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चुदाई का ज्ञान

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दीपाली बाहर गई और अपनी माँ से पूछा- क्या बात है?

(दोस्तो, आप सोच रहे होंगे कि कहानी इतनी आगे बढ़ गई मगर अब तक मैंने दीपाली की माँ और उसके पापा के बारे में आपको नहीं बताया तो आज बताती हूँ.. वैसे इन दोनों का कहानी में कोई रोल नहीं है इसलिए मैंने इनके बारे में नहीं लिखा.. मगर कुछ दोस्त जानना चाहते हैं तो उनके लिए बता देती हूँ।

दीपाली के पापा अनिल सिंह सरकारी ठेके लेते हैं.. जैसे कोई सरकारी बिल्डिंग बनानी हो या कोई सड़क वगैरह.. तो बस इन कामों में वो बहुत बिज़ी रहते हैं, रात को देर से घर आते हैं कई बार तो रात को आते ही नहीं हैं। दीपाली की शिकायत होती है कि कई-कई दिनों तक वो पापा से बात भी नहीं कर पाती और उसकी माँ सुशीला एक सीधी-साधी घरेलू औरत हैं घर-परिवार में बिज़ी रहती हैं। एक ही बेटी होने के कारण दीपाली को कोई कुछ नहीं कहता है।)

सुशीला- बेटी तूने कपड़े क्यों बदल लिए.. हमें बाहर जाना था।

दीपाली- इस वक़्त कहाँ जाना है?

सुशीला- अरे वो अनिता की कल बहुत तबीयत बिगड़ गई थी उसको रात अस्पताल ले गए हैं.. वहाँ उसको भर्ती कर लिया गया है.. अब मेरी इतनी खास दोस्त है वो.. अगर मैं नहीं जाऊँगी तो बुरा लगेगा …

दीपाली- ओह.. आंटी के पास आप का जाना जरूरी है.. मगर मैं वहाँ क्या करूँगी.. दो दिन बाद इम्तिहान हैं.. मैं यही रह कर पढ़ाई करती हूँ।

सुशीला- अरे नहीं बेटी, तेरे पापा का फ़ोन आया था.. वो आज नहीं आने वाले हैं और हॉस्पिटल भी काफ़ी दूर है.. आने-जाने में ही एक घंटा लग जाएगा.. अब उसके पास जाऊँगी तो एकाध घंटा वहाँ बैठना भी पड़ेगा ना.. तू इतनी देर अकेली क्या करेगी यहाँ.. तुझे अकेली छोड़ कर जाने का मेरा मन नहीं मान रहा है।

दीपाली- नहीं माँ.. प्लीज़ आप जाओ ना…

सुशीला- अरे आते समय बाजार से सामान भी लेते आएँगे.. खाना मैंने बना दिया है.. आकर सीधे खा कर सो जाएँगे चल ना…

दीपाली- माँ आप बेफिकर होकर जाओ और आराम से आओ मुझे कुछ नहीं होगा.. आप बिना वजह डरती हैं।

सुशीला- बड़ी ज़िद्दी है.. अच्छा तुझे भूख लगे तो खाना खा लेना.. मुझे आने में देर हो जाएगी.. दरवाजा बन्द रखना.. ठीक है।

दीपाली ने अपनी माँ को समझा कर भेज दिया और खुद कमरे में जाकर बिस्तर पर बैठ कर दीपक के लौड़े के बारे में सोचने लगी।

(अरे.. अरे.. दोस्तों आप भी ना याद ही नहीं दिलाते कि दीपाली के चक्कर में हम दीपक और प्रिया को तो भूल ही गए। चलो वापस पीछे चलते हैं.. दीपाली के घर से निकलने के बाद उन दोनों ने क्या किया.. वो तो देख लिया जाए।)

वो दोनों एक-दूसरे की चूत और लंड के मज़े ले रहे थे ... कोई दस मिनट बाद दोनों गर्म हो गए। प्रिया ने लौड़ा मुँह से निकाल दिया।

प्रिया- आ आहह.. भाई चाटो.. मज़ा आ रहा है.. उई आराम से भाई.. अपने अपने मोटे मूसल से मेरी छोटी सी चूत का हाल बिगाड़ दिया है.. सूज गई है आहह.. आई.. आराम से…

दीपक- बस बहना, अब लौड़ा आग उगलने लगा है.. चल अब तुझे दोबारा चोदता हूँ मगर अबकी बार प्यार से चोदूँगा। तू ऐसा कर कुतिया बन जा.. मज़ा आएगा।

प्रिया- हा हा हा भाई कुतिया नहीं घोड़ी बनती हूँ।

दीपक- अब मैं कुत्ता हूँ तो तुझे कुतिया ही बनाऊँगा ना.. भला कुत्ता घोड़ी को कैसे चोदेगा..

प्रिया- भाई आप अपने आप को कुत्ता क्यों बोल रहे हो?
 
