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ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना complete

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आए लौन्डे ज़ुबान संभाल के बात कर, वरना में तेरा वो हाल करूँगा – वो हाल करूँगा..कि… तडाक….!!

अभी बात पूरी भी नही कर पाया वो मरियल के जगेश ने उसके कान पर एक और बजा दिया.

अपने मुँह पे ताला लगा हरामी वरना, यही टेन्टुअ दबा दूँगा साले, एक मिनट में खेल ख़तम कर दूँगा… तू हमें नही जानता.. मैने तैश में आकर कहा..,

तभी वो इनस्पेक्टर उठ खड़ा हुआ और इससे पहले की वो कुछ कहता या करता,

मे बोला- आए इनस्पेक्टर होश में आ, ऐसा ना हो कि तुझे भी लेने के देने पड़ जाएँ, ला फोन दे इधर, और फोन अपनी तरफ करके एसपी का नंबर लगा दिया..

दूसरी तरफ बेल जा रही थी, तभी इनस्पेक्टर बोला.. करले-2 फोन बुला ले तेरा जो भी कोई बाप हो उसे.. मे भी देखता हूँ तू क्या कर पाता है..

थोड़ी देर में एसपी ने फोन पिक कर लिया और हेलो बोलके पुछा- एसपी सिन्हा हियर, कॉन बोल रहे हैं.

मे- सर मे अरुण मेसी कॉलेज से…!

एसपी- ओह अरुण बोलो कैसे फोन किया.. सब ठीक तो है..?

मे- सर कुछ भी ठीक नही है, वरना मे आपको कष्ट ही क्यों देता..?

एसपी- अब क्या प्राब्लम हो गयी भाई.. ?

मैने उन्हें पूरी बात बताई तो उन्होने पुछा कॉन सा इनस्पेक्टर है, ज़रा फोन तो देना उसे..!

मैने फोन उस इनस्पेक्टर को दे दिया..

इंस्पेक्टर- हेलो ! हां ! में इनस्पेक्टर यादव बोल रहा हूँ, क्या तकलीफ़ है तुम्हें..?

एसपी- तकलीफ़ तो तुझे हो सकती है यादव, लगता अब तेरी वर्दी ही उतरवानी पड़ेगी, तेरी अकड़ अभी गयी नही..?

इंस्पेक्टर- हकलाते हुए… स.स.सस्स. जय हिंद सर.. सॉरी सर.. मुझे पता नही था, आप हैं फोन पर..!

एसपी- वो सब छोड़, ये क्या किस्सा है…? क्यों हर किसी से बदतमीज़ी से पेश आते हो, देखो तुम फिर कोई मुसीबत में पडो उससे पहले अरुण जैसे कहे वैसा करो, वरना इस बार तुम्हारी नौकरी भी नही बचेगी सोच लो.

इंस्पेक्टर- लेकिन सर दूसरी तरफ एमएलए साब के लड़के का मामला है, अब बताइए मे क्या करूँ..?

एसपी- अच्छा ? तुम अरुण को फोन दो एक मिनट. उसने मुझे फोन दिया.., एसपी आगे बोले- देखो अरुण हमारी भी मजबूरी समझो, लोकल लीडर को भी हमें तबज्जो देनी पड़ती है, तो जो आसानी से हल निकल सके वो निकाल लो प्लीज़..!

मे- ये आप क्या कह रहे हैं एसपी साब, उसको अभी छोड़ दिया तो वो फिरसे गुंडा गर्दि करेगा, इसने ज़बरदस्ती चार लड़कियों को उठवाया है.. ये कोई मामूली घटना नही है… अगर पोलीस ने कुछ नही किया तो जानते हैं क्या होगा..?

मेसी कॉलेज तो मेरे साथ है ही, इन लड़कियों का कॉलेज भी सड़क पे उतर आएगा और देखते-2 शहर के सभी स्कूल, कॉलेजस सड़कों पे होंगे, फिर एमएलए तो क्या, आपको और कमिशनर साब को भी जबाब देना भारी पड़ेगा.

आँखों देखे मे तो मक्खी नही निगल सकता, शहर में खुले आम गुंडागर्दी नही होने दूँगा मे..! चाहे इससे मेरा मशबिरा समझिए, या धमकी.

और आपको भी पता है, मे कोरी धमकी नही देता..! अब आप सोचिए क्या करना है..!

एसपी- ठीक है उस इनस्पेक्टर को फोन दो..! मैने फोन उसे पकड़ा दिया..

एसपी- यादव ! मामला इतना सीधा नही है, अरुण जो कहता है वो करो, एक एमएलए के लौन्डे को बचाने के लिए हम पूरे शहर की शांति को भंग नही कर सकते..! और जो वो कह रहा है, अगर ऐसी नौबत आ गयी, तो ये एमएलए भी रातों रात अपनी कुर्सी नही बचा पाएगा, फिर कॉन बचाएगा तुम्हें.

इंस्पेक्टर- ठीक है सर… जय हिंद सर…..!

आए हवलदार ! इन गुण्डों को हवालात में डालो जल्दी, क्या साला मुशिबत है, नेता की मानो तो पब्लिक भड़कती है, और पब्लिक की सुनो तो साले नेता हमारी बजाते हैं.

 
फिर हमारे देखते-2 उन सभी गुण्डों को हवालात में डाल दिया गया, उसके बाद फिर मैने इनस्पेक्टर से कहा..

मे- थॅंक यू इनस्पेक्टर साब..! वैसे आपको नही लगता इतना सब करने की नौबत नही आनी चाहिए थी,

इंस्पेक्टर- अरुण साब…! अब वो रेस्पेक्ट देने लगा था, आप नही जानते ये लोकल लीडर हमें कैसे-2 नचाते हैं साले..!

मे- आप जनता के नौकर हैं या इन नेताओं के ? सीधा-2 क्राइम किया है इन लोगों ने, और उसपे आप लोग लीपा पोती करदेने वाले थे..?

जानते हैं, पोलीस की इन्ही नाकामियों की वजह से जनता का भरोसा आप लोगों से उठता जा रहा है. और इसी वजह से इन नेताओं की हिम्मत और बढ़ जाती है,

ज़रा सोचिए, ये क्या उखाड़ पाएँगे आपका..? ज्यदा से ज़्यादा ट्रान्स्फर ही करा सकते हैं ना..! उससे ज़्यादा क्या है इनके पास..?

