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ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना complete

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उधर जब उस नौजवान ने फोन कट किया तो रुखसाना ने रुआंसे स्वर में उससे पुछा - अब तो बता दो कि तुमने ऐसा क्यों किया..? हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है..?

नौजवान ने उसके रसीले होठों को अपने अंगूठे से रगड़ते हुए कहा - बता दूँगा मेरी जान..! सबर कर ! सब कुछ बता दूँगा..!

अभी वो ये बातें कर ही रहे थे कि तभी दरवाजा खटखटाने की आवाज़ सुनाई दी.

उसने आगे बढ़ कर दरवाजा खोल दिया, सामने वही दोनो खड़े थे, जो अब उस नौजवान के गले मिल रहे थे.

अंदर आकर उन्होने कुछ पॅकेट जो वो बाहर से लेकर आए थे, उन्हें सेंटर टेबल पर रख दिया. और सोफे पर बैठ गये जहाँ वो दोनो पहले से ही बैठे थे.

उनकी बातचीत में अभी तक उन्होने एक दूसरे का नाम नही लिया था, बस संकेतिक शब्दों से ही काम चला रहे थे.

फिर उनमें से एक आदमी एक पॅकेट लेकर स्टोर रूम की ओर चला गया,

वहाँ जाकर उसने उस क़ैद किए हुए आतंकवादी जो अब एकदम ठीक हो चुका था, उसे खोला, और उसको खाना दिया.

उधर उस नौजवान ने भी खाना निकाला, रुखसाना को दिया और खुद भी खाया.

वो थोड़ा नखरे कर रही थी, लेकिन फिर मान गयी, क्योंकि भूखे रहना किसी भी सूरतेहाल में उसके लिए फ़ायदा नही होता.

दूसरे दिन दोपहर के बाद उस नौजवान ने गनी को फोन किया, जब उसने बताया कि वो तैयार है पैसे देने को बोलो कहाँ और कब आना है,

तो उसने जगह का नाम और समय बता दिया और साथ ही साथ हिदायत भी दी कि अगर कोई चालाकी की तो बीवी तो हाथ से जाएगी ही,

वो भी इतना बदनाम हो जाएगा कि कहीं मुँह छुपाने के काबिल नही रहेगा.

शाम साडे 6 बजे, जब सूर्यास्त हो रहा था, वो नौजवान और एक बंदे ने उस क़ैदी के हाथ-पैर बाँधे और मुँह पर एक टेप चिपका कर रुखसाना की बिना नज़र में आए उसे गाड़ी की डिग्गी में डाल दिया,

दूसरे बंदे को रुखसाना पर नज़र रखने को छोड़ कर वो दोनो उसे लेकर निकल गये.

शाम 7 बजे एक काले रंग की स्कॉर्पियो भारोल स्टेशन के पास वाले उजाड़ और टूटे-फुट रोड पर आकर रुकी, अभी उसमें से कोई बाहर नही आया था,

उसमें बैठे गनी को फोन आया और उसको पास के ही बंद पड़े मिल के अंदर गाड़ी लेजाने को कहा,

स्कॉर्पियो फॅक्टरी के टूटे-फूटे गेट के अंदर चली गयी.

फोन पर लगातार इन्स्ट्रक्षन मिल रहे थे, देखते-2 स्कॉर्पियो फॅक्टरी के पीछे की ओर बने लोडिंग कॉंपाउंड में पहुँच गयी और खड़ी हो गयी.

उसमें से गनी भाई एक सूटकेस लेकर उतरा, उसका ड्राइवर गाड़ी में ही रुका रहा,

तभी फोन पर फिर से दहाड़ सुनाई दी कि ड्राइवर को गाड़ी लेकर वापिस भेजो..!

ये सुनकर गनी हड़बड़ा गया, और बोला- फिर मे वापस कैसे जाउन्गा..?

आवाज़ आई- फोन करके बाद में बुला लेना, अभी उसको यहाँ से दूर भेजो.

गनी ने ड्राइवर को जाके कुछ बोला, एक मिनट के बाद ही स्कॉर्पियो वहाँ से चली गयी और उस एरिया से दूर हो गयी.

गनी को इन्स्ट्रक्षन दी कि वो अंदर जाकर वेट करे.

दो मिनट के बाद उसी जगह पर एक सूडान कार आकर रुकी और उसमें से वो नौजवान उतरा, दूसरा बंदा कहाँ गया हमें भी पता नही चला.

उस नौजवान ने गाड़ी की डिग्गी खोली और उस क़ैदी के पैरों की रस्सी खोल कर उसे बाहर निकाला और उसकी बाजू पकड़के घसीटते हुए अंदर ले गया.

गनी इस समय एक हॉल जैसे अहाते में खड़ा था, अंधेरा घिरने लगा था, फिर भी इतनी रोशनी थी कि सब कुछ नंगी आँखों से दिखाई दे रहा था.

गनी को अपने पीछे कुछ आहट सुनाई दी तो वो पलटा, और जैसे ही उसकी नज़र उस आतंकवादी पर पड़ी.. वो उच्छल ही पड़ा..…तूमम्म..!!

उस क़ैदी आतंकवादी के पीछे खड़ा वो नौजवाना बोला- क्यों सत्तार मियाँ .. झटका लगा ना..?

गनी की नज़र पहली बार उस नौजवान पर पड़ी, वो हकलाते हुए बोला - कौन हो तुम…और ये कॉन है..? मेरी बीवी कहाँ है..?

नौजवान - क्यों इसको नही पहचानते..?

गनी - नही मे नही जानता कि ये कॉन है..?

नौजवान - तो इसे देखकर इतना उच्छल क्यों पड़े थे..?

गनी – म.म्मईएनी सोचा था, मेरी बीवी यहाँ होगी… लेकिन उसकी जगह इसको देखा तो वो..चौंक गया बस.. और कुछ नही.

नौजवान - अच्छाअ ! लेकिन ये तो कहता है कि ये तुम्हें अच्छी तरह से जानता है..! और तुम बोल रहे हो, कि इसको नही जानते…इसका मतलब ये झूठ बोल रहा है..? लेकिन क्यों..?

गनी - अब मे क्या जानू, ये क्यों झूठ बोल रहा है..?

नौजवान – फिर तो भी झूठ होगा, कि तुम्हारी रुखसाना बेगम ****** है..?

नौजवान के मुँह से ये शब्द सुनते ही, गनी का मुँह खुला का खुला रह गया.. वो उसे किसी अजूबे की तरह देख रहा था…

नौजवान - जबाब नही दिया तुमने प्यारे..?

