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जंगल में लाश
गर्मियों की अँधेरी रात थी। घण्टों करवटें बदलने के बाद कोतवाली इंचार्ज इन्स्पेक्टर सुधीर की बस आँख लगी ही थी कि एक सब-इन्स्पेक्टर ने आ कर उसे जगा दिया।
“क्या है भई, क्या आफ़त आ गयी?” वह झल्लाता हुआ बोला।
“क्या बताऊँ साहब, अजीब मुसीबत में जान है। शायद कोई क़त्ल हो गया है।" सब-इन्स्पेक्टर ने कहा।
“शायद क़त्ल हो गया है...? क्या मतलब...?"
“एक आदमी धर्मपुर के जंगलों में एक लाश देख कर ख़बर देने आया है।"
___“इतनी रात गये धर्मपुर के जंगलों में वह आदमी क्या कर रहा था?" इन्स्पेक्टर सुधीर ने बिस्तर से उतरते हुए कहा।
“मैंने उससे कोई सवाल नहीं किया। सीधा यहाँ चला आया।” सब-इन्स्पेक्टर ने जवाब दिया।
दोनों तेज़ क़दमों से चलते हुए दफ़्तर जा पहुँचे। इन्स्पेक्टर सुधीर ने ख़बर लाने वाले अजनबी को घूर कर देखा। वह एक नौजवान था। उसके चेहरे पर घबराहट नज़र आ रही थी। टाई की गाँठ ढीली हो कर कॉलर के नीचे लटक आयी थी। बालों पर जमी हुई धूल से ज़ाहिर हो रहा था कि वह बहुत दूर का सफ़र करके आ रहा है। उसकी साँस अभी तक फूल रही थी।
--
"क्यों भई...क्या बात है?" सुधीर ने तेज़ आवाज़ में पूछा।
__“मैं अभी-अभी...धर्मपुर के जंगल में एक औरत की लाश देख कर आ रहा हूँ।” उसने माथे से पसीना पोंछते हुए कहा।
"लेकिन आप इस वक़्त धर्मपुर के जंगल में क्या कर रहे थे?” सुधीर ने कहा।
“मैं दरअसल जलालपुर से वापस आ रहा था।"
“जलालपुर से...? जलालपुर यहाँ से लगभग बीस मील की दूरी पर है। आप किस सवारी पर आ रहे थे?"
“मोटर साइकिल पर...जब मैं जोज़फ़ रोड से पीटर रोड की तरफ़ मुड़ने लगा तो मैंने सड़क के किनारे एक औरत की लाश देखी। उसका ब्लाउज़ खून से तर था। उफ, मेरे ख़ुदा...कितना भयानक मंज़र था...मैं उसे ज़िन्दगी भर न भुला सकूँगा।"
“तो आप जलालपुर में रहते हैं?"
“जी नहीं...मैं यहीं इसी शहर में रहता हूँ। एक दोस्त से मिलने जलालपुर गया था।” ।
“तो इतनी रात गये वहाँ से वापसी की क्या ज़रूरत पड़ गयी थी?"
___ “सर, मैं यह क़त्ल खुद करके आपको ख़बर देने नहीं आया।" अजनबी ने झंझला कर कहा। “मैंने एक लाश देखी और एक शहरी होने की हैसियत से अपना फ़र्ज़ समझा कि पुलिस को इत्तला दे दूँ।"
“नाराज़ होने की ज़रूरत नहीं...!'' सुधीर ने संजीदगी से कहा। “मैं भी अपना फ़र्ज़ ही अदा कर रहा हूँ...आप का क्या नाम है?"
“मुझे रणधीर सिंह कहते हैं।"
“आप क्या काम करते हैं?"
