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चुदासी माँ और गान्डू भाई

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राधा- “जरा देखें तो आज मेरा लाल मेरे लिए क्या नया लेकर आया है?” यह कहकर माँ ने मेरे हाथ से पैकेट ले लिया और उसे खोलने लगी।

उसमें से दो ऐसी पैंटी निकली जो मुश्किल से चूत भर को ढक सके और उन दो में से एक ट्रॅन्स्परेंट भी थी। दो। ही बिना बाँह की तंग और टाइट ब्रा थी। एक झीनी नाइटी थी और एक खुली लेडीस नाइटगाउन था। सारे माँ की साइज के थे क्योंकी इस लाइन में काम करने से मुझे एग्ज़ेक्ट पता था की माँ को किस साइज के फिट बैठेगे। माँ उलट पलट के देखती रही।

राधा- “तो आज तू अपनी माँ के लिए ये सब लाया है?”

विजय- “अरे माँ ये तो सैंपल है, जो मुझे उस सप्लायर ने दिए हैं। यदि तुझे पसंद है तो सारे तुम रख लो..”

राधा- “तो क्या शहर की औरतें ऐसे कपड़े पहनती हैं, की कुछ भी ढका ना रहे। मुझे तो इनको देखकर ही शर्म

आ रही है...”

विजय- “माँ ये सब हल्के और बहुत अच्छी क्वालिटी के हैं। इन्हें नीचे पहन के बहुत आराम लगता है और पता ही नहीं चलता की कुछ पहन रखा है। तुमसे बड़ी-बड़ी उमर की औरतें इन्हें लेने के लिए हमारे स्टोर में भीड़। लगाए रखती हैं। फिर तुम किसी से कम थोड़े ही हो। रख लो इन्हें, ऐसे कपड़े पहनने से सोच भी माडर्न होती है...”

माँ- “हाँ... तुम ठीक कह रहे हो। आजकल तो ऐसी ही चीजों का चलन है और माडर्न लोगों का ही बोलबाला है। पिक्चरों में, होटेलों में, पार्लरों में कहीं भी देखो लोग खुलकर मौज मस्ती करते हैं, ना किसी की शंका शर्म, ना। किसी से लेना देना...”

विजय- “हाँ माँ, शहरी और पढ़े-लिखे लोगों की सोच यह है की जब मौज मस्ती करने की उमर है, साधन है और

शौक है तो खुलकर मौज मस्ती करो। एक बार उमर और तबीयत चली गई तो फिर बस किसी तरह जिंदगी गुजारनी रह जाती है। इसीलिए तो तुम्हारा इतना ध्यान रखता हूँ। जो सुख तुझे गाँव में नहीं मिला वो सुख यहाँ तो खुलकर भोगो। यहाँ ना तो गाँव का वातावरण है और ना कोई यह देखने वाला की तुम क्या करती हो और कैसे रहती हो? तुम्हें खाली जिंदगी गुजारनी थोड़े ही है, तुम्हें तो इस हसीन जिंदगी का पूरा मजा लेना है। तुम्हें यहाँ किस बात की कमी है? गाँव की जायदाद से कम से कम 40 लाख मिल जाएंगे और दो-दो जवान बेटे । कमाने वाले हैं। चलो माँ अच्छे से तैयार हो जाओ, आज तुझे ऐसी जगह दिखाता हूँ की तुझे भी पता चले की लोग जिंदगी का मजा कैसे लेते हैं?”

मेरी बात सुनकर माँ अपने कमरे में चली गई। मैंने अपनी ओर से दाना डाल दिया था। अब देखना था की चिड़िया कब जाल में फंसती है? मुझे बिल्कुल जल्दी नहीं थी। मैं माँ में तड़प पैदा कर देना चाहता था और चाह रहा था की पहल माँ की तरफ से हो। थोड़ी देर में मैं भी उठकर अपने कमरे में चला गया। मैंने शावर लिया, टाइट जीन्स और स्पोटिंग पहनी और टीवी के सामने बैठा माँ का इंतजार करने लगा।

थोड़ी देर में माँ भी तैयार होकर निकली। आज उसने बड़ी दिलकश साड़ी बिना बाँह के ब्लाउज़ के साथ पहनी हुई थी और उसकी मांसल दूधिया नंगी बाहें बड़ी मस्त लग रही थीं। हल्की लिपस्टिक और चेहरे पर हल्का मेकप कर रखा था। वाह... माँ को इस रूप में देखकर मजा आ गया।

 
मेरे जैसे 6'2” के गबरू गठीले शरीर वाले जवान के साथ यह बीवी के रूप में या पटाए हुए माल के रूप में बिल्कुल चल सकती थी।

