल ही रही थी कि 'रघुनाथ भी पहुंच गया । (ये जो नाम आ रहे हैं, नियमित पाठक इन नामों से खूब परिचित हैं लेकिन अगर आप ऐसे पाठक हैं जिसने आज से पहले विजय विकास सीरीज का कोई उपन्यास नहीं पढा हे तो इतना ही कहूंगा कि एक वार कश्मीर का वेटा को ज़रुर पढ लें तभी आप चलते पुर्जे का पूर्ण आनंद उठा पाएँगे।)

हां, तो रधूनाथ बिजय की कोठी पर पहुचा और उसने बताया कि क्रिस तरह कुछ लोगों ने मुल्क के लाॅ मिनिस्टर नौशाद अंसारी को किडनैप का किया हे । आप जानते ही है…रधूनाथ पुलिस सुपरिटेंडेंट हैं । नौशाद अंसारी की सुरक्षा का जिम्मा उसी पर था। मगर अपहरणकर्ताओं ने उसे ऐसी टेक्निक के साथ किडनैप किया कि लाख क्रोशिशो क वाद भी वह अंसारी को अगवा होने से न राक सका । यहां वह, नौशाद अंसारी का पता लगाने के लिए बिजय की मदद हासिल करने आया था ।

वाते चल ही रही थी कि शहर के आईजी पुलिस ठाकुर ' निर्भय सिंह यानी विजय के पिता का फोन आया मगर फोन बिजय के लिए नहीं रघुनाथ के लिए था । उन्होंने रघुनाथ को फोरन अपने आफिस में तलव किया था ।

रघुनाथ को रवाना होना पड़ा । उघर, पाकिस्तान में । वहा के अजीमोश्शान जासूस नुसरत तुगलक को तो आप जानते ही हैं ! पाकिस्तानी सीक्रेट सर्विस कै पास इस जासूस जोडी से उम्दा कोई जासूस नहीं है अंतत: जावेद कश्मीरी का मामला उन्हीं कं सुपुर्द कर दिया गया था आर सबसे पहले उनकी धार पर आया-इस्लामावाद आइएसआइ का चीफ आफ्ताव खान ।

वह, जिसे गुलहसन की हिफाजत का जिम्मा सौपा गया था । नुसरत-तुगलक ने उसे उसकी नाकामी की सजा दी । हमेशा की तरह उनकी सजा नई और विचित्र थी ।

आफताब खान की नाक काट ली थी उन्होंने ।

इधर, बिजय इडियन सीक्रेट सर्विस के चीफ यानी ब्लैक व्वाय कै बुलावे पर सीक्रेट सर्विस के हेडक्वार्टर अर्थात् गुप्त भवन पहुंचा । इस बार ब्लेक व्याय ने उसे ऐसा अनोखा मिशन सौंपा जेसा न पहले कभी सोंपा गया था ओर न ही कल्पना की जा सकती थी कि किसी सीक्रेट एजेंट को ऐसा मिशन सौंपा जा सकता है ।

ब्लेक व्वाय ने कहा …'पाकिस्तान सरकार ने हिंदुस्तान सरकार से आपको मांगा है । कहा है कि बिजय नाम के जासूस को फौरन पाकिस्तान भेजा जाए । उसका मिशन होगा-जावेद कश्मीरी को अरेस्ट करके पाकिस्तान सरकार ' के हवाले करना ।' इस आदेश को सुनकर बिजय चोंका ।

बोला …'क्यों, नृसरत तुगलक मर गए हैं क्या? "ज़वाब में ब्लेक व्वाय ने कहा…'समझने की कोशिश कीजिए सर, विश्व जनमत के कंघे पर सबार होकर पाक हम पर दयाव वना रहा हे ओर भारत , साकार के सीधे आदेश हुए हैं कि आप फौरन पाकिस्तान जाकर, जेसे भी हो जावेद कश्मीरी को गिरफ्तार करके उसे पाक सरकार… के हवाले करें' । याद रहे -जावेद कश्मीरी को मार नहीं सकते आप । मिशन उसे गिरफ्तार करके पाक सरकार के हवाले ही करना है क्योंकि यदि आपने उसे मारा तो यह समझा जाएगा कि वह भारतीय सीक्रेट एजेंट ही था और आपने उसे सबुत खत्म करने को मंशा से मार डाला ।"

अंतत: विजयको मिशन के लिए तैयार ' होना पड़ा और यहीं, बातचीत में यह रहस्य भी खुला कि भारत के जिस लाॅ मिनिस्टर नौशाद अंसारी को किडनैप किया गया है वह पाकिस्तान में विध्वंस मचा रहे जावेद कश्मीरी का चाचा है । इस रहस्योद्घाटन ने बिजय के कान खडे कर दिए । दिमाग में खलबली मचा दी । उसे लगने लगा कि अंसारी के अपहरण का संबंध जावेद द्वारा पाकिस्तान में मचाए जा रहे तहलके से हो सकता है ।

ब्लेक व्वाय ने बताया-'नोशाद अंसारी ओर जावेद कश्मीर के रहने वाले हैं । नौशाद अंसारी भारत को अपना मुल्क मानते है और यहीं रह गया था जबकि उसका भाई यानी जावेद के अव्बा का मानना था कि मुसलमान होने के नाते उनका मुल्क पाकिस्तान है। वे अपनी फेमिली को लेकर पाकिस्तान चले गए है मगर , जावेद के विचार अपने चाचा से मिलते थे इसलिए वह यहीं रह गया ओर......

...... उस वक्त तो बिजय कुछ ज्यादा ही चौक पडा जब ब्लेक व्वाय ने बताया कि छ: महीने पहले तक जावेद जम्मू कश्मीर पुलिस में इंस्पैक्टर था ।

उसने कई बहादुरी भरे कारनामे किये थे लेकिन अंत में पाया गया कि न केवल उसके आंतकवादीयो से संबंध थे वल्कि वह खुद भी आतंकवादी था ।

सारे भेद खुलने पर उसे हवालात में वंद कर दिया गया लेकिन वहाँ से उसे उसके आतंकवादी साथी फरार करा ले गए । फरार होने के बाद वह पाकिस्तान चला गया । इतना सब सुनने के बाद विजय बोला-'अगर वह भारत से नफरत करता था तो अब पाकिस्तान में आतंक क्यों मचा रहा है?????
 
