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तवायफ़ की प्रेम कहानी complete

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Guest
तवायफ़ की प्रेम कहानी

दोस्तो "'तवायफ़" -एक ऐसी वेदना है जिसे ना किसी तारूफ़ की ज़रूरत , ना किसी पहचान की दरकार . उसका पेशा है जिस्म बेचना .......मजबूरी मे ...या शायद "शौक" मे ..... शर्म और हया तो बहुत पहले ही नीलाम हो जाती है..............शायद उसी दिन जिस दिन उसके साथ ये तवायफ़ नाम जुड़ जाता है ..या यू कहें कि जोड़ दिया जाता है .बेचने को उसके पास कुच्छ बचता है तो सिर्फ़ जिस्म......लेकिन सब इल्ज़ाम अपने सीने पर हस्कर सज़ा लेने वाली तवायफ़ कहाँ से आती है?? कोई अलग दुनिया, कोई अलग समाज ...कोई अलग देश...न्ही !!! हमारे ही क़ानून , हमारे ही रिवाज़ उसे तवायफ़ बना देते हैं . तवायफ़ तो सिर्फ़ एक खिलोना होती है...जिस से जिस्म की भूख मिटाई जाती है. वो किसी की रात की रानी तो बन जाती है लेकिन किसी की बेटी न्ही बन पाती ...कभी न्ही. ....ना किसी की बेटी, ना किसी की बीवी,ना किसी की प्रेमिका....ना कोई मज़हब , ना कोई जात , ना कोई बिरादरी...... एक तवायफ़ की सिर्फ़ एक ही पहचान होती है.........."तवायफ़ तो सिर्फ़ तवायफ़ होती है

दोस्तो मुंबई के एक पॉश इलाक़े मे स्थित एक शानदार कोठी....बाहर गेट के पास लगी हुई नेम प्लेट...मानस विला, एस-234/ए, सदानंद चौहान , एम.एल.ए........ सदानंद चौहान एरिया के सबसे प्रतिष्ठित और सबसे रहीस व्यक्ति...दोस्तो के बीच सदा बाबू के नाम से जाने जाते हैं...उन्ही की है ये कोठी. 7 दिन पहले आए स्टेट के एलक्षन रिज़ल्ट मे वो एक रीजनल पार्टी के एमएलए चुने गये थे और आज उसी जीत को सेलेब्रेट करने के लिए अपने जान ने वालो को और पार्टी वर्कर्स को ट्रीट दे रहे थे ..

एक और ख़ुसी की बात थी.....2 साल बाद उनका बेटा आलोक यूसए से एमबीए करके वापस आया था...तो इस दोहरी ख़ुसी के मौके पर मानस विला को भव्य तरीके से सजाया गया था. सदानंद साहब के पास दौलत की कोई कमी नही थी.....खानदानी राईश थे, तो ज़ाहिर है शौक भी रहिसों वाले थे............शराब और शबाब............लेकिन बच्चो पर कभी इस रंग की परच्छाई नही पड़ने दी थी उन्होने.

बीवी की मौत किसी बीमारी के चलते बहुत पहले ही हो गयी थी....दूसरी शादी न्ही की सदा बाबू ने..दो ही बच्चे थे....बेटा आलोक और बेटी अंजलि.....आलोक अंजलि से लगभग 2 साल बड़ा था. …..अंजलि की शादी हुए 6 महीने ही हुए थे और वो फॉरिन मे सेट्ल हो गयी थी. आज वो न्ही आ पाई थी और आलोक अपनी बेहन की शादी मे न्ही आ पाया था. सदानंद साहब ने कभी भी अपनी किसी इच्छा को अपने बच्चो पर थोपा नही था....दोनो ही बच्चे काफ़ी खुले मिज़ाज के थे.

पार्टी अपने जोरो शॉरो पर थी...अमीरो की पार्टी थी तो तरह तरह की देसी विदेशी शराब भी अपनी रंगत मे थी और पार्टी के कुच्छ नव-युवक नेताओ ने शबाब का इंतज़ाम भी किया था. इंतज़ाम क्या था अभी वो किसी को न्ही पता था. सदा बाबू से भी छिपाकर उन्हे सर्प्राइज़ देने का प्लान था.

आलोक, बेहद दिलकश और हॅंडसम परसनाल्टी का मालिक...लंबा कद, मजबूत कद काठी....गोरा सुर्ख चेरहरा...काले भँवरा सी आँखे , चेहरे पर एक गंभीरता और पर्सनाल्टी मे एक ठहराव.....देखने से किसी गंभीर विचारो वाले लेखक की याद दियालता.

वो सब से ही बड़े रईसों से मिल रहा था....स्टेट के जाने माने लोगो से सदा बाबू अपने बेटे की जान पहचान करवा रहे थे.आलोक के साथ एक विदेशी मुल्क की लड़की भी थी .......दूध सी रंगत , नाज़ुक सी, लाल लाल होठ ,भूरे-सफेद बाल और भूरी बिलोरी आँखे........बहुत खूबसूरत ना सही लेकिन बेहद मासूम लग रही थी वो . आलोक के साथ-साथ लगी हुई ....हस्ती खिलखिलाती....नाम था सोफ़िया और आलोक उसे सोफी कहकर बुला रहा था..

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"वो तैयार हो गयी ?? " लैला बाई ने दरवाज़े पर आते ही पुछा.

"ज....ज...जीए" जल्दी से अपने सामने बैठी लड़की के जुड़े मे क्लिप फ़साते हुए ऋुना ने जवाब दिया.

"ह्म्‍म्म अब देर नको करो........जल्दी से ले आओ नीचे, टेम हो गया है पिरोगाराम का........" लैला बाई ने पान के थूक को निगलते हुए आँखे तरेरकर कहा.

लैला बाई , अपने जमाने की मशहूर तवायफ़ और इस समय मुंबई के सबसे माशूर कोठे की मालकिन ...आज के शबाब का इंतज़ाम की ज़िम्मेदारी उन्हे ही मिली थी और वो इतने बड़े मौके को हाथ से न्ही जाने दे सकती थी ...इसलिए आज पहली बार किसी कोठे से बाहर की महफ़िल पर उन्होने अपने "कोहिनूर" को उतारा था.

ऋुना उनके कोठे की खास मेकप करने वाली औरत का नाम था......और इस समय वो उस लड़की को तैयार कर रही थी जिसे आज का प्रोग्राम करना था.......लैला बाई जिसे "कोहिनूर" कहती थी . वो आईने की ओर चेहरा करके बैठी थी और ऋुना पिछे से उसके बाल बना रही थी

लड़की तैयार हो गयी थी और स्टेज पर पड़े पर्दे के पीछे खड़ी थी...दो पर्दे लगे थे ...एक स्टेज के भी बाहर जिस से किसी को स्टेज भी नही दिख रहा था....और दूसरा स्टेज के दूसरी छोर की ओर ...जैसा आम तौर पर किसी प्ले मे लगा होता है . लेकिन बेहद खूबसूरती से सजाया गया था...तरह तरह के झूमर लगे हुए थे....कुल मिलाकर स्टेज को किसी रंगमहल के जैसा बनाने की कोसिस की गयी थी .