हमें घर से निकलते-निकलते 8:00 बज गये। आज मैं माँ को ले शहर से थोड़ा बाहर ऐसे पार्क की सैर कराने ले चला जहाँ काफी तादाद में मनचले अपने जोड़ीदार के साथ मौज मस्ती के लिए आते थे। सनडे की वजह से पार्क में और दिनों की अपेक्षा काफी भीड़ थी। अभी 8:30 ही हुए थे सो काफी तादाद में परिवार वाले भी अपने बच्चों के साथ थे। मौज मस्ती वाले जोड़े कम थे। वे 9:00 बजे आने शुरू होते हैं, जब परिवार वाले वापस जाने लग जाते हैं। पार्क बहुत बड़े एरिया में फैला हुआ था, कई फव्वारे फुल स्पीड में चल रहे थे, तरह-तरह की आकृति में कटिंग किए हुए झाड़ जगह-जगह थे, पार्क के चारों और करीब 6' चौड़ी पगडंडी थी जिस पर टहलने वाले पार्क का चक्कर काट रहे थे, बच्चों के लिए एक स्थान पर कई तरह के झूले और स्लाइडिंग्स भी बने हुए थे। इसी स्थान के चारों ओर चाट, पाव-भाजी, कोल्ड ड्रिंक, आइसक्रीम, गोल-गप्पे, खुशबूदार पानन के कई स्टाल थे जिन पर सनई की वजह से काफी भीड़ थी।

माँ- “विजय बेटा, आज तो तुम मुझे स्वर्ग में ले आए हो। बहुत ही अच्छी जगह है...”

मैं माँ को लेकर लाइटिंग और म्यूजिक वाले फव्वारे के पास आ गया। संगीत की धुन और लाइटिंग की चकाचौंध में फव्वारा मानो डान्स कर रहा हो। फव्वारे के चारों और युवतियां, माँ के उमर की औरतें और बूढ़ियां भी बहुत ही माडर्न, शरीर के उभारों को उजागर करते परिधानों में सजी धजी हँस रही थीं, इस दिलकश वातावरण का पूरा मजा ले रही थी, अपने पुरुष साथियों के साथ हाथ में हाथ डाले घुल मिलकर बातें कर रही थी। चारों ओर । लिपस्टिक पुते होंठ, फेशियल सा सजा चेहरा, बाब-कट तथा खुले केश, जीन्स में कसे नितंब, अधकटी चोलियों से झाँकते स्तनों की बहार थी। हम काफी देर उस फव्वारे का आनंद लेते रहे।

विजय- “चलो माँ पहले कुछ खा पी लेते हैं फिर तुम्हें पूरा पार्क दिखाऊँगा...” मैंने माँ से कहा। मैं कुछ समय व्यतीत करना चाहता था ताकी पार्क में घूमते समाय माँ को मनचले जोड़ों की भी मस्ती देखे। जो सेक्स की भूख पिछले 15 साल से उसमें दबी पड़ी थी वो ऐसे मस्त वातावरण में उजागर हो जाय।

मैं माँ को लेकर खाने पीने के स्टालों में आ गया। हमने आलू टिकिया, दही चाट, गोलगप्पे इत्यादि का मिलकर आनंद उठाया। फिर हमने कोल्ड-ड्रिक की दो बोतलें ली और एक झाड़ के पास बैठकर मजे से पी।

विजय- “माँ तुम यहीं बैठो, मैं आइसक्रीम यहीं ले आता हूँ। कैसी लाऊँ? कैंडी या कोन?”

राधा- “मेरे लिए तो कल जैसी चूसने वाली ही लाना...”

मैं माँ के लिए एक कैंडी और मेरे लिए एक कोन लेकर आ गया। माँ कैंडी को मुँह में लेकर चूसने लगी और मैं कोन में जीभ डालकर आइसक्रीम खाने लगा।

विजय- "माँ तुझे आइसक्रीम चूस के खाने में मजा आता है पर मुझे तो इस लंबी कोन में जीभ डालकर चाट के खाने में मजा आता है.”

माँ खिलखिलकर हँस पड़ी।

विजय- “माँ यह पार्क बहुत बड़ा है। क्या पार्क का पूरा चक्कर काट के देखोगी?”

राधा- “हाँ, देखो लोग कैसे चक्कर काट रहे हैं। मैं तो अभी भी ऐसे पार्क के 3 चक्कर काट लँ..."

