• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

तवायफ़ की प्रेम कहानी complete



मैं वहीं थोड़ा सा हटकर खड़ी हो गयी...हिम्मत नहीं हो रही थी कि उनकी ओर जाउ..वो खुद चलते हुए मेरे पास आ गये..........

"वो..वू.....क्लाशस ख़त्म हो गयी....???."आलोक भी शायद मुझसे पहली बार अकेले मे बात करने मे झिझक रहे थे.

"जी, आप यहाँ...??.."मैने बस इतना ही कहा.

"हां वो मैने सोचा की आप को लेता चलूं कॉलेज से..तो......?? "

"पर आज अंजू नहीं आई……..बताया नहीं उसने..??" पहली बार मैं मुझे किसी को छेड़ने मे मज़ा आ रहा था.

"जी..बा..बताया उसने.. तभी तो मैं आपको लेने......."आलोक के मूह से अचानक निकल गया...और फिर जैसे अचानक ब्रेक लगा दिया उन्होने……….मुझे हँसी आ रही थी.....मैने भी ज़्यादा परेशान करना ठीक नहीं समझा ,…..हँसी को कंट्रोल करते हुए बोली.......

"मुझे लेने ?.....ओके..चलिए" और पहली बार मैं हल्क सा मुस्कुरा दी……..

आलोक एक टक मुझे देखते रह गये, मुझे बड़ा अजीब लग रहा था..

."चलें??" मैने थोड़े ज़ोर से कहा.

"आओ...हां...प्लीज़ आइए......"

आलोक के साथ उनकी बाइक पर बैठ, आज जिंदगी मे पहली बार मुझे महफूज होने का अहसास हो रहा था...जाने क्यू?? हम दोनो ही शांत थे आलोक ने बाइक की स्पीड काफ़ी कम रखी थी ..और मैं उस से थोड़ा दूर हटकर बैठी थी.

"आप इतनी चुप क्यू हैं आज......" आलोक ने बात सुरू की.

"जी...नहीं तो..वो अंजू की तबीयत ठीक है अब ?? .......मेरा मतलब जब आप आए तो ??" मैं भी उल्टे सीधे सवाल पुच्छ रही थी.

"हां ....ठीक तो थी..कही बाहर गयी है शायद...क्यू कुछ हुआ था क्या उसे..."आलोक ने कहा.

मुझे बड़ा अजीब लगा......मुझसे तो बोला कि तबीयत ठीक नहीं....और अब बाहर गयी...फिर मुझे लगा कि क्या पता आलोक से छुपाना चाहती हो........मैं चुप हो गयी.

"जी वो यू ही आज कॉलेज नहीं आई तो ...." मैने बस इतना ही कहा.

अचानक एक मोड़ पर बाइक थोड़ी सी लहराई तो मैने जल्दी से आलोक के कंधे पर हाथ रख दिया....एक सुकून मिला था मुझे......एक अहसास कि मैं बेसहारा नहीं हूँ......एक मीठी सी हुक दिल मे उठी..........काश ये सहारा उमर भर का सहारा बन जाए तो ज़िंदगी कितनी खूबसूरत हो जाए.

"काजल जी, कही कॉफी पीएँ क्या...आज जाने क्यू बड़ा मन कर रहा है...." आलोक ने कहा.

"जी बस थोड़ी देर मे आप अपने घर पहुच जाएँगे.......ज़रूर पी लीजिएगा......." मैने कहा.

"अरे...घर पर कौन कॉफी बनाएगा...वो अंजलि की बच्ची?? अरे वो तो कॉफी का काढ़ा बना देती है.........और फिर आप कहा होंगी घर पर..." आलोक ने इस बार पिछे मूड कर देखते हुए कहा, एक शरारत थी उन आँखो मे.

"आप प्लीज़ आगे देखिए.......कहीं बाइक ठोक दी तो...मुझे अभी नहीं मरना...." मैं ज़िंदगी मे पहली बार शायद इतने बेतकुल्लफि से किसी से बात कर रही थी.

जवाब मे आलोक ज़ोर से हँसने लगे...

"तो एक कॉफी हो जाए...हां कर दीजिए ना"

इस बार मैं मना नहीं कर पाई.......... यही सब मेरी खताये थी बाजी !! जिनकी सज़ा मुझे मिल रही है…क्यू ना मना कर दिया उन्हे मैने……??..क्यू ना मना कर दिया …..??” काजल का बस चलता तो वो शायद अपने अतीत के हर पन्ने को जला देती.

ऋुना उसे देखती रही, क्या खता है इस मासूम सी बच्ची की…...........इसमे क्या ग़लत है उसे समझ मे नहीं आ रहा था…लेकिन काजल को सब अपना कसूर लग रहा था.....सबकुछ.

ऋुना ने उसके गाल पर बह आए आँसुओं को पोन्छ दिया….काजल आगे बोलने लगी………

“कॉफी शॉप मे बैठे,आलोक मुझे देखे जा रहे थे और मैं परेशान हो रही थी........

"अब मैं कभी आपके साथ नहीं आउन्गि" मैने परेशान होकर कहा.

"क्यू"

"ऐसे ही........"

मैं चुप हो गयी...थोड़ी देर आलोक भी चुप रहे........

आँखे तो आलोक की बहुत कुछ कह रही थी पर होठ शायद अभी भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे...

वो पहली बार था जब हम दोनो साथ बाहर रहे थे.

 
कुछ हल्की फुल्की बातें होती रही उसके बाद लेकिन हम दोनो मे से किसी ने कुछ कहा नहीं..जो एकदुसरे से कहना था.

वापस आते समय मेरी नज़र अंजलि पर पड़ी.......किसी लड़के के साथ थी….मैने आलोक को नहीं बताया….सोचा पहले अंजलि से बात करूँगी…..पुछुन्गि कौन है वो.

उस दिन के बाद अक्सर आलोक मुझसे अकेले मिलने के बहाने ढूँढते ..मुझे भी अच्छा लगता था...थोड़ी थोड़ी भनक तो अंजू को भी लग गयी थी और उसने मुझे छेड़ना भी सुरू कर दिया था….मैं ना चाहते हुए भी आलोक की ओर खिचि चली जा रही थी …..दिल गुस्ताख़ी पर उतर आया था.

अंजू से उस लड़के के बारे मे पुछा तो वो टाल गयी..बस इतना ही कहा कि वक़्त आने पर सब बता देगी. मैं भी चुप हो गयी.

मैं और आलोक अब बाहर मिलते तो खूब सारी बातें करते..मुहब्बत तो करते थे लेकिन ना कभी लफ़जो मे इज़हार हुआ था ना इकरार... और ना ही कभी हमने अपनी मर्यादा लाँघने की कोसिस की .एक दोस्त के जैसे ही आलोक रहते थे.हर पल मेरे लिए कुछ भी कर जाने को तैयार. अपने सारे दर्द मानो भूल गयी थी.मैं खुश रहने लगी थी ..बहुत खुश.

