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ज़िंदगी भी अजीब होती है Restart

भाभी- देखो मैने भी सुबह से कुछ नही खाया है अगर तुम नही खाओगे तो मैं भी नही खाउन्गी ऐसे ही भूखी ही सो जाउन्गी अगर तुम्हारी यही ज़िद है तो मेरी भी यही ज़िद है

अब मैं क्या कहूँ उनसे मैं जानता था वो जो कर रही थी मेरे लिए ही कर रही थी पर मुझे समझे ना कोई तोड़ लिए दो चार टुकड़े उनके साथ आलू के परान्ठे मुझे हमेशा से ही बहुत पसंद थे पर सिर्फ़ मेरी मम्मी के हाथ के ही पर अब वो होना नही था और इधर मेरा जी भी नही लगता था तो मैने वापिस देल्ही जाने का सोचा

मैं सीधा अपने कमरे मे आया और अपना समान डालने लगा

“मुझे बता तो देते तो मैं भी अपनी पॅकिंग कर लेती ”

“मैने सोचा तुम कुछ दिन और रुकोगी



“हाँ, रुकती तो सही पर अगर तुम ने वापिस चलने का सोचा है तो फिर चलते है मैं भी पॅकिंग कर लेती हूँ



रात के करीब 1 बजे थे , मैं और निशा घर से निकले सब लोग सो रहे थे मैने जगाना ठीक नही समझा चुपचाप गाड़ी स्टार्ट की और चल दिए रास्ते मे वो मोड़ आया जो सीधा मिता के घर तक जाता था मैने कुछ देर के लिए गाड़ी रोक दी पर कितना रुकता मैं आँखो मे एक झलक भरी और फिर चल दिए देल्ही के लिए सब पीछे रह गया था सफ़र तो चल रहा था पर मैं उसी मोड़ पर रह गया था

मेरा गाँव मेरा परिवार मेरे अपने लोग मेरी आँखो मे कुछ आँसू थे जो अब सुख चुके थे ज़िंदगी कहती है कि खुल के जियो पर जिए तो कैसे जिए इन हालातों मे मैने निशा की तरफ़ देखा खिड़की खोल रखी थी उसने ठंडी हवा उसके गालो को चूम चूम के जा रही थी अपने सर को टिकाए सीट पर वो कुछ सोच रही थी

मैं- क्या सोच रही हो

वो- हमें ऐसे बिना बताए नही आना चाहिए था

मैं- बताने से भी क्या हो जाता

वो- अपने परिवार से दूर मत भागो तुम

मैं- वहाँ कौन है जो मुझे समझता है

वो- हम सब को फिकर है तुम्हारी

बाते करते करते देल्ही आ गये हम थोड़ा सा थक सा गया था तो सो गया आँख खुली तो देखा कि वो मेरे पास ही सो रही थी मुझसे चिपक के मेरा हाथ उसके सर के नीचे था मैने निकाला नही कही उसकी नींद ना टूट जाए एक बालो की लट जो उसके चेहरे पर आ गयी थी हौले से हटाया मैने,निशा ये कौन लगती थी मेरी सच कहूँ तो सब कुछ थी मेरी बस ऐसे ही दोस्ती की थी इस से कभी पर अब देखो वो क्या थी मेरे लिए

कुछ देर बाद वो उठी , मैने लेटे रहने को कहा उसके पास होने से अच्छा लग रहा था मुझे वो मुझसे और चिपक गयी

वो- कॉफी पियोगे

मैं- चाय

वो- बनाती हूँ

वो उठी तो मैं भी उठ गया वैसे तो दोपहर का टाइम हो रहा था पर अभी उठे थे तो चाय बनती थी निशा चाय बना रही थी तो मुझे उसकी कलाई दिखी एक दम कोरी खाली तो मुझे फिर कुछ याद आया मैं कमरे मे कुछ खोजने लगा और फिर मुझे वो चीज़ मिल ही गयी ये कंगन थे जो पद्मियनी भाभी ने मुझे दिए थे मिथ्लेश के लिए पर ऐसी मेरी किस्मत थी कहाँ

मैं वापिस गया रसोई मे- निशा ज़रा अपने हाथ आगे करो

वो- किसलिए

मैं- करो तो सही यार

जैसे ही उसने अपने हाथ आगे किए मैने वो कंगन उसे पहनाने लगा

वो- क्या कर रहे हो

मैं- एक तोहफा है तुम्हारे लिए

वो- जानते हो क्या कर रहे हो

मैं- जानता हूँ

वो- मनीष,………….

मैं- चुप रहो अब इतना तो हक है ना तुमपे कि तुमहरे लिए कुछ कर सकूँ

वो- हक … मेरा सब कुछ तुम्हारा ही है मनीष

उसकी कलाईयों मे वो कंगन देख कर दिल को सुकून सा लगा अच्छा लगा निशा ने मुझे गले से लगा लिया फिर हम ने चाय पी कुछ छोटे मोटे काम किए कल से ज़िंदगी को वापिस पटरी पे लाने की कोशिस करनी थी मुझे एजेंसी जाना था और उसे बॅंक , ज़िंदगी का एक दिन और बीत गया था ऐसे ही

अगले दिन

मैं- तुम्हे ड्रॉप कर दूं बॅंक

वो- नही मैं मेट्रो से जाती हूँ तुम कार ले जाओ

मैं- नही , तुम गाड़ी ले जाओ

रोड पे आके मैने ऑटो लिया और बताई उसको अपनी मंज़िल बॉस मुझे देख के खुश था उसने कुछ दिन डेस्कजॉब करने को ही कहा वो भी जानते थे कि अभी मैं फील्ड मे जाने लायक नही काम मे पता ही नही चला कि कब रात हो गयी तो अब चलना ही था मैं वहाँ से चला पर घर जाने का मूड नही था तो एक बॉटल ले ली और बैठ गया ऐसे ही पता ही नही चला कि कब बॉटल आधी से ज़्यादा हो गयी

“कितना पियोगे मेरे फ़ौजी मेंटल घर नही जाना क्या ”

