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चलते पुर्जे ( विजय विकास सीरीज़ )

इतना तो बिजय समझ गया था कि यकीनन वे किसी खतरनाक प्लान पर काम कर रहे है लेकिन यह नहीँ समझ पा रहा था कि वह प्लान क्या है । ऐसा प्लान जो हमेशा के लिए उन्हें केवल उसी से नहीं बल्कि पूरी इंडियन सीक्रेट सर्विस से निजात दिला देगा । उसी क्रो समझने के लिए, उन्हें उकसाने की मंशा से बोला-'"इसका मतलब तो ये हुआ वागड़विल्लो कि तुम्हें अपने मुल्क क्री इज्जत का जरा भी ख्याल नहीं है । एक बार भी तुमने ये नहीं सोचा कि हमारे गायब होने पर तुम्हारा मुल्क दुनिया क्रो क्या जवाब देगा।। "

"हमने खूब सोचा है गुरुदेव बल्कि घोट घोटकर इस सवाल क्रो पिया है और फिर ऐसा हल निकाला है कि ये दुनिया साली हमारे मुल्क से वह सवाल करेगी ही नहीं जिसके बूते पर सवार होकर आप हमारी लिमोजीन में आ बेठे ।"'

"भला दुनिया क्रो सवाल करने से कैसे रोक लोगे तुम?"

“रोक लेंगें । बूता है हममें ।'"

"बूता नहीं, खोपडी है। " तुगलक बीला…"वो खोपडी है जिससे ऐसी तरकीब निकलकर आईं है कि दुनिया साली वो सवाल ही न करे जो उसे करना चाहिए और. ..तुममें वो खोपड़ा नहीं है, तभी तो हमारे जाल में आ फंसे। मगर हम तुम्हें समझने का मोका जरूर देंगे । जब तुम्हारी समझ में हमारी पूरी आईसक्रीम आएगी तो हमारा दावा है…खुद ही अपनी खोपडी को फाढ़ लोगे ।"

"तो मियां, दो न हमें अपनी खोपडी फाड़ने का मोका। "

"देते हैँ हुजूरेआला । इतने उतावले क्यों हो रहे हो। " कहने के साथ वह एक दीवार की तरफ बढा था ।

नुसरत बोला…“वेसे भी, आपको यहां नहीं रखा जाएगा। यहां तो सिर्फ मंत्री महोदय से मिलाने लाया गया था। आपको तो यहा से भी शानदार जगह पर रखा जाएगा। " नुसरत का सेटैस खत्म होते होते तुगलक उस दीवार कै करीब पहुंच गया था जिसकी तरफ बढा था ।

फिर, उसने स्टील की दीवार पर एक खास अंदाज़ में तबला सा बजाया ।

परिणाम स्वरूप-हल्की सी गड़गड़ाहट के साथ दीवार मेँ तीन बाइ छ: का दरवाजा उत्पन्न हों गया ।

दरवाजे के बीच खडे होकर तुगलक ने ऐसा एक्शन करते हुए कहा जेसे फाइव स्टार होटल का दरबान करता है---"आइए हुजूर, आपके दौलतखाने में आपका इस्तकवाल हैं। "

विजय और उसके साथ नुसरत भी दरवाजा पार करके दूसरी तरफ पहुच गए।

नौशाद ने भी जब वेसा करना चाहा तो तुगलक ने उसे दरवाजे से पहले ही राकते हुए कहा …"तुम नहीं ।"

नौशाद अंसारी जहा' का तहां रुक गया।

अगले पल तुगलक भी दरवाजे के उस तरफ चला गया, साथ ही…दरवाजा बंद हो गया।

दीवार पहले जैसी नजर आने लगी । विजय ने देखा…इस वक्त वे तीस बाइ तीस के एक हाल में थे ओर उसके ठीक सामने एक ऐसा शख्स खड़ा था जिसकी कल्पना वह इस स्थान पर पहले ही कर चुका था।

वह किसी भी तरह छ: फुट दो इंच से कम न था । उसक पहाड जैसे बलिष्ट जिस्म पर ब्राऊन रंग का पठानी सूट था।

चेहरा अत्यंत चौडा।

मोटे मोटे होंठ ।

लंबी नाक और

जरूरत से ज्यादा बाहर को निकली हुईं ठोडी। मस्तक बहुत चोड़ा था।

पीछे की तरफ को कढे हुए लंबे बाल । लाल सुर्ख और गोलमटोल आंखे।

उसे विजय ही क्या, दुनिया के ज्यादातर लोग पहचानते थे ।

हाजी गल्ला था वह । तालिबानियों का सरदार ।

वह…जिसे किसी समय इंडियन गर्वमेंट इसलिए तिहाढ़ जेल से रिहा करने पर मजबूर हो गई थी क्योकिं उसके साथियों ने इंडिया का यात्रियों से भरा एक विमान किडनैप कर लिया था ।

तुगलक ने कहा -"इनसे मिलिए हुजूर, इन्हें...

"जनाब हाजी गल्ला कहते हैं ।" बात विजय ने पूरी की ।

"कमाल की बात है गुरुदेव आप तो इन्हें पहचानते हैं ।" नुसरत ने कहा -"अब तो शायद यह बताने की ज़रूरत भी नहीं रही कि कुतुबमीनार जेसी यह इमारत इन्हीं के लिए बनवाई गइ है ।"

"जो आग से खेलते हैं नुसरत मियां ।" जाने किस मूड में विजय ने शायराना अंदाज़ में कहा था…"वे एक दिन राख हो जाते ।"

"इस नई झकझकी का मतलब क्या हुआ हुजूर ?'"

"आतंकवादियों के इस सरगना को अपने मुल्क में तुम इसलिए पनाह दिए हुए हो कि इसके बूते पर एक दिन हिंदुस्तान में धूल उड़ा दोगे मगर याद रखना-पाकिस्तान जलाकर ये ही खाक करेगा ।"

बड़े ही अजीब ढंग से हंसा था हाजी गल्ला ।

बोला…"पाक की फिक्र बाद में करना मिस्टर बिजय, फिलहाल अपने मुल्क की ओर उससे भी ज्यादा खुद अपनी फिक्र करी ।”

"मतलब? ”

"इन हजरात से मिलो ।" कहने के साथ तुगलक ने हाल में नजर आने वाली स्टील की सीढियों की तरफ इशारा किया था-"शायद आपकी समधन में कुछ आ सके !"

विजय ने उधर देखा…जिस शख्स पर नजर पडी, उसे देखकर बुरी तरह चोंका ।

पलक झपकते ही उसकी समझ में नुसरत तुगलक का पूरा प्लान आ गया था और...प्लान समझते ही दिमाग हवा हवाइ हो गया था । मानना पडा…नमूने वाकई चलते पुर्जे थे।

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खट.. .खट. ..खट । बारिश की जोरदार आवाज क्रो चीरकर यह आवाज दूर दूर तक गूंजती चली गई थी । यहां तक कि सोईं हुई खालिदा के कानों को भी बेंध गई । बिस्तर पर लेटे ही लेटे उसने आंखें खोल ली और इस वक्त यह जानने की कोशिश कर रही थी कि जो आवाज उसने सुनी थी वह उसका वहम तो न थी बाहर पड़ रही जोरदार बारिश की आवाज निरंतर कानों में आ रही थी मगर कान उस आवाज को सुनने कै लिए सजग थे जिसने उसके ख्याल से उसकी नींद में खलल डाला था ।

आवाज पुन: उभरी…खट...खट...खट ! खालिदा यूं बिस्तर से उछल पडी जेसे अचानक बिच्छू ने काट लिया हो और फिर बगल में सो रहे शौकत अंसारी का कंधा पकडकर झंझोढ़ती हुई बोली…"अजी उठो । देखो...दरवाजे पर कोइ है ।"

"कैसी बात करती ही खालिदा। " शौकत अंसारी के मुंह से नींद में अलसाई आवाज निकली-“इतनी अंधेरी और तूफानी रात में भला कौन ही सकता है ! तुम्हें वहम हुआ होगा । सो जाओ ।"

तभी, जोर से बिजली कड़कड़ाइ । ओर वह कड़कड़ाहट बंद खिडकी के कांच को बेंधकर कमरे में पलभर कै लिए तीव्र रोशनी फैलाने के बाद पुन: लुप्त हो गई ।

आवाज पुन: उभरी-खट...खट...खट "अरे ।" इस बार चोंककर शोकत अंसारी बिस्तर पर उठकर बैठ गया…"ये तो हमारे दरवाजे की सांकल की आवाज़ हे ।”

"व वही तो कह रही हू' ।" खालिदा की आवाज कांप रही थी ।

शोकत कै मुह से निकला-"कोन हो सकता है इस वक्त?"

"क कहीँ.... 'वे ही' तो नहीं हैँ। ” अब...किसी आशंका से खालिदा की आवाज बुरी तरह कांप रही थी ।

"वको मत। " शौकत बुरी तरह भन्ना गया…"तुम्हें तो "उन्हीं", के सपने डराने लगे हैं। "

"और इतनी रात गए कौन हो सकता हे ?"

शौकत के पास जवाब न था ।

सांकल बजने की आवाज़ एक बार फिर आईं ।

इस बार खालिदा सहमकर उससे लिपट गइ थी और. ..शौकत ने महसूस किया कि खौफ के कारण वह थरथर कांप रही थी ।

शंका तो उसे भी हुइ कि "वे ही' हो सकते हैं और...हक़ीक़त येहे कि इस शंका ने उसके भी मुकम्मल जिस्म में मोत की सिहरन दोड़ा दी थी मगर खुद को संभालने की काशिश करता बोला…"खुद को संभालो खालिदा, तुम डर रही हो । वे इतनी रात को क्यों आएंगे । वे दो दिन का टाइम देकर गए हैँ ।"

खालिदा की जुबान तालूसे जा चिपकी थी ।

"गिरधर की कोइ प्राबलम होगी ।" शौकत यह कहता बिस्तर से उतर गया था । हालांकि कमरे में अंधेरा था मगर कमरा क्योकि उन्हीं का था इसलिए अंधेरे ही मेँ तेजी से दीवार के उस हिस्से की तरफ बढा जहा' इलेबिटक बोर्ड था ।

वह स्विच आन किया जिससे कमरे में रोशनी हो जानी चाहिए थी मगर नहीं हुइ ।

खालिदा बाली…"ए ऐसे तूफानी मौसम में क्या लाइट होती है। अब तो कइ दिन बाद आएगी ।”

"मैं देखता हू ।” उसने कहा ही था कि बेडरूम के दरवाजे पर दस्तक हुई । साथ ही आवाज उभरी-"शौकत भाई ।'"

“क्या हुआ किबला?" ऊंची आवाज में पूछने के साथ शौकत तेजी से दरवाजे की तरफ बढा था ।

किबला की आवाज…"मेनगेट पर क्रोइ है। '"

"हां । हमने भी सांकल की आवाज सुन ली है ।" कहने के साथ शौकत ने दरवाजा खोल दिया ।

सामने किबला खडा था ।

उसके एक हाथ में लालटेन और दूसरे में लाठी थी।

एक बार फिर सांकल बजने की आवाज़ आइ ।

"आओ मेरे साथ...रोशनी दिखाओ ।"' कहता हुआ शौकत तेजी से दरवाजा पार करके गेलरी में पहुंच गया था ।

"ये लाठी ले लो भाइ जान ।" उसके पीछे लपकत किबला ने कहा था…“नीचे रखी है । मैं दूसरी ले लूगा ।”

"ल लाठी क्यों ?' शौकत ठिठका ।

“ऐसी तूफानी और अंधेरी रात में उनके अलावा और कोई हो ही नहीं सकता ओर अगर वे इस वक्त आए होंगे तो किसी अच्छे इरादे से नहीं आए होंगे । हमेँ उनका मुकाबला करना होगा। "

जो शंका खालिदा ने व्यक्त की थी, वही किबला ने भी कर दी और.. किसी न किसी हद तक वहीँ शंका खुद शौकत के दिलो दिमाग में भी थी, शायद इसीलिए वह झुंझला उठा…"तुम सब पागल हो गए हो। उनकें अलावा तुम्हारे दिमाग में कोई घुस ही नहीँ रहा है । इतनी रात गए वे क्यों आएंगे ?"