आलोक को आज यूएसए जाना था... सिर्फ़ एक हफ्ते के लिए......मैं सुबह से ही उदास थी....फोन भी नहीं था मेरे पास..आलोक ने एक बार देना चाहा था ,मैने मना कर दिया था लेने से....आज लग रहा था कि काश ले लिया होता...आलोक के पापा आए हुए थे.........तो मैं वहाँ नहीं जाना चाह रही थी..जाने क्यू डर लगता था...सिर्फ़ अंजू और आलोक ही थे जिनके साथ मैं हँस बोल लेती थी..बाकी सारी दुनिया के लिए मैं वही उदास सी काजल थी ...और मुझे शायद कोई फ़र्क भी नहीं पड़ता था .

आलोक शाम को चले गये........मैं चाहकर भी मिल ना पाई उनसे............मन बहुत उदास हो रहा था, लेकिन फिर दिल को समझा लिया था कि सिर्फ़ एक हफ्ते की ही तो बात है. मैं अपने हॉस्टिल के रूम मे बैठी थी.......वॉर्डन ने आकर कहा की बाहर कोई मुझसे मिलने आया है.

मैने अपने कपड़े ठीक किए और बाहर चल दी...मुझसे कौन मिलने आ सकता है ???

“जी..??” बाहर खड़े एक अंजान व्यक्ति से मैने पुछा.

“आप ही हैं मिस काजल ? ” उसने पुछा.

“ज..जीए..आप्प्प…..??” मैं कन्फ्यूज़ होते हुए बोली .

“मुझे सदानंद साहब ने भेजा है…आलोक बाबू के पिता जी…आप से मिलना चाहते हैं… मैं उनका ड्राइवर हूँ….” उस व्यक्ति ने कहा.

मुझे कुछ समझ मे नहीं आया क्या बोलूं…लेकिन ऐसी कोई वजह भी नहीं थी कि मैं मना करू…मैने उसे 2 मिनट रुकने को कहा और अंदर चली गयी….

थोड़ी देर बाद मैं उस ड्राइवर के साथ कार मे आलोक के घर पहुचि …मन मे बुरे बुरे ख्याल आ रहे थे…कोई गुनाह नहीं किया था मैने, फिर भी जाने क्यू खुद को ही मुजरिम लग रही थी, शायद मुझ जैसी एक आम लड़की का उन उँचे तबके के लोगो से ताल्लुक रखना ही एक गुनाह था.

किसी तरह से मैं अपने आप को समेटे संभाले एक एक कदम गिनती घर के अंदर चलती गयी…कल तक जिस घर मे जाते मेरा मन ख़ुसी से भर जाता था आज उसी घर मे जाते हुए एक डर सा लग रहा था.

मैं भीतर गयी..घर पर शायद अंजू भी नहीं थी……दरवाजा हल्का सा खोला और अंदर झांका सामने सोफे पर आलोक के पापा बैठे थे…पहली बार मिल रही थी …हां एक दो बार फोटो देखा था…चेहरे से ही रोब झलक रहा था.

“आ जाओ” उनकी तेज आवाज़ कानो मे पड़ी तो रहा सहा होश भी हवा हो गया.

“ नमस्ते अंकल…” मैं अंदर पहुचि और आगे बढ़कर उनके पैर छुने चाहे..

“ठीक है ठीक है…”वो खड़े हो गये.

“जानती हो आलोक कौन है…??” अजीब सवाल था, ये शायद मैं ठीक से समझ नहीं पाई थी.

“जी”?? मैने ना समझने के अंदाज़ मे धीरे से कहा.

“मेरा बेटा आलोक……….. जानती हो ना उसे……” उनका हर शब्द एक हथौड़े की तरह दिमाग़ की नसें हिला दे रहा था.

“जी” मैने बस इतना ही कहा.

“मैं सदानंद चौहान….और वो मेरा बेटा है..करोड़ो की प्रॉपर्टी का एक लौटा वारिस…ह्म्म..तुम्हे तो सब पता ही होगा…तभी तो ये जाल बिछाया है…..बोलो क्या कहना चाहोगी……..”

आख़िर वही इल्ज़ाम मुझपर लग गया था जिस से मैं बचना चाहती थी. जाने कहा से मेरे अंदर इतनी हिम्मत आ गयी……शायद मेरे निर्दोष मन को ये आरोप बर्दाश्त नहीं हुआ था………

“कुछ नहीं कहना चाहूँगी…….क्यूकी मुझे नहीं लगता कि मुझे आपको कोई भी सफाई देने की ज़रूरत है…क्या हक है मुझ पर इल्ज़ाम लगाने का………..कौन सी दौलत लूट ली है मैने आपकी…….पुच्छ लीजिए अपने बेटे से और अपनी बेटी से..आज तक एक धेला नहीं लिया है मैने……..आप बड़े लोग हैं , पता है मुझे…....लेकिन यू बेबुनियाद इल्ज़ाम मत............”मेरी बात मूह मे ही रह गयी , आलोक के पापा चिल्ला उठे……….

“और क्या उम्मीद की जा सकती है एक तवायफ़ की बेटी से.......फाँसना….ये तो पेशा है तुम लोगो का ”

सदानंद के शब्द मेरे कलेजे पर बिजली बन कर गिरे….ऐसा लगा जैसे दुनिया के इस मेले मे आज मैं बिकुल बेमोल हो गयी. बेगुनाह होते हुए भी मुझ पर हर आरोप साबित हो गया था.मैं मानो बुत बन गयी थी. सदानंद ने मेरी माँ को ही नहीं मुझे भी तवायफ़ कह दिया था.
 


तन्हाई के सेहरा मे झुलसे अपने पाओ के लिए शीतल छाया की तलाश मे निकली काजल आज एक ऐसी आग मे जल रही थी जिसने उसकी शख्सियत को राख कर दिया था.

मेरी आँखो के सामने मानो अंधेरा छा गया .....मेरी माँ एक तवायफ़ !!......मैं चीख उठी...

"नहिणीईिइ...झूठ बोल रहे हो आप........मेरी माँ ऐसी नहीं हो सकती ...झूठे हो आप..."मैं चीख रही थी और सदानंद मेरी हालत से मजे ले रहे थे.

"मैं यहाँ नहीं रहता ..लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि मुझे पता नहीं रहा था कि मेरे बच्चे कैसे हैं क्या कर रहे हैं, किस से मिल रहे हैं.....बाबूलाल........!!!" सदानंद ने आवाज़ लगाई.

" हां साहब" बाहर से एक दौड़ता हुआ आया उनकी आवाज़ पर......

" देखो ये है , मैने इसे सिर्फ़ यहाँ इसीलिए रखा है कि मेरे बच्चो को कोई तकलीफ़ ना हो....उन्हे नहीं पता होता लेकिन मुझे हर रोज पता चलता रहता है उनकी हर हरकत के बारे मे.......कहाँ जाते हैं किस से मिलते हैं........जब से तुम्हारा आलोक से मिलना जुलना बढ़ा तभी मैं तुम्हारे बारे मे सब पता लगाने लग गया...मेरे बेटे से मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वो इतनी लो क्लास लड़की को पसंद करेगा...”

काजल ने ऋुना की ओर देखा , ऋुना ने आँखो आँखो मे ही पुछा क्या हुआ.........