दीपक- अरे यार बन जा ना.. क्या फरक पड़ता है.. घोड़ी बोल या कुतिया.. बनना तो जानवर ही है ना.. समझी…

प्रिया कुतिया बन जाती है.. पैरों को ज़्यादा चौड़ा कर लेती है जिससे उसकी चूत का मुँह खुल जाता है। दीपक लौड़े पर थूक लगा कर उसे चूत पर टीका देता है और आराम से अन्दर डालने लगता है।

प्रिया- आहह.. उ भाई आहह.. हाँ ऐसे ही धीरे आहह.. धीरे.. पूरा आ आहह.. घुसा दो आहह.. मेरी चूत कब से तड़प रही है आहह..

दीपक- डर मत मेरी बहना.. अबकी बार बहुत प्रेम से से घुसाऊँगा लंड .. तुझे पता भी नहीं चलेगा.. आज तेरी चूत को ढीला कर दूँगा। उसके बाद तो रोज तुझे चोदूँगा.. आहह.. क्या कसी हुई चूत है तेरी आहह.. बहन.. चुदवायेगी क्या रोज मुझसे.. आहह.. मज़ा आ गया।

प्रिया- भाई आप कैसी बात करते हो.. मैं आपकी ही हूँ जब चाहो चोद लेना.. आहह.. अब तो बस आपके लौड़े की दीवानी हो गई मैं आहह.. उई आराम से भाई आहह.. रोज चुदवाऊँगी आहह.. आपसे…

दीपक कुछ ही देर में पूरा लौड़ा जड़ तक चूत में घुसा देता है। प्रिया को दर्द तो हो रहा था मगर चूत-चटाई से वो बहुत उत्तेजित हो गई थी। उसकी वासना के आगे दर्द फीका पड़ गया था।

प्रिया- आहह.. भाई मज़ा आ रहा है आहह.. अब झटके मारो, मेरी चूत पानी-पानी हो रही है आहह.. चोदो भाई आहह.. चोदो..

दीपक अब झटके मारने लगा था और धीरे-धीरे उसकी रफ़्तार तेज़ होने लगी थी। प्रिया भी अब गाण्ड पीछे धकेल कर चुदाई का पूरा मज़ा ले रही थी।

प्रिया- आह फक मी आहह.. माय सेक्सी ब्रदर आहह.. फक मी डीप.. आहह.. फक मी हार्ड.. आह यू आर सो सेक्सी आह एंड युअर डिक इज वेरी लोंग आहह.. आहह..

दीपक- उहह उहह क्या बात है बहन आह.. बड़ी अँग्रेज़ी बोल रही है.. आहह.. ले संभल आहह.. तू बोलती रह आहह... आज तेरा भाई बहनचोद बन गया है, तू भी आ भाईचुदाऊ बन गई ... आहह।

प्रिया- आहह.. भाई आप बड़े कुत्ते हो आहह.. स्कूल में सब लड़कियों के चूचे और गाण्ड आहह.. देखते हो.. कभी आहह.. उ आहह.. अपनी बहन पर भी आ नज़र मार लेते आहह.. तो अब तक अई आई.. ससस्स तो कई बार अई आपसे चुद चुकी होती।

दीपक- उह आहह.. साली मुझे क्या पता था आहह.. तू इतनी बड़ी रंडी निकलेगी.. अपने भाई के ही लौड़े को लेने की तमन्ना रखती है उह उह! अब तक तो मैं कब का तेरी चूत और गाण्ड का मज़ा ले लेता आहह.. तेरी चूत का चूरमा और गाण्ड का गुलकंद बना देता मैं.. आहह.. ले उहह उहह।

प्रिया- आहह आई.. फास्ट भाई आ मेरा पानी आने वाला है आई.. आहह.. ज़ोर से आह और फास्ट आहह..

दीपक उसकी बातों से बहुत ज़्यादा उत्तेजित हो गया था और अब चुदाई की रेलगाड़ी ने रफ़्तार पकड़ ली थी.. राजधानी भी उसके आगे हर मान जाए इतनी तेज़ी से लौड़ा चूत के अन्दर-बाहर हो रहा था। इसका अंजाम तो आप जानते ही हो ... प्रिया की चूत ने पानी छोड़ दिया और उसके अहसास से दीपक के लौड़े ने भी बरसात शुरू कर दी। दोनों काफ़ी देर तक झड़ते रहे और उसी अवस्था में पड़े रहे।
 
प्रिया- आह भाई, मज़ा आ गया आज तो.. अब उठो भी, ऐसे ही पड़े रहोगे क्या.. मुझे घर भी जाना है वरना माँ को शक हो जाएगा।

दीपक- हाँ तूने सही कहा.. देख किसी को जरा भी भनक मत लगने देना.. वरना हम तो क्या हमारे घर वाले भी किसी को मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहेंगे।

प्रिया ने ‘हाँ’ में अपना सर हिला दिया और जब वो उठने लगी उसको चूत और पैरों में बड़ा दर्द हुआ।

प्रिया- आईईइ उईईइ माँ! मर गई रे.. आहह.. भाई, मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा आहह.. आपने तो मेरी टाँगें ही थका दीं..

दीपक ने उसको सहारा दिया और खड़ी करके उसको हाथ पकड़ कर चलाया।

दीपक- आराम से चल.. कुछ नहीं होगा.. मैं तुझे दवा ला दूँगा.. दर्द नहीं होगा.. अभी थोड़ी देर यहीं चल के देख ... नहीं तो घर पर जबाव देना मुश्किल हो जाएगा कि क्या हुआ है..

