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चुदासी माँ और गान्डू भाई

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माँ की बात सुनकर मैं माँ के सामने खड़ा हो गया और माँ को जोर से बाँहों में भर लिया। फिर मैं माँ को साथ लेकर बेड पर बैठ गया और मेरी बाँहों में माँ की पीठ अपने सीने पर कस ली। मुझे पक्का विश्वास हो गया की मेरी माँ सज-धज के अपने बेटे से चुदने के लिए आई है, लेकिन यह करने की मुझे जल्दी नहीं थी। यह करने से पहले मैं उसे बिल्कुल खोल लेना चाहता था और पूरी बेशर्म बना देना चाहता था।

मैंने कहा- “लो माँ कल मैंने कहा और आज तुम मेरी सुहागन बनकर आ गई...”

राधा- “तेरी सुहागन? क्या मतलब?” माँ ने मेरी आँखों में आँखें डालकर कहा।

विजय- "मेरा मतलब इस रूप में तुम और तो किसी के सामने जाने से रही, तो केवल मेरी ओर एक्सक्लूसिव्ली मेरी सुहागन हुई की नहीं। बड़ी बात यह है की इस प्रकार सुहागन की तरह-रहने से तुम्हारे मन में विधवा वाली नेगेटिव भावना नहीं रहेगी और जीवन की हर वह खुशी, मौज मस्ती जो तुम पिछले 15 साल से नहीं ले सकी, अब यहाँ बहुत ही एंजाय करते-करते ले सकोगी। जितनी सोच सकारात्मक और खुली हुई होगी जिंदगी जीने का मजा भी उतना ही आता है...” मैंने माँ को इशारों-इशारों में कह दिया की अब सारी लाज शर्म छोड़ दो और अपने सगे बेटे के साथ खुलकर रंगरेलियां मनाओ।

राधा- “यहाँ आने के बाद तुमने तो मेरी पूरी सोच ही बदल दी। गाँव के उस माहौल में में कई बार सोचती थी की कभी मेरे जीवन में भी ऐशो-आराम लिखा है या नहीं?” माँ ने मेरे सीने में मुँह छुपाते हुए कहा।

विजय- “माँ गाँव का वो माहौल अब बहुत पीछे छूट गया। अब मैं तुम्हारे जीवन में खुशियां ही खुशियां भर दूंगा। सबसे बड़ी बात यह है की तुम ऐश करने की, रंगीन जिंदगी जीने की रंगीन और शौकीन तबीयत की औरत हो।। वहीं मैं शुरू से ही बहुत खुले विचारों का हूँ। वैसे मैं हर किसी के साथ कम खुलता हूँ पर जिससे एक बार खुल जाता हूँ उसके साथ अपना सब कुछ खुलकर बॉटता हूँ..."

अब मैंने इस उन्मुक्त बहती गंगा में डुबकी लगाने का फैसला कर लिया। मैंने एक हाथ से माँ की ठुड्डी ऊपर उठा ली और दूसरे हाथ की उंगली माँ के होंठों पर फेरने लगा और साथ ही अपनी जीभ अपने होंठों पर फेरने लगा। माँ ने मेरी ओर देखते हुए मुश्कुराकर आँखें बंद कर ली और मैंने अपना मुँह नीचे करते हुए माँ के यौवन से भरे मदभरे गुलाबी होंठों पर अपने होंठ रख दिए। मैंने माँ के होंठ अपने होंठ में जकड़ लिए और मस्त होकर अपनी मस्त जवान मम्मी के होंठों का रसपान करने लगा। रसपान करते-करते एक हाथ माँ के दाएं पुष्ट स्तन पर रख दिया और उसे हल्के-हल्के दबाने लगा।

विजय- “मम्मी अब तुम मेरी सुहागन हो। सुहागन का मतलब जिसका सुहाग हो और अब बताओ तुम्हारा सुहाग

कौन हुआ?” मैंने मम्मी की चूचियां कस के दबाते हुए कहा।
 
राधा- “तुम हुए और कौन हुआ और सुहाग होने का पूरा अधिकार जमा तो रहे हो। मन तो सदा से ही तुमको दिया हुआ था। धन की कोई बात ही नहीं, जो मेरा था वो सदा ही तुम्हारा था। जो तन बचा था उसको भी मुझे अपनी सुहागन बनाकर अधिकारी बन गये। इतने से मन नहीं भरा तो और कुछ भी चाहिए क्या?” माँ ने शरारत भरे अंदाज में कहा।

विजय- “अभी तो शुरुआत हुई है। देखती जाओ आज मैं तुझे कैसा निर्मल आनंद देता हूँ। मुझे पता है की पिछले 15 साल से तुम तड़प रही थी। तुम्हारी जवानी और तमन्नाएं सोई पड़ी थीं, लेकिन अब वे पूरी तरह सा जाग गई हैं। तुम्हारी जवानी का कुँवा जो सूख चुका था वापस लबालब भर गया है। अब उस जवानी के कुँवें से मैं । मेरी प्यास खुलकर बुझाऊँगा। समझ रही हो ना मैं किस कुँवें की बात कर रहा हूँ..” अब मैं तो बेशर्मी पर उतार गया पर देखना चाहता था की माँ इस बेशर्मी में कहाँ तक साथ निभाती है?

