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तवायफ़ की प्रेम कहानी complete

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"नहीं जुंमन, इतनी सहूलियत तो है मेरे अंदर की इंसान पहचान सकूँ...हां जवानी के दिनो मे धोखे खाए कुछ लोगो को पहचानने मे लेकिन अब नहीं....बहुत प्यार करता है वो इस कोहिनूर से........जिस तरह से वो सदानंद के खिलाफ हो गया था, सॉफ लग रहा था कि वो आज भी कोहिनूर को बहुत चाहता है.........आज भी ..."

"बाजी आज जिंदगी मे पहली बार कुछ अच्छा करने को दिल किया है...जान भी चली जाए तो कोई गम नहीं.........पर एक कोसिस तो करूँगा मैं.....आप साथ दोगि ना...."

"हां जुंमन ..मैं ज़रूर साथ दूँगी...लेकिन कोहिनूर से छुपा कर सब करना होगा ...नहीं तो वो कभी मानेगी नहीं...तुम समझ रहे हो ना..........अब बताओ क्या करना है.........."

"ठीक है बाजी...एक कोसिस करते हैं ...बाकी जो पर्वरदिगार की मर्ज़ी..........."जुंमन ने दुआ मे हाथ उपर उठा दिए.

वो ऋुना को समझाता चला गया और ऋुना हां मे सर हिलाती रही......वो कुछ कुछ बाते कर ही रहे थे कि अंदर से काजल की आवाज़ आई..............

"ऋुना बाजी...??"

"आप जाइए ऋुना बाजी , मैं आया अभी........एक घंटे मे हम लोग यहाँ से निकल लेंगे..........कुछ दूर पर मेरा गाओं है............लगभग 2 घंटे लगते है रेलवे स्टेशन से...वहाँ चल कर रुकेंगे....मुझे नहीं लगता कि वहाँ का पता किसी के पास भी होगा...आपके गाओं तो शायद 6-7 घंटे मे वो सब पहुँच जाएँगे प्लेन से आए तो....." जुंमन ऋुना को समझाता हुए बोला.

"ठीक है जुंमन , मैं कोहिनूर को तैयार करती हू....."

अंदर से फिर कोहिनूर की आवाज़ आई....जुंमन बाहर गाओं की ओर चल दिया.

"हां , बस आई बेटा........."ऋुना ने बड़े प्यार से कहा और अंदर आ गई.

"वो मैं बाहर गयी थी...पड़ोस से कुछ सामान लेने...........अभी वो पहुचा जाएगी...ज़रा चाय पी लेते हैं फिर बातें करेंगे...अभी दुकाने नहीं खुली होंगी ना.........??"

"जी" काजल ने बस इतना ही कहा...उसका चेहरा बुझा हुआ सा था...लेकिन बहुत खूबसूरत लग रही थी....ऋुना ने मन ही मन बलाइयाँ ले ली.

"जुंमन कह रहा था कि यही थोड़ी दूर पर उसका गाओं है, चलोगि घूमने...वैसे भी यहाँ तो रहना ही है...जुंमन शायद वही से चला जाए ...??"

"ठीक है बाजी, जैसा आप कहे......"कोहिनूर को कोई दिलचस्पी नहीं थी कही आने जाने मे , लेकिन ऋुना का दिल रखने के लिए हां कह दिया था.

थोड़ी देर बाद एक लड़की पड़ोस से कुछ सामान दे गयी ...ऋुना ने चूल्हे मे आग जलाई और चाय रख दी पतीले मे.

वो किसी चिराग से निकले जिन्न की तरह बहुत तेज़ी से सारे काम कर रही थी और कोहिनूर वहीं पास मे रखे तख्त पर लेट गयी...............लेटते ही उसकी आँख लग गयी रात भर जागी थी.

 


ऋुना ने एक संदूक खोली और उसमे से कुछ कुछ समान एक छोटे से बॅग मे रखने लगी, उसे यकीन हो गया था कि अब कभी दुबारा अपने इस घर मे नहीं आ पाएगी................इसलिए जो चीज़े उसकी ज़िंदगी मे कीमती थी उन्हे वो ले जाना चाहती थी...कीमती चीज़े भी क्या होती हैं ग़रीबों की....कुछ पुराने खत, कुछ पुराने तोहफे, कुछ पुरानी तस्वीरे......कुछ पुरानी यादें.......और कुछ पुराने सपने.