फिर तो शायद ये भी झूठ होगा कि ******************************* का सरगना ज़फ़्फरुल्ला ख़ान तुम्हारा साला है..?

और तुमने ही इस बंदे और इसके तीन साथियों को ना केवल पनाह दी, बल्कि इन्हें अपने साथ, *** शहर तक लेकर गये थे, अपने पोलिटिकल कद का सहारा लेकर.

गनी बिल्कुल हक्का-बक्का सा खड़ा रह गया, फिर अचानक उसने अपनी लंबी सी कमीज़ के नीचे से रेवोल्वेर निकाल कर उस नौजवान पर तान दी.

रेवोल्वेर तान कर वो दहाडा - काफ़िर की औलाद, तू मेरे बारे में सब कुछ जान चुका है, अब तेरा जिंदा रहना मेरे लिए सही नही होगा…,

अपनी जान से अज़ीज़ बीवी को तो में बाद में भी ढूँढ लूँगा, लेकिन तेरा जिंदा रहना अब मेरे लिए ठीक नही है, ये कहते हुए उसकी उंगली ट्रिग्गर पर कसने लगी.

पित्त्तत्त…एक हल्की सी आवाज़ हुई और गनी की रेवोल्वेर ज़मीन पर जा गिरी, वो अपने घायल हाथ को पकड़ कर वहाँ से भागने के लिए एक तरफ को लपका ही था,

कि एक बार फिर से पित्त्तत्त… की आवाज़ हुई और एक गोली उसकी जाँघ में घुस गयी, वो ज़मीन पर बैठ कर दर्द से तड़पने लगा.

दरअसल हुआ यूँ कि गनी जैसे ही ट्रिग्गर दवाने वाला था, कि वो दूसरा बंदा जो इन पर नज़र रखे हुए था उसने साइलेनसर युक्त रेवोल्वेर से उसके हाथ पर गोली चला दी.

नतीजा अब सत्तार मियाँ उनकी गिरफ़्त में थे.

वो नौजवान जो कोई और नही एनएसएसई एजेंट अरुण था, गनी को अपने कब्ज़े में लेने के लिए उसकी ओर बढ़ा,

मौके का लाभ उठाते हुए वो क़ैदी आतंकवादी वहाँ से खिसकने की फिराक़ में चुप-चाप पीछे वाले गेट की ओर खिसकने लगा,

तभी एक गोली और चली और सीधी उसकी खोपड़ी में सुराख बना गयी, वो वही ढेर हो गया, सेकेंड के सौवे हिस्से में ही उसकी आत्मा एश्वरपूरी की शैर पर जा चुकी थी.

गनी की मस्क कस्के उन्दोनो ने गाड़ी की डिग्गी में डाला और 20 मिनट के अंदर वो फार्म हाउस में थे.

अब मियाँ बीवी दोनो आमने-सामने थे, फ़र्क इतना था, कि बीवी आज़ाद थी और मियाँ जी बँधे पड़े थे.

रास्ते में आते-2 उन्होने पोलीस को इनफॉर्म करके बता दिया कि चौथा आतंकवादी कहाँ पड़ा है,

जब पोलीस द्वारा बताने वाले का नाम पुचछा गया तो जबाब मिला, कि आम खाओ, पेड़ गिनने के चक्कर में मत पडो.

वैसे भी पोलीस को इस मामले में अपनी ज़्यादा नाक ना घुसेड़ने की खास हिदायत दी गयी थी,

पोलीस ने उसकी बॉडी बताए गये स्थान से प्राप्त कर ली थी………….

 
उधर ******* में ज़फ़्फरुल्ला ख़ान को न्यूज़ के माध्यम से जब ये पता चला कि उसका ये मिसन फैल हो चुका है,

तभी से वो गनी और रुखसाना पर भड़का हुआ था, जो कि भारत में उसके इस मिसन के कमॅंडर के तौर पर नियुक्त किए गये थे.

ऐसा नही था कि गनी और रुखसाना ने ये जानने की कोशिश नही की थी, कि उनके इस मिसन की माँ चोदने वाला कॉन है,

पर जब पूरे डिविषन की पोलीस मिल कर सर खपाने के बाद भी उसमें से झांट का बाल नही खोज पाई थी, तो उनके लिए तो ये दूर की कौड़ी ही साबित होनी थी.

लेकिन अब गनी भाई और रुखसाना को कोई कन्फ्यूषन नही था कि उनके उस मिसन की किसने माँ चोदि है,

फिर भी उनको अभी तक ये नही पता चला था, कि इन लोगों का भारत सरकार की किस संस्था से संबंध हैं.

वो ये तो अच्छी तरह से समझ चुके थे कि ये लोग कोई मामूली लोग नही हैं.

और न्यूज़ के मुतविक वो ये जान ही चुके थे, कि जिस एक बंदे ने गोलियों की बौछार के बीच घुसकर उनके 4-4 ट्रेंड और ख़ूँख़ार आतकियों को अंजाम तक पहुँचा दिया, वो तो मामूली हो ही नही सकते.

बावजूद इसके की रुखसाना ने इस नौजवान से शारीरिक संबंध बनाए हैं और वो लोग उसकी वजह से ही फँस गये हैं,

फिर भी वो रुखसाना को कुछ नही कह पाया क्योंकि उसका भाई एक दुर्दांत आतंकी संगठन का सरगना था, जो गनी जैसे ना जाने कितने गुर्गों को अपनी जेब में रखता है.

वो तो हिन्दुस्तान में अपना एक नेटवर्क बनाने की गर्ज से अपनी बेहन का निकाह गनी से करने को तैयार हुआ था, क्योंकि यहाँ गनी का रूतवा भी कोई गेर्ममूली नही था.

इधर फार्म हाउस पर इन लोगों ने अब रुखसाना को भी बाँध दिया था, क्योंकि थी तो साली आतंकवादी ही ना, और वो भी एक ख़तरनाक आतंकी की बहन, कहीं मौका पा कर भाग खड़ी हुई तो खमखाँ मेहनत करनी पड़ेगी.

अरुण के दो साथी जिसमें से एक एजेंट 726 नाम विक्रम राठौड़, और दूसरा एजेंट 782 नाम रणवीर सिंग तोमर,

दोनो ही उससे सीनियर थे, जो कि उसकी डिमॅंड पर उसकी हेल्प के लिए भेजे गये थे.

चूँकि मिसन अरुण का था सो कमॅंड उसी की चलनी थी.

वो दोनो शौहर बीवी अभी भी हॉल में ही बँधे पड़े थे,

रणवीर कुछ ज़रूरत के सामान के लिए शहर चला गया था.