राधा- “सब समझती हूँ। तुम मेरी दोनों टाँगों के बीच में उभरे हुए टील्ले के बीचो-बीच खुदे कॅवें की बात कर रहे हो। लेकिन ध्यान रखना उस कॅवें के चारों ओर फिसलन भरी खाई भी है, और आजकल वहाँ झाड़ झंखाड़ भी। बहुत उगा हुआ है, कहीं उलझ कर कुँवें में मत गिर जाना। दूसरी बात कुँवा बहुत गहरा है, पानी तक पहुँचना आसान नहीं..."

माँ की यह बात सुनकर एक बार तो मैं हकबका गया की यह तो शेर पर पूरी सवा शेर निकली। पर मन ही मन बहुत खुश था। मैंने सोचा भी नहीं था की सब कुछ इतनी जल्दी इतने मनचाहे ढंग से हो जाएगा। मैं आनंद के सातवें आसमान पर था।

विजय- “ऐसे कॅवें का पानी तो मैं जरूर पियूँगा। चिंता मत करो मेरे पास लंबा मोटा और मजबूत रस्सा है और बड़ा सा टाप भी है, तेरे कॅवें का सारा पानी खींच लेगा। ठीक से समझ रही हो ना?” मैंने कहा।

राधा- “तुम मेरी दोनों टाँगों के बीच वाले कुँवें में अपनी दोनों टाँगों के बीच में लटके मोटे और लंबे रस्से के। आगे अंडे जैसा टोपा बाँधकर उतारोगे और मेरे कुँवें को उस टोपे से ठीक से झकझोर के मेरे कुँवें के रसीले पानी से अपनी प्यास बुझाओगे..." माँ ने नहले पर दहला मारा।।

विजय- “हाय मेरी राधा रानी उसे डंडा नहीं लण्ड बोलो। पूरा 11 इंच लंबा और 4 इंच मोटा है। एकदम सिंगापुरी केले जैसा। एक बार देखोगी तो मस्त हो जाओगी..” यह कहकर मैंने माँ के होंठों को वापस मुँह में ले लिया और माँ के मुँह में अपनी लंबी जुबान डाल दी। यह चुंबन काफी लंबा चला।

 
साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
विजय- “हाय मेरी राधा रानी उसे डंडा नहीं लण्ड बोलो। पूरा 11 इंच लंबा और 4 इंच मोटा है। एकदम सिंगापुरी केले जैसा। एक बार देखोगी तो मस्त हो जाओगी..” यह कहकर मैंने माँ के होंठों को वापस मुँह में ले लिया और माँ के मुँह में अपनी लंबी जुबान डाल दी। यह चुंबन काफी लंबा चला।

राधा- “जिसका 4-5 इंच का होता है उसे नूनी बोलते हैं, जिसका 6-7 इंच का होता है उसे लण्ड बोलते हैं पर तुम्हारा तो 11 इंच लम्बा है तो उसे लण्ड नहीं हलब्बी लौड़ा बोलते हैं। मैं अब उसे झेल पाऊँगी भी या नहीं? 15 साल से अधिक हो गये मेरी चूत में एक तिनका भी नहीं गया है। मेरी चूत एकदम संकरी हो गई है। मेरे राजा मुझे चोदोगे तो कुंवारी लड़की जैसा मजा मिलेगा." माँ पूरी बेशर्मी के साथ हँसकर बोली।

अब मैंने माँ के दोनों पुष्ट चूचे ब्लाउज़ के ऊपर से ही अपने दोनों हाथों में समा लिए और उनका कस के मर्दन करने लगा। मुझे माँ के साथ पूरा बेशर्म होकर इस प्रकार खुली बातें करने में बहुत मजा आ रहा था और उससे भी बढ़कर इस बेतकल्लुफी और बेशर्मी में माँ मुझसे भी बढ़कर साबित हो रही थी। मुझे पूरा भरोसा हो गया की मैं माँ के साथ नये वासनात्मक खेल खुलकर खेल सर्केगा।