"बाजी , उस दिन उनकी बातो से सॉफ जाहिर था कि उन्हे इस बात से कोई प्राब्लम नहीं थी कि उनका बेटा या बेटी किसी से प्यार करते हैं , बल्कि उनके लिए ग़लत ये था कि वो लड़की उनके स्टेटस की नहीं थी........ जाने क्यू उन्हे ये अहसास नही हुआ कि वो हमारी मुहब्बत के बारे मे इसलिए जान पाए क्यूकी हमरी मुहब्बत मे पाप नहीं था...............ह्म कुछ छुपाना चाहते ही नहीं थे....अंजलि के बारे मे तो कुछ नहीं कहा बाजी ,हां शायद वो लड़का उनके स्टॅंडर्ड का था...खैर ,"

काजल फिर आगे बताने लगी.......

सदानंद ने बहुत कुछ कहा बाजी, बोलते गये, मैं सुनती रही...............

“मैं समझ गया कि तुम कोई बहुत ही चालाक लड़की हो...और फिर तुमहरे बारे मे पता लगवाया........मेरा शक़ सच साबित हुआ...जितना सोचा उस से ज़्यादा घटिया निकली तुम.........क्या नाम बताया है रे इसकी माँ का........." सदाननद बड़े मज़े से पुच्छ रहे थे.

"मालिक नाम तो नहीं याद.....पर खबर पक्की है......." वो सहमा से बोला...

"कोई बात नहीं........ तवायफ़ का क्या नाम??....तवायफ़ है इतना ही काफ़ी है.......जा तू !!”

“हां, तो अब बोलो क्या कहना चाहोगी......" सदानंद जाने क्या क्या बोल रहा था लेकिन मुझे और कुछ समझ नहीं आ रहा था ...शिवाय इस बात के कि मेरी माँ एक तवायफ़ है...मेरा वजूद आज मुझे और गंदा लगने लगा था...मैं एक तवायफ़ की बेटी थी और शायद इसीलिए मुझे पता नहीं था कि मेरा बाप कौन है.

"कहोगी क्या....तुम्हारा सच जो सामने आ गया...." सदानंद को मेरी हालत पर शायद बहुत ख़ुसी मिल रही थी.............मैं ज़ोर ज़ोर से रोने लगी..........

"क्यू??क्यू किया माँ तुमने ऐसा......क्यू???? आज मुझे अपनी माँ से नफ़रत हो रही थी.

"दफ़ा हो जाओ यहाँ से....और कभी आलोक के आस पास भी नज़र मत आना, वरना फिर कभी नज़र नहीं आओगी......." सदानंद की आवाज़ से मैं एकदम सहम गयी,....तेज़ी से दौड़ती हुई मैं गेट से बाहर निकली और पागलो के जैसे सड़क पर भागने लगी.....आलोक से दूर होने का गम तो था ही लेकिन अपने वजूद प्र एक बदनुमा दाग लग जाने का दर्द शायद उस से कही ज़्यादा था.शायदा मैं अपनेआप से भाग रही थी या शायद अपनी मुहब्बत से.

 


कुछ दूर ही आई थी...मैं सड़क पर गिर पड़ी , आँखो के आँसू रुक नहीं रहे थे...आलोक का साथ छीन गया था, मुझ से मेरी पहली मुहब्बत छीन गयी थी.....मुझसे तो मेरी पहचान ही छीन गयी थी .....एक नयी पहचान मिली थी.."तवायफ़ की बेटी" ...एक ऐसी पहचान जो मौत से भी बदतर थी.

मैने सोच लिया थी कि अब नहीं जियूंगी .......उस समय मैं ग़लत करती सही करती, मुझे कुछ होश नहीं था........जहाँ सड़क पर मैं गिरी थी वही बगल मे एक पुल था जिसके नीचे नदी बह रही थी...मैने अपने आँसू पोछे दौड़क्र पुल पर चढ़ गयी..नदी मे छलान्ग लगाई ही थी कि किसी ने पिछे से पकड़कर मुझे खींच लिया..........

मैं उस आदमी के साथ सड़क पर गिर पड़ी.......

"मुझे मर जाने दो प्लीज़...मर जाने दो......क्या अब मैं अपनी मर्ज़ी से मर भी नहीं सकती........कौन हो तुम.........???."मैं पागलो की तरह रो रही थी और उस से छूटने की कोसिस कर रही थी.

वो लगातार मुझे शांत होने को कह रहा था और आख़िर परेशान होकर एक जोरदार थप्पड़ मेरे गालो पर जड़ दिया....चेहरा जैसे सुन्न हो गया....मेरे आँसू रुक गये...... मैने नज़र उठकर उसकी ओर देखा...

वो कोई 50-60 साल का आदमी थी..दुबला पतला सा......मैनला से धोती कुर्ता पहने......मैं पहले कभी उस से नहीं मिली थी, मैने सवालिया नज़रों से देखा उसे..मानो उस से पुच्छ रही हो कि अब मेरे मरने पर भी दुनियावालो को ऐतराज है क्या??.

"एक बार मेरी बात सुन लो ...भगवान के लिए.." वो बड़े अपनेपन से बोला...

मैं कुछ नहीं बोल्ली...एकबार फिर से आँखो से आँसू बहने लगे.........मैं चुपचाप उसकी ओर देखती रही..

“आओ पहले यहाँ से चलो ...चलो बेटी......."उसने मुझे पकड़ कर उठाया, मैने भी सोच लिया मरने की इतनी भी क्या जल्दी , सुन लेती हू क्या कहना है इन्हे, वो भी मुझसे??

थोड़ी दूर आकर एक सड़क के किनारे के बड़े से पेड़ की नीचे मैं बैठ गयी.वो शख्स कही से पानी की एक बोतल ले आया.......मैने उसके इसरार करने पर दो घूँट पानी पिया.........

"बोलिए क्या कहना चाहते हैं...हैं कौन आप??"मैं बड़ी मुश्किल से इतना ही बोल पाई.

"सदानंद का आदमी हूँ बेटी......बाबूलाल के साथ तुम्हारी माँ के बारे मे पता लगाने का काम मैने ही किया था........मुंबई मे है तुम्हारी माँ......"उसने मुझे एक कोठे का नाम बताया.,आधा ही बोल पाया.........

"चले जाओ यहा से.......तुम आए हो मेरे हमदर्द बन ने...सदानंद के कुत्ते....................चले जाओ इस से पहले मैं........." मैं बुरी तरह भड़क उठी उसकी बात सुनकर.वो चुपचाप लाचार सा वहीं खड़ा रहा.

“जाओ यहाँ से....मर गयी मेरी मां, कोई नही है मेरा........” मैं फिर से रोने लगी.

"मैं तो चला ही जाउन्गा बेटी, लेकिन एक बात कह कर जाउन्गा.........कोई औरत अपनी ख़ुसी से तवायफ़ नहीं बनती, जिस्म बेचने का धंधा वो सिर्फ़ और सिर्फ़ मजबूरी मे करती है..तब जब दुनिया के सारे रास्ते उसके लिए बंद हो जाते हैं........और जानती हो एक तवायफ़ की ज़िंदगी मे सब से तकलीफ़ वाला दिन कौन सा होता है.........."

मैं सुनी सुनी नज़रों से उसे देखती रही..........

“वो दिन सबसे तकलीफ़ देता है जब उसकी अपनी औलाद उसे तवायफ़ कहती है..जब उसकी औलाद उस से अपने बाप का नाम पूछती है.........” उस दिन बूढ़े व्यक्ति की बाते मुझे अच्छी नहीं लग रही थी, लेकिन आज मुझे लगता है कि कितना सच्चा था वो.