विक्रम और अरुण बस एक दूसरे से अपने घर परिवार की बातें कर रहे थे कि तभी गनी की जेब में पड़ा उसका स्पेशल सेल फोन जो वो ओवरसीस कॉल के लिए यूज़ करता था वाइब्रट होने लगा,

गनी फोन के बाइब्रेशन से चोंक गया और अपनी जेब की तरफ देखने लगा.

अरुण ने सेल फोन की आवाज़ तो नही सुनी लेकिन उसकी लाइट उसके कपड़े में से चमकने लगी और उसने फ़ौरन उसकी जेब से उसे निकाल लिया,

जब उसने मोबाइल की स्क्रीन पर फ्लश हो रहे नंबर को देखा तो फ़ौरन ताड़ गया कि ये कॉल ******* से है.

उसने कॉल पिक की और उसके मुँह से जो आवाज़ निकली उसे सुनकर गनी और रुखसाना समेत विक्रम भी चोंक पड़ा.

अरुण के मुँह से हूबहू गनी की आवाज़ निकल रही थी वो उसकी आवाज़ में ही बोला-

हेलो भाई.. . में इंडिया से गनी भाई बोल रहा हूँ … सलाम वलेकुम.

उधर से क्या बोला गया किसी ने नही सुना क्योंकि वो उनसे थोड़ा दूर जाकर बात कर रहा था.

थोड़ी देर के बाद वो वापस उनके पास आया और बोला- मुबारक हो सत्तार मिया, तुम्हारे साले मियाँ इंडिया आ रहे हैं कल, अपने दुश्मनों का ख़ात्मा करने और वो ठहाके मार कर हसने लगा.

विक्रम ने उसकी ओर सवालियाँ नज़रों से देखा तो वो बोला- हाँ यार !! देखा उपरवाला हम पर कितना मेरबान है, शिकार खुद चल कर शिकारी के पास आ रहा है.. हाहाहा…!!

फिर उसने सारी बात डीटेल में बताई कि कैसे उसने उसको बताया कि अपना मिसन फैल करने वाले मेरे (गनी) शिकंजे में आ चुके हैं, और अभी भी मेरे सामने बँधे पड़े हैं,

ये सब रॉ की कार गुज़ारी थी, अब में उनको इंटेरगेट करके, सारी जानकारी लेकर ठिकाने लगा दूँगा…

तो वो आग बाबूला होकर खुद ही बोला कि तुम उनको हाथ भी मत लगाना मे खुद वहाँ आकर उनको मौत दूँगा…हाहहहाआ….!

चूँकि गनी के मुँह पर टेप लगा था, उसकी आँखें ये सुन कर निराशा से बंद हो गयी,

 
चूँकि गनी के मुँह पर टेप लगा था, उसकी आँखें ये सुन कर निराशा से बंद हो गयी,

लेकिन रुखसाना बिफर पड़ी, गुर्राती हुई गाली गलौज पर उतर आई और उल्टा सीधा बकने लगी, बुरी तरह चीखने चिल्लाने लगी.

मे (अरुण) उसके गालों को सहलाते हुए बोला..

क्यों मेरी जान अब क्यों फडफडा रही है, हम हिंदुस्तानियों का खून बहाने में बड़ा मज़ा आता है ना तुम लोगों को.

जब अपने खून की बारी आई तो पीड़ा हो रही है क्यों.

लेकिन तू चिंता मत कर, तुझे हम कुछ नही कहेंगे, तू तो हमारा हसीन मोहरा है.

रुखसाना - क्या मतलब है तुम्हारा..? किस तरह का मोहरा,,?

मे - देखती जा मेरी छम्मक्छल्लो… इतनी उतावली क्यों हो रही है रानी.. सबर कर, सब पता चल जाएगा वक़्त आने पर.

रणवीर आ चुका था सामान लेकर, हमने खाना खाया और रुखसाना को पुछा तो वो नखरे करने लगी,

मैने कहा - माँ चुदाने दे साली को, नही खा रही तो ना सही अब इसपर ज़्यादा तरस खाने की ज़रूरत नही है.

फिर हमने गनी की और अच्छी तरह से मुश्क कस दी, और उसे उसी स्टोर रूम में बंद कर दिया जहाँ उस आतंकवादी को रखा था.

विक्रम रुखसाना को लेकर एक दूसरे रूम में चला गया जहाँ एक बेड भी पड़ा हुआ था.

मैने उसको बोल दिया था कि अब इसके साथ सेक्स मत करना जब तक ये अपने मुँह से ना कहे.

कुछ देर बाद वो उसको उसी कमरे में बंद कर आया अच्छी तरह से हाथ पैर बाँध कर,

उसका मुँह बंद करना भी ज़रूरी था सो एक पतला सा कपड़ा मुँह पर भी बाँध दिया जिससे साँस लेने में आसानी रहे.

उन दोनो को वहीं छोड़ कर में अपने घर चला आया, क्योंकि आस-पड़ोस वालों को भी शक्ल दिखाना ज़रूरी था,

दूसरा, शहर में क्या गति विधियाँ चल रही हैं, वो भी पता लगाना ज़रूरी था.

घर आकर फ्रेश हुआ, टीवी ऑन करके थोड़ा न्यूज़ रेफ्रेश की और फिर सो गया.

दिन भर की भागम-भाग से थकान भी थी, जल्दी नींद आ गयी.

सुबह जल्दी उठकर नित्य क्रिया करके, योगा- प्राणायाम किया, एनएसए को अबतक का अपडेट ईमेल के थ्रू दिया और सुबह की चाइ लेकर फार्म हाउस पहुँच गया.

गनी का सेल फोन मेरे ही पास था, उसी पर ज़फ़्फेरुल्ला का कभी भी कॉल आ सकता था.

चाइ पीकर हम लोग आज के दिन में जो - जो काम करने थे उसका प्लान करने लगे.

हमारा अनुमान था कि ज़फ़्फेरुल्ला डाइरेक्ट पाकिस्तान से इंडिया की फ्लाइट ले नही सकता, प्रोबबली वो पहले दुबई जाएगा और वहाँ से किसी दूसरे नाम से पासपोर्ट बनवाया होगा उसीपर इंडिया आएगा,

अब इंटरनॅशनल फ्लाइट हमारे शहर तो आती नही हैं, तो वो पहले दुबई से मुंबई की फ्लाइट लेगा, फिर यहाँ की डोमेस्टिक फ्लाइट्स से आना चाहिए.