मैने देखा वो खड़ी थी थोड़ी दूर फिर आई और मेरे पास बैठ गयी

मैं-घर है ही कहाँ मेरा

वो- कब तक नाराज़ रहोगे

मैं- अब नाराज़ भी ना रहूं , तुमने अच्छा नही किया मेरे साथ

वो- मैं कहाँ दूर हूँ तुमसे, देखो पास ही तो हूँ तुम्हारे

मैं- तो फिर क्यो चली गयी तुम दूर

वो- ताकि फिर से तुम्हारे पास आ सकूँ

मैं- मुझे दुखी देख खुशी हुई तुम्हे

वो- मैं भी कहा सुखी हूँ देखो , जब तक तुम खुश नही तो भला मैं कैसे खुश रहूंगी

मैं- तो फिर क्यो नही आ जाती वापिस

वो- आ तो गयी हूँ क्या मैं तुमहरे साथ नही हूँ

मैं- बाते ना बनाओ

वो- तुमसे ही सीखा है , मैं कुछ कहना चाहती हूँ तुमसे

मैं- कहो

वो- देखो, निशा अच्छी लड़की है बहुत प्रेम करती है तुमसे और फिर उसका कौन है तुम्हारे सिवा उसका हाथ थाम लो

मैं- पर तुम जानती हो मेरी हर सांस तुम्हारी ही है

वो- वो भी तुम्हारी ही है ज़रा एक बार देखो तो सही वो क्यो ही तुम्हारे लिए क्योंकि वो प्यार करती है तुमसे

मैं- और मैं तुमसे जो हक तुम्हारा है वो मैं कैसे उस से …..

वो- मेरी खातिर

वो मुस्कुरई अब उस क्या जवाब देता मैं क्या कहता मैं

वो- सोचो ज़रा मेरी यही इच्छा है कि तुम निशा से शादी कर लो और मुझे पूरा विशवास है तुम मेरी ये इच्छा भी पूरी करोगे

अब मैं क्या कहता उसको उसने अपना फ़ैसला सुना दिया था अब मैं कहूँ भी तो क्या उसको पर इतना ज़रूर था कि वो दूर होकर भी मेरे पास ही थी बहुत पास शायद मेरे दिल मे मेरी धड़कनो मे

 
मैं जब घर आया तो रात बहुत बीत गयी थी पर निशा दरवाज़ पे ही बैठी थी मेरे इंतज़ार मे मुझे देख कर उसको थोड़ी तसल्ली हुई मेरे बॅग को साइड मे रखा मैं भी उसके पास ही बैठ गया

वो- आज देर हो गयी

मैं- हाँ

वो-खाना खाओगे

मैं- तुमने खाया

वो- तुम्हारे बिना कैसे खाती

मैं- हाँ फिर ले आओ यही खाते है

कुछ देर बाद वो दो थालिया ले आई उसको अपने पास देख के मैं बहुत अच्छा फील करता था वैसे मुझे भूख नही थी पर अगर मैं नही ख़ाता तो वो भी नही खाती तो फिर मैने भी कुछ नीवाले खा लिए , उसने बर्तन समेटे मैं भी अंदर आ गया कुछ देर बाद वो मेरे पास आ बैठी

मैं- जानती हो निशा, जब तुम दूर थी मैं बहुत याद करता था तुम कहाँ हो किस हाल मे हो, मैं तुम्हे याद हूँ भी या नही

वो- तुम्हे कैसे भूल सकती थी मैं आज जो हूँ तुम्हारे कारण हूँ मैं

मैं- नही रे पगली , तेरी अपनी मेहनत है मैं क्या था एक आवारा जिसकी ना कोई मंज़िल थी ना कोई ठिकाना पर फिर तुम वो दोस्त बनकर मेरी जिंदगी मे आई जिसका हमेशा से मुझे इंतज़ार था और फिर ज़िंदगी बदल गयी कितना कुछ सीखा है तुमसे वो दिन भी क्या दिन थे बस ज़ी तो तभी ही लिए थे अब तो बस सांसो का बोझ ढो रहे है , वो छोटी छोटी बाते कितनी खुशियाँ देती थी दो रोटी थोड़ी सी सिल्वट पर पिसी हुई लाल मिर्च और एक गिलास लस्सी मे ही अपना पेट भर जाता था

और वो जलेबिया जो तुम लाया करती थी क्या महक आती थी उनमे से अब वो कहाँ , निशा जब तुम पानी भरने मंदिर के नलके पे आती थी मैं तुम्हे देखता था कसम से जैसे ही तुम्हारी इन हिरनी जैसी आँखो से आँखे मिलते ही पता नही क्या हो जाता था बस वो दो पल की मुलाकात ही होंठो को मुस्कुराने की एक वजह दे जाती थी

वो- और तुम जो अपने दोस्तो के साथ उल्जुलुल हरकते करते थे जैसे ही मैं आती कितना इतराते थे तुम कितने गंदे लगते थे तुम जब तुम अपने बालो को जेल लगाते थे और उस दिन जब तुम कीचड़ मे फिसल कर गिरे थे कितना हँसी थी मैं

मैं-वो तो मैं तुम्हे इंप्रेस करने के चक्कर मे गिर गया था पर कुछ भी कहो वो भी क्या दिन थे

वो- हाँ ये तो है

मैं- और वो तो बेस्ट था जब जयपुर मे तुम टल्ली होकर सड़क पर घूम रही थी और फिर उल्टी कर दी थी तुमने

वो- तुम्हे याद है वो

मैं- वो कोई भूलने की बात थोड़ी ना है

वो- पता है उसके बाद मैने फिर कभी नही पी

मैं- क्या बात कर रही हो

वो- कसम से

मैं- चल आज फिर आजा एक बार फिर घूमते है रोड पर टल्ली होके

वो- ना बाबा ना अब बात अलग है

मैं- क्या अलग है वो ही तुम हो वो ही मैं हूँ

वो- कही फिर टल्ली ना हो जाउ

मैं- तब भी संभाला था आज भी संभाल लूँगा

वो – एक बात पुछु

मैं- दो पूछ ले यारा

वो- चल जाने दे फिर कभी पूछूंगी मैं बॉटल लाती हूँ

 
मैं और निशा टुन्न हो चुके थे पूरी तरह से कभी हँस रहे थे कभी रो रहे थे जी रहे थे अपनी यादो मे , बस ये यादे ही तो थी जो अपनी थी मैने निशा की छोटी के रिब्बन को निकाल दिया हमेशा से ही मुझे लड़किया या औरते बस खुले बालो मे ही अच्छी लगती थी