ब्लेक व्वाय कै पास कोइ जबाव न था....... तव, बिजय को कहना पडा…'नहीं , जावद कश्मीरी की स्टोरी इतनी सीधी-सादी नहीं है । इसमे काई जबरदस्त पेच है ओर........ उस पेंच तक पहुंचने के लिए मुझे जावेद तक पहुंचना होगा ।' विजय ने जावेद के बारे मेँ ब्लेक व्वाय से जब और जानकारियां मांगीं तो ब्लेक व्वाय ने एक फाइल देते हुए कहा…'इसमें उसके बारे में वह सब है जो जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा हमें भेजा गया है। " उनके बीच बातें चल ही रहीँ थीं कि विजय के मोबाइल पर रघुनाथ का फोन आया ।

उसने बताया-"एक नदी से किसी की लाश मिली हे ।' बिजय विकास के साथ घटनास्थल पर पहुंचा । वहां का नजारा बता रहा था कि काले रंग की किसी गाडी ने मकतूल की गाडी को जानबूझकर हिट किया था जिसके कारण वह नदी में जा गिरी और ये हादसा हुआ ।

लाश इतनी बुरी हालत में थी कि उसे पहचाना नहीं जा सकता था मगर विजय ने अपनी इन्वेस्टिगेंशन से पता लगा लिया कि मृतक बलजीत यादव नामक एक विधायक था ।

विधायक भी भ्रष्ट, चरित्रहीन ओर बाहुबली । इतना ही नहीं, विजय ने यह भी पतालगा लिया कि बलजीत कै तार पाकिस्तान से जुड़े थे । वह अक्सर पाकिस्तान में रहने वाले गुलजार नाम कै व्यक्ति से मोबाइल पर बातें करता था । एक महत्वपूर्ण जानकारी यह मिली कि…राज़नगर के वर्तमान डीएम केलकर की इस पद पर नियुक्ति बलजीत यादव की मेहरबानियों है। बिजय यह सोचकर डीएम से मिलने गया था कि उससे यादव के बारे में कुछ और ज्यादा जानकारी मिल सकेगी मगर वहां पहुचेने पर तो उसके होश ही उड गए ।

डीएम केलकर ने कहा कि…बलजीत यादव नाम कै कुत्ते का मर्डर मैंने किया हे । मैंने अपनी गाडी से उसकी गाडी को हिट करके नदी में डाला था । विजय ने जब यह पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया तो ऐसी कहानी सामने आईं जिसने विजय जैसे शख्स कं दिमाग को हिलाकर रख दिया ।

केलकर ने बताया कि उसे डीएम बनाने के बदले में बलजीत यादव उसकी पत्नी की एक रात मांग रहा था और उसने उसे अपने शिकंजे मे इस कदर कस लिया था कि उससे निजात पाने के लिए, उसका मर्डर करने के अलावा केलकर के पास कोई चारा न बचा था । केलकर से ही विजय को यह भी पता लगा कि नोशाद अंसारी के किडनेप के पीछे यादव ही था और मरने से पहले उसने नौशाद अंसारी को पाकिस्तान पहुचा दिया था । विजय को पूरा यकीन हो गया कि नौशाद को जावेद पर प्रेशर डालने के लिए पाकिस्तान ने ही किडनेप कराया है । अब उसके पास पाकिस्तान जाने की दूसरी वज़ह भी थी । नौशाद अंसारी को वापस लाना ।

उधर, पाकिस्तान में…नुसरत-तुगलक गुलजार के फ्लैट पर पहुचे । वही गुलजार, बिजय की इन्वेस्टिगेशन के मुताबिक जिससे बलजीत यादव मोबाइल पर बात करता था। उनकी बातचीत से पता लगा कि गुलजार आईएसआइ की करांची शाखा का एजेंट था और नुसरत तुगलक की प्लानिंग के मुताबिक बलजीत यादव ने नौशाद क्रो बार्डर पर गुलजार के ही हवाले किया था । मगर, उसने एक गलती कर दी थी । यह कि यादव से बात करते वक्त अपने मोबाइल का इस्तेमाल किया जिसके कारण विजय को पता लग गया कि यादव कै पाकिस्तान मेँ किससे संबंध थे ।

नुसरत तुगलक गुलजार कै फ्लैट पर उसे उसकी इसी गलती की सजा देने पहुचे थे ।

जब गुलजार को लगा वे उसे मौत की सजा देने वाले हैँ तो उनके पेरों में गिर गया । कहने लगा कि इस गलती को सुधारने के लिए वह, हर वो काम करने क्रो तैयार है जो वे कहेगे ।

तब, नुसरत तुगलक ने गुलजार को मानव बम बनाने का फैसला किया । ऐसा मानव बम जिसे अपने साथ बिजय उडाना था ।

इधर, यानी भारत मेँ बिजय अपनी कोठी पर पहुंचा । वहा विकास और घनुषटंकार( मोटो) एक पार्टी की तेयारी कर रहे थे । लान में उन्होंने जावेद कश्मीरी की बडी सी पेंटिंग लगा रखी थी ओर धनुषर्टक्रार उसे माला पहना रहा था ।

बिजय ने जब पूछा कि ये सब क्या है तो विकास ने कहा कि जावेद कश्मीरी पाकिस्तान में जो कुछ कर रहा है, वह सब उसी दिन से वह खुद करना चाहता था जिस दिन पाकिस्तान ने भारत में आतंकवादी वारदातें शुरु की मगर सीक्रेट एजेंट होने कै कारण उसके हाथ बंधे थे, इसलिए न कर पाया । अब...क्योंकि जावेद कश्मीरी वहीँ सब कर रहा हे, इस खुशी में आज शाम उसने यहा' पार्टी दी है । यह सुनकर बिजय क्रो ताव आ गया और उसने कह दिया कि तुम्हारे इस हीरो(जावेद कश्मीरी) की जिंदगी ज्यादा लंबी नहीं है क्योंकि भारत सरकार के आदेश पर वह उसे गिरफ्तार करके पाक सरकार के हवाले करने के मिशन पर आज ही पाकिस्तान जा रहा हे ।

ऐसा सुनकर विकास न केवल हेरान रह गया बल्कि भड़क उठा ।

कहने लगा कि भला आपका ऐसे मिशन पर पाकिस्तान जाने का क्या मतलब हे? तात्पर्य यह कि बिकास के मुताबिक जावेद जो कुछ कर रहा था ठीक कर रहा था और बिजय का काम उसे रोकना था । इस मसले पर गुरु चेले में ठन गई । विकास ने धोखे से बिजय क्रो बेहोश कर दिया । इस दृश्य को देखकर धनुष्टकांर हैरान रह गया । विकास ने उसकी हैरानी यह कहकर दूर की कि उसका मिशन बिजय को किसी भी तरह पाकिस्तान न जाने देना है ।