अब समय वग़ैरह तो उसके फोन आने पर ही पता लगेगा सो उसके फोन का इंतजार करने के अलावा और कोई चारा नही था.

हमें बातों बातों मे 10 बज गये, कि तभी उसके फोन की रिंग बजने लगी.

मैने कॉल पिक की और गनी की आवाज़ में बोला- सलाम वेलेकम भाई ! क्या प्रोग्राम है..?

ज़फर - मे और असरफ़ दुबई पहुँच गये हैं, यहाँ से मुंबई की फ्लाइट है एक घंटे में 1:30 तक मुंबई फिर वहाँ से 2:30 बजे की फ्लाइट लेके 3:30 तक वहाँ पहुँचेंगे, तुम एर पोर्ट आ जाना हमें लेने.

मे - भाई मे तो इन शिकारों को छोड़कर कहीं नही जा सकता, मे अपने खास आदमियों को लेने भेज दूँगा, वो हिफ़ाज़त से आपको मेरे पास तक ले आएँगे..

ज़फ़रुल्ला थोड़ा गुस्से के स्वर में बोला… क्या एडा हो गया है तू, मे किसी और पर कैसे भरोसा कर सकता हूँ..? तुम्हें ही आना होगा.

मे – समझा करो भाई ! मे कोई रिस्क नही लेना चाहता, ऐसा करूँगा मे अपना ये सेल फोन उसको दे दूँगा, यहाँ से चन्द मिनटों का ही तो फासला है, आप उसको कॉल करके चेक कर लेना..

ज़फर - चल ठीक है ये आइडिया भी ठीक है…, फिर उसको खुदा हाफ़िज़ बोल कर कॉल कट कर दिया.

हमने डिसाइड किया कि हम दो लोग उसको लेने जाएँगे, एक आदमी यहीं रहेगा, सब कुछ समय से हुआ तो 4 बजे तक ज़फ़रुल्ला और उसका साथी असरफ़ हमारी गिरफ़्त में होंगे और एक आतंकवादी संघटन एक तरह से ख़तम समझो.

पूरी प्लॅनिंग और रिपोर्ट एनएसए को भेज दी, उनका कन्फर्मेशन भी आ गया.

दोपहर का लंच लेके हमने वहीं पर थोड़ा आराम करने की सोची, मे थोड़ा सा उन दोनो मियाँ बीवी को चेक करना चाहता था,

सो पहले गनी के रूम को खोल कर उसको देखा, उसकी हालत ख़स्ता थी, मुँह से पट्टी हटा कर पानी पिलाया और थोड़ा बहुत खाने को दिया.

उसको निपटा के, रुखसाना के पास गया तो उसकी हालत और ज़्यादा खराब मिली, रो रो कर आँखें सूज गयी थी, आँखों के कोरों से पानी बह रहा था,

मुँह की पट्टी खोली तो वो बुरी तरह से सुबक्ती हुई बोली-

हमने कुछ पल तो साथ में बिताए थे ना ! कम-अज-कम उनको ही थोड़ा याद करके रहम कर लेते,

कल से ना पेट में एक दाना गया है, ना एक घूँट पानी, इतने जालिम तो ना बनो..,!

मे - मैने तो तुम्हें खाने के लिए पुछा था, तुमने ही तो मना कर दिया था, अब इसमें मेरी क्या ग़लती है..? बोलो पहले खाओगी या पिओगी..?

रुखसाना - पहले मुझे पानी पिला दो, और थोड़ा टाय्लेट मे ले जाकर फ्रेश करवा दो फिर कुछ खाने को हो तो दे देना.

मैने उसे चेतावनी देते हुए कहा - कोई चालाकी मत करना, वरना मुझे तुम्हें शूट करने में एक मिनट भी नही लगेगा.

रुखसाना - मे जानती हूँ, अब यहाँ से तुम्हारी मर्ज़ी के बिना निकल नही सकती.

मैने उसे पानी पिलाया, वो 2-3 ग्लास पानी पी गयी, और फिर हाथ पैर खोलकर बाथरूम तक ले गया, आधे घंटे में वो फ्रेश होकर निकली.

फिर उसे खाना खिलाया, इसी में ढाई बज गया, उसको फिर से क़ैद करके, तय हुआ कि विक्रम को यहीं रुकना है,

मे और रणवीर दोनो गाड़ी लेकर एर पोर्ट की तरफ निकल लिए.

 
कुच्छ देर में मुंबई की फ्लाइट लॅंड हुई, चूँकि ज़फ़्फरुल्ला के पूरे डीटेल्स हमारे पास थे सो जैसे ही वो एग्ज़िट से निकलता हुआ दिखाई दिया,

मैने फ़ौरन गनी के सेल फोन से उसको कॉल किया और उसके सामने पहुँच गये,

उसने अपना फोन कान पर लगाया हुआ था, हमने अपनी पहचान बताई तो वो हमें पहचान गया.

रास्ता ज़्यादा लंबा नही था, 15-20 मिनट में हम फार्म हाउस में उन दोनो को लेकर पहुँच गये.

हमने उसे सोफे पर बियायतने को कहा तो वो उसी पर बैठते हुए बोला- गनी भाई कहाँ है..?

मे - अभी बुलाते हैं.. विक्रम और रणवीर को इशारा कर दिया, तो वो दोनो उनके सिर के पीछे इस तरह से खड़े हो गये, मानो वो गनी भाई के चमचे हों.

मे स्टोर रूम में गया और गनी के पैर खोल दिए, फिर उसको पकड़ कर घसीटते हुए बाहर लाया..!

जैसे ही उन दोनो की नज़र गनी के उपर पड़ी, वो सोफे से ऐसे उछले, मानो सालों की गान्ड में किसी बिच्छू ने डंक मार दिया हो..……………

ज़फ़्फ़र ने गनी को इस हालत में पाए जाने की कतई उम्मीद नही की होगी, सो वो उसे देखते ही बुरी तरह चोन्क्ते हुए बोला –

कॉन हो तुम लोग..? और गनी भाई जान को इस तरह क्यों बाँध रखा है..?

मैने उसके ठीक सामने खड़े होकर उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा-

हम इस महान देश के अदना से सिपाही हैं, और रही बात इस देश के गद्दार को इस तरह बाँधने की…

तो तुझ जैसे चूहे को उसके बिल से निकालने के लिए रोटी का टुकड़ा पिजरे में रखना पड़ता है ज़फ़्फरुल्ला ख़ान,

ज़फर – ओह ! तो तू ही वो इंसान है, जिसने हमारे प्लान की धज्जियाँ उड़ाई हैं..