वो- ये क्या किया

मैं- ऐसे ही अच्छी लगती हो तुम

वो- मनीष , तुम यार सच मे ही अजीब हो

मैं- हाँ सब तुम्हारा ही असर है

वो- अच्छा जी और मुझ पर जो ये रंग चढ़ा है ये किसका है

मैं- मुझे क्या पता

वो- तो किसे पता

मैं- तुम जानो

तभी वो थोड़ा सा लड़खड़ाई मैने उसकी कमर मे हाथ डाला और उसको अपनी बाहों मे थाम लिया उसकी छातिया आ लगी मेरे सीने से उसकी साँस मेरे चेहरे को छू गयी वो लहराने लगी मेरी बाहों मे हल्की सी जुल्फे उसके चेहरे पर आ गयी थी मैने उन लटो को सुलझाया उसकी धड़कानों को मैने अपने सीने मे महसूस किया

मैं- देख के चल अभी गिर जाती

वो- तुम जो हो संभालने के लिए

मैं- वो तो है

उसकी गरम साँसे मेरी सांसो को दहका रही थी मैने उसकी कमर को और थोड़ा सा खींच हम एक दूसरे की आँखो मे देख रहे थे उसके होंठ जैसे सूख से गये थे इस से पहले कि वो कुछ कहती मैने धीरे से अपने होंठो से उसके होंठो को छू लिया अगले ही पल उसकी आँखे बंद हो गयी सांसो से साँसे जुड़ गयी वो मेरी बाहों मे ढीली सी पड़ गयी मैं धीरे धीरे से उसको किस करने लगा कुछ देर बाद वो अलग हुई

 
उसकी गरम साँसे मेरी सांसो को दहका रही थी मैने उसकी कमर को और थोड़ा सा खींच हम एक दूसरे की आँखो मे देख रहे थे उसके होंठ जैसे सूख से गये थे इस से पहले कि वो कुछ कहती मैने धीरे से अपने होंठो से उसके होंठो को छू लिया अगले ही पल उसकी आँखे बंद हो गयी सांसो से साँसे जुड़ गयी वो मेरी बाहों मे ढीली सी पड़ गयी मैं धीरे धीरे से उसको किस करने लगा कुछ देर बाद वो अलग हुई

हम दोनो रोड पर ही बैठ गये, उसने मेरे हाथ को अपने हाथ मे लिया और बोली- मनीष एक बात बोलू

मैं- हूँ

वो- तुझसे ना प्यार हुआ पड़ा है आज से नही बहुत पहले से पर कभी मैं तुझे बोल नही पाई पर आज सोचा बोल ही दूं यार ऐसे मन में कब तक घुट घुट कर सहूंगी मुझे पता ही नही चला कि कब मैं तुझे इतना टूट के चाहने लगी , बस हो गया यार

मैं- मुझे पहले ही पता है निशा

वो- तो फिर तूने कहा क्यो नही

मैं- तुझे भी तो पता है ना

उसने मेरी बॉटल ली और दो चार घूंठ भरे फिर बोली- यार मैं जानती हूँ कि तेरी मिथ्लेश की जगह कोई नही भर पाएगा पर मैं बस तेरे साथ ही रहना चाहती हूँ तेरे सिवा मेरा है ही कौन

मैं- और तेरे सिवा मेरा भी कौन है

नशे से वो हल्के हल्के काँप रही थी

मैं- यार डर लगता है कहीं तू भी उसकी तरह मुझे छोड़ गयी तो

वो- मुझे कहाँ जाना है

मैं- साथ रहेगी ना

वो- मरते दम तक

वो मेरे सीने से लग गयी उसकी आँखो से दो आँसू निकल कर मेरे गालो को छू गये बड़बड़ाते हुए वो कब सो गयी कुछ होश नही मैने उसे बेड पर लिटाया और उसके पास ही सो गया दारू सच मे ही कुछ ज़्यादा हो गयी थी पर मैने आँखे मींच ली इस उम्मीद मे क्या पता आने वाला कल कुछ अच्छा हो सुबह जब मैने देखा तो मामा के लड़के की काफ़ी मिस कॉल आई हुई थी तो मैने सोचा बाद मे ही कॉल कर लूँगा

नहाने जा ही रहा था कि उसका फिर से फोन आ गया

मैं- हाँ भाई

वो- अरे यार कब से कॉल कर रहा हूँ तू फोन क्यो नही उठा रहा

मैं- सो रहा था

वो- सुन बे तू चाचा बन गया है बेटा हुआ है

मैं- ये तो बहुत ही अच्छी खबर आई भाई

वो- हाँ पर सुन तू अभी घर आजा कुँआ पूजन का प्रोग्राम जल्दी ही बन गया है तो तुझे आना ही होगा और कोई बहाना नही चलेगा

मैं- तुझे तो पता ही है यार मेरा दिल नही करता

वो- मेरे भाई , तू यार हम को अपना मानता ही नही है हमेशा ऐसी ही बात करता है अरे हमारे लिए नही तो बेटे के लिए आजा देख तू नही आएगा तो फिर मैं नाराज़ हो जाउन्गा बात नही करूँगा फिर कभी

मैं- तू समझता क्यो नही यार

वो- देख तू ही तो मेरा छोटा भाई है तेरे बिना मेरी क्या खुशी यार आजा ना

मैं- चल ठीक है यारा, कल शाम तक पहुचता हूँ

ज़िंदगी के कुछ दिन और गुजर गये थे वो अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती थी कि मेरे होंठो पर एक मुस्कान आ जाए चाहे हल्की सी ही पर मुझे पता नही क्यो खुशी होती ही नही थी कहने को तो जी रहा था पर सांसो का कुछ अता-पता था नही ऐसा नही था कि मैं निशा के बारे मे सोचता नही था हर पल उसकी फिकर रहती थी, ले देके वोही तो थी मेरी जो मिथ्लेश के बाद समझती थी मुझे कभी सोचा नही था ज़िंदगी ऐसे मुकाम पे ले आएगी हमेशा से मेरी कोई बड़ी तम्मन्ना नही थी

