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Guest
इतना तो बिजय समझ गया था कि यकीनन वे किसी खतरनाक प्लान पर काम कर रहे है लेकिन यह नहीँ समझ पा रहा था कि वह प्लान क्या है । ऐसा प्लान जो हमेशा के लिए उन्हें केवल उसी से नहीं बल्कि पूरी इंडियन सीक्रेट सर्विस से निजात दिला देगा । उसी क्रो समझने के लिए, उन्हें उकसाने की मंशा से बोला-'"इसका मतलब तो ये हुआ वागड़विल्लो कि तुम्हें अपने मुल्क क्री इज्जत का जरा भी ख्याल नहीं है । एक बार भी तुमने ये नहीं सोचा कि हमारे गायब होने पर तुम्हारा मुल्क दुनिया क्रो क्या जवाब देगा।। "
"हमने खूब सोचा है गुरुदेव बल्कि घोट घोटकर इस सवाल क्रो पिया है और फिर ऐसा हल निकाला है कि ये दुनिया साली हमारे मुल्क से वह सवाल करेगी ही नहीं जिसके बूते पर सवार होकर आप हमारी लिमोजीन में आ बेठे ।"'
"भला दुनिया क्रो सवाल करने से कैसे रोक लोगे तुम?"
“रोक लेंगें । बूता है हममें ।'"
"बूता नहीं, खोपडी है। " तुगलक बीला…"वो खोपडी है जिससे ऐसी तरकीब निकलकर आईं है कि दुनिया साली वो सवाल ही न करे जो उसे करना चाहिए और. ..तुममें वो खोपड़ा नहीं है, तभी तो हमारे जाल में आ फंसे। मगर हम तुम्हें समझने का मोका जरूर देंगे । जब तुम्हारी समझ में हमारी पूरी आईसक्रीम आएगी तो हमारा दावा है…खुद ही अपनी खोपडी को फाढ़ लोगे ।"
"तो मियां, दो न हमें अपनी खोपडी फाड़ने का मोका। "
"देते हैँ हुजूरेआला । इतने उतावले क्यों हो रहे हो। " कहने के साथ वह एक दीवार की तरफ बढा था ।
नुसरत बोला…“वेसे भी, आपको यहां नहीं रखा जाएगा। यहां तो सिर्फ मंत्री महोदय से मिलाने लाया गया था। आपको तो यहा से भी शानदार जगह पर रखा जाएगा। " नुसरत का सेटैस खत्म होते होते तुगलक उस दीवार कै करीब पहुंच गया था जिसकी तरफ बढा था ।
फिर, उसने स्टील की दीवार पर एक खास अंदाज़ में तबला सा बजाया ।
परिणाम स्वरूप-हल्की सी गड़गड़ाहट के साथ दीवार मेँ तीन बाइ छ: का दरवाजा उत्पन्न हों गया ।
दरवाजे के बीच खडे होकर तुगलक ने ऐसा एक्शन करते हुए कहा जेसे फाइव स्टार होटल का दरबान करता है---"आइए हुजूर, आपके दौलतखाने में आपका इस्तकवाल हैं। "
विजय और उसके साथ नुसरत भी दरवाजा पार करके दूसरी तरफ पहुच गए।
नौशाद ने भी जब वेसा करना चाहा तो तुगलक ने उसे दरवाजे से पहले ही राकते हुए कहा …"तुम नहीं ।"
नौशाद अंसारी जहा' का तहां रुक गया।
अगले पल तुगलक भी दरवाजे के उस तरफ चला गया, साथ ही…दरवाजा बंद हो गया।
दीवार पहले जैसी नजर आने लगी । विजय ने देखा…इस वक्त वे तीस बाइ तीस के एक हाल में थे ओर उसके ठीक सामने एक ऐसा शख्स खड़ा था जिसकी कल्पना वह इस स्थान पर पहले ही कर चुका था।
वह किसी भी तरह छ: फुट दो इंच से कम न था । उसक पहाड जैसे बलिष्ट जिस्म पर ब्राऊन रंग का पठानी सूट था।
चेहरा अत्यंत चौडा।
मोटे मोटे होंठ ।
लंबी नाक और
जरूरत से ज्यादा बाहर को निकली हुईं ठोडी। मस्तक बहुत चोड़ा था।
पीछे की तरफ को कढे हुए लंबे बाल । लाल सुर्ख और गोलमटोल आंखे।
उसे विजय ही क्या, दुनिया के ज्यादातर लोग पहचानते थे ।
हाजी गल्ला था वह । तालिबानियों का सरदार ।
वह…जिसे किसी समय इंडियन गर्वमेंट इसलिए तिहाढ़ जेल से रिहा करने पर मजबूर हो गई थी क्योकिं उसके साथियों ने इंडिया का यात्रियों से भरा एक विमान किडनैप कर लिया था ।
तुगलक ने कहा -"इनसे मिलिए हुजूर, इन्हें...