माँ की बात सुनकर मैं उठ खड़ा हुआ और माँ की तरफ हाथ बढ़ा दिया, जिसे पकड़कर वो भी खड़ी हो गई। पहले हम माँ बेटों ने एक-एक खुशबूदार पान खाया और फिर हम भी पगडंडी पर आ गये। 9:30 बज गये थे। पगडंडी पर नौजवान जोई, अधेड़ जोई सब थे जो साथ की महिला के हाथ में हाथ डाले, उसके कंधे पर हाथ रखे, उसकी कमर में हाथ डाले या उसे अपने बदन से बिल्कुल सटाए दीन दुनियां से बिल्कुल बेखबर होकर चल रहे। थे। हम माँ बेटे भी, जो दुनियां की नजर में जो भी हों, उससे बेखबर चुपचाप चल रहे थे।

 
चलते-चलते हम पार्क के उस भाग में आ पहुँचे जहाँ अपेक्षाकृत कुछ अंधेरा था और काफी तादाद में घने झाड़ थे। हर झाड़ के साए में एक जोड़ा बैठा हुआ था, पगडंडी से विपरीत दिशा में मुँह किए एक दूसरे को बाँहों में । समेटे गड्डमड्ड हो रहे थे, पुरुष महिलाओं की जांघों पर लेटे हुए थे, कुछेक पुरुष तो महिलाओं के चेहरे पर झुके हुए किस कर रहे थे। चारों तरफ बहुत ही रंगीन और वासनात्मक नजारा था। माँ कनखियों से जोड़ों की हरकतें देख रही थी और मेरे साथ चुपचाप चल रही थी।

ऐसे वातावरण में मेरी हालत खराब होना लाजिमी थी खासकर जब मेरी जवान मस्त माँ मेरे साथ थी, जिसे मैं अपना बनाना चाह रहा था। पर मैंने अपने आप पर पूरा काबू कर रखा था और अपनी ओर से कोई जल्दबाजी या पहल करना नहीं चाहता था।

मैं माँ की सेक्स की भूख को पूरा जगा देना चाहता था और उसमें तड़प पैदा करना चाह रहा था। एक चक्कर काट के ही हम पार्क से बाहर आ गये। 10:30 पर हम घर पहुँच गये और मैं अपने रूम में बाथरूम में घुस गया। बाथरूम से फ्रेश होकर निकला तो देखा की माँ का रूम बंद था और मैं भी माँ के साथ फैंटेसी में काम क्रीड़ा करते-करते सो गया।

दूसरे दिन मंडे की वजह से मुझे स्टोर से वापस आने में ही रात के 9:00 बज गये। खाना खतम करके टीवी के सामने बैठते-बैठते 10:00 बज गये। मैं थोड़ी देर न्यूज चैनेल्स देखता रहा। फिर मैंने माँ से बात छेड़ी- “क्यों माँ, यहाँ चंडीगढ़ की शहरी जिंदगी पसंद आ रही है ना? बोल गाँव से अच्छी है या नहीं?”

राधा- “मुझे एक बात यहाँ की बहुत अच्छी लगी की लोग एक दूसरे से मतलब नहीं रखते की कौन क्या पहन रहा है, कैसे रह रहा है? वहाँ गाँव में तो कोई अच्छा पहन ले तो लोग बात बनाने लग जाते हैं...”

विजय- "माँ, अब यहाँ तुम कैसे एंजाय करती हो, यह कोई देखने वाला नहीं या तुम्हारे बारे में सोचने वाला नहीं। मैं तुम्हें हर वो सुख दूंगा जो आज तक तुझे गाँव में पति की इतनी सेवा करके भी नहीं मिला। अब से मेरा । केवल एक ही उद्देश्य है की तुझे दुनियां का हर वह सुख हूँ जो तुम जैसी सुंदर और जवान नारी को मिलना चाहिये...” मैं धीरे-धीरे पासा फेंक रहा था।

राधा- “जब उमर थी तो ये सब मिले नहीं...”

विजय- “माँ तुम्हें देखकर कोई भी तुम्हें 35 साल से ज्यादा की नहीं बताएगा। फिर मन की तो तुम इतनी जवान हो की कुंवारी लड़कियों को भी मात देती हो। पिछले 15 साल से बीमार पिताजी की सेवा करते-करते तुम्हारी सोच कुछ ऐसी हो गई है। लेकिन अब तुम यहाँ आ गई हो और अपने वे सारे शौक और दबी हुई इच्छाएं पूरी करो। यहाँ मेरी जान पहचान का एक बहुत ही अच्छा ब्यूटी पार्लर है। कल स्टोर जाते समय मैं तुझे वहाँ छोड़ दूंगा। तुम वहाँ फेशियल, आइब्रो, बालों की सेटिंग सब ठीक से करवा लेना...”

राधा- “मैं जानती हूँ की तुम मुझे बहुत खुश देखना चाहते हो, और मैं यहाँ सचमुच में बहुत खुश हूँ। पर ये सब करके मुझे किसे दिखाना है?”

