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ज़िंदगी भी अजीब होती है Restart

कौशल्या मामी तो गजब औरत थी गोरा रंग पतला शरीर एक नाज़ुक गुड़िया सी पर सेक्सी बहुत थी एक आग थी उनमे और मैं उस आग मे झुलसना चाहता था मैं बार बार और क्योकि मेरे जिस्म को चाह थी तो बस चूत की मेरे लिए तो हर रिस्ता ख़तम था अगर कुछ था तो भूक मेरे जिस्म की

मामी बड़े प्यार से मेरे लंड को चूस रही थी मैने उसके सर को थाम रखा था उसके बालो मे उंगलिया फसि थी मेरी और मामी अपने थूक से सन रही थी मेरे लंड को कभी कभी मैं ज़ोर से पेल मार देता तो मेरा लंड मामी के गले मे आगे को हो जाता तो मामी अपनी आँखो से गुस्सा करती

करीब 5-7 मिनिट तक उन्होने खूब चूसा मेरे लंड को फिर मामी ने अपनी टाँगो मे फसि कच्छी को उतारा

और मेरी ओर अपनी गान्ड कर के घोड़ी बन गयी मामी के बदन से बहुत ही मस्त खुसबु आ रही थी शायद उसने पर्फ्यूम लगाया था मैं थोड़ी देर उसकी चुतड़ों को देखता रहा और फिर अपनी जीभ फेरने लगा मामी की गान्ड पर मामी की गान्ड की दरार मे

और हौले से उसकी गान्ड के छेद को चूम लिया मामी ने एक आह सी भरी और अपनी गान्ड को मेरे मूह पर दबाने लगी बस एक इंच नीचे मामी की चूत गीली होकर फुफ्कार रही थी बुला रही थी मेरे लंड को कि आ और मेरे छेद को चौड़ा कर दे

आ और समा जा, धज्जिया उड़ा दे मेरी मैं बारी बारी मामी की चूत और गान्ड दोनो को चूमने लगा मामी के चूतड़ मेरी जीभ की ताल पर नाचने से लगे थे और मामी के होंठो से फुट ती वो मस्त आहे कसम से कोई भी पागल ही हो जाए

मामी की उस अदा को देख कर , खुद मेरा हद से ज़्यादा बुरा हाल था मामी का नमकीन रस मेरे होंठो पर अपना स्वाद छोड़ रहा था मामी का पतला पेट काँप रहा था बुरी तरह से उत्तेजना सर पर चढ़ चुकी थी मैने मामी की चूत पर अपने गरम लंड को लगाया

और मामी खुद अपनी गान्ड पीछे करने लगी जिस से मेरा सुपाडा मामी की रस से भरी चूत मे जाने लगा मामी की चूत खुद किसी गरम भट्टी की तरफ से तप रही थी मैने अपने लंड पर चूत की गर्मी को महसूस किया

और मेरे अगले धक्के पर मेरा आधा लंड कौशल्या मामी की चूत मे घुस गया मैने अपने दोनो हाथ मामी के सुडौल कंधो पर रखे और मामी को चोदना शुरू किया अगले कुछ मिनिट्स तक बस मामी की गरम आहो का शोर ही होता रहा

मामी की चिकनी चूत जिसे जितना चोदो कम लगे, उपर से मामी भी टूट कर चुद रही थी तो बहुत मज़ा आ रहा था मैं बार बार उसकी पीठ पर चूमता उसके चुतड़ों पर थप्पड़ मारता

“ओह हाआँ ऐसे ही असीसीईईईईईईई फाद्द्द्द्द्द्द्द्द्दद्ड दीईईईई मेरे भोस्डे कूऊऊ उफफफफफफफफफ्फ़ आऐईयईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई हूंम्म्म हूंम्म्मममम धीरीईईईईईईईईई ढरीईईईईईई ”

मामी की ये मादक आहे मुझे और उत्तेजित कर रही थी चुदती तो हर औरत है पर जब औरत अपनी लाज़-शरम छोड़ कर चुदती है तो उसे भी मज़ा आता है और चोदने वाले को भी ऐसा ही हाल मेरी प्यारी मामी का था जो मुझ पर अपनी चूत की घनघोर बरसात कर रही थी

मैं- उपर आउ क्या

मामी- ना ऐसे ही चुदुन्गि मेरा होने वाला है तो बस तोड़ दो मुझे निचोड़ दो अपनी मामी को …….

 


मामी ने अपनी चूत को टाइट कर लिया अपनी जाँघो को आपस मे चिपका कर तो मैं भी तेज तेज स्टॉक लगाने लगा मैं भी चाहता था कि उसके साथ ही झड जाउ ताकि उसके पानी को फील कर सकूँ

अगले कुछ मिनिट बस मैं बेरहमी से धक्के लगाता रहा और फिर मामी की चूत जैस ही अपना रस बहाने लगी मैने भी अपना वीर्य छोड़ दिया और मामी के उपर ही ढह गया

करीब दस पंद्रह मिनिट हम दोनो एक दूसरे से लिपटे पड़े रहे फिर मामी उठी और कोने मे जाकर मूतने लगी चूत से जो सुर्र्र्ररर सुर्र्र्र्र्र्ररर की आवाज़ आ रही थी बड़ी मस्त लग रही थी मैने पास रखे जग से थोड़ा पानी पिया और फिर मैं भी मूतने चला गया

तब तक मामी भी चूत सॉफ करके वापिस बिस्तर पर आ गयी थी मैं आते ही उसके पास लेट गया और बाते करने लगे

मामी- तूने बड़ी मामी के साथ कर लिया

मैं- कहाँ , आप सीधा यहाँ जो ले आई

वो- तो क्या करती, मुझे पता है एक बार उसकी चूत ले ली तो फिर तुम उसके पीछे ही घुमोगे

मैं- ऐसी बात नही है डार्लिंग, वैसे कहो तो तुम दोनो को साथ चोद दूं

वो- ना, अकेले मे मस्त लगता है

मैं- तो अकेले मे चुद लो मेरी रानी आज की रात तो अपनी ही है आज तुम्हारे दोनो छेद चौड़े कर दूँगा

वो- गंदी बाते करना सीख गये हो तुम

मैं- तुमसे ही सीखाया है मेरी रानी

मैने मामी की चुचि चूसना शुरू किया और बारी बारी दोनो चुचियो का मज़ा लेने लगा मामी आहे भरने लगी जल्दी ही मामी की चुचिया कठोर होने लगी और मामी के चेहरे का रंग बदलने लगा

बहुत देर तक मैने उसकी चुचिया चूसी मामी की आँखो मे फिर से हवस के लाल डोरे तैरने लगे थे मैने मामी को बिस्तर पर औंधी लिटा दिया और उसके चुतड़ों को थोड़ा सा फैलाया जिस से उसकी गान्ड का छेद सामने हो गया

मैने ढेर सारा थूक लगाया उसकी गान्ड पर फिर अपना लंड अंदर डालने लगा मामी की गान्ड काफ़ी खुली हुई थी तो ज़्यादा परेशानी नही हुई मुझे धीरे धीरे करके मैने पूरा लंड अंदर डाल दिया

मेरी गोलिया मामी के चुतड़ों से टकरा रही थी कुछ देर मैं उसके उपर ऐसे ही पड़ा रहा फिर मैने मामी की गान्ड मारनी शुरू की साथ ही मैं उसके गोरे गालो को चूम ने लगा मामी की गान्ड अंदर से बहुत ही गरम थी और मेरे लंड पर काफ़ी टाइट हो रही थी

मामी के उपर मेरा पूरा बोझ पड़ रहा था पर मामी एक्सपर्ट थी गान्ड मरवाने मे जल्दी ही वो भी अपने चूतड़ पटकने लगी और पूरी मस्ती मे आकर मज़ा लेने लगी हम दोनो पसीना पसीना हो रहे थे

काफ़ी देर तक हम ऐसे ही करते रहे फिर मैने मामी को टेढ़ी किया और पीछे से उसकी गान्ड मारने लगा मैं अपने हाथ से उसकी चुचि दबा रहा था उसको किस कर रहा था और मामी भी मेरा पूरा साथ दे रही थी

करीब आधे घंटे तक उसकी गान्ड मारी मैने तब कही जाके मेरा पानी छूटा, उसके बाद हम ने एक राउंड और लिया और फिर सो गये, सुबह मैं जल्दी ही उठ गया तो थोड़ा खेतो की तरफ घूमने निकल गया तो रास्ते मे मुझे सरोज मिल गयी