प्रिया- आहह.. उई! पहली बार में आप जानवर बन गए थे.. कैसे ज़ोर से लौड़ा घुसाया था.. उई ... ये उसकी वजह से हुआ है।

दीपक- अरे पहली बार तो इंसान ही था.. कुत्ता तो दूसरी बार बना था हा हा हा हा।

प्रिया- बस भी करो.. आपको मजाक सूझ रहा है.. मेरी हालत खराब है।

दीपक- अब चुदने का शौक चढ़ा है तो दर्द भी सहना सीखो.. अभी तो तेरी गाण्ड की गहराई में भी लौड़ा घुसना है.. आज वक्त कम है.. नहीं तो आज ही तेरी गाण्ड का भी मुहूरत कर देता।

प्रिया- आहह.. ना भाई.. आहह.. आप बस चूत ही लेना.. गाण्ड का नाम भी मत लो.. चूत का ये हाल कर दिया.. ना जाने गाण्ड को तो फाड़ ही दोगे।

दीपक हँसने लगा और बहुत देर तक वो प्रिया को वहीं घुमाता रहा.. जब प्रिया ठीक से चलने लगी, तब दीपक ने कमरे का हाल ठीक कर दिया और दोनों ने कपड़े पहन लिए।

जब दोनों बाहर निकले तो दीपक ने प्रिया से कहा- कल रविवार है, दीपाली को यहाँ बुला लेना.. तीनों मिल कर मज़ा करेंगे.. चाभी तू अपने पास ही रखना।

प्रिया- हाँ भाई.. ये सही रहेगा.. अब आप जाओ.. हम साथ गए तो किसी को शक होगा.. मैं पीछे से आऊँगी।

दीपक- तू धीरे-धीरे आराम से जाना और घर में बड़े ध्यान से अन्दर जाना.. मैं थोड़ी देर में दवा ले कर आता हूँ.. वैसे भी मैंने सारा पानी तेरी चूत में भर दिया था.. कहीं कुछ हो गया तो लेने के देने पड़ जाएँगे.. दर्द की दवा के साथ कुछ गर्भनिरोधी दवा भी लेता आऊँगा ओके.. अब जा…

दोनों वहाँ से अलग-अलग हो गए और घर की तरफ़ जाने लगे।

(चलो दोस्तों, आपको पता चल गया कि दीपाली के जाने के बाद इन दोनों ने क्या किया था। अब वापस कहानी को वहीं ले चलती हूँ.. जहाँ से हम पीछे आए थे।)
 
दीपाली अपने कमरे में बैठी दीपक के लौड़े के बारे में सोच रही थी और बड़बड़ा रही थी।

दीपाली- हाय क्या मस्त लौड़ा था दीपक का.. मज़ा आ गया चूस कर.. काश एक बार चूत में ले लेती.. आहह.. एक तो विकास सर नहीं मिले और ये दीपक भी हाथ नहीं आया.. अब क्या करूँ.. इस चूत की खुजली का.. कोई तो इलाज करना होगा.. आज तो कुछ ज़्यादा ही बहक रही है ये निगोड़ी चूत उफ…

दीपाली अपनी चूत को बड़े प्यार से सहला रही थी.. तभी बाहर से कोई आवाज़ उसके कानों में आई। कुछ देर उस आवाज़ को सुन कर उसने कुछ सोचा और अचानक से खड़ी हो गई और वो झट से दरवाजे की तरफ भागी। बाहर से लगातार आवाज़ आ रही थी।

‘कोई इस अंधे गरीब की मदद कर दो.. है कोई देने वाला.. अंधे को देगा.. दुआ मिलेगी..’

(दोस्तों आप ठीक सोच रहे हो.. ये वही अँधा भिखारी है.. जो रास्ते में मिला था। अब आप देखो आगे क्या होता है।)

दीपाली ने दरवाजा खोला तो वो भिखारी जा रहा था।
 
दीपाली- रूको बाबा, यहाँ आओ ... आपको खाना देती हूँ।

भिखारी- अँधा हूँ बेटी.. कहाँ हो? मालिक तेरा भला करेगा।

दीपाली ने बाहर इधर-उधर देखा.. कोई नहीं था.. वो झट से बाहर गई और उसका हाथ पकड़ कर घर के अन्दर ले आई।

दीपाली- यहाँ आओ बाबा मेरे साथ.. चलो खाना देती हूँ।

वो उसके साथ अन्दर आ गया। दीपाली ने उसे अन्दर ला कर वहीं बैठने को कहा और खुद खाना लेने अन्दर चली गई। अन्दर जा कर दीपाली सोचने लगी कि इसका पूरा लंड कैसे देखूँ! इस का सुपाड़ा तो काफी बड़ा है.. अब क्या करूँ जिससे पूरा लौड़ा दिख जाए। तभी उसे एक आइडिया आया.. वो वापस बाहर आई।

दीपाली- बाबा, आप कौन हो? जवान हो.. बदन भी ठीक-ठाक है.. आप बचपन से अंधे हो या कोई और वजह से हो गए और आपने ये क्या फटे-पुराने कपड़े पहन रखे हैं?