वो इनस्पेक्टर चुप रह गया, उसने हमारा और लड़कियों का स्टेट्मेंट लिया और रिपोर्ट दर्ज करली उन लड़कों के खिलाफ..

हम अभी निकलने ही वाले थे कि एमएलए अपने कुछ चमचो के साथ थाने में घुसा.. और घुसते ही हाथ जोड़ के हमारे सामने खड़ा हो गया..लग रहा था एसपी ने पूरी तरह समझा बुझा के भेजा होगा..!

एमएलए लड़कियों की ओर मुखातिब होकर- आप सभी मेरी बेटी जैसी हो, मैने जैसे ही सुना कि मेरे बेटे और उसके कुछ आवारा साथियों ने आप लोगो के साथ बदतमीज़ी की है, तो मे फ़ौरन यहाँ चला आया..

मे आप सबको आश्वस्त करता हूँ कि भविष्य में कभी-भी इन लोगों ने आप लोगों के साथ कोई भी बदतमीज़ी करने की कोशिश की तो में इन्हें अपने हाथों से गोली मार दूँगा..! अब आप मेहरबानी करके अपनी कंप्लेंट वापस ले लीजिए..!

वो लड़कियाँ हमारी तरफ देखने लगी..! मे आगे बढ़के बोला- एक मिनट एमएलए साब, अगर आप इतने ही उसूलों के पक्के हैं, तो ये नौबत आई कैसे ?

अगर आप इतना बड़ा कदम अभी उठा सकते हैं, तो पहले इसके गाल पे दो तमाचे रसीद क्यों नही किए? जिससे ये आवारगार्दी, दारू पीके सरेआम लड़कियों की इज़्ज़त पे हाथ डालने का सोचता ही नही..

हमें आप इतना बेवकूफ़ भी मत समझिए, कि आपकी बातों पर आँख बंद करके विस्वास कर लें..!

एमएलए- देखो बेटा हमारी बात समझने की कोशिश करो, हम ये कतई नही चाहेंगे कि हमारा बेटा किसी की इज़्ज़त के साथ खिलवाड़ करे, वो तो बस थोड़ा हमारी पत्नी के लाड-प्यार की वजह से बिगड़ गया है,

लेकिन अब मे उसे आगे कोई ऐसी छूट नही दूँगा, ये मेरा वादा है आप सब से. एक बार मेरी बात मान लो.

मे- ठीक है, हम आपकी बात मान लेते हैं, लेकिन क्या जो आपने अभी कहा है गोली मारने वाली बात उसे लिख कर दे सकते हैं ?

मेरी बात पर एमएलए हड़बड़ा गया…! मुँह फाडे मेरी ओर देखने लगा..! मे फिर बोला क्या सोचने लगे..सर ? मे जानता हूँ, कहने और करने में ज़मीन आसमान का फ़र्क होता है..!

अगर आप लिखके देने को तैयार हैं तो हम अपनी कंप्लेंट इस शर्त पर वापस ले लेंगे कि ये सब इन लड़कियों के पैरों मे पड़के बहन बोलें और माफी माँग लें.

एमएलए कुछ देर सोच में डूबा रहा.. फिर एक फ़ैसला करके बोला- ठीक है, मुझे मंजूर है तुम्हारी शर्त…!

तुरंत हमने एक कोरे काग़ज़ पर उसका लिखित स्टेट्मेंट लिया, सील साइन कराए.

उन सभी लड़कों ने, लड़कियों के पैरों मे पड़के बहन हमें माफ़ करदो बोलके माफी माँगी.

एमएलए अपने लड़के को गुस्से से घूर रहा था,..! फिर उसने हम लोगों के सामने हाथ जोड़कर हमें धन्याबाद करके उन्हें अपने साथ लेकर चला गया.

वो लड़कियाँ बड़ी खुश दिखाई दे रहीं थी, उनकी नज़रों में हमारे प्रति कृीतग्यता और प्रेम के भाव नज़र आ रहे थे.

फिर हम इनस्पेक्टर को भी धन्याबाद करके थाने से बाहर निकल आए..

धनंजय और रोहन तो अपनी सेट्टिंग रास्ते में ही कर चुके थे उनमें से दो के साथ, वाकी की दो कपिल और जगेश को बड़े प्यार से घूर रही थी, वो दोनो भी उन्हें देखे जा रहे थे.

मैने सोचा चलो ये चारों तो लग गये काम पर.. !

थाने से बाहर आकर, मैने उन लड़कियों से पहली बार इंट्रोडक्षन किया, तो पता चला कि वो गर्ल्स कॉलेज मे पढ़ती हैं और वहीं हॉस्टिल में ही रहती हैं, उन्होने अपने-2 नाम बताए और एक दूसरे से हाथ मिलाया, सेट्टिंग वालों ने तो गले मिलके एक दूसरे को विश किया.

लड़कियों से फिर मिलने का वादा करके हमने उन्हें विदा किया और अपने रास्ते हो लिए…..!

दूसरे दिन सुबह-2 शहर के बहू चर्चित अख़बार में मुख्य खबर के रूप में एमएलए के आवारा लौन्डे की करतूत, और साथ में एमएलए द्वारा लिखा गया राज़ीनामा सील साइन वाला लेटर छपा था.

एमएलए ने ये सपने में भी नही सोचा होगा कि कल के लौन्डे ये भी कर सकते हैं, ये करना हमारे इसलिए ज़रूरी था कि नेताओं की बात का कोई भरोसा नही होता है.

वो कभी भी किसी भी तरह से लेटर गायब करवा सकता था, और हमें भी कोई नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर सकता था.

इस खबर के सार्वजनिक हो जाने से उसके हाथ बँध चुके थे, अब वो सीधे तौर पर हमारा कुछ नही उखाड़ सकता था, दूसरा वो जनता की नज़र में भी आ चुका था, अब वो कोई भी ग़लत काम चाह कर भी भविष्य में नही कर पाएगा.

हम लोग फिर अपनी सामान्य दिन चर्या में बिज़ी हो गये, वोही क्लासेस, किताबें, वर्कशॉप साथ-2 में दोस्तों के गर्ल्स हॉस्टिल के चक्कर लगने लगे, अपनी-2 महबूबाओं से मिलना जुलना, डेटिंग.. !