10

बेहोश बिजय को लेकर विकास गुलफाम के पास पहुचा । उसे सारी बातें बताईं और कहा…'मेरा मिशन किसी भी तरह जावेद को पाकिस्तान से निकालकर हिंदुस्तान लाना है । विजय गुरु ऐसा नहीं होने देंगे इसलिए, आपकी ओर मोटों की डयूटी ये हे कि जब तक मैं अपना मिशन पूरा करके भारत न लोट आऊं तब तक बिजय गुरु क्रो अपनी केंद में बनाए रखें । इन्हें फरार न होने दें ।

गुलफाम इसके लिए तैयार हो गया ।

जावेद कश्मीरी कै बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारियां जुटाने के मकसद से बिकास नौशाद अंसारी कै घर पहुंचा । वहां उसे नौशाद की बीबी हुनरबानो मिली । जावेद का नाम सुनते ही हुनरवानो ने ऐसा मुंह बनाया था जैसे मुंह में कुनेन की गोली घुल गइ ।

जो कुछ उसने बताया, उसके मुताबिक-करीब छ: महीने पहले जब वह और नौशाद अंसारी कश्मीर के प्रसिद्ध हिलस्टेशन पहलगाम स्थित अपने पुश्तैनी वंगले पर गए थे तो वहाँ आतंकी हमला हुआ था । उस वक्त वहा केवल वे दोनों, जावेद ओर उनका तीन फुटा नौकर मोगली था । हमला करने वाले तीन आतंकी थे । नाजनीन नाम की लडकी, एक घनी दाढी वाला और एक नकाबपोश.....

..... उन्होंने जावेद को जख्मी कर दिया था । मोगली क्रो बांधकर डाल दिया था । हुनरवानो और अंसारी न खुद को तहखाने में छुपाकर जान बचाई थी । आतंकियों को तहखाने के वारे में कुछ पता न था इसीलिए वे बच सकै थे वरना उन्हें अंसारी की ही तलाश थी। आतकी जाने क्यों नोशाद अंसारी से उन पुलिसवालों के नाम जानना चाहते थे जो पच्चीस जनवरी कै दिन उसकी रक्षा को तनात थे। आतंकियों कै जाने कें बाद अंसारी ने बलविंदर सिंह को फोन किया । बलविंदर सिंह वहां एसएसपी पुलिस था । उसे एक ईमानदार ओर कत्तर्व्यनिष्ठ पुलिसिया माना जाता था । उसने नोशाद अंसारी से कहा क्रि मै पहुच रहा हूं लकिन दूर होने के कारण शायद कुछ लेट हो जाऊं पर मै अभी फोन कर रहा हूं। एसपी देहात शिवालकर शमा, एसपी सिटी गजेंद्र चौधरी ओर सी ओ अविनाश अग्रवाल फोरन आपके बंगले पर पहुंच रहे हें ।

वेसा ही हुआ ।

जावेद क्रो होश में लाया गया ।

पुलिस इंस्पेक्टर होने के नाते वह उपरोक्त सभी आफिसर्स के मातहत काम करता था । अब सवाल यह उठा कि आतंकियों को यह कैसे पता लगा कि अंसारी ओर हुनरवानो आज की रात अपने पहलगाम वाले बंगले पर आए हुए हैं ? यह वात अंसारी ने केवल जावेद को बताइ थी इसलिए संदेह के घेरे में आगया । यानी यह माना जाने लगा कि खबर उसी ने लीक की है । हुनरवानो तक को एसा ही लग रहा था पर नौशाद अंसारी ने जावेद का पक्ष लिया ।

वह सख्ती से बोला…"जावेद ऐसा नहीं कर सकता ।"

उसी के कारण उस वक्त वात आई गई हो गइ थी ।।

बिकास को इतना बताने के बाद हुनरवानो बोली…"पर उसके बाद, आज से करीब एक महीना पहले अंसारी साहब बहुत ही परेशान और टूटी हुई हालत में घर लोटे । उन्होंने कहा कि उन्हे अब भी यक्रीन नहीं आ रहा कि जावेद आतंकवादी हो सकता है । मैं चोंक पडी । पूछा…क् क्या नई बात कह रहे हें आप? उन्होंने इतना ही बताया-जावेद आतंकवादी निकला । बलविंदर सिंह का फोन आया था । उसने बताया कि वह रंगे हाथों पकडा गया हे ओर इस वक्त हवालात में है । मेंने और ज्यादा जानना चाहा मगर अंसारी साहब बोले -उसने हमारी ही नहीं, पूरे खानदान की नाक कटवा दी हे । मैंने कहा…मूझे तो उसी दिन जावेद पर शक हो गया था। आप ही ने उस पर अंधा विश्वास किया । अंसारी साहब बोले-- हम दोनां में से किसी की जुबान पर कभी उसका नाम नहीं आना चाहिए । वह हमारे लिए मर चुका हे । मैं भी यह सोचकर चुप रह गई कि ज्यादा कुरेदने पर उन्हें दुख होगा ।"

बिकास के बारम्बार पूछने पर भी हुनरबानो ज्यादा कुछ न बता सकी मगर विकास के दिमाग में जावेद क्रो लेकर अनेक सवाल चकरा रहे थे ।

अगले दिन विकास पहलगाम, नोशाद अंसारी के बंगले पर जा पहुंचा । मोगली से मिला । सवाल-जवाब किए । सबसे पहले मोगली ने यह बताया कि इंस्पेक्टर के रूप में जावेद ने किस तरह अदभुत बहादुरी का परिचय देकर एक दरगाह को आतंकवादियों से आजाद कराया था ओर यह भी कि अपने इस कारनामे पर उसे शिवालकर शर्मा, अविनाश अग्रवाल ओर गजेंद्र चोधरी से क्रिस तरह प्रशंसा की जगह प्रताडना सुनने को मिली थी । उनका कहना था कि उनकी परमीशन के बगैर उसने आतंकवादियों से टक्कर क्यों ली । तभी वहा एसएसपी बलविंदर सिंह पहुंच गए । उन्होंने जावेद कै कारनामे की जमकर तारीफ की । तब, शिवालकर आदि ने सारे मामले क्रो उनके सामने इस तरह पेश किया जेसे सब कुछ उन्हीं का किया धरा था । प्लानिंग उन लोगां ने बनाई थी, कार्यान्वित उनके आदेश पर जावेद ने की ओर जावेद उनके आधीन होने के कारण एसएसपी को सच्चाइ न बता सका । जावेद क्रो उसी दिन नाज़नीन कै गैंग क्रो पकड़ने या खत्म कर देने का मिशन सोंपा गया था ।
 