"आज दिन मेँ उनके तेवर अच्छे नहीं थे अब्बू ।" ऐसा कहती हुइ सुरैया अपने कमरे से निकलकर गैलरी में आइ थी ।

"त तुम भी।। तुम सबका दिमाग खराब हो गया है ।"

अगर यह लिखा जाए तो गलत न होगा कि शौकत अंसारी उस बक्त खौफ की ज्यादती के कारण चीख पड़ा था…"ऐसा क्या था उनक तेवरों में। गिरधर को भी तो कोई प्राबलम हो सकती हे !"'

"फिर भी, लाठी हाथ मेँ लेने में कोइ बुराई नहीं हे ।" किबला ने समझाने वाले लहजे में कहा ।

"लाओ .' इसी से तुम्हारी तसल्ली होगी तो...लाओ ।" तेज आवाज़ में कहने के साथ उसने किबला से लाठी लगभग छीनी फिर तेजी से गेलरी के उस हिस्से की तरफ बढ गया जहां से शुरू होकर 'जेड' के आकार की सीढियां नीचे लाबी तक चली गई।।

"अरे . .अरे ! मुझे तो आने दीजिए ।” लालटेन हाथ में लिए किवला उसके पीछे लगभग दोड़ा था"सीढियों पर अंधेरा है ।"

सीढियों के सिरे पर शौकत खुद ही ठिठका ओर पलटकर अपने पीछे आ रही खालिदा ओर सुरैया से बोला…"कहां चली आ रही हो ? तुम दोनों यहीँ रहोगी । नीचे नहीं आओगी।'"

खालिदा ने कुछ कहने कै लिए मुंह खोला लेकिन शौकत अंसारी उसे कोई मौका दिए बगैर सीढियां उतरता चला गया क्योंकि एक बार फिर सांकल बजाइ गइ ।

किवला उसके पीछे लपक रहा था।

सीढियों के निचले सिरे से टिकी एक लाठी खडी थी । किबला ने उसे अपने दूसरे हाथ में ले लिया । अब वह किसी भी किस्म के खतरे से टकराने के लिए तेयार नजर आ रहा था ।

खालिदा ओर सुरेया नीचे भले ही न आई हों मगर सीढियों कै उस स्थान तक जरूर उतर आईं थीं जहां उन्होने 'जेड' बनाया हुआ था । वहां से मेनगेट को देखा जा सकता था ।

सांकल फिर बजाई गई ।

"क कौन है। " जोर से बोलते वक्त शौकत ने अपनी आवाज़ के कंपन को छुपाने को भरपूर कोशिश की थी ।

"मैं हूअब्बा। ” आवाज आइ-"जावेद ।"'

"ज जावेद। ." यह चीख अकेले शौकत के नहीँ बल्कि किबला, खालिदा और सुरैया कै हलकों से भी निकली थी ।

किसी ने कल्पना तक न की थी कि दरवाजे के उस तरफ जावेद हो सकता है । उनका बेटा…जावेद ।

शौकत अंसारी ने बगैर सोचे समझे एक झटके से दरवाजा खोल दिया । बारिश की तेज फुहारें क्षण भर में उसे पूरा भिगो गई ।

मगर उस वक्त, उस बात की उसे ज़रा भी परवाह न थी ।

वह बाहर छाए अंधकार में खडी वारिश में भीग रही एक परछाई को देख रहा था ।

खालिदा और सुरैया तेजी से सीढियां उतरती हुइ न केवल लाबी मेँ बल्कि शौकत और किवला कै करीब आ गइ थीं ।
 
किबला आगंतुक का चेहरा देखने के लिए लालटेन हाथ में लिए आगे बढा लेकिन उससे पहले ही आकाशीय बिजली ने जोरदार गढ़गड़ाहट के साथ पल भर के लिए ही सही मगर पूरे माहौल क्रो चकाचौंध कर दिया था और...उन सबकें लिए वह एक पल ही काफी था । सभी के मुंह से एकसाथ निकला-"जावेद !"

"में हो हूअब्बा ।" उसकी आवाज थकी हुई थी ।

"अरे तो बाहर क्यों खडा है ! अंदर आ ।" कहने कै साथ शौकत ने उसे खींचकर अपनी बांहों में भर लिया था ।

सभी हतप्रभ थे ।

आंखों के सामने देखने के बावजूद किसी को यकीन न आ रहा था कि वह जावेद ही है क्योंकि वह तो हिंदुस्तान मेँ था ।

भला इस तरह इधर कैसे आ सकता हे ?

मगर, वह जावेद ही था…यह यकीन आते ही सुरैया 'भैया' कहती हुई उसकी तरफ लपकी थी ।

खालिदा ने 'मेरा बेटा’ कहकर लिपटा लिया उसे ।

हाथ में लालटेन तिए किबला र्किकर्त्तव्यबिमूढ़ सा खडा रह गया था ।

कुछ देर बाद, शौकत अंसारी को होश आया तो बोला …'"खड़ा देख क्या रहा हे किबला ? देखता नहीँ कितनी ठंडी हवा हे ! वारिश की बूंदें अंदर तक आ रही हैं । दरवाजा बंद कर ।"

किबला ने यंत्रचत्तित अंदाज मेँ दरवाजा बंद किया ।

"तूऐसी कहरभरी रात में हिंदुस्तान से पाकिस्तान कैसे आ गया बेटे ?" शौकत कै मुंह से ये शब्द स्वत: फूटे थे ।

"आना पड़ा अब्बा, आपने ठीक कहा था । बात मेरी ही समझ में देर से आइ ।" जावेद जजवाती लहजे मेँ कहता चला गया…"वह मुल्क हम मुसलमानों के लिए नहीं है । मुझे उसी वक्त आपके साथ आ जाना चाहिए था । हमारा मुल्क यही हैँ…पाकिस्तान । मैं हमेशा के लिए आ गया हू । अब यहीं रहूगा ।”

"ऐसा क्या हुआ बेटे ?'

"कैसी बातें कर रहे हैं आप ! " जावेद के कुछ भी कहने से पहले खालिदा बोल पडी थी…“देखते नहीं मेरे बच्चे की क्या हालत है ! सर्दी से बुरी तरह कांप रहा है ये । वे बातें बाद में ही जाएंगी । पहले कपड़े तो बदलवाओ । जिस्म क्रो गर्मी देने के लिए कुछ करो ।"

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उपरोक्त वृतांत बताने कै बाद किबला चुप हो गया । विकास और मोगली आखों में यह उम्मीद लिए उसकी तरफ देख रहे थे कि शायद वह आगे भी कुछ बोलेगा । जब नहीं बोला तो विकास ने पूछा…“उसके बाद?"

"खालिदा की बात सबको जमी थी । जावेद को शौकत कै कमरे मेँ भेज दिया गया ।

वह नहाया । शौकत भाई के कपडे पहने । इस बीच सबने मिलकर आतिशदान में आग जला दी थी ।”

"फिर ?'" मोगली ने पूछा ।

“हम सभी लोग आतिशदान के करीब बैठ गए । आग के सबसे करीब जावेद को बैठाया गया था । सुरैया सबके लिए चाय बना लाइ थी । चाय पीते शौकत ने पूछा…"अब बताओ, क्या हुआ वहां?"

जावेद ने बताया।।

"उसको दोहराने की जरूरत नहीं है ।" विकास बोला-"तुम जानते ही हो कि हम देवांश और अर्जुन हैं । उस नाते हिंदुस्तान में जो कुछ हुआ था, उसे जानते है । जावेद ने वही बताया होगा।"

मोगली ने कहा -"पर ये तो बताओ जावेद शाब यहां पहुचे कैशे थे? बहरहाल, बार्डर क्रास करना...

"शौकत ने पूछा था ।"' क्रिबला बोला …"जावेद ने बताया कि इसके लिए उसने अटारी बार्डर से चले एक ट्रक का इस्तेमाल किया था । बहुत से ट्रक थे जिनमें हिंदुस्तानी गेहुं इधर लाया जा रहा था । जावेद उन्हीं मं से एक में बोरियां कै बीच छुप गया था । दोनां बार्डर क्रास करते वक्त तो किसी की नजर न पडी पर पाकिस्तान के अंदर आने के बाद एक चकपोस्ट पर पाकिस्तानी सेनिकों द्वारा देख लिया गया और जब देख लिया गया तो भिड़त होनी ही थी । जावेद उनसे भिढ़ गया और बचता बचाता आगे बढा । पूरी कहानी सुनाने बैठ गया तो बहुत लंबी हो जाएगी, बस यूंसमझ लो कि अंतत: उस तूफानी रात में यहां पहुच ही गया।"'

"उसके बाद ? "

"सारी बातें सुनने के बाद शौकत अंसारी थोडा चिंतित नजर आने लगा था । बोला …"ये तो तुमने बिल्कुल ठीक किया जावेद कि समय रहते हवालात से भागकर इधर आ गए । वरना वे तुम्हें वाकइ फांसी पर चढा देते । इसके लिए हमेँ देवांश और अर्जुन का शुक्रिया अदा करना चाहिए लेकिन...