सरोज- अरे तुम बड़े दिनो बाद रुख़ किया इस तरफ का

मैं- टाइम नही मिलता आपको तो पता है लाइफ चेंज हो गयी है

वो- फिर भी पुराने लोगो से मिलते रहना चाहिए

मैं मुस्कुरा दिया , सरोज को भी खूब पेला था पुरानी सेट्टिंग थी मैं उसके हाव भाव से ही जान गया था कि तैयार है पर मैने उसको कहा की जल्दी ही मिलूँगा उस से घूम फिर के आया नहाने धोने मे ही दोपहर हो गयी थी

 
रामअवतार मामा यानी कौसहल्या मामी के पति भी आ गये थे तो वो थोड़ा सा शांत थी, हम सब बैठे थे कि मम्मी पापा भी आ गये मैं पापा से मिला पर मम्मी ने बात नही की बस निशा से ही बात की

पापा- और फ़ौज़ी क्या चल रहा है

मैं- कुछ नही पापा

वो- कितने दिन की छुट्टी है

मैं- है थोड़े दिन

वो- घर चल फिर

मैं- आपको तो पता है पापा

वो- वो कल भी तेरा घर था और हमेशा रहेगा और किस घर मे आपस मे बोल-चाल नही होती बाकी तेरी मर्ज़ी है हम कितने दिन जियेंगे

मैं- ऐसा क्यो कहते हो

वो- और नही तो क्या वहाँ तू दुखी यहाँ हम दुखी कैसे चलेगा बता

मामी- जीजाजी, बाते तो होती रहेंगे आओ कुछ चाय-नाश्ता करते है फिर बाकी बाते होती रहेंगी

बस प्रोग्राम मे दो दिन ही थे तो मेहमान आने ही थे तो तभी पता चला कि बड़े मामा भी छुट्टी आ गये है तो अब सबसे ही दुआ सलाम होनी थी ऐसे ही शाम हो गयी बड़ी मामी से नज़रे भी मिली पर उनकी तरफ से कुछ रेस्पॉन्स नही आया मुझे

शाम को मैं उनके कमरे मे गया तो वो साड़ी बदल रही थी

वो- मैं कपड़े पहन रही हूँ दिखा नही क्या

मैं- मुझ से कैसा परदा मेरी प्यारी मामी मैने तो आपके अंग अंग को देखा है

मामी- अब तुम बड़े हो गये हो देखो मैं भी बूढ़ी हो गयी हूँ जो बीत गया उसको भूलो और आगे बढ़ो अब क्या फ़ायदा इन बातों का और नही ये बाते अब शोभा देती है

मैं- हाँ, मामी टाइम बदल गया है लोग बदल गये है और आप भी देखो ना कितनी आसानी से बोल दिया

मामी- तू समझा कर

मैं- हां, समझ तो रहा हूँ पर मैं कौन सा रोज आपके पास पड़ा रहता हूँ कितने दिन बाद मिल रहे है ऐसे मे एक बार दे दोगि तो क्या घट जाएगा आपका

मामी- तूने नही सुधरना तेरे मामा आज ही आए है तो वो भी लिपतेंगे मुझसे पर करती हूँ कुछ तेरा चल अब ये बुरा सा मूड ना बना जैसे ही मौका लगता है इशारा करती हूँ

मैने मामी को किस किया और निकल लिया वहाँ से मामी के पास से आया तो देखा कि मम्मी और निशा बड़ी हंस हंस के बाते कर रही थी तो मैने सोचा कि क्या बात कर रही होंगी मैं भी एक साइड मे जाके बैठ गया कुछ और जान-पहचान वाले थे तो उनसे बाते होने लगी

आज रात दोनो मामिया बिज़ी रहने वाली थी तो अपने को ऐसे ही रात गुजारनी थी रात के खाने के बाद भी बहुत देर तक ऐसे ही बाते चलती रही फिर निशा ने मुझे इशारा किया तो मैं उसके पास गया

निशा- मम्मी से बात करो

मैं- ना

वो- सुनो तो सही

मैं- कहा ना नही उसको बेटा नही चाहिए क्या वो नही बोल सकती

वो- ईगो पे मत लो यार आख़िर सब अपन ही तो है तुम एक स्टेप आगे लोगे तो क्या हो जाएगा

मैं- निशा अभी टाइम ठीक नही है जब टाइम होगा तो देखेंगे

वो- चलो तुम्हारी मर्ज़ी मुझे ना चाय पीनी है तुम आओगे

मैं- हाँ, पर तुम्हे बना नी होगी

मैं और निशा रसोई मे आ गयी उसने चाय का पानी रखा गॅस पर रखा मैं बस उसे ही देखे जा रहा था

वो- ऐसे ना देखा करो तुम

मैं- अब क्या पाबंदी लगाओगी

वो- ना पर तुम्हारी नज़रें बाँध लेती है मुझे

मैं – तो बँध जाओ ना

वो-क्यो भला

मैं- तुम अंजान तो नही

वो- हां पर काबिल भी तो नही अभी तक

मैं- बहुत सताती हो आजकल तुम

वो- और जो तुम तडपाते हो उसका क्या

मैने उसका हाथ पकड़ा और उसको खीच लिया

वो- क्या करते हो कोई आ जाएगा

मैं- आने दो

वो- छोड़ो ना

मैं- कभी कभी तो तुम मुझे पागल ही कर देती हो

वो- सच मे

मैं उसके बालो को सूंघते हुए- निशा

वो-हूंम्म

मैं- मैं बहक रहा हूँ

वो- बहक जाओ किसने रोका है

 


मेरी साँसे उसके चेहरे को छू रही थी मैने उसे थोड़ा सा और कस लिया अपने आप मे उसके होंठो और मेरे होंठों मे बस कुछ ही फासला था उसने अपनी आँखे बंद कर ली बस एक सेकण्ड की बात थी कि ……

“बेशर्मो, कहीं भी शुरू हो जाते हो ”

हम दोनो एक पल को तो चौंक ही गये थे हड़बड़ाहट मे अलग हुए तो देखा कि बड़ी मामी रसोई के दरवाजे पे खड़ी थी

मैं- मैं तो चाय पीने आया था

मामी- हाँ देख रही हूँ मैं

निशा ने सर झुका लिया

मामी- थोड़ा यहाँ वहाँ देख लिया करो मेहमानों का घर है बाकी जवान बच्चे है जो चाहे करो वैसे चाय बन रही है तो मैं भी एक कप लूँगी

मैं अपना कप लेके बाहर आया और एक कुर्सी पर बैठ गया मामी भी मेरे पास आ गयी

वो- क्या सोचा फिर तूने

मैं- किस बारे मे

वो- निशा के बारे मे

मैं- क्या सोचना है

मामी- भोला मत बन, देख सब रिश्तेदार तो आए ही हुए है तू कहे तो पंडित बुलवा के फेरे पड़वा दे

मैं- मामी अभी हम ने ऐसा सोचा नही है और वैसे भी ये सब मुझसे ना हो पाएगा मेरा जी नही करता

मामी- पर बात यहा तुम्हारी नही है बात निशा की है उसके बारे तो सोचना होगा तुम्हे

मैने मामी की तरफ देखा

मामी- देखो वो तुम्हारे साथ रहती है तुम दोनो की दोस्ती मेरे कहने का मतलब कि तुमको अगर सबसे अच्छे से कोई समझती है तो वो निशा ही है और मैं जानती हूँ कि आगे भी तुमको साथ ही रहना है तो शादी कर लो उस से

मैं जानती हूँ कि तुम्हारा मन नही करता पर दुनिया क्या कहेगी कल को अब हम तो चलो समझते है पर गाँव-बस्ती है और लोग है हम किसी का मूह तो बंद नही कर सकते ना अब सामने तो नही पीठ-पीछे तो लोग कुछ ना कुछ कहेंगे ही

दरअसल बात निशा के सम्मान की है जो तुम्हे उसे देना ही होगा हम सब चाहते है कि वो बस तुमहरि दोस्त ना रहे बल्कि हमारी बहू बन कर रहे इस से उसका फॅमिली मे भी आदर होगा

मुझे कुछ नही पता बस हमें निशा हमारी बहू के रूप मे चाहिए हम सबकी यही चाहत है अब शादी मे भीड़ भाड़ रोनक नही चाहिए तो कोई बात नही एक सिंपल सा प्रोग्राम कर लेते है जैसा तुम चाहो वैसे पर बेटे निशा को उसका हक तुम्हे देना ही होगा