11

तब, जावेद ने शिवालकर शर्मा , अविनाश अग्रवाल ओर गजेंद्र चौधरी से कहा-'सर, मैंने सुना हे कि नाजनीन आतंकवादी नहीं हे बल्कि कुछ पुलिसवालों ने उसक मां बाप और भाई की हत्या की है । इसलिए वह अपने चाचा के साथ उन पुलिसवालों से बदला लेने के लिए भटक रही हे ।' तब, गजेंद्र चौधरी ने कहा …‘ये बकवास है, हकीकत ये है कि कश्मीर में सक्रिय आईएसआई के एजेंट पुलिस की वर्दी पहनकर ऐसी वारदातें इसलिए करते हें ताकि यहां के लाग भ्रमित होकर यहां मोजूद इंडियन आर्मी ओंर ज़म्मू कश्मीर पुलिस को अपना दुश्मन समझन लगे और आतंकवाद की दलदल में फस जाएं । नाजनीन की तरह अनेक कश्मीरी उनकी चाल में र्फसे हुए हैं । ये सच न होता तो वह गोला बारूद, एकै सेत्तालिस ओर आरडीएक्स जेसे वे घातक हथियार उनके पास कहां से आ रहे जिनकी मदद से आए दिन यात्रियों से भरी बसों क्रो उडाते हें । पुलों को ध्वस्त करते हें । ये चीजें उन्हें आईएसआई मुहेया करा रही है ।"

बात जावेद क्रो जम गई ।

कश्मीर का बेटा का अगला सीन नुसरत तुगलक का था । वे आपस में बातें कर रहे थे और उन्हीं वातों से रहस्य खुला कि 'जिस विजय" को विकास ने बेहाश करके गुलफाम की केद में छोड़ा था, असल में वह विजय था ही नहीं।

वह विजय की डमी थी और वह डमी खुद बिजय ने तेयार की । उसक दो मकसद थे …पहला विकास को धोखा देना । दूसरा-नुसरत तुगलक को धोखा देना । यहां, नुसरत तुगलक की बातों से यह वात क्लियर हो गई कि बिजय अपने पहले मकसद यानी विकास को धोखा देने में भले ही कामयाब होगया हो लेकिन दूसरे मकसद अर्थात् नुसरत तुगलक क्रो घाखा देने मं कामयाब न हो सका था ।

उन्हें इस बात की पूरी इंफॉर्मेशन थी कि गुलफाम की कैद में बिजय की डमी हे जबकि असली बिजय वाहिद पठान के नाम से पाकिस्तान कै लिए रवाना हो चुका है और यहां वह करांची मेँ पहले से मौजूद रॉ की जासूस गजाला से मिलने उसके फ्लैट पर पहुचेगा ।

वही हुआ.. .यानी विजय वाहिद पठान के मेकअप मेँ गजाला कै फ्लेट पर पहुंचा । कुछ देर बाद नुसरत तुगलक के प्लान कै मुताबिक मानव बम बना गुलजार भी जा पहुंचा ।

वह अपने साथ बिजय औंर गजाला क्रो उडाने कै वहुत करीब था कि किसी रहस्यमय शख्स ने गाली मारकर उसकी हत्या कर दी । उस वक्त बिजय ओर गजाला न जान सके कि उनका मददगार कौन था ।

उधर, मोगली ने बिकास को जो बताया उसके मुताबिक जावेद उस वक्त अपने पहलगाम वाले बंगले में ही था जब नाजनीन नाम की आतंकवादी ने न सिर्फ मोगली को किडनैप कर लिया वल्कि बडी दिलरी के साथ जावेद के सामने आ धमकी । उसने कहा कि मोगली को वापस चाहते हो तो उन आतंकियों क्रो लौटाओ जिन्हें दरगाह से पकड़ा है । जावेद इसके लिए तेयार न हुआ।।

यहां उन दोनां के बीच जमकर फाइटिंग हुइ । जावेद ने नाजनीन को बंदी वना लिया । जव उसने उसे यह समझाने की कोशिश की कि जिन लोगों ने तुम्हार मां बाप ओर भाई की हत्या की हे वे पुलिस के लोग नहीं वल्कि पुलिस की वर्दी में आईएसआई के लाग थे तो नाजनीन भड़क उठी । उसने अपन साथ घटी घटना विस्तार से बताई आर दावा किया कि वह सब करने वाले पुलिस वाले ही थे । तब, भावुक हुए जावेद ने कहा …यदि वे पुलिस वाले थे तो तुम्हें इंसाफ दिलाने के लिए मैं तुम्हारा साथ दूगा हकीकत ये नहीं हे । हकीकत ये हे कि भ्रम में फंसकर तुम एक आंतकवादी बन गई हो । अपने ही लोगों को मार रही हो । अगर यह सच नहीं है तो बताओ-तुम्हारे पास इतना गोला बारूद, एक सैंतालिस आरडीएक्स जेसे घातक हथियार कहां से आए ?' जावेद के इस सबाल ने नाजनीन की जुबान पर ताला ज़ढ़ दिया था क्योकि यह सब उन्हें एक नकाबपोश सप्लाई करता था ओर उसकी असली सूरत आजतक उसने नहीं देखी थी । उस वक्त तो नाजनीन की हेरानियों की इंतहा ही न रही जब जावेद ने उसे यह कहकर आजाद कर दिया कि-जाओ पता लगाओ हकीकत क्या हे । अगर लगे कि तुम आईएसआइ की कठपुतली बनी हुईं हो तो जो कर रहीँ हो, वह सब छोढ़ दो और यदि वाकइ तुम्हारे परिवार की हत्या करने वाले पुलिस के लोग थे तो मैं वादा करता हूँ मैतुम्हें इंसाफ दिलाऊंगा । यह सब जावेद ने इस अंदाज़ में किया था कि नाजनीन उससे प्रभावित हुए बगैर न रह सकी ।