“उफ मेरे खुदा! मैंने यहाँ आ कर ग़लती की। अजनबी ने परेशान होते हुए कहा।
“अरे साहब, मैं आपके साथ ही चलूँगा।"
__“चलना तो पड़ेगा ही... खैर, अच्छा , आप बहुत ज़्यादा थोड़ा परेशान मालूम होते हैं, फिर सही...दरोगा जी ज़रा जल्दी से तीन कॉन्स्टेबलों को तैयार कर लीजिए और इस वक़्त ड्यूटी पर जो ड्राइवर हो, उसे भी बुलवा लीजिए।
थोड़ी देर बाद पुलिस की लॉरी पीटर रोड पर धर्मपुर की तरफ़ जा रही थी। रात बहुत अँधेरी थी। सन्नाटे में लॉरी की आवाज़ दूर तक सुनायी दे रही थी। लॉरी की हेड लाइटों की रोशनी दूर तक सड़क पर फैल रही थी। सड़क के मोड़ से लगभग दो फ़रलाँग की दूरी पर एक बड़ा-सा पेड़ सड़क पर गिरा हुआ नज़र आया।
“अरे यह क्या...?” अजनबी चौंक कर बोला।
लॉरी पेड़ के पास आकर रुक गयी।
“मैं आपसे क़सम खा कर कहता हूँ कि अभी आध घण्टा पहले जब मैं इधर से गुज़रा तो यह पेड़ यहाँ नहीं था।” अजनबी ने परेशान होते हुए कहा।
सब लोग लॉरी से उतर आये।
“आप भी कमाल करते हैं! आपकी बात पर किसे यक़ीन आयेगा! ज़ाहिर है, आज आँधी भी नहीं आयी। यह भी साफ़ है कि पेड़ काटा गया है और आधे घण्टे में इतने मोटे तने वाले पेड़ को काट डालना आसान काम नहीं।
“अब मैं आपसे क्या कहूँ।" अजनबी ने अपने सूखे होंटों पर ज़बान फेरते हुए कहा।
_ “खैर, यह बाद में सोचा जायेगा।" कोतवाली इंचार्ज तेज़ आवाज़ में बोला। “अब वह जगह यहाँ से कितनी दूर है?"
.
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“ज़्यादा-से-ज्यादा दो, ढाई फ़रलाँग...!" अजनबी ने जवाब दिया।
लॉरी वहीं छोड़ कर यह पार्टी टॉर्च की रोशनी में आगे बढ़ी। सुनसान सड़क पुलिस वालों के भारी-भरकम जूतों की आवाज़ से गूंज रही थी।
।
___“उफ मेरे खुदा...!'' अजनबी ने चलते-चलते रुक कर कहा।
“क्यों, क्या बात है?' कोतवाली इंचार्ज बोला।
“कहीं मैं पागल न हो जाऊँ।” अजनबी ने बेचैनी में अपनी नाक रगड़ते हुए कहा।
“ऐ मिस्टर! तुम्हारा मतलब क्या है?" कोतवाली इंचार्ज ने गरज कर कहा।
___“मैंने वह लाश यहीं देखी थी...मगर...मगर...!”
“मगर-मगर क्या कर रहे हो...यहाँ तो कुछ भी नहीं है।'
“यही तो हैरत है।"
“सरकार, यहाँ भूत-प्रेत भी ज़्यादा रहते हैं।" एक कॉन्स्टेबल ने मिनमिनाती हुई आवाज़ में कहा।
“बको मत!” कोतवाली इंचार्ज चीख़ कर बोला। वह गुस्से में तमतमा रहा था।
“मैं तो बड़ी मुश्किल में फँस गया।" अजनबी ने धीमी आवाज़ में कहा।
“अभी कहाँ...अब फँसेंगे आप मुश्किल में।" कोतवाली इंचार्ज ने कड़क आवाज़ में कहा। “ज़बर्दस्ती परेशान किया। क्या तुमने रुक कर क़रीब से लाश देखी थी?"
__“जी हाँ...उसके सीने से खून उछल रहा था।"
“अजीब लाश थी, कहीं ज़मीन पर खून का धब्बा तक दिखायी नहीं देता।" कोतवाली इंचार्ज ने झुक कर टॉर्च की रोशनी में ज़मीन को गौर से देखते हुए कहा।
“मैं क़सम खा कर...!"
“बस-बस...रहने दो। बेकार ही वक़्त बर्बाद कराया।" कोतवाली इंचार्ज ने उसकी बात काटते हुए कहा।
“मैं कहता हूँ सरकार, भूत...!”