मामी का कहा हर लफ्ज़ सच्चा था निशा ने कभी मुझसे कुछ माँगा नही था पर उसका ख्याल रखना मेरी ज़िम्मेदारी थी

मैं- करता हूँ कुछ मामी जल्दी ही

कल कुआँ पूजन था तो बाकी का दिन काम करने मे गया मेहमानो की खातिर दारी हलवाई को देखना कभी बाज़ार जाना मैं आया और सीधा तैयार होने के लिए चला गया

और जैसे ही मैं कमरे मे गया तो देखा कि निशा ने वो ही जोड़ा पहना हुआ है जो मैने उसके लिए खरीदा था उसने मुझे देखा तो बोली- पहन कर देख रही थी

जब मैने उसे उस जोड़े मे देखा तो दिल मे गड़गाहट सी हो गयी निशा उस जोड़े मे इतनी खूबसूरत लग रही थी उसके कमर तक आते खुले हुए बाल उसके बदन से वो पर्फ्यूम की हल्की सी जो खुसबु आ रही थी उसने अपने माथे पर जो माँग टीका लगाया था

कसम से मैं जैसे हो सा ही गया था उसकी वो डोरियो वाली चोली मैं बस उसके पास गया और बोला- बहुत खूबसूरत लग रही हो तुम

वो मुस्कुराइ

उसने हाथो मे जो चूड़िया पहनी थी पूरी कलाईयों को भर लिया था उसने मेरा दिल जोरो से धड़क रहा था उसका तो पता नहीपर मेरा होश खोने लगा था जिंदगी मे पहली बार मैने महसूस किया कि निशा एक बदल बन जाए और बरस पड़े मुझ पर और भिगो दे मुझे किसी बंजर ज़मीन की तरह वो बस किसी बिजली की तरह गिर जाए मुझ पर और जला दे मुझे किसी आभूषण की तरफ खनकाने को तो बहुत कुछ था मेरे पास पर शायद दिल ने इजाज़त नही दी

मैने बस उसे अपने आगोश मे समेट लिया और उसके नर्म होंठो को खुद से जोड़ लिया इस से पहले वो मुझे कुछ कहती मैने जाकड़ लिया उसको ये हमारा दूसरा किस था मैं बस उसके होंठो को फील कर रहा था मैं उसकी सांसो की गहराई मे उतर जाना चाहता था उसको अपने दिल से महसूस करना चाहता था

 


मैने बस उसे अपने आगोश मे समेट लिया और उसके नर्म होंठो को खुद से जोड़ लिया इस से पहले वो मुझे कुछ कहती मैने जाकड़ लिया उसको ये हमारा दूसरा किस था मैं बस उसके होंठो को फील कर रहा था मैं उसकी सांसो की गहराई मे उतर जाना चाहता था उसको अपने दिल से महसूस करना चाहता था

ना जाने क्या सोच कर उसने खुद को मेरी बहो मे ढीला छोड़ दिया थोड़ी देर तक ऐसे ही चलता रहा फिर वो हट गयी

“सांस तो लेने दो मनीष ”

मैं- निशा मैं कुछ कहना चाहता हूँ

निशा- मैं जानती हूँ …….

मैं- निशा …………..

वो- मैं जानती हूँ तुम क्या कहना चाहते हो पर इतना जान लेना कि मैं तुम्हारी ज़रूरत ना बन जाऊ

“तुम मेरी ज़रूरत नही हो निशा ”

“तो कौन हूँ मैं क्या हूँ मैं क्या मैं ख्वाब हूँ या तस्सवुर हूँ या मैं कुछ भी नही ”

“पहली तो पता नही पर आज तुम मेरी ख्वाहिश हो तुम वो डर हो जहाँ मैं बार बार आना चाहूँगा , तुम हो तो मैं हूँ बस इतना जानता हूँ ”

“वो क्या करोगे मुझे अपनी ख्वाहिश बना कर जब तुम खुद किसी का ख्वाब हो और ख्वाब अक्सर आँख खोलते ही बिखर जाया करते है ”

“मैं किसी का ख्वाब नही बल्कि शतरंज के खेल का हारा हुआ राजा हूँ ”

“तुम तुम हो तो क्या तुम हुए ”

“तुम्हे तो सब पता है ना ”

“तभी तो कह रही हूँ कि मैं तुम्हारी ज़रूरत नही हूँ ”

“हाँ, तुम मेरी ज़रूरत नही हो ”

“तो क्या हूँ मैं तुम्हारी बता क्यो नही देते ”

“क्या सुन ना चाहती हो तुम निशा ”

“कुछ नही बस ढूँढ रही हूँ खुद को अंधेरी गलियों मे और रोशनी है कि कुछ दिखाई देता नही ”

“अगर मैं कहूँ मुझे तुमसे ……… ’

“मनीष, तुम बहुत कच्चे हो मैं जब भी तुम्हारे बारे मे सोचती हूँ मेरी आँखो के सामने जैसे एक बच्चा आ जाता है पर किसी पतंग की डोर की तरह उलझे हो तुम ”

“और कौन सुलझाएगा इस डोर को ”

“कोई तो होगा जिसे तुम्हारी नज़रें देख नही पा रही है ”

“मैं क्या बताऊ क्या मेरे दिल मे है आँसू भी मेरा है और दिल भी मेरा है मैं कैसे जीता हूँ निशा बस मैं जानता हूँ मेरा कोई वजूद नही उसके बिना मैं जानता हूँ कि तुम भी मेरी हो पर निशा वो भी तो ………. ”

“मैं समझती हूँ मनीष, पर जीना तो होगा ना मैने पहले भी कहा है कि तुम उसको भी दुख दे रहे हो वो क्या सोचती होगी जब तुम्हे यूँ देखती होगी मैं जानती हूँ कि तुम कभी उसको नही भूल पाओगे और उसको भूल जाना भी नही पर मैं फस गयी हूँ ”

“तुम ही तो हो मेरे पास ”

“कुछ बातों को तुम नही समझते हो ”

“तुम समझाती भी तो नही हो ना ”

“इतने नासमझ भी नही हो तुम ”

“निशा मैं इशारे नही समझ पाता हूँ ”

“ तुम मुझे भी कहाँ समझ पाते हो ”ये बोल कर वो नीचे चली गयी मुझे छोड़ गयी अब कैसे कहे हम हाल-ए-दिल अपना सनम से जब उसको हमारी धड़कने सुनाई देती हो

वो मेरी ज़रूरत नही थी सच कहा था उसने पर मेरी ख्वाहिश भी तो नही थी मुझे बहुत गुस्सा आता था कभी कभी कि क्यो छोड़ गयी मुझे वो इस बीच राह मे मंदिर- मस्जिद जहाँ भी मैने सर झुकाया बस एक दुआ माँगी कि जी सकूँ उसके साथ उसकी बाहों मे सोना चाहता था – उसके साथ हसना उसके साथ रोना चाहता था

कोई बहुत बड़ी चीज़ नही माँगी थी मैने दुआ मे और ऐसी भी ना थी कि जो पूरी ना होसके फिर क्या कमी रही मेरी मुहब्बत मे या मेरी दुआ मे जो किसी ने भी कबूल नही किया मैं दोष नही दे रहा किसी को पर साला अजीब लगता है जब खुद को अपनो के बीच अकेला पाता हूँ कहने को तो मेरे होंठो पर एक मुस्कान है फिर क्यो मेरे सीने मे आग लगी है

मितलेश मेरा नूर थी तो निशा मेरी परछाई थी उसका कहना कुछ भी ग़लत नही था पर हम करे तो क्या करे वो भी अपनी और दर्द भी अपना वो लाख कोशिश करती थी मेरे दिल पर मरहम लगाने की पर मैं खुद कुरेदता था अपने जख़्मो को

खैर, नीचे आया तो रोनक लगी थी महफ़िल सजी थी आज तो जम के धमाल होना था तभी मैने देखा कि रुक्मणी भी आई थी ओह उसको तो आना ही था

मैं उस से मिला

रुक्मणी- मनीष, कैसे हो तुम हमें तो भूल ही गये हो कितना टाइम हुआ ना कोई फोन ना कुछ