वाकी के दोस्तों ने भी सेट्टिंग कर ली थी, जिसमें उन चार लड़कियों ने उनकी हेल्प की, और वैसे भी हमारे द्वारा की गयी उन लड़कियों की हेल्प की वजह से उस कॉलेज में हमारी एक अच्छी इमेज बन गयी थी.

उस घटना के बाद गर्ल्स कॉलेज की प्रिन्सिपल ने हमें इन्वाइट किया था, तो हम सभी दोस्त अपने प्रिन्सिपल के साथ उनके कॉलेज गये जहाँ उन्होने हमें सभी स्टूडेंट्स की मौजूदगी में सम्मानित किया.

इसी सम्मान समारोह में हमारे प्रिन्सिपल की भी गर्ल्स कॉलेज की हॉट, अधेड़ प्रिन्सिपल से सेट्टिंग हो गयी.

लाइफ अच्छी गुजर रही थी, दिन निकलते जा रहे थे, कोई ज़यादा पंगा अब कम-से-कम हमारे कॉलेज से लेने की सोचता भी नही था, चाहे वो गुंडे हों, प्रशासन हो या नेता, कोई भी हमारे कॉलेज से विना-वजह उलझने की कोशिश नही कर करते थे और दूर ही रहते थे.

 
यहाँ मे एक बात क्लियर करना ज़रूरी समझता हूँ, कि मैने उस कॉलेज की किसी भी लड़की को अपनी तरफ आकर्षित नही होने दिया, एक नही कइयों ने कोशिश भी की लेकिन मैने बड़े प्यार से नो वेकेन्सी वाला बोर्ड अपने उपर लगा लिया था.

एक शाम मेरे दोस्त डेट पर गये थे, में अपने रूम में अकेला था, थोड़ी देर बुक्स पढ़ता रहा, फिर उठके मेस में खाना खाया, और करीब 8- साडे 8 बजे कॅंपस से बाहर रोड पर टहलने निकल पड़ा.

मेरे दिमाग़ में विचारों का आना-जाना लगा हुआ था, काफ़ी दिनों से रिंकी का कोई लेटर नही मिला था, तो मे थोड़ा उदास भी था, मन को कई तरह के विचारों ने घेरा हुआ था.

पता नही क्या हुआ होगा उसके साथ ? लेटर क्यों नही लिखा ? कहीं बीमार तो नही पड़ गयी होगी, जिसकी वजह से लेटर नही लिख पाई हो. ऐसे ही विचारों की आँधी सी चल रही थी मेरे मन में.

टहलते-2 सोच में डूबा हुआ मे कॉलेज से काफ़ी दूर शहर से बाहर की ओर करीब दो किमी निकल आया था, रात का अंधेरा गहराता जा रहा था. रोड के दोनो तरफ घनी झाड़ियाँ थीं, झींगुरों की झींझीनाहट रात के सन्नाटे को चीरती हुई सुनाई दे रही थी बस...!

अचानक एक औरत की चीख मेरे कानों में पड़ी, पहले तो अपनी सोचों के दायरे से बाहर आकर इधर-उधर नज़र डाली लेकिन गहन अंधेरे के अलावा और कुछ नही दिखाई दिया..

1 मिनट के बाद फिर से एक चीख सुनाई दी, अब मे चौकन्ना हो चुका था, और चीख की दिशा में स्वतः ही मेरे कदम मूड गये.

करीब 20-25 कदम झाड़ियों के अंदर जाकर जो नज़ारा मेरी आखों ने देखा वो मेरी आँखों मे खून उतरने के लिए काफ़ी था. जिस बात से मुझे सख़्त नफ़रत थी वोही मेरी आँखों के सामने था.

एक औरत जिसे 4 गुंडे पकड़े हुए थे, एक ने उसका मुँह दबाया हुआ था, दो उसको आजू-बाजू से उसके हाथों को पकड़े थे, और चौथा उसके कपड़े निकालने की कोशिश कर रहा था, वो अबला नारी अपनी पूरी शक्ति से अपने कपड़े उतारने से रोकने की भरसक कोशिश में लगी थी,

बीच-2 में जब उसके मुँह पर उस गुंडे की पकड़ ढीली पड़ती तो चीख पड़ती मदद की आशा में.

मे उनसे 5-6 कदम पहले ही खड़ा हो गया और गुर्राते हुए बोला - आए..! छोड़ो उसे,

जो गुंडा उसकी साड़ी को पकड़े हुए था, घूम कर मुझे खा जाने वाली नज़रों से घूरते हुए बोला… आए कोन है तू..? भाग जा यहाँ से.. क्यों मरने आया है यहाँ..?

मे- चला जाउन्गा.. पहले तुम लोग उस औरत को छोड़ो..

गुंडा- तू कॉन होता है हमें ऑर्डर देने वाला.. जा यहाँ से वरना खम्खा मारा जाएगा, और उसने एक रामपुरी चाकू निकाल लिया.

मे अपनी आँखें उसके चाकू वाले हाथ पे जमाए हुए एक कदम बढ़ाते हुए बोला- अब ये तो आनेवाला वक़्त ही बताएगा प्यारे, कॉन मरता है और कॉन नही.

उनकी हालत बता रही थी वो चारों नशे में हैं, मुझे आगे बढ़ते हुए देख वो हड़वाड़ाया और हाथ उठा कर एक चाकू का वार मुझ पे किया,

उसका हाथ मैने हवा में ही पकड़ के उसकी कलाई को मरोड़ दिया, जिससे उसका चाकू हाथ से छूट गया जिसे मैने दूसरे हाथ में ले लिया.

पता नही क्यों आज मेरी आँखों में कुछ ज़्यादा ही गुस्सा था, मैने उस गुंडे का उल्टे हाथ से गला पकड़ा और दाँत भीचते हुए पूरा का पूरा चाकू उसकी आंतडियों में उतार दिया, और एक राउंड चाकू को उसके पेट में घुमाके पीछे को धक्का देदिया, चाकू बाहर निकलते ही उसके पेट से भल्भला कर खून बाहर आने लगा. वो वहीं पड़ा-2 तड़पने लगा और थोड़ी देर में शांत पड़ गया.

उसके साथियों ने जैसे ही ये सीन देखा, उनकी आँखें गुस्से में जलने लगी, नशा हिरण हो गया उन तीनों का.