मैं कुछ नहीं बोली..........

“तुम सोच रही होगी कि मैं ये सब क्यू बता रहा हूँ, मैने सदा बाबू की सारी बातें सुनी जो उन्होने तुमसे कही..........मुझे समझ मे आ गया था कि आज तक तुम्हे अपनी माँ की असलियत नहीं पता थी............और तुम्हारा दर्द मुझसे देखा नहीं गया.....जाने अंजाने मैं भी तुम्हारी इस बर्बादी का हिस्सा बन गया..माफ़ करना बेटी मैं भी मजबूर था....”

 


वो बूढ़ा सचमुच दुखी लग रहा था...एक पल को रुका फिर बोलने लगा..........

“मुझे तो बस यहाँ कोलकाता रेलवे स्टेशन पर एक औरत के पिछे लगाया गया और उसका पता लगाने को कहा गया....सदा बाबू राजनीति वाले हैं, अक्सर ऐसा काम मुझसे करवाया जाता था......लेकिन मुझे नहीं पता था कि इस बार एक मासूम सी बच्ची उनका निशाना है......”

“...जिस हाल मे तुम उनके घर से निकली, मुझे लग रहा था कि तुम ऐसी ही कोई ग़लती करोगी ......इसीलिए तुम्हारे पिछे आया...”

“तो क्या करू मैं..........क्या करू.........???? है कौन मेरा दुनिया मे.........किस के लिए जियु??...........जो ताने मैं बचपन से सुन रही थी अब वो और तेज हो जाएँगे.....मेरी मुहब्बत छिन गयी ........म..मेरी पहचान खो गयी है..” मैं बिलख बिलख कर रोने लगी , एक बार फिर से आज मैं अकेली हो गयी थी..बहुत अकेली.

“मैं जानता हू तुम पर क्या बीत रही है....फिर भी कहूँगा हो सके तो जाकर एक बार अपनी माँ से मिल लेना...सदाबाबू बहुत ख़तरनाक आदमी हैं...तुम अब उनके बेटे से दूर रहना बेटी........जाओ यहाँ से,....जाओ अपनी माँ से मिल लो......जब इंसान तकलीफ़ मे होता है तो सिर्फ़ अपनो का साथ ही उसके दर्द पर मरहम लगा सकता है......तुम्हारी माँ को भी तुम्हारी ज़रूरत होगी.......यू मर जाने से क्या हासिल होगा..........मौत किसी भी समस्या का हाल नहीं......”

वो जाने और क्या क्या बोल रहा था, लेकिन मुझे बस यही समझ मे आया था कि - “जाओ एक बार अपनी माँ से मिल लो”.

सोच लिया था मैने की एक बार अपनी माँ से ज़रूर मिलूंगी......एक मौका तो दूँगी उन्हे.... पुछुन्गि कि क्यू किया उन्होने ऐसा..........पुछुन्गि कि क्यू जी मैं एक अनाथ की तरह........पुछुन्गि कि क्यू मुझे नसीब नहीं हुई मेरे बचपन की ख़ुसीया........सबकुछ पुछुन्गि......जो आज तक नहीं पुच्छ सकी थी.

..वो बूढ़ा आदमी मेरे साथ साथ मेरे हॉस्टिल तक आया.........मैने लाख मना किया पर वो पिछे पिछे आता रहा...........शायद उसे लग रहा था कि मैं फिर से मरने की कोसिस करूँगी.............मैने सोच लिया था बिना अपनी माँ से एक बार मिले तो नहीं मारूँगी.

मैं अपने हॉस्टिल के गेट पर पहूचकर पलटी,उस बूढ़े ने मुझे उस कोठे का नाम और अड्रेस्स एक बार फिर से बताया,

“मुझे माफ़ करना बेटी, खुश रहो........” बस इतना ही कहा उसने और तेज़ी से पलट गया......मैं जब तक वो दिखा उसे देखती रही और फिर वापस पलटकर हॉस्टिल के अंदर चल दी......

मैने एक हॅंड बॅग मे एक दो कपड़े रखे और निकल पड़ी मुंबई के लिए ...अपनी माँ से मिलने.

मुंबई पहुचकर मैने किसी तरह से कोठे के बारे मे पता किया………...वो सब अब मैं नहीं दोहराना चाहती बाजी, हां पर ये अहसास हो गया कि किसी लड़की के लिए एक कोठे का पता पुच्छना ही अपने आप मे एक कहानी है...खैर, मैं जब वहाँ पहुचि तो मुझे पता चला कि मेरी माँ हॉस्पिटल मे है.

भारी मन से मैं हॉस्पिटल पहुचि............

“मेरी माँ मर चुकी थी बाजी, सिर्फ़ एक खत मेरे नाम छोड़कर.....और कुछ पैसे”

“जाने क्यू मुझे कोई दुख नहीं हो रहा था माँ के मरने का........तब तक नहीं जब तक उस खत को नहीं पढ़ा था..........” काजल धीरे धीरे सब बताए जा रही थी, उस खत को मानो पढ़ रही थी, उसकी आँखे जल थल हो रही थी.........ऋुना की आँखो मे भी आँसू आ गये थे.

“मैने वो पैसे लेने से इनकार इनकार कर दिया और वो खत !!...उस पूरे खत मे मेरी माँ ने सिर्फ़ माफी माँगी थी मुझसे............कुछ नहीं लिखा था कि मेरा बाप कौन है.........वो कोठे पर क्यू गयी........वो तवायफ़ क्यू बनी.............कुछ भी नहीं बाजी, सिर्फ़ माफी माँगी थी......शायद मेरे सवालो का जवाब मेरी माँ के पास नहीं थे.....इसीलिए बिना कुछ बताए ही चली गयी.......”

“उस दिन तो मैने अपनी माँ को माफ़ नहीं किया बाजी , लेकिन खुद जिस दिन मैने पहली बार कोठे पर कदम रखा..उस दिन माफ़ कर दिया.........” काजल बोल कर चुप हो गयी थी.

 


रात के 2 बज चुके थे, ऋुना भी खामोश थी...

“तू कोठे पर कैसे पहुचि काजल......जिस दिन तुझे मैं पहली बार मिली थी उस दिन भी पुछा था, लैला से भी पुछा ............ना तूने बताया , ना उसने ...........जाने क्यू मुझे लगता नहीं कि असली वजह लैला को भी पता है......बता....कैसे और क्यू आई तू कोठे पर............???”

“बाजी, माफ़ कीजिएगा...........लेकिन ये मैं नहीं बता सकती......तब भी मैने नहीं बताया था आपको, और आज भी नहीं बता सकती..........” काजल के चेहरे पर एक सख्ती आ गयी.........

“काजल बता दे,,,शायद मैं तेरे लिए कुछ कर पाऊ.....बता दे मेरी बच्ची.....”” ऋुना उसे य्कीन दिलाना चाह रही थी.

“आपको जो बताना था मैने बता दिया, मैं आलोक को कैसे जानती हूँ ये बता दिया...और ये भी बता देती हूँ कि उसके बाद मैं आलोक से कभी नहीं मिली.........और क्या बताऊ......अब जो बचा है उसे जानकार कुछ हासिल नहीं होना है......और......” काजल कुछ कहते कहते रुक गयी.