..... वापस जाकर अपने चाचा यानी अरमान अली से कहा कि मोगली के हमारी कैद में होने के बावजूद जावेद ने मुझे आजाद करने की जो दिलरी दिखाई हे, मोगली क्रो आजाद करके हमेँ भी वही दिलेरी दिखानी चाहिए । अरमान अली का कहना था कि ऐसा करना ठीक न होगा ।

जब उसने उसकी न सुनी तो नकाबपोश सामने आया । वह भी नाजनीन की वात मानने को तैयार न था बल्कि वह तो उसी वक्त मोगली क्रो गोली मारने वाला था कि एन वक्त पर वहां जावेद पहुंच गया । उसने न केवल मोगली को उनकी कैद से निकाला वल्कि अंधेरे का फायदा उठाकर मोगली ने नकाबपोश की जेब से उसका वह आइडेंटिटी कार्ड भी उडा लिया जिसके बूते पर उसे आईएसआई का एजेंट सिद्ध किया जा सकता था ।

.... उसका असली नाम अजमल था । अजमल ने अपना आईडेंटिटी कार्ड गुम होने की जानकारी जब पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं को दी तो वे भड़क उठे । उन्होंने अजमल से कहा…"सबसे पहले कार्ड वापस हासिल करो, जावेद ने अगर यह साबित कर दिया कि तुम आइएसआइ के एजेंट हो तो दुनिया में पाकिस्तान की मिदृटी पलीद हो जाएगी ।'

उधर, जिस बहादुरी के साथ जावेद उनके पंजे से मोगली क्रो निकालकर ले गया था, उसने नाजनीन को जावेद की फेन बना दिया.....

12

.....यहा यदि यह भी कह दिया जाए तो अतिश्योक्ति न होगी कि मन ही मन नाजनीन जावेद से मुहब्बत करने लगी थी । उसे यह भी यकीन हो चला था कि वाकई उसके परिवार के हत्यारे पुलिस वाले नहीं बल्कि आईएसआई ही लोग थे ओर जावेद सचमुच उसे इंसाफ दिला सकता हे ।

......अपने दिल की वात जव उसने अरमान अली क्रो बताई तो यह महसूस करके अरमान के होश उढ़ गए कि नाजनीन जावेद से किस कदर प्रभावित हो गई हे । नाजनीन ने उससे कहा था कि वह एक बार जावेद से अकेले में मिलना चाहती हे । अरमान अली के एंगिल से क्योंकि नाजनीन भटक गई थी और वह गलत रास्ते पर जा रही थी इसलिए उसने नाजनीन से हुई सभी बातें अजमल को बता दीं । वह अभी तक नहीं जानता था अजमल सचमुच आईएसआई का एजेंट हे । अजमल क्रो लगा अपना कार्ड हासिल करने का इससे सुनहरा मोका न मिलगा अत: उसने अरमान अली से कहा…'अगर वह जावेद से अकेले में मिलना चाहती हे तो मिलने दो ।' अरमान चोंका ।

बोला-"ये आप क्या कह रहे हें सरदार ? तब, उसने बताया कि जावेद पर कावूपाने का इससे अच्छा मौका और क्या मिलेगा ! बात अरमान की समझ में आ गई।

और तब, उनके बीच प्लान यह बना कि नाजनीन जावेद क्रो जहा' बुलाएगी, वहां वे नाजनीन को नहीं जाने देंगे बल्कि वे जाकर जावेद का इलाज़ करेंगें । नाजनीन ने जावेद को चिनारों के पांच पेडों के बीच बुलाया था ।

मोगली भी जावेद से उसके साथ चलने की जिद करने लगा मगर जावेद नहीं मान रहा था ।

जव मोगली ने ज्यादा जिद की तो जावेद ने उसे उसे एक ऐसा यंत्र दिया जो मोगली को उसकी दिशा और दूरी बताता रहने वाला था ।

नाजनीन को जब अरमान और नकाबपोश यानी अजमल का प्लान पता लगा तो वह भडक गई मगर उन दोनों ने मिलकर नाजनीन क्रो वेहोश कर दिया और चिनार के पांच पेडों के बीच पहुंचकर जावेद को अपने शिकंजे मे कस लिया ।

अरमान अली जावेद को तुरंत खत्म कर देने के पक्ष में था अजमल ऐसा कैस चाह सकता था ? उसे तो जावेद को खत्म करने से पहले अपना कार्ड हासिल करना था ।

मगर, यह बात वह अरमान क्रो नहीं बता सकता था क्योकि ऐसा करता तो अरमान पर उसका भेद खुल जाता । सो उसने इस बहाने से अरमान को घटनास्थल से हटा दिया कि तुम नाजनीन का ख्याल रखो, कहीं वह होश में आने के वाद यहा न पहुंच जाए और तब, कार्ड का पता पूछने के लिए जावेद को ज़बरदस्त और बीभत्स तरीक से टाचर करना शुरू किया । वह टार्चर कर ही रहा था कि नाजनीन वहा' पहुंच गई ।

.... जावेद की हालत देखकर वह रणचंडी बन गई । नकाबपोश पर टूट पडी । अब उसे भी पता लग गया था कि नकाबपोश असल में आईएसआइ का एजेंट हे लेकिन अजमल के आगे उसकी एक न चली । अंतत: उसने नाजनीन को भी जंजीरों में जकड़ लिया और जावेद से कार्ड का पता पूछने के लिए नाजनीन के जिस्म से कपड़े नोचने लगा । यह सब चल ही रहा था कि अरमान वहा पहुंच गया । नाजनीन की हालत देखकर ओर अजमल की हकीकत पता लगने पर तो जेसे वह पागल ही हो गया । अजमल पर झपट पडा,

.... मगर अजमल ने उस पर गोलियों की वारिश कर दी । वह मौके पर हीँ मारा गया ।

सही वक्त पर मोगली न पहुच जाता तो निश्चित रूप से अजमल जावेद ओर नाजनीन का भी खात्मा कर देता ।

मोगली की मदद से हुआ यह कि नाजनीन ने अपने हाथो से अजमल को ठिकाने लगा दिया ।

यहा तक का हाल विस्तार से बताने के वाद मोगली न विकास से कहा…'उसकै बाद जावेद नाजनीन क्रो लेकर एसएसपी बलविंदर सिंह के आफिस पहुचा । उसका इरादा वलबिदर सिंह क्रो हकीकत बताकर नाजनीन को संरडर कराना था मगर, आफिस में उस वक्त बलविंदर सिंह नहीं वल्कि गजेंद्र चौधरी , शिवालकर शर्मा और अविनाश अग्रवाल थे । उन्हें देखते ही नाजनीन बुरी तरह चोंक पडी ओर चीख चीखकर कहने लगी कि मेरे परिवार की हत्या करने वाले ये ही तीनों थे ।