 
विजय- “अरे माँ, ये किसी को दिखाने की बात नहीं है बल्कि खुद की संतुष्टि होती है। देखना तुम्हें खुद पर नाज होगा। फिर मैं मुन्ना को सप्टइज देना चाहता हूँ। वो जब गाँव से वापस आएगा तो तुम्हें देखता ही रह जाएगा और सोचेगा की हमारे घर में यह स्वर्ग की अप्सरा कहाँ से आ गई?'

राधा- “मेरे ऐसे शहरी रूप को तो मेरा शहरी नटखट बड़ा बेटा ही देखना चाहता है। अजय तो भोला-भाला और सीधा साधा है उसे तो सीधी साधी ही माँ चाहिए.”

विजय- “माँ, मुन्ना अब पहले वाला मुन्ना नहीं रहा। कुछ ही दिनों में यहाँ रहकर पूरा चालू हो गया है। स्टोर में भी उसने अपना काम इतनी अच्छी तरह से संभाल लिया है की सब उसकी प्रशंसा करते हैं..."

राधा- “तुम्हारे साथ रहकर तो अजय चालू नहीं बनेगा तो और क्या बनेगा? कुछ ही दिनों में उसे भी अपने जैसा बना लेगा..."

विजय- “माँ, अजय भी तुम्हारी तरह पूरा शौकीन है। वो तो छुपा रुस्तम निकला पर मुझे पता चल गया और एक बार मेरे से खुल गया तो बहुत जल्दी पूरा खुल गया। मेरा भाई वैसे ही मक्खन सा चिकना है, अब देखो कैसे स्मार्ट बनकर रहता है और टाइट स्मार्ट कपड़ों में कैसा मस्त लगता है? तुम तो वैसे ही इतनी स्मार्ट हो और थोड़ा सा भी रख रखाव रखोगी तो पूरी निखर जाओगी...”

माँ- “पर एक विधवा का ज्यादा बन-ठन के रहना। भला आस-पास के लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे और क्या सोचेंगे?”

विजय- “माँ ये सब गाँव की बातें हैं। यहाँ शहर में इन बातों की कोई परवाह नहीं करता। मुझे ऐसे लोगों की

कोई परवाह नहीं। जिस भी चीज से या काम से तुझे खुशी दे सकें, उसे करने में ना तो मुझे कोई संकोच है और ना ही किसी की परवाह। यह विधवा वाली सोच मन से बिल्कुल निकाल दो। कौन कहता है की तुम विधवा हो? तुम तो मन से एकदम सधवा हो। अब तुम बिल्कुल एक सुहागन की तरह बन-ठन के रहा करो...”

माँ- “तो अब तुम मुझे विधवा से वापस सुहागन बनाएगा."

हम माँ बेटे इस प्रकार काफीदेर बातें करते रहे। फिर रोज की तरह माँ अपने कमरे में सोने के लिए चली गई। मैं बिस्तर पर काफी देर पड़े-पड़े सोचता रहा की माँ मेरी कोई भी बात का थोड़ा सा भी विरोध नहीं करती है। पर मैं माँ को पूरी तरह खोल लेना चाहता था की माँ की मस्त जवानी का खुलकर मजा लिया जाय।

 
माँ आधुनिक विचारों की, घूमने फिरने की, पहनने ओढ़ने की तथा मौज मस्ती की शौकीन थी। इसलिए मैं कोई भी हड़बड़ी नहीं करना चाहता था। मैं इंतजार कर रहा था की जल्द ही यह फूल खुद-बा-खुद टूट के मेरी गोद में गिरे। उसे विधवा से सुहागन बनाऊँ और उसका सुहाग मैं खुद बनँ।

दूसरे दिन स्टोर जाते समय मैं माँ को ब्यूटी पार्लर पर ले गया। पार्लर की माँ की उमर की अधेड़ मालेकिन मेरे स्टोर की परमानेंट ग्राहक थी, सो मेरा उससे बहुत अच्छा परिचय था। माँ की उमर की होने के बावजूद उसका फिगर, रहन-सहन और बनाव शृंगार बिल्कुल युवतियों जैसा था। उसकी टाइट जीन्स, स्लोगन लिखा टाप, बाबकट बाल, फेशियल से पुता चेहरा सब मुझे बहुत अच्छा लगता था। इस पार्लर में अधिकतर अधेड़ महिलाएं ही। आती थीं, जिनकी चाह उस मालेकिन जैसी बनने की रहती थी। मैंने उस पार्लर की मालेकिन से हाय हेल्लो की, माँ का उसे परिचय दिया और माँ को वहीं छोड़कर मैं अपने स्टोर में चला गया।