“ठाँय...!'' अचानक फ़ायर की आवाज़ ने सब को बौखला कर रख दिया। कोतवाली इंचार्ज का हाथ पिस्तौल के केस ही पर था कि दूसरा फ़ायर हुआ। फिर तीसरा...चौथा...अब ऐसा मालूम हो रहा था जैसे बहुत-से आदमी एक साथ बंदूने चला रहे हों। कोतवाली इंचार्ज और सब-इन्स्पेक्टर ने अपने पिस्तौल निकाल कर पेड़ों की आड़ ले ली। लेकिन उन्हें जल्द ही वहाँ से भागना पड़ा, क्योंकि उनके पीछे से भी फ़ायर होने शुरू हो गये थे। तभी एक चीख़ सुनायी दी...फिर दूसरी और एक सिपाही लड़खड़ा कर गिर पड़ा। फिर उठ कर भागा। ये लोग छुपते-छुपाते लॉरी तक पहुँच पाये। जिस वक़्त ड्राइवर लॉरी बैक कर रहा था, क़रीब ही से दोबारा फ़ायर होने शुरू हो गये।
लॉरी तेज़ रफ़्तार से शहर की तरफ जा रही थी। फ़ायर अब तक सनायी दे रहे थे। एक सिपाही के बाजू पर गोली लगी थी। वह कराह रहा था।
“लेकिन...वह...वह कहाँ गया?" सब-इन्स्पेक्टर ने भर्रायी हुई आवाज़ में कहा।
“जहन्नुम में...!” कोतवाली इंचार्ज ने चीख़ते हुए कहा। मुझसे ज़्यादा बेवकूफ़ शायद दूसरा न मिले। आख़िर मैं अच्छी तरह इत्मीनान किये बगैर उसके साथ चला क्यों आया। कमबख़्त का पता भी तो मालूम न हो सका। हम लोगों की जान लेने की एक बेहतरीन साज़िश थी।"
“मगर साहब...वह किसी तरह भी झूठा नहीं मालूम होता था।” सब-इन्स्पेक्टर ने कहा।
गर्मियों की अँधेरी रात थी। घण्टों करवटें बदलने के बाद कोतवाली इंचार्ज इन्स्पेक्टर सुधीर की बस आँख लगी ही थी कि एक सब-इन्स्पेक्टर ने आ कर उसे जगा दिया।
“क्या है भई, क्या आफ़त आ गयी?” वह झल्लाता हुआ बोला।
“क्या बताऊँ साहब, अजीब मुसीबत में जान है। शायद कोई क़त्ल हो गया है।" सब-इन्स्पेक्टर ने कहा।
“शायद क़त्ल हो गया है...? क्या मतलब...?"
“एक आदमी धर्मपुर के जंगलों में एक लाश देख कर ख़बर देने आया है।"
___“इतनी रात गये धर्मपुर के जंगलों में वह आदमी क्या कर रहा था?" इन्स्पेक्टर सुधीर ने बिस्तर से उतरते हुए कहा।
“मैंने उससे कोई सवाल नहीं किया। सीधा यहाँ चला आया।” सब-इन्स्पेक्टर ने जवाब दिया।
दोनों तेज़ क़दमों से चलते हुए दफ़्तर जा पहुँचे। इन्स्पेक्टर सुधीर ने ख़बर लाने वाले अजनबी को घूर कर देखा। वह एक नौजवान था। उसके चेहरे पर घबराहट नज़र आ रही थी। टाई की गाँठ ढीली हो कर कॉलर के नीचे लटक आयी थी। बालों पर जमी हुई धूल से ज़ाहिर हो रहा था कि वह बहुत दूर का सफ़र करके आ रहा है। उसकी साँस अभी तक फूल रही थी।
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"क्यों भई...क्या बात है?" सुधीर ने तेज़ आवाज़ में पूछा।
__“मैं अभी-अभी...धर्मपुर के जंगल में एक औरत की लाश देख कर आ रहा हूँ।” उसने माथे से पसीना पोंछते हुए कहा।
"लेकिन आप इस वक़्त धर्मपुर के जंगल में क्या कर रहे थे?” सुधीर ने कहा।
“मैं दरअसल जलालपुर से वापस आ रहा था।"
“जलालपुर से...? जलालपुर यहाँ से लगभग बीस मील की दूरी पर है। आप किस सवारी पर आ रहे थे?"