मैं- थोड़ा सा बिज़ी था अब तुम्हे तो सब पता ही है

वो- एक मिनिट किसी से मिलावाती हूँ

मैं- कौन

वो- आओ तो सही इनसे मिलो मेरे हब्बी सुधीर

हम ने हेलो किया कुछ बाते हुई अच्छा इंसान लगा मुझे

मैं- तुमने शादी कब की

वो- तुम कॉंटॅक्ट रखो तो कुछ पता चले तुम्हे

मैं- वैसे अच्छा ही है लाइफ मे सेट्ल तो होना ही है

वो- हाँ पर तुम कब सेट्ल हो रहे हो

मैं- जल्दी ही हो जाउन्गा और बताओ

वो- बस बढ़िया जयपुर मे हूँ अभी

मैं- क्या बात कर रही हो मैं अभी तो आया जयपुर से

वो- कब

मैं- जस्ट कुछ दिन पहले

वो- तो फिर आओ हम सिविल लाइन्स मे रहते है

मैं- पक्का

तभी निशा भी आ गई

रुक्मणी- कौन है

मैं- दोस्त है

वो- गर्लफ्रेंड

मैं- उस से ज़्यादा

वो- वाउ मनीष तुम तो छुपे रुस्तम निकले

मैने निशा को रुक्मणी से मिलवाया

तभी निशा को मामी ने बुला लिया

रुक्मणी- चूक मत शादी कर ले

मैं- सोच तो रहा हूँ

वो- सोच मत पगले कब तक भागता रहेगा अपने आप से अब तो रुक जा

मैं- डर लगता है

वो- डर कैसा

मैं- पता नही

वो- कुछ ना होता अच्छा मैं मिलती हूँ थोड़ा कपड़े वग़ैरा चेंज कर लूँ

मैं-ओके

उसके बाद मैं बड़े लोगो के कमरे मे गया पेग सेग लग रहे थे तो मैने भी एक बॉटल उठा ली और बाहर आ गया

मामी- शुरू हो गया तुम लोगो का

मैं- वो तो किसी को देनी थी

वो- रहने दे सब समझती हूँ मैं

मैं- भाई कहाँ है

वो- होगा यही कही

मैं- मिले तो बोलना मैं उधर हूँ

मैं एक कुर्सी पर बैठ गया और गिलास मे थोड़ी दारू डाली और पीने लगा तभी पापा आ निकले उस साइड तो मेरे लिए थोड़ी शर्मिंदगी हो गयी मैने बॉटल को छुपाया तो बोले- रहने दे बेटा शरम तो आँखो की होती है फ़ौजी पेग नही लगाएग तो कौन लगाएगा चल मेरा भी मूड है एक मेरा भी बना

मैने उनको सीप दिया

पापा- आज कल दारू भी पहले जैसी नही रही

मैं हुम्म

वो-यार एक बात बोलनी थी तुझसे बुरा ना माने तो बोलू

मैं- जी

वो- यार तेरे बिना ना घर मे रोनक नही लगती

मैं- मैं, जानता हूँ आप क्या कहना चाहते है , मैं हर चीज़ समझता हूँ , वहाँ से घर जाते ही मैं मम्मी से बात करूँगा और पूरी कोशिश करूँगा कि सब ठीक हो जाए.

पापा- मेरी भी ये ही चाहत है.

रत करीब दो बजे मैं निशा के साथ चौबारे की छत पर लेटा हुआ था. आँखो मे नींद का नामो निशान नही था. दिल निशा से कुछ कहना चाहता था पर समझ नही आ रहा था कि कैसे कहूँ, क्या कहूँ क्योंकि हमारी हर बात आजकल अधूरी ही रह जाती थी

निशा- नींद नही आ रही क्या

मैं- तुम भी तो नही सोई

निशा- मेरा क्या है और वैसे भी नींद पर किसी का ज़ोर तो है नही, ये तो जब आए तब आए.

मैं- सुबह होते ही हम गाँव के लिए निकल रहे है.

 


निशा मेरे थोड़ा पास आते हुए – मैने सोचा तुम और रुकोगे यहाँ.

मैं- नही, अभी चलते है दो तीन दिन गाँव रुक कर फिर देल्ही निकल लेंगे.

निशा- कभी कभी मैं तुमको समझ नही पाती हूँ.

मैं- मैं भी.

मैने निशा के माथे पर एक किस किया और बोला- सो जा निशा.

उसने अपना सर मेरे सीने पर रखा और आँखो को बंद कर लिया , चाँदनी रात मे निशा आज कुछ अलग सी ही लग रही थी , क्या ये जिस्म की ज़रूरत थी या मैं सच मे ही उसकी ओर खींचा चला जा रहा था , पर जो भी था अब निशा के सिवा मेरा और था भी तो कौन. कुछ ठंड सी लग रही थी तो मैने एक चादर हम दोनो के उपर डाल ली और सो गया.

सुबह हम तैयार हो चुके थे, तो मैं बस सबको बाइ बोल रहा था कि अशोक भाई और रीना भाभी मेरे पास आए .

भाभी- मनीष, उस बात पे गौर करना जो मैने तुमसे कही थी.

मैं- किस बारे मे भाभी.

भाभी- निशा के बारे मे , स्टुपिड. तुम चाहे मानो या ना मानो पर मैं जानती हूँ निशा ही वो लड़की है जो तुम्हे थाम सकेगी, क्योंकि उस से बेहतर तुम्हे कोई नही समझता , जैसे तुम्हे महसूस कर लेती है वो और सबसे बड़ी बात तुमसे प्यार करती है वो.

भाई- देखो, कुछ चीज़ो से हम लाख कॉसिश कर ले लेकिन भाग नही सकते हमे बस जीना होता है , वैसे तो हम फ़ौज़ियो की ज़िंदगी की डोर का कुछ पता नही पर जितना भी जीने को मिले राज़ी खुशी जी लो यार, चलो अपना मत सोचो पर जब भी तुम्हारी रूह मिथ्लेश से मिलेगी वो बस तुमसे एक सवाल पूछेगी- कि मैं तो अपनी तमाम मुस्कुराहटें तुम्हे सौंप गयी थी , तब क्या कहोगे उस से. नियती से कब तक भगॉगे और फिर निशा जैसी सुलझी हुई लड़की तुम्हे कहाँ मिलेगी, बाकी करो जो करना है हम होते ही कौन है .

मैं- ऐसा क्यो कहते हो भाई, मैं कोशिश तो कर रहा हूँ ना.

भाई- एक बार निशा के दिल को टटोल कर देखो, तुम्हे कोशिश नही करनी पड़ेगी.

भाई और भाभी बहुत देर तक मुझे समझाते रहे, वो ये भी चाहते थे कि मैं कुछ दिन और रुक जाउ पर मुझे तो जाना ही था तो सब लोगो से विदा लेकर मैं और निशा गाँव के लिए चल दिए. पहुचते पहुचते शाम हो गयी थी. चाय-नाश्ता किया निशा घर पर ही रुक गयी और मैं चाची के साथ खेतो की तरफ आ गया.

चाची ने कमरे का ताला खोला और चारपाई बाहर निकाल ली.

मैं- टाइम कितना बदल गया ना.

चाची- हाँ, ऐसे लगता है जैसे बस कल ही की बात है. जैसे कल तक तुम ऐसे ही बेफ़िक्रे इन खेत खलिहानो मे घुमा करते थे, शराराते किया करते थे.

मैं- हाँ, चाची मुझे सब की बहुत याद आती है, अब अपने पैरो पे खड़ा तो हो गया हूँ पर फिर भी सच कहूँ तो काश एक बार फिर वो वक़्त आ जाए तो , मैं एक बार फिर से उसी वक़्त को , उसी अंदाज को , उसी बेफकरी मे जीना चाहता हूँ.

चाची- वक़्त बदल गया है मनीष अब कुछ नही पहले जैसा यहाँ तक कि हम भी तो बदल गये है, खैर मैं कुछ काम निपटा लूँ, तुम चाहो तो थोड़ा आराम करो या फिर आस पास घूम लो .

मैं भी उठ कर थोड़ा आगे को चल दिया, जैसे एक मुद्दत ही हो गयी थी मैं इस तरफ आया ही नही था. हमारे खेतो से थोड़ा आगे सेर मे एक बड़ा सा नीम का पेड़ होता था जिस की छाया मे बहुत समय गुज़रा था मेरा, एक बार फिर से उस नीम को देख कर बहुत अच्छा लगा मुझे. पास ही एक पानी की टंकी होती थी जो अब नही थी, शायद रोड को पक्का करने मे उसे यहाँ से हटा दिया गया था. ऐसा लगता था कि जैसे जमाना एक तेज रफ़्तार से आगे बढ़ गया था और मैं आज भी अपनी उसी बारहवी क्लास वाले साल मे अटका हुआ था.

