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Guest
दीपाली बाहर गई और अपनी माँ से पूछा- क्या बात है?
(दोस्तो, आप सोच रहे होंगे कि कहानी इतनी आगे बढ़ गई मगर अब तक मैंने दीपाली की माँ और उसके पापा के बारे में आपको नहीं बताया तो आज बताती हूँ.. वैसे इन दोनों का कहानी में कोई रोल नहीं है इसलिए मैंने इनके बारे में नहीं लिखा.. मगर कुछ दोस्त जानना चाहते हैं तो उनके लिए बता देती हूँ।
दीपाली के पापा अनिल सिंह सरकारी ठेके लेते हैं.. जैसे कोई सरकारी बिल्डिंग बनानी हो या कोई सड़क वगैरह.. तो बस इन कामों में वो बहुत बिज़ी रहते हैं, रात को देर से घर आते हैं कई बार तो रात को आते ही नहीं हैं। दीपाली की शिकायत होती है कि कई-कई दिनों तक वो पापा से बात भी नहीं कर पाती और उसकी माँ सुशीला एक सीधी-साधी घरेलू औरत हैं घर-परिवार में बिज़ी रहती हैं। एक ही बेटी होने के कारण दीपाली को कोई कुछ नहीं कहता है।)
सुशीला- बेटी तूने कपड़े क्यों बदल लिए.. हमें बाहर जाना था।
दीपाली- इस वक़्त कहाँ जाना है?
सुशीला- अरे वो अनिता की कल बहुत तबीयत बिगड़ गई थी उसको रात अस्पताल ले गए हैं.. वहाँ उसको भर्ती कर लिया गया है.. अब मेरी इतनी खास दोस्त है वो.. अगर मैं नहीं जाऊँगी तो बुरा लगेगा …
दीपाली- ओह.. आंटी के पास आप का जाना जरूरी है.. मगर मैं वहाँ क्या करूँगी.. दो दिन बाद इम्तिहान हैं.. मैं यही रह कर पढ़ाई करती हूँ।
सुशीला- अरे नहीं बेटी, तेरे पापा का फ़ोन आया था.. वो आज नहीं आने वाले हैं और हॉस्पिटल भी काफ़ी दूर है.. आने-जाने में ही एक घंटा लग जाएगा.. अब उसके पास जाऊँगी तो एकाध घंटा वहाँ बैठना भी पड़ेगा ना.. तू इतनी देर अकेली क्या करेगी यहाँ.. तुझे अकेली छोड़ कर जाने का मेरा मन नहीं मान रहा है।
दीपाली- नहीं माँ.. प्लीज़ आप जाओ ना…
सुशीला- अरे आते समय बाजार से सामान भी लेते आएँगे.. खाना मैंने बना दिया है.. आकर सीधे खा कर सो जाएँगे चल ना…
दीपाली- माँ आप बेफिकर होकर जाओ और आराम से आओ मुझे कुछ नहीं होगा.. आप बिना वजह डरती हैं।
सुशीला- बड़ी ज़िद्दी है.. अच्छा तुझे भूख लगे तो खाना खा लेना.. मुझे आने में देर हो जाएगी.. दरवाजा बन्द रखना.. ठीक है।
दीपाली ने अपनी माँ को समझा कर भेज दिया और खुद कमरे में जाकर बिस्तर पर बैठ कर दीपक के लौड़े के बारे में सोचने लगी।
(अरे.. अरे.. दोस्तों आप भी ना याद ही नहीं दिलाते कि दीपाली के चक्कर में हम दीपक और प्रिया को तो भूल ही गए। चलो वापस पीछे चलते हैं.. दीपाली के घर से निकलने के बाद उन दोनों ने क्या किया.. वो तो देख लिया जाए।)
वो दोनों एक-दूसरे की चूत और लंड के मज़े ले रहे थे ... कोई दस मिनट बाद दोनों गर्म हो गए। प्रिया ने लौड़ा मुँह से निकाल दिया।
प्रिया- आ आहह.. भाई चाटो.. मज़ा आ रहा है.. उई आराम से भाई.. अपने अपने मोटे मूसल से मेरी छोटी सी चूत का हाल बिगाड़ दिया है.. सूज गई है आहह.. आई.. आराम से…
दीपक- बस बहना, अब लौड़ा आग उगलने लगा है.. चल अब तुझे दोबारा चोदता हूँ मगर अबकी बार प्यार से चोदूँगा। तू ऐसा कर कुतिया बन जा.. मज़ा आएगा।
प्रिया- हा हा हा भाई कुतिया नहीं घोड़ी बनती हूँ।
दीपक- अब मैं कुत्ता हूँ तो तुझे कुतिया ही बनाऊँगा ना.. भला कुत्ता घोड़ी को कैसे चोदेगा..