"लेकिन ?' जावेद के मुंह से निकला । साथ ही, हम सभी चेहरों पर सवालिया निशान लिए उसकी तरफ देखने लगे थे।

"तुम्हें कुछ दिन घर ही में छुपकर रहना होगा । गांव में भी किसी को पता न लग पाए कि तुम यहां हो ।”

"क्यों अब्बू?" सुंरेया ने पूछा ।

"क्योंकि यह अवैध तरीके से इधर आया है । " कहने के साथ उसने जावेद के चेहरे पर नज़रें गड़ा दी थीं…"तुम तो समझते ही होगे इस बात को । अगर यह बात फेली और पुलिस या सेना तक पहुंची तो वे लोग तुम्हें गिरफ्तार कर लेंगे ।"

"यह खतरा तो हमेशा के लिए है ।"

"'नहीँ, ज्यादा दिन तक मैं ये हालात नहीं रहने दूंगा । यहां की हुकूमत में रिश्वत खूब चलती है । जेसे भी होगा मैं उनसे कहूंगा कि मेरा वेटा पाकिस्तान आना चाहता है । पेसों कै लालच में वे कागजी कायंवाइ पूरी कर देंगे आर वह पूरी होने के बाद तुम्हें एक दिन वैध तरीके से इधर आया दिखा दिया जाएगा ।"'

“अगर ऐसा हो सकता हे तो यहीँ ठीक है ।"' जावेद ने कहा ।
 
"हो जाएगा ।"'

विकास ने पूछा…"तो क्या ऐसा हुआ?"

"उससे पहले तो बहुत कुछ हो गया ।" किबला ने कहा ।

"मतलब ? ”

"शोकत ने जावेद से यह कहकर कि-'तुम थके हुए होगे वेटे, जाकर सो जाओ ।' लाबी से भेज दिया और उसके जाने के बाद दबे स्वर में हम सबसे बोले…"ये मेरी तुम सबको सख्त हिदायत हे कि यहां जो भी कुछ चल रहा हे उसकी भनक जावेद क्रो न लग पाए । "'

“क्यों ?' सुरैया ने पूछा ।

"क्यों की बच्ची, क्या वह सब पता लगने कै बाद जावेद चुप बैठेगा ! हरगिज नहीं.. .और वह हरकत में आ गया तो हम पर दुसरी मुसीबतें पहाड़ बनकर टूट पडेगी । बता ही चुका हूं…जब तक वह वेध तरीके से इधर नहीं आ जाता तब तक छुपाकर रखना होगा। "'

"पर ऐसा हो केसे सकता है ?'" खालिदा ने पूछा ।

"कैसा ? "

"कि वह सब उससे छुपा रहे । वे लोग परसों आने को कह गए हे । उस वक्त जावेद घर ही में होगा । उनकी बातें सुनेगा तो?"

"कुछ तो करना ही पडेगा ।"' शौकत चिंता में डूब गया था ।

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सुबह के सात बजे थे । बारिश रुक चुकी थी । बारिश के बाद मौसम उमस भरा हो गया था। लाइट अभी तक न आई थी । लाबी मेँ बेठे शौकत, खालिदा, सुरैया ओर जावेद चाय पी रहे थे । किबला सफाइ मे लगा हुआ था कि किसी ने सांकल बजाई ।

सभी चौंके ।

नज़रें दरवाजे की तरफ उठ गई ।

वेहरों पर ऐसे भाव उभर आए थे जेसे रंगे हाथों पकड़े जाने वाले हों । खालिदा के मुह से तो निकल भी गया“कौन हो सकता है? "

59

शौकत अंसारी ने तिगढ़म भिड़ाने की जगह कठोर आवाज में पूछ ही लिया-"कौन? "

सबने पहचाना, आवाज गिरधर की थी-“दरवाजा खोल ।"'

"तुम लोग बैठो ।"' खालिदा बोली -"मैं टाल देती हू ।"'

""नहीँ, तुम तो जानती हो कि वह दरवाजे से टलने वाला नहीं है। आ गया है तो अंदर आकर ही मानेगा ।” शौकत ने जावेद की तरफ़ देखते हुए कहा…"तुम थोडी देर कै लिए ऊपर चले जाओ बेटे, मेँ उसे जल्दी ही टाल दूंगा ।"

जावेद ने वगैर कुछ कहे उमस के कारण चेहरे पर आया पसीना पोंछा, उठा ओर सीढियां चढता चला गया ।

इस बीच गिरधर की आवाज आ चुकी थी…"अबे क्या हुआ ?'

"खोलता हू बाबा, सिर पर क्यों सवार हुआ जा रहा है !'" कहने के साथ शौकत उठा और दरवाजे की तरफ बढ़ गया ।

हालांकि कोइ कारण न था मगर चोर का दिल चोर का ही होता है । इस आशंका से सभी की धडकनें तेज़ हो गई थीं कि कहीं गिरधर को जावेद के बारे में पता न लग जाए ।

शौकत ने दरवाजा खोला ।

"बडी देर लगाइ दरवाजा खोलने में अच्छा...तो मर्निग टी पी जा रही है ।" कहने कै साथ गिरधर पूरी बेबाकी से यह परवाह किए बगैर डायनिंग टेबल की तरफ बढ गया कि शौकत अंदर बुलाना भी चाहता था या नहीं…"एक चाय ओर बना किबला भाइ । "

"क्यों ? " शौकत ने कहा…"तेरे घर चाय नहीं बनी क्या ? "

"ये तो दिल तोढ़ने वाली बात कर दी शौकत तूने। " गिरधर ने मुस्कराकर कहा था…"ये घर क्या मेरा नहीं हे?”

"हां हा । आप ही का घर है गिरधर भाई ।" खालिदा ने बात संभाली-"ये तो मजाक कर रहे हैं ।"

"मैं जानता हूंये मजाक कर रहा है । इसकी तो आदत है मजाक करने की । इस बात को क्रिबला भी समझता है, तभी तो देखो, किचन की तरफ चल दिया। " कहने के साथ वह उसी चेयर पर बैठ गया था जिससे जावेद उठकर गया था और...तभी, शौकत की नज़र उस चेयर के ठीक सामने मेज़ पर रखे जावेद के मग पर पडी ।

उसमें आधा मग चाय वाकी थी ।

शौकत कै दिल की धडकनें असामान्य गति से बढ गई । अगर गिरधर ने उस मग के बारे में पूछ लिया तो क्या ज़वाब देगा?

गिरधर की बगल वाली चेयर पर सुरैया बैठी थी । उसने जावेद का मग उठाने के लिए सुरेया क्रो इशारा किया मगर सुरैया इशारे का मतलब न समझ पाईं । जबकि गिरधर बोला…"अबे भंवें क्या मटका रहा है ? तबियत तो ठीक है तेरी?"

“ए ऐसे ही ।” शौकत सकपकाया-"रात ठंड लग गइ थी ।"'

"हां यार, रात ठंड कुछ ज्यादा ही हो गई थी और अब बारिश कै बाद उतनी ही उमस हो गई है । मेरे ख्याल से रात सीजन की सबसे तगडी बारिश थी और तूफान। वाप रे, जेसे पूरी कायनात क्रो अपने साथ उड़ा ले जाएगा । बाहर कितने पेढ़ टूटे पड़े है। "

"वाकई ।” शौकत ने हां में हां मिलाई-“कहर की रात थी ।'"

"कौन आया था ?" उसने सामान्य स्वर में पूछा था जबकि तीनों के दिमागों पर वह सवाल बिजली बनकर गिरा ।

हढ़वड़ाहट मेँ तीनों के मुंह से एकसाथ निकला-"क.... कब? ”

"रात। '"

"क कोई नहीं । " फिर तीनों ने कहा ।

"अरे ! तुम तीनों एकसाथ जवाब क्यों दे रहे हो ?” कहतेकहते उसने तीनों के चेहरे पढ़ लिए थे । इसलिए, आंखें थोडी सुकडी उसकी कहता चला गया…""और...अचानक तुम्हें क्या हो गया हे ? तीनों कें चहरे ऐसे क्यों लग रहे हैं जेसे खून निचोड गया हो? "

"ए ऐसी तो कोइ बात नहीं हे ।"

"कुछ तो है। "

"कहा न-कुछ नहीँ है ।"

"तो झूठ क्यों बोल रहा है ?"

"झ झूठ....? ”

"बता क्यों नहीं रहा ? कौन आया था?”

"क कहा तो है-कोइ नहीं ।"

"मैंने अपने कानों से सांकल की आवाज सुनी थी ।'"

"नशे में कान बज रहे होंगे तेरे ।” शौकत ने उसकी बात हंसी मेँ उड़ाने की कोशिश की-“मुझे मालूम है कि रात को तू...

“तुझे क्या ? सबको मालूम है कि रात को दो पेग लगाए बगेर मुझे नींद नहीं आती और शायद इसीलिए मैं सांकल की आवाज नहीं सुन पाया था । आरती ने सुनी । उसी ने मुझे झझोढ़कर जगाया और कहा कि…"देखो पापा, इस तूफानों रात में जाने कौन शौकत चाचा कं घर की सांकल बजा रहा हे । तब. ..मैंने भी सूनी ओर एक बार नहीं, कईं बार सुनी इतनी जोर से तूफान न चल रहा होता, बारिश न पढ़ रही होती तो में बाहर ही आ जाता और...जब सांकल बजे ही चली गइ तो बाहर आने भी वाला था कि सांकल बजनी बंद हो गइ । मैँ समझ गया कि तुमने गेट खोल दिया होगा । तब, यह सोचकर सो गया कि सुबह पूछ लूगा ओर आरती से भी सोने के लिए कहा । ”

"ओह..... अच्छा ! तूतब की बात कर रहा है !” शौकत ने यह सोचकर बात घुमाई कि अब इसके अलावा कोई चारा नहीँ है…“वो तो में आया था। ये सब गहरी नीदे में सो गए थे इसलिए इतनी बार सांकल बजानी पडी । बाद में मैंने इन सबको डांटा। "

यह सब कहने के बाद शौकत जब चुप हुआ तो उसने देखा कि गिरधर एकटक उसी की तरफ देख रहा था । एक बार भी पलक न झपक रहा था वह । उसके इस अंदाज़ में देखने के कारण शोकत के दिल पर घबराहट सवार हो गइ ओर फीकापन बनकर वह घबराहट उसके चेहरे पर भी नजर आने लगी ।

जब हद हो गई । गिरधर केवल उसे घूरता रहा । बोला कुछ नहीं तो अपनी घबराहट छुपाने के लिए उसे ही पूछना पड़ा"ए ऐसे क्या देख रहा हे?"

"तूदेख मेरे चेहरे को गोर से ।'" वह बोला…“और बता, क्या मैं तुझे मूर्खानंद नजर आता हू?”