इधर जुंमन ने अपना फोन निकाला और किसी को कॉल लगाया .....

“कैसे हो जुंमन मियाँ” दूसरी ओर से फ़ोन उठाते ही कहा गया.

“ओये शेरा, तुझे मेरा ये नंबर भी पता चल गया……कमाल है…..”

“जुंमन बाबू, भूल गये अपने धंधे का वसूल, दोस्तो की खबर भले ना हो..दुश्मनो की पूरी जानकारी रखनी पड़ती है…बोल आज मरने का इरादा है क्या , मुझे कैसे याद कर लिया…बोल कहाँ आ जाउ तुझे मौत देने…..” दूसरे ओर जो भी था बाते बड़ी ढिठाई से कर रहा था.

“शेरा, तेरा हिसाब भी ज़रूर करूँगा अगर जिंदा रहा तो…अभी कुछ और बात है……”

“ओये ज़िंदा तो तू रहेगा ही…क्यूकी तुझे मैं मारूँगा …मैं….चल क्या याद रखेगा तू भी कि दुश्मनी की भी तो किसी मर्द से……बोल क्या करना है……किसकी जान लेनी है…….”

“शेरा जो काम बोलने जा रहा हू…तभी हां करना अगर ईमान का पक्का होना………..बोल करेगा….??”

“ओये साले….भुतनी के …शेरा से बड़ा ईमान वाला मर्द अक्खी मुंबई मे नही है, जानता है तू भी..… और इसीलिए तूने फोन भी ख़टकाया अपुन को …....अभी ज़्यादा शान पट्टी मत कर, चल बोल……शेरा ने ज़ुबान दिया तेरे को…….जान छोड़ के कुछ भी माँग ले..क्यूकी मरूँगा तो तेरे को मारके ही.........”

“शेरा, जुंमन अपनी अक्खी लाइफ मे पहली बार कोई नेकी वाला काम करने जा रहा है…किसी भी गुर्गे से बोल देता...पन्न वो सब पैसे के लिए बिकाऊ हैं...इसीलिए तुझे बोला.…तेरे ईमान पर यकीन है मुझे..........तुझे धंधे की कसम है धोखा मत देना…..सुन मेरी बात………..” जुंमन उसको कुछ कुछ बताने लगा.....…कुछ बोला जिसे शेरा नोट करने लगा.

“चल हो जाएगा तेरा काम…..जल्द ही आना ....तेरे से पुराना हिसाब है......” शेरा इस बार बस इतना ही बोला , थोड़े गंभीर लहजे मे.

“शेरा , देख ये तेरे मेरे बीच की बात नहीं है…एक मासूम की ज़िंदगी दाव पर लगी है…और तू जानता है अपुन लोगो का उसूल…..तू धोखा तो नहीं….” जुंमन की बात अधूरी रह गयी.

“ साले….बेहनचोद…..अबे शेरा ईमान का सौदा नहीं करता…बोला ना तेरे को ज़बान दिया….जा ऐश कर……..”शेरा ने इतना ही कहा और फोन काट कर दिया.

जुंमन ने फोन कुर्ते की जेब मे डाला और खेतो की तरफ निकल गया...सामने एक मस्जीद दिखी , जुंमन का दिल आज बरसो के बाद नमाज़ अता करने को किया........

मस्जिद मे खड़ा वो हाथ फैलाए दुआएँ माँग रहा था......

"आए मेरे मालिक , मुझ जैसे गुनहगार को एक मंज़िल दिखा दी तूने...एक मकसद दे दिया....तेरा शुक्र है ....बस अब इतनी हिम्मत देना कि मेरे कदम ना डगमगाए.....तेरी रज़ा तू जाने...बड़ा मुश्किल सफ़र है इस मंज़िल का.... ..एक तेरा ही आसरा है.............कोई ऐसा करिश्मा कर कि ज़माना देखता रह जाए...........मैं सारे बुरे काम छोड़ दूँगा, सारे गुनाहो की माफी दे......मदद करना मेरे मौला..............मदद मेरे खुदा." जुंमन की आँख से एक आँसू गिरा उसकी दुआ मे उठी हथेली मे.