प्रिया- भाई आप अपने आप को कुत्ता क्यों बोल रहे हो?
(दोस्तो, आप सोच रहे होंगे कि कहानी इतनी आगे बढ़ गई मगर अब तक मैंने दीपाली की माँ और उसके पापा के बारे में आपको नहीं बताया तो आज बताती हूँ.. वैसे इन दोनों का कहानी में कोई रोल नहीं है इसलिए मैंने इनके बारे में नहीं लिखा.. मगर कुछ दोस्त जानना चाहते हैं तो उनके लिए बता देती हूँ।
दीपाली के पापा अनिल सिंह सरकारी ठेके लेते हैं.. जैसे कोई सरकारी बिल्डिंग बनानी हो या कोई सड़क वगैरह.. तो बस इन कामों में वो बहुत बिज़ी रहते हैं, रात को देर से घर आते हैं कई बार तो रात को आते ही नहीं हैं। दीपाली की शिकायत होती है कि कई-कई दिनों तक वो पापा से बात भी नहीं कर पाती और उसकी माँ सुशीला एक सीधी-साधी घरेलू औरत हैं घर-परिवार में बिज़ी रहती हैं। एक ही बेटी होने के कारण दीपाली को कोई कुछ नहीं कहता है।)
सुशीला- बेटी तूने कपड़े क्यों बदल लिए.. हमें बाहर जाना था।
दीपाली- इस वक़्त कहाँ जाना है?
सुशीला- अरे वो अनिता की कल बहुत तबीयत बिगड़ गई थी उसको रात अस्पताल ले गए हैं.. वहाँ उसको भर्ती कर लिया गया है.. अब मेरी इतनी खास दोस्त है वो.. अगर मैं नहीं जाऊँगी तो बुरा लगेगा …
दीपाली- ओह.. आंटी के पास आप का जाना जरूरी है.. मगर मैं वहाँ क्या करूँगी.. दो दिन बाद इम्तिहान हैं.. मैं यही रह कर पढ़ाई करती हूँ।
सुशीला- अरे नहीं बेटी, तेरे पापा का फ़ोन आया था.. वो आज नहीं आने वाले हैं और हॉस्पिटल भी काफ़ी दूर है.. आने-जाने में ही एक घंटा लग जाएगा.. अब उसके पास जाऊँगी तो एकाध घंटा वहाँ बैठना भी पड़ेगा ना.. तू इतनी देर अकेली क्या करेगी यहाँ.. तुझे अकेली छोड़ कर जाने का मेरा मन नहीं मान रहा है।
दीपाली- नहीं माँ.. प्लीज़ आप जाओ ना…
सुशीला- अरे आते समय बाजार से सामान भी लेते आएँगे.. खाना मैंने बना दिया है.. आकर सीधे खा कर सो जाएँगे चल ना…
दीपाली- माँ आप बेफिकर होकर जाओ और आराम से आओ मुझे कुछ नहीं होगा.. आप बिना वजह डरती हैं।
सुशीला- बड़ी ज़िद्दी है.. अच्छा तुझे भूख लगे तो खाना खा लेना.. मुझे आने में देर हो जाएगी.. दरवाजा बन्द रखना.. ठीक है।
दीपाली ने अपनी माँ को समझा कर भेज दिया और खुद कमरे में जाकर बिस्तर पर बैठ कर दीपक के लौड़े के बारे में सोचने लगी।
(अरे.. अरे.. दोस्तों आप भी ना याद ही नहीं दिलाते कि दीपाली के चक्कर में हम दीपक और प्रिया को तो भूल ही गए। चलो वापस पीछे चलते हैं.. दीपाली के घर से निकलने के बाद उन दोनों ने क्या किया.. वो तो देख लिया जाए।)
वो दोनों एक-दूसरे की चूत और लंड के मज़े ले रहे थे ... कोई दस मिनट बाद दोनों गर्म हो गए। प्रिया ने लौड़ा मुँह से निकाल दिया।
प्रिया- आ आहह.. भाई चाटो.. मज़ा आ रहा है.. उई आराम से भाई.. अपने अपने मोटे मूसल से मेरी छोटी सी चूत का हाल बिगाड़ दिया है.. सूज गई है आहह.. आई.. आराम से…
दीपक- बस बहना, अब लौड़ा आग उगलने लगा है.. चल अब तुझे दोबारा चोदता हूँ मगर अबकी बार प्यार से चोदूँगा। तू ऐसा कर कुतिया बन जा.. मज़ा आएगा।
प्रिया- हा हा हा भाई कुतिया नहीं घोड़ी बनती हूँ।
दीपक- अब मैं कुत्ता हूँ तो तुझे कुतिया ही बनाऊँगा ना.. भला कुत्ता घोड़ी को कैसे चोदेगा..
प्रिया- भाई आप अपने आप को कुत्ता क्यों बोल रहे हो?