 
बस एक छोटा सा सपना देखा था मैने कि मैं और मिथ्लेश जी सके एक साथ पर गाँव की जिन गलियों मे हम जवान हुए वहाँ पर इतनी घुटन थी कि सांस लेना भी मुश्किल था और हम तो महक उठे थे मोहब्बत की खुश्बू मे पता नही कैसा रंग था उस का वो जो मुझे रंगरेज की तरह रंग गया था उसके रंग मे प्रीत ने जो डोर लगाई थी वो उलझ ज़रूर गयी थी पर टूटी नही थी ये और बात थी कि वो मुझसे आज दूर थी पर दूर होकर भी पास थी मेरे ,

इस दिल पे बस एक ही नाम था मेरी हर सांस बस मिथ्लेश ही पुकारती थी ऐसा कोई दिन नही जब उसकी याद नही आई, वो बहुत कहती थी मुझसे कि फ़ौजी कभी तुझे मेरी याद भी आती है और मैं बस इतना ही कहता था कि यार, तू इस दिल से कभी जाए तो तेरी याद आए जितने भी पल हम ने साथ जिए बहुत कीमती थे मिथ्लेश की बात ही अलग थी और लड़कियो से बस एक गुरूर सा था उसमे उसकी वो बड़ी बड़ी सी आँखे जब वो उनको गोल गोल घुमाती थी तो कसम से दिल साला कुछ ज़ोर से धड़क ही जाता था

जितना भी लिखू मैं उसके बारे मे बस वो कम ही है , खैर, उस दिन मैं और निशा रीना के घर गये थे वो जयपुर थी उन दिनो अब बहन माना था उसको तो मना भी कैसे कर पता उसको रिश्ता ही कुछ था उस से , ये जयपुर शहर से भी अपना कुछ अजीब सा रिश्ता सा बन गया था आजकल तो मामा भी यही रहने लगे थे रीना से एक अरसे से मिला भी नही था पर सच बात तो ये थी कि उसको मना भी नही कर पाया था

निशा की इच्छा थी कि ट्रेन पकड़ ले पर मैने सोचा कि कार से ही चलते है तो हम चल पड़े जयपुर की तरफ रास्ते मे कुछ सोच कर कोटपुतली रुक गये रुक्मणी की याद जो आ गयी थी उसकी शादी पे तो जा नही पाया था तो सोचा कि मिल ही लेते है पता नही क्यो पुराने लोगो की एक कमी सी महसूस करने लगा था मैं अब मम्मी के मामा का घर था तो खूब बाते हुई रुक्मणी चाहती थी कि मैं रुकु कुछ दिन पर मैने उसको फिर मिलने का वादा दिया और रात के अंधेरे मे हम लोग जयपुर आ गये

रीना बहुत खुश थी मुझे देख कर और मैं भी उसे देख कर सबसे अच्छी बात तो ये थी कि इस रिश्ते मे कोई फ़ॉर्मलिटी नही थी बस एक भाई- बहन का प्यार और हो भी क्यो ना हमारा बचपन ही कुछ ऐसा था मैने निशा के बारे मे बताया उसको अब जिकर हुआ तो पुरानी बाते भी निकलनी थी और बातों के साथ मिथ्लेश का ज़िक्र तो होना ही था पर रीना भी समझती थी उसने बातों का रुख़ दूसरी तरफ मोड़ दिया पर वो भी जानती थी कि मिथ्लेश कभी जुदा नही होगी मुझसे

फॅमिली कहने को तो ये एक वर्ड है पर समझो तो बहुत कुछ है और अपनी तो बस यही कहानी थी अपनो ने कभी अपनाया नही कुछ लोगो ने कभी ठुकराया नही दिल से अच्छा लगा थोड़ा टाइम रीना के घर पे बिताके उसका पति भी मस्त इंसान था तगड़ी जमती थी उस से कोई तीन चार दिन वहाँ रहने के बाद हम ने विदा ली उनसे पर इस शहर से कुछ यादे जुड़ी थी जिनको ताज़ा करना था मुझे पर पहले निशा को कुछ शॉपिंग करवानी थी तो हम चांदपॉल चले गये , वैसे निशा एक सिंपल लड़की थी पर मैने फ़ॉेर्स किया तो उसने जम के खरीदारी की

इसी बहाने से उसके चेहरे पर खुशी देखी मैने , पर एक बात पे मैने गौर किया कि उस शोरुम मे निशा एक ड्रेस को बहुत गौर से देख रही थी पर उसने खरीदा नही , वो फिर आगे बढ़ गयी मैं रुक गया मैने सेल्समेन से वो ही ड्रेस देखी वो एक दुल्हन का जोड़ा था और मैं उसके मन की सारी बात समझ गया बिना उसको बताए मैने वो खरीद लिया और चुपचाप छिपा के गाड़ी मे रख दिया

मैं समझता था कि हर लल्डकी का अरमान होता है कि वो दुल्हन बने निशा की भी यही इच्छा थी मैने मन ही मन कुछ सोचा और वैसे भी क्या फरक पड़ता है अब अगर हमारी वजह से अगर एक भी इंसान को ख़ुसी मिले तो बहुत बड़ी बात है ,

मैं- निशा, बियर पिएगी

वो- ना, मुझसे कंट्रोल नही होता फिर खम्खा तमाशा हो जाना है

मैं- कैसा लगा जयपुर आके

वो- अच्छा, काफ़ी टाइम गुज़रा है यहाँ तो यादे है

मैं- हा, पर कुछ बदला बदला सा लग रहा है ना

वो- परिवर्तन तो संसार का नियम है श्रीमान मनीष कुमार जी

मैं- हां जी वो तो है

निशा- वैसे तुम्हे शायद नही अशोक भाई ने तुम्हे बुलाया था और तुम यहाँ पर घूम रहे हो वो नाराज़ हो जाएँगे