 


संदूक से जल्दी जल्दी सामान बॅग मे रखती हुई ऋुना के हाथ से छुटकर एक तस्वीर ज़मीन पर गिर पड़ी..........छन्न्न की आवाज़ के साथ टूटे हुए काँच ज़मीन पर बिखर गये...कोहिनूर की आँख खुल गयी..........जल्दी से उठकर बैठ गयी ......और तस्वीर पर नज़र पड़ी तो बस देखती ही रह गयी..........उसकी आँखे मानो जम सी गयी उस तस्वीर पर.

जल्दी से तख्त से उतरकर तस्वीर के पास पहुचि , ऋुना के हाथ से फ्रेम लेकर ध्यान से देखने लगी...कोहिनूर की आँखे भर आई..........

"ये मोहिनी है........" ऋुना ने बिना काजल की ओर देखे तस्वीर मे बैठी दो औरतो मे से एक पर अंगुली रखते हुए कहा.

"हां बाजी !!!!...... ये मोहिनी है......मेरी माँ......" कोहिनूर ने बहुत सर्द लहजे मे कहा....उसकी बात पर मानो हज़ार वॉल्ट का करेंट लगा ऋुना को......

"मोहिनी!!! और्र्ररर ...........तुम्हारी माँ......??????" ऋुना जैसे सकते मे आ गयी एक पल को.

"ये नहीं हो सकता.........खुदा इतना बेरहम नहीं हो सकता...........नहीं ये नहीं हो सकता...."ऋुना चीख पड़ी.

किस्मत भी कैसे कैसे खेल खेलती है, इंसान तो उसके हाथ की कठपुतली ही बनकर रह जाता है .

"क्या हुआ ऋुना बाजी........आप जानती हैं मेरी मम्मी को????..हां ये मेरी मम्मी ही हैं ...बोलिए ना क्या हुआ????...कैसे जानती हैं आप उन्हे..........क्या जानती हैं......???" काजल भी चौंक गयी ऋुना के इस तरह से चीखने पर.....

"या मेरे ख़ुदाया.........ये तेरी कैसी आज़माइश है...और कितनी आज़माइशें देगा तू इस मासूम को...............क्या खता है इसकी...हां, कोहिनूर मैं जानती हूँ तेरी मम्मी को...कोहिनूर मेरी बच्ची....." ऋुना ने खीच कर काजल को अपने कलेजे से लगा लिया और उसकी आँखे छलक पड़ी......

"क्या हुआ ऋुना बाजी ..बताइए तो सही......."

"मुझे नहीं पता था कि तू मोहिनी की बेटी है....!!!....कोहिनूर !! मुझे नहीं पता कि तुम खुश होगी या नहीं ...लेकिन एक बात है जो तुम्हारे लिए जान'ना बहुत ज़रूरी है...तुम्हारे पापा एक निहायत शरीफ और सच्चे इंसान थे.......मेरे कहने का मतलब ये है कि तुम ये ना सोचना की तुम्हे किसी कोठे पर...मतलब कोठे की पैदाइश....मुझे माफ़ कर्दे मेरी बच्ची........मुझे समझ मे नहीं आ रहा कैसे तुझे अपनी बात समझाऊ......."ऋुना सचमुच बहुत परेसान हो गयी थी.

"कोहिनूर !तुम्हारे पापा और मम्मी एक ही कॉलेज मे मे पढ़ते थे.........स्टूडेंट यूनियन के लीडर थे....मम्मी से तुम्हारी तकरीबन 10 साल बड़े थे...मुझे ज़्यादा तो नहीं बताया मोहिनी ने...लेकिन इतना बताया था कि मुहब्बत की शुरुआत मोहिनी ने ही की थी...और जल्द ही दोनो की मुहब्बत परवान चढ़ती गयी.........लेकिन जैसा कि अक्सर होता है हमारे समाज मे........उनकी मुहब्बत किसी को मंजूर नहीं थी...ना मोहिनी के घर वालो को ना तुम्हारे पापा के घर वालो को..........." ऋुना को जितना पता था वो बताती जा रही थी...कोहिनूर चुपचाप बड़े गौर से सुन रही थी उस मांझी को जिसके बारे मे उसे कभी उसकी माँ ने नहीं बताया.