“और क्याअ....” ऋुना ने पुछा.

“कुछ नहीं......एक बात बताइए...........आप कैसे जानती हैं सदानंद को........जैसे वो चौंका था आपको देखकर, ऐसा लगता है वो भी आपको अच्छे से जानता है........” काजल ने उल्टे ऋुना से ही सवाल कर दिया.

“काजल मैं वक़्त आने पर सब बता दूँगी....प्लीज़ मेरा भरोसा कर....तुझे मुझपर भरोसा करना ही होगा............बता मुझे......” ऋुना ने फिर से मिन्नतें की.

“ठीक है ऋुना बाजी.....हमेसा बड़ी बहन माना है आपको......कर लिया आप पर ऐतबार .......खाइए मेरे सर की कसम कि कभी आप किसी को नहीं बताएँगी जो मैं बताने जा रही हू........और अगर आपने बताया तो याद रखिएगा कोहिनूर आपको फिर कभी नहीं मिलेगी इस दुनिया मे....बोलिए मंजूर है........” काजल की बात से ऋुना बुरी तरह किलस गयी.

“पर अगर मैं किसी को बताउन्गी नहीं तो................देख तू समझ नहीं रही है....मैं सब तेरे लिए ही कर रही हू...बता मुझे.....”

“नहीं, फिर जाने दीजिए.........मुझे कुछ नहीं चाहिए.......मैं खुश हू........हां एक लम्हे को कमजोर पड़ गयी थी मैं.......लेकिन अब नहीं...आप नहीं जानती बाजी उस एक बात से कितनी ज़िंदगियाँ बर्बाद होंगी........कुछ नहीं कहना और मुझे........सो जाइए........” काजल ने सारी बात ही ख़त्म कर दी.

“ठीक है , नहीं बताउन्गी...तेरी कसम..खुदा गवाह है..कभी नहीं कहूँगी किसी से....अब बता...........”

“ ठीक है बाजी तो सुनिए............” काजल ने फिर बताना सुरू किया............

काजल जो बात सारी दुनिया से अब तक छुपती आई थी ,आज अंजाने मे वो जुंमन तक पहुच रही थी..............जाने किसकी जिंदगी दाव पर लग रही थी.

काजल ऋुना को सब सच बताए जा रही थी , इधर आलोक के घर मे सोफी काफ़ी परेशान थी.....इतनी रात को भी नींद उसकी आँखो से कोसो दूर थी..........आलोक ने उस घटना के बाद से खुद को एक कमरे मे बंद कर लिया था.......सोफी कुछ कुछ तो समझ गयी थी लेकिन एक बार आलोक के मूह से वो पूरी बात जान ना चाहती थी कि कौन है वो लड़की, कैसे जानता है उसे आलोक और जो कुछ आज हुआ वो क्यू हुआ..?

सोफी एक बार फिर से आलोक के कमरे के दरवाज़े पर खड़ी थी..जाने कितनी बार चेक कर चुकी थी वो लेकिन हर बार अंदर से बंद ही होता..इस बार खुला मिल गया....शायद आलोक बंद करना भूल गया था.........सोफी चुपके से अंदर पहुचि और दरवाज़ा बंद कर दिया......कमरे की लाइट्स ऑफ थी.....आलोक एक चेर पर बैठा किसी गहरी सोच मे डूबा था...या शायद उन यादो के भंवर मे गुम था....एक हाथ मे एक छोटी ग्लास थी...........वाइन से भरी...........और दूसरे मे एक सिगरेट.....सामने रखे म्यूज़िक सिस्टम पर धीमे वॉल्यूम मे सॉंग चल रहा था...........शायद उसके दिल की आवाज़..........

“मेरे दिल से दूर जाकर , कहाँ खो गये हो तुम,

ख़ुसी की ये बात है कि ,खुस तो हो गये हो तुम......

इतना बता दो राज दिल को क्यू छुपाया,

दिल ना मिलाया..

क्यू मेरा प्यार तुम्हे रास ना आया,

नज़र मिलाई तुम ने दिल ना मिलाया...........”

सोफी ने आगे बढ़कर सिस्टम बंद कर दिया........आलोक मे पलट कर उसकी ओर देखा और आँखे बंद कर ली......

“आजा सोफी......... सॉरी यारा....तू भी सोच रही होगी कैसा हूँ मैं...तुझे भी क्या क्या देखना पड़ा.....कही नहीं घुमा पाया तुझे मैं....अपने ही दर्द मे चूर........सॉरी यारा........” आलोक जैसे बेहोशी के से आलम मे बोल रहा था..............बहुत पी ली थी उसने.

“आलोक ..यू ओके?? .....इतना क्यू पी रहे हो......उ नेवेर ड्रिंक........नाउ, व्हाट हॅपंड..........???.....आलोक टेल मी अबौट दट गर्ल.........हू ईज़ शी??”

“सोफी...कम हियर.......इधर आ यार........बैठ यहाँ....” आलोक ने सोफी को पास बुलाया और उसका हाथ पकड़कर अपने पास बिठा लिया.

“वो लड़किईईई!.......शी ईज़ माइ फर्स्ट लव....यू नो फर्स्ट लव....पहला प्यार...और ...और आख़िरी भी.......लेकिन यार मुझे छोड़ कर चली गयी......मैं..मैं जब पहली बार यूएसए गया था तब......तब से मैं उसे प्यार करता हू........उस से भी पहले से........लेकिन यार कभी कहा नहीं...सोचा था आते ही बोल दूँगा....फिर शादी फिर बच्चे...मस्त बनेगी लाइफ.........” आलोक बहुत नशे मे था इसलिए दिल का दर्द बाहर आ रहा था.

 


“लेकिन यार जब मैं वापस आया तो वो जा चुकी थी....जाने कहाँ?? ..बिना कुछ बताए............और ये भी बोलती गयी कि.......कि..कि....मुझे प्यार नहीं करती.........मुझे बोली कि भूल जाना मुझे........मैने कोशिस की उसे ढूँढने की, पर नहीं मिली.........यार सोफी...तू बता.........कैसे भूल जाउ...इतना आसान है क्या भूल जाना...........???... नहीं मिली मुझे.........दिल नहीं लगता था यहा.....यूएसए चला गया मैं........लेकिन अब देख किस्मत का खेल.........जब वापस आया तो फिर मिला दिया उस से...और मिलाया भी तो किस तरह से..””

आलोक ने एक और पॅक बनाया और गटक गया...........

“यार,सोफी ,...शी ईज़ माइ लाइफ........माइ लव......लेकिन मेरे पापा समझते ही नहीं.......मैं...मैं डरता नहीं हूँ किसी से..........लेकिन यार एक बार वो तो बोल दे..........वो तो कहे कि हां मैं तुमसे प्यार करती हू........तुम्हारी हूँ मैं..........मैं उसके लिए सारी दुनिया से लड़ जाउन्गा...सारी दुनिया छोड़ दूँगा.....लेकींन.........यू नो व्हाट??? ......अव्वककककक......शी लव्स मी..........बहुत प्यार करती है वो मुझसे....आइ नो........लेकिन मानती नहीं है यार..... और अब तो वो कभी नहीं कहेगी और ना ही मानेगी......”