विजय- "जैसा मेरा लंबा तगड़ा शरीर है और लौड़ा है, उसे झेलना हल्की फुल्की लड़की के बस की बात नहीं है। इसलिए मेरी लड़कियों में ज्यादा दिलचस्पी भी नहीं है। मुझे तो मेरे जैसी ही लंबी, तगड़ी, मस्त और बेबाक खेली खाई हुई औरत चाहिए। माँ तुम ठीक मेरा ही प्रतिबिंब हो। बिल्कुल मेरे जैसी गठीली, मजे लेने की शौकीन, खुलकर बात करने वाली हो। किसी नई लड़की को चोद दें तो लेने के देने पड़ जाएंगे। साली की एक बार में ही । फट के भोसड़ा बन जाएगी। मुझे तो ठीक तुम जैसी ही औरत चाहिए थी...” मैंने भी मजे लेते हुए कहा।

राधा- “तू तो मेरी 15 साल से बचा के रखी चूत का भोसड़ा बना देगा। ना बाबा ना.. मुझे तुमसे नहीं चुदवाना..” माँ ने इठलाते हुए कहा।

विजय- “अरे मम्मी जैसा तुम्हारा लंबा चौड़ा शरीर है उसी अनुपात में तुम्हारी चूत भी तो बड़ी होगी? बल्कि चूत नहीं मालपुवे सा फुद्दा है फुद्दा। फिर तुम तो मेरी जान हो। तुम्हारी चूत को मैं बहुत प्यार से लँगा। चिंता मत करो मेरी राधा डार्लिंग, खूब प्यार से तुम्हें मजे ले-लेकर धीरे-धीरे चोदूंगा...” मैंने माँ की जवानी के चटकारे लेते हुए कहा।

राधा- “हाय... ऐसी खुली-खुली बातें मैंने आज से पहले ना तो कभी सुनी और ना ही कभी कही। तुम्हारी सुहागन बनकर मुझे तो मेरे मन की मुराद मिल गई। ऐसी बातें करने में तो काम से भी ज्यादा मजा आता है। ऐसी ही खुली-खुली बातें करते हुए मेरी इस तड़पती जवानी को खुलकर भोगो मेरे राजा..” माँ ने कहा।

विजय- “मैं जानता था की तुम्हें असली खुशी में तुम्हारा सुहाग यानी की तुम्हारा पति, सैंया, साजन, बालम बनकर ही दे सकता था। अब लोगों के सामने तो हम माँ बेटे रहेंगे, और रात में खुलकर रंगरेलियां मनाएंगे। जवानी के नये-नये खेल खेलेंगे। क्यों मेरी रानी तैयार हो ना मेरे से खुलकर मजे लेने के लिए? कहीं कोई डर तो मन में नहीं है ना?” मैंने खुला आमंत्रण दिया।

राधा- “नहीं मेरे राजा मुझे ना तो कोई डर है और ना ही कोई शंका। मैं तुझसे मस्त होकर चुदने के लिए पूरी तैयार हूँ। मेरी चूत गीली होती जा रही है। वो तुम्हारे लण्ड को तरस रही है...”

 
मैं बेड पर से खड़ा हो गया और माँ को भी हाथ पकड़कर मेरे सामने खड़ा कर लिया। माँ को मैंने आगोश में ले लिया। माँ की खड़ी-खड़ी चूचियां मेरे सीने में चुभने लगीं। माँ के तपते होंठों पर मैंने अपने होंठ रख दिए। माँ के अमृत भरे होंठों का रसपान करते-करते मैंने पीछे दोनों हथेलियां माँ के उभरे विशाल नितंबों पर जमा दी। माँ के गुदाज चूतड़ों को मसलते हुए में माँ के पेल्विस को अपने पेल्विस पर दबाने लगा।

विजय- “अब इस सौंदर्य की प्रतिमा को अपने हाथों से धीरे-धीरे निर्वस्त्र करूंगा। तुम्हारे नंगे जिश्म को जी भर

के देदूंगा, तुम्हारे काम अंगों को छुऊँगा, उन्हें प्यार करूँगा..." चुंबन के बाद माँ की ठुड्डी को ऊपर उठाते मैंने। कहा और एक-एक करके पहले माँ के गहने उतार दिए। फिर माँ का ब्लाउज़ खोला और उसके बाद उसके घाघरे का नाड़ा खींच दिया। नाड़ा ढीला होते ही भारी घाघरा नीचे गिर पड़ा। अब माँ उसी माडर्न हल्के गुलाबी रंग की पैंटी और ब्रा में थी जो उस दिन मुझे सप्लायर ने दी थी।