.... शुरू में तो जावेद कुछ समझ ही न सका । जब तक समझा, तब तक वह नाजनीन को गाली मार चुके थे ।

उस दृश्य को देखकर तो जावेद पर मानो खून सवार हो गया क्योंकि इस बीच वह भी नाजनीन से मुुहव्वत करने लगा था ।

उसने वहां, तीनों क्रो मौत कै घाट उतार दिया । इस बीच बलविंदर सिह भी वहां पहुच चुके थे । जावेद ने जो कुछ किया, उनकी आंखों के सामने किया था मगर उन्हें सारी वात गलत एंगिल से पता लगी थी ।

उनकी समझ के मुताबिक नाजनीन आतंकवादी थी । जावेद उसका साथी था । वे दोनों उनके आफिस से सीक्रेट फील्म चुराने आए थे ।

शिवालकर, अविनाश और गजेंद्र को उसने इसलिए मार डाला क्योंकि उन्होंने उसे रोकने की कोशिश ।

जावेद ने चीख चीखकर हकीकत बताई जरूर लेकिन अपनी बातों को सच साबित करने वाला उसक पास एक भी सबूत न था इसलिए आतंकवादी मानकर हवालात में डाल दिया गया ।

नाजनीन तब तक मरी नहीं थी इसलिए उसे हास्पिटल भेज दिया गया । वाद में जब हास्पिटल से खबर आई कि वह मर चुकी हे ता जावेद पूरी तरह टूट गया ।
 
इतना सबकुछ होने के कारण उसके दिल में हिंदुस्तान के खिलाफ ज़हर भर गया ।

उसके जेहन में यह वात घर कर गई थी कि मुसलमान हिंदुस्तान के लिए भले ही जान दे दें लकिन हिंदू उन्हें कभी हिंदुस्तानी नहीं मानंगे । उसके अब्बा ही ठीक कहते थे । यह कि…मुसलमानों का मुल्क पाकिस्तान हे । उस वक्त वहां दो हिंदू पुलिसवालों की डूयूटी थी । पहले का नाम देवांश था, जो सब इंस्पक्टर था । दूसरा हवलदार अर्जुन पांडे था । जावेद ने देवांश से मोगली से मिलने की इच्छा प्रकट की ।

13

हालांकि कानून देवांश को ऐसा करने की परमीशन नहीं देता था लेकिन जावेद से सहानुभूति होने के कारण वह बंगले पर गया और मोगली को अपनी जीप मेँ लेकर हवालात आया और फिर जावेद की इच्छा कै मुताबिक इन्हीं दोनों की मदद से ऐसा ड्रामा रचा गया जेसे हवालात पर हमला करके आतंकवादी जावेद को अपने साथ ले गए हों ।

देबांश ने जावेद से कहा था…सर, यदि आप पाकिस्तान को अपना मुल्क समझते हैं, वहा जाना चाहते हैँ तो शोक से जाएं पर इस हकीकत को याद रखें कि हिंदू हो या मुसलमान, हर कोम में हर किस्म कै लोग हैं । बस इतनी दरख्वास्त है आपसे कि सारे हिंदुओं को कभी गाली न देना ।"

इतना सब बताने कै बाद मोगली ने बिकास से कहा…"उसकै बाद जावेद साब बार्डर क्रास करके पाकिस्तान के लिए निक्ल गए । हमने भी उनकें साथ जाने की बहुत जिद की मगर वे नहीँ माने ।'

तब, विकास ने मोगली से वहीँ सबाल किया जो शुरू से उसके दिमाग में अटका हुआ था ।

..... यह कि अगर जावेद को हिंदुस्तान से इतनी नफरत हो गई थी, वह पाकिस्तान को अपना मुल्क समझने लगा था तो पाकिस्तान में नरसंहार क्यों मचा रहा हे????

.... मगर, सबाल सबाल ही रह गया क्योंकि मोगली भी इस सबाल का कोइ जबाब न दे सका था । उसने कहा…"यहां से जाने के बाद जावेद साब ने हमसे कभी कोइ संपर्क नहीं किया ।'

उधर करांची में विजय और गजाला को पता लगा कि ऐन वक्त पर गुलजार को गोली से उड़ाने बाला उनका मददगार अलफासे था।

अंलफासे ने विजय से कहा-'अगर वह माकूल कीमत दे तो यह भी बता सकता हे कि नोशाद अंसारी इस वक्त कहाँ है।' विजय ने जब पूछा तो अलफांसे ने बताया कि नुसरत तुगलक ने उसे तालिबानियों के सरदार हाजी गल्ता की देख रेख में उसकै महल में रखा है। उस महल की सुरक्षा व्यवस्था इतनी पुख्ता है कि किसी भी तरह अंसारी क्रो निकाला नहीं जा सकता । बस, कश्मीर का बेटा में कहानी का इतना ही हिस्सा लिखा जा सका था । बाकी के तीन सीन आप चलते पुर्जे की शुरुआत में पढ चुके हैं ।

कश्मीर का बेटा

की शोर्ट स्टोरी

समाप्त........

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
हैदर अली की बात सुनते ही शफ्फाक शाही ने झपटकर दोनों हाथों से उसका गिरेबान पकड लिया और चीखा…"ये सब पहले क्यों नहीं बताया तुमने ?"

"म माहोल और समय ही नहीं मिला सर !" नौकरी जाने के भय से कांप रहे हैदर ने कहा…“आप तब लाॅन में आए जब ज्यादातर मेहमान आ चुके थे और...

"मेहमान आ गए थे तो क्या हुआ---" तुम्हें बताना चाहिए था ।"'

“हकीकत ये है सर कि मैंने वारदात को इतनी इंपोटेंस नहीं दी थी । सोचा था...कुछ मनचले लड़कों की नजर खूबसूरत लडकी पर पडी, उनके मन डोले । रेप की नीयत से किडनेप करने की कोशिश कर रहे थे कि हम पहुच गए । मेंने गाडी का नंबर नोट कर लिया था । लड़की का एड्रेस भी था । सोचा था, खोज निकालूंगा लेकिन...