भिखारी- बेटी, मैं पहले अच्छा था. ट्रक में माल भरने का काम करता था.. मुझमें बहुत ताक़त थी.. दो आदमी का काम अकेले कर देता था। आठ महीने पहले एक दिन सड़क पर किसी गाड़ी ने टक्कर मार दी.. उसमें मेरी आँखें चली गईं.. अब पहले से ही मेरा कोई नहीं था तो मुझे कौन संभालता.. सरकारी अस्पताल में इलाज फ्री हो गया.. अब कोई काम तो होता नहीं है.. इसलिए भीख माँग कर गुजारा कर लेता हूँ.. कपड़े भी फट गए हैं.. अब मैं दूसरे कपड़े कहाँ से लाऊँ?

दीपाली- ओह्ह! सुन कर बड़ा दुख हुआ.. अच्छा, आपका कोई घर तो होगा ना…

भिखारी- पहले एक किराए के कमरे में रहता था.. अब वो भी नहीं रहा.. अब तो बस दिन भर घूम कर माँगता हूँ और रात को जहाँ जगह मिल जाए.. वहीं सो जाता हूँ।

दीपाली- मेरे पास मेरे पापा के पुराने कपड़े हैं.. मैं आपको देती हूँ.. ये कपड़े निकाल दो, पूरे फट गए हैं.. आपके बदन पर कितना मैल जमा है, नहाते नहीं क्या कभी?

भिखारी- बेटी, ना घर का ठिकाना है.. ना कुछ और.. सड़कों के किनारे सोने वाला कहाँ से नहाएगा?

दीपाली- ओह, आपकी बात भी सही है.. ऐसा करो यहाँ मेरे घर में नहा लो.. उसके बाद आपको कपड़े दूँगी.. चलो मैं आपको बाथरूम तक ले चलती हूँ।

भिखारी- नहीं.. नहीं.. बेटी, रहने दो.. आज के जमाने में भिखारी को लोग घर के दरवाजे पर खड़ा करना पसन्द नहीं करते.. तुम तो घर के अन्दर तक ले आईं.. और अब अपने बाथरूम में नहाने को बोल रही हो।

दीपाली कुछ सोचने लगी.. उसके बाद उसने कहा- देखो बाबा, मेरी नज़र में अमीर-गरीब सब एक जैसे हैं.. आप किसी बात का फिकर मत करो.. आओ नहा लो.. मैं साबुन तौलिया सब दे देती हूँ।

भिखारी- मालिक, तुम्हारा भला करेगा बेटी.. तुम घर में अकेली रहती हो क्या.. यहाँ और किसी की आवाज़ नहीं सुनने को मिली।

दीपाली- इस वक़्त अकेली हूँ.. सब बाहर गए हैं.. अब चलो, बातें बाद में कर लेना और ये फटे-पुराने कपड़े निकाल कर वहीं रख देना.. मैं कचरे में डाल दूँगी।

दीपाली उसका हाथ पकड़ कर उसे बाथरूम में ले गई और उसको अन्दर खड़ा कर के पानी चालू कर दिया, उसके हाथ में साबुन दे दिया। दीपाली अच्छे पैसे वाले घर की थी। उसका बाथरूम काफ़ी बड़ा था। आम आदमी के कमरे से भी बड़ा था।

दीपाली- बाबा, तौलिया ये आपके दाहिनी तरफ़ खूंटी पर टंगा है। मैं दरवाजा बाहर से बन्द कर देती हूँ.. जब आप नहा लो तो आवाज़ दे देना.. मैं खोल दूँगी। आप अन्दर से बन्द करने की कोशिश मत करना.. ये चाभी वाला लॉक है.. कहीं आपसे बाद में नहीं खुला तो मुसीबत हो जाएगी।

भिखारी- ठीक है बेटी, जैसा तुम कहो.. मगर कपड़े तो ला देतीं.. नहा कर में पहन कर बाहर आ जाता।

दीपाली- आप नहा लो.. मैं बाहर रख कर लॉक खोल दूँगी.. आप बाद में उठा लेना.. ठीक है.. अब मैं दरवाजा बन्द करके जाती हूँ आप आराम से नहा लो।

दीपाली ने दरवाजा ज़ोर से बन्द किया ताकि उसे पता चल जाए कि बन्द हो गया और फ़ौरन ही धीरे से वापस भी खोल दिया. बेचारा भिखारी अँधा था.. उसको पता भी नहीं चला कि एक ही पल में दरवाजा वापस खुल गया है। अब उसने फटी हुई बनियान निकाल कर साइड में रख दी और जैसे ही उसने कच्छा निकाला उसका लौड़ा दीपाली के सामने आ गया। उसका मुँह भी इसी तरफ था.. दीपाली तो बस देखती रह गई।

लौड़े के इर्द-गिर्द झांटों का बड़ा सा जंगल था.. जैसे कई महीनों से उनकी कटाई ना हुई हो और उस जंगल के बीचों-बीच किसी पेड़ की तरह लंड महाराज लटके हुए थे.. हालाँकि लौड़ा सोया हुआ था मगर फिर भी कोई 5″ का होगा और मोटा भी काफ़ी था।
 