“मोटर साइकिल पर...जब मैं जोज़फ़ रोड से पीटर रोड की तरफ़ मुड़ने लगा तो मैंने सड़क के किनारे एक औरत की लाश देखी। उसका ब्लाउज़ खून से तर था। उफ, मेरे ख़ुदा...कितना भयानक मंज़र था...मैं उसे ज़िन्दगी भर न भुला सकूँगा।"
“तो आप जलालपुर में रहते हैं?"
“जी नहीं...मैं यहीं इसी शहर में रहता हूँ। एक दोस्त से मिलने जलालपुर गया था।” ।
“तो इतनी रात गये वहाँ से वापसी की क्या ज़रूरत पड़ गयी थी?"
___ “सर, मैं यह क़त्ल खुद करके आपको ख़बर देने नहीं आया।" अजनबी ने झंझला कर कहा। “मैंने एक लाश देखी और एक शहरी होने की हैसियत से अपना फ़र्ज़ समझा कि पुलिस को इत्तला दे दूँ।"
“नाराज़ होने की ज़रूरत नहीं...!'' सुधीर ने संजीदगी से कहा। “मैं भी अपना फ़र्ज़ ही अदा कर रहा हूँ...आप का क्या नाम है?"
“मुझे रणधीर सिंह कहते हैं।"
“आप क्या काम करते हैं?"
“उफ मेरे खुदा! मैंने यहाँ आ कर ग़लती की। अजनबी ने परेशान होते हुए कहा।
“अरे साहब, मैं आपके साथ ही चलूँगा।"
__“चलना तो पड़ेगा ही... खैर, अच्छा , आप बहुत ज़्यादा थोड़ा परेशान मालूम होते हैं, फिर सही...दरोगा जी ज़रा जल्दी से तीन कॉन्स्टेबलों को तैयार कर लीजिए और इस वक़्त ड्यूटी पर जो ड्राइवर हो, उसे भी बुलवा लीजिए।
थोड़ी देर बाद पुलिस की लॉरी पीटर रोड पर धर्मपुर की तरफ़ जा रही थी। रात बहुत अँधेरी थी। सन्नाटे में लॉरी की आवाज़ दूर तक सुनायी दे रही थी। लॉरी की हेड लाइटों की रोशनी दूर तक सड़क पर फैल रही थी। सड़क के मोड़ से लगभग दो फ़रलाँग की दूरी पर एक बड़ा-सा पेड़ सड़क पर गिरा हुआ नज़र आया।
“अरे यह क्या...?” अजनबी चौंक कर बोला।
लॉरी पेड़ के पास आकर रुक गयी।
“मैं आपसे क़सम खा कर कहता हूँ कि अभी आध घण्टा पहले जब मैं इधर से गुज़रा तो यह पेड़ यहाँ नहीं था।” अजनबी ने परेशान होते हुए कहा।
सब लोग लॉरी से उतर आये।
“आप भी कमाल करते हैं! आपकी बात पर किसे यक़ीन आयेगा! ज़ाहिर है, आज आँधी भी नहीं आयी। यह भी साफ़ है कि पेड़ काटा गया है और आधे घण्टे में इतने मोटे तने वाले पेड़ को काट डालना आसान काम नहीं।
“अब मैं आपसे क्या कहूँ।" अजनबी ने अपने सूखे होंटों पर ज़बान फेरते हुए कहा।
_ “खैर, यह बाद में सोचा जायेगा।" कोतवाली इंचार्ज तेज़ आवाज़ में बोला। “अब वह जगह यहाँ से कितनी दूर है?"