जो उस औरत का मुँह पकड़े था उसने पिस्टल निकाली और दूसरे दोनो ने उसे छोड़के अपने-2 छुरे निकाल लिए, अब वो तीन तरफ से मुझ पर हमला करने वाले थे.

पिस्टल वाला दाँत पीसते हुए- हरामज़ादे कुत्ते, तूने इसे मार डाला..? साले अब तू जिंदा नही बचेगा.. और उसने फाइयर कर दिया, मेरी नज़र उसकी उंगली पर ही थी

जैसे ही उसने फाइयर किया, मे साइड में हट गया और साथ ही एक कराट दूसरे चाकू वाले की गर्दन पर मारी..

एक साथ दो काम हुए, एक तो फाइयर की आवाज़ से उस औरत की चीख निकली, दूसरी उस आदमी की गर्दन की हड्डी टूटी और वो मरने वाले भैंसे की तरह डकार मारता हुआ, गिर पड़ा.

पिस्टल वाला भौचक्का रह गया, एक तो उसका वार खाली गया दूसरा उसका एक और साथी घायल हो गया, उन दोनो का गुस्से में मानसिक संतुलन खो गया और वो मेरी ओर झपट पड़े.. मैने फुर्ती दिखाते हुए अपनी टाँग चलाई और एक किक उस पिस्टल वाले के हाथ में लगी, उसकी पिस्टल हाथ से छूट कर कहीं अंधेरे में खो गयी,

 
उधर चाकू वाले ने जैसे ही मुझे चाकू मारने की कोशिश की मैने उसका चाकू फल से पकड़ के झटका दिया, अब चाकू मेरे हाथ में था, लेकिन इस दौरान मेरा हाथ घायल हो गया और उसमें से खून बहने लगा.

किसको परवाह थी इस घाव की, मैने देर ना करते हुए बिजली की तेज़ी से घूमते हुए उन दोनो की गर्दन पर चाकू का वार किया, दोनो की गले की नसें कट गयी और वो धडाम से ज़मीन पर गिर पड़े…

जिसकी गर्दन की हड्डी टूटी थी, वो अपनी पूरी चेतना समेट कर झाड़ियों की तरफ भागा और उनमें गायब हो गया, मैने भी उसे ढूँढने की कोई कोशिश नही की.

मेरे हाथ से लगातार खून बह रहा था, वो औरत तो मुँह बाए हमारी लड़ाई में खोई थी, जब वो बचा हुआ गुंडा भी भाग गया, तब उसे होश आया और

मेरे हाथ से खून बहता देख कर मेरी तरफ लपकी, आनन-फानन में उसने अपनी साड़ी की किनारी फाडी और मेरे हाथ पर बांधने लगी.

जब वो साड़ी का टुकड़ा मेरे हाथ पर बाँध रही थी तब मेरी नज़र उस पर पड़ी और मैने उसे गौर से देखा, अंधेरे के कारण सही से तो नही देख पाया पर फिर भी मुझे साड़ी में सुंदर सी लगी.

हम दोनो झाड़ियों से निकल कर बाहर सड़क पर आ गये और शहर की ओर बढ़ने लगे, चलते-2 मैने उससे सवाल किया…!

मे- कॉन थे ये लोग..? और आप यहाँ कैसे पहुँची..?

वो- मे बाज़ार से लौट रही थी, इनमें से एक ऑटो रिक्शे वाला था उसके रिक्शे में बैठी थी, जैसे ही बाज़ार की भीड़ भाड़ कम हुई, उसने रिक्शे की स्पीड तेज कर दी, मैने बोला भी कि भैया इतना तेज क्यों चला रहे हो, आराम से चलो, तो वो बोला- मेम साब मुझे कहीं जल्दी पहुँचना है सो मे जल्दी से आपको पहुँचा कर चला जाउन्गा.

पर जैसे ही मेरे घर जाने वाला मोड निकला, ये नही मुड़ा और सीधा इधर तेज़ी से रिक्शा भगा लाया, और यहाँ अपने साथियों के पास ले आया मुझे, जो शायद इनका पहले से प्लान रहा होगा...!

चलते-2 हम शहर के नज़दीक आ गये और स्ट्रीट लाइट की रोशनी हम पर पड़ना शुरू हो गयी..

हम दोनो एक दूसरे के साथ-2 ही चल रहे थे, रोशनी में आकर मैने उसपर गौर किया..! वो एक लगभग 30 साल की भरे हुए मांसल बदन की गोरी-चिट्टी 5’6” लंबी एक सुंदर सी औरत थी जो देखने में ही किसी अच्छे घर से लग रही थी,

36” का आगे को उभरा हुआ सीना, पतला पेट, 38 की उसकी गोल-2 गान्ड जो सलीके से पहनी हुई साड़ी में थिरक रही ही, मेने थोड़ा सा पीछे रह कर उसके मटकते कुल्हों को देखा तो लगा जैसे वो दोनो एक तरह से कॉंपिटेशन कर रहे हों, कि मे बड़ा कि तू.

मे- हॅम.. ! इफ़ यू डॉन’त माइंड, मे आपको भाभी कह कर बुला सकता हूँ..?

वो- हां..हां क्यों नही..? मुझे अच्छा लगेगा. आप यही बोलिए मुझे..

मे- भाभी ! आपका घर और कितनी दूर है..?

वो- अभी यहाँ से 2 किमी और होगा,

मे- थोड़ा चुटकी लेते हुए..! वैसे भाभी जी उन बेचारे गुण्डों की कोई ग़लती नही थी, आप हो ही इतनी सुंदर की कोई भला मानुस भी अपना ईमान खो दे.

वो- शरमाते हुए तिर्छि नज़र से देखती हुई…! तो आपका भी ईमान डोल रहा है क्या..? मुझे देखकर..!

मे- मेरा डोलता तो मे आपको आपके घर तक छोड़ने क्यों आता..? मैने तो जो सच है वो कहा है बस.

वो- सच ! तो क्या आपको भी मे सुंदर लगी..?

मे कोई साधु सन्यासी तो नही, जो सुंदरता को सुंदर ना कहूँ, सच कहूँ तो आप सुंदर ही नही, काफ़ी सेक्सी और हॉट दिखती हो..मैने कहा.

वो खिल-खिलाकर हंस पड़ी, और हंसते हुए और भी ज़यादा सुंदर दिख रही थी. और फिर बोली.. हॉट..! और में..?