 
"कोहिनूर, बहुत दर्द झेला तुम्हारी माँ ने............तुम्हारी मम्मी और पापा ने शादी करली थी किसी मंदिर मे..........लेकिन किसी को बताया नहीं........कुछ दिनो बाद ही मोहिनी प्रेग्नेंट हो गयी......तुम्हारे पापा जल्द ही मोहिनी को लेकर उस शाहर को छोड़कर कहीं चले जाने वाले थे और ये बात किसी को पता नहीं थी.......लेकिन किस्मत को तो मोहिनी का इम्तेहान लेना था....कोहिनूर तुम्हारे पापा एक हादसे के शिकार हो गये.......इस से पहले कि उनकी खुशियों का गुलशन गुलजार होता , किस्मत ने उनकी दुनिया वीरान करदी...........उनका आशियाना बसने से पहले ही तिनका तिनका बिखर गया.."

ऋुना ने कोहिनूर को और ज़ोर से भीच लिया अपने साथ और उसकी आँखो से छलक आए आँसुओ को अपने दुप्पट्टे के पल्लू से सॉफ कर दिया......

"क्या नाम था मेरे पापा का बाजी, क्या हुआ था उन्हे...क्यू चले गये वो मुझे छोड़कर....."`

" नीरज नाम था तुम्हारे पापा का..... नीरज चौधरी....मम्मी ने नहीं बताया तुम्हे???......मुझे नहीं पता क्यू नहीं बताया उसने बेटा..शायद जिस भवर मे वो फँस गयी थी उसके बाद उसे यकीन ही नही रहा था कि कोई भी उसकी बात पर ऐतबार करेगा.........शायद उसे लगा हो कि .....खैर, जाने दो मेरी बच्ची........"

"बताइए क्या हुआ था मेरे पापा को.........."

"मोहिनी ने मुझे बहुत तफ़सील से नहीं बताया कोहिनूर , फिर भी जो उसने बताया और जो मुझे याद है मैं बता रही हू.......स्टूडेंट यूनियन के लीडर होने के नाते बहुत से दुश्मन थे तुम्हारे पापा के.......एक बात बताऊ .............जिस पार्टी का सदानंद लीडर है तुम्हारे पापा उसकी पार्टी के अपोजीसन वाली पार्टी के लीडर थे ...............तुम्हारे पापा यूनिवर्सिटी से अपनी स्टडी ख़त्म कर चुके थे...शायद उन्हे जॉब भी मिल गयी थी......लेकिन एक दिन यूनिवर्सिटी के एलेक्षन मे उन्हे उनकी पार्टी ने बुलाया था.....वो अपने पार्टी के कॅंडिडेट के सपोर्ट मे स्पीच दे रहे थे और किसी वजह से दंगा भड़क गया ......उस दंगे मे तुम्हारे पापा भी मारे गये...........किसने भड़काया , किस वजह से हुआ ..कुछ पता ना चला........."

ऋुना बोलती जा रही थी..........

"कोहिनूर , यही वजह थी...यही वजह थी कि मुहब्बत का जहाँ आबाद करने के सपने देखने वाली मोहिनी एक कोठे पर पहुँच गयी.........एक सुहागन की जिंदगी जीने के सपने देखने वाली वाली मोहिनी को एक तवायफ़ की तरह जीने की राह चुन नी पड़ी......बहुत मुश्किल राह चुन ली थी उसने...............जब वो मुझसे आख़िरी बार मिली तो बहुत खुस थी, मुझे लगा कि शायद उसकी आज़माइश , उसका इम्तेहान ख़त्म हो गया, लेकिन मुझे नहीं पता थी कि उस मोहिनी की आज़माइश आज भी ख़त्म नहीं हुई......आज उसकी एकलौती निशानी भी उसी राह पर चल पड़ी..."