दीपाली चुपचाप वहीं खड़ी बस उसको देखती रही.. वो भिखारी शायद कई दिनों से नहाया नहीं था पानी के साथ उसके बदन से काली मिट्टी निकल रही थी। वो साबुन को पूरे बदन पर अच्छे से मल रहा था.. जब उसने नीचे के हिस्से पर साबुन लगाया तो उसके हाथ लंड को भी साबुन लगाने लगे ... शायद उसे बड़ा मज़ा आ रहा था। लौड़े पर साबुन लगाते-लगाते उसने कई बार लौड़े को आगे-पीछे कर दिया.. जिससे उसकी उत्तेजना जाग गई.. लंड महाराज अंगड़ाई लेने लगे जैसे बरसों की नींद के बाद जागे हों और लंड अकड़ने लगा। ... जब लंड महाराज अपने विकराल रूप में आ गए तो दीपाली की आँखें फटने लगीं और उसका कलेजा मुँह को आ गया और आता भी क्यों नहीं? भिखारी का लौड़ा था ही ऐसा…

(दोस्तो, उसकी लंबाई कोई 9″ की होगी और मोटा इतना कि दीपाली की कलाई के बराबर.. और उसका सुपाड़ा एकदम गुलाबी, किसी कश्मीरी सेब की तरह अलग ही चमक रहा था.. कड़कपन ऐसा कि उसके सामने लोहे की रॉड भी फेल लगे।)

दीपाली के होश उड़ गए। वो नजारा देख कर उसका हाथ अपने आप चूत पर चला गया.. उसकी ज़ुबान लपलपाने लगी। दीपाली मन ही मन सोचने लगी कि इतना बड़ा और मोटा लौड़ा अगर चूसने को मिल जाए तो मज़ा आ जाए। वो बस उसके ख्यालों में खो गई।

भिखारी 25 मिनट तक अच्छे से रगड़-रगड़ कर नहाया। इस दौरान उसका लौड़ा किसी फौजी की तरह खड़ा रहा। शायद उसे दीपाली की चूत की खुश्बू आ गई थी.. या सामने खड़ी दीपाली का यौवन दिख रहा था।

(अरे नहीं, आप गलत समझ रहे हैं.. भिखारी तो बेचारा अँधा है.. उसको कहाँ कुछ दिखेगा। मैं तो उसके लौड़े की बात बता रही हूँ.. वो थोड़ी अँधा है! हा हा हा हा। चलो बुरा मान गए आप.. मैं बीच में आ गई, आप आगे मजा लीजिए।)

भिखारी नहा कर एकदम ताजा दम हो गया.. उसके जिस्म में एक अलग ही चमक आ गई। उसका रंग साफ था और लौड़ा भी किसी दूध की कुल्फी जैसा सफेद था। भिखारी ने तौलिए से बदन साफ किया और उसे अपने जिस्म पर लपेट लिया।

भिखारी- बेटी कहाँ हो.. मैंने नहा लिया.. लाओ कपड़े दे दो…

उसकी आवाज़ सुनकर दीपाली को होश आया.. उसने दरवाजे को धीरे से बन्द किया।

दीपाली- हाँ यहीं हूँ.. आप तौलिया लपेट लो.. मैं दरवाजा खोल रही हूँ।

भिखारी- हाँ खोल दो.. मैंने लपेट रखा है।

दीपाली ने आवाज़ के साथ दरवाजा खोला ताकि उसको शक ना हो।

दीपाली- बाबा, बाहर आ जाओ आपको दिखता तो है नहीं.. अन्दर पानी है.. कपड़े वहाँ पहनोगे तो गीले हो जाएँगे.. बाहर आराम से पहन लो.. मैं आपको कपड़े दे देती हूँ।

भिखारी थोड़ा शर्म महसूस कर रहा था.. मगर वो बाहर आ गया। दीपाली उसका हाथ पकड़ कर कमरे में ले आई और बिस्तर के पास जा कर उसके कंधे पर हाथ रख कर बैठने को कहा।

भिखारी- बेटी, कपड़े दे दो ना..

दीपाली- अरे बैठो तो.. एक मिनट में देती हूँ ना…

बेचारा मरता क्या ना करता बिस्तर पर बैठ गया। दीपाली अलमारी से हेयर आयल की बोतल ले आई और उसके एकदम करीब आ कर खड़ी हो गई।

दीपाली- अब इतने दिन से नहाए हो.. तो सर में थोड़ा सा तेल भी लगा देती हूँ ताकि बाल मुलायम हो जाएं।

भिखारी- अरे नहीं.. नहीं.. बेटी, रहने दो.. मुझे बस कपड़े दे दो।

वो आगे कुछ बोलता दीपाली ने तेल हाथ में ले कर उसके सर पर लगाने लगी।

दीपाली- रहने क्यों दूँ.. अब लगाने दो.. चुप कर के बैठो.. बस अभी हो जाएगा।

दीपाली तेल लगाने के बहाने उसके एकदम करीब हो गई.. उसके मम्मे भिखारी के मुँह के एकदम पास थे। दीपाली के बदन की मादक करने वाली महक.. उसको आ रही थी। अब था तो वो भी एक जवान ही ना.. अँधा था तो क्या हुआ.. मगर दीपाली के इतना करीब आ जाने से उसकी सहनशक्ति जबाव दे गई और उसका लौड़ा अकड़ना शुरू हो गया। दीपाली ने एक-दो बार अपने मम्मों को उसके मुँह से स्पर्श भी कर दिया और अपने नाज़ुक हाथ सर से उसकी पीठ तक ले गई.. जिससे उसका लौड़ा फुफकारने लगा.. तौलिया में तंबू बन गया।