5'10" लम्बे और छरहरे शरीर की मालिका श्रीमती राधा देवी, यानी की मेरी पूज्य माताजी पैंटी और ब्रा में खड़ी मंद-मंद मुश्कुरा रही थी। विशाल जांघों ओर पीछे उभरे हुए नितंबों से पैंटी पूरी सटी हुई थी। माँ की फूली चूत का उभार स्पष्ट नजर आ रहा था। सीने पर दो बड़े-बड़े कलश बड़े ही तरीके से रखे हुए थे। मैंने ब्रा के ऊपर से माँ के भरे-भरे चूचों को हल्के से सहलाया और ब्रा के स्ट्रैप खोल दिए और ब्रा भी शरीर से अलग कर दी। माँ के उरोज बिल्कुल शेप में थे। गुलाबी चूचुक तने हुए और काफी बड़े-बड़े थे।

विजय- “हाय मम्मी तुम्हारे अंगूर के दाने तो बड़े मस्त हैं..." यह कहकर मैंने मुँह नीचे करके दाएं चुचुक को

अपने मुँह में भर लिया और चूचुक को चुलभुलने लगा।

तभी माँ मेरे सिर के पीछे हाथ रखकर मेरे सिर को अपनी चूची पर दबाने लगी तथा दूसरे हाथ से अपनी चूची मानो मेरे मुँह में ठूसने लगी। मुझे माँ का यह खुलापन और अदा बहुत ही पसंद आई। कुछ देर चूची चूसने के बाद मैं बेड पर बैठ गया और माँ की पैंटी में उंगलियां डालने लगा। मैंने सिर ऊपर उठाते हुए माँ की आँखों में देखा। माँ ने आँखों के इशारे से हामी भर दी। मैंने वैसे ही माँ की आँखों में देखते-देखते पैंटी नीचे सरका दी और माँ की टाँगों से निकालकर सोफे पर उछाल दी। अब माँ मेरे सामने जन्मजात नंगी खड़ी थी।

मैंने माँ के चेहरे से आँखें हटाकर माँ की चूत पर केंद्रित कर दी। मेरी माँ की चूत बहुत ही फूली हुई और घने काले बालों से भरतीं थी। माँ की झाँट के बाल घंघराले और लम्बे थे। माँ ने शायद ही कभी अपनी झांटों की । सफाई की हो। माँ की जांघे बहुत ही चौड़ी और दूधिया रंगत लिए थीं। मैंने माँ की चिकनी मरमरी जाँघों पर हाथ रख दिया और हल्के-हल्के उसपर फिसलाने लगा। तभी माँ ने टाँगें थोड़ी चौड़ी कर दी और मेरी आँखों के सामने माँ की चूत की लाल फाँक कौंध गई।

राधा- “हाय मेरे विजय राजा, तुझे अपनी माँ की चूत कैसी लगी?” माँ ने हँसते हुए पूछा।

विजय- “हाय क्या प्यारी चूत है। जितनी प्यारी यह तेरी चीज है उतने ही प्यार से इसे मेरे सामने पेश करो। इसे पूरी सजा के पूरी छटा के साथ मुझे सौंपो तब मेरी पसंद नापसंद पूछो। खूब बोल-बोलकर पूरी कामातुर होकर मुझे इसे भोगने के लिए कहो मेरी जान...” यह कहकर में बिस्तर पर लेट गया।

 
माँ मेरा मतलब समझ गई और बिस्तर पर आ गई। माँ ने मेरी छाती के दोनों ओर अपने घुटने टेक लिए और घुटनों को जितना फैला सकती थी फैला ली। मैंने भी अपने घुटने मोड़ लिए और पीछे माँ के पीठ टिकने के लिए उनका सपोर्ट बना दिया। माँ ने उनपर अपनी पीठ टिका दी और चूत मेरी ओर आगे सरकाते हुए अपने दोनों । हाथों से जितना चिदोर सकती थी उतनी चिदोर दी। माँ की चूत का लाल छेद पूरा फैला हुआ मुझे आमंत्रण दे रहा था। माँ की चूत से विदेशी सेंट की मीठी खुश्बू आ रही थी।

राधा- “लो मेरे साजन तेरी सेवा में मेरा सबसे खाश और प्राइवेट अंग पेश है, इसे ठीक से अंदर तक देखो। भीतर झाँक के देखो, इसकी ललाई देखो, इसकी चिकनाहट देखो। अपनी रानी की इस सबसे प्यारी डिश का चटखारे लेलेकर स्वाद लो...” माँ ने खनकती और थरथरती आवाज में कहा।

मैं पागल हो उठा। मैंने अपने दोनों होंठ लगभग माँ की खुली चूत के छेद में ठूस दिए। माँ के लसलसे छेद में मैंने 2-3 बार अपने होंठ घुमाए और फिर जीभ निकालकर माँ की चूत की अंदरूनी दीवारों पर फिराने लगा। माँ की चूत का अंदरूनी भाग लसलसा और हल्का नमकीन था।