लड़की (कोहिनूर) का आधे से ज़्यादा चेहरा घूँघट मे ढका हुआ था....एक ट्रॅन्स्परेंट सा ड्रेस पहना हुआ था उसने....गोरी चिटी नाज़ुक सी काया और पतली कमर ...कमसिन जवानी को नुमाया कर रही थी...उन्नत उभारों पर पड़ा झीना सा कपड़ा उनकी लाज बचाए हुए था....लड़की का चेहरा न्ही दिख रहा था लेकिन जितना दिख रहा था उतना ही काफ़ी था जवानो और बूढ़ो के दिलों पर बिजलियाँ गिराने के लिए.

"जा कोहिनूर, वक़्त हो गया..." ऋुना ने पर्दे की ओर इशारा करते हुए कहा.

"बाजी आज जाने क्यू दिल बहुत घबरा रहा है...बाजी आज डर लग रहा है... आप बोल दो ना लैला बाजी को कि मैं नही करूँगी आज...किसी और को बोल दे...प्लीज़ बाजी.." कोहिनूर का चेहरा तो नही दिख रहा था लेकिन उसकी आवाज़ भीगी सी लग रही थी.यक़ीनन औरतो के दर्द का सच्चा हमदर्द, आँसू , उसकी आँखो से बह निकला था.

"तू जानती है ना कोहिनूर, मैं कुच्छ न्ही कर सकती...जा मेरी बच्ची ..जा..." ऋुना की आँखे भी भीग गयी लेकिन वो जानती थी कि इस दलदल से अब कोई न्ही बचा सकता था उस मासूम अबला को.

कुच्छ ही देर मे अनाउन्स किया जाने लगा..........जाने क्या क्या बोल रहा था अनाउन्स करने वाला लेकिन कोहिनूर को मतलब था बस अपने नाम से ........जिसके बाद उसे जाना था.......और उसने बस उतना ही सुना..........

"तो दोस्तो पेश है आज की महफ़िल मे ..........कोहिनूऊऊऊररर्र्र्र्र्र्ररर………………."

लोगो की आह और वाह सुरू हो गयी थी...सीटियों की आवाज़ें भी आने लगी....शरीफों के महफ़िल मे एक तवायफ़ नाचने वाली जो थी.

आख़िरकार परदा उठा दिया गया..............एक मनमोहक संगीत के बीच बहुत सी लड़कियो से घिरी हुई कोहिनूर सबके सामने आ गयी......अपने आँसुओ को संभालते हुए सलाम करने के लिए उसने ज़रा सा सर उठाया........उउफफफफ्फ़.....पहली ही नज़र जिस पर पड़ी उसके बाद कहीं न्ही पड़ी..........कोहिनूर के पैर काप गये. ...........पैर काँपे और घुंघरू बज उठे...लोगो ने एक तवायफ़ के दर्द पर भी तालियाँ बजा दी..........घूँघट पर हाथ अपने आप सरक गया और वो थोड़ा और लंबा कर लिया उसने..........आँसुओं की बाढ़ सारे बंधन तोड़ कर बह निकली.....वाह रे ज़ालिम किस्मत......आज बरसो बाद..........कोहिनूर मानो बुत बन गयी थी ....किसी तिलिस्म के असर मे हो मानो..........लेकिन जल्द ही पर्दे के पिछे से आती घुड़कियो और गालियों ने उसका तिलिस्म तोड़ दिया...और फिर कोहिनूर के घुंघरू बोलने लगे.......आहों और सिसकियो के बीच उसके गीत फुट पड़े........दर्द के गीत............पहली ही लाइन गाइ उसने ..........

"पिया लगी लगन बस तेरे नाम की, तुझ पे बलिहारी जाउ कसम राम की.."
 
आलोक के चेहरे का रंग जैसे बिल्कुल उड़ गया था उस आवाज़ को सुनकर.......उसके चेहरे पर सारे जामने का दर्द उमड़ आया था....बेचैनी हर साँस के साथ बढ़ने लगी ......वो बदहवास सा उस घूँघट के अंदर छिपे मुखड़े को देखने की कोसिस कर रहा था....लेकिन चाहकर भी वो स्टेज पर जाकर ऐसा न्ही कर पा रहा था.....सबसे नज़रे चुरा कर वो एक दीदार को तरस रहा था उस तवायफ़ के .

वहीं दूसरी ओर पूरी महफ़िल उस तवायफ़ के नाच गाने का लुफ्ट उठा रही थी........पैसे लूटा रही थी उसपर....एक तवायफ़ का स्वांग अपने रंग मे सबको रंग रहा था………………काश कोई उसके दिल का रंग भी देखता.काश किसी को उसमे किसी अपने का अक्स दिखता….काश्ह्ह्ह्ह !

जाने किस मिट्टी की बनी थी .....दिल रो रहा था, आँखे बरस रही थी लेकिन कोहिनूर के पैर थिरक रहे थे....उसके होठ दर्द मे रचे उस गीत को गाए जा रहे थे...वेदना तो पहले से थी उसके दिल मे बस आज वो फुट कर बाहर निकल रही थी.

हर साज़ के साथ आलोक के दिल की आशंका बढ़ती जा रही थी …मन ही मन वो अपने भगवान से विनती कर रहा था कि जो उसे महसूस हो रहा है,वो सच ना हो……लेकिन बीत ते वक़्त के हर पल के साथ उसकी आशंका और बढ़ती ही जा रही थी.

हर ताल के साथ कोहिनूर के घुंघरू की आवाज़ तेज हो रही थी….. उसकी दर्द मे डूबी आवाज़ आलोक को बहुत तकलीफ़ पहुचा रही थी………

“मुझा पे छाइ है कैसी ये दीवानगी,

मैने माना तुझे अपना भगवान जी ;

मुझको सौगंध साजन मेरे राम की

बिन तेरे मैं नही अब किसी काम की ………”……

इन्ही लाइन के साथ एक पल को ठितकी कोहिनूर……मानो सबलॉग किसी सहर के आलम से बाहर आ गये………..लेकिन अगले ही पल फिर से वो घुंघरू बोल उठे……..

“तेरी दहलीज़ पे, ऊऊ, तेरी दहलीज़ पे दम ये निकले मेरा

तुझे पे बलि हारी जाउ कसम राम कीईईईईईईईईईईई……………….”

साज़ की ताल तेज होती जा रही थी और साथ ही साथ कोहिनूर के घुंघरुओं की आवाज़ भी….बुरी तरह से थक चुकी थी वो लेकिन आज तो वो किसी जुनून मे नाच रही थी……..जब तक पैर साथ देते वो नही रुकती.

वैसा मुज़रा शायद ही वहाँ मौजूद किसी शख्स ने अपनी जिंदगी मे देखा था……लेकिन उस कला की कोई तारीफ करने वाला नही था…सबकी आँखे बस उसके जिस्म पर थी…….आख़िरकार तक कर कोहिनूर के घुंघरुओं ने जवाब दे दिया……गीत के आख़िरी बोल आलोक पर एक नज़र डालते हुए कोहिनूर ने अता किए…….

“तुझ पे बलि हारी जाउ कसम राम कीईईईईईईईईईईई……….तुझ पे बलिहारी जाउ कसम राम की……….” और फिर कोहिनूर के घुंघरू टूट गये.