वो दिन भी क्या दिन थे, मेरा अतीत मुझ पर हावी होने लगा था. मेरे अंदर का जो आवारापन था , जैसे मैं कोई बंजारा था जो बस भटक रहा था इधर उधर. पर मैने सोचा कि एक बार फिर अपने पुराने दिनो की याद को ताज़ा करना है, मैने सोचा कि कल सुबह ही निशा को लेकर निकल जाउन्गा और पूरा दिन बस घूमना है, तमाम उन चीज़ो को एक बार फिर से देखना है जो आज भी मेरा इंतज़ार कर रही थी.

उसके बाद मैं वापिस कुँए पर आ गया. चाची मेरा इंतज़ार कर रही थी.

चाची- कहाँ चले गये थे.

मैं- बस थोड़ा आगे तक.

मैं- चाची, एक बात कहूँ.

चाची- हाँ,

मैं- दोगि क्या.

चाची- अच्छा तो अब तुझे चाची की याद आई है, मैं तो सोची कि अब मुझे भूल ही गया है तू तो.

मैं- ऐसी बात नही है बस उलझा हूँ अपनेआप मे उसी का असर है और कुछ नही.

चाची- रात को चुप चाप मैं छत पे आ जाउन्गी.

मैं- यही करते है ना, वैसे भी मैने अरसे से खेत मे सेक्स नही किया है. वैसे भी घर पर निशा होगी उसके सामने मैं ये सब नही करना चाहता.

चाची- चोरी छिपे क्यो करते हो फिर, बेटा माना कि तुम्हारे और मेरे जिस्मानी रिश्ते है पर मैं फिर भी कहूँगी कि अब तुम्हारी ज़िंदगी मे हम नही बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ है , तू करना चाहता है तो कर ले मैं मना नही करूँगी पर बेटा, वो तुझे बहुत चाहती है , उसकी आँखो मे तेरे लिए बेशुमार चाहत है , उसके दिल को समझ, सिर्फ़ वो ही है जो तुम्हे सब से ज़्यादा जानती है, उसका हाथ थाम लो. यही सही होगा तुम्हारे लिए.

चाची की बात बिल्कुल सही थी. मुझे अब आगे बढ़ कर निशा का हाथ थामना चाहिए था, निशा जो जैसे मेरी सोचों पर छाई थी, मेरा हमदम थी. मेरा जो भी थी अब वो ही थी. मैने फिर चाची के साथ सेक्स नही किया और कुछ देर बाद हम घर आ गये. और आते ही मैं सीधा निशा के पास गया जो बस अभी सो कर उठी थी, अलसाया सा उसका चेहरा, बिखरे बार उसके चेहरे पर बेतारीब बिखरे हुए .

निशा- ऐसे क्या देख रहे हो.

मैं- बस तुम्हे.

निशा- पर मुझे तो रोज ही देखते हो.

मैं- मेरी जितनी मर्ज़ी होगी उतना देखूँगा.

निशा- ओके बाबा, देख लेना पर अभी ज़रा हाथ मूह धो लूँ.

मैं रसोई मे गया और दो कप चाय बनाने लगा कुछ देर मे निशा भी वही पर आ गयी.

निशा- मनीष, आख़िर तुम खुद को कैसे इतना सिंपल रख पाते हो, देखो जमाना कितना बदल गया और तुम आज भी जैसे बचपन मे ही अटके हुए हो, आज भी तुम सिर्फ़ डबल डाइमंड चाय पीते हो, कहने को तो ऑफीसर हो पर फिर भी स्टॅंडर्ड के हिसाब से तुम्हे कॉफी पीना चाहिए या कुछ ऑर.

मैं- सिंपल होना ही सबसे बड़ी मुश्किल है मेडम आज की इस भागती ज़िंदगी मे, दुनिया चाहे कुछ भी समझे पर आज के इस सेल्फिश जमाने के साथ चलना मुझे पसंद नही, मैं बस अपने आप मे ही जीना चाहता हूँ, और सही कहा तुमने मैं जान बुझ कर ही आगे नही बढ़ना चाहता, क्योंकि उस दौर मे जब हम छोटे थे जीना तभी सीखा था मैने और सच तो ये है कि मैं उस दौर मे ही जी चुका अब तो बस साँसे है.

मैने निशा के हाथ मे चाय का कप दिया और बोला- कल सुबह जल्दी उठ जाना

निशा- क्यो

मैं- खुद जान लेना .

निशा- चलो ठीक है पर अभी खाने मे क्या खाओगे, बता दो मैं जल्दी से बना देती हूँ.

मैं- अभी तो बस मेगि ही बना दो , पर सुबह मेरे लिए राबड़ी बना देना बहुत दिन हुए मैने राबड़ी नही पी है और हाँ दो रात की रोटी भी रख देना,

निशा- जो हुकम सरकार.

जब तक निशा बिज़ी थी मैं अनिता भाभी से मिलने चला गया पर हमेशा की तरह मेरी शक्की ताई की वजह से मैं भाभी से कुछ बात नही कर पाया , सो डिन्नर किया और अपना बिस्तर छत पर लगा दिया रात के करीब 11 बजे , मेरा रेडियो बज रहा था हमेशा की तरह 90’स के शानदार गाने स्लो आवाज़ मे उस ठंडी सी हवा के साथ मेरे दिल को धड़का रहे थे. और ना जाने कब मेरी बगल मे निशा आकर लेट गयी.

 
निशा मेरे थोड़ा पास आते हुए – मैने सोचा तुम और रुकोगे यहाँ.

मैं- नही, अभी चलते है दो तीन दिन गाँव रुक कर फिर देल्ही निकल लेंगे.

निशा- कभी कभी मैं तुमको समझ नही पाती हूँ.

मैं- मैं भी.

मैने निशा के माथे पर एक किस किया और बोला- सो जा निशा.

उसने अपना सर मेरे सीने पर रखा और आँखो को बंद कर लिया , चाँदनी रात मे निशा आज कुछ अलग सी ही लग रही थी , क्या ये जिस्म की ज़रूरत थी या मैं सच मे ही उसकी ओर खींचा चला जा रहा था , पर जो भी था अब निशा के सिवा मेरा और था भी तो कौन. कुछ ठंड सी लग रही थी तो मैने एक चादर हम दोनो के उपर डाल ली और सो गया.

सुबह हम तैयार हो चुके थे, तो मैं बस सबको बाइ बोल रहा था कि अशोक भाई और रीना भाभी मेरे पास आए .

भाभी- मनीष, उस बात पे गौर करना जो मैने तुमसे कही थी.

मैं- किस बारे मे भाभी.

भाभी- निशा के बारे मे , स्टुपिड. तुम चाहे मानो या ना मानो पर मैं जानती हूँ निशा ही वो लड़की है जो तुम्हे थाम सकेगी, क्योंकि उस से बेहतर तुम्हे कोई नही समझता , जैसे तुम्हे महसूस कर लेती है वो और सबसे बड़ी बात तुमसे प्यार करती है वो.

भाई- देखो, कुछ चीज़ो से हम लाख कॉसिश कर ले लेकिन भाग नही सकते हमे बस जीना होता है , वैसे तो हम फ़ौज़ियो की ज़िंदगी की डोर का कुछ पता नही पर जितना भी जीने को मिले राज़ी खुशी जी लो यार, चलो अपना मत सोचो पर जब भी तुम्हारी रूह मिथ्लेश से मिलेगी वो बस तुमसे एक सवाल पूछेगी- कि मैं तो अपनी तमाम मुस्कुराहटें तुम्हे सौंप गयी थी , तब क्या कहोगे उस से. नियती से कब तक भगॉगे और फिर निशा जैसी सुलझी हुई लड़की तुम्हे कहाँ मिलेगी, बाकी करो जो करना है हम होते ही कौन है .

मैं- ऐसा क्यो कहते हो भाई, मैं कोशिश तो कर रहा हूँ ना.

भाई- एक बार निशा के दिल को टटोल कर देखो, तुम्हे कोशिश नही करनी पड़ेगी.

भाई और भाभी बहुत देर तक मुझे समझाते रहे, वो ये भी चाहते थे कि मैं कुछ दिन और रुक जाउ पर मुझे तो जाना ही था तो सब लोगो से विदा लेकर मैं और निशा गाँव के लिए चल दिए. पहुचते पहुचते शाम हो गयी थी. चाय-नाश्ता किया निशा घर पर ही रुक गयी और मैं चाची के साथ खेतो की तरफ आ गया.

चाची ने कमरे का ताला खोला और चारपाई बाहर निकाल ली.

मैं- टाइम कितना बदल गया ना.