"जनाब हाजी गल्ला कहते हैं ।" बात विजय ने पूरी की ।
"कमाल की बात है गुरुदेव आप तो इन्हें पहचानते हैं ।" नुसरत ने कहा -"अब तो शायद यह बताने की ज़रूरत भी नहीं रही कि कुतुबमीनार जेसी यह इमारत इन्हीं के लिए बनवाई गइ है ।"
"जो आग से खेलते हैं नुसरत मियां ।" जाने किस मूड में विजय ने शायराना अंदाज़ में कहा था…"वे एक दिन राख हो जाते ।"
"इस नई झकझकी का मतलब क्या हुआ हुजूर ?'"
"आतंकवादियों के इस सरगना को अपने मुल्क में तुम इसलिए पनाह दिए हुए हो कि इसके बूते पर एक दिन हिंदुस्तान में धूल उड़ा दोगे मगर याद रखना-पाकिस्तान जलाकर ये ही खाक करेगा ।"
बड़े ही अजीब ढंग से हंसा था हाजी गल्ला ।
बोला…"पाक की फिक्र बाद में करना मिस्टर बिजय, फिलहाल अपने मुल्क की ओर उससे भी ज्यादा खुद अपनी फिक्र करी ।”
"मतलब? ”
"इन हजरात से मिलो ।" कहने के साथ तुगलक ने हाल में नजर आने वाली स्टील की सीढियों की तरफ इशारा किया था-"शायद आपकी समधन में कुछ आ सके !"
विजय ने उधर देखा…जिस शख्स पर नजर पडी, उसे देखकर बुरी तरह चोंका ।
पलक झपकते ही उसकी समझ में नुसरत तुगलक का पूरा प्लान आ गया था और...प्लान समझते ही दिमाग हवा हवाइ हो गया था । मानना पडा…नमूने वाकई चलते पुर्जे थे।
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"हमने खूब सोचा है गुरुदेव बल्कि घोट घोटकर इस सवाल क्रो पिया है और फिर ऐसा हल निकाला है कि ये दुनिया साली हमारे मुल्क से वह सवाल करेगी ही नहीं जिसके बूते पर सवार होकर आप हमारी लिमोजीन में आ बेठे ।"'
"भला दुनिया क्रो सवाल करने से कैसे रोक लोगे तुम?"