"लेकिन ।” शफ्फाक शाही गुर्राया ।

"कोशिश कर … कर हू सर । " अली का लहजा ऐसा था जैसे आत्महत्या कर रहा हो…"सब बेकार । उस नंबरों की कोई गाडी रजिस्टर्ड नहीं और न ही आरती वहा रहती हे जहां उसने...

"अ.... आरती !" शफ्फाक की जीभ मानो अंगारे से टच हो गई ।

हैदर अली तुरंत बोला…"क्या आप उसे जानते हैं ?”

“प पागल हुए हो क्या ?" शफ्फाक शाही की हालत ऐसी हो गई जेसे किसी ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया हो…“भ....... भला मैं किसी आरती क्रो क्या जानूं?"

"आपके रिएक्शन से मुझे ऐसा ही लगा सर। ”

"बकवास मत करो ।" उसने अपने चेहरे पर उभरने वाले पसीने को बडी मुश्किल से रोका था…"और फिर क्या ज़रूरी है कि उसका नाम आरती ही हो ?'

"कोई जरूरी नहीं हे सर ।"'

"साफ जाहिर है कि वो सब तुम्हें मूर्ख बनाने के लिए किया गया था और तुम बने । उन्होंने आतिशबाजी का डिब्बा चेंज कर दिया और तुम इसे साधारण वारदात समझते रहे ।”

"गलती हो गई सर ।" हेदर अली रोने को तेयार था…"मैं नहीं जान सका कि डिब्बा उन्होंने कब और कैसे चेंज कर दिया ?'

"मुझे नहीं पता था हैदर अली कि तुम इतने बड़े गधे हो ।" हैदर ने गर्दन झुका ली जबकि शफ्फाक शाही का चेहरा ऐसा नजर आ रहा था जैसे जिस्म से सारा खून निचोड लिया गया हो।।।

¶¶¶¶¶¶

¶¶¶¶¶¶

14

"तूजानती है आरती कि मुझे किसी बेगुनाह पर हमला किया जाना पसंद नहीं हे । " जावेद कश्मीरी ने वीडियो गेम खेलने में मस्त वारिस खान की तरफ बढते हुए कहा था-""और इस मासूम का तो किसी भी मामले से कोइ संबंध ही नहीं हे ।"'

"क्यों?? भूल गया शफ्फाक शाही ने क्या किया था !"।

"' आरती । ""

“चाचा चाची क्रो तोढ़ने के लिए तेरा इस्तेमाल किया था उस दरिदे ने । तुझे हथकडी और वेडियां लगाकर लाया था वो ।'"

"मगर मै वेसा नहीं कर सकता ।”

"'पापा, समझाओ इसे । " आरती मूंढे पर बेठे एक अधेड शख्स से मुखातिब हुई थी…"तुम्हारे इस घोंचूराम को तो अभी तक ये भी नहीं मालूम कि मुहब्बत और जंग में सब जायज होता हे ।"'

"मैं कई बार देख चुका हू। " गिरधर पांडे नाम कै अधेड ने हंसते हुए कहा था…"जो तुम दोनों के बीच बोले वह महामूर्ख ।”

“यानी मेरे पापा होकर भी तुम मेरे साथ नहीं हो?”

"इस बेवकूफी में कोन हो सकता हे तेरे साथ में ?" इस बार पुन: जावेद ने भड़के हुए अंदाज में कहा था…"वारिस जैसे मासूम को उसके मां बाप से जुदा करना...

"अबे जरा देख तो उसकी तरफ ! ध्यान तो दे उस पर !” जावेद की बात काटकर आरती कहती चली गई…"मां बाप से बिछुड़ने कीकोइ शिकन हे उसके चेहरे पर गेम खेलने में मस्त है । उसका तो इस पर भी ध्यान नहीं हे कि हम उसके बारे में बातें कर रहे हैँ ।'"

“बहला जो रखा है तूने, पांच साल के बच्चे की साइक्लोजी का फायदा जो उठा रही हे। ” जावेद नाराजगी भरे अंदाज़ में कहता चला गया…"उस बेचारे को तूने वीडियो गेम पकड़ाया ओर वो मस्त हो गया । उसे तो यह भी नहीं मालूम कि किडनेप होता क्या है। "

"तुझे कितनी बार समझाऊं घोंचूराम कि हम इसे किसी तरह का नुकसान पहुंचाने वाले नहीँ हैं ।'"

"फिर क्यों उठाया है ओर...

" और ? ""

"वहा। " छोडी गईं पर्ची पर मेरा नाम क्यों लिखा ?’

“आज की डेट में पाकिस्तान में तेरे नाम का डंका बज रहा है यार, उसे पढकर सबके चेहरों पर बारह बज गए होंगे और शफ्फाक शाही की तो हवा शंट हो गई होगी ।"

"तो मेरे नाम का इस्तेमाल तूने उन्हें दहशतज़दा करने के लिए किया ! इसलिए किया ताकि.. .

"तू ओर मै क्या अलग हैं !'"

" मतलब ? "

"काम तूने किया या मेने, बात तो एक ही हुई ।'"

"बिल्कुल नहीँ हुइ । गिरधर चाचा समझाओ अपनी बेटी क्रो । " इस बार जावेद ने मूंढे पर बैठे अधेड से कहा था…“मैं किसी पांच साल के बच्व क्रो किडनेप नहीँ कर सकता । यह सब करने से पहले मुझसे तो पूछा तक नहीं था इसने ।'"
 
गिरधर के होठौं पर मुस्कान नाच रही थी । यह मुस्कान जावेद आर आरती के बीच चल रही उस नोंक झोंक के कारण थी जो उसके लिए जरा भी नइ न थी बल्कि यदि यह कहा जाए तो गलत न होगा कि उनके बीच होने वाली इस नोंक झोंक की उसे आदत पढ़ गई थी । बोला…"कुछ भी कह जावेद, आरती ने यह सब किया तो तेरी ही खातिर है । आखिर शफ्फाक शाही तक पहुचने के लिए. ..

" अपने किसी भी शिकार तक पहुंचने के लिए ऐसा कोई रास्ता इस्तेमाल करना पसंद नहीं है चाचा । " गिरधर की बात पूरी से पहले ही जावेद कह उठा…"मेरा बिश्वास शिकार पर सीधा हमला करने मे हे । यूंघुमाकर कान पकडना...