वो लड़खड़ा कर स्टेज पर गिर पड़ी……….शायद बेहोश हो गयी थी………उसके चेहरे पर पड़ा झीना सा घूँघट भी हट चुका था और आलोक भी शायद बेहोश ही हो गया था आँसुओं मे डूबे उस मासूम मुखड़े को देखकर.

“ काजल ” आलोक के मूह से चीख निकल गयी……..उसकी आँखो मे आँसू भर आए…….इस से पहले कोई कुच्छ समझ पाता आलोक स्टेज पर पहुच चुका था और कोहिनूर को अपने मजबूत बाजुओ मे उठा स्टेज से उतरा और अंदर की ओर चल दिया.

सदा बाबू चौक उठे थे आलोक के इस बर्ताव से..नाराज़गी और शर्मिंदगी दोनो ही उनके चेहरे पर सॉफ सॉफ झलक रही थी….लेकिन अभी कुच्छ कह कर वो अपनी मट्टी पलीत नही करना चाहते थे.सो चुप रहे.

महॉल थोड़ा गंभीर हो गया…….और ऐसे मे एमएलए साहब के ही किसी ने और रंग चढ़ा दिया……

“लगता है अपने आलोक बाबू को पसंद आ गयी ये तवायफ़…….हे हे हे….सदा बाबू बेटा आप पर ही गया है…….”

सदा बाबू भी ज़बरदस्ती का मुस्कुरा दिए..और महफ़िल मे मौजूद लोगो को एक नया बहाना मिल गया था…..कुच्छ तो यहाँ तक मान रहे थे कि आलोक उस तवायफ़ के साथ पहले ही रातें गुज़ार चुका है और इस लिए ही उसे पहले से जानता है……वैसे भी शरीफो का किसी तवायफ़ से भला और क्या रिश्ता हो सकता था???

लेकिन सदा बाबू का चेहरा गंभीर हो गया था…उन्हे पता था कि आलोक क्या है ?? किसी तूफान की आशंका हो रही थी उन्हे……अपने एक ख़ास आदमी को बुलाकर उन्होने कुच्छ कहा और अंदर भेज दिया.

वो आदमी सीधे लीला बाई के पास गया और उके कान मे कुच्छ बोला….लैला खुद सोच रही थी क्या करे….जिस तरह से आलोक कोहिनूर को उठाकर ले गया बहुत कुच्छ सोचने पर मजबूर कर गया उसे …पर वो भी पूरी घाघ थी. अपने “कोहिनूर “ को यू ही कैसे जाने देती . वो भी उठकर तेज़ी से अंदर की ओर चली गयी.

वही ऋुना के चेहरे पर एक संतोष के भाव थे…बरसो बाद आज उसके दिल मे उम्मीद का कोई चिराग जला था.

इधर आलोक कुच्छ सदमे की सी हालत मे कोहिनूर को उठाए अपने रूम की ओर चला जा रहा था.

सोफी उसके साथ साथ चल रही थी लेकिन कुच्छ बोल नही रही थी.बस चुप चाप आलोक के चेहरे को देखे जा रही थी.सोफी ने जल्दी से आगे बढ़कर दरवाजा खोला..

आलोक कोहिनूर को लेकर अंदर दाखिल हुआ और उसे अपने बेड पर लिटा दिया……..उसके सिरहाने बैठकर चुप चाप उसके चाँद से मुखड़े को तकने लगा. ख्यालो की एक आँधी चल रही थी उसके मन मे .

 


कहाँ वो मासूम सी सलवार कमीज़ मे लिपटी काजल और कहा ये कोहिनूर- एक तवायफ़. कितना कुच्छ बदल दिया था इन कुच्छ सालो ने. लेकिन कुच्छ ऐसा था जो अभी भी नही बदला था….वो थी काजल की मासूमियत, उसके चेहरे की पाकिज़गी..उसका वो सादापन. कम से कम आलोक तो इस बात को महसूस कर रहा था.सोफी वही चुपचाप खड़ी आलोक के चेहरे पर आते जाते भाव को देख कर कुच्छ अनुमान लगाने की कोसिस कर रही थी…

आलोक ने अपने हाथ कोहिनूर के माथे को छुने के लिए बढ़ाए ही थे कि…

“अरे अरे हुज़ूर……… .कुच्छ मूह दिखाई तो करवाई दो…अरे ऐसी भी का जल्दी……आप ही की है…..जो चाहे करना …पर तनिक ठहर जाओ…….अरे हमको तो तलाश थी तोहरे जैसे जौहरी की जो आकी सही कीमत लगगगगगग…………..” लैला की मूह की बात मूह मे ही रह गयी इतनी ज़ोर से गुर्राया आलोक……….

“हलक से ज़ुबान खिच लूँगा अगर काजल के बारे मे एक और लफ्ज़ गंदा निकाला तो……..तू कीमत लगाएगी काजल की ……..तू…….” पलक झपकते ही लैला की गर्दन आलोक के पंजे मे थी

आलोक की आँखे खून बरसा रही थी मानो…जैसे कोई होश ही ना था उसे….

सोफी बुत बन गयी थी बिल्कुल ..शांत-शांत से, सुलझे सुलझे से रहने वाले आलोक का ये रूप पहली बार देखा था उसने. बहुत डर गयी थी वो….लैला का चेहरा एकदम लाल हो गया था और वो आलोक से छूटने की पूरी कोशिस कर रही थी लेकिन सब बेकार.

“छोड़ दीजिए मालिक इसे…….अल्लाह का वास्ता है आपको……..आपके रब का वास्ता छोड़ दीजिए…”ऋुना दाखिल ही हुई थी कमरे मे कि अंदर का नज़ारा देखकर आलोक की ओर भागी और मिन्नते करने लगी.

आलोक पर जैसे कोई नशा सवार था…उसकी पकड़ ढीली नही हो रही थी……ऋुना किसी को बुलाने के लिए बाहर की ओर भागी.

“ये क्या हो रहा है????छोड़ो उसे….”सदानंद की कड़क आवाज़ कमरे मे गूँज गयी. उसका भी असर आलोक पर नही पड़ा था……. वो आगे बढ़े और आलोक के हाथ को पकड़ कर लैला के गले से हटा दिया………आलोक अपने पापा की ओर एकटक देखने लगा मानो पुच्छ रहा हो कि क्या ग़लत कर रहा हू?? .

सदानंद का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था…लेकिन आलोक एक सवालिया नज़रो से उनकी ओर देख रहा था……आम तौर पर सदानंद गुस्सा होते तो आलोक सर झुका कर वहाँ से चला जाता था…लेकिन आज ज़िंदगी मे पहली बार ऐसा नही हुआ था…….और इसी बात ने सदानंद को और गुस्सा दिला दिया.

“तुम्हे तो मैं बाद मे देखूँगा…….बाबू लाल उठाकर फेंक दो इस हरामजादी तवायफ़ को हवेली की बाहर..बद्जात ,साली…..होती ही ऐसी हैं कि किसी का भी घर फोड़ दे………” सदानंद ने बाहर जमा हो चुकी अपने आदमियो की भीड़ मे से किसी का नाम लिया.

एक काला मोटा गुंडे जैसा दिखने वाला आदमी आगे बढ़ा……..