लेकिन तू ये भूल गया, कि जिस आदमी ने तेरे मुल्क में इस कदर तावही मचा रखी हो उसे तू चूहा समझ रहा है हरम्जादे..?

लगता है अभी तू वाकिफ़ नही है मुझसे, ज़फ़्फरुल्ला ख़ान नाम है मेरा.

वो तो मे पहले ही बोल चुका हूँ तेरा नाम ! तू मुझे बताने की जहमत मत कर – मैने उसे और खिजाते हुए कहा,

वैसे हमारे मुल्क में चूहों के ऐसे ही नाम रखे जाते हैं. तभी तो तू अपने बिल में बैठकर हमारे कपड़े कूतरता रहता है..

ज़फर- अभी तुम लोगों का वास्ता मुझ जैसे शेर से नही पड़ा.. हरामी के पिल.ले…..तड़क..तड़क..

वो अपना डाइलॉग पूरा बोल भी नही पाया था, कि दोनो के सर पर पीछे से रेवोल्वेर के हॅंडल की भारी भरकम चोट ने उन्हें फिर से सोफे पर ढेर होने पर मजबूर कर दिया.

रेवोल्वेर के दस्तों की चोट इतनी पवरफुल और सटीक जगह पर पड़ी, कि असलम तो पड़ते ही ढेर हो गया, और अपनी चेतना खो बैठा.

लेकिन ज़फ़्फरुल्ला बड़ा जीवट किस्म का इंसान था…वो उस चोट झेल गया, और साथ ही फुर्ती से घूमकर विक्रम के हाथ से रिवॉलव छीन ली.

ना केवल गन उसके हाथ से छीनी, वल्कि उसे अपने निशाने पर लेकर गुर्राया…

चल वे चूहे सामने आ, ऐसे खिलौनों से शेर का शिकार नही कर पाओगे तुम लोग…

क्षण भर के लिए ही सही, पासा उसके हाथ में आ गया था… लेकिन चूँकि उसका ध्यान विक्रम पर ही था…

विक्रम मेरी तरफ देखने लगा, मैने इशारे से उसको सामने आने को कहा…

वो जैसे – 2 मेरी तरफ बढ़ रहा था, साथ ही साथ ज़फ़्फ़र हम दोनो पर नज़र बनाए हुए उसे निशाने पर लेकर उसके साथ ही घूम रहा था…

वो जैसे ही मेरे 90 डिग्री पर आया, और उसका ध्यान रणवीर की तरफ गया, मेरी एक टाँग हरकत कर गयी…

पैर की किक सीधी उसके रेवोल्वेर पर पड़ी, नतीजा ! रेवोल्वेर उसके हाथ से छूट कर उपर हवा में उठती चली गयी…

इससे पहले कि वो ज़मीन पर गिरती, विक्रम ने हवा में जंप लगाकर उसे कॅच कर लिया..और उसे ज़फ़्फ़र की कनपटी पर फिर से दे मारा…

इस बार ज़फ़्फ़र अपनी चेतना खोने से नही बचा सका, अब वो दोनो ही हमारे सामने बेहोश पड़े हुए थे…,

फिर उन दोनो को भी बाँध कर डाल दिया गया, उसके बाद उनको होश में लाया गया, और फिर दौर शुरू हुआ उनको टॉर्क्चर करने का,

उन तीनो को दो दिन तक हम लोग टॉर्क्चर करते रहे, बड़ा ढीठ था साला जाफ़रुल्ला,

जब उसके हाथ और पैरों के कई अंग काट डाले, तब जा कर उसने बोलना शुरू किया.

देशभर में उसके कितने नेटवर्क काम कर रहे हैं, कॉन-कॉन कहाँ कहाँ इन्वॉल्व है उसके साथ,

हमारे देश के खिलाफ उसका क्या-2 मिसन था, और कॉन-कॉन से संगठन थे पाकिस्तान में जो भारत के खिलाफ काम कर रहे है, सारी इन्फर्मेशन उससे निकाल ली.

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गनी और रुखसाना को पोलीस के हवाले कर दिया गया, ये सारा काम बिना हमारे सामने आए होम मिनिस्ट्री की स्पेशल सेल के नाम पर हुआ था.

गनी के बच्चे को बाल सुधार घर भेज दिया गया, और उसकी सारी चल-अचल संपत्ति को जप्त कर सरकारी खजाने में जमा कर दिया गया.

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उसे मोहरा बना कर इंटरनॅशनल लेवेल पर पाक के नापाक इरादों को नंगा करने के लिए इस्तेमाल करना था.

इस तरह से एक बहुत बड़ा आतंकवादी संघटन दुनिया से मिटा दिया गया था, साथ ही ना जाने कितनी जानें जाने से बच गयी.

मेरा ये एनएसएसआइ के अंडर कवर एजेंट के तौर पर पहला अफीशियल मिसन था, जो कामयाब रहा,

जिसकी पीएम ने अपने सामने बिठा कर भूरी-भूरी प्रशंसा की और कुछ विशेष अधिकार भी दिए जो भविश्य में काम आने वाले थे.

पीएम आगे बोले..! बेटे ऐसे ही देश की सेवा करते रहो, तुम्हारे जैसे देश के सच्चे सिपाहियों की कमी है इस देश में.

हम अब रहें या ना रहें, हो सकता है कि अब ज़्यादा दिन इस देश की सेवा कर नही पाएँगे क्योंकि हमें तो 5 साल के लिए ही चुना गया है,

अगले 6 महीनों में चुनाव हैं, हमें लग रहा है कि आने वाली सरकार में हमारा कोई रोल नही रहने वाला.

लेकिन हमें खुशी इस बात की रहेगी, कि तुम्हारे जैसे सपूत इस देश में मौजूद रहेंगे..! सो विश यू ऑल दा बेस्ट आंड टेक केर फॉर युवरसेल्फ टू.

हो सकता है अब हमारी मुलाकात पीएम के पद पर रहते हुए ना हो.

रणवीर और विक्रम को स्पेशल ड्यूटी पर मेरा साथ देने के लिए भेजा था, जो उन्होने बखूबी निभाया था.

इसके लिए उन दोनो को भी पुरशकृत किया गया….!

देखते -2 मेरी शादी का वक़्त नज़दीक आ पहुँचा, अगले हफ्ते मेरी और ट्रिशा की शादी थी,

वो यूपी पूर्वांचल के एक छोटे से शहर में एसपी नियुक्त हो चुकी थी.