"म मतलब ? "

"कुछ देर पहले तक इस बात पर अड़ा हुआ था कि सांकल बजी ही नहीं । नशे में मेरे कान बजे होंगे मगर जब लगा कि बच निकलने का कोइ रास्ता नहीँ है तो ये राग अलापने लगा कि उतनी रात गए तूआया था ओर...ये भी चाहता हे कि मैं इस बकवास पर यकीन कर लू! इसलिए पूछा, क्या में तुझे मूर्खानंद. ..

"खालिदा बताओ न इसे !” उसकी बात काटकर शौकत ने अपनी बला खालिदा पर टालने की कोशिश की-“बताओ न कि मैं ही आया था, और कोइ न था ।"

"ये ठीक कह रहे हैं भाईजान ।"

"और बिटिया तू! तूक्या कहती है?” गिरधर ने सुरैया से पूछा था…"क्या उतनी रात गए तेरे अब्बूही आए थे?"

"मुझे पता ही नहीं कि आप किस बारे मेँ बात कर रहे हैं ।'" वह साफ बच निकली-"मैं तो सो रही थी ।"

"इतनी सांकल बजने के बावजूद सोती रही ?'

"मैं सच बोल रही हू'चाचा ।"

"मुझे तो पूरा परिवार ही झूठ बोलता नजर आ रहा है ।'"

"तेरा दिमाग खराब हो गया है गिरधर, तूक्या इस परिवार से अलग है ! भला तुझसे झूठ क्यों बोलेंगे हम ? "

"वही तो सोच रहा हू ।”

"क्या सोच रहा है?"

"मुझे परिवार का मेंबर क्यों नहीं समझा जा रहा? ”

"तूगलत सोच रहा है ।"

"जब मैने पूछा कि रात कौन आया था, तब मेरे दिमाग में कुछ भी न था । एकदम सामान्य सवाल पूछा था मैंने क्योंकि रात सांकल की आवाज सुनी थी । उसके बाद…तुम तीनों की हड़बड़ाहट, निचुड़ चुकें से चेहरे । मेरे हर सवाल पर बौखलाहट और झूठ पर झूठ । इस सबका मतलब मेरी समझ में नहीं आ रहा ।"

"तुझे भ्रम हुआ हे । हम झूठ नहीं बोल रहे ।'"

"तू आया था उतनी रात गए? "

"हां । "'

"कहा से ? "

“करांची से ।"

"कब गया था वहा'?"

"रात नौ बजे । "'
 
"हां । ये जवाब तूने अच्छी तरह सोच समझकर दिया हे ।'" उसे घूरता हुआ गिरधर कहता चला गया…"तुझें याद है कि कल शाम सात बजे हम उस वक्त मिले थे जब तू कराची से आया था । याद न होता तो कह देता…तुझे तो मालूम ही है । अपनी बैंक की नौकरी बजाने रोज़ करांची जाता हूं । कल आने में लेट हो गया । मगर नहीँ, तूने ऐसा नहीं कहा । इसलिए नहीँ कहा क्योकि तुझे याद है कि सात बजे जब तूबैंक से लौटा था तो हम मिले थे । इसका मतलब ये हुआ कि तूबाद में सात बजे के बाद दोबारा कराची गया । "

"ह हा' । मैँ दोबारा ही गया था । "

"जान सकता हू! दोबारा किस काम से गया था ?'

"व वो बात ये हे कि. ..

“हां हा । सोच ले । अच्छी तरह सोचकर ज़वाब दे ।"

शौकत भन्ना गया-“तूतो यार पीछे ही पड़ गया। ”

“पीछे इसलिए पड गया हुंक्योंकि तूवो कर रहा है जिसकी मुझे ख्वाब तक में उम्मीद न थी ।”

"क क्या कर रहा हूमैं?"

"मुझसे कुछ छुपा रहा है ।”

"तुझसे आजतक कुछ छुपाया है जो अब छुपाऊंगा ! " भन्नाए हुए अंदाज में शोकत कहता चला गया…"तुझे तो मालूम ही है । वही हाइवे से लगी ज़मीन का चक्कर चल रहा है । चकबंदी आफिसर ने आफिस मेँ काम नहीं किया । रात दस बजे अपने घर बुलाया था । मैं समझ गया घर क्यों बुला रहा है । तूभी समझ गया होगा । वैंक से पांच बजे फ्री हो गया था । सोचा…रात कै दस बजे तक क्या करूंगा । इसलिए चला आया । नौ बजे फिर निकल गया । यहां से करांची हे ही कितनी दूर ! पोने दस बजे चकबंदी आफिसर के घर पर था । पांच लाख मांगे थे उसने । ढाइ में बात पट गई हे । साढे दस बजे वहां से निकला त्तो आंधी-तूफान ओर बारिश शुरू हो गई । उस सबकें रूकने का इंतजार करता रहा । जब रुकें ही नहीँ और रुकने के आसार भी नज़र न आ रहे थे तो निकल पड़ा ।”

"और रात दो बजे यहा पहुंचा ।” बात गिरधर ने पूरी की ।

"सांकल की आवाज तूने सुनी ही थी ।"

तभी, किबला एक मग में उसके लिए चाय ले आया । गिरधर ने उससे पूछा-"सांकल की आवाज़ ने तुम्हें जगा दिया था किबला भाइ या बिटिया की तरह सोते ही रह गए ?"

"दरवाजा तो मैंने ही खोला था ।"

"ओहा अच्छा ! शौकत साब ही थे न !”

"हा । " कहने के साथ किबला ने मग उसके सामने रखना चाहा तो उसकी नजर जावेद के मग पर पडी । यह सोचकर एक बार क्रो हाथ कांप गया उसका कि ये कितनी बडी गढ़बढ़ हुइ पडी हे मगर अगले ही पल उसने खुद को नियंत्रित किया । एक हाथ से जावेद के मग को उठाया और दूसरे से वहीं, दूसरा मग रख दिया ।

"बस शौकत...बस ! " ज़जबाती लहजे में कहता हुआ गिरधर एक झटके से उठ खडा हुआ-"अब न यहा बैठा जाएगा यार, न तेरे घर की चाय पी जाएगी । चलता हू ।"

"अरे कहा जा रहा है ?' शौकत बौखलाया ।

"अपने घर ।”

"ये तेरा घर नहीं है क्या?"

"नहीं हे.. नहीं हे...नहीँ हे । "' चीखने के साथ वह उनकी तरफ घूमा तो उसके चेहरे को देखकर चारों की रूह फ़ना हो गई । सुर्ख हुआ पड़ा था उसका चेहरा । जजबातों की आंधी चल रही थी उस पर ओर...सुर्ख आंखों में तैरते आंसूसाफ नजर आ रहे थे । किसी अघविक्षिप्त शख्स की तरह चीखता चला गया वह…“ओर ज्यादा बेवकूफ़ बनाने की कोशिश मत कर शौकत वरना मेरा कलेजा फट जाएगा । आजतक मैं बहुत बड़े भ्रम का शिकार रहा । न ये घर मेरा हे आर न ही मैं इसका मेंबर हू । यह एहसास मुझे तुझ अकेले ने कराया होता तो शायद सह जाता मगर यह एहसास एक ही झटके में तुम सबने करा दिया मुझे । उसने, जिसे मैने कभी भाभी जान नहीं कहा, हमेशा बहन कहा । उसने, जिसे मेंने कभी सुंरया नहीं कहा, हमेशा बिटिया कहा और इस किबला ने भी जो हमेशा मेरा भी उतना ही वफादार होने का दम भरता था जितना तेरा है । एक ही झटके में सबने आइना दिखा दिया दिया मुझें । "

"ऐसा कुछ भी नहीं है गिरधर भाई ।" खालिदा के चेहरे पर स्वाभाविक वेदना नजर आईं थी-"आप गलत समझ रहे हैं।"

"ऐसा नहीं है तो बताओ-अभीअभी क्रिबला ने मेरे सामने से जो मग हटाया हे…बो किसका है ?'

सब सन्न ।

जहनों में सन्नाटा ।

"झूठ मत बोलना ।" भावुक लहजे में उसने दांत भौंचकर कहा था-'"प्लीज़ झूठ मत बोलना । तुममें से किसी का भी एक और झूठ शायद मुझे मेरे घर तक भी न पहुंचने दे । न बताना हो तो बस चुप रह जाना । मैं समझ जाऊंगा...बल्कि समझ चुका हूकि रात यहा जो भी आया था, उसके वारे में सिर्फ इस घर के मेंबर जान सकते हें ।"

जी तो चाहा शौकत का कि उससे कहे"तू भी इस घर का मेंबर है । पर. . अभी भला जावेद के वारे में कैसे बताया जा सकता था ? इसलिए चुप ही रहा ओर...उनकी चुप्पी का अर्थ समझता हुआ गिरधर तेज कदमों के साथ दरवाजे की तरफ बढ़ गया ।

खालिदा ने पुकारा-"गिरधर भाई...

दरवाजे पर पहुंचकर वह ठिठका । धूमा और आंखों में आंसूलिए बोला-“गांव के वाकी लोग उस छोर पर रहते हैं । इस छोर पर जो था, वो मेरे ख्याल से एक ही घर था मगर आज़ तुमने बता दिया कि ये दो घर हें । एक हिंदू का, दूसरा मुसलमान का ।" कहने के बाद वह दरवाजा पार कर गया था । चारों इस तरह खड़े रह गए जेसे वह उन्हें दुनिया की सबसे बडी गाली दे गया ।

सन्नाटा छा गया था वहां । किसी के मुंह से बोल न फूटा ।

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फर्स्ट फ्लोर पर पहुचने के बाद जावेद को चैन न मिला । उमस कै कारण जिस्म बार वार पसीना उगल रहा था ।

उससे निजात पाने के लिए, यह सोचकर वह छत पर पहुंच गया कि खुले वातावरण में शायद राहत मिले और...हुआ भी ऐसा ही ।

छत पर हल्की हल्की हवा चल रही थी । पैरापिड वाल कै एक किनारे पर पहुंचकर दूर तक देखा ।

कुछ पेढ़ टूटे पड़े थे । मगर हर तरफ हरियाली छाईं थी । वारिश कै कारण पेड़ पौधे नहाए से लग रहे थे।

उस सबने आंखों को सुकून पहुंचाया । हरियाली के बाद छोटी छोटी पहाडियां नज़र आ रही थीं । कइ पहाडियों से छोटे छोटे झरने भी गिरते नजर आए ।

जावेद को बहुत अच्छा लगा । एक सिगरेट सुलगा ली उसने । दो या तीन कश ही ले पाया था कि किसी दरवाजे कै खुलने की आवाज सुनी । आवाज की दिशा में देखा तो थोडा सकपका गया ।

पडोस के मकान की छत का दरवाजा खुला था और नजर आइ थी परी जैसी एक लड़की ।

ऐसी, जिस पर एक बार नज़र पडी तो हटने का नाम ही न ले रही थी । उस लडकी को देखकर उसे अचानक ही नाज़नीन की याद आ गइ थी ।

उसी की तरह खूबसूरत थी वह । यह याद आते ही उसका दिल बैठने लगा कि नाज़नीन अब इस दुनिया में न थी ।

वह कहीं खोया सा पडोस की लडकी को देखे जा रहा था जबकि वह थी कि निरंतर उसे घूरे जा रही थी ।

जब काफी देर यही पोजीशन रही तो लडकी ने पूछा-"'कौन हे तू ? "

वह चौंका । बल्कि सकपकाया ।

मुंह से निकला-"म मैं ?"