चूत की नेचुरल खुश्बू विदेशी सेंट से मिली हुई बहुत ही मादक थी। मैं माँ की चूत पर मुँह दबाकर चूत को बेतहाशा चाटे जा रहा था। मेरी जीभ की नोक किसी कड़ी गुठलीनुमा चीज से टकरा रही थी। जब भी मैं उसपर जीभ फिराता माँ के शरीर में कंपन अनुभव होता। तभी माँ ने उठकर ठीक मेरे चेहरे पर आसन जमा लिया और जोर-जोर से मेरे चेहरे पर अपनी चूत दबाने लगी। मैंने माँ के फूले चूतड़ों पर अपनी मुठियां कस ली और माँ की चूत में गहराई तक जीभ घुसाकर मेरी मस्त माँ की चूत का स्वाद लेने लगा।

थोड़ी देर बाद मैं बिस्तर से खड़ा हो गया और एक-एक करके अपने कपड़े खोलने लगा। कुछ ही पल में मैं भी माँ की तरह पूरा जन्मजात नंगा था। माँ बिस्तर पर बैठी थी। मेरा 11 इंच का लण्ड लोहे की रोड की तरह तनकर खड़ा था। बड़ा सा गुलाबी रंग का सुपाड़ा एकदम चिकना था। मैंने एक पैर माँ के बगल में बिस्तर पर रखा और अपना लण्ड हाथ से पकड़कर माँ के चेहरे से टकराने लगा। माँ ने हाथ बढ़ाकर मेरे लण्ड को मुट्ठी में ले लिया, लण्ड के सुपाड़े को माँ अपने होंठों पर फिराने लगी, दूसरे हाथ से मेरे अंडकोषों को मसल रही थी।

राधा- “वाह... क्या शानदार शाही लण्ड है। ऐसे लण्ड पर तो मैं बलि बलि जाऊँ। आज से तो मैं तेरे लण्ड की कनीज हो गई। अब और मत तड़पाओ, इस मस्ताने लण्ड से मेरी प्यासी चूत की प्यास बुझा दो। इस लण्ड को मेरी चूत में पूरा उतार दो मेरे साजन, मेरी योनि का अपने विशाल लण्ड से मंथन करो। अपनी तड़पती माँ की जवानी को खुलकर भौगो। अपने लिंग के रस से मेरी योनि को सींच दो। आओ मेरे प्यारे आओ। मेरे ऊपर आ जाओ और मेरी खुशी-खुशी लो। मैं तुम्हें देने के लिए बहुत आतुर हूँ...” माँ तड़प-तड़प कह रही थी।

 
विजय- “हाँ... मेरी राधा रानी मैं तेरा दीवाना हूँ, तेरी चूत का रसिया हूँ। जब से तू यहाँ आई है तब से मैं तुझ पर फिदा हूँ। सोते जागते मैं हरदम तेरी मस्तानी चूत का ही ख्वाब देखा करता था। अब जब मेरे सामने तेरी यह चूत नंगी पड़ी है तो मैं इसे मनचाहे ढंग से चोदूंगा, तुझे तड़पा-तड़पा के तेरी जवानी को भोगूंगा...” यह कहकर मैंने माँ को लिटा दिया और माँ की गाण्ड के नीचे एक बड़ा सा तकिया लगा दिया ताकी चूत उभर जाये।

माँ- “हाँ... मेरे वीजू प्यारे अपने इस मातृ अंग का, अपनी इस जन्मस्थली का खुलकर उपभोग करो। अपने विशाल लिंग से मेरी योनि का भेदन करो। हाँ मेरे स्वामी अपनी इस प्यासी चरणों की दासी को अपना वीर्य दान दो, मेरी वर्षों से सूखी पड़ी इस बावड़ी में अपने रस का नाला बहा दो और इसे लबालब भर दो...”

विजय- “हाँ... मेरी रानी, मैं तेरी टाँगों के बीच तेरी लेने आ रहा हूँ..” कहकर मैं माँ की टाँगों के बीच आ गया और माँ की चूत के छेद पर अपने लण्ड का सुपाड़ा रख दिया।