रात जब 8:00 बजे के करीब घर पहुँचा तो माँ ने ही दरवाजा खोला। माँ का चेहरा बिल्कुल चमक दमक रहा था। फेशियल, आइब्रो, बालों की कटिंग सब कुछ बहुत सलीके से की गई थी। मैं काफी देर माँ को एकटक देखते रह गया और माँ लज्जाशील नारी की तरह मंद-मंद मुश्कुराते हुए शर्मा रही थी।

विजय- “वाह... आज तो बदले-बदले सरकार नजर आ रहे हैं। माँ तुम्हें तो उस ब्यूटी पार्लर वाली मिसेज कपूर ने एकदम अपने जैसी नौजवान युवती सा बना दिया है। जानती हो वो भी तुम्हारी उमर की एक विधवा है पर क्या अपने आपको मेनटेन रखती है की बस मेरे जैसे नौजवान भी उसे देखकर आहें भरे...”

माँ- “तो उन आहें भरनेवालों में एक तुम भी हो। चलो हाथ मुँह धोकर तैयार हो जाओ, मैं खाना परोसती हूँ.”

फिर मैं थोड़ी ही देर में माँ के साथ डाइनिंग टेबल पर था। रोज की तरह हम माँ बेटों ने साथ-साथ खाना खाया।

मैं खाना खाकर आज अपने रूम में आ गया और बेड पर लेट गया।

 
साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
थोड़ी देर में माँ भी मेरे रूम में आ गई। मुझे लेटा देख उसने पूछा- “अरे विजय बेटा, आज खाना खाते ही लेट गये। क्या बात है, तबीयत तो ठीक है ना? कहीं उस ब्यूटी पार्लर वाली की याद तो नहीं आ रही?"

मैं- “नहीं माँ जब से तुम यहाँ आई हो मुझे और किसी की याद नहीं आती। मेरे लिए तो तुम ही सब कुछ हो..”

राधा- “तुम आजकल बातें बड़ी प्यारी-प्यारी करते हो। कहीं कोई लड़की तो नहीं पटाने लगे?”

विजय- "माँ तुम तो जानती हो की लड़की वड़की में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं..”

राधा- “लेकिन मेरा तो आजकल तुम बहुत ही ध्यान रख रहे हो...” यह कहकर माँ भी मेरे पास मेरे बेड पर बैठ गई और मैं भी बेड पर टाँगें पसारकर बैठ गया।

विजय- “पर माँ तुम कोई लड़की थोड़े ही हो..." ऐसा कहकर मैंने डबलबेड पर बैठी हुई माँ को अपने आगोश में भर लिया और कहा- “और अगर तुम लड़की होती तो जरूर पटाता और यदि नहीं पटती तो जबरदस्ती भगाकर ले जाता..."

माँ- “पर मैं तो कोई लड़की नहीं। मैं तो 46 साल की एक ढलती उमर की पूरी औरत हूँ। मुझे भगा के तू क्या करेगा?" माँ ने मेरी आगोश में ही मेरे सीने पर सिर टिकाते हुए कहा। माँ मेरी ओर देखकर हँस रही थी।

मैंने माँ को आगोश से मुक्त कर दिया और उसके घने बालों पर हाथ फेरने लगा- “माँ मुझे तो शुरू से ही तुम्हारे जैसी बड़ी उमर की औरतें ही अच्छी लगती हैं। स्टोर में एक से एक नौजवान लड़कियां मेरे पर मरती है, पर मैं उनकी तरफ देखता तक नहीं..”

राधा- “तो क्या मेरे जैसी किसी से शादी करेगा? मेरा इतना सजीला नौजवान बेटा है, ऐसे गठीले मर्द को तो एक से एक सुंदर और माडर्न लड़की मिल जाएगी। कहीं कोई चक्कर वाककर चल रहा है तो बता, उसे कल ही तेरी बहू बनाकर ले आती हूँ...”

विजय- “नहीं माँ, ऐसा सोचना भी मत। अभी तो तुम जैसी मन मिलने वाली माँ के रूप में मुझे दोस्त मिली है। अभी तो मेरा पूरा ध्यान इसी बात पर है की तुझे हर प्रकार का सुख दें, तेरी जी भर के सेवा करूँ। मुझे तेरे ही। साथ सिनेमा जाने में, होटेलों में खाने में, पार्को की सैर करने में मजा आता है। फिर अजय जैसा प्यारा भाई मिला है की अपने बड़े भैया की खुशी के लिए कुछ भी करने को हरदम तैयार रहता है। इतने दिन तो मैं शहर में अकेला था, अब इतनी प्यारी माँ और भाई का साथ मिला है तो तू कह रही है की कोई माडर्न लड़की को तेरी बहू बनाकर ले आऊँ। जानती हो ऐसी लड़की आते ही सबसे पहले तेरी और अजय की यहाँ से छुट्टी करेगी। जो घर प्यार का स्वर्ग बना हुआ है उसे नरक बना देगी। मुझे तो तेरे जैसी कोई चाहिए जिसने पति की सेवा में, घर को जोड़े रखने में अपने सारे सुख चैन छोड़ दिए..”