'"हां, तेरी ही बात कर रही हूऔर घूर क्यों रहा है मुझे ?"

"म मैं घूर रहा हू! घूर तो तुम रही हो मुझे । "

"हा" घूर रही हू । इसलिए घूर रही हू क्योंकि शौकत चाचा की छत पर पहली बार किसी अजनबी को देखा है ।'" अचानक जावेद क्रो ख्याल आया कि किसी कै भी द्वारा उसे यहां देखा जाना ठीक न था । इसीलिए तो ऊपर भेजा गया था । पर अब क्या किया जा सकता था !

"बोल न? " वह बोली…"कोन है तू?"

"तुम्हें क्या ?" उसने टालने की कोशिश की…"अपना काम करो । मुझे अपना करने दो ।”

“यानी सिगरेट पीने दूं?"

“स सिगरेट ?" वह सकपकाया ।

“और नहीं तो क्या ! मैं क्या समझती नही' हूंकि तूयहां शौकत चाचा और खालिदा चाची से छुपकर सिगरेट पीने आया जावेद क्रो जवाब न सूझा ।

63

"तूवही है न जो रात आया था?”

"र रात?"

"जब बहुत तेज बारिश पढ़ रही थी । कहर बरपाने वाली आंधी आई हुईं धी । बारम्बार सांकल बजा रहा था । कहा से आया था।। "

उससे पीछा छुडाने का जावेद को एक ही रास्ता नज़र आया । रूखा व्यवहार करना । सो बोला-“तुमसे मतलब?"

“अरे वाह !” वह लिपटे ही जा रही थी…“मतलब क्यों नहीं हे ! क्या तुझे ये नहीं मालूम कि ये देखने में दो घर भले ही नज़र आए लेकिन असल में एक ही हैं और मुझे यह जानने का पूरा हक है कि तूहै कौन और इतनी तूफानी रात में कहां से आया था ।”

"मेरा दिमाग मत चाटो, जाओ यहां से ।”

"ऐ। किसे बोल रहा है जाने को? जानता भी है मैं कौन हूं?

"कौन हो?"

"आरती हू । गिरधर पांडे की बेटी । तूबता । तू कोन है ? '"

जावेद की हालत बडी अजीब हो गई । इतना तो वह समझ ही का था कि गड़बड़ हौ चुकी है मगर यह नहीं समझ पा रहा था कि इस गढ़बड़ को कैसे सुधारे । लड़की थी कि पीछा ही छोडने को तैयार न थी । जब कुछ और न सूझा तो सिगरेट का बचा हुआ टुकडा टेरेस से नीचे डाला और सीढियों की तरफ बढ गया ।

"ऐ ! जाता कहां हे ? तू क्या ये समझता है कि नहीं बताएगा तो मुझे कभी पता ही नहीँ लगेगा कि कौन है !" वह बेबाक अंदाज में जोर से बोली थी-“पापा,, शौकत चाचा से तेरे ही बारे मेँ पूछने गए हैं ओर वे इस वक्त भी नीचे चाय पी रहे होंगे ।”

जावेद को जब कुछ सूझा ही नहीँ तो कहता क्या ?

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"अरे। "आरती बुरी तरह चौंकी थी-"आप इतने गुस्से में क्यों हैं पापा और...आपकी आंखों में आंसू! बात क्या है?"

"बस आरती । अब हम यहा नहीं रहेगे ।"' गिरधर की हालत ऐसी थी जैसे अभी रो पडेगा ।

"मतलब ? ”

"इस मकान को बेचकर...बल्कि इस गांव ही से कहीँ दूर चले जाएंगे । कहीं और रह लेंगे ।”

“अरे मगर ऐसा क्या हो गया है ?"

"वो हो गया हे बेटी जिसके बारे मेँ कभी कल्पना भी नहीं की थी । सोचा था…हमारे जैसा पडोस पाकिस्तान में शायद कोई दूसरा न होगा । हम हिंदूहे, वो मुसलमान मगर दो मकानों को कभी दो घर समझा ही नहीं । एक ही परिवार समझा था मगर आज़ उन्होंने, उन सबने एहसास करां दिया कि वे अलग हें, हम अलग ।”

"क्या बात कर रहे हो पापा ! ऐसा कैसे हो गया ?"

"बस हो गया । कर दिया उन्होनै । तुझे भी पक्का यकीन है न कि कल रात वहा कोई आया था?”

"यकीन को छोडो । मैं जानती हूं कि आया था ।"

"जान तो मैं भी अच्छी तरह गया हूमगर वे हैं कि हांगकर नहीं दे रहे । छुपाए चले जा रहे हैं । वैसे देखा जाए तो यह कोई बडी बात नहीं हे । किसी के घर मेँ कोइ आया है । वह पडोसी को बताए, न बताए, यह उसका राइट हे मगर मैंने उन्हें कभी पडोसी समझा होता, तभी न ! मैंने तो एक ही घर समझा था ओर सोचा था कि हमारे बीच छुपाने जैसी कभी कोई बात हो ही नहीं सकती, मगर. . .

"मगर ? ”

"उन्होंने समझाया-मै उनके घर आने वाले कै बारे मेँ जानने का हकदार नहीँ हू । अलग हूउस घर कै मेंबरों से । "

“पर मैंने तो उसे देखा हे ।"'

“किसे ? "

“जो रात आया था ।”

"तूने देखा है !" गिरधर बुरी तरह चौंका…“कहा ?”

"छत पर । वहाँ खडा सिगरेट पी रहा था। "

"सिगरेट पी रहा था? कौन है वो ? कैसा लगता हे ? " उसके लहजे में उत्सुकता ही उत्सुकता थी मगर फिर, अचानक ही जैसे उसे शौकत और उसके परिवार का व्यवहार याद आया । कहता चला गया…"छोडी, हमें क्या ? होगा कोई !"

आरती ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि नजर दरवाजे पर पडी ।

वहां…जहाँ शौकत, खालिदा, सुरेया, किबला और जावेद खडे नजर आए थे । उन्हें देखती रह गइ थी वह ।

गिरधर ने जब उसकी ऐसी हालत देखी तो पलटकर दरवाजे की तरफ देखा ।

वहां उन सबको खड़ा देखते ही भढ़क उठा-" क्यो आए हो यहां , ये मेरा घर है । निकल जाओ यहां से ।"'

उन सबके...बल्कि खासतौर पर शौकत ओर खालिदा के चेहरों पर पश्चाताप नजर आ रहा था । खालिदा यह कहती हुई आगे बढी थी…"आपक्रो यह सब कहने का हक हे गिरधर भाइ, गलती हमारी ही थी । हमें तुमसे नहीं छुपाना चाहिए था ।"

"आरती । इनसे कह दे-मुझे किसी से माफी नहीं मंगवानी हे । अपने घर चले जाएं और जेसे खुश रहना चाहे-रहें । ""

"ऐसा न कहो गिरधर ।"' शौकत उसके नजदीक आया ।

"क्यों न कहूं?" वह भढ़का-'"मैं क्या जानता नहीं हूंकि अब तुम सब यहां क्यों आए हो। .”

"क्यों आए हैं ?'

"क्योकि जिसे तुमने छुपाने की कोशिश की उसे आरती ने छत पर देख लिया और जब देख ही लिया तो...

"नहीं गिरधर भाइ ।" खालिदा उसकी बात पूरी होने से पहले ही इस तरह बोली जेसे अभी रो देगी-“कसम से, ये बात नहीं है । हकीकत ये हे कि तुम्हारे घर से निकलते ही एहसास हो गया था कि इस बारे में तुमसे छुपाकर हमने गलती की । जावेद तो वाद मेँ नीचे आया । इसने बाद में बताया कि छत पर आरती...

"ज़ावेद !" गिरधर ने चिंहुककर जावेद की तरफ देखा, मुह से लफ्ज़ निकलते चले गए-'"य ये जावेद है?”

"हां ।"' शोकत सचमुच रो पड़ा ।

"य ये जावेद है ! तेरा बेटा ! मेरा बेटा !” सारे गिले शिकवे भुला कर गिरधर मानो पागल हो गया था…"व वो, जिसके बारे में तुम दोनों के मुंह से सुनते सुनते कान पक गए हैं लेकिन कभी देखने को नहीं मिला । ये वो जावेद है ! इंडियन पुलिस इंस्पेक्टर। "

"हां भाइजान ।" खालिदा बोली-"ये वही हे ।”

"अरे मगर.. अचानक ये इंडिया से यहाँ कैसे आ गया ? वो भी इतनी तूफानी रात में? चक्कर क्या है ये?”

और तब, जब शौकत अंसारी ने गिरधर को चक्कर समझाया तो एक बार फिर गिरधर उन पर चढ दोढ़ा-""तो तुमने इसके बारे में मुझसे इसलिए छुपाया कि कहीँ मैं किसी और से जिक्र न कर दूं! बस...इतना ही यकीन था मुझ पर ! इसी बूते पर दम भरते हो कि गिरधर भी तुम्हारे ही परिवार का मेंबर है। ” झपटकर उसने दोनों हाथों से शौकत का गिरेबान पकड़ लिया था और फिर ज़जबाती लहजे में कहता चला गया… "तूने ये क्यों नहीं सोचा गधे कि इसकी हिफाजत तो गिरधर तुझसे भी बढकर करेगा ।"'

"कितनी बार वुलवाएगा यार कि गलती हो गइ'...गलती हो गई । अब माफ भी कर दे ।" कहने कै साथ शौकत ने खींचकर उसे अपनी बाहों मं भर लिया और फफक पड़ा ।

रो गिरधर पाडे भी रहा था ।

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"वो सब तो मैंने शौकत चाचा और खालिदा चाची के मुंह से सुन लिया जो तेरे साथ हिंदुस्तान में हुआ था ।" आरती जावेद से कह रही थी…"अब वो बता जो तेरे ओर नाजनीन के बीच हुआ ।"

"म मेरे और नाजनीन कै बीच क्या होता?" वह बोखलाया ।

"कुछ तो हुआ होगा?"