इस से पहले की वो बेड की ओर बढ़ पाता उसका रास्ता रोक लिया आलोक ने……

“ऐसी ग़लती मत करना……” आलोक ठीक उसके सामने खड़ा हो गया……….

बेचारा गुंडा कस्मकश मे पड़ गया….किसकी सुने…….लेकिन था तो वो सदा बाबू का ही आदमी…….

“सुना नही तुमने…….??” सदानंद चौहान फिर से गुर्रा उठे.

वो गुंडा आलोक के सामने से निकलते हुआ कुच्छ कदम ही बढ़ा था कि आलोक का जोरदार घूँसा उसके लेफ्ट जबड़े पर पड़ा………एक जोरदार चीख के साथ वो ज़मीन पर गिर पड़ा………

सदानंद को समझ मे नही आ रहा था की आलोक को क्या हो गया है?? एक तवायफ़ के लिए आज वो अपने बाप के खिलाफ हो गया था…

“प्लीज़ पापा मुझे मजबूर मत कीजिए…हाथ जोड़ता हूँ …….थोड़ा सा मौका दीजिए……बस कुच्छ वक़्त……” आलोक ने आज तक कभी अपने पाप की बात नही टाली थी, उँची आवाज़ मे बात तक नही की थी कभी…लेकिन आज …….आज तो वो कोई और ही था.कोई दीवाना.

“ऐसा क्या है उस तवायफ़ मे…अरे मैं तेरे लिए ऐसी रंडियों की लाइन लगा …………..” सदानंद चौहान की आवाज़ गले मे ही रह गयी एक बार फिर इतनी ज़ोर से ग़र्ज़ा आलोक…….

“बसस्स्स्सस्स पापा………..”सदानंद के सामने आँखो मे शोला दह्काते खड़ा था आलोक.मुत्ठिया भिन्च गयी थी उसकी…..मानो कह रहा हो काश आप मेरे बाप ना होते तो आज…………!!

“बस कीजिए आप लोग..भगवान के लिए …….मत लड़िए एक तवायफ़ के लिए……”इस शोरगुल मे कोहिनूर को होश आ गया था.

“तुम???????? ओह तो ये बात है……” सदानंद की नज़र जैसे ही कोहिनूर पर पड़ी उनके चेहरे पर एक कुटील मुस्कान आ गया

“आप??????” सदानंद की चेहरे पर नज़र पड़ते ही ऋुना के मूह से अनायास ही निकल गया.
 
दोस्तो एक और कहानी शुरू कर दी है

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सदानंद एक तक ऋुना की ओर देख रहे थे...कुच्छ बोल नही रहे थे..मानो कुच्छ याद आ गया हो उन्हे...ऋुना का भी वही हाल था........लेकिन एक नागवरि थी ऋुना के चेहरे पर..ऐसा लग रहा था कि अतीत के कुच्छ ऐसे पन्ने उसकी आँखो के सामने आगये थे जिन्हे वो कभी दुबारा पढ़ना नही चाहती थी.

जैसे ही सदानंद को अहसास हुआ सबकी मौजूदगी का, अपने आप को संभाल लिया उन्होने......

"जाओ सब लोग" सदानंद की आवाज़ सुनते ही सारे नौकर वहाँ से चले गये.....बाबूलाल भी उठकर अपने जबड़े को संभालता धीरे धीरे बाहर चला गया.

कमरे मे अब सिर्फ़ ऋुना, सदाबाबू,कोहिनूर ,आलोक और सोफी रह गये थे.लैला चली गयी पर ऋुना नही गयी.क्यू?? ये तो सिर्फ़ ऋुना ही जाने.

"ले जाओ इसे यहान से......"सदानंद अपने गुस्से पर काबू पाने की कोसिस करते हुए फुफ्कार रहे थे.

"कहीं नही जाएगी ये...तब तक नही , जब तक मैं नही कहूँगा........." आलोक एक बार फिर से अपने बाप की खिलाफत पर उतर आया.

"मैं जाउन्गी !!!, चलिए ऋुना बाजी........" इस बार बहुत देर से सारा तमाशा देख रही कोहिनूर बोल पड़ी.

" तुम कहीं नही जाओगी........." आलोक ने घूर कर उसे देखा.

"तवायफ़ हूँ मैं आलोक बाबू......." एक दर्द उमड़ आया कोहिनूर के चेहरे पर.

"काजल ?" आलोक कुच्छ कहने ही वाला थी कि कोहिनूर चीख पड़ी.

"कोहिनूर नाम है मेरा..........काजल नही हूँ मैं....." आलोक सन्न रह गया इस बार....कुच्छ नही बोला.....बोलता भी तो क्या.

सदानंद ऋुना से नज़रे नही मिला रहे थे...लेकिन गुस्सा उनके चेहरे से सॉफ साफ झलक रहा था.

आलोक को समझ मे नही आ रहा था कि वो क्या बोले.....चुपचाप लाचार सा काजल को देख रहा था.

कुच्छ पल के लिए सब लोग खामोश हो गये और सदानंद ने इस खामोशी को तोड़ा.........

"लैला को बुलाओ" उन्होने ने कहा...पर कोई टस से मस ना हुआ...नौकर तो उनके वहाँ थे नही और जो थे वो अभी उनके हुक्म की तामील नही करने वाले थे......खुद ही ज़ोर ज़ोर से आवाज़ें लगाने लगे लैला को...........

लैला नही आई तो झुंझला कर ही बाहर की बढ़े और जाते जाते........

"ले जाओ ऋुना बाई इसे यहान से..कही ऐसा ना हो कि........."बस कुच्छ कहते कहते रुक गये और दाँत पीसते हुए बाहर चले गये.

ऋुना ने कोहिनूर को हाथ पकड़ा और चल दी......कोहिनूर ने एक बार भी आलोक की ओर नही देखा....उसके चेहरे पर एक उदासी थी..एक बेबसी. वो बाहर चली गयी.... .ऋुना ने जाते जाते आलोक की ओर देखा और आँखो ही आँखो मे उसे शांत रहने का इशारा किया. आलोक खड़ा देखता रहा...एक बार फिर से मजबूर. ऋुना उस से कुच्छ कहना चाहती थी शायद पर कोहिनूर के सामने शायद नही.

ऋुना पिच्छले दरवाज़े से बाहर आई तो देखा कुच्छ दूर पर खड़ी लैला सदानंद से बात कर रही थी और बार बार हां मे सर हिला रही थी. वो चुपचाप कोहिनूर के साथ जाकर कार मे बैठ गयी...कोहिनूर के चेहरे पर एक दर्द था...एक पछ्तावा था. वो आँखे मुन्दे सीट की बॅक से लगी बैठी थी..आँखो से एक एक करके धीरे धीरे आँसू उसके गोरे गोरे गालो पर लुढ़क रहे थे.

 


अचानक ऋुना की नज़र उसी दरवाज़े से बाहर आती सोफी पर पड़ी...कुच्छ कौंधा उसके दिमाग़ मे...

"कोहिनूर मे अभी आई..वो मैं अपना पर्स भूल गयी अंदर........."ऋुना ने कहा .

"जी बाजी" कोहिनूर बिना आँखे खोले ही बोली.