मे- हां काफ़ी हॉट..! वैसे अभी तक आपने बताया नही अपने बारे में.

वो- मेरा नाम रति है, मेरे पति आलोक वर्मा, मैं मार्केट में गारमेंट का शोरुम चलाते हैं, हमारी शादी 6 साल पहले हुई थी.

शुरू-2 में तो हम अपने सास-ससुर और देवर के साथ ही रहते थे, फिर आलोक ने यहाँ नयी कॉलोने में बांग्ला ले लिया और एक साल पहले ही शिफ्ट हुए हैं. फिर कुछ रुक कर बोली- आप भी तो बताओ अपने बारे में कुछ..

मे- मेरा कोई लंबा चौड़ा इंट्रो नही है, मेरा नाम अरुण शर्मा है, मेसी में थर्ड एअर का स्टूडेंट हूँ, हॉस्टिल में ही रहता हूँ बस इतनी सी पहचान है मेरी फिलहाल.

वो- घर ! घर कहाँ है आपका और कॉन-2 हैं वहाँ..?

मे- घर मेरा **** डिस्ट्रीक में पड़ता है, एक छोटा सा गाँव है, सब हैं माँ-पिता जी, बेहन भाई सब हैं, मे सबसे छोटा हूँ अपने घर में.

बातों-2 में पता ही नही चला और उसका घर आ गया. साडे 9 बज चुके थे, मे उसके दरवाजे तक उससे छोड़ के लौटने लगा तो वो ज़िद करके अपने घर के अंदर ले गयी..

आते ही उसने सबसे पहले मेरे हाथ से साड़ी का टुकड़ा खोल कर डेटोल से घाव को सॉफ किया और फिर उसकी ड्रेसिंग कर दी.

घर क्या था..पूरा एक खूबसूरत बड़ा सा बांग्ला था जिसके आगे एक छोटा सा गार्डन और एक कार पार्किंग सब कुछ, अंदर गये तो एक बड़ा सा हॉल उसे एक साइड में बड़ा सा किचेन दिख रहा था, उसके बाजू में वॉशरूम, फिर दो बड़े-2 से कमरे दोनो में अटॅच्ड बाथ रूम...

हॉल से ही गोलाई लेती हुई सीडीयाँ फर्स्ट फ्लोर को, उपर भी शायद तीन तो कमरे होने चाहिए. कुल मिलाकर, एक मीडियम फॅमिली लायक पूरी सुख सुखसुविधाओ युक्त, एक खूबसूरत घर था उसका.

मे- काफ़ी बड़ा और सुंदर घर है आपका, कितने लोग रहते हैं यहाँ..?

वो- मे और मेरे पति.. बस हम दो ही लोग हैं अभीतक..

मे- बच्चे नही हैं आपके..?

वो थोड़ी मायूस सी दिखी, मैने बात संभालते हुए कहा.. ओह्ह्ह मतलब फॅमिली प्लॅनिंग चल रही है अभी..

वो- नही ऐसी हमने अभी तक कोई प्लानिंग नही की, बस हुए ही नही अभी तक.

वो मुझे हॉल में पड़े एक बड़े से सोफे पर बिठा कर मेरे लिए किचेन से कुछ लाने चली गयी, मे इधर-उधर नज़र दौड़कर हॉल की भव्यता को देखने लगा.

 
थोड़ी ही देर में वो दो ग्लास में आपल जूस और कुछ स्नेक्क्स ले आई, और मेरे सामने झुक कर सेंटर टेबल पर रखा, झुकने के कारण उसका आँचल धलक गया तो उसके गोल-2 सुडौल खरबूजे और उनके बीच की गहरी खाई नुमाया हो गयी,

वाह ! क्या खजाना छुपा रखा था उसने टाइट ब्लाउस के अंदर ? मेरी नज़र वहीं जम गयी.

जब उसने मेरी नज़रों का पीछा किया तो शरमा कर अपना पल्लू संभाल कर खड़ी हो गयी और फिर मेरे बाजू में सोफे पर बैठ कर हम दोनो जूस शिप करने लगे.

उसने स्नेक्क्स की प्लेट उठा कर ऑफर की, तो मैने एक दो पीस उसमें से उठा लिए..

थोड़ी देर इधर उधर की बातें की, उसने मुझे डिन्नर के लिए पुछा, मैने मना कर दिया कि मे मेस में ख़ाके आया था.

जब मे चलने के लिए सोफे से उठा, तो पीछे से उसने मुझे अपनी बाहों में जाकड़ लिया, और मेरी पीठ पर अपना गाल रगड़ते हुए भर्राइ हुई से आवाज़ में बोली..

मुझे ऐसे अकेले छोड़ कर ना जाओ अरुण, मुझे तुम्हारी ज़रूरत है….!

मैने बड़े प्यार से उसके दोनो हाथों को पकड़ के अपने सीने से अलग किया और उसको सामने लाकर उसकी आँखों में झाँकते हुए बोला…

अपने आपको संभालिए रतीजी… जो आप चाहती हैं वो संभव नही है..

वो- लर्जति हुई आवाज़ में- पर्रर…क्क्यों..? तुम्हें तो मे अच्छी लगी हूँ ना..!

मे- हर अच्छी चीज़ पर हर एक का हक़ नही होता…! मुझे अब चलना चाहिए रात बहुत हो गयी है, आप भी सो जाइए.. और तेज-2 कदमों से मे उसके बंगले से बाहर निकल आया…

अभी तक मेरे दोस्त डेटिंग से लौटे नही थे, मे कमरे में आकर अपने बिस्तर पर लेट गया, शाम को हुई सारी घटनाओ पर गौर करता रहा, सोचता रहा, कि साला पता नही मेरे साथ ही अक्सर ये सब क्यों होता है ?

एक तो साला आदत इतनी खराब, कि किसी के साथ ज़्याददती होते सहन नही होती, उपर से मुझे ही क्यों मिलता है ये सब होते हुए ? क्या मेरी नियती ही है ये..?

सोचते-2 पता नही कब नींद लग गयी, कब वो लोग लौटे. सुबह जब जिम से लौट रहा था तब वो लोग जिम जा रहे थे, मैने कहा क्यों भाई लोग कल तो खूब मस्ती की..क्यों ? कहाँ तक पहुँचा मामला ? किसी का गेम-वेम बजाया की नही..?