“क कुछ भी नहीं हुआ ।"'

"झूठ मत बोल वर्ना ... ।" आरती ने आंखें तरेरी ।

"वर्ना ? "

"तेरी शिकायत चाचाचवाची से कर दूंगी ।”

"मेरो कौन सी शिकायत?"

"सिगरेट पीने यहां. . .छत पर आता है।”

"बोल? बताऊं अभी नीचे जाकर ?” वह खडी हो गई ।

"अरे अरे, क्या कर रहीँहै !" बौखलाहट में जावेद ने उसे रोकने के लिए उसकी कलाई पकढ़ ली थी ।

वह चौंकी ।

बल्कि अगर यह कहा जाए तो गलत न होगा कि आरती को अच्छा लगा ।

आंखों में प्यार भरकर वह उसी पोजीशन में जावेद को देखती रह गइ थी ।।

जावेद यह सोचकर सकपका गया कि वह क्या कर बैठा । फिर आहिस्ता से उसकी कलाई छोडता बोला…"तूपागल है क्या ? "

"तू होगा । ”

“तूहै ?"

"क्यों? "

"वे क्या अब तक समझ नहीं गए होंगे कि मैं सिगरेट पीने के लिए ही ऊपर आता हूँ । वही बात उन्हें बताना पागलपन ही तो है । ऐसे पर्दे पेरेंटस और बच्चों कै बीच पड़े ही रहे तो अच्छा होता है ।"

"मैं ये पर्दा हटाकर रहूंगी ।"

"आखिर क्यों ? "

"तू बता जो नहीँ रहा कि तेरे और नाजनीन के बीच. . .

"अरे बाबा, कहा तो है कि कुछ नहीं हुआ ।"

"मैं मान ही नहीं सकती ।"

"अरे, कोई ज़बरदस्ती हे !"

"हां । ज़बरदस्ती हे । इसलिए जबरदस्ती है क्योकि ये नेचुरल नहीं है । कोई लडकी ऐसे ही उससे बगावत नहीँ कर देती जिसने उसे बचपन से पाला हो । उसने तेरी खातिर अपने चाचूसे बगावत की तो जरूर कोइ मुहब्बत वुहब्बत का चक्कर होगा ।"'

"खामखा ! "

अचानक आरती ने उसकी कलाई पकडी और हाथ अपने सिर पर रखती हुई बोली-“अब बोल, मेरी कसम खाकर कह कि तेरे और नाजनीन कै बीच मुहब्बत वुहब्बत वाला चक्कर नहीं था।”

"अ.... आरती !" जावेद के हलक से चीख सी निकल गई थी ।

हाथ तेजी से आरती के सिर से खींच लिया था उसने ।

“.क्यों..पकड़ा गया न !"

जावेद कै चेहरे पर अंजाने ही में जज़बात्तों की आंधी सी चलती नज़र आने लगी थी । आरती की तरफ देखता रह गया था वह । उस आरती की तरफ जिससे अभी तक उसका कोइ खास रिश्ता न जुडा था मगर उसकी झूठी कसम नहीं खा सकता था ।

वह थी ही इतनी चंचल और निश्छल ।

फिर, उसे ऐसा भी लगा कि नाजनीन की यादों मेँ डूब जाना उसे अच्छा लगता है । उसके बारे में बातें हों तो बहुत ही अनोखा सूकून मिलता हे और...यहां कोइ ऐसा न था जिससे नाजनीन के बारे में चर्चा कर सकता । आरती इसके लिए मुफीद लगी । इसलिए लरजते से लहजे में बोला…"तेरा अंदाजा ठीक है आरती ।"

"कौनसा अंदाजा ठीक हे मेरा, साफ साफ बोल ।"

"मैं और नाजनीन एक दूसरे से मुहब्बत करने लगे थे ।"

"वो मारा पापढ़ वाले को । '" कहने कै साथ वह उसके सामने आलथी पालथी मारकर बैठ गई…"अब बता...ओर खुलकर बता कि तेरे और उसके बीच प्यार कैसे परवान चढा?"

शून्य में आंखे टिकाए जावेद बताता चला गया । जब नाजनीन की मृत्यु का वृतांत आया तो आंखों से आंसूबहने लगे ।

वह यह तक न देख सका कि आरती भी रोने लगी थी ।

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बहुत सोच विचार के बाद शौकत अंसारी करांची के एक थाने में थानेदार से मिलने आया था मगर एक सिपाही ने पिछले दो घंटे से उसे नीम के नीचे पडी बेंच पर वैठा रखा था ।

वह कईं वार उससे थानेदार से मिलाने की रिक्वेस्ट कर चुका था । वह हर बार झिड़कने के से अंदाज में कह देता था… "थानेदार साहब कें पास एक तुझसे ही मिलने का काम बाकी नहीं बचा है । बहुत काम हैं उन्हें । फुर्सत मिलेगी तो बुला लेंगे। "

इस बार, यानी दो घंटे जाने कै बाद शोकत अंसारी ने जेब से पांच सो का एक नोट निकालकर सिपाही कै सामने मेज पर रखते हुए कहा-“मैं वहुत दूर से आया हूभाई, वापस भी जाना है ।"

सिपाही धूर्त अंदाज में मुस्कराया । बोला…“बडी जल्दी अक्ल आईं ! थोडी और जल्दी आ जाती तो तेरे दो घंटे खराब न होते मगर अभी भी आधी अक्ल आइ हे ।'"

"मतलब ? "

"एक ओर पत्ता निकाल ।'"

"मेरे पास और नहीँ हे ।"

“तो तसल्ली से बैठा रह । जब थानेदार साब को फुर्सत होगी तो अंदर भेज दूंगा । चाय वाय पिएगा ?"

शौकत ने एक और नोट मेज पर रख दिया ।

“जा...मिल ले ।" उसने नोट जेब में डालते हुए कहा…“इतनी देर में यह तो समझ ही गया होगा कि वे कहां बेठे हैँ ।"

शौकत अंसारी बगैर कुछ कहे बैंच से उठा ओर उस कमरे की तरफ बढ़ गया जिसके माथे पर "थानेदार" लिखा था ।

दरवाजे से ही अंदर का दृश्य नजर आ गया ओर जो दृश्य नज़र आया उसे देखकर शौकत को लगा कि वह कहां आ गया ?

कटारीदार काली मूंछों बाला थानेदार दरवाजे के ठीक सामने, कमरे के बीचों बीच पडी मेज कें उस तरफ कुर्सी पर बैठा था । रंग एकदम काला था उसका । चेहरा जरूरत से कुछ ज्यादा ही चोड़ा । गोभी के पकौड़े जेसी नाक और सिर पर एक भी बाल न था । दाएं गाल पर ज़ख्म का लंबा निशान था, जैसे किसी जमाने में वहां चाकूलगा हो । शौकत को लगा था कि उसकी आंखों के सामने थानेदार नहीं बल्कि इलाके का छटा हुआ गुंडा बैठा है ।

उसके दोनों पैर जूतों सहित मेज पर रखै हुए थे । मेज ही पर एक गिलास था, एक हाफ । हाफ में भी आधी बची थी और गिलास में भी आधी थी ।

नमकीन भुजिया की एक प्लेट भी थी मेज पर ।

पटठा दिन में ही पी रहा था ।

शौकत अभी दरवाजे पर ही ठिठका खडा था कि उसने अपने पोज़ में जरा भी परिवर्तन लाए बगैर ऐसे अंदाज में कहा जैसे किसी आसामी से कहा हो…“आजा-आजा । बैठ ।"'

शौकत आगे बढा ओर मेज के इस तरफ पडी दो में से एक कुर्सी पर बैठ गया । उसने पूछा-“लेगा?”

"ज जीं । मैँ नहीं लेता ।'"

"अच्छा करता है । पर क्या तूने आज़ से पहले ऐसा थानेदार देखा है जो फरियादी की इस तरह आवभगत करे...पीने को पूछे। "

"न नहीं ।'" शौकत को कहना पड़ा ।

"अब बोल...ओर बिंदास बोल कि क्या फरियाद है तेरी ?”

शौकत को लगा कि जो कंपलेंट लेकर वह यहां आया है, उसका जिक्र करना बेकार है । कुछ भी होने वाला नहीं है । जी चाहा-उठकर वापस चला जाए मगर, काम तो इससे भी होने वाला न था ।

कंप्लेंट लिखवाना मजबूरी थी ।

इसके अलावा कोई चारा ही न था ।

फिर सोचा-शायद यही थानेदार उसके काम का हे । पैसे लेकर काम करने वाला हे ये और मैं पैसा खर्च करने क्रो तेयार हूं ।

अत: बात यूं शुरू की…"करांची में मेरी एक जमीन है। "

"पहले नाम बता यार, थाने में पहली बार आया है क्या? तुझे तो बात करने का सलीका तक नहीँ मालूम ।"'

"शौकत अंसारी ।"

"कहां रहता हे ?”

"रशीदपुर गांव मेँ। ”

"शुरू से वहीं रहता है ? '"

"जी नहीं, दस साल से । "

"उससे पहले कहां रहता था ।”

"कश्मीर कै पहलगाम में ।"

"ओह। " उसके तेवर थोड़े बदले-"मुजाहिदीन है !"

शौकत क्रो पाकिस्तान में अक्सर यह शब्द सुनने को मिलता था ।

यह शब्द, जो उसे गाली जेसा लगता था और थोडे नागवारी वाले अंदाज में वह हमेशा वही कहता था जो इस वक्त कहा…"मै अपने परिवार के साथ दस साल पहले इसलिए पाकिस्तान आ गया था क्योंकि जेहनी तौर पर इसी को अपना मुल्क समझता था फिर भी, जब ये शब्द सुनता हूं तो अच्छा नहीं लगता ।'"

"अच्छा लगे या न लगे मुजाहिदीन साहब मगर जो हकीकत है, सो है । हिंदुस्तान से आने वाले मुजाहिदीन ही होते हैं ।”

शौकत खून का सा घुट पीकर रह गया ।

"खैर, करता क्या है?”

"पाक बैंक' की शाह रोड बांच में क्लर्क हू ।"'

"अब बता, कौनसी ज़मीन की बात कर रहा था?”

"पाकिस्तान में आते ही यानी दस साल पहले मैंने हजरत बाग मेँ थोडी सी ज़मीन खरीद ली थी।”

"हजरत बाग में !" उसकी आंखों में चमक आइ…“कितनी ?'