भिखारी- ब्ब..बस, अब रहने दो.. म..म..मुझे जाना है।

दीपाली- अरे क्या हुआ, बाबा.. अभी तो आपने खाना भी नहीं खाया.. अच्छा ये बताओ मैंने आपके लिए इतना किया आप मुझे क्या दोगे?

भिखारी- म..मैं क्या दे सकता हूँ. बेटी ... मुझ भिखारी के पास है ही क्या देने को?

दीपाली- बाबा, आपके पास तो इतनी कीमती चीज़ है.. जो शायद ही किसी और के पास होगी।

इस बार दीपाली का बोलने का अंदाज बड़ा ही सेक्सी था।

भिखारी- अच्छा, क्या है मेरे पास?

दीपाली ने उसके लौड़े पर सिर्फ़ अपनी एक ऊँगली टिका कर आह भरते हुए कहा- ये है आपके पास.. इसके जैसा शायद किसी के पास नहीं होगा।
 
आप सभी को कमेंट के लिए थैंक्स।कहानी जारी रहेगी।अगला अपडेट जल्दी ही।कहानी के बारें में अपनी राय अवश्य दें।thanks
 
SID4U

Bhai maine bhi wo link padha.kahani to wahi hai lekin sabhi name change hai.aap chinta na kare agli kahani jaldi hi shuru karungaa.thanks
 
भिखारी एकदम घबरा गया और झटके से उठ गया। इसी हड़बड़ाहट में तौलिया खुल कर उसके पैरों में गिर गया और फनफनाता हुआ उसका विशाल लौड़ा आज़ाद हो गया।

भिखारी- न..नहीं ब..ब..बेटी, यह गलत है.. म..मुझे जाने दो।

दीपाली- आप तो ऐसे घबरा रहे हो जैसे आप लड़की हो और मैं लड़का।

भिखारी- डरना पड़ता है बेटी, तुम ठहरी पैसे वाली और मैं एक गरीब आदमी.. कोई आ गया तो तुमको कोई कुछ नहीं कहेगा.. मैं फालतू में मारा जाऊँगा।

दीपाली ने लौड़े पर हाथ रख दिया और बड़े प्यार से सहलाती हुई बोली।

दीपाली- बाबा, कोई नहीं आएगा. प्लीज़.. मना मत करो.. आपका लंड बहुत मस्त है.. थोड़ा प्यार कर लेने दो मुझे.. आप भी तो मर्द हो, आपका मन नहीं करता क्या?

लौड़े पर दीपाली के नर्म मुलायम हाथ लगते ही उसका तनाव और बढ़ गया और भिखारी भी अब लय में आ गया।

भिखारी- आहह.. करता है, बेटी.. मगर मुझ अंधे को कहाँ ये नसीब होता है।

दीपाली- उह.. इसका मतलब आपने कभी कुछ नहीं किया।

दीपाली बातों के दौरान लौड़े को सहलाए जा रही थी और कभी-कभी दबा भी देती।

भिखारी- आहह.. ऐसी बात नहीं है.. पहले तो कभी-कभी मेरे पड़ोस की भाभी के मज़े ले लेता था.. आहह.. उफ.. अब जब से अँधा हुआ हूँ तब से तो लंड प्यासा ही है।

अब भिखारी भी खुल गया था और लंड जैसे शब्द बिंदास बोल रहा था।

दीपाली- उह.. इसका मतलब महीनों से प्यासे घूम रहे हो.. ओफ कितना मस्त लौड़ा है आपका.. मन करता है चूस कर मज़ा ले लूँ मगर आपके बाल बहुत ज़्यादा हैं।

भिखारी- बाल तो बड़े हो गए.. अब कैसे साफ करूँ इनको.. आहह.. चूस लो ना.. मेरा भी मन करता है कि कोई मेरे लौड़े को चूसे.. आहह.. वैसे तेरी उम्र क्या होगी?

दीपाली- एक आइडिया है.. आओ बाथरूम में.. अभी दस मिनट में आपके बाल साफ कर दूँगी.. उसके बाद मज़ा करेंगे।

भिखारी भी इस बात के लिए फ़ौरन राज़ी हो गया और होता भी क्यों नहीं.. वो कहावत तो आपने सुनी ही होगी ‘बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले ना भीख.’ और यहाँ कुछ हाल ऐसा है ‘माँगा था खाना और मिल रही है फ्री की चूत.’