ऋुना तेज़ी से बाहर निकली और सबसे नज़रे बचाते हुए सोफी के पास पहुचि.इस से पहले सोफी कुच्छ समझ पाती ऋुना ने उसे चुप रहने का इशारा किया और उसका हाथ पकड़ कर दरवाज़े से अंदर हो गयी.

" वो लड़का कहाँ है?? अंदर ही है ??वो..वो ठीक है ना...??" ऋुना फिक्रमंदी से पुच्छ रही थी.

" हू...?? कौन ..आलोक " सोफी ने धीरे से कहा.

"हां...." ऋुना ने इतना ही कहा.....कि बाहर से लैला की आवाज़े आने लगी.....

"ओ ऋुनाअ?कहाँ मर गाइिईई"

"सुनो मैं जा रही हूँ...उस लड़के से कहना बहुत जल्द कोहिनूर मिलेगी उस से..कुच्छ वक़्त लग सकता है लेकिन मिलेगी ज़रूर....कहना कि बहुत मजबूर है कोहिनूर...कहना कि ......समझा देना उसे..." जल्दी जल्दी इतना ही बोल पाई ऋुना और बाहर निकल गयी.शायद जो करने आई थी वो कर भी ना पाई.पर वो किसी भी तरह से लैला के शक के दायरे मे नही आना चाहती थी.

सोफी उसकी बातें तो शायद ही समझ पाई हो लेकिन उसके हाव भाव और उसके कहने का मतलब खूब समझ गयी थी.

"कहाँ मर गयी थी तू " ऋुना को देखते ही लैला ने डांटा.

"जी वो पर्स भूल गयी थी अपना अंदर"

"तो कहाँ है पर्स ??"

"व..वो..वो थोड़ी ना मिलेगा..किसी नौकर के हाथ लग गया होगा... वैसे भी शक्ल से तो सारे चोर ही लग रहे हैं.." ऋुना बोलते बोलते कार मे घुस गयी.

लैला भी कार मे बैठ गयी....और कार चल दी.

लैला बड़े ध्यान से कोहिनूर को देख रही थी.......जो कुच्छ हुआ था उसे पूरा तो नही पता चल पाया था ...लेकिन कोहिनूर के लिए आलोक ने उसका गला दबाया था ,ये अच्छी तरह याद था....भला कैसे भूल जाती.

"साली तू चीज़ क्या है रे....आए हाए रजाआ !!!! जमाना तो देखो..तवायफ़ की मोहब्बत मे एक शरीफजादा साला अपने बाप से लड़ गया......हा हा हा.....अच्छा एक बात बता.... अयीईयी बता ना !! ...क्या चक्कर है ....इतनी सी देर मे क्या जादू फूँक दिया....पहले का याराना लगता है....साली मैं तो तुझे बड़ी शरीफ समझती थी....खैर मुझे क्या ...सदाबाबू से ज़्यादा कीमत कौन देगा तेरी........और मुझे तो बस नोटो से मतलब है......."

लैला चटकारे ले लेकर बोल रही थी...ज़ाहिर है उसे किसी बड़े माल की उम्मीद दिलाई गयी थी...कोहिनूर चुप चाप आँसू बहाए जा रही थी और ऋुना एकदम शांत थी ..मानो अपने मौके का इंतज़ार कर रही हो........अपने वक़्त का इंतज़ार कर रही हो.

बहुत कुच्छ चल रहा था उसके दिमाग़ मे ...कुच्छ अतीत के बारे मे कुच्छ भविश्य के बारे मे.......कुच्छ बुरी यादें, कुच्छ अच्छे सपने.

कार एक बड़े से बंगले के सामने जाकर रुकी.......वहाँ नही जहाँ लैला बाई का कोठा था.

"आज रात हम यहीं रुकेंगे....." लैला ने कहा और हवेली के अंदर चल दी.

ऋुना को क्या ऐतराज़ होना था..तवायफ़ की तो ज़िंदगी ही यही होती है...कोई कोठा या फिर हर रात नया बंगला...."घर" कहाँ होता है उनके नसीब मे.

रात के 12 बाज रहे थे और ऋुना , लैला के सामने बैठी थी बंगले मे . ऋुना सदानंद को देखकर चौकी थी, ये लैला ने देखा था..लैला ने पुछा तो उसने कह दिया कि उसके धंधे मे आने के बाद , सदानंद कुच्छ सुरू के कस्टमर मे से था.लैला को भी पता ही था कि तवायफों की किसी से भी पहचान बस जिस्म के सौदे तक ही होती है..उसने भी ज़्यादा नही पूछा.

"ऋुना, एक काम है तुझ से ..."

"जी कहिए"

"सदा बाबू ने कहा है कि कोहिनूर को कुच्छ दिनो के लिए इस शहर से हटाना है..जब तक उनका बेटा यहाँ है ...फिर वो कोहिनूर का कोई बंदोबस्त कर देंगे........." लैला बोले जा रही थी.

"जी" ऋुना का दिमाग़ बहुत तेज़ी से काम कर रहा था.

"तो मैं चाहती हूँ कि तू उसे लेकर अपने गाँव चली जा.....बड़े लोग हैं..यहाँ रहेगे और उस लौन्डे के हत्थे चढ़ गयी तो जाने सदाबाबू क्या करेंगे..समझ रही है ना तू......"

"जी"ऋुना ने बस इतना ही कहा.

"कल का तेरा और उसका टिकेट करवा देती हूँ......और सुन उसे कुच्छ मत बताना ....उसे यही पता चलना चाहिए कि वो लड़का इसके साथ रात गुज़रना चाह रहा था और उसके बाप को ये पसंद नही था....और इसीलिए उसे कुच्छ दिन के लिए शहर से दूर भेजा जा रहा है...क्यूकी बात एक बड़े आदमी की है..नेता की है...अगर बात खुल गयी तो तेरी और मेरी दोनो की खाल उतर जाएगी...बहुत ज़ालिम होते है ये खादी वाले."

 
लैला अपनी आदत के वीपरीत काफ़ी संजीदगी से बात कर रही थी......उसे खुद नही पता था कि आलोक कैसे जानता है कोहिनूर को...और कोहिनूर कैसे जानती है उसे...वैसे भी वो जानकर क्या करती..उसे कोई दिलचस्पी नही थी..उसे तो बस कोहिनूर के रूप मे एक तिजोरी मिली थी जिसकी सही कीमत उसे मिलनी थी.

बेचारी लैला ऋुना को वो समझा रही थी जो वो अभी तक खुद ना समझी थी.दौलत का परदा पड़ा था आँखो पर, इसीलिए आलोक की तड़प भूल गयी थी.वैसे और कर भी क्या सकती थी वो, जो कहा गया था उसे वो करना था और इसकी कीमत उसे मिल रही थी...इस से ज़्यादा उसे मतलब नही था किसी चीज़ से.

उसकी नज़र मे कोहिनूर भी एक तवायफ़ थी और अगर आलोक के साथ उसका कोई रिश्ता था भी तो बस एक तवायफ़ का अपने आशिक़ से होने वाला रिश्ता ...और लैला को अच्छे से पता था ऐसे रिश्तों की उम्र बहुत लंबी नही होती...सिर्फ़ तब तक जब तक उस से अच्छि तवायफ़ किसी कोठे पर ना आ जाए.यही उसका अनुभव था और यही उसकी अपनी सोच थी.