माँ की चूत पूरी लसलसी थी। थोड़ा सा जोर लगते ही सुपाड़ा ‘पच्च' करके अंदर फिसल गया। अब मैं माँ के ऊपर पूरा झुक गया और माँ को होंठों को अपने होंठों में ले लिया। 4-5 बार केवल सुपाड़ा अंदर डालता और पूरा बाहर निकल लेता। इसके बाद सुपाड़ा अंदर डालने के बाद मैंने लण्ड का दबाव माँ की चूत में बढ़ाया। मैं दबाव बहुत धीरे-धीरे दे रहा था। अगले 2-3 मिनट में मेरा आधा लण्ड माँ की चूत में समा चुका था। उधर माँ के होंठ मेरे होंठों में थे। नीचे माँ कसमसा रही थी। अब मैं माँ की चूत में आधा के करीब लण्ड डालता और वापस निकाल लेता। कई बार ऐसा करने से चूत अंदर से अच्छी तरह से गीली हो गई। इसके बाद आधा लण्ड डालने के बाद मैंने चूत में दबाव बनाए रखा और मेरा लण्ड चूत में धीरे-धीरे सरकने लगा। माँ का शरीर नीचे अकड़ रहा था। अब माँ के होंठ छोड़कर मेरे हाथ माँ की चूचियों को गूंध रहे थे।

राधा- “तूने तो अपने हलब्बी लण्ड से आज मुझे 18 साल की कुंवारी कन्या बना दिया है। इतना मजा तो मैं जब जिंदगी में पहली बार चुदी थी तब भी नहीं आया था। तुम्हारा यह मोटा सोंटा तो मेरी चूत में पूरा अड़स गया है। अपनी माँ की चूत में धीरे-धीरे पेलो और आहिस्ते आहिस्ते मेरा पूरा मजा लो...”

विजय- “हाँ... मेरी राधा प्यारी देखो कितने आराम से तुझे चोद रहा हूँ। मैं तेरा बहुत शुक्रगुजार हूँ की तूने इतने साल से मेरे लिए अपनी यह मस्त चूत बचा के रखी। जितना मजा मुझे तेरे साथ आ रहा है उतना मजा मुझे। कोई लड़की दे ही नहीं सकती थी। अब मैं बिल्कुल शादी नहीं करूंगा। अब से तू ही मेरी बीवी है, मेरी घरवाली है। दुनियां की नजरों में तू भले ही मेरी माँ बने रहना, उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। पर जब भी मौका मिले यूँ ही मस्त होकर चुदाते रहना...”

 
अब मेरा लण्ड माँ की चूत में जड़ तक अंदर घुसने में बिल्कुल थोड़ा सा बाकी रह गया था, तो मैंने चूत में लण्ड के हल्के-धक्के देने प्रारंभ कर दिए। माँ हाय हाय करने लगी। मेरा लण्ड माँ की चूत में जड़ तक अंदर-बाहर होने लगा था। धीरे-धीरे मैं धक्कों की स्पीड बढ़ाता गया। लण्ड ‘फछ-फछ’ करता चूत से अंदर-बाहर हो रहा था।

अब माँ ने दोनों हाथ मेरी कमर में जकड़ दिए और धक्कों में मेरा साथ देने लगी। माँ की हाय हाय सिसकारियों में बदल गई। माँ की आँखें मूंद गई और वो मुझसे चुदाई का स्वर्गीय आनंद लेने लगी। मैं माँ को बेतहाशा चोदे जा रहा था। अब % के करीब लण्ड चूत से बाहर निकालता और एक करारा शाट लगाकर जड़ तक वापस पेल देता।

विजय- “माँ कैसा लग रहा है? क्यों तीनो लोक दिख रही है या नहीं?” मैंने पूछा।

राधा- “अरे मत पूछ। आज जैसा आनंद तो मुझे जीवन में आज तक नहीं मिला। तुम बहुत ही प्यार से कर रहे हो। मुझे दर्द महसूस तक नहीं होने दिया और 11 इंच का हलब्बी लौड़ा पूरा का पूरा मेरी चूत में उतार दिया...” माँ ने कहा।

अब मैं पूरे जोश में आ चुका था और जोर-जोर से हुमच-मच कर लण्ड पेलता था। माँ भी नीचे से धक्कों का जबाब दे रही थी।

विजय- "देख तुझे कैसे कस के चोद रहा हूँ। ले ये मेरा धक्का झेल। बड़ी मस्त औरत है तू। तू तो सिर्फ मेरे से चुदने के लिए ही बनी है। तुझ जैसी चुदक्कड़ और सेक्सी औरत को तो दिन रात नंगी करके ही रखना चाहिए। और जब भी लण्ड खड़ा हो जाय तेरे में पेल देना चाहिए..” मैं अनाप सनाप बकते हुए अपनी मस्त माँ को चोदे जा रहा था।

करीब 10 मिनट तक यह चुदाई चली की माँ ने मुझे बुरी तरह से जकड़ लिया। माँ की आँखें लाल हो गई, वो हाँफने लग गई, उसका शरीर एक बार ऐंठा और वो ढीली पड़ने लगी।

राधा- “हाय विजय बेटे तूने तो एक ही चुदाई में मुझे ढीली कर दिया। देख मेरी चूत से क्या बह रहा है? मैं इतनी कमजोर क्यों होती जा रही हूँ? मेरे पर ऐसे ही चढ़ा रह, मुझे अपने नीचे दबोचे रख। मैं तृप्त हो गई..”