चाची- हाँ, ऐसे लगता है जैसे बस कल ही की बात है. जैसे कल तक तुम ऐसे ही बेफ़िक्रे इन खेत खलिहानो मे घुमा करते थे, शराराते किया करते थे.

मैं- हाँ, चाची मुझे सब की बहुत याद आती है, अब अपने पैरो पे खड़ा तो हो गया हूँ पर फिर भी सच कहूँ तो काश एक बार फिर वो वक़्त आ जाए तो , मैं एक बार फिर से उसी वक़्त को , उसी अंदाज को , उसी बेफकरी मे जीना चाहता हूँ.

चाची- वक़्त बदल गया है मनीष अब कुछ नही पहले जैसा यहाँ तक कि हम भी तो बदल गये है, खैर मैं कुछ काम निपटा लूँ, तुम चाहो तो थोड़ा आराम करो या फिर आस पास घूम लो .

मैं भी उठ कर थोड़ा आगे को चल दिया, जैसे एक मुद्दत ही हो गयी थी मैं इस तरफ आया ही नही था. हमारे खेतो से थोड़ा आगे सेर मे एक बड़ा सा नीम का पेड़ होता था जिस की छाया मे बहुत समय गुज़रा था मेरा, एक बार फिर से उस नीम को देख कर बहुत अच्छा लगा मुझे. पास ही एक पानी की टंकी होती थी जो अब नही थी, शायद रोड को पक्का करने मे उसे यहाँ से हटा दिया गया था. ऐसा लगता था कि जैसे जमाना एक तेज रफ़्तार से आगे बढ़ गया था और मैं आज भी अपनी उसी बारहवी क्लास वाले साल मे अटका हुआ था.

वो दिन भी क्या दिन थे, मेरा अतीत मुझ पर हावी होने लगा था. मेरे अंदर का जो आवारापन था , जैसे मैं कोई बंजारा था जो बस भटक रहा था इधर उधर. पर मैने सोचा कि एक बार फिर अपने पुराने दिनो की याद को ताज़ा करना है, मैने सोचा कि कल सुबह ही निशा को लेकर निकल जाउन्गा और पूरा दिन बस घूमना है, तमाम उन चीज़ो को एक बार फिर से देखना है जो आज भी मेरा इंतज़ार कर रही थी.

उसके बाद मैं वापिस कुँए पर आ गया. चाची मेरा इंतज़ार कर रही थी.

चाची- कहाँ चले गये थे.

मैं- बस थोड़ा आगे तक.

मैं- चाची, एक बात कहूँ.

चाची- हाँ,

मैं- दोगि क्या.

चाची- अच्छा तो अब तुझे चाची की याद आई है, मैं तो सोची कि अब मुझे भूल ही गया है तू तो.

मैं- ऐसी बात नही है बस उलझा हूँ अपनेआप मे उसी का असर है और कुछ नही.

चाची- रात को चुप चाप मैं छत पे आ जाउन्गी.

मैं- यही करते है ना, वैसे भी मैने अरसे से खेत मे सेक्स नही किया है. वैसे भी घर पर निशा होगी उसके सामने मैं ये सब नही करना चाहता.

चाची- चोरी छिपे क्यो करते हो फिर, बेटा माना कि तुम्हारे और मेरे जिस्मानी रिश्ते है पर मैं फिर भी कहूँगी कि अब तुम्हारी ज़िंदगी मे हम नही बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ है , तू करना चाहता है तो कर ले मैं मना नही करूँगी पर बेटा, वो तुझे बहुत चाहती है , उसकी आँखो मे तेरे लिए बेशुमार चाहत है , उसके दिल को समझ, सिर्फ़ वो ही है जो तुम्हे सब से ज़्यादा जानती है, उसका हाथ थाम लो. यही सही होगा तुम्हारे लिए.

चाची की बात बिल्कुल सही थी. मुझे अब आगे बढ़ कर निशा का हाथ थामना चाहिए था, निशा जो जैसे मेरी सोचों पर छाई थी, मेरा हमदम थी. मेरा जो भी थी अब वो ही थी. मैने फिर चाची के साथ सेक्स नही किया और कुछ देर बाद हम घर आ गये. और आते ही मैं सीधा निशा के पास गया जो बस अभी सो कर उठी थी, अलसाया सा उसका चेहरा, बिखरे बार उसके चेहरे पर बेतारीब बिखरे हुए .

निशा- ऐसे क्या देख रहे हो.

मैं- बस तुम्हे.

निशा- पर मुझे तो रोज ही देखते हो.

मैं- मेरी जितनी मर्ज़ी होगी उतना देखूँगा.

निशा- ओके बाबा, देख लेना पर अभी ज़रा हाथ मूह धो लूँ.

मैं रसोई मे गया और दो कप चाय बनाने लगा कुछ देर मे निशा भी वही पर आ गयी.

निशा- मनीष, आख़िर तुम खुद को कैसे इतना सिंपल रख पाते हो, देखो जमाना कितना बदल गया और तुम आज भी जैसे बचपन मे ही अटके हुए हो, आज भी तुम सिर्फ़ डबल डाइमंड चाय पीते हो, कहने को तो ऑफीसर हो पर फिर भी स्टॅंडर्ड के हिसाब से तुम्हे कॉफी पीना चाहिए या कुछ ऑर.

मैं- सिंपल होना ही सबसे बड़ी मुश्किल है मेडम आज की इस भागती ज़िंदगी मे, दुनिया चाहे कुछ भी समझे पर आज के इस सेल्फिश जमाने के साथ चलना मुझे पसंद नही, मैं बस अपने आप मे ही जीना चाहता हूँ, और सही कहा तुमने मैं जान बुझ कर ही आगे नही बढ़ना चाहता, क्योंकि उस दौर मे जब हम छोटे थे जीना तभी सीखा था मैने और सच तो ये है कि मैं उस दौर मे ही जी चुका अब तो बस साँसे है.

 
मैने निशा के हाथ मे चाय का कप दिया और बोला- कल सुबह जल्दी उठ जाना

निशा- क्यो

मैं- खुद जान लेना .

निशा- चलो ठीक है पर अभी खाने मे क्या खाओगे, बता दो मैं जल्दी से बना देती हूँ.

मैं- अभी तो बस मेगि ही बना दो , पर सुबह मेरे लिए राबड़ी बना देना बहुत दिन हुए मैने राबड़ी नही पी है और हाँ दो रात की रोटी भी रख देना,

निशा- जो हुकम सरकार.

जब तक निशा बिज़ी थी मैं अनिता भाभी से मिलने चला गया पर हमेशा की तरह मेरी शक्की ताई की वजह से मैं भाभी से कुछ बात नही कर पाया , सो डिन्नर किया और अपना बिस्तर छत पर लगा दिया रात के करीब 11 बजे , मेरा रेडियो बज रहा था हमेशा की तरह 90’स के शानदार गाने स्लो आवाज़ मे उस ठंडी सी हवा के साथ मेरे दिल को धड़का रहे थे. और ना जाने कब मेरी बगल मे निशा आकर लेट गयी.

मैं- जानती हो मुझे बहुत दुख हुआ था जब पापा ने हमारे पुराने मकान को तुडवा कर ये कोठी बनवा दी, मुझे बिल्कुल अच्छा नही लगता इसमे रहना , मुझे बस मेरा पुराना मकान चाहिए.

निशा- पर टाइम के साथ हमे बदलना तो पड़ता है.

मैं- जानती हो जहा हम लेटे है पहले वहाँ एक कमरा था जिसमे मैं पढ़ता था, वो भी क्या दिन थे घर के साइड मे एक छप्पर था , और बाहर चबूतरे के पास एक पत्थर जिसपे बैठ के मैं कपड़े धोता था नहाता था.

निशा- मनीष, कुछ चीज़ो पर हमारा बस नही चलता है .

मैने निशा को अपने सीने से चिपका लिया और बोला- पर हम कोशिश तो कर सकते है ना.

मैं- बिल्कुल. याद है कैसे जब तुम पहली बार मुझे मिली थी.

निशा- कैसे भूल सकती हूँ मैं , कैसे थे तुम उस टाइम, और कपड़े पहन ने का बिल्कुल सलीका नही था तुम्हे पर बालो का वो अजय देवगन वाला स्टाइल मस्त लगता था तुम पर.

मैं- और तुम हाथो मे जो वो धागा बाँधती थी , और तुम्हारी चोटी जो आज भी आगे को रहती है .

निशा- तुम आज भी नोटीस करते हो.

मैं- तुम्हारा वो रूप मेरी आँखो मे बसा है निशा.