"जी बहुत बेहतर...ऐसा ही होगा.." ऋुना ने एक बार फिर बस इतना ही कहा.

"एक बात बता..ये साला सदा का लौंडा पागल है क्या...........मेरा गला दबाने लगा.....अबे साला क्या शादी करेगा उस से......एक तवायफ़ से..आज तक तो किसी शरीफ़ज़ादे ने की नही....ये साला अमीरों के चोचले ना.......अरे अमरीका से आया है ना...........छोड़ रज्जाआअ.........अपनी समझ मे कहाँ आने वाला हैं..........अपने को तो रोकडे से मतलब और वो अपुन को मिल रहा है........."लैला बोल तो ऋुना से रही थी ...लेकिन सारी बातें खुद से ही किए जा रही थी.

ऋुना मन ही मन खुदा का शुक्रिया अदा कर रही थी..शुक्र था कि उसके साथ कोहिनूर को भेज रही थी लैला.उसने सोच लिया था कि एक बार पहले कोहिनूर से बात हो जाए , सारी सच्चाई पता चल जाए......फिर वो एक कोसिस ज़रूर करेगी,अगर उस कोसिस की ज़रूरत लगी उसे तो.

दूसरे दिन दोपहर के 2 बजे की ट्रेन से कोहिनूर और ऋुना , ऋुना के गाँव को रवाना हो गये .उनके साथ लैला का एक खास आदमी भी था -जुंमन . खूब लंबा चौड़ा , काला रोबीला चेहरा, लाल आँखे...कुर्ता और लूँगी पहने हुए.......किसी दानव के जैसा.......थोड़ी दूर पर बैठा अपनी चील सी नज़रो से ऋुना और कोहिनूर को घूर रहा था.

ट्रेन अपनी रफ़्तार से मंज़िल की ओर बढ़ी जा रही थी....ऋुना के गोद मे सर रख कर लेटी कोहिनूर कल से बिल्कुल खामोश थी..बस हां हूँ मे हर बात का ज़वब दे रही थी.कल से उसने कुच्छ भी नही खाया था..रह रहकर दर्द की एक लहर सी दौड़ जाती थी उसके सीने मे.आँखे नम थी और लब खामोश..बस दिल मे यादों का एक तूफान था,जो थम ही नही रहा था.

ट्रेन मे ज़्यादा भीड़ नही थी.....जुंमन की सीट पिछे थी और ऋुना और कोहिनूर की आमने सामने.... रात हो चुकी थी...सबने कुच्छ थोड़ा बहुत खाया....और कोहिनूर एक बार फिर ऋुना की गोद मे लेट गयी...जुंमन के होने से दोनो कोई बात नही कर रही थी.

 


थोड़ी देर बात जुंमन उठकर अपनी सीट पर चला गया सोने....अब उन दोनो के आस पास की सारे सीट खाली थी...ऋुना ने एक नज़र जुंमन पर डाली...कुच्छ ही देर मे उसके ख़र्राटों की आवज़ें आने लगी.........और वैसे भी वो दूसरी ओर चला गया था तो अब वो उनकी बातें सुन पाएगी ऐसा लगभग असंभव ही था.कम से कम ऋुना और कोहिनूर को तो यही लग रहा था कि जुंमन सो गया .और वैसे भी कल से ऋुना के दिल मे हलचल मची हुई थी ...सवालो का एक अंबार था उसके मन मे.अब उस से सब्र नही हो रहा था.....

"कोहिनूर" ऋुना बड़े प्यार से उसके बालो मे हाथ फेरते हुए बोली.

"ह्म्म्मथ" कोहिनूर हल्के से बोली..

"कौन है ये लड़का, वो तुझे काजल बुला रहा था...कैसे जानता है वो तेरे बारे मे ???........" ऋुना ने एक साथ वो सब कुच्छ पुछा, जो वो कल से ही पुछ्ना चाह रही थी.

कोहिनूर ने आँखे खोली और सूनी सूनी नज़रो से उसे देखने लगी....मानो पुच्छ रही हो कि क्या फ़र्क पड़ता है अब......उसने तो खुद ही आलोक को दुतकार दिया था कल...खुद कह दिया था कि क्या हक़ है उसपर ...फिर अब क्यूँ....??

"बताओ कोहिनूर कौन है ये लड़का ?? "

"नही बाजी....प्लीज़ अब मत पुछिये .......मैं बहुत शर्मिंदा हूँ...कल जाने कैसे एक कमजोर लम्हे का शिकार हो गयी उसे अचानक अपने सामने पाकर मैं...अगर मुझे पता होता कि यहाँ वो होगा तो मैं कभी ना आती........कभी भी नही....." कोहिनूर की आवाज़ मे एक पछ्तावा था.

"पता तो मुझे भी नही था कि वहाँ कौन मिलेगा, नही तो मैं भी ना आती." एक सपने के से आलम मे ऋुना ने कहा.

"खैर वो सब बातें फिर कभी, अभी मेरी बात सुन.......बड़ी किस्मत वाली है तू कि तुझे कोई चाहने वाला है......उसकी नज़रो से चाहत झलक रही थी ...एक तवायफ़ की ज़िंदगी मे वो पल नही आता जब कोई उसकी खातिर अपनो के खिलाफ हो जाए. ..उसे तो बस खरीदा जाता है , बेचा जाता है और एकदुसरे से बाँटा जाता है...अपनाया नही जाता.....लेकिन उस लड़के की आँखो मे कुच्छ और ही था.......मुहब्बत थी...देख मुझे बता सब कुछ......शायद मैं कुच्छ कर पाऊ तेरे लिए...एक छोटी सी कोसिस ......." ऋुना ने उसका चेहरा अपनी ओर करके उसकी आँखो मे देखते हुए कहा.........

"ऐसा क्यू होता है बाजी एक तवायफ़ के साथ.....ना उसके पास मांझी की खूबसूरत यादें होती हैं ना आने वाले दिन के सुहाने सपने....क्यू इतना अंधेरा होता है उसकी ज़िंदगी मे....क्यू जब दिल रोता है तब भी उसे हँसना पड़ता है............बाजी ! कोई क्यू नही बदल देता इस दुनिया की ये रिवायते .........क्यू बना दी जाती है कोई मासूम काजल एक कोहिनूर........ " कोहिनूर की आँखे छलक पड़ी और वो ऋुना के साथ अपनी मांझी के गलियारो मे डूबती चली गयी.......

इस बात से बेख़बर कि दो आँखे और दो कान उनकी हर बात ,हर हरकत देख और सुन रहे थे.......जुंमन इसी खेल का तो शातिर खिलाड़ी था.

"ऋुना बाजी, मेरी ज़िंदगी मे चन्द दिन खुशियों के भी थे ...जिन्हे याद करके अब मुझे सबसे ज़्यादा तकलीफ़ होती है.......काजल ..हां यही नाम था मेरा , मेरे कॉलेज मे........" कोहिनूर अपनी यादो के सफ़र पर ले चली ऋुना को.