“उसे लगता होगा कि उसके इस रूप मे देखकर मैं उसे नहीं अपना पाउन्गा..............कितनी नादान है वो..........उसे नही पता कि मुहब्बत तो दिल से की जाती है....आज भी मुझे वो उतनी ही पवित्र लगती है........चाहे एक तवायफ़ के रूप मे ही सही......आज भी उसकी आँखो मे वही प्यार है मेरे लिए........आज भी वही सादापन है......सोफी, शी लव मी.......बहुत प्यार करती है...... ..बस कहती नहीं है......अच्छा अब तू बता.........नहीं तो क्यू कहती कि मैं तुमसे प्यार नहीं करती...........बता क्यू कहती......मैने तो उस से पुछा भी नहीं था.........जब मैं वापस आया तो मुझे उसका एक लेटर मिला कुछ दिनो बाद..........सब लिखा था उसने........मैं समझ गया कि वो भाग रही है मेरी मुहब्बत से.” आलोक का नशा उसके दर्द मे घुलता जा रहा था...

वो सोफी के साथ बैठा अपने दिल की सारा दर्द निकाल रहा था........

“यस........शी लव्स यू........उस लड़की के साथ जो लेडी थी, शी टोल्ड मी....उसने कहा कि कोहिनूर जल्द ही आलोक से मिलेगी...मैं भूल गयी थी तुम्हे बताना........” सोफी को अब याद आई थी ऋुना की बात.....

“उसने कहा ??? सच?????...ओह, थॅंक यू सोफी.....मुझे पता था सोफी.......वो ज़रूर मुझसे मिलेगी.......”आलोक का चेहरा पहली बार दमक उठा एक उम्मीद से....

“लेकिन सोफी......वो कुछ बोलती नहीं है.......कभी कहे तो मुझसे.............यार सोफी, कोई बहुत बड़ी बात है........कोई साज़िश की गयी है...मेरे पापा तो ऐसा नहीं करेंगे ...........तो फिर किसने किया???......लेकिन कल जो हुआ उस से सॉफ लग रहा था कि पापा जानते हैं उसे......पापा कब मिले उससे........और मुझे क्यू नहीं बताया ???......पुछा मैने पापा से....लेकिन गुस्से मे हैं ना तो बताया नहीं....पता करूँगा मैं.....कल भी कोसिस की मैने पता लगाने की.........पर पता चल नहीं पाया कि वो कहाँ है......यार मैं उसे जाने ही नहीं देता.......लेकिन उसने कहा कि वो मेरी कुछ नहीं लगती , सिर्फ़ एक तवायफ़ है...........” आलोक की आँखे भर आई.......

“अब मैं क्या करता........इसीलिए मैने सोचा कि पहले उस वजह का पता चल जाए जिसने काजल को कोहिनूर बना दिया, और शायद तभी मुझे मेरी काजल मिल जाए..........मैं किसी भी कीमत पर उस सच तक पहुचूँगा........उस वक़्त मुझे लगा था कि शायद सच मुच मुझे ही ग़लतफहमी हुई थी, उसे मुझसे प्यार नहीं था, लेकिन अब जितनी बार सोचता हू, हर बार लगता है कि हद से ज़्यादा मुहब्बत करती है वो मुझ से....हां कहा नहीं उसने ,,...मैं भी नहीं कह पाया......शायदा वक़्त ने मौका ही नहीं दिया.............उस से पहले ही वो चली गयी............वो क्यू चली गयी?? क्यू आज एक तवायफ़ के रूप मे है.....क्यू मुझसे भाग रही है.....इन सब बातों की वजह एक ही है.....और मुझे वो वजह पता करनी है.........”

आलोक की आँखो मे दर्द था ,मुहब्बत थी, और एक उम्मीद थी.......इस बार वो अपने प्यार को पाने के लिए किसी भी हद से गुजर जाने वाला था ...क्यूकी इस बार उसकी मुहब्बत उसे बेड़ियों मे क़ैद नज़र आ रही थी.

सोफी ने उसके कंधो पर हाथ रखा और आलोक उसके गले लगकर रो दिया......... “इस बार मैं उसे नहीं जाने दूँगा सोफी....चाहे कुछ भी हो........मैं नहीं जाने दूँगा.......”

इधर ट्रेन मे काजल अपनी बात कहकर चुप हो गई थी......ऋुना मानो बुत बन गयी थी....ऋुना की आँखे लगातार बरस रही थी और काजल के चेहरे पर एक सख्ती थी... सदियों की उदासी थी.........ऋुना ने कज़ला की ओर देखा , वो चुप थी , एक दम चुप......ऋुना को ऐसा लग रहा था कि उसका सर फॅट जाएगा........

उसने खिचकर काजल को अपने गले से लगा लिया.... ..

“जीती रह मेरी बच्ची..........इतनी बड़ी कुर्बानी.....ओह्ह मेरे ख़ुदाया.....अगर ऐसी होती है “तवायफ़” तो खुदा से इल्तीज़ा करूँगी कि हर जन्म मे मुझे तुझ जैसी एक बेटी दे........ तुझ जैसी किसी तवायफ़ की माँ बनाए मुझे........कैसे कर दिया ये सब मेरी जान....कैसे............??”

“सब मुहब्बत है बाजी, बड़ी ताक़त होती है इस मुहब्बत मे ..छोटे से छोटा इंसान भी बड़ी से बड़ी कुर्बानी दे जाता है..........” काजल ने भी ऋुना को ज़ोर से गले लगा लिया......”

काजल के होंठो पर दर्द मे डूबी एक मुस्कान फैल गयी थी.

ऋुना जैसे ही काजल के गले से अलग हुई , उसकी नज़र सामने खड़े जुंमन के चेहरे पर पड़ी........

ऋुना का चेहरा फक्क पड़ गया..........जुंमन का पूरा चेहरा आँसुओ मे भीगा हुआ था......वो रो रहा था......... एक पत्थर आज शायद पिघल गया था............ऋुना को अपनी आँखो पर यकीन नहीं हुआ..........

“जुंमन ??तुम रो रहे हो........???”

जुंमन ने सर उठा कर उसकी ओर देखा और अपने आँखो के आँसू पोन्छ लिए..........

"हां ऋुना बाई , आज जुंमन भी रो दिया..........जब से होश संभाला सिर्फ़ दुख तकलीफें झेली.......लेकिन हर तकलीफ़ मुझे और मजबूत बनाती गयी या यूँ कहूँ कि मुझे और बुरा इंसान बनाती गयी.....घर से भाग आया मुंबई , और दर बदर की ठोकरें खाकर इस कोठे पर पहुच गया......आज तक सिर्फ़ दूसरो को रुलाने वाला जुंमन आज रो दिया.......कैसा कर दिया रे कोहिनूर तूने ये सब....इतनी छोटी सी तू है, तेरा दिल कितना बड़ा है रे...........एक तवायफ़ ने इतनी बड़ी कुर्बानी दे दी, लेकिन दुनिया को वो नहीं दिखा, सिर्फ़ कोठे पर उसके मुज़रे दिखे, कभी नहीं उसकी आँखो का दर्द नज़र आया, मुझे भी तो नहीं दिखा कभी आज तक."