“रोक लेंगें । बूता है हममें ।'"
"बूता नहीं, खोपडी है। " तुगलक बीला…"वो खोपडी है जिससे ऐसी तरकीब निकलकर आईं है कि दुनिया साली वो सवाल ही न करे जो उसे करना चाहिए और. ..तुममें वो खोपड़ा नहीं है, तभी तो हमारे जाल में आ फंसे। मगर हम तुम्हें समझने का मोका जरूर देंगे । जब तुम्हारी समझ में हमारी पूरी आईसक्रीम आएगी तो हमारा दावा है…खुद ही अपनी खोपडी को फाढ़ लोगे ।"
"तो मियां, दो न हमें अपनी खोपडी फाड़ने का मोका। "
"देते हैँ हुजूरेआला । इतने उतावले क्यों हो रहे हो। " कहने के साथ वह एक दीवार की तरफ बढा था ।
नुसरत बोला…“वेसे भी, आपको यहां नहीं रखा जाएगा। यहां तो सिर्फ मंत्री महोदय से मिलाने लाया गया था। आपको तो यहा से भी शानदार जगह पर रखा जाएगा। " नुसरत का सेटैस खत्म होते होते तुगलक उस दीवार कै करीब पहुंच गया था जिसकी तरफ बढा था ।
फिर, उसने स्टील की दीवार पर एक खास अंदाज़ में तबला सा बजाया ।
परिणाम स्वरूप-हल्की सी गड़गड़ाहट के साथ दीवार मेँ तीन बाइ छ: का दरवाजा उत्पन्न हों गया ।
दरवाजे के बीच खडे होकर तुगलक ने ऐसा एक्शन करते हुए कहा जेसे फाइव स्टार होटल का दरबान करता है---"आइए हुजूर, आपके दौलतखाने में आपका इस्तकवाल हैं। "
विजय और उसके साथ नुसरत भी दरवाजा पार करके दूसरी तरफ पहुच गए।
नौशाद ने भी जब वेसा करना चाहा तो तुगलक ने उसे दरवाजे से पहले ही राकते हुए कहा …"तुम नहीं ।"
नौशाद अंसारी जहा' का तहां रुक गया।
अगले पल तुगलक भी दरवाजे के उस तरफ चला गया, साथ ही…दरवाजा बंद हो गया।
दीवार पहले जैसी नजर आने लगी । विजय ने देखा…इस वक्त वे तीस बाइ तीस के एक हाल में थे ओर उसके ठीक सामने एक ऐसा शख्स खड़ा था जिसकी कल्पना वह इस स्थान पर पहले ही कर चुका था।
वह किसी भी तरह छ: फुट दो इंच से कम न था । उसक पहाड जैसे बलिष्ट जिस्म पर ब्राऊन रंग का पठानी सूट था।
चेहरा अत्यंत चौडा।
मोटे मोटे होंठ ।
लंबी नाक और
जरूरत से ज्यादा बाहर को निकली हुईं ठोडी। मस्तक बहुत चोड़ा था।
पीछे की तरफ को कढे हुए लंबे बाल । लाल सुर्ख और गोलमटोल आंखे।
उसे विजय ही क्या, दुनिया के ज्यादातर लोग पहचानते थे ।
हाजी गल्ला था वह । तालिबानियों का सरदार ।
वह…जिसे किसी समय इंडियन गर्वमेंट इसलिए तिहाढ़ जेल से रिहा करने पर मजबूर हो गई थी क्योकिं उसके साथियों ने इंडिया का यात्रियों से भरा एक विमान किडनैप कर लिया था ।
तुगलक ने कहा -"इनसे मिलिए हुजूर, इन्हें...
"जनाब हाजी गल्ला कहते हैं ।" बात विजय ने पूरी की ।
"कमाल की बात है गुरुदेव आप तो इन्हें पहचानते हैं ।" नुसरत ने कहा -"अब तो शायद यह बताने की ज़रूरत भी नहीं रही कि कुतुबमीनार जेसी यह इमारत इन्हीं के लिए बनवाई गइ है ।"
"जो आग से खेलते हैं नुसरत मियां ।" जाने किस मूड में विजय ने शायराना अंदाज़ में कहा था…"वे एक दिन राख हो जाते ।"
"इस नई झकझकी का मतलब क्या हुआ हुजूर ?'"
"आतंकवादियों के इस सरगना को अपने मुल्क में तुम इसलिए पनाह दिए हुए हो कि इसके बूते पर एक दिन हिंदुस्तान में धूल उड़ा दोगे मगर याद रखना-पाकिस्तान जलाकर ये ही खाक करेगा ।"
बड़े ही अजीब ढंग से हंसा था हाजी गल्ला ।
बोला…"पाक की फिक्र बाद में करना मिस्टर बिजय, फिलहाल अपने मुल्क की ओर उससे भी ज्यादा खुद अपनी फिक्र करी ।”
"मतलब? ”
"इन हजरात से मिलो ।" कहने के साथ तुगलक ने हाल में नजर आने वाली स्टील की सीढियों की तरफ इशारा किया था-"शायद आपकी समधन में कुछ आ सके !"
विजय ने उधर देखा…जिस शख्स पर नजर पडी, उसे देखकर बुरी तरह चोंका ।
पलक झपकते ही उसकी समझ में नुसरत तुगलक का पूरा प्लान आ गया था और...प्लान समझते ही दिमाग हवा हवाइ हो गया था । मानना पडा…नमूने वाकई चलते पुर्जे थे।
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