तभी मेरे लण्ड से जोर से ज्वालामुखी फट पड़ा। लण्ड से पिघला लावा माँ की चूत में बहने लगा। धीरे-धीरे माँ के साथ मैं भी शीतल पड़ता गया। कुछ देर बाद माँ उठी। सोफे से उसने सारे कपड़े लिए और नंगी ही अपने कमरे में चली गई। कुछ देर बाद मैं भी उठा। बाथरूम में जाकर हाथ मुँह धोया और नाइट ड्रेस पहनकर सो गया। आज बहुत अच्छी नींद आई। सोने के बाद एक बार नींद लगी तो सुबह ही खुली। आफिस जाते वक़्त माँ ने नाश्ता दिया पर वो रोज की तरह बिल्कुल सामान्य थी।

 
शाम को ठीक समय पर मैं घर पर आ गया। रोज की ही तरह हमने डिनर लिया। आज माँ फिर नहाने चली गई। मैंने भी बहुत तबीयत से शावर का मजा लिया और सोफे पर बैठकर माँ का इंतजार करने लगा। जब माँ मेरे रूम में आई तो आज वो सेक्सी खुली नाइट-गाउन में थी। गाउन के स्ट्रैप्स उसने आगे पेट पर बाँध रखे थे। चलकर आते समय उसकी भारी चूचियां गाउन में उछल रही थीं।

राधा- “लगता है बड़ी बेसब्री से इंतजार हो रहा है...” माँ ने अपनी स्वाभाविक हँसी से पूछा।

विजय- “जिस इंतजार का फल मीठा हो उस इंतजार में भी मजा है। पर माँ आज तो तुम कयामत ढा रही हो।

क्या इरादा लेकर आए हैं सरकार..” मैंने सोफे के पास खड़ी माँ का हाथ पकड़कर कहा।।

राधा- “कल तो मैं इतनी बेचैन हो गई की तुम्हें ठीक से देख ही नहीं सकी। पिछले 15 साल से जो मेरी तमन्नाएं सोई पड़ी थीं, उन्हें तुमने एकाएक जगा दिया था। मेरे पूरे शरीर में आग सी जलने लगी थी और चींटियां सी रेंगने लगी थी। जब तक तूने मेरी प्यासी धरती पर प्यार की बौछार नहीं की मैं धू धू करके जल रही थी। लेकिन आज अपने लाल की पूरी जवानी अच्छी तरह देगी। तेरे मतवाले अंग को जी भर के निहारूंगी, उसे खूब प्यार करूंगी। वैसे तो तू मुझे आइसक्रीम कैंडी खिलाने कहाँ-कहाँ ले जाता रहता है और पूछ-पूछ खिलाता है। आज अपनी नीचे वाली कैंडी इस माँ को नहीं खिलाएगा?” माँ ने कहा।

विजय- “अरे मेरी रानी इतनी जल्दी भी क्या है? आओ कुछ देर मेरी गोद में बैठो, मेरे से प्यारी-प्यारी खुलकर बातें करो। मेरा मतवाला लण्ड तो अब आपका बिना मोल का गुलाम है। जब सरकार हुकुम करेंगे, बिल्कुल सीधा खड़ा होकर आपको सल्यूट करेगा। आप जहाँ हुकुम देंगे वहीं दौड़ा चला जाएगा...” यह कहते हुए मैंने अपनी सेक्सी माँ को हाथ पकड़कर आपनी गोद में बैठा लिया।

राधा- “यह तो बहुत ही प्यारा स्वामिभक्त और आज्ञाकारी सेवक है। ऐसे सेवक के लिए तो मेरे महल का हर द्वार खुला है। कहीं भी कोई पहरा नहीं है और ना ही कहीं रोक है। इसकी जब भी जिस समय जहाँ जाने को इच्छा हो वहाँ फौरन बेरोक-टोक जा सकता है। राजमहल की महारानियों की सेवा में तो ऐसे ही फौलादी जिश्म के मुस्तैद गुलाम चाहिए..."

विजय- “यह आपका प्यारा गुलाम ठीक वैसा ही है जैसा की आप चाहती हैं। यह इस विशाल राजमहल का हर बंद पड़ा और गुप्त द्वार खुद-बा-खुद तलाश लेगा और अपना रास्ता खुद बना लेगा..."