मैं- ओह तेरी यार! मैं तो भूल ही गया था

निशा- तुम भूले नही थे बल्कि तुम भाग रहे हो रिश्तो से पर कब तक भागोगे मनीष एक ना एक दिन रुकना पड़ेगा

मैं चुप रहा उसने बड़ी सफाई से मेरे मन की बात पकड़ ली

वो- देखो वो लोग तुम्हारे अपने है और खुशनसीब होते है वो लोग जिनके अपने होते है मेरी बात मानो तुम्हे जाना चाहिए लोगो की खुशियो मे शामिल होने की आदत डालो सबका अपना अपना नसीब होता है अपने मे ये है तो ये ही सही

 
निशा ठीक कह रही थी हम ने लंच किया अब निशा की बात को कैसे टाल सकता था मैं और उसका कहना भी तो जायज़ था और वैसे भी मैने अतीत को पीछे छोड़ कर जीने का निर्णय ले लिया था

पर ये निर्णय मैने सिर्फ़ निशा के लिए लिया था माना कि हमारी झोली खाली थी पर फिर भी उसके दामन को खुशियो से भरने का हौंसला था मेरा

निशा- एक काम करो तुम अकेले चले जाओ, मैं देल्ही की बस ले लेती हूँ

मैं- पागल है क्या तू भी चल रही है

वो- थोड़ा ठीक नही लगेगा यार कोई पूछेगा कि ये कौन है तो फिर

मैं- तो फिर क्या सबको पता है तू कौन है

वो- मेरी बात सुनो

मैं- तुम सुनो अगर तुम साथ नही तो मैं भी नही जाउन्गा

अब वो क्या कहती जब हम मामा के घर पहुचे तो मैं बुरी तारह से थक चुका था हल्का हल्का सा अंधेरा भी होने लगा था जैसे ही गाड़ी चौक मे रुकी सबसे पहले मुझे कौशल्या मामी दिखी मुझे देखते ही वो बहुत खुश हो गयी

मैने और निशा ने उनके पैर छुए फिर हम घर मे गये सब लोग बहुत खुश हुवे देख के थोड़ी देर बाद अशोक भाई भी आ गया तो बोला- हां भाई अब फ़ुर्सत मिली है तुम्हे

मैं- भाई तुझे तो सब पता है ना

वो- हाँ, भाई हम भी फ़ौजी है तेरी तरह अफ़सर नही है पर पता सब है

मैं- भाई अब रहने भी दे

भाई- अपनी भाभी से मिल ले गुस्से मे भरी बैठी है उसको झेल थोड़ी देर

मैं- मिलता हूँ थोड़ी देर मे

मैने निशा को इंट्रोड्यूस करवाया सबसे थोड़ी ही देर मे निशा सबसे घुल मिल गयी थी

मामी- कौन है ये

मैं- थारी होने वाली बहू है जल्दी ही इस से शादी करने वाला हूँ पर इसके लिए सर्प्राइज़ है बताना मत

वो- तभी मैं कहूँ …

मैं- क्या आप भी

वो- अच्छा है एक ना एक दिन तो ये काम भी करना ही है मम्मी से बात हुई

मैं- ना

वो- कब तक चलेगा ऐसे घर की बात है सुलझा लो

मैं- वो ही ज़िद पकड़ के बैठी है आपको तो पता है ही

वो- कल या परसो वो आ रही है फिर करते है कुछ

मैं- रहने दो मामी बड़ी मुश्किल से संभाला है खुद को यहा पे कोई तमाशा नही चाहता बस आप लोगो के साथ कुछ दिन हूँ तो हँसी-खुशी धीरे धीरे सब ठीक हो जाना है

मामी- चल फिर घर चलते है कितने दिन बाद आया है वही पे कुछ बाते करेंगे इधर तो सांस आनी नही है

मैं- एक बार भाभी से मिल लूँ फिर चलते है आप बताओ क्या चल रहा है

वो- कुछ नही बस अकेली हूँ आजकल , बच्चे अलग अलग सहरो मे है पढ़ाई के लिए तेरे मामा का तो पता है तुझे चिपके है नौकरी से कितनी बार कहा है रिटाइर हो जाओ पर सुनते ही नही मैं यहाँ रह जाती हूँ अकेली

मैं- ड्जूस्ट तो करना पड़ता है

वो – और कितना अड्जस्ट करू

मैं- भाभी से मिलके आता हूँ

वो- मैं भी कुछ काम निपटा लेती हूँ

जब मैं भाभी के कमरे मे गया तो निशा वहाँ पहले से ही बैठी थी कुछ देर तक भाभी के उलाहने सुनके उनको मनाया

भाभी- तुम तो बड़े आदमी हो गये हो क्यो आओगे हमारे यहाँ

मैं- भाभी ताने मत मारो

वो- लो जी अब ताने भी ना मारे

मैं- अब आ तो गया हूँ अब जब तक कहोगे यही रहूँगा

थोड़ी देर उनके पास बैठा फिर मैं और कौशल्या मामी उनके घर आ गये

 
मामी मेरी तरफ देख रही थी मैं उसकी तरफ देख रहा था वो ही वो थी वो ही मैं था कौशल्या मामी का भी मेरे जीवन मे बहुत बड़ा रोल थे मेरा उनसे सेक्स रीलेशन एक ग़लती की वजह से बन गया था जब मैने चाची समझ कर उसको चोद दिया था

उसके बाद हमारा रिश्ता बहुत बदल गया था वो मेरी मामी थी , मेरी दोस्त थी बिस्तर पर मेरी साथी थी आज भी कुछ ऐसा ही लम्हा था कुछ देर हम दोनो एक दूसरे को देखते रहे और फिर मैने मामी को अपनी गोद मे थम लिया मामी ने अपने होंठ मेरे होंठो पर रख दिए और किस करने लगी