माँ- “तो क्या मिसेज कपूर चाहिए? उसकी तो बड़ी प्रशंसा कर रहे थे। लगता है उसके तो पूरे दीवाने हो। तेरे । जैसे गबरू गठीले जवान को पाकेर तो वो निहाल हो जाएगी। यदि उसे दुबारा शादी नहीं भी करनी है तो तेरे जैसे मस्त जवान की बात आते ही वो शादी के लिए मचल जाएगी। तू कहे तो बात चला के देखें?”

 
विजय- “तूने भी कहाँ से ये शादी वाली बात छेड़ दी। मुझे कोई कपूर वपूर नहीं चाहिए। अभी तो मुझे मेरी। प्यारी-प्यारी माँ चाहिए, जिसके सामने मिसेज कपूर तो एक लौंडिया जैसी है। तो माँ मेरे जैसे को देखकर वो मिसेज कपूर शादी के लिए तैयार हो जाएगी तो फिर तुम्हें भी मेरे जैसा कोई मिल गया तो फौरन पट जाओगी?” यह कहकर मैंने माँ को वापस अपने आगोश में भर लिया।

राधा- “मिलेगा तब सोचूँगी..” माँ ने शरारती हँसी के साथ कहा।

माँ की इस बात पर मैंने उसकी ठुड्डी ऊपर उठाई और उसकी आँखों में झाँकते कहा- “जी तो करता है की तेरी इस बात पर एक प्यारी सी पप्पी ले लँ...”

राधा- “तू मुझे इतना प्यार करता है और इतनी छोटी सी बात पूछ रहा है। लेनी है तो ले ले पूछ क्या रहा है?" यह कह माँ मेरी आँखों में देखते हुए हँसने लगी।

मैंने माँ का फूला-फूला गाल गप्प से अपने मुँह में भर लिया और कस के एक प्यारी सी पप्पी ले ली।

राधा- “चलो तुझे अपनी माँ की पप्पी मिल गई ना, अब खुश हो ना?”

विजय- “माँ सबके मन की बात बिना कहे ही जान लेती है और माँगते ही मुराद पूरी कर दी। जो मजा माँ की

गोद में है वो भला दूसरी की गोद में कहाँ? माँ तेरी हर बात पे, तेरी हर अदा पे मैं हमेशा खुश हूँ..”

राधा- “मेरा बेटा आजकल पूरे आशिक़ों जैसी बातें करता है। कोई बात नहीं इस उमर में हर कोई ऐसी बातें करता है..." माँ ने कहा। माँ उठ खड़ी हुई और बगल में सटे अपने रूम की ओर चल दी।

मैं भी फ्रेश होकर जिस बेड पर अभी माँ के साथ यह सब चल रहा था उसी बेड पर पड़ गया। बेड पर पड़ा-पड़ा काफी देर माँ के बारे में ही सोचता रहा और ना जाने कब नींद आ गई।

इसके दूसरे दिन मैंने माँ को शाम 5:00 बजे ही स्टोर से फोन करके बता दिया की मैंने शाम शो की दो टिकेट बुक कर ली है और वो 6:00 बजे तक तैयार होकर स्टोर में ही आ जाय। माँ 6:00 बजे स्टोर में पहुँच गई।

आज हमने पुरानी पिक्चर ‘खूबसूरत' देखी। माँ को यह साफ सुथरी पिक्चर बहुत ही अच्छी लगी। आज भी हमने बाहर ही रेस्टोरेंट में खाना खाया और 10:30 बजे घर पहुँच गये।

आज कुछ गर्मी थी सो घर पहुँचकर माँ नहाने के लिए बाथरूम में चली गई। मैं भी अपने रूम में चला गया और शावर लेकर नाइट ड्रेस चेंज कर ली। मैं अपने बेड पर पसर गया और एक मैगजीन को पलटने लगा। मैं मैगजीन में खोया हुआ था की माँ की आवाज से की ‘क्या चल रहा है?' से मेरा ध्यान माँ की तरफ गया। एक बार ध्यान गया की मैं माँ की तरफ देखते ही रह गया। माँ बहुत ही आकर्षक नाइटी में थी। माँ को नाइटी में मैं पहली बार देख रहा था। नाइटी में मेरी मदमस्त माँ 35 साल की भरी पूरी बिल्कुल आधुनिक शहरी महिला लग रही थी।

राधा- “क्या घूर-घूर के देख रहा है? जब बेटा मुझे इस रूप में देखना चाहता है, मेरी छोटी सी छोटी खुशी के लिए मरा जाता है तो मैं क्या मेरे प्यारे बेटे की इतनी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकती। अब देखो ठीक से तुम्हारे लिए मैं पूरी शहरी बन गई..” माँ ने कहा और मेरे पास बेड पर बैठ गई।

विजय- “माँ सच-सच बताना, तमको भी ये सब अच्छा लग रहा है ना?"