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“ज़्यादा-से-ज्यादा दो, ढाई फ़रलाँग...!" अजनबी ने जवाब दिया।
लॉरी वहीं छोड़ कर यह पार्टी टॉर्च की रोशनी में आगे बढ़ी। सुनसान सड़क पुलिस वालों के भारी-भरकम जूतों की आवाज़ से गूंज रही थी।
।
___“उफ मेरे खुदा...!'' अजनबी ने चलते-चलते रुक कर कहा।
“क्यों, क्या बात है?' कोतवाली इंचार्ज बोला।
“कहीं मैं पागल न हो जाऊँ।” अजनबी ने बेचैनी में अपनी नाक रगड़ते हुए कहा।
“ऐ मिस्टर! तुम्हारा मतलब क्या है?" कोतवाली इंचार्ज ने गरज कर कहा।
___“मैंने वह लाश यहीं देखी थी...मगर...मगर...!”
“मगर-मगर क्या कर रहे हो...यहाँ तो कुछ भी नहीं है।'
“यही तो हैरत है।"
“सरकार, यहाँ भूत-प्रेत भी ज़्यादा रहते हैं।" एक कॉन्स्टेबल ने मिनमिनाती हुई आवाज़ में कहा।
“बको मत!” कोतवाली इंचार्ज चीख़ कर बोला। वह गुस्से में तमतमा रहा था।
“मैं तो बड़ी मुश्किल में फँस गया।" अजनबी ने धीमी आवाज़ में कहा।
“अभी कहाँ...अब फँसेंगे आप मुश्किल में।" कोतवाली इंचार्ज ने कड़क आवाज़ में कहा। “ज़बर्दस्ती परेशान किया। क्या तुमने रुक कर क़रीब से लाश देखी थी?"
__“जी हाँ...उसके सीने से खून उछल रहा था।"
“अजीब लाश थी, कहीं ज़मीन पर खून का धब्बा तक दिखायी नहीं देता।" कोतवाली इंचार्ज ने झुक कर टॉर्च की रोशनी में ज़मीन को गौर से देखते हुए कहा।
“मैं क़सम खा कर...!"
“बस-बस...रहने दो। बेकार ही वक़्त बर्बाद कराया।" कोतवाली इंचार्ज ने उसकी बात काटते हुए कहा।
“मैं कहता हूँ सरकार, भूत...!”
“ठाँय...!'' अचानक फ़ायर की आवाज़ ने सब को बौखला कर रख दिया। कोतवाली इंचार्ज का हाथ पिस्तौल के केस ही पर था कि दूसरा फ़ायर हुआ। फिर तीसरा...चौथा...अब ऐसा मालूम हो रहा था जैसे बहुत-से आदमी एक साथ बंदूने चला रहे हों। कोतवाली इंचार्ज और सब-इन्स्पेक्टर ने अपने पिस्तौल निकाल कर पेड़ों की आड़ ले ली। लेकिन उन्हें जल्द ही वहाँ से भागना पड़ा, क्योंकि उनके पीछे से भी फ़ायर होने शुरू हो गये थे। तभी एक चीख़ सुनायी दी...फिर दूसरी और एक सिपाही लड़खड़ा कर गिर पड़ा। फिर उठ कर भागा। ये लोग छुपते-छुपाते लॉरी तक पहुँच पाये। जिस वक़्त ड्राइवर लॉरी बैक कर रहा था, क़रीब ही से दोबारा फ़ायर होने शुरू हो गये।
लॉरी तेज़ रफ़्तार से शहर की तरफ जा रही थी। फ़ायर अब तक सनायी दे रहे थे। एक सिपाही के बाजू पर गोली लगी थी। वह कराह रहा था।
“लेकिन...वह...वह कहाँ गया?" सब-इन्स्पेक्टर ने भर्रायी हुई आवाज़ में कहा।
“जहन्नुम में...!” कोतवाली इंचार्ज ने चीख़ते हुए कहा। मुझसे ज़्यादा बेवकूफ़ शायद दूसरा न मिले। आख़िर मैं अच्छी तरह इत्मीनान किये बगैर उसके साथ चला क्यों आया। कमबख़्त का पता भी तो मालूम न हो सका। हम लोगों की जान लेने की एक बेहतरीन साज़िश थी।"
“मगर साहब...वह किसी तरह भी झूठा नहीं मालूम होता था।” सब-इन्स्पेक्टर ने कहा।