मामी की उमर बेशक बढ़ गयी थी पर उसके बदन की ताज़गी आज भी ऐसी ही थी मामी के हल्के गुलाबी पतले पतले होंठ आज भी उनका स्वाद ऐसा ही था जैसा कि पहले था कुछ भी तो नही बदली थी वैसी ही थी पतली छरहरी हा कुछ बाल थोड़े से हल्के सफेद हो गये थे पर आग आज भी वैसी ही थी

हम दोनो का थूक मामी के मूह मे इकट्ठा हो रहा था जिसे वो पी गयी , पर मैं उसके होंठो को चूस्ता रहा जब तक वो खुद से अलग नही हो गयी

मामी- ज़्यादा मत चूसो, वरना होंठ सूज जाएगा

मैं- तो क्या हुआ

वो- कुछ नही पर थोड़ा छुपाना मुश्किल होगा

मैने मामी के ब्लाउज को खोल दिया और ब्रा के उपर से ही उसकी मीडियम साइज़ वाली चुचियो को सहलाने लगा मामी के बदन मे कंपकंपी चढ़ने लगी मामी मेरे चेहरे को अपनी छातियो पर रगड़ने लगी मैं अपने हाथ उसकी पीठ पर ले गया और ब्रा को उतार दिया

मामी की चुचियो के भूरे भूरे निप्पल्स जैसे इंतज़ार कर रहे थे मेरे लबो का मामी की चुचि को मैने अपने मूह मे लिया तो मामी ने एक मीठी आह भरी और मेरे सर के बालो को सहलाने लगी

कुछ ही देर मे मामी के बदन ऐंठने लगा था चुचियो मे तनाव आने लगा था बारी बारी वो दोनो चुचियों को मेरे मूह मे दे रही थी मामी के बदन की मोहक खुशुबू मेरी सांसो मे घुलती जा रही थी

कुछ देर बाद वो मेरी गोद से उतर गयी और मेरी पॅंट को खोलने लगी नीचे खिसकाया और फिर घुटनो के बल बैठ कर मेरे लंड से खेलने लगी मामी ने उपर से नीचे तक लंड पर अपनी जीभ फेरी तो मैं झुर्झुरा गया

मेरे लंड के हर हिस्से पर मामी की गीली जीभ घूम रही थी बीच मे जब वो अपने दाँतों से चॅम्डी को आहिस्ता से काट ती तो एक खुमारी सी छाने लगी मैने अपनी आँखो को मूंद लिया और मामी को अपना काम करने दिया

 
मामी ने मेरे सुपाडे पर अपने होंठ लगा दिए और उसको पुच पच करते हुए चूसने लगी चाटने लगी मैने उनके सर को थोड़ा सा नीचे को दबाया तो मामी ने लंड का कुछ और हिस्सा अंदर ले लिया और अपने जलवे दिखाने लगी

मैने देखा बीच बीच मे उनका हाथ अपनी चूत पर जा रहा था तो मैं समझ गया कि मामी आज बहुत ज़्यादा गीली हुई पड़ी है पर मैने भी काफ़ी दिन से सेक्स नही किया था तो मैं चाहता था कि आज अच्छे से करू

करीब दस मिनिट बाद मैने अपने लंड को मामी के मूह से निकाला जिस पर मामी की लार लगी हुई थी मैने मामी को खड़ी किया और कच्छी को उतार दिया उफफफ्फ़ मामी की गान्ड क्या थी ज़्यादा भारी तो नही थी पर दिल धड़काने वाली ज़रूर थी

मामी के गोरे चुतड़ों पर जो हल्का सा गुलबीपन था वो बड़ा सेक्सी था और उपर से उनका पूरा शरीर गोरा था बस चूत ही काली थी और उसके वो झाट के बाल वहाँ से चूत की खूबसूरती और बढ़ गयी थी

मामी इस कदर गीली थी कि चूत से रिस्ता कामरस झान्ट के बालो को भी गीला करने लगा था जैसे की हरी घास मे कुछ शबनम की बूंदे सुबह सुबह कुछ ऐसी ही सुंदर मामी की चूत लग रही थी

मैने मामी को बेड पर पटक दिया और मामी ने खुद अपनी टाँगो को फैला लिया और अपनी गान्ड के नीचे तकिया लगा लिया ताकि चूतड़ थोड़े से उपर हो जाए

मामी- मनीष अब मत तडपा मुझे बहुत दिनो से तरस रही हूँ तुझसे प्यार करने के लिए

मैं- मैं भी मामी

मैने मामी की टाँगो को अपनी जाँघो पर चढ़ाया और मामी की चूत पर अपने गरम सुपाडे को रख दिया

मम्मी-अयाया

मैने हल्का सा झटका मारा तो लंड चूत मे जाने लगा मामी की चूत वक़्त के साथ थोड़ी मेच्यूर हो गयी थी तो चोदने मे और मज़ा आने वाला था धीरे धीरे मेरा पूरा लंड चूत मे जा चुका था और मैं मामी के उपर लेट गया

मामी ने अपने हाथ मेरी पीठ पर लगा दिए और मुझमे और अंदर तक समाने की कोशिश करने लगी मेरे गाल मामी के गालो से टकरा रहे थे और मैने अब अपनी कमर उचकानी शुरू की

मामी- आज तेरे साथ करके बहुत अच्छा लग रहा है बस ऐसे ही धीरे धीरे कर थोड़ा लंबा चलेंगे

मैं- हूंम्म

मामी का बाया गाल मेरे होंठो मे दबा हुआ था और मामी की चूत मे लंड फसा हुआ था कुछ देर बाद मामी ने अपने पैर एम शेप मे कर लिए जिस से लंड और गहराई तक अंदर को जाने लगा

मैं और मामी इस दौरान कुछ भी बात नही कर रहे थे बस धीरे धीरे अपनी चुदाई को आगे ले जा रहे थे मामी भी अपनी कमर उचका उचका कर मेरा साथ दे रही थी

कहने को तो ये सेक्स था पर हम अपने रिश्ते को थोड़ा और मजबूत कर रहे थे मामी के गुलाबी होंठो को मैं हल्के हल्के से चूम लेता था मामी की चुचिया मेरे सीने के बोझ तले दबी पड़ी थी और मामी की साँसे उफन रही थी