दीपाली उसे बाथरूम में ले गई और पहले तो कैंची से उस जंगल को काटा और उसके बाद हेयर रिमूवर से उसके बाल साफ किए. साथ ही साथ अपनी चूत भी दोबारा क्लीन कर ली। इन सब कामों में 15 मिनट लग गए। हाँ.. इस दौरान उन दोनों में बातें हुईं जो कुछ खास नहीं थीं क्योंकि काम के वक्त बात ज़्यादा नहीं होती।

अब दीपाली ने जब लौड़े पर पानी डाला तो एक अलग ही लंड उसके सामने था, एकदम चिकना बम्बू जैसा ... उसकी जीभ लपलपा गई।

दीपाली- वाउ.. क्या मस्त लग रहा है अब लौड़ा.. चलो अब बाहर चलो, बिस्तर पर।

भिखारी- तुम्हारा नाम क्या है.. अब बेटी बोलने का मन नहीं कर रहा तुम्हें.. और तुमने बताया नहीं कि तुम कितने साल की हो।

दीपाली- नाम का क्या अचार डालना है.. आप कुछ भी बोल दो ... मेरी उम्र भी नहीं बताऊँगी, बस इतना जान लो.. बालिग हो गई हूँ अब चलो भी…

भिखारी- तुम बहुत होशियार हो, मत बताओ कुछ भी.. मगर अपना यौवन तो छूने दो मुझे.. मेरे करीब आओ.. मेरा कब से तुम्हारे चूचे छूने का दिल कर रहा है।

दीपाली उसके साथ ही तो थी और उसने सिर्फ़ नाईटी पहन रखी थी मगर भिखारी ने जानबूझ कर ये बात कही क्योंकि वो कोई जल्दबाज़ी नहीं करना चाहता था।

दीपाली- मैं कब से आपके पास ही तो हूँ.. अगर मन था तो मेरे मम्मों को पकड़ लेते.. रोका किसने था..

भिखारी- अब तो बिस्तर पर जा कर ही शुरूआत करूँगा.. चलो, ले चलो.

दीपाली ने उसका हाथ पकड़ने की बजाए खड़ा लौड़ा पकड़ लिया और चलने लगी.. जैसे हम किसी बच्चे का हाथ पकड़ कर चलते हैं। लौड़ा तो कब से खड़ा ही था क्योंकि झांटें दीपाली ने साफ की और कब से लौड़े पर उसके नरम हाथ लग रहे थे.. वो तो लोहे जैसा सख़्त हो गया था।

बिस्तर पर जा कर दीपाली ने नाईटी निकाल दी और एकदम नंगी हो गई.. उसने भिखारी को अपने करीब बैठा लिया।

दीपाली- लो बाबा, अब जो छूना है छू लो.. मैं आपके पास बैठी हूँ और मुझे तो पहले आपके लौड़े का स्वाद चखना है।

भिखारी- मेरी जान, अब तुम बाबा मत कहो.. कुछ और कहो और लौड़े को जितना चूसना है.. चूस लेना.. पर पहले तेरे चूचे तो दबा कर देखने दे।

ये बोलते-बोलते भिखारी ने दीपाली के मम्मों को अपने हाथों में लेकर देखे.. बड़े ही कड़क और मस्त मम्मे थे।

भिखारी- वाह.. क्या मस्त अमरूद हैं तेरे.. आज तो मज़ा आ जाएगा तू तो कमसिन कली है.. मैंने ऐसा कौन सा पुन्य का काम किया था जो तेरी जैसी कमसिन चूत भीख में मिल गई.. वाह.. क्या मस्त चूचे हैं तेरे।
 
दीपाली- आहह.. उई आराम से, मेरे राजा.. आपका लौड़ा कब से खड़ा है.. लाओ मुझे चूसने दो.. आहह.. आप बाद में मेरे मज़े ले लेना आहह.. पहले लौड़ा चूसने दो ना.. मैं कब से तरस रही हूँ आहह..

दीपाली नीचे बैठ गई और लौड़े का सुपारा चाटने लगी। वो इतना मोटा था कि उसने बड़ी मुश्किल से मुँह में ले पाया। अब वो आराम से लौड़ा चूसने लगी थी।

भिखारी- आहह.. चूस मेरी जान.. आह आज कई महीनों बाद मेरे लौड़े को सुकून मिलेगा.. आहह.. कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि तेरे जैसी कमसिन कली के नाज़ुक होंठ मेरे लौड़े पे लगेंगे।

दीपाली को कुछ होश नहीं था.. वो तो बस लौड़ा चूसे जा रही थी और भिखारी उसके सर पर हाथ घुमा रहा था। पाँच मिनट बाद दीपाली की चूत भी वासना की आग में जलने लगी.. तब कहीं उसने लौड़ा मुँह से निकाला।

दीपाली- ऐसा करो मैं आप के ऊपर उल्टी लेट जाती हूँ.. आप मेरी चूत चाटो और मैं आपका लंड चूसती हूँ।

भिखारी- नहीं ये सब बाद में.. पहले तुम सीधी लेट जाओ.. और मेरा कमाल देखो.. मैं कैसे तुम्हारे जिस्म को चूमता हूँ.. तुम मेरी चुसाई को जिंदगी भर नहीं भूल पाओगी.. चलो सीधी हो जाओ अभी तो तेरे मखमली होंठों को चूसना है.. उसके बाद धीरे-धीरे तेरी चूत तक आऊँगा.. देखना मेरा वादा है… चूत तक आते-आते अगर तू ठंडी ना हो गई ना.. तो जो तू कहे वो करूँगा..