हम दोनो ने एक हफ्ते की लीव ले ली. दोनो तरफ के मुख्य-2 रिस्तेदारो को मैने अपने पास ही बुला लिया,

उनमें मेरे कॉलेज फ्रेंड्स भी थे, एक गेस्ट हाउस और शादी के लिए पार्टी प्लॉट बुक कर दिया.

बड़े सादे तरीक़े से हम दोनो शादी के बंधन में बँध गये. दोनो ही ओर खुशी का माहौल था.

मेरी माँ भी किसी तरह से शादी में शामिल हुई और अपने अंतिम वर-बधू को आशीर्वाद दिया.

शादी के बाद ज़्यादातर लोग दूसरे दिन ही विदा हो गये, ट्रिशा के माता-पिता अभी ठहरे हुए थे, जो उसके साथ ही जाने वाले थे.

आज हमारी सुहागरात थी, ट्रिशा कुछ ज़्यादा ही एग्ज़ाइटेड थी इस क्षण को लेकर, ना जाने कितने सालों से इस रात का उसने इंतजार किया था.

अपनी सुहाग सेज को उसने खुद अपने तरीक़े से सजाया था.

आज फूलों से सजे एक मास्टर बेड पर हम सिर्फ़ दोनो ही थे, जो आज एका-कार होने के लिए वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे थे,

ख़ासकर ट्रिश जो आज मेरी अर्धांगिनी बनी, सिकुड़ी सिमिटी सी लाल सुर्ख जोड़े में पलंग पर बैठी थी थोड़ा घूँघट निकाल कर अपने प्रियतम के इंतेज़ार में, कि कब वो आए और उसका घूँघट खोले.

मैने कमरे में प्रवेश किया और उसको अंदर से बोल्ट करके धीरे-2 कदमों से चल कर बेड पर आकर बैठ गया.

ट्रिशा के मेहदी भरे हाथों को अपने कठोर हाथों में लेकर मैने कहा- ट्रिशा.. ! अब ये घूँघट किसके लिए है..? इसे उतारो जान ! मे अपने चाँद के दर्शन करना चाहता हूँ.

उसने ना में गर्दन हिला कर इशारा किया और वो ज़्यादा सिमट कर बैठ गयी.

मैने थोड़ा सा उसे सताने के उद्देश्य से कहा- तुम तो पहले दिन से ही मेरी बात की अवहेलना करने लगी, भाई ये नाचीज़ अब आपका पति है, आइपीएस का अरदली नही,

ये कहकर मैने अपने हाथ उसके घुटनों पर रख दिए, तो उसने अपने घुटने और अंदर को समेट लिए.

मे उठकर खड़ा हो गया और बोला- ठीक है कोई बात नही, वैसे भी एक आइपीएस और इंजिनियर का कोई मुकवला नही है. मे चलता हूँ टेक केर, ये कहकर मे वहाँ से जाने लगा.

उसने मेरा हाथ थाम लिया और बोली- और कितना सताओगे प्राणनाथ..? एक नव विवाहित लड़की के अरमानों की तो कद्र करो, जो काम आपको करने चाहिए वो तो आपको ही करने होंगे ना..!

मे फिर से उसके बगल में बैठ गया और उसके घूँघट को अपने हाथों में लेकर उलट दिया.

जैसे कोई चाँद निकल आया हो उस कमरे में, ट्रिशा सचमुच किसी चाँद से कम नही लग रही थी, नज़रें पलंग की चादर को देख रही थी, होंठ थर थरा रहे थे उसके.

मैने अपनी शेरवानी की जेब से एक नेकक्लेशस निकाला और उसे ट्रिशा के गले में पहना दिया, और बोला- ये आपकी मुँह दिखाई का तोहफा है, अगर पसंद हो तो कबूल कर लीजिए.

मुझे आपका हर तोहफा कबूल है स्वामी..! -वो नज़रें नीची किए हुए ही बोली.

फिर भी एक बार देख तो लो जान ! कैसा है..? मैने कहा तो उसने उसे अपने हाथ में लेके देखा और बोली- सच में बहुत खूबसूरत है..

मैने उसका चाँद सा मुखड़ा अपने हाथों में लेकर कहा - लेकिन तुमसे ज़्यादा खूबसूरत नही,

सच कहूँ तो आज में अपने आपको बहुत शौभागयशाली महसूस कर रहा हूँ कि तुम मेरी पत्नी हो.

वादा करो कि हमारा पेशा, हमारे फ़र्ज़ कभी हम दोनो के बीच नही आएँगे.

ट्रिशा- वादा मेरे स्वामी, मे अपने काम, अपने फ़र्ज़ को हम दोनो के बीच नही आने दूँगी . लेकिन फ़र्ज़ से कभी गद्दारी नही कर पाउन्गि उस बात का ख्याल आपको रखना होगा.

मे - बेशक ! मे अपनी पत्नी के उत्तरदयुक्तों को भली- भाँति समझता हूँ.

और ये सुनिश्चित करूँगा कि मेरी पत्नी की मेरी वजह से कभी नज़र नीची ना हो.

अब मैने उसके मेहदी भरे हाथों को फिर से अपने हाथों में लिया जिन पर मेरे नाम की मेहदी थी और उनको चूम लिया, उसके बाद उसके माथे को गालों को गर्दन को चूमने लगा.

वो आँखें बंद किए मादक उमंगों में खोती जा रही थी.

जब मैने उसके होठों को हल्के से अपने हाथ के अंगूठे से सहलाया… आह..कितने मुलायम, पतले सुर्ख होंठ..

मन अपने आप खींचा चला गया और मेरे तपते होंठ उसके लिपीसटिक लगे सुर्ख पतले रस्सीले होठों पर टिक गये और उनपर मैने बस एक हल्का सा किस कर दिया.

उसका रोया-2 काँप गया मेरे होठों के स्पर्श मात्र से ही, और शरमा कर अपना मुँह दोनो हाथों से ढांप लिया.

मैने उसके दोनो हाथ अपने हाथों से पकड़ कर उसके शर्मो-हया में डूबे चेहरे से हटाए और उसके कान में फुसफुसा कर कहा.. क्या हुआ जान.. चेहरा क्यों छुपा रही हो मुझसे..?

वो- शर्म आ रही है मुझे आपसे..!

मे - अब मुझसे कैसी शर्म मेरी जान.. अब तो हम एक होने जा रहे हैं, ऐसे ही शरमाती रहोगी तो ये हसीन रात जो वर्षों के बाद आई है,

जिसको तुमने ना जाने कितनी बार ख्वाबों ख़यालों में देखा होगा वो यौंही बीत जाएगी.