निशा- तुम मुझे किस रूप मे देखना चाहते हो.

मैं- कढ़ाई का सूट, घेर की सलवार और पाँवो मे लंबी जूतियाँ, हाथो मे हरी चूड़िया और चोटी मे लाल रिब्बन.

निशा- मनीष, तुम एक पल भी नही भूले हो ना.

मैं- कैसे भूल सकता हूँ, उस दिन तुम्हारा जनमदिन था और तुमने बरफी खिलाई थी मुझे.

निशा- जानते हो जब मैं तन्हा थी , अकेली थी बस ये लम्हे ही थे जिन्हे याद करके मेरे होंठो पर हँसी आ जाती थी. कितनी ही रातें उस खामोश चाँद को देख कर गुजर जाती थी मेरी. और एक टाइम तो लगने लगा था कि बस ऐसे ही अकेली पड़ जाउन्गी पर तभी जैसे जादू हो गया किसी ताज़ा हवा के झोंके की तरह तुम फिर से मुझे गुलज़ार करने आ गये.

मैं- पता है कितना तलाश किया मैने तुम्हे और शुक्र है किस्मत का जिसने तुम्हे फिर से मिलने मे मदद की. जानती हो फ़ौज़ कभी भी मेरी ज़िंदगी नही थी, पता नही कैसे शायद ये भी किस्मत का ही करिश्मा था कोई जो मुझे यहा ले गयी. मैं तो इसी गाँव मे रहना चाहता था पर आज देखो गाँव भी शहर ही बन गया है.

शुरू मे बहुत अच्छा लगता था इस गाँव का पहला लड़का जो सेना मे अफ़सर बना पर अब जैसे वर्दी बोझ लगती है.

निशा- नौकरी छोड़ नही सकते क्या.

मैं- नही यार. माना कि लाख परेशानिया है पर जब सरहद बुलाती है तो पैर अपने आप दौड़ पड़ते है, बेशक वहाँ पर एक सूनापन है पर फिर भी एक ज़िंदगी वहाँ पर भी है. फ़ौज़ ने मजबूरियों के साथ बहुत कुछ दिया भी है, अगर फ़ौज़ मे ना होता तो तुम्हे कभी नही ढूँढ पाता. मितलेश के बाद अगर मुझे किसी का भी ख्याल रहता तो बस तुम्हारा, जब भी मैं छुट्टी आता तो मेरी हर शाम उन ठिकानो पर गुजरती जहाँ तुम और मैं अक्सर मिलते थे. आज जमाने के साथ वो जगह बदल गयी हो पर मेरी यादो मे वो ज़िंदा है और रहेंगी, निशा मेरे लिए तुम क्या हो ये बस मैं जानता हूँ. हमेशा मेरी परछाई बन कर मेरे साथ चली हो तुम. जब कभी थक कर चूर हो जाता था बस तुम्हारी ही यादे थी जो मुझे हौंसला देती थी, कश्मीर की सर्द फ़िज़ा मे तुम्हारी ही यादो की गर्मी थी मेरे पास.

निशा- मनीष तुम सच मे पागल हो , कुछ भी बोलते रहते हो . तुम्हारी बस ये ही बात मुझे तब भी पसंद थी और आज भी पसंद है, जानते हो मैं जब भी गाँव के इन नये लड़के लड़कियो को देखती हूँ तो उनकी आँखो मे अपने लिए एक अलग ही तरह की रेस्पेक्ट देखती हूँ, उनकी आँखो मे मैं वो ही कशिश देखती हूँ जो हम मे थी, वो ही जैसे कोई परिंदा पिंज़रा तोड़ कर इस आसमान मे उड़ जाना चाहता हो. पर मनीष हम ने इस साथ की कीमत भी तो चुकाई है,

मैं- अब उस से कुछ फरक नही पड़ता है . किसी मे इतनी हिम्मत नही जो आज तुम्हारी तरफ आँख उठा कर देख सके, मैं जानता हूँ तुम अपने परिवार की तरफ से थोड़ी परेशान हो पर मेरा यकीन करो वो दौर अब बीत चुका है .

निशा- जानती हूँ . अब ये बाते छोड़ो और बताओ क्या प्लान है

मैं- प्लान तो कुछ खास नही पर इतनी गुज़ारिश है कि मैं तुम्हे कल साड़ी मे देखना चाहता हूँ .

निशा- मुझे मालूम था तुम्हारी यही फरमाइश होगी, चलो जाओ अब मैं कुछ देर सोना चाहती हूँ.

 
रात आँखों आँखो मे कट गयी . सुबह जब मैं उठा तो निशा मेरे साथ बिस्तर पर नही थी, दिन का उजाला हो चुका था शायद मैं ही आज देर से उठा था . मैं नीचे आया तो देखा कि अनिता भाभी आँगन मे कपड़े धो रही थी. भाभी ने एक नज़र मुझ पर डाली और अपने कपड़े फिर से धोने लगी. तो मैं उनके पास गया.

मैं- क्या बात है भाभी. कुछ उखड़ी उखड़ी सी लगती हो.

भाभी- तुम्हे मुझसे क्या लेना देना , देख रही हूँ जबसे आए हो भाभी की तो एक पल याद नही आई, अब तुम्हे भला मेरी क्या पड़ी है.

मैं- भाभी, मेरा गुस्सा इन बेचारे कपड़ो पर क्यो निकाल रही हो और फिर आपको तो पता है कि ज़िंदगी किस तरफ गुज़र रही है , मैं कोशिश कर रहा हूँ कि फिर से सब ठीक हो सके.

भाभी- तो मैने क्या माँग लिया तुमसे, कभी कुछ कहा क्या मैने. पर तुम दो बात करने की ज़रूरत भी नही समझते हो , एक समय था तब भाभी के सिवा कुछ नही दिखता था , मनीष तुम सच मे बदल गये हो .

मैं- मनीष कभी नही बदल सकता भाभी. आप मन मे ऐसा कुछ मत लाओ. आपको तो पता है की आपका और मेरा रिश्ता कितना अलग है.

भाभी- पर लगता है कि मेरे साथ साथ तुम उस रिश्ते को भी भूल गये हो.

मैं भाभी की बात का जवाब दे ही रहा था कि निशा ने मुझे आवाज़ दी और जो मैने पलट कर देखा बस फिर देखता ही रह गया. वो हवा जैसे मेरे माथे को चूम कर गयी थी अपने साथ निशा की महकती साँसे लाई थी दरवाजे पर हल्के नीले रंग की साड़ी मे खड़ी थी वो हाथो मे हरी चूड़िया , और बालों को आगे की तरफ किया हुआ था कंधे के उपर सेजैसे कोई काली नागिन लिपटी हुई हो. मैं कुछ पॅलो के लिए बस उसके रूप की चमक मे खो गया .

निशा- अब देखते ही रहोगे या अंदर आओगे.

मैं अंदर गया और उसे अपनी बाहों मे भर लिया.

निशा- छोड़ो, क्या करते हो कोई आ जाएगा.

मैं- आने दो , हम किसी से डरते है क्या.

निशा- तुम तो बेशर्म हो पर मुझे तो मत बनाओ. हाथो मैं नाश्ता लाती हूँ.

निशा रसोई मे गयी और मैने टीवी ऑन कर दिया और गजब बात देखो उस पर भी वो ही गाना आ रहा था तू लादे मुझ हरी हरी चूड़िया. गाने को सुन कर ना जान क्यो निशा ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी. अब किसे भूख थी कैसी प्यास थी मैं बस उसे निहारते रहा. पर जल्दी ही मुझे भी तैयार होने जाना पड़ा .

मैं अपने जूते लेने घर के अंदर वाले कमरे मे गया तो देखा कि मेरी बुलेट वही पर शान से खड़ी हुई थी. उसे देख कर मेरे होंठो पर मुस्कान सी आ गयी, आज भी उस पर धूल का एक दाना नही था मम्मी ने बड़े प्यार से रखा था उसे. मैने कमरे मे देखा तो मेरा तमाम वो समान रखा था जो कभी मम्मी ने ये झूट बोल कर छुपा दिया था कि वो सब जला दिया है.

मैने एक बॉक्स मे देखा तो मिथ्लेश के और मेरे कुछ फोटो थे और ढेर सारे खत जो हमारे इश्क़ के गवाह थे, एक ऐसे ही डिब्बे मे वो तमाम चिट्ठिया रखी थी जो निशा ने मेरे लिए पोस्ट की थी . एक कोने मे मेरा क्रिकेट का किट पड़ा था , अब तो याद भी नही था कि लास्ट टाइम मैने बॅट अपने हाथो मे कब लिया था. एक तरफ मेरी वो ही पुरानी साइकल खड़ी थी , अब मुझे समझ आया कि मम्मी ने मेरी तमाम यादो को इस कमरे मे सज़ा दिया था.