दीपाली- अच्छा मेरे राजा.. ये बात है.. चूत को चाटे बिना मुझे ठंडी कर दोगे.. चलो आ जाओ, मैं भी देखती हूँ.. आज मेरी कैसी चुसाई करते हो।

दीपाली सीधी लेट गई और भिखारी उस पर चढ़ गया.. इस तरह चढ़ा कि लौड़ा दीपाली की जाँघों में फँस गया और वो दीपाली के होंठ चूसने लगा। उसके हाथ भी हरकत में थे.. कभी उसके कान के पीछे ऊँगली घुमाता तो कभी मम्मों के बीच की घाटी में.. दीपाली भी उसका साथ दे रही थी। थोड़ी देर बाद उसने होंठों को छोड़ दिया और दीपाली की गर्दन चूसने लगा। दीपाली तड़पने लगी थी उसकी चूत से लार टपकने लगी थी।

दीपाली- आहह.. उई वाह.. मेरे राजा आहह.. क्या मस्त चूस रहे हो.. आह गर्दन से भी चुदास पैदा होती है मुझे पता ही नहीं था.. आहह.. चूसो आहह..

भिखारी पक्का लौण्डीबाज या चोदू था.. वो तो ऐसे चूस रहा था जैसे दीपाली उसकी लुगाई हो और सारी रात उसके पास रहेगी.. उसको किसी के आने का जरा भी डर नहीं था, इतने आराम से सब कर रहा था कि बस दीपाली तो वासना की आग में जलने लगी। उसको हर पल यही महसूस हो रहा था कि अब ये लौड़ा चूत में डाल दे.. अब डाल दे.. मगर वो कहाँ डालने वाला था.. वो तो अभी गर्दन से उसके रसीले चूचों तक आया था जिनको वो एक-एक करके मुठ्ठी में ले कर दबा और चूस रहा था।

दीपाली- आ आहह.. उह.. प्लीज़ आहह.. अब चूत चाटो ना.. आहह.. मज़ा आ रहा है.. उफ़फ्फ़ पूरे जिस्म में आग लग रही है.. उई क्या मस्त चूस रहे हो आहह..

भिखारी- जलने दो मेरी जान.. आहह.. जितना जल सकता है.. तेरा बदन जलने दे.. तेरी चूत को रस टपकाने दे.. पूरी गीली हो जाने दे.. तभी तेरी चूत मेरा लंड ले पाएगी.. नहीं तो मेरे हथियार का वार सहन नहीं कर पाएगी।

दीपाली- आहह.. उह.. मेरे राजा मैं कोई कुँवारी नहीं हूँ जो सह नहीं पाऊँगी.. आहह.. मैं चूत में कई बार लौड़ा ले चुकी हूँ.. आहह.. अब सब वार सह लिए हैं.. आराम से करो ना.. आहह.. सह लूँगी.. एक बार लौड़ा डाल कर तो देखो.. मेरे राजा।

भिखारी- अभी बच्ची हो.. नहीं जानती कि क्या बोल रही हो.. ये लौड़ा कोई मामूली नहीं.. तुमने बच्चों के लंड लिए होंगे.. आज तेरा असली मर्द से पाला पड़ा है.. देखना अब तक के सारे लौड़े भूल जाओगी।

दीपाली- आहह.. उफ देखती हूँ आहह.. वैसे आपका लौड़ा है बहुत लम्बा.. और मोटा भी आहह.. मगर कुछ भी हो.. पूरा ले लूँगी.. आहह.. अब डाल भी दो.. मत तड़पाओ।

भिखारी अपने काम में लगा हुआ था.. अब चूचों से नीचे.. वो पेट पर आ गया था और अपनी जीभ पूरे पेट पर घुमा रहा था। दीपाली बहुत ज़्यादा गर्म हो गई थी। वो भिखारी के बाल पकड़ कर खींचने लगी थी कि अब डाल दो मगर वो पक्का खिलाड़ी था.. सब सहता गया और पेट से उसकी जाँघों को चूसने लगा। दीपाली को लगा.. अब चूत पर मुँह आएगा मगर वो जाँघों से नीचे चला गया और उसके पैर के अंगूठे को चूसने लगा। बस उसी पल दीपाली की चूत का बाँध टूट गया और वो कमर को उठा-उठा कर झड़ने लगी। बस भिखारी समझ गया कि उसका फव्वारा छूट गया है.. उसने फ़ौरन अपनी जीभ चूत पर लगा दी और रस को चाटने लगा।

दीपाली- ससस्स आह ससस्स अब क्या फायदा.. आहह.. कब से बोल रही थी तब तो चूत को टच भी नहीं किया और अब चाट रहे हो.. जब मेरा पानी निकल गया आहह..

भिखारी- मैंने कहा था ना.. बिना चूत को छुए.. तुम्हें ठंडी कर दूँगा.. वो मैंने कर दिया.. अब दोबारा गर्म भी मैं ही करूँगा और मेरा लंड जो कब से तेरी चूत में जाने के लिए तरस रहा है.. उसको भी आराम दूँगा.. तू बस ऐसे ही पड़ी रह।
 
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