काफ़ी देर हो चुकी थी हम दोनो को पर वो चाहती थी कि मैं उसके उपर ही चढ़ा रहूं शायद वो दूसरी बार झड रही थी जब मेरा पानी उसकी चूत मे गिरने लगा मैने बहुत दिनो बाद सेक्स किया था तो जब मेरा हुआ तो मैं झेल नही पाया काफ़ी सारा पानी मामी की चूत मे गिरा जब मैने लंड को बाहर की तरफ खीचा तो वीर्य भी बाहर आकर गिरने लगा

कुछ देर तक हम दोनो एक दूसरे की बाहों मे पड़े रहे फिर मामी ने अपने कपड़े पहने मैं बाथरूम मे चला गया थोड़ी थकान भी हो रही थी तो मैं नहा धोके आया

मामी- खाने मे क्या खाओगे

मैं- खाना निशा के साथ खाउन्गा

मामी- मेरे साथ नही खाना क्या

मैं- खाउन्गा आपके साथ भी पर सुबह, अभी उसे पूछना तो पड़ेगा ना मेहमान है वो

मामी- हाँ, पूछना तो पड़ेगा वैसे बात कितनी आगे बढ़ी है उसके साथ

मैं- मामी, उसका मेरा ना थोड़ा अलग टाइप का है, मतलब हम साथ रहते है पर फिर भी बस ऐसे ही है

मामी- शादी कर ले उसके साथ

मैं- मामी, सोचता तो हूँ पर मिथ्लेश की यादे जो है उसकी याद आती है तो फिर दिल साला काबू मे नही रहता और उपर से मम्मी भी नाराज़ है तो देखू क्या होता है

मामी- तुम्हारी मम्मी कल आ रही है तो फिर करते है बात सारे परिवार के आगे वो मना थोड़ी ना करेगी

मैं- मम्मी तो बात भी नही करती है

वो- सब सही हो जाएगा

मैने रॉकी को फोन किया और बोला कि निशा को यहाँ ले आ मामी खाना बनाने रसोई मे चली गयी मैं टीवी देखने लगा करीब आधे घंटे बाद निशा आ गयी कपड़े चेंज कर लिए थे उसने बड़ी कमाल लग रही थी

मैं- आज तो जबर्जस्त दिख रही हो, किसपे बिजलिया गिराने का इरादा है

वो- कौन हो सकता है तुम्हारे सिवा

मैं- बोर तो ना हो रही

वो- ना

मैं- बढ़िया

मैं- चल एक एक बियर पीते है

वो- ना यार, तुझे तो पता है मुझे झिलती नही है और फिर खम्खा तमाशा होगा

मैं- अरे कुछ नही होता थोड़ी थोड़ी लेते है तू छत पे आ मैं लेके आता हूँ

 
पहले तो वो मना करती रही पर फिर मान गयी और हम दोनो छत पर आ गये, मामी ने अपना घर खेतो मे बनाया था पहले तो ये एकलौता घर था पर अब बस्ती हो गयी थी हम दोनो छत की मुंडेर पर बैठ गये

और खोल ली बियर की बोटले, कुछ घूंठ लिए थे फिर बाते शुरू हो गयी

निशा- एक बात कहूँ

मैं- वो कैसी थी

मैं- कौन

वो- मिथ्लेश

मैं- तेरे जैसी

वो- बता ना

मैं- कहा ना तेरे जैसी

वो- सच मे

मैं- हां

वो- कैसे मिले थे तुम

मैं- बस ऐसे ही गाँव मे मेला था तो मैं भी गया था उसका पाँव भीड़ मे मेरे पाँव पर पड़ गया था तो तभी पहली बार उसको देखा था और तभी दिल मे कुछ कुछ हो गया था

वो- फिल्मी स्टाइल मे

मैं- हूंम्म

वो- फिर आगे

मैं- बस वो रोज आती थी मंदिर मे और मैं भी तो बस दिल ने उसके दिल तक पैगाम पहुचा दिया

वो- ऐसे ही तूने मुझे पटाया था

मैं- दोस्त है यार तू अपनी बल्कि दोस्त से बढ़ कर तूने मेरे लिए जो किया मैं कभी नही चुका सकता तू भी क्या पूछने लगी तुझे तो सब पता ही है

वो- अच्छा लगता है, उन लम्हो को याद करना कितने अजीब दिन थे तब लाइफ मे एक सुकून सा था आज देख सब कुछ है पर फिर भी कम लगता है

मैं- सही कहा यार अब तो सब बदल गया है अपने गाँव की मिट्टी भी बदल गयी यार, पहले हसी-मज़ाक था शराराते थी वो झोड़ मे नहाना पार्क मे पड़े रहना क्या दिन थे यार

वो- पता है जब तू नही था तेरी बहुत याद आती थी

मैं- मुझे भी बहुत मेहनत की यार तुझे ढूँढने मे पर तू इतनी दूर क्यो चली गयी थी

वो-पास ही तो हूँ , तुझसे दूर हो सकती हूँ क्या

मैं- निशा, मैं मर जाता अगर तू ना होती तो मेरी ज़िंदगी मे

वो- ऐसे मत बोल

मैं- पता है या कभी कभी दिल करता है तुझे अपने सीने से लगा लूँ थाम लूँ तुझे अपनी बहो मे तुझे ना बहुत प्यार करू किस करू तुझे

वो- कर ले तो उसमे क्या है

मैं- सच मे

वो- हाँ

उसके होंठो के नीचे एक तिल था जो मुझे बहुत प्यारा लगता था मैने बोतल को साइड मे रखा और निशा का हाथ पकड़ लिया

वो मेरे करीब आने लगी इतनी करीब की उसकी गरम साँसे मेरे चेहरे को छुने लगी, उसने अपने होंठो को आगे किया और ऐसा ही मैने किया जैसे ही हमारे होंठ टकराए उसका बदन हल्के हल्के से काँपने लगा