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" मैं बचपन से ही पढ़ने मे अच्छी थी और स्वाभाव की शांत…….लोगो से ज़्यादा घुलना मिलना मुझे नहीं आता था...शायद इसकी वजह मेरी परवरिश और मेरा परिवारिक अकेलापन था……..बचपन से ही मैं अपने नाना के यहाँ रही ...मेरी मम्मी शहर मे रहती थी ...पापा के बारे मे ज़्यादा पता नहीं है..सिवाय इसके कि वो बचपन मे ही गुजर गये थे.बस इतना ही बताया था माँ ने….छोटी थी तो इस से ज़्यादा पुछा नहीं, बड़ी हुई तो माँ को कभी बताने की फ़ुर्सत नहीं मिली…या शायद….".. बोलते बोलते काजल की आँखे भर आई.ऋुना शांत भाव से सुन रही थी...मानो उसकी अपनी ही कहानी हो.

काजल ने एक लंबी साँस ली और फिर बोलना सुरू किया...........

"बचपन से अपने मम्मी पापा के बारे मे ताने सुनते सुनते मुझे खुद के वजूद से नफ़रत सी हो गयी थी……लोग अलग अलग बातें करते थे.....लेकिन मेरा मन नहीं मानता था….…मुझे हमेसा लगता ज़रूर मम्मी की कोई मजबूरी होगी जो मैं उनसे दूर हूँ…..लेकिन थी तो बच्ची ही, कभी कभी सोचती थी कि जब किसी को मेरी ज़रूरत ही नहीं थी तो क्यू मैं दुनिया मे लाई गयी थी…??

ना ज़्यादा किसी से बोलना , ना कही आना जाना......मेरी दुनिया मेरे वजूद के चारो ओर सिमट सी गयी थी. घर के सारे काम करती और फिर बाकी का वक़्त अपनी किताबों को गले से लगा लेती.....वो कभी कोई ताना ,कोई उलाहना नहीं देती थी...मेरी कितबे मेरी दोस्त बनती गयी और शायद यही वजह थी की मैं पढ़ने मे काफ़ी ज़हीन थी.लेकिन बचपन क्या होता है मैने जाना नहीं.

“एक गीत है ऋुना बाजी, मुझे बड़ा पसंद था……अभी भी पसंद है.” काजल ने किसी छोटे बच्चे की तरह ऋुना के हाथो को सहलाते हुए कहा.

“कौन सा??”ऋुना ने पुछा.

“मैने माँ को देखा है, माँ का प्यार नहीं देखा……..सुना है आपने ???” कहते कहते काजल का गला भर आया

“नहीं सुना….आगे बता” ऋुना का भी वी हाल था, बस इतना ही बोली.

"ऋुना बाजी, माँ बाप के प्यार ना मिल पाने का ख़ालीपन मेरी ज़िंदगी मे एक नासूर बन गया....कभी मैने बचपन के वो खुशियों वाली दिन नहीं देखे...खैर………., जब तक नाना थे सब कुछ ठीक था..मम्मी भी कभी कभी आती थी..नाना कुछ पूछते तो बस इतना ही कहती थी कि शहर मे नौकरी के लिए कोशिस कर रही हुँ...मम्मी का सोचना भी शायद ठीक था.उन्हे शायद पता था कि नाना के ना होने पर ,मैं या वो ,कभी ननिहाल मे नहीं रह पाएँगे...और उनका सोचना बेवजह नहीं था."

"मैं बहुत छोटी थी जब नाना का देहांत हो गया....मैं खूब रोई ....बिल्कुल टूट गयी......नाना के रहते एक सहारा था...एक आसरा था......मेरे नाना मुझे बहुत प्यार करते थे……उनके बाद ननिहाल मे मामा मामी ने रहने नहीं दिया.....माँ ने मुझे बोरडिंग स्कूल भेज दिया....शायद उन्हे कोई नौकरी मिल गयी थी.....मुंबई मे…मैने पुछा तो उन्होने कुछ नाम भी बताया था पोस्ट का..मुझे याद नहीं रहा….." ...फिर एक पल को रुकी काजल, दो घूँट पानी पिया और एक गहरी साँस लेकर फिर बोलने लगी.

"मेरा ननिहाल बंगाल के एक छोटे से गाओं मे था और मेरा बोराडिंग स्कूल वहाँ कोलकाता मे..........बोरडिंग स्कूल मे मैने जी लगाकर पढ़ना सुरू कर दिया...सबकुछ पिछे छ्चोड़कर.........माँ कभी कभी आती थी.......लेकिन मुझे माँ से भी कोई खास लगाव नहीं था..........माँ के साथ मैं कभी ज़्यादा रही ही नहीं थी.....या शायद मेरी माँ ही मुझसे दूर रही थी....मुझे नहीं पता क्या वजह थी.....हां, पैसे महीने के महीने मेरे पास आते थे........"

"फिर बोराडिंग से मैं कॉलेज मे आ गयी और गर्ल्स हॉस्टिल मे रहने लगी........मैं 18 साल की हो चुकी थी....ज़िंदगी का एक ऐसा पड़ाव जब हर लड़की की आँखे सुनहरे सतरंगी सपने सजोने लगती हैं.....लेकिन मेरे सपने बहुत छोटे थे..........पढ़ाई पूरी करना और एक छोटी सी नौकरी...मेरे सपनो की ताबीर इस से ज़्यादा हो पाए, ऐसा हौसला कभी कर ही नहीं पाई मैं.........और ना कोई ऐसा था जो मेरे सपने की उड़ान को पंख देता. ….मैं बड़ी हो गयी थी .........शायद अपनी उमर से ज़्यादा बड़ी हो गयी थी.......लेकिन मेरे अंदर का ख़ालीपन नहीं गया.......... मेरी माँ का मेरे पास ना होना मुझे खलने लगा था अब...."

"कॉलेज का पहला साल ख़त्म हो चुका था...रिज़ल्ट भी आ गया था...मैने कॉलेज टॉप किया था…..क्लास मे चुप चुप सी रहने वाली मैं, बॅक बेंचर मे शुमार, मुझे कोई जानता ही नहीं था.......लेकिन रिज़ल्ट के आने के बाद से बहुत हाइलाइट हो गयी थी मैं...............मेरी किस्मत एक नया मोड़ ले रही थी...अच्छा या बुरा मुझे खुद नहीं पता था......"

"कॉलेज मे मुझे सम्मानित किया गया था उस दिन.......मुझे ख़ुसी नहीं हुई थी ये कहना शायदा ग़लत होगा............खैर, मेरी ख़ुसी मे शामिल होने वाला मेरा कोई अपना नहीं था....माँ से कभी कभार बात हो जाती थी.लेकिन बस ऐज ए फॉरमैनल्टी..ऐसा नहीं था कि मेरी माँ मुझे प्यार नहीं करती थी...लेकिन शायद कभी उस प्यार का अहसास वो नहीं दिला पाई मुझे....तब तक नहीं जब तक उनकी मौत ना हो गयी." काजल की आँखे एक बार फिर से भर आई……..ऋुना चुपचाप सुन रही थी. ट्रेन अपनी रफ़्तार से दौड़ रही थी..........काजल भी आज अपने दिल का सारा दर्द कह देना चाहती थी....वो दर्द जो किसी कीड़े के जैसे उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था.