"ऋुना बाई, इंसान बुरा पैदा नहीं होता, हालत उसे बुरा बना देते हैं....और सबसे बुरा इंसान वो बनता है जिसकी ज़िंदगी मे कोई मकसद नहीं होता ,जैसे कि मैं, आज तक समझ ही नहीं पाया कि मैं इस दुनिया मे क्यू आया....दो बोतल शराब, और दो वक़्त का खाना .....और कभी कभार एक रंगीन रात.......यही मकसद रहा आज तक जुंमन का."

 
जुंमन सर झुका कर बैठा बोल रहा था...काजल और ऋुना दोनो चुपचाप सुन रही थी.

"कोई बात नहीं जुंमन...अब तो तुम आज़ाद हो.....अब तुम कहीं चले जाओ ...मत जाओ वहाँ....""...ऋुना ने कहा.

"जुंमन हमेसा आज़ाद रहा है ऋुना, किसी माई के लाल मे हिम्मत ही नहीं कि जुंमन को क़ैद करके रखे...अरे मैं खुद उस कोठे पे रहता हू...जब चाहता वहाँ से चला जाता...लेकिन आज तक कभी गया नहीं...कोई वजह ही नहीं थी वहाँ से जाने की.,"

"तो अब...आज क्यू...??"

"ऋुना...... जुंमन ने आज तक अपनी जिंदगी मे कोई अच्छा काम नहीं किया है, लेकिन एक काम अब ज़रूर करूँगा.....चाहे जान रहे या चली जाए...लेकिन कोहिनूर अब कोठे पर नहीं जाएगी..अब वो काजल बन कर जिएगी.....सिर्फ़ काजल."

"हां जुंमन, आज मेरा दिल भी यही कह रहा है..........."

"नहीं जुंमन भाई, मुझे जाना होगा......जिसके लिए इतना सबकुछ कुर्बान कर दिया, अब उसकी ख़ुसीयों मे आग क्यू लगाऊ..........मैं वही करूँगी जो लैला बाई कहेंगी....." काजल के चेहरे पर बहुत दर्द था , इतना दर्द की कलेजा फट जाए.

जुंमन खामोश हो गया...लेकिन उसकी आँखे देखकर लग रहा था कि वो काजल की बात मानने को तैयार नहीं है.

ट्रेन के उस डिब्बे मे अब बिल्कुल खामोशी थी....ऋुना और जुंमन काजल के अगल बगल बैठे थे...........जब से काजल ने कहानी बतानी सुरू की थी कम से कम 10 बार जुंमन के मोबाइल पर लैला का फोन आ चुका था...एक दो बार उसने रिसीव किया तो आवाज़ नहीं आई............और उसके बाद उसने फोन उठाया ही नहीं.....काजल की कहानी मे खोया हुआ जो था...........जुंमन बात का पक्का और बिल्कुल निडर था ...इसीलिए अपने सबसे ज़रूरी काम लैला उस से ही करवाती थी.......लेकिन आज काजल की दास्तान का दर्द उसके सीने को चियर गया था.....उसे नफ़रत हो रही थी खुद से भी और लैला से भी.

भोर के 4 बज गये थे...ट्रेन एक छोटे से स्टेशन पर रुकी कोहिनूर, ऋुना और जुंमन ट्रेन से उतर गये....ट्रेन से जैसे ही नीचे उतरे एक बार फिर से जुंमन का फ़ोन बज उठा............उसने ऋुना और काजल को चुप रहने का इशारा किया और उनसे थोड़ी दूर जाकर इस बार फोन उठा लिया...........

"कहाँ मार गया है रे तू..."फोन उठाते ही लैला की तेज आवाज़ उसके कानो मे पड़ी,जुंमन के जी मे आया कि जमाने भर की गालियाँ सुना दे लैला को, लेकिन कुछ सोच कर खामोश रहा..........

" इतना क्या भड़क रही है..........ट्रेन मे नेटवर्क नहीं आ रहा था तो अपुन नहीं उठाया फ़ोन..........और सोचा था उतरते ही तेरे को कॉल करके बता देगा कि अपुन इधर पहुच गया है...........और सुन जुंमन से तमीज़ से बात करने का......मेरे को जानती है ना तू............." जुंमन की आवाज़ भी धीरे धीरे गरम हो गयी.

"कमीने......??...चल छोड़...हाँ हां चल ठीक है.......... अच्छा सुन , ज़रूरी बात है" लैला जानती थी कि अगर जुंमन सनक गया तो फिर किसी की नहीं सुनेगा., वो अपने गुस्से को कंट्रोल करने की कॉसिश करते हुए बोली...

"हां बोल"

"तू उन दोनो पर नज़र रखना.............जाने क्यूँ सदा बाबू बहुत नाराज़ हो रहे हैं कि मैने ऋुना के साथ क्यू भेज दिया काजल को.........वो कह रहे थे कि ऋुना काजल को बहकाएगी....वैसे तो वो कोहिनूर मेरी मुट्ठी मे है लेकिन फिर भी तू होशियार रहना...वो दोनो वहाँ से कहीं जानी नहीं चाहिए...........हम जल्द ही वहाँ पहुच रहे हैं ...सदा बाबू ...." लैला की बात अधूरी रह गयी थी कि सदानंद ने रिसीवर छीन लिया उसे से.

"देखो जुंमन, मेरी बात ध्यान से सुनो...मैं कुछ घंटो मे वहाँ पहुचूँगा, तब तक वो लड़की और ऋुना वहाँ से जानी नहीं चाहिए....मैं तुम्हे दौलत से मालामाल कर दूँगा.........लेकिन अगर वो दोनो वहाँ से गयी तो समझ लेना तुम...बोटिया कटवा दूँगा तुम्हारी....."सदानंद बहुत गुस्से मे थे....और शायद उन्हे मालूम नहीं था कि जुंमन कितना खिसका हुआ इंसान है

जुंमन ने सब कुछ सुन लिया चुपचाप , बस हर लफ्ज़ के साथ उसके चेहरे का रंग बदल रहा था........आज जिंदगी मे पहली बार जुंमन ने किसी का इतना बर्दाश्त किया था.......जुंमन के पास कुछ खोने के लिए नहीं था, और शायद इसीलिए वो किसी से नहीं डरता था...एक की 10 सुनाने वाला जुंमन खामोशी से सुनता रहा..

"जी साब, कही नहीं जाएँगी ये दोनो ...आप खुद को तकलीफ़ क्यू देते.....मैं हू ना...." जुंमन एक एक शब्द को चबाता हुआ बोला.

"नहीं तुम बस आज शाम तक उन दोनो पर नज़र रखो, मैं पहुचता हूँ...."सदानंद ने इतना ही कहा और फ़ोन काट कर दिया.

 


जुंमन का चेहरा गुस्से से भभक रहा था...लेकिन उसने खुद पर कंट्रोल किया हुआ था........"मादरचोद ..जुंमन को धमकी देता है" उसने फ़ोन कट होते ही गली बकि.

"क्या हुआ जुंमन, किसका फ़ोन था" ऋुना उसके चेहरे के बदले तेवर देखकर बोली.

"ऋुना बाजी आपका घर कितना दूर है यहाँ से...." आज पहली बार जुंमन ने ऋुना बाई की जगह ऋुना बाजी कहा था...वो उसके सवाल का जवाब देने की बजाय बस यही बोला.