वो - उउन्नहु… मुझे कुछ नही पता..? आपको जो करना है करिए..!

मे - ये ठीक बात नही है, ये रात तो हम दोनो की है ना..! तो फिर हम दोनो को ही मिलकर मनानी होगी..!

चलो ये गहने और ये भारी-भरकम कपड़े अलग करो, ये आज की रात हमारे सबसे बड़े दुश्मन हैं, इतना कहकर मे उसके गहने एक-2 करके उतारने लगा.

अब उसके माथे का टीका और नाक की नथ ही शेष थे जो मैने जान बूझकर नही उतारे.

फिर उसकी साड़ी को भी उसके बदन से अलग कर दिया, ब्लाउस और पेटिकोट में वो स्वर्ग से उतरी किसी अप्सरा जैसी लग रही थी,

मैने उसको धीरे से पलंग पर लिटा दिया और उसके अतुल्यनीय रूप को अपनी आँखों से पीने लगा.

उसके काले घने बालों के बीच हल्की लालिमा लिए उसका गोरा चिटा गोल चेहरा मानो बादलों के बीच चाँद निकल आया हो,

 
माथे पर छोटी सी बिंदिया, कमान जैसी उसकी भवें (आइ ब्रो) हल्के काजल से भरी उसकी हिरनी जैसी चंचल आँखें मानो कुछ कहना चाहती हों,

मैने अपने तपते होंठो से उसकी बंद आँखों की पलकों को चूम लिया.

सुराई दार गर्दन, जिसके नीचे पतली सी एक रेखा नीचे को जाती हुई, जो आगे जाते-2 चौड़ाई में बदल रही थी.

सुर्ख कपड़े के ब्लाउस में क़ैद उसके सुडौल वक्ष जो अभी 24” के भी नही हुए थे.

ट्रैनिंग में किए गये अथक मेहनत की वजह से एकदम ठोस टेनिस की बॉल की तरह गोल-गोल संतरे जैसे उसके उरोज.

उसके नीचे उसका एक दम पतला सा सपाट पेट, जिसके मध्य में एक चबन्नी के साइज़ की नाभि, जो कभी-2 हिलने लगती थी.

कमर इतनी पतली हो गयी थी उसकी कि दोनो हाथों के बीच में समा जाए.

वो अपनी दोनो टाँगें जोड़े हुए लेटी थी, पेटिकोट में धकि उसकी गोल लेकिन सख़्त जांघे, थोड़ी मोटाई लिए, जांघों के बीच जहाँ उसके पेटिकोट का कपड़ा थोड़ा चारों तरफ से सिकुड गया था,

ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो किसी नदी में तेज बहाव के कारण भवर पड़ गये हों.

उसके रूप सौन्दर्य में खोया हुआ मे उसके पैरों तक चला गया, और उसके महाबर से रंगी मुलायम पैरों की उंगलियों को मुँह में लेकर चूसने लगा.

ट्रिशा ने चोंक कर अपनी गर्दन उठाई.. और झट से अपना पैर खींचते हुए बोली..

नाथ ! ये क्या अनर्थ कर रहे है आप..? मेरे पैरों को तो आपको छुना भी नही चाहिए और आपने तो..मुँह.. क्यों पाप चढ़ा रहे हैं मुझ पर.

मैने उसका चाँद सा मुखड़ा अपने हाथों में लेकर कहा – क्या तुम सच में आइपीएस ऑफीसर हो..?

मेरी बात सुनकर वो बोली - क्या मतलब..? इसका इस बात से क्या लेना देना..?

मैने कह - तुम्हारे ये पैर शरीर से अलग हैं क्या..? नही ना.. तो जब मुझे तुम्हारे शरीर का जो अंग अच्छा लगेगा उसको में मन मर्ज़ी प्यार कर सकता हूँ, फिर पैरों को क्यों नही.

वो तुनकते हुए बोली – वो सब मुझे कुछ नही पता, माँ कहती है, पत्नी को हमेशा पति के चरणों में रहना चाहिए.

ग़लती से भी पति, पत्नी के पैर छु भी ले तो वो पाप की भागीदार होती है.

मे - अरे यार तुम तो उपदेश देने लगी, चुप करो ये बाबा आदम के जमाने के दकियानूसी उपदेश और मुझे प्यार करने दो तुम्हें.

वो मेरी बात सुन कर चुप हो गयी…

अब मे उसको पैरों से चूमता हुआ धीरे-2 उपर को बढ़ने लगा, जहाँ मेरे होंठ लगते ही ट्रिशा का वही अंग कंपकंपाने लगता.

चूमते-2 मे उसके पेट पर आ गया और जब मैने उसकी नाभि के उपर चूमा, तो वो खिल-खिला कर उठ कर बैठ गयी.. और बोली..

अरुण प्लीज़ यहाँ नही…हहहे.. नही..नही.. प्लीज़.. हहहे…हहुउ.. मुझे गुदगुदी होती है,

मैने और जान बूझकर उसके पेट को सहला दिया, गुदगुदी के मारे उसके आँसू निकल आए..! अब कुछ ज़्यादा ना हो जाए इसलिए मे उपर को बढ़ने लगा.

मैने उसके गोल सुडौल वक्षों को ब्लाउस के उपर से ही चूमता हुआ उसकी घाटी की दरार पर से गर्दन पर पहुँच गया.

वो अबतक हल्की-2 सिसकियाँ लेने लगी थी, आँखें बंद हो रही थी उसकी, अंत में मैने उसके होठों को चूमा और देर तक चूस्ता रहा, उसको भी बोला तो वो भी मेरी तरह कोशिश करती रही और फिर हम लंबी स्मूच में डूब गये.

मैने उसके ब्लाउस के बटन खोलने शुरू कर दिए, और उसको उतार कर पलंग के नीचे फेंक दिया, ब्रा में कसे उसके उन्नत सुडौल वक्ष इलाहाबादी अमरूद के साइज़ के बड़े आकर्षक लग रहे थे,

जब मैने उनको अपनी मुत्ठियों में कस्के मसला तो ट्रिशा सिसक पड़ी…

आहह… सस्सिईइ… जोरे से नहियीई…प्लस्ससस्स… आहह…दर्द होता है..उईई.. माआ… ऊहह….जानणन्न्… मारीइ..

अब मेरा एक हाथ उसकी चुनमुनिया पर पहुँच चुका था जो उसको प्यार से सहला रहा था..

मैने आपने सारे कपड़े निकाल फेंके सिवाय अंडरवेर के, मुझे रुखसाना वाला अपना एनकाउंटर याद आया और ट्रिशा की ब्रा खोल कर बिस्तर पर लेट गया.