उसने फिर से बोलना सुरू किया...........

 


"धीरे धीरे कॉलेज मे मेरे एक दो दोस्त बने........मुझसे दोस्ती की कोई खास वजह नहीं थी……… ..शिवाय मेरी जहानत के.......स्टडी मे अच्छा होना कुछ लोगो के लिए शायद कॉलेज मे भी मायने रखता था...ऐसे ही दोस्तो मे थी अंजलि...........सदानंद चौहान की बेटी….." काजल ने ऋुना की आँखो मे देखा. सदानंद का नाम लेते ही , ऋुना के चेहरे को देख कर ऐसा लग रहा था कि उसके मन मे कोई उथल पुथल मची हुई थी.

"क्या हुआ ऋुना बाजी" काजल ने बड़ी मासूमियत से पुछा......

"कुछ नहीं मेरी बच्ची ..बस यही सोच रही हू कि हर तवायफ़ की कहानी इतनी एक सी क्यू होती है......खैर, बता आगे ......उसी के ज़रिए उस लौन्डे से तेरी मुलाकात हुई होगी ??...."

"जी.आलोक से ..हां ऋुना बाजी आलोक नाम है उनका........मेरी मुलाकात पहली बार कॉलेज मे हुई थी वो अंजलि को छोड़ने आए थे........पहली बार कॉलेज के बाहर ही हाई हेलो हुई.."

"कोलकाता मे आलोक और अंजलि रहकर पढ़ाई करते थे...उनकी फॅमिली मुंबई मे रहती थी...वैसे उन दोनो के अलावा बस उसके पापा ही थे फॅमिली मे.....काफ़ी रईश लोग थे...एक अच्छा ख़ासा फ्लॅट ले रखा था आलोक ने...आलोक जब भी मिलते मुझे एक अलग ही नज़र से देखते थे...और जब कभी ग़लती से मेरी नज़र पड़ जाती तो बस हल्का से मुस्कुरा देते.......मैं समझ नहीं पाती कि क्या करूँ, लेकिन मैने कभी खुद से कदम उनकी ओर नहीं बढ़ाए..........."

काजल मानो सफाई पेश करते हुए बोली..हां..एक तवायफ़ को ये सफाई देनी ही पड़ती है...उस पर इल्ज़ाम जो होता है अमीरजादों , शरीफाजादों को फाँस लेने का.

"लेकिन ऋुना बाजी आलोक एक बेहद अच्छे इंसान थे.....आइ मीन हैं…..सुलझे हुए ...ज़िंदगी से भरपूर………..हस्मुख.....और मुझे भी अच्छे लगते थे."पहली बार एक हल्की सी शर्म की लाली काजल के गालो पे चमक गयी.....उसने बोलना जारी रखा.

"हम तीनो अक्सर एक साथ बाहर आने जाने लगे.......आलोक के पापा कोलकाता नहीं आते थे...मेरा तो कोई आनेवाला था नहीं……..माँ कभी आती तो 2-4 घंटे मे चली जाती.......अब मैं खुश रहने लगी थी ...अंजलि और आलोक के साथ ने एक और ही दुनिया दिखा दी थी मुझे.........अंजलि एक बहुत अच्छी दोस्त थी ...एक ऐसी दोस्त जिसपर मैं खुद से ज़्यादा यकीन करती थी...और आलोक???...अभी तक इस उलझन मे थी कि इस रिश्ते को क्या नाम दूं.........जो नाम था उस रिश्ते का वो मैं आक्सेप्ट नहीं कर पा रही थी.......दिल डर रहा था कि कही अपनी उड़ान से उँचा सपना ना देख बैठू.....जिसके टूटे हुए टुकड़े आँखो को चुभने लगे..........हां बाजी, खता कर दी थी इस दिल ने....उन दिलकश आँखो की भाषा ये दिल समझ गया था....मुझे मुहब्बत हो गयी थी....एक खामोश मुहब्बत…”

”एक ऐसी खामोश मुहब्बत जिसका गला भी मैं बड़ी खामोशी से घोंट देती, लेकिन किस्मत को तो मेरा मज़ाक बनाना था..ऐसा कर ना सकी..यही मेरी ख़ाता थी कि मैने उसी पल उन दोनो का साथ नहीं छोड़ दिया…नहीं छोड़ पाई बाजी…सेहरा के प्यासे को पानी की एक बूँद मिल जाए तो वो कैसे छोड़ दे…………मैं भी बचपन से इसी थोड़े से अपनेपन को तरसी थी..मैं नहीं छोड़ पाई….…मुझे तो मुहब्बत का समुंदर मिल गया था…..हां, ये नहीं पता था कि ये समुंदर मुझे डुबो देगा." काजल की चेहरे की उदासी और गहरी हो गयी , पर उसने खुद को संभाला और बोलना जारी रखा.

"अंजलि मेरी क्लास मेट थी और हम दोनो अक्सर कॉलेज साथ ही जाते थे...आलोक हमसे एक साल सीनियर थे लेकिन वो दूसरे कॉलेज मे थे..........आलोक अपनी कार मे हम दोनो को कॉलेज छोड़ते हुए खुद के कॉलेज जाते थे......मैं हमेशा आलोक से दूर भागती थी..कभी कोई मौका नहीं देती किसी भी बात का.....और फिर एक दिन जब मैं अंजलि के घर पहुचि.........."काजल की आँखो के सामने सारे पुराने मंज़र उभर आए.....उसके प्यार और दर्द की कहानी.

अंजलि जिसे मैं प्यार से "अंजू" कहती थी अपने रूम मे बिस्तर पर लेटी थी........."क्या हुआ अंजू..........?? तू अभी तक तैयार नहीं हुई........कॉलेज नहीं चलना क्या......"

"नहीं यार........तबीयत थोड़ी ठीक नहीं लग रही...........प्लीज़ तू चली जा ..नहीं तो लेक्चर मिस हो जाएगा....तेरा रहेगा तो मैं भी कर लूँगी.."पता नहीं क्यू मुझे लग रहा था कि अंजू झूठ बोल रही है....लेकिन ऐसी कोई बड़ी बात भी नहीं थी..मैं बाहर आने लगी.

"सुन ,भाई के साथ चली जा ना...."अंजू ने पिछे से कहा.

मेरे दिल धक्क से रह गया..आज तक मैं कभी अकेली आलोक के साथ कही नहीं गयी थी...मैने साफ साफ मना कर दिया और जल्दी जल्दी वहाँ से निकल गयी.डर था कि कही आलोक से सामना ना हो जाए.मैं मुहब्बत से भाग रही थी बाजी, वो मुहब्बत जो हर रोज जाने कैसे खुद ही बढ़ती जा रही थी.......शायद आलोक की शराफ़त का बड़ा हाथ था इसमे …या फिर शायद उनके अपनेपन का ..या शायद मेरे अकेलेपन का……….मुझे नहीं पता.

क्लास ख़त्म करके मैं बाहर निकली ही थी कि किसी ने आवाज़ लगाई..........

"काजल........." मैने पलट कर देखा, आलोक अपनी बाइक से टेक लगाए खड़े थे...आज बाइक से ..शायद अकेले थे इसलिए.
 
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