कपिल हंसते हुए.. हां यार मस्ती तो की, सिर्फ़ प्रॅक्टीस ही हो पा रही है, अभी फाइनल मॅच नही हो पा रहा..

मे- क्यों..? कोई दिक्कत है क्या..?

रोहन – अरे यार मॅच तो तब हो ना जब कोई ग्राउंड मिले खेलने लायक.. सब नये खिलाड़ी हैं, फाउल वाउल हो गया तो परेशानी में पड़ जाएँगे.. और सब ठहाका मार कर हँसने लगे..!

फिर वो सब जिम चले गये और मे रूम पर आकर कॉलेज के लिए तैयार होने लगा.

लेक्चर अटेंड करने के बाद हम चारों अपने रूम में पहुँचे ही थे, मे एक शॉर्ट और स्पोर्ट्स बनियान में बैठा था, वाकी भी ऐसे ही उन फॉर्मल कपड़ों में ही थे. मेस में लंच के लिए जाने ही वाले थे की गेट पर दस्तक हुई…!

मेरी नज़र खुले गेट पर गयी.. देखा तो एक छोटे से कद का व्यक्ति कोई 5’3” की हाइट का थोड़ा भारी शरीर का आवरेज स्किन कलर, गोल भारी चेहरा, 3/4 ही खोपड़ी पर बाल बचे होंगे खड़ा था.

मैने सवालिया नज़रों से उससे देखा, वाकी दोस्तों की नज़र भी उसपर पड़ चुकी थी.

वो- अरुण शर्मा इसी रूम में रहते हैं…?

मे- हां ! मे ही अरुण हूँ..! कहिए क्या सहायता कर सकता हूँ आपकी..?

तब तक एक लेडी सिल्क की साड़ी पहने नुमाया हुई दरवाजे में उसके पीछे से निकल कर..! मे चोंक गया, और बोला.. अरे रीति जी आप..? और यहाँ..?

आइए… आइए… कैसे आना हुआ…? वो एक टक मेरे कसरती शरीर पर नज़र गढ़ाए देखे ही जा रही थी…! जब मैने दुबारा उससे पुकारा.. अरे भाभिजी कहाँ खो गयीं.. तब वो हड़बड़ा गई और बोली.. व वो.. हम तुमें लेने आए हैं.

मे- मुझे लेने आए है..? कहाँ जाने के लिए..?

वो- अरे.. चलिए तो सही..! अब कोई सवाल नही, उठिए बस..

मे- अच्छा ठीक है, आप दो मिनट रुकिये मे कपड़े पहन कर आता हूँ.

वो- ठीक हम बाहर गाड़ी में बैठे हैं, आप जल्दी से तैयार होकर आइए.

मैने अपने कपड़े पहने, मेरे दोस्त कुछ समझ ही नही पा रहे थे कि आख़िर माजरा क्या है, आख़िर ऋषभ बोल ही पड़ा..

अरे भाई, कॉन है ये मेनका..? और कहाँ ले जाना चाहती है तुझे..? क्या-2 गुल खिला रखे हैं तूने..? कुछ हमें भी तो बता दिया कर भाई..?

मे- अरे कुछ नही यार, अभी देर हो रही है, आके सब बताता हूँ, बाइ.. और मे निकल गया रूम से.

मे और रति पीछे की सीट पर थे, आलोक गाड़ी ड्राइव कर रहा था.

रास्ते में आलोक बॅक मिरर से मेरी ओर देखकर बोला- रति ने कल शाम की घटना मुझे बता दी है, सच में अरुण तुमने हम लोगों को बिन मोल खरीद लिया है भाई.. ! हम तुम्हारा ये अहसान कैसे चुका पाएँगे..?

तुमने मेरी पत्नी की इज़्ज़त बचा कर बहुत बड़ा उपकार किया है हम पर.

मे- अरे भाई साब ! थम्बा ! और कितना छोटा बनाएँगे मुझे..?

मैने आपके उपर कोई अहसान नही किया है..? जिसे आप चुकाने की बात कर रहे हैं, ये सब परिस्थियाँ बन जाया करती हैं. मैने तो बस वही किया जो उस समय मुझे उचित लगा.

 
रति मेरे हाथ को अपने हाथों में लेकर बोली – ये आपका बड़प्पन है अरुण, वरना लोग तो देख कर भी अनदेखा कर के निकल जाते हैं, कोई आम इंसान क्यों अपनी जान-जोखिम में डालेगा किसी और के लिए, आपने तो उन चार-चार हथियारों से लेस गुण्डों से मुझे बचाया और उन्हें मार डाला. क्या ये साधारण सी बात है..?

आलोक- हमें पोलीस को इनफॉर्म कर देना चाहिए..!

मे- भूल कर भी इस घटना का जिकर किसी से मत करना यहाँ तक कि अपने परिवार में भी, बैठे बिठाए मुशिबत मोल लेने वाली बात होगी ये.

रति- मे भी इन्हें वही समझा रही थी. लेकिन ये रट लगाए हुए थे.

इतने में उनका घर आगया, आलोक और रति ने मुझे सर आँखों पे बिठा लिया था, उन्हें लग रहा था जैसे भगवान उनके घर आए हों और वो उनको नाराज़ नही करना चाहते.

मैने उन्हें कई बार बोला, कि इतना फॉर्मल होने की ज़रूरत नही है, मुझे आप अपना छोटा भाई समझिए तो ये सुनकर उनकी आँखें छलक आईं और आलोक मेरे गले लगकर फफक-2 कर रो पड़ा..! तुम मेरे लिए भगवान का रूप हो मेरे भाई..!

मैने उसे जैसे तैसे समझा-बुझा कर शांत किया, आँखें रति की भी भरी हुई थी जिनमें आँसुओं के साथ-2 चाहत सॉफ-सॉफ झलक रही थी, जिससे मे बचना चाहता था.

रति ने अच्छे से होटेल से खाना मंगवा रखा था, तो हम तीनों ने मिलकर खाना खाया, और फिर थोड़ी देर बात-चीत करने के बाद आलोक बोला- तुम लोग बैठो बात-चीत करो, मुझे थोड़ा अर्जेंट काम है तो मे चलता हूँ.

मे बोला मे भी अब चलता हूँ, लंच के लिए शुक्रिया, तो रति आलोक की तरफ देखने लगी..!