माँ- “अच्छा क्यों नहीं लगेगा? तुम्हीं तो कहते रहते हो की अभी तो मैं पूरी जवान हूँ और तेरे जैसा जवान तो यह बात किसी बुढ़िया को भी कह दे तो उसमें जवानी आ जाय। पर आज तूने जो पिक्चर दिखाई, देखकर मजा आ गया...”

 
विजय- “मजा आ गया ना? देखा, अशोक कुमार जैसा बुड्ढा रेखा जैसी जवान लड़की को कैसे अपनी गर्लफ्रेंड बनाता है। माँ तुम भी मेरी गर्लफ्रेंड बन जाओ...”

राधा- “तुम मेरा बायफ्रेंड बन जाओ तो मैं अपने आप तुम्हारी गर्लफ्रेंड हो गई..”

विजय- “यह हुई ना बात। अब मजा आएगा...” यह कहकर मैंने माँ को अपनी बाँहों में जकड़ लिया और उसके

गाल को चूसते हुए पप्पी ले ली।

माँ- “लो हामी भरने की देर थी और तुम शुरू हो गये। मैं तो बस उस रेखा जैसी ही तुम्हारी गर्लफ्रेंड बनूंगी...”

विजय- “पर माँ सोचो कहाँ उसका अशोक कुमार जैसा 70 साल का बुड्ढा बायफ्रेंड और कहाँ तुम्हारा 28 साल का गबरू जवान मस्त बायफ्रेंड। उसके निर्मल आनंद लेने में और मेरे निर्मल आनंद लेने में कुछ तो फर्क होगा ना? पर असली बात है निर्मल आनंद लेना। ऐसा स्वच्छ और निसंकोच आनंद जो दोनों को बराबर मिले..” मेरी बात सुनकर माँ मंद-मंद मुश्कुरा रही थी और मैं माँ के मुश्कुराते होंठों पर अंगुली फेरने लगा।

राधा- “पिक्चर की यह निर्मल आनंद वाली बात तूने अच्छी पकड़ी। तो अब माँ को अपनी गर्लफ्रेंड बनाकर तू उससे निर्मल आनंद लेगा। पर ध्यान रखना मैं पिक्चर जैसे निर्मल आनंद की बात कर रही हूँ..”

विजय- “अब तो तुम मेरी गर्लफ्रेंड बन गई हो तो कल चलें उस पार्क की सैर करने, जहाँ लोग अपनी गर्लफ्रेंड केसाथ निर्मल आनंद लेते हैं...” मैंने माँ की आँखों में देखते शरारत भरे अंदाज में कहा।

माँ- “ना बाबा नहीं लेना मुझे ऐसा निर्मल आनंद? बेशर्म लोग कहीं के छिप-छिपी ही करनी है तो घर में जाकर करे, वहाँ पार्क में सबके सामने। तुम मुझे माडर्न बनाने के चक्कर में धीरे-धीरे पीछे ला रहे हो। पहले तो विधवा से मुझे वापस सुहागन साबित कर दिया। अब सुहागन से गर्ल यानी की कुंवारी लड़की बना दिया। आगे जहाँ से आई वहीं वापस मत भेज देना..."

विजय- “अरे माँ नहीं। तुम चाहोगी तो अब हम यहाँ से वापस आगे की ओर बढ़ने लगेंगे। विधवा से वापस सुहागन बनने में सोच नेगेटिव रहती है, जबकी कुंवारी लड़की जब सुहागन बनती है तो उसकी सोच पाजिटिव होती है...” मैंने माँ को इशारों-इशारों में संकेत दे दिया की मैं तुम्हें अपनी सुहागन बनाना चाहता हूँ।

राधा- “तो इसका मतलब की अब गर्लफ्रेंड का किस्सा खतम और वापस सुहागन माँ चाहिए तुम्हें?”