राधा- “चलो अब उठो और अपने कपड़े खोलो। मुझे तो अभी कैंडी चूसनी है...” माँ ने मचलकर कहा।

विजय आज्ञाकारी बालक की तरह सोफे से उठा और एक-एक करके सारे कपड़े उतारकर माँ के सामने पूरा नंगा

हो गया। माँ सोफे से उठकर बेड पर बैठ गई थी। मेरा लण्ड तन गया था जिसे माँ ने हाथ में ले लिया और मुठियाने लगी।

राधा- “इतना प्यारा कैंडी सा लण्ड और रसगुल्ले सा सुपाड़ा। इसे आज जी भर के चूसूंगी। मैंने आज तक किसी मरद का लण्ड नहीं चूसा। लेकिन कल्पनाओं में किसी मोटे और तगड़े लण्ड को पक्की लण्डखोर की तरह चूसा । करती थी। आज वैसा ही लण्ड मेरे सामने है। विजय डार्लिंग अपने विशाल लण्ड को अपनी माँ के मुँह में दे दे...” यह कहकर माँ ने मुझे बेड पर ले लिया और खुद चिट लेट गई। मैंने माँ के कंधों के दोनों ओर घुटने जमा लिए

और माँ के मुँह में अपना लण्ड दे दिया।

 
राधा होंठ गोल करके मुँह से लण्ड को बाहर-भीतर करते हुए गीला करने लगी। फिर जी जान से कोशिश करती, जितना हो सके मुँह के अंदर लेने लगी। पूरी कोशिश के बाद भी माँ 6 इंच के करीब ही लण्ड मुँह में ले पाई।

माँ काफी देर मेरे लण्ड को चूसती रही, सुपाड़े पर जीभ फिराती रही, 1-2 बार आंडों को भी मुँह में भरने की कोशिश की।

राधा- “तेरे इस मस्त लण्ड ने तो मुझे पक्की लण्डखोर बना दिया। देखो तो इस उमर में मुझे यह क्या हो गया?” माँ ने कहा।

विजय- “माँ तेरे जैसी जवान, हसीन और शौकीन औरत को इस उमर में आकर जब ऐसा चस्का लगता है ना तो उस औरत के यार की तो लाटरी खुल जाती है। ऐसी प्यासी और तड़पती औरत बहुत मस्त होकर बोल-बोलकर आपनी जवानी का खजाना लुटाती है। खुद भी पूरी तरह से खुलकर जवानी के नये-नये खेल खेलती है और अपने ठोंकू यार को भी पूरी मस्ती देती है। उस औरत के साथ मजा लेने में जो सुख है ना उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। बड़ी नमकीन औरत है तू। तेरा यार बनकर तो मेरा भाग्य खुल गया। अब तेरे साथ खुलकर व्यभिचार करूँगा। तभी तो मुझे तेरे जैसी प्यासी और शौकीन औरतों का चस्का है। एक बार पटाने की देर है फिर तो इतनी मस्ती कराती है की पूछो मत...” मैंने बहुत ही कामुक अंदाज में होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा।

राधा- “जब तेरे जैसा मतवाला बांका यार मिल जाय तो हर जवान प्यासी औरत अपनी जवानी लुटाने को मचल जाती है। मैं 15 साल से तगड़े लौड़े को तरस रही थी। एक बार जब तूने मेरे पर डोरे डालने शुरू किए तो मुझे तुम एक बेटे से ज्यादा पूरा मर्द दिखाई देने लेगे। मुझे तेरा कसा शरीर, मजबूत पुढे, विशाल बाँहें, फैली जांघे आकर्षित करने लगी। मैं इनमें पिसने के लिए तड़प उठी। यह हमेशा याद रखो जब भी हम दोनों एकांत में। कामातुर होकर मिलें, तब तुम बेटे से पहले एक पूर्ण पुरुष हो और मैं एक काम पीड़िता पूर्ण नारी। तुम्हारे पौरुष का इसी में सम्मान है की तुम अपने समक्ष काम याचना लेकर आई नारी की काम तृप्ति करो, चाहे वो तुम्हारी जननी ही क्यों ना हो...” यह कहकर माँ ने मुझे अपनी बाँहों में कस लिया।

विजय- “चल मेरी राधा जान अब अपनी मालपुए सी चूत भी तो मुझे चटा दे। तुझे तो पता ही है की तुम कैंडी चूसने की शौकीन हो तो मैं कोन में जीभ घुसाकर क्रीम चाटने का शौकीन...”

मेरी बात सुनकर माँ उठी और नाइट-गाउन की डोरी खोल दी। खुले गाउन के नीचे माँ ने कुछ भी नहीं पहन । रखा था और माँ ने गाउन अपनी बाँहों से निकाल दिया और मेरे सामने मेरी माँ पूरी नंगी होकर हँस रही थी। मैं बेड पर लेट गया और माँ को मेरे चेहरे पर घोड़ी नुमा बना लिया और माँ का मुँह मेरे पैरों की ओर कर दिया।

 
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