आलोक नही अरुण आज का डिन्नर भी हमारे साथ ही करोगे, देखो भाई थोड़ा हमें भी सेवा का मौका दो प्लीज़..! तुम्हें अपने यहाँ देख कर हमें ऐसा लगा कि कोई हमारा अपना हमारे साथ है.

मे- ऐसी कोई बात नही है भाई साब, आप लोग जब भी बुलाएँगे मे हाज़िर हो जवँगा, अभी चलने दो थोड़ा आज के लेक्चर का रिविषन भी करना है.

रति अपनी आँखों में आँसू लाते हुए रुँधे स्वर में बोली- जाने दो आलोक इन्हें, शायद हम ही इतने बदनसीब हैं कि किसी को अपना कह सकें.

आँसू एक औरत का आख़िरी और अचूक अस्त्र होता है किसी भी मर्द को हथियार डालने पर मजबूर करने के लिए.. “एमोशनल अत्याचार”.

मैने भी हथियार डाल दिए- आप ऐसा ना कहिए भाभी जी, ठीक है मे आज शाम तक रुकता हूँ, और डिन्नर करके ही जाउन्गा, अब तो खुश.

वो दोनो खुश हो गये ये सुन कर, आलोक अपने काम पर चला गया, रह गये हम दोनो अकेले घर में,

मे जिस बात को टालना चाहता था, वो टल नही पाई, अब पता नही क्या क्या महाभारत होना था मेरे साथ..? मैने अपने मन में सोचा.

क्योंकि सामने कोई आम योद्धा नही था, जिससे लड़ा जा सके, एक हस्तिनी वर्न की यौवन से भरपूर औरत थी जो ना जाने कब्से प्यासी कुए का इंतज़ार कर रही थी.

और आज जब वो कुआँ उसके पास खुद चल कर आ गया है, तो कुछ बाल्टी पानी तो लेकर ही मानेगी.

वो अपने नाम के अनुरूप सच में रति का ही स्वरूप थी जो किसी भी मर्द के सोए हुए कामदेव को जगाने में सक्षम थी. और उपर से ना जाने कबे से प्यासी थी, जिसका पति सिर्फ़ आग लगा पाता था, बुझा कभी शायद ही पाया हो…!

आलोक के जाने के बाद रति बोली चलो अरुण अभी-2 खाना खाया है तो थोड़ी देर आराम कर्लो और मुझे लेकर वो अपने बेडरूम में आ गई.

मे अभी बेड के पास खड़ा ही हुआ था कि वो मेरी पीठ से चिपक गयी और मुझे अपनी मांसल बाहों में कस लिया..!

मे- अरे भाभी जी क्या कर रही हो ? देखो ये ठीक नही है, मैने आपकी इज़्ज़त बचाई है, तो इसका मतलब ये नही है कि मुझे आपसे उसके बदले में कुछ चाहिए, प्लीज़ छोड़िए मुझे और आराम करने दीजिए वरना मे चला अपने हॉस्टिल.

रति- अरुण प्लीज़ ! मे ये कोई अहसान चुकाने के लिए नही कर रही, मुझे तो तुम्हारा एक और अहसान चाहिए.. प्लीज़ करोगे मुझ पर एक और अहसान..?

मे- बोलिए क्या चाहिए मुझसे आपको..?

रति- मे माँ बनना चाहती हूँ..! क्या दोगे मुझे माँ बनने का सुख..?

मे- उसके लिए तो आपके पति हैं ना.. मे कैसे..ये..सब..?

रति- मेरे पति इस काबिल नही हैं कि वो मुझे ये सुख दे सकें..!

मे- क्या..? क्या उनमें सेक्स क्षमता नही है..?

रति- नही ऐसी बात नही है, शुरू-2 में वो सेक्स को बहुत एंजाय करते थे, कुछ सालों तक हमने काफ़ी एंजाय किया लेकिन कुछ सालों के बाद भी मे माँ नही बन सकी तो इनके पेरेंट्स इसके लिए मुझे दोषी समझने लगे और मेरे उपर दबाब डालने लगे.

लेकिन ना जाने कैसे आलोक को अपनी कमी का पता चल गया और वो दुखी रहने लगे, माँ-बाप के तानों से बचने के लिए ही हमने ये घर लिया और अलग रहने आगये.

अब तो उन्होने अपने आपको बिज़्नेस में इतना डूबा लिया है कि मेरी इच्छाओ को भी नज़र अंदाज करने लगे हैं.

मे- तो फिर मे ही क्यों..? उनका अपना भाई भी तो है या और कोई…!

रति – तुम नही समझोगे अरुण ! एक औरत अपना शरीर जो उसकी पूंजी होता है, यूँ ही हर किसी को नही सौंप देती, जो उसके दिल में बस जाए वो उसी को देती है ये सौगात.

मैने आज तक आलोक के सिवाय किसी के लिए भी वो भावनाएँ अपने दिल में महसूस नही की थी.

लेकिन कल जब तुमने ना मेरी इज़्ज़त बचाई बल्कि एक अंजान औरत के लिए अपनी जान जोखिम में डाल कर उन बदमाशों को उनके अंजाम तक पहुँचा दिया.

तबसे मेरे दिल में तुम्हारे लिए जो इज़्ज़त, जो भावना पैदा हुई है वो अभी तक मेरे अपने पति के प्रति भी कभी नही हुई.

तुम्हारे द्वारा कल मुझे यूँ ठुकरा के चले जाने के बाद तो और भी जयदा इज़्ज़त बढ़ गयी तुम्हारे लिए मेरे दिल में.

मैने सच्चे दिल से आलोक को अपनी भावनाओं के बारे में सब सच-2 बताया तो उसने भी मेरी भावनाओं को उचित ठहराते हुए तुमसे रीलेशन बनाने को कहा, इसलिए तो हम दोनो तुम्हें लेने तुम्हारे हॉस्टिल गये, क्योंकि मुझे पता था कि अगर मे अकेली तुम्हें लेने जाती तो शायद तुम नही आते.

 
मेरा मुँह खुला का खुला रह गया उसकी बातें सुन कर, मुझे विस्वास नही हो रहा था कि कोई पति अपनी पत्नी को किसी और की बाहों में जाने के लिए कह सकता है.