“दस हजार गज । "

"द दस हजार गज ज़मीन ! हज़रत बाग में??? '" इन शब्दों के साथ मानों उसकी समस्त इंद्रियां सचेत हो गई ।

पैर एक झटके से मेज के टाप से हटाकर उसने मेज़ के नीचे डाल लिए थे ।

दोनों क्रोहनियां मेज़ पर टिकाई और शौकत की तरफ थोडा झुककर बोला-"वहां तो जिम्मा हाइवे बन रहा है । काफी कीमत हो गई होगी? ”

""जी, दस साल मेँ कुछ बढी तो है ।"'

"प्राबलम क्या है ? '"

"दो लोग दबाव डाल रहे हैं कि वो ज़मीन मैँ उन्हें बेच दूं ।"

"जबकि तुम बेचना नहीं चाहते ।"'

"नहीं । "

"क्यों ?"

"वे आज़ के रेट के हिसाब से बहुत कम पैसे दे रहे हैं ।"

"तो मत बेचो । जमीन तुम्हारी है । तुम उसके कानूनी मालिक हो । जिसे चाहोगे बेचोगे, जिसे चाहोगे नहीँ बेचोगे।”

"वही तो...लेकिन वे दबाव डाल रहे हैं।"

"किस किस्म का दबाव?"

"पहले तो बैंक में ही आकर तरह तरह की बातें करते थे मगर कल तो हद ही कर दी । रशीदपुर , मेरे घर पहुंच गए । मेरे पूरे परिवार कै सामने कहने लगे कि ज़मीन नहीं बेचोगे तो नुकसान में रहोगे ओर ये भी हो सकता कि रहो ही नहीँ।"'

“अरे, ये तो सरासर मारने की धमकी है।"

"इसीलिए तो आपके पास आया हू मैं बाल बच्चोंदार शरीफ आदमी हू । समझ में नहीँ आ रहा था क्या करूं ।"

"अरे वाह, इसमें समझ में न आने वाली क्या बात थी? हम किसलिए बेठे हैं यहां ! शरीफों के जान माल की हिफाजत करना ही तो हमारी हृयूटी है । आप बेचना नहीं चाहते, वे ज़बरदस्ती कर रहे हैँ । ये तो जुल्म हे, ज्यादती है बल्कि सरासर गैरकानूनी हरकत है । आप ज़रा भी फिक्र न करें, मेरे इस थाने में रहते वे किसी हालत में अपने मंसूबों में कामयाब न हो सकेंगे ।"'

"जी शुक्रिया ।'"

"बस थोड़ा सा खर्चा करना होगा आपको ।"'

शौकत तो इसके तैयार था ही । सो बोला…""कितना ?”

"इमानदारी से बताइए, इस वक्त ज़मीन कितने की होगी?"

शौकत अंसारी समझता था कि झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं हे । हालांकि तो वह पहले ही जमीन की कीमत जानता होगा, न भी जानता होगा तो फोन ही पर किसी भी प्रापर्टी डीलर से आसानी से पता लगा लेगा अत: वही कहा जो हकीकत थी…"सौ करोढ़ । "

“दस परसेंट । "

"जी ?"

"मैं अकेला नहीं हू…पेसा ऊपर तक जाएगा ।"'

"पर ये तो बहुत ज्यादा हो जाएगा ।"' शौकत को पसीना आ गया था-""दस परसेंट का मतलब हे, दस करोड ।”

"वे कितने में खरीदने को तैयार हैं?”

"केवल पच्चीस दे रहे हैँ ।”

"कितने का फायदा हुआ?"

"जी ? ”

"हिसाब लगाकर बताओ शौकत मियां, सौ में बेची । दस थाने को दिए । नब्बे तुम्हारे हाथ में आए । इस रास्ते पर नहीं चले तो कुल जमा पच्चीस हाथ में आए । कितने का प्राफिट हुआ ?"

"पैंसठ । "

"कम है क्या ?' इसमें शक नहीं कि शौकत यहां पैसा देने के लिए तैयार होकर आया था मगर जितना मांगा गया था उतना तो उसने ख्वाब तक में नहीं सोचा था । इसलिए फैसला न कर सका ।

चुप रह गया ।

"मुझे क्रोइ जल्दी नहीं है ।" उसने एक ही घूट में गिलास खाली किया और कुर्सी की पुश्त से पीठ टिकाता हुआ बोला…"सोच लो, घर जाकर सोच लेना । हफ्ता दस दिन, महीना सालभर जितना टाइम तुम पर हो, सोच लो । जब सोच लो तो बता देना । तुम्हें पेंसठ करोढ़ का फायदा कराने की जिम्मेदारी मेरी ।"

टाइम कहां था शौकत अंसारी पर ?

बस आज़ ही की रात तो बाकी है ।

कल उन्होंने घर आने के लिए कहा हे ओर अब तो वहां जावेद भी हे ।

उसके सामने आ गए तो जाने क्या से क्या हो जाए।

समझ सकता था कि थानेदार उसकी इसी मजबूरी का फायदा उठा रहा है । वह समझ चुका है कि सोचने कै लिए उसके पास टाइम नहीं है । और फिर, उसे लगा कि दस करोड की रकम सुनने मेँ भले ही ज्यादा लग रही हो मगर असल में बात उसी की ठीक हे । उसे थानेदार द्वारा मांगे गए कमीशन के बारे में नहीं बल्कि नब्बे करोढ़ के बारे में सोचना चाहिए । मगर, दस करोढ़ उसके पास थे कहां ?

वहीँ कह दिया उसने-“आप दस करोड़ की बात कर रहे हैं ! साधारण बैक क्लर्क हू । मेरे पास तो दस लाख भी नहीं होंगे । बस जो हे, वो जमीन ही है। जाने किसके नसीब से इतने की हो गइ।"

“तो थाने का पेमेंट तब कर देना जब जमीन बिक जाए ।"

उसने कांपते दिल से कहा…"में तैयार हूं।"'

"पर परसेंट दस की जगह पंद्रह हो जाएगा ।"'

"य ये तो ज्यादती हे साहब ।"

"सोच लो, पहले पेमेंट करोगे तो दस परसेंट । बाद मेँ करोगे तो पंद्रह । तब भी तुम्हें साठ करोड़ का फायदा होगा।”

शौकत के पास यह कहना ही एकमात्र चारा था-"ठीक है ।"'

"वेरीगुड ।" वह सीधा हो गया ।

अब उसके पोर पोर से पंद्रह करीढ़ बोल रहे थे-"अब मुझे उन दोनों सज्जनों कै नाम पते बताओ जिन्होंने तुम्हें कत्ल करने की धमकी दी हे ओर घर जाकर तकिया लगाकर सो जा जिस पर तुम्हें सबसे अच्छी नींद आती हो क्योंकि उनसे निपटने की जिम्मेदारी मेरी ।"'

"वे मेरे घर आकर मुझे परेशान तो नहीं करंगे ?"

"अजी परछाई तक के नज़दीक नहीं आएंगें तुम्हारी क्योकिं मैं उन्हें कत्ल की धमकी देने के इल्जाम में जेल भेजने वाला हूं ।”

"आप जानते होंगे-एक तो पीस पार्टी का एमपी है ।" शौकत अंसारी ने बताया-"'इकरामुद्दीन ।"'

"ओह। " थानेदार को झटका सा लगा ।

शौकत को लगा…काम बिगढ़ गया हे । अब शायद वह कहेगा कि सत्ताधारी पार्टी के एमपी से वह नहीं निपट सकेगा । थोड़े कांपते से लहजे में पूछा उसने-"क्या हुआ?"

"काफी बड़े आदमी से उलझे पड़े हो शौकत मियां , मुझे भी उससे निपटने के लिए अपने काफी कस बल निकालने पडेगे, साला सत्ताधारी पार्टी से जो हे । लेकिन खैर, तुम चिंता मत करो । वादा कर दिया, सो कर दिया । काफी घोटाले कर रखे हैं उसने । ऐसे नेताओ रास्ते पर लाने में मेरे जैसे थानेदार क्रो थोडी मेहनत तो करनी पड़ती हे मगर ले आते है । दूसरे शख्स का नाम बताओ ।"

"उसने अपना नाम हाजी गल्ला बताया था ।'"

“क क्या ?" वह इस तरह कुर्सी से उछल पड़। जेसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो-""क्या कहा तुमने ?”

"हाजी गल्ला ।"

थानेदार की नशे में डूबी सुर्ख और रूआबदार आंखों में आतंक नजर आने लगा ।

पलक झपकते ही शौकत को ऐसा लगा जैसे उसके सामने बेठे काले शख्स के चेहरे पर किसी ने हल्दी पोत दी हो । कुछ देर पहले पंद्रह करोढ़ कमाने का जो जोश उसके पोर पोर से् टपकने लगा था, वह जाने कहां फुर हो गया ।

घबराए से शौकत ने पूछा-"क्या हुआ ?'

"एक सलाह दूं शौकत मियां ? "

"दीजिए । "

" वो जितने में भी तुम्हारी ज़मीन खरीद रहा है, बेच दो । जो भी दे रहा है, उसे नियामत समझो उसकी वर्ना, इसमें कोई शक नहीं कि तुम्हारी जमीन फ्री में उसकी हो जाएगी क्योंकि उस जमीन पर अपना क्लेम करनेवाला कोई इस जमीन पर नहीं बचेगा । "

"य ये क्या कह रहे हैं आप? "' शौकत के होश उड़ गए थे।

"जो कहा है, उसे उतनी गहराई से लो जितनी गहराइ मेरे लफ्जों में भी नहीं हे ।" वह कहता चला गया…"बस यूंमानकर चलो कि जान हे तो जहान है । पच्चीस करोढ़ भी कम नहीं होते ।"

"अ आप तो मुझे डरा रहे हैँ ।"

"डरा नहीं रहा, नेक सलाह दे रहा हूज़नाब । हालांकि फ्री फंड में मैं किसी को नेक सलाह भी नहीं दिया करता मगर तुम्हारा नसीब अच्छा होगा जो ऐसा हो रहा हे ।'"

"ऐसा क्रोन हे हाजी गल्ला ?'

"तुम नहीँ जानते ?'

"नहीं । "

“कौनसी दुनिया के रहने वाले हो जनाब।। "

"जी क्या मतलब ?'