विजय- “हाँ, अब से तुम बिल्कुल एक सुहागन की तरह सज-धज के रहो, शृंगार करो, मन से सारी नेगेटिव बातें निकाल दो और एक गर्ल की तरह बेबाक बेफिकार जिंदगी जियो और निर्मल आनंद लो..” यह कहकर मैंने माँ के गाल का चुम्मा ले लिया।

 
माँ मेरी और देखकर हँस रही थी। मैं माँ के हँसते होंठ पर एक उंगली रखकर अपने होंठ पर अपनी जीभ फिराने लगा। मैंने अपनी ओर से इशारा दे दिया की मैं तुम्हारे होंठों का रसपान करना चाहता हूँ।

राधा- “तर्क करना तो कोई तुमसे सीखे। पर तुम्हारी बातें है बहुत गहरी। हम उचित-अनुचित, भले-बुरे, पाप-पुण्य इन दुनिया भर के लफड़ों में उलझे पड़े रहते हैं, और जो मन चाहे वो कर नहीं पाते और सोचते ही रह जाते हैं। की दूसरे क्या सोचेंगे? किसी को भी कष्ट पहँचाए बिना जिस भी काम में मन को शांति मिले, आत्मा प्रसन्न हो वही निर्मल आनंद है..” माँ ने एक दार्शनिक की भाँति कहा।

मैं- “हाँ माँ, यही तो मैं तुम्हें कहता रहता हूँ। तुम्हारी और मेरी सोच कितनी मिलती है। जो मैं सोचता हूँ ठीक तुम भी वही सोचती हो। तभी तो तुमसे मेरा इतना मन मिलता है। जब से तुम यहाँ आई हो मुझे सिर्फ तुम्हारी कंपनी में ही मजा आता है। तभी तो स्टोर से सीधा तेरे पास आ जाता हूँ। घर से बाहर भी जितना मजा मुझे। तुम्हारे साथ आ रहा है उतना आज तक नहीं आया...”

हम माँ बेटे इस प्रकार काफी देर बातें करते रहे। फिर रोज की तरह माँ अपने कमरे में सोने के लिए चली गई। मैं बिस्तर पर काफी देर पड़े-पड़े सोचता रहा की माँ मेरी कोई भी चीज का थोड़ा सा भी विरोध नहीं करती है। पर मैं माँ को पूरी तरह खोलना चाहता था की माँ की मस्त जवानी का खुलकर मजा लिया जाय। माँ आधुनिक विचारों की, घूमने फिरने की, पहनने ओढ़ने की तथा मौज मस्ती की शौकीन थी।

दूसरे दिन मैं रोज वाले समय पर घर आ गया। आज कहीं भी बाहर जाने का प्रोग्राम नहीं बनाया, क्योंकी आज मैं माँ बेटे के बीच की दीवार गिरा देना चाहता था। खाने का काम समाप्त होने पर माँ बाथरूम में नहाने चली गई और मैं काफी देर सोफे पर बैठा सोचने लगा की आज माँ का कौन सा रूप देखने को मिलेगा। कल माँ मुझसे बहुत खुलकर पेश आई थी, तो क्या जितना आतुर मैं हूँ उतनी ही आतुर माँ भी है? फिर मैं भी अपने कमरे में जाकर बाथरूम में घुस गया। अच्छे से शावर लिया और बहुत ही मादक हल्की सी क्रीम अपने बदन पर लगा ली। मैं तैयार होकर बेड पर बैठा फिर माँ के बारे में सोचने लगा। मैं आँखें मूंदे माँ की सोच में डूबा हुआ था की माँ की इस आवाज से मेरी तंद्रा टूटी।

राधा- “लगता है बड़ी बेसब्री से इंतजार हो रहा है...”

मैंने आँखें खोली और जैसे ही माँ की तरफ देखा तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गई। माँ ने शादी का जोड़ा पहन रखा था, जो शायद उसने अब तक संभाल रखा था। माँ ने सच्ची जरी का लाल घाघरा कमर में काफी नीचे बाँधा हुआ था और उसी का मैचिंग ब्लाउज़ पहन रखा था। इन सबके ऊपर उसने हल्के लाल रंग की झीनी चुनरी ओढ़ रखी थी, जिसे पूँघट के जैसे सिर पे ले रखा था। माथे पर लाल बिंदिया भी लगा रखी थी। गले में हार, हाथों में कंगन, कहने का मतलब माँ पूरी एक नव-व्याहता दुल्हन के रूप में थी। मैं आश्चर्यचकित होकर माँ के इस अनोखे रूप को निहारे जा रहा था।

राधा- “ऐसे क्या देख रहा है? क्या कभी कोई दुल्हन देखी नहीं? वैसे तो बहुत बोलता रहता है की मैं एक । सुहागन के रूप में रहूं, सजू धजू, शृंगार करूँ और जब तेरी इच्छा का मन रखते हुए इस रूप में आ गई तो तेरी सारी बोलती बंद हो गई...”

 
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