मे ये भी नही चाहूँगी कि तुम मुझसे अपनी मर्ज़ी के खिलाफ जाकर समबंध बनाओ, बस मेरी ये इलतज़ा है कि मे तुम्हारे जैसे सच्चे और नेक दिल इंसान के बच्चे को जन्म दूं. अगर तुम्हारा दिल इस बात के लिए राज़ी नही है तो कोई बात नही मे तुम्हारी यादों के सहारे जिंदगी बसर कर लूँगी,

जैसे अबतक जीती आ रही हूँ आगे भी जी लूँगी और ये बोलते-2 उसकी रुलाई फुट पड़ी.

मैने पलट के उसके रसीले होठों को चूम लिया और उसकी बड़ी-2 काली आँखों से छल्के आँसुओं को अपने लवो में जप्त कर लिया.

उसकी झील सी गहरी आँखों में मैने अपने लिए एक श्रद्धा का भाव देखा, जो एक भक्त का अपने भगवान के प्रति होता है.

मे- क्या सचमुच तुम मुझे चाहने लगी हो..? या सिर्फ़ एक बच्चे की चाह मेरी ओर ले आई है तुम्हें..

रति- मेरी आँखों में देख कर पता लगा लो की मेरे दिल में क्या है ? शायद तुम्हें सच दिखाई दे जाए..? मेरी बातों का विस्वास क्यों करते हो?

दिल की बातें तो आँखों के ज़रिए ही पढ़ी जा सकती हैं. है ना अरुण..! वो भावुकता में बहती चली गयी.

मे तो कल से ही उसकी तरफ आकर्षित हो चुका था, लेकिन नही चाहता था कि कल को कोई मुझ पर या उसके चरित्र पर उंगली उठाए इसलिए ये करना भी ज़रूरी था.

मे कितनी देर तक उसकी हिरनी जैसी आँखों की गहराई में डूबा रहा.. क्या दिखा तुम्हें इन में…? उसने पुछा तो मुझे होश आया..!

आय्ीन्न.. हां ! मुझे बहुत कुछ दिखा तुम्हारे इन मद भरे प्यालों में, एक बार तो डूब ही गया था, बड़ी मुश्किल से बाहर आ पाया हूँ. मुस्कराते हुए जबाब दिया मैने.

रति- तो फिर बताओ ना क्या दिखा..? अरुण तुम्हें मेरी बताओं पर विस्वास हो या ना हो पर मे तुम्हें अपने दिल ही दिल में पूजने लगी हूँ, एक देवता की तरह. मुझे स्वीकार कर्लो मेरे देव.. प्लीज़..! इस पुजारन की पूजा कबूल कर लो.. और कहते-2 छलक पड़ी उसकी आँखें.

मैने अपनी हथेलियों से उसकी आँखों से छल्के पानी को सॉफ किया और बोला… अब बस करो रति, मत रो प्रिय, मे भी कल से ही तुम्हें पसंद करने लगा था,… हां मे सच कह रहा हूँ जान, लेकिन डरता था कि कहीं तुम रुसबा ना हो जाओ मेरी वजह से, इसलिए दूर भागने की कोशिश कर रहा था.. लेकिन भाग ना सका.

रति- सच..! तुम सच कह रहे हो..?

और बुरी तरह लिपट गयी मेरे सीने से वो..! उसके 36 साइज़ के बूब्स और उनके नुकीले निपल मेरी छाती में चुभने लगे, मानो सज़ा देना चाहते हों मुझे कि साले बहुत तरसाया है हमें अब देख तेरी खैर नही.

मैने रति के मासूम भोले भले चेहरे को अपने हाथों में भरके उपर किया और अपने सूखे और भूखे होंठ उसके रसीले होठों पर जमा दिए, वो तो जैसे इसी बात का इंतजार कर रही थी कि टूट ही पड़ी मेरे होठों पर,

वो मेरे नीचे के होठ को चूसने लगी, मैने भी उसके उपर के होंठ पर कब्जा कर लिया, फिर ना जाने कब हमारी जीभ एक दूसरे से कबड्डी खेलने लगी.

जो भी हो रहा था वो जैसे स्वचालित था, हमरे शरीर की स्टारिंग अब हमारे दिलों के हाथ में थी हम तो सिर्फ़ एक माध्यम बन कर रह गये थे.

मेरे हाथ उसके खरबूजों का जायज़ा ले रहे थे और देख रहे थे कि ये पके हैं या अभी समय है. ना जाने कब उसका ब्लाउस उतर गया पता ही नही चला.

उसकी कसी हुई ब्रा में क़ैद कबूतर फड़फड़ाने को व्याकुल हो रहे थे, चोंच उठा कर उसे फाड़ डालने की कोशिश कर रहे थे, जब मुझसे उनकी ये दशा देखी नही गयी तो मैने रति के कान में फुसफुसा कर कहा.

जान.. ! इन कबूतरों पर अब और ज़ुल्म ना करो प्रिय.. ! तो वो मेरे कंधे पर दाँत गढ़ाते हुए बोली… तो आज़ाद क्यों नही कर देते बेचारों को…दुआएँ देंगे आपको.

उसकी गर्दन चूमते हुए मैने हाथ पीछे ले जाकर उसकी ब्रा के हुक खोल दिए, सच में उन कबूतरों ने उस ब्रा को दूर उछाल दिया मानो उनमें स्प्रिंग लगे हों.

उसकी एवरेस्ट की चोटियों को देख कर मेरी आँखें चुन्धिया गयी… क्या बूब्स थे..? आज से पहले मैने कभी इतने सुडौल चुचियाँ नही देखी थी, एक दम सतर, उपर से उत्तेजना के मारे उसके निपल एकदम कड़े हो गये थे..

अब मुझसे सब्र नही हुआ इतने सुडौल वक्ष देख कर, मसल ही डाला पूरे जोश के साथ हाथों में भरके…!

आआययययीीईई…. मारररर… गाइिईई… धीररीए.. सीईयाअहह… उखाड़ ही डालॉगीए.. इनकूओ… आअहह….प्लस्सस्स.... आर्रामम्म सी… तुमहरे लिईए…ही हैन्न… प्याररर..सीए…कार्र्रूऊ….ऊऊओउउच…म्माआ… ससिईई….इतने जालिम्म… नाअ.. बानू..रजाअ…!

उसके निपल को मसल के एक चुचि को मुँह में भर पूरा दम लगाके वॅक्यूम पंप की तरह सक कर दिया…!

 
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