"जिसे सारी दुनिया जानती हे बल्कि जिससे सारी दुनिया थर्राती हे उसे पाकिस्तान में रहने वाला एक बैंक क्लर्क नहीं जानता।। हैरत की बात है । इसीलिए पूछना पड़ा कि कौनसी दुनिया के रहने वाले हो । "

वह कहता चला गया…"बेसे देखा जाए तो अच्छा ही है कि तुम उसे नहीं जानते । जानते होते तो यहा आने तक की नौबत ही न आती । जिस दिन तुमसे पहली बार मिला था उसी दिन काम निपटा लिया होता । वेसे मन ही मन वह हंस जरूर रहा होगा कि पाकिस्तान में कोई ऐसा भी हे जो उसक नाम से वाकिफ नहीं है ।'"

"आप बता दीजिए न !" शौकत ने कहा…"कौन है बो? ”

"यकीन मानिए शोकत अंसारी साहब, उस बला को न जानना ही बेहतर है और...फ्री की जितनी नेक सलाह मुझे आपको देनी थी दे चुका । अब उठिए यहां से और अपने गांव जाकर सांस लीजिए, यदि हाजी गल्ला को पता लग गया कि आपको इतनी देर अपने पास बेठाया है तो आपसे पहले मेरा नंबर लग जाएगा ।'"

शौकत के जिस्म का खून जैसे पानी में तब्दील हो गया था ।

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शौकत की बात सुनकर वही हालत गिरधर पांडे की हुईं बल्कि अगर यह लिखा जाए तो गलत न होगा कि उसके जिस्म में बहने वाला खून तो पानी में तब्दील होकर जम भी गया था क्योंकि वह जानता था कि हाजी गल्ला किस बला का नाम है ।

शौकत ने पूछा…“ऐसा कौन हे वो जिसके नामन्मात्र से थानदार की ऐसी हालत हो गई कि पंद्रह करोड भी उसके लिए कुछ न ? '"

"तालिबानियों का सरदार हे । " गिरधर बोला… "तूने उसके बारे में इसलिए नहीं सुना क्योंकि न तू अखबार पढता है, न खबरें देखता है जबकि मुझे इन्हीं दोनों चीजों का शौक हे ।"

"मैं सीधा सादा बेंक में काम करने वाला आदमी हूयार । बैंक में कमी कभी अखबार देख भी लेता हूंतो केवल आर्थिक हालात पर नजर रखने के लिए । मुझ जैसे सीधे आदमी का भला किसी हाजी गल्ला से कनेक्टिड खबरें पढने से क्या मतलब?"

"किसान को बैक क्लर्क से भी सीधा माना जाता हे और मैं वही हूं ।" गिरधर बोला…"पुरखे थोडी सी ज़मीन छोड गए थे । उस पर हल जोतकर अपना और वेटी का पेट पाल रहा हू मगर न्यूज पेपर पढ़ने का नहीं बल्कि उसे चाटने का शौकीन हूं । इसलिए हाजी गल्ला नाम की मुसीबत का नाम सुना है ।"

"अगर वो तालिबानी हे तो पाकिस्तान में क्या कर रहा है?”

"अमेरिका के निशाने पर हे । इसलिए पाकिस्तान में पनाह लिए हुए है मगर ऐसी पनाहें फ्री में नहीं मिला करती । लंबे सियासी फायदे उठाए जाते हें लेकिन, उनसे न तुझे मतलब हे, न मुझे । हमें मतलब इस बात से कि उसकी टेढी नज़र हमारी ज़मीन पर पढ़ चुकी है, और अब उससे कैसे बचा जाए ।'"

शौकत ने कहा-"इस वक्त मेरी समस्या ये भी नहीं हे ।"

" और क्या हे ?'

"कि उन्हें कल अपने घर आने से कैसे रोकू ।"

"मतलब ? ”

"जैसा कि बता चुका हूं-ये कल आए थे । कह गए थे परसों तक सोच लो क्या करना हे, वर्ना हमें सोचना पड़ेगा । इसका मतलब हे कि वे कल आएंगे और घर में जावेद है । जावेद के रहते उनके और मेरे बीचमें बातें हुई तो...

"सोच तो तूबिल्लुल ठीक रहा हे ।"' गिरधर के चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंची हुइ थीं-“उसके और तेरे ब्रीच होने वाली बातें जावेद के सामने हरगिज नहीं होनी चाहिए ।'"

"तो हत्या करें ? "

"पहले यह सोच कि करना क्या है?”

"मतलब ? "

"जमीन उसे पच्चीस में देनी है या अड़े रहना है ?'

"ये फैसला भी अब तूहीँ कर क्योंकि मैं तो अभी भी ठीक से हाजी गल्ला की ताकत से वाकिफ नहीं हुआ हू ।"'

“ये तो तूने मुझे बहुत गहरे संकट में डाल दिया दोस्त ।”

"ऐसा क्यों ? "

"एक तरफ पिचहत्तर करोढ़ का नुकसान है…पिचहत्तर करोढ़ का । दूसरी तरफ़ हाजी गल्ला है । जो बात मेरा दिमाग कह रहा है, तुझे बो सलाह देन का मतलब हे…पिचहत्तर कराढ़ के नुकसान की सलाह और दोस्त, दोस्त चाहे जितना गहरा हो उसके लिए दोस्त को पिचहत्तर करोड़ के नुकसान की सलाह देना बहुत मुश्किल हे।”

"ये क्यों सोच रहा हे कि तूमुझे कोई सलाह दे रहा हे । ये क्यों नहीं सोचता कि जमीन तेरी है और तुझे ही फैसला लेना है ।"'

"ऐसी बात है दोस्त तो... ।"' गिरधर ने बहुत गहरी सांस लेने के बाद कहा था…"हमेँ उनकी बात मान लेनी चाहिए । इसी में हमारा आर हमारे परिवार का भला है । यहीँ मैं यह कहने से भी नहीं चूकुगा कि हमें पिचहत्तर करोढ़ का नुकसान नहीं देखना चाहिए बल्कि पच्चीस करोड का फायदा देखना चाहिए और पच्चीस करोड़ भी कम नहीं होते । इसमें शक नहीँ, ठीक ही कहा थानेदार ने…वह अगर अपनी पर आ गया तो ज़मीन मुफ्त में उसकी हो जाएगी ।"'

"तूऐसा कहता हे तो मैं तैयार हू ।"'

"तब तो क्रोइ प्राब्लम ही नहीँ है । आने वाले कल को हम आने ही नहीं देते । उससे पहले उनसे मिलकर कह देते हैं कि हमें उनका आफर मंजूर हे । कल उन्हें घर आने की ज़रूरत ही न पडेगी । जावेद को कभी इस बात की भनक ही न लगेगी कि हमारे पास ऐसी कोइ जमीन थी जिसे हमने हाजी गल्ला क्रो बेचा ।"

"समस्या ये हे गिरधर कि में उनसे नहीं मिल सकता ।"'

"क्यों ?!!"

"क्योंकि मुझे नहीं मालूम वे कहां मिलेंगे । मैँ कभी उनसे नहीं मिला । हमेशा वे ही मुझसे मिले । कई बार बैंक में । कल घर में आए थे । हाजी गल्ला सुरया को अच्छी नज़रों से नहीं घूर रहा था इसलिए मै ओर ज्यादा डरा हुआ हूं"

"यह तो ठीक है कि हाजी गल्ला से तो शायद पाकिस्तान का प्रधानमंत्री भी अपनी मर्जी से नहीं मिल सकता जबकि वह जब चाहे प्रधानमत्री से मिल सकता है क्युकि अखबारों के मुताबिक उसका ठिकाना आइएसआइ के चंद लोगों के अलावा किसी ने नहीँ देखा । उसे जिससे भी मिलना होता हे, खुद प्रकट होकर मिलता हे मगर इकरामद्दीन तो एमपी हे । उसका पता सब जानते हैँ या कोई भी पता लगा सकता है । इसके बावजूद, बेशक आम आदमी कै लिए उससे मिलना आसान नहीं हे लेकिन अगर उसके बंगले पर जाकर यह खबर भिजवाइ जाए कि तू जमीन कै सिलसिले में मिलने आया हे तो वह खुद तुझसे...

कहता कहता रुक गया गिरधर पांडे ।

"क्या हुआ ? " शीकत असारी ने पूछा ।

“एक ।" गिरधर पांडे तेजी उठा और अपने निजी कमरे की एक अलमारी की तरफ लपका ।

कुछ देर बाद वह वहां भरे अखबारों को उलट पुलटकर देख रहा था ।

दो मिनट बाद उसने एक अखबार को हाथ में लिए कहा-"हां यही हे आज का ।”

"तू कर क्या रहा है ? "

वह तेजी से उसके पनी को पलटने लगा और फिर, पाचवें पन्ने पर छपी एक छोटी सी खबर पर उसकी नजरें अटक गई । उसके हेडिंग को पढते ही बोला…"मुझें ठीक याद आया था ।"'

"क्या याद आया था?"

"सुबह मैंने यह खबर पढी थी । इकरामुद्दीन आज करांची में नहीँ है । इस्लामाबाद गया हूआ है । कल किसी समय लौटेगा ।”

"किस समय ?'

"अखबार में यह नहीं लिखा ।”

"मतलब हम उससे भी नहीं मिल सकते।”

"मेरे ख्याल से तो नहीँ, क्या पता कल करांची लौटने पर वह अपने बंगले पर जाने से पहले हाजी गल्ला से मिले और फिर.......

“क्या फिर ।” शौकत के चेहरे पर आतंक ही आतंक था ।

ज़वाब गिरधर को भी न सूझा । वह भी चिंता में डूब गया ।

हालात ऐसे बन गए कि दोनां के बीच सन्नाटा पसर गया ।

कुछ देर कहने केलिए किसी क्रो कुछ न सूझा और फिर, अचानक गिरधर ही बोला…“अबे यार, हम दिमाग से पैदल है क्या?"

"क्यों ?"

"साले आते हैं तो आएं । हम इतने परेशान क्यों हो रहे हैं?”

"मतलब ? "

"सीधी सी बात है, जब भी कोई बाहरी व्यक्ति घर में आता है तूजावेद क्रो ऊपर भेज देता है । ऊपर जाने के बहाने वह सिगरेट पीने छत पर पहुंच जाता है । लाबी की कोई आवाज वहा तक नहीं पहुंचती । उस समय मैं जान बूझकर आरती क्रो छत पर भेज दूंगा । दोनों गपशप में लग जाएंगे । वेसे भी, जब हमें 'उनकी' बात मान ही लेनी है ता बात लंबी नहीं खिंचेगी । ज़मीन के कागज़ क्रोईं तेरे घर में तो रखे नहीं हें, बेंक लाकर में हे' । तूकह सकता है कि वे अगले दिन पैसे लेकर बैंक में आएं ओर तेरे साइन कराकर जाए । "

"उफ्फ " शौकत अंसारी को जैसे बडी राहत मिली…"इतना सीधा सा समाधान पहले हमारे दिमाग में क्यों नहीं आया?”

"मेंने कहीं पढा था-इंसान का दिमाग जब आतंक में डूबा होता है तो अपनी समस्या का सबसे सरल समाधान उसके दिमाग में नहीं आता, इसलिए दिमाग को आतंकमुक्त रखना चाहिए ।"

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