एक बार जो होंठो से होंठ मिले तो बस मिलते ही गये मैने दोनो हाथो से उसके चेहरे को थाम लिया और उसको स्मूच करने लगा निशा ने अपनी बाहों मे कस लिया और मेरा साथ देने लगी

एक फिर दो फिर पता नही कितने किस हम करते रहे फिर भाई-बहन आ गये छत पर तो और बाते होने लगी

 
रॉकी- आप भी पीती हो

निशा- नही, बस कभी कभी तुम्हारे भाई ज़िद कर लेते है तो

सुषमा- वैसे आप क्या करते हो

निशा- लोन मॅनेजर हूँ बॅंक मे

रोकके- भाई मैं भी इस साल एनडीए का एग्ज़ॅम दे रहा हूँ

मैं- मत दे यार, लाइफ मुश्किल हो जाएगी

वो- क्या भाई आप भी मुझे भी आपकी तरफ बन ना है

मुझे हँसी आ गयी – मैं- ना भाई मेरी तरह मत बन ना , कुछ नही हासिल होगा जो लाइफ मैं जीता हूँ दूर से बहुत अच्छी लगती है तू भी सोचता होगा भाई के पास पैसा है रुतबा है पर मेरे भाई ये सब शोऑफ है अंदर से खाली हूँ मैं

रोकके- भाई आप बताते भी नही कि क्या हुआ था

मैं- कुछ नही यार बस इतना समझ ले,ये इश्क़ नही आसां एक आग का दरिया और डूब के जाना है

रोकके – भाई मैं जानता तो हूँ कि आप किसी के साथ लव मे थे पर क्या हुआ वो नही पता

मैं- मुझे भी नही पता

मैं उठा और छत से घरो को देखने लगा जिनमे अब रोशनी होने लगी थी मामी रसोई मे खाना बना रही थी हम लोग उपर छत पर बैठे बाते कर रहे थे

रोकके- सोल्जर बन ना चाहता था अच्छी बात थी , सबके अपने अपने सपने होते है और एक कोशिश तो होनी ही चाहिए सपनो को पूरा करने की बाकी का कुछ टाइम खाने- पीने मे गया

उसके बाद निशा सुषमा के साथ रीना भाभी के पास चली गयी रॉकी भी उनके ही साथ था रह गये मैं और मामी…………………..

मामी ने बिस्तर छत पर ही लगा दिया था मौसम मे हल्की सी ठंडक सी थी एक खुशमिजाजी सी थी और फिर मामी ने अपने कपड़े उतारे और बस पैंटी पैंटी मे ही मेरे पास आ लेटी मामी ने एक काली कच्छी पहनी हुई थी जिसमे से आधे से ज़्यादा चूतड़ दिख रहे थे

और आगे से भी बस चूत वाला हिस्सा ही ढका हुआ था ऐसा लग रहा था कि उसने अपने साइज़ से छोटी पैंटी पहनी हुई थी मामी मुझसे लिपट गयी तो मैने भी उसे अपनी बाहों मे ले लिया और मामी की नंगी पीठ पर हाथ फेरते हुए उसको किस करने लगा

मामी की चुचिया मेरे सीने मे घुसने को मचल रही थी और फिर मैने मामी के होंठ चूस्ते हुए उसकी गान्ड को सहलाना शुरू किया तो वो और मस्त होने लगी, मैने मामी की कच्छी को नीचे सरकाया और मामी की फूली हुई गान्ड को मसल्ने लगा

मामी ने अपनी जीभ मेरे मूह मे डाल दी मस्ती हम दोनो पर असर कर रही थी मैने अपना हाथ मामी की गान्ड की दरार मे डाला और उसको सहलाने लगा मेरी इस हरकत से मामी को मज़ा आने लगा तो उसने मेरे लंड को अपने हाथ मे लिया और ऊपर नीचे करने लगी

मामी की नाज़ुक उंगलिया मेरे सुपाडे के छेद को सहला रही थी मैने अपनी उंगली पर थोड़ा सा थूक लगाया और मामी की गान्ड मे घुसा दी उसने अपने चुतड़ों को भीच लिया तो मैने चूतड़ पर एक थप्पड़ मारा मामी ने चूतड़ ढीले कर दिए

और मैं उसकी गान्ड मे उंगली अंदर बाहर करने लगा मामी तो एक्सपर्ट थी गान्ड मरवाने मे

मैं – कितनी गरम है तू कितना नशा है तुझमे जब जब तुझे चलते देखता हूँ दिल करता है वही पटक कर चोद दूं तुझे उम्र बढ़ गयी पर तुम्हारा नशा कम नही हुआ कौन कहेगा कि तुम तीन जवान बच्चों की माँ हो कितनी गदर गान्ड है तुम्हारी

मामी- ठुकाई भी तो खूब होती है जब तुम्हारे मामा होते है तो दिन रात खूब दबा के पेलते है मुझे तो ये चूतड़ उन्होने ही फूला दिए है

मैं- मामी आज की रात खूब चुदोगि ना

वो- हां मेरे प्यारे तेरा लंड लेने को तो तरस ही गयी हूँ मैं आज अपनी मामी की चूत को खूब रगड़ ना

मैं- मूह मे लेले

मामी ने तुरंत मेरा कहा माना उसने अपनी लंबी जीभ बाहर निकाली और मेरे सुपाडे पर फेरने लगी “आह मामी क्या बात है आआआअहह”

मुझ पर एक दम से मस्ती चढ़ गयी थी मामी अपनी जीभ का जलवा बस मेरे सुपाडे पर ही दिखा रही थी मामी की आँखो मे एक नशा था मैने अपना हाथ पीछे किया और मामी की चोटी को खोल दिया मुझे हमेशा से खुले बालो वाली औरते ही सुंदर लगती थी

और कौशल्या मामी तो गजब औरत थी गोरा रंग पतला शरीर एक नाज़ुक गुड़िया सी पर सेक्सी बहुत थी एक आग थी उनमे और मैं उस आग मे झुलसना चाहता था मैं बार बार और क्योकि मेरे जिस्म को चाह थी तो बस चूत की मेरे लिए तो हर रिस्ता ख़तम था अगर कुछ था तो भूक मेरे जिस्म की

 
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