“सीधा हमला करने मे विश्वास है तो बैठा रह हाथ पर हाथ रखे। ” आरती ने उसकी बात पूरी न होने दी-“उस तक पहुंचने के लिए यदि मेंने एक छोटी सी चाल चल दी तो तुझे क्या एतराज हे ?"

"पहली बात, मुझे तेरी मदद की जरूरत नहीं हे । दूसरी बात, ऐसी चालें पसंद नहीं हैं ।'"

"जानती हूं तुझे क्या पसंद हे । "' आरती ने ताना सा मारा…“ काम नाजनीन ने किया होता तो तुझे पसंद आ जाता।। ”

15

नाजनीन का नाम आते ही जावेद को जाने क्या हुआ कि कुछ कहते-कहते जहां का तहां रुक गया वह ।

मुंह खुला का खुला रह गया था । चेहरे पर उदासी और आंखों में वीरानियां नजर आने लगीं ।

"आरती ।" गिरधर ने उसे डांटा…“क्रितनी बार कहा हैं तुझसे ! जावेद को नाजनीन की याद न दिलाया कर ।”

“और मैं कितनी बार कहूंकि ये कब तक उसकी यादों की माला अपने गले में डाले घूमता रहेगा। मेरी तरफ क्यों नहीं देखता ! ये क्यों नहीं सोचत्ता कि इस दुनिया मेँ जहां और भी हें ।”

एकाएक जावेद वेहद भावुक नजर आने लगा था'…""आरती, नाजनीन की जगह मैं किसी क्रो नहीं दे सकता ।”

"अब तो उसकी जगह कौन मांग रहा हे गधे ! तेरे दिल के ड्राइंग रूम में क्या एक ही सींट पडी थी जिस पर नाजनीन आ बैठी और किस्सा खत्म ! ड्राइंगरूम मे ओर कुर्सियां भी पडी हाती हे बल्कि पूरा सोफा पड़ा रहता । समझ ले मै उसी पर विराजमान हो गईं हूंओर अब उठने बाली नहीँ हूइस सोफे से ।"

जावेद आरती की तरफ देखता रह गया था । कुछ ऐसे अंदाज में जैसे बहुत कुछ कहना चाहता हो मगर कुछ न कह पा रहा हो ।।

फिर गिरधर से बोला…"चाचा, दिल को ड्राइंगरूम समझने वाली इस बेवकूफ लड़की को समझाते क्यों नहीं ?”

“मेरी तो समझ में नहीं आता जावेद वेटे कि किसे समझाऊं ! तुझे. ..या इसे !"" गिरधर भी भावुक नज़र आने लगा'…"" मानने वाला न तूहे, न आरती । मैं महसूस कर रहा हूंकि तुम दानों के बीच कुछ रिश्ता ही ऐसा जुढ़ गया है । देखा जाए तो हम.....लोगों के बीच संबंध ही क्या है ! सिर्फ पडोसी का । तुम्हारे वालिद के पडोस मे रहते थे हम । फिर तुम इंडिया से पाकिस्तान आ गए । शौकत अंसारी क घर में जेसे बहार आ गई थी और वही बहार हमारे घर में भी आ गई । जो आरती कभी किसी से बात तक न करती थी । जिस आरती के बारे में लोग यह कहा करते थे कि पता नहीं इसके मुंह में जुबान भी हे या नहीं, वह तुमसे पटर पटर बोलने लगी । ठीक वेसे, जैसे इस वक्त बोल रही है । दोनों घर एक ही थे ओर फिर, वह होलनाक हादसा हुआ ।"' गिरधर की आंखों मेँ जाने कौन से मंज़र को याद करके खोफ कै साए लहराते नजर आए…"उस होलनाक हादसे के छींटे हमारे घर में भी आ गिरे । तब से हम सबकी मंजिल एक हो गई । हम हिंदूहें बेटे, तुम मुसलमान । इसके बावजूद...

"चुप हो जाओ चाचा, चुप हो जाओ । " जावेद इतनी वुरी तरह चीख पड़ा था जेसे अचानक किसी ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो…"आप जानते है कि न मुझे अपने मुसलमान होनेपर फख्र है, न आपके हिदुं होने पर एतराज । धर्म और जातियों में हमने बांटा है खुद को । खुदा ने तो बस इंसान पेदा किए थे । उन्हीं इंसानों में से कुछ ने खुद को शेतान में बदल लिया । वे शेतान शिवालकर, अविनाश, गजेंद्र भी हो सकते है ओर इकरामुद्दीन, गुलहसन, हाजी गल्ला तथा शफ्फाक शाही भी ।"

आरती ने तपाक् से कहा…"और उन शैतानों का सफाया करना हम इंसानों का फर्ज हे।। ”

"' फिर ब्रीच मे बाली !'"

" बीच' मै कहां। त्तेरी बात खत्म होने कै बाद बोली हू ।"

"वारिस क्रो वहीं पहुंचाकर आ जहां से लेकर आई है । इसके बाप से मैँ अपनी तरीके से निपटूंगा ।"

"फिर कर दी न घोंचूपने वाली बात ! लाते वक्त तो पकडी न गई । वापस पहुंचाते वक्त ज़रूर पकडी जाऊंगी ।"

"और वो कौन थे जिनके वेस पर ये सारा नाटक किया?"

"ऐसे किराए के टटू इस्तामाबाद मेँ टके कै भाव मिलते हैं जो हर वह काम करेगें जो तूकहेगा और साथ ही यह जानने की कोशिश भी नहीं करेंगे कि आखिर हे कौन ।"

“यानी टोटे ओर उसके आदमी तुझे नहीं जानते। "

“उतना ही जानते हें जितना हेदर अली जानता...

“जो कुछ आरती ने किया हे, सहमत तो मैं भी नहीं हू उससे ।" एक बार फिर गिरधर पांडे ने आरती की बात बीच में काटी और फिर जावेद क्रो समझाने वाले लहजे में बोला'-"लेकिन जावेद, जब इसने यह सब कर ही दिया हे तो क्यों न वह किया जाए जिसके लिए किया हे, जो यह चाहती है !'"

“क्या चाहती है ये ?”

"फोन मिला शफ्फाक शाही को ।” आरती ने एक बार फिर तपाक से कहा और एक कागज जावेद की तरफ बढाती बोली…“ये रहा उसका नंबर । जो मैं पढ़ाऊं…वो बोल ।"

जावेद उसकी तरफ देखता रह गया ।

आरती ने आंख मारी ।

¶¶¶¶¶

¶¶¶¶¶
 
Back
Top