"मुश्किल से आधे घंटे लगेंगे...........बताओ तो हुआ क्या....??"

"ऋुना बाजी, कुछ नहीं बस थोड़ा जल्दी कीजिए.........मुझे भूख लग रही...और इस समय तो स्टेशन पर कुछ मिलेगा भी नहीं..चलिए..." जुंमन ने बड़ी सफाई से हर बात पर परदा डाल दिया और छोटा सा बॅग उठाया और चल दिया...पिछे पिछे ऋुना और काजल.

काजल को भी इतना तो समझ मे आ गया था कि बात उसके ही बारे मे हो रही है लेकिन उसने पुछा नहीं कि क्या बात हो रही थी....शायद उसे यकीन था कि जुंमन नहीं बताएगा...... ऋुना ने भी कुछ नहीं कहा क्यूकी उसने जुंमन का शांत रहने के लिए चुपके से किया गया वो इशारा देख लिया था.

इधर मुंबई मे, आलोक के घर पर,

सदानंद अपने आदमियों एक साथ ऋुना के गाओं को निकल गये थे…..उनका एक आदमी रात मे ही निकल गया था जब पता चला कि ऋुना के साथ कोहिनूर गयी है….लेकिन अभी तक वो पहुचा नहीं था.

सदनद अपनी खुद की गाड़ी से निकले थे …..उनके पिछे दो गाड़ियाँ और थी जिनमे उनके ही आदमी भरे थे……….लाख कोसिस के बाद भी किसी फ्लाइट का टिकेट नहीं मिल पाया था और अगले 24 घंटे मे कोई फ्लाइट नहीं थी……ट्रेन का रूट बहुत घूम कर था उस स्टेशन तक , और बस 2-4 घंटे का ही अंतर होता था बाइ रोड और बाइ ट्रेन….और अगर ट्रेन लेट हो गयी तो लगभग बराबर टाइम ही लगता था……..इसलिए मजबूरी मे उन्हे अपनी गाड़ी से ही जाना पड़ रहा था…….लगभग 15 घंटे का रास्ता था वहाँ से ऋुना के गाओं का.

इस बात का खास ख्याल रखा गया था कि आलोक को कोई भनक ना लगे, उसे यही पता था कि उसके पापा किसी रॅली मे जा रहे हैं..वैसे भी उसे कोई खास दिलचस्पी नहीं थी सदानंद के कही आने जाने मे.

*********************************************************************

लगभग 20 मिनिट ऑटो मे चलने के बाद जुंमन, ऋुना और काजल गाओं के बीचो बीच बने एक छोटे से घर के दरवाज़े पर खड़े थे.......घर क्या था अब महज एक खंडहर ही रह गया था...लेकिन दरवाज़े पर ताला लगा था....ऋुना कभी कभी आती थी अपने गाओं.... अभी भोर ही था तो ज़्यादा लोग नहीं दिख रहे थे गाओं मे.

ऋुना ने आगे बढ़कर ताला खोला और सब अंदर चले गये...घर अब खंडहर् हो चुका था, लेकिन देख कर लग रहा था कि किसी जमाने मे एक ख़ुसीयो का बसेरा हुआ करता था..एक बड़ी सी दालान , एक बड़ा से आँगन, तीन कमरे और एक कमरा उपर फर्स्ट फ्लोर पर.........एक वॉशरूम और एक किचन रूम से लगा हुआ ही.

एक हॅंड पंप लगी हुई थी ...और वही एक चीज़ थी जो नयी लगी हुई लग रही थी पूरे घर मे...शायदा जल्द ही उसे लगवाया गया था.

ऋुना ने बॅग को एक कमरे मे रखा और काजल को वॉशरूम की ओर इशारा कर दिया.

जुंमन उस से क्या कहना चाहता था वो जान ना सबसे ज़्यादा ज़रूरी था...जैसे ही काजल वॉशरूम मे घुसी दोनो घर से बाहर निकल गये..........

 


"क्या बात है जुंमन , किसका फोन था" दरवाज़े से बाहर निकलते ही ऋुना ने पुछा.

"सदानंद और लैला थे.......बाजी वो दोनो आ रहे हैं यहाँ.......वो कोहिनूर को इस बार नहीं छोड़ेंगे...ये मासूम कुछ समझती ही नहीं...दूसरे की ज़िंदगी बचाने मे लगी है.....इस बार वो इसे हो सकता है इस मुल्क से ही बाहर भेज दे........बाजी सदानंद बहुत कमीना इंसान है........"

"मुझ से बेहतर ये कौन जानता है, खैर, बताओ क्या करना है ??"

"आप सदानंद को कैसे जानती हैं...??? और लैला ने कोहिनूर को आपके साथ भेज दिया, इस बात से उसे क्यू ऐतराज़ हो गया है?? " जुंमन के दिमाग़ मे भी बहुत सारे सवाल आ रहे थे.

"वो सब बात करने का वक़्त अभी नहीं है जुंमन ...फिर कभी फ़ुर्सत से बताउन्गी.........पहले ये बताओ वो लोग कब आ रहे हैं..........??"

"कहा तो है कि शाम तक..लेकिन जिस तरह से वो बात कर रहा था , मुझे लगता है कि वो जल्द ही आ जाएँगे........"जुंमन बहुत फ़िक्रमंद लग रहा था.

"जुंमन क्या फिर से कोहिनूर उनके चंगुल मे फस जाएगी....? " ऋुना का गला भर आया.

"नहीं बाजी !!!..जुंमन ने आज तक कोई अच्छा काम नहीं किया...आज खुदा ने मौका दिया है......एक काम भी नेकी का कर दूं तो शायद मेरे गुनाह वो माफ़ कर दे...इस बार कोहिंनोर को अगर उनके हाथ सौप दिया तो फिर कभी कोहिनूर को आप देख भी नहीं पाओगी......"

"जुंमन हम क्या कर सकते हैं, और फिर ये कोहिनूर भी नहीं मानेगी........वो किसी भी हाल मे लैला के खिलाफ नहीं जा सकती .....तुम तो जानते ही हो........."

"क्यू नहीं लैला के खिलाफ जा रही कोहिनूर" जुंमन का दिमाग़ कब से इस सवाल मे अटका हुआ था.

"बेवकूफी की बातें मत करो जुंमन...........तुम्हे नहीं पता?...अरे जिसके लिए इतना सबकुछ बर्दाश्त कर गयी अब ....उसे डर है कि फिर से वही सब.........." ऋुना की बात अधूरी रह गई , जुंमन बोल पड़ा.

"हां बाजी मैं समझ गया..........."

कुछ पल दोनो खामोश रहे..........

"तो फिर क्या करना है बाजी..........?"

"तुम्ही बताओ जुंमन.........."

"बाजी मेरा बस चले तो मैं कोहिनूर को कभी वापस मुंबई ना जाने दूं...कभी उन सबसे ना मिलने दूं..........मेरा तो दिल करता है कि.........एक बात बताओ..ये लौंडा आलोक कैसा लड़का है......कोहिनूर तो बच्ची है......उसे ज़्यादा समझ नहीं.......आप बताओ.........सचमुच मुहब्बत करता है क्या काजल से...आप तो मिले हो उस से ....कैसा लगता है........अपने बाप की ही तरह अयाश..........???"

 
Back
Top