मैं दूर होकर भी हर पल उनके साथ ही था. अब मैने जाना था कि माँ-बाप आख़िर क्यो हम औलादो से दो कदम आगे होते थे. मेरी आँखो से दो आँसू निकल कर गिर गये.

“तो तुम आ ही गये यहाँ.”

मैने देखा निशा मेरे पीछे ही खड़ी थी.

मैं- तुम्हे पता था ना.

निशा- हां

मैं- तो क्यो नही बताया.

निशा- क्योंकि खुशी से ज़्यादा तुम्हे दर्द होता , और मैं तुम्हे फिर से टूटता हुआ नही देख सकती. इन यादो मे खुशी से ज़्यादा दुख है , हर वो याद जिसकी वजह से तुम मुस्कुराओगे वो ही तुम्हारे दिल को जलाएँगी और मैं ऐसा बिल्कुल नही चाहती. बिल्कुल नही चाहती . काश मेरा बस चलता तो दुनिया की तमाम खुशी तुमहरे हाथो मे रख देती.

मैं- तुम हो , हर खुशी पा ली मैने. अब कोई हसरत बाकी नही रही.

निशा- बस तुम्हारी यही अदा मेरा चैन छीन लेती है और तुम हो कि ……

मैं- आ चलते है

निशा- पर जा कहाँ रहे हो अब तो बता दो .

मैं- धोसी की पहाड़ी .

निश- मज़ाक कर रहे हो ना तुम.

मैं- क्या लगता है ,

निशा- सच मे मनीष.

मैं- तुम्हारी कसम.

निशा- याद है जब हम पहली बार वहाँ पर गये थे.

मैं- ऐसा ही तो मौसम था

निशा- हाँ. पर एक बात कहूँ

मैं- कहो

वो- बुलेट पे चले आज

मैं- तुम तो जानती हो मैं इसे जब तक हाथ नही लगाउन्गा तब तक मम्मे मेरे हाथ मे चाबी नही देगी.

निशा- पर गाड़ी मे मज़ा नही आएगा.

मैं- किसने कहा हम गाड़ी मे जा रहे है रवि की बाइक कब काम आएगी.

निशा- जैसे तुम्हारी मर्ज़ी .

 
जब निशा मेरी कमर मे हाथ डाल कर बैठी तो पता नही क्यो अच्छा सा लगा . ठंडी हवा जिसमे हल्की सी मोहब्बत तैर रही थी और साथ मे हमारी बाते और क्या चाहिए था. सहर मे कुछ खाने-पीने का समान लिया और फिर बढ़ गये धोसी की ओर. रास्ते मे मेरी कुछ यादे ताज़ा हो गयी.

मैं- निशा जानती हो , रास्ते मे एक खेत आएगा एक बार हम छोटे थे तो तीन दोस्त स्कूटर पे धोसी जा रहे थे और कंट्रोल खो कर सरसो मे घुसा दिया था स्कूटर.

निशा- ऐसी उल जलूल हरकते तुम करते ही रहते थे. मैं आज भी नही भूली हूँ कैसे तुमने मेरा मटका फोड़ा था.

मैं- पर आज तुम मटका लेके पानी लेने कहाँ आती हो.

निशा- अब वो दिन भी तो नही रहे.

मैं- पर हम तुम तो आज भी वही है ना. और मैं अपने उन्ही दिनो को जीना चाहता हूँ.

निशा- पर अब मुमकिन नही जानते हो अब तो मंदिर के पीछे उस बगीची को भी उजाड़ कर वहाँ पर धरम शाला के कमरे बना दिए है. ऐसा लगता है कि किसी ने मुझसे कुछ छीन लिया है , मुझे गुस्सा तो इतना आ रहा है कि पुजारी का सिर फोड़ दूं.

मैं- मंदिर के पास काफ़ी ज़मीन है निशा , आज शाम हम लोग पुजारी से बात करते है और सब ठीक रहा तो एक नया बगीचा हम अपनी तरफ से बनवा देते है ,

निशा- इच्छा तो मेरी भी यही है पर .

मैं- पर क्या, पुजारी कभी मना नही करेगा बस तू कल पानी का मटका लेके आइयो.

निशा- बहुत सताते हो तुम.

मैं- अपनी हो इसलिए ही तो सताता हूँ.

तभी मैने बाइक रोकी और निशा को उतरने को कहा.

निशा- क्या हुआ.

मैं- ये वही खेत है , ये नहर देख आज भी वैसे ही है एक दम शांत हाँ आस पास के पेड़ कुछ कम हो गये है पहले तो यहाँ घने पेड़ थे , शायद यही आस पास से हमारा स्कूटर आउट ऑफ कंट्रोल हुआ था , बेशक चोट लगी थी पर कसम से मज़ा बहुत आया था, इसी नहर मे तो फिर कूद कूद के नहाए थे.

निशा- मनीष, वैसे ज़िंदगी को अपने अंदाज मे तुमने खूब जिया है.

मैं- नही यार, ज़िंदगी तो कभी ज़ी ही नही पाया मैं, मिता थी तुम थी , कितना साथ रहा वो अपने रास्ते चली गयी तुम अपने रह गया मैं, जानती हो जब बर्फ़ीली पहाड़ियो पर जीना मुश्किल होता था तो बस तुम दोनो की यादे ही थी, वरना जलती आग मे कहाँ इतनी तपिश थी जो मेरे दिल को पिघला सके.

जब कभी जोडियो को देखता तो अपने आप से कहता था मेरे पास भी दुनिया की सबसे खूबसूरत दोस्त है , जब मैं बॅटल मे होता और गोलियो के उस शोर मे, धमाको के उस धुए मे जब बस दिल कह ही देता कि आज सांसो की डोर बस टूटने को है मेरे पर्स मे रखी तुम दोनो की तस्वीरो को ही अलविदा कहा है मैने.

जब पहली बार गोली लगी तो आँखो के आगे अंधेरा छा गया , और बिल्कुल नही लगा कि अब ज़िंदगी बचेगी पर कानो मे जैसे तुम्हारी ही आवाज़ गूँज रही थी , उन अंधेरे मे डूबती आँखो मे बस तुम्हारी यादो का ही उजाला तो था मेरे पास. बहुत बार टूटा पर दिल ने आस का दामन नही छोड़ा, उम्मीद थी कि तुम्हे कभी ना कभी ढूँढ ज़रूर लूँगा.

निशा- मनीष की परछाई है निशा , उस से दूर कैसे हो सकती थी बस कुछ समय था मुश्किल का पर अब सब ठीक है. तुम तो कह कर अपना हाल बता देते हो पर मैं जानती हूँ कितनी रातें बस तन्हाई मे बीत गयी, दिन तो बस काम मे कट जाता था पर ऐसी कोई रात नही जब मैने अतीत के पन्ने नही पलटे हो.

मैने निशा का हाथ पकड़ा और वही नहर के किनारे पर बैठ गये. कुछ तो कशिश थी उसमे ऐसे ही थोड़ी ना मैं उसकी तरफ खिंचा जा रहा था.

मैं- निशा आज रात अपना कुएँ पर ही बिताएँगे.

निशा- वहाँ पर क्यो, इरादे तो नेक है जनाब के.

मैं- जब तुम साथ हो तो इरादो की क्या ज़रूरत.

निशा- ये कैसी चाहत है तुम्हारी मैं समझ नही पा रही हूँ..

मैं- अपने दिल से पूछ क्यो नही लेती..

निशा- ये कम्बख़्त भी अब कहाँ मेरा रहा ये तो ना जाने कब से तुम्हारे सीने मे धड़क रहा है. ये तुम्हारी ही तो साँसे है जो मेरे बदन को महका रही है.

मैं- साड़ी मे जबर दिखती हो तुम.

निशा- शूकर है जीन्स पहन ने को नही कहा तुमने.

मैं- जीन्स भी अच्छी लगती है तुमपे, पर मुझे तुम्हारी ये सादगी ही पसंद है , जब तुम चुन्नी को अपने अंदाज मे ओढती हो तो साँसे बेकाबू सी हो जाती है.

निशा- अब इतनी भी तारीफ ना करो, और कब तक यही बैठना है चलना नही है क्या धूप भी पड़ने लगी है.

 
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