मे- जान तुम मेरे उपर बैठ जाओ, तो वो मेरे पेट पर बैठ गयी, मैने कहा तोड़ा और नीचे तो वो समझ गयी,

तब तक मैने अपने मूसल महाराज को अंडरवेर में हाथ डालकर उपर को करके अपने पेट से लगा लिया.

अब वो मोटी ककड़ी जैसा अंडरवेर में मेरी नाभि की ओर मुँह करके अंडरवेर को फ़ाडे दे रहा था. ट्रिशा अपनी परी की अनखूली फांकों को उसके उपर रख कर बैठ गयी.

मैने उसको अपने उपेर झुका लिया और उसकी कमर को दोनो तरफ से पकड़ कर आगे-पीछे करने लगा, जब उसको तरीक़ा समझ में आ गया,

अब वो खुद से ही अपनी कमर चलाने लगी और अपनी अन्छुइ मुनिया को मेरे लंड के उपेर घिसने लगी, उसके अमरूद मेरी हथेलियों में थे.

हम दोनो मज़े में डूबते चले गये, मुझे तो बहुत मज़ा आ रहा था, जब वो पीछे को कमर ले जाती मेरा सुपाडा खुल जाता और अंडरवेअर के कपड़े के रगड़ से सुरसूराहट और बढ़ जाती.

कमर हिलाते-2 ट्रिशा ने अपना मुँह उपर को उठाया और एक लंबी सी सिसकी भरी कराह मुँह से निकाल कर लंबी-2 साँसें लेने लगी.

उसकी पेंटी कामरस से एक दम तर हो गयी थी, मेरा भी कुछ ऐसा ही हाल था, अगर वो एक दो रगड़े और कस कर लगा देती तो शायद मेरा पानी भी निकल जाता.

 
ट्रिशा मेरे उपर लेटी हुई थी उसके कड़क हो चुके कंचे जैसे निप्पल मेरे सीने में मीठी-2 चुभन दे रहे थे, मैने ट्रिशा के गले पर किस करके कहा.

मे - जान मज़ा आया…? तो उसने मेरे कंधे में मुँह छिपा कर हुउंम.. करके हामी भरी.

बेबी थोड़ा मेरे साब बहादुर की सेवा करोगी..? तो वो समझ नही पाई और आश्चर्य से मेरी ओर देखा..?

मैने अपने मूसल को रगड़ते हुए कहा, इसको थोड़ा किसी-वीसी दो प्यार करो जिससे ये तुम्हारी परी को जीवन भर अच्छे से प्यार करता रहे.

वो शरमा गयी और ना में मुन्डी हिलाने लगी..!

मे - क्या बेबी, मेरे लिए इतना भी नही कर सकती..?

तो उसने झिझकते हुए मेरे अंडरवेर को उतार दिया और मेरे 8” लंबे और सोट जैसे मोटे लंड को अपने मुट्ठी में लेकर सहलाने लगी,

उसके हाथों में पहुँच कर साहिब बहादुर और अकड़ गये, और एक दम रोड की तरह कड़क हो गये.

वो आगे पीछे करके उसके सुपाडे को खोलने और बंद करके देखने लगी.

मैने कहा क्या देख रही हो जान..? तो वो बोली- आपका ये सिपाही तो बहुत तगड़ा है, मेरी उस छोटी सी परी में कैसे जाएगा..?

कोशिश करने से तो भगवान भी मिल जाते हैं, तुम भी कोशिश करो और इसको अपने मुँह में लेके इसको लूब्रिकेट कर दो.

उसने मेरे सुपाडे को खोल कर अपनी उंगली उसके छेद पर घुमाई, मेरी सिसकारी निकल गयी और एक बूँद अमृत की उसके मुँह पर आ गयी,

ट्रिशा उसको अपनी उंगली के पोर पर रख कर देखने लगी, मैने कहा इसको टेस्ट करके देखो बहुत टेस्टी होता है ये.

वो बोली-छि ये भी कोई टेस्ट करने की चीज़ है, तो मैने थोड़ा नाराज़गी वाले स्वर में कहा.

तुम्हें मेरी किसी बात का विश्वास क्यों नही होता, जाओ अब तुम्हें जो ठीक लगे वो करो..

तो उसने अन्मने भाव से उसको अपनी जीभ की नोक पर ऐसे रखा मानो वो कोई बॉम्ब हो और टच करते ही फट ना जाए.

जीभ पर रख कर कुछ देर उसका टेस्ट समझने की कोशिश करती रही तो मैने पुछा कैसा लगा.

वो बोली - अच्छा है, थोड़ा सा तेज है लेकिन मिठास के साथ, तो मैने कहा फिर चूस्लो इसे, और ज़्यादा मिठास मिलेगी.

फिर उसने अपनी सारी झिझक छोड़ कर मेरे सुपाडे को अपने लाल-2 होठों में क़ैद कर लिया और चूसने लगी,

बीच-2 में अपनी जीभ की नोक से मेरे छेद को कुरेद देती. मेरा मज़े के मारे लंड फटा जा रहा था. वैसे भी इतनी देर से अकडा हुआ था.

मैने कहा- आअहह मेरी जान.. थोड़ा और अंदर ले ना,, ससिईई.. तेज़ी से मुँह चला .. आहह.. आयईयी.. सीईइ.. और फिर मेरा नल खुल गया..

उसको जैसे ही ये आभास हुआ कि मेरा वीर्य छूट गया है, उसने अपना मुँह हटा लिया.. हटते-2 भी एक दो पिचकारी तो उसके मुँह में ही छूट गयी और फिर होली के पिचकरे की तरह से उसके मुँह को अपने ताज़े मक्खन से रंग दिया.

वो तुरंत वॉश रूम की ओर भागी और अपना मुँह सॉफ किया. वापस आकर मेरे बगल में लेट गयी.

और क्या-2 कराओगे मुझसे.. वो बोली,

तो मैने कहा- तुम्हें ये सब अच्छा नही लगा..?

वो बोली- नही..नही..! ऐसी बात नही है, मे तो बस ऐसे ही पुच्छ रही थी.

कुछ देर हम एक दूसरे की बाहों मे लिपटे ऐसे ही पड़े रहे, मेरे हाथ उसकी पीठ को सहलाते हुए उसके कूल्हे पर चले गये,

उसकी मुलायम गोल-मटोल गान्ड को सहलाते-2 उसकी दरार में उंगली घुमाने लगा, तो उसने मुझे और ज़ोर से कस लिया.

 
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