"मैं समझी नहीं...आप सॉफ सॉफ क्यू नहीं बताती......" इस बार काजल बुरी तरह झुंझला गयी.....

"सॉरी मेरी जान, सच तो ये है कि मैं कुछ बोलने की हालत मे ही नहीं हूँ...आज मुझे नफ़रत हो रही है इस दुनिया से भी और उस खुदा से भी...."

"बताती हू " ऋुना एक पल को रुकी अपने आँसू सॉफ किए और फिर से बोलना सुरू किया......

"मुझे ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि तुम्हारी माँ पर कैसा असर हुआ होगा तुम्हारे पापा की मौत का........वही हुआ उसका जो किसी भी प्यार मे पागल दीवानी लड़की का होता..........लेकिन उसने हार नहीं मानी.....उसने तुम्हे जन्म दिया.............तुम्हारे नाना ने तुम्हे अपने पास रखा ...लेकिन मुझे इस बारे मे इस से ज़्यादा कभी नहीं बताया उसने...हां इतना बताया था उसने कि एक बेटी है मेरी....शायद तुम्हे अपनी मांझी के काले साए से दूर रखना चाहती थी...शायद वो चाहती ही नहीं थी कि कोई जान पाए कि वो तुम्हारी माँ है............."

"तुम्हारे नाना क्यू मान गये , कैसे मान गये मुझे नहीं पता मेरी बच्ची.....लेकिन जहाँ तक एक औरता का दिल कहता है...उन्हे भी अपनी बेटी का दर्द शायद महसूस हो गया हो...कुछ कह नहीं सकती मैं इस बारे मे...."

"मोहिनी बहुत बहादुर थी कोहिनूर...उसने सबकुछ बर्दाश्त कर लिया ...बस एक बात नहीं कर पाई..........नीरज की मौत उसे हमेशा एक साजिश लगी........उसके दिल मे एक चोट थी....एक दर्द था.......हमेशा उसे लगता रहा कि नीरज को सदानंद की पार्टी के बड़े नेताओ ने मरवा दिया...........क्यूकी वो उनके लिए एक नया और शायद सबसे बड़ा ख़तरा बनता जा रहा था....नीरज बहुत अच्छा इंसान था,...लोग बहुत प्यार करते थे उसे...और शायद जल्द ही उसकी पार्टी मे उसे कोई बड़ा ओहेदा मिल जाता....यही डर था उनके मन मे...........लेकिन इन सब में सदानंद का हाथ नहीं था........क्यूकी उस समय सदानंद की औकात उसकी पार्टी मे कुछ ख़ास थी नहीं....... "

"आप ये सबकुछ कैसे जानती हैं "काजल से रहा नहीं गया...

 
"बताती हू,,सब कुछ बताउन्गी........सदानंद उस समय अपनी पार्टी मे नया नया शामिल हुआ था...लेकिन ख्वाब बड़े उँचे थे उसके......कुछ दिनो मे ही उसने अपने रंग दिखाए और अपनी ही पार्टी के खिलाफ बोलने लगा....और पार्टी से अलग होकर एक नयी पार्टी बनाने की बात भी करने लगा............एक बात जो सदानंद के हक़ मे थी कि वो बहुत पैसे वाला था.......रहिशि और अमीरी खानदानी थी ..और धीरे धीरे इस पैसे ने अपना रंग दिखाना सुरू किया......मोहिनी को सदानंद की शक्ल मे एक मोहरा नज़र आया.......उसे खुद नहीं पता था कि मोहरा तो वो बन रही थी सदानंद के हाथ की."

"मोहिनी सदानंद के ज़रिए अपने नीरज के हत्यारों को ख़त्म करना चाहती थी, लेकिन उसे नहीं पता था कि सदानंद उसे मोहरा बनाकर अपना रास्ता सॉफ कर रहा था..........सदानंद को पार्टी मे पोज़िशन चाहिए थी और मोहिनी को इंतकाम......यही शायद उनका सौदा था.......... किसी को नहीं छोड़ा मोहिनी ने...मोहिनी का मायाजाल सबको निगल गया..........वो सारे लोग जो ज़िम्मेदार थे ,सबको कीमत चुकानी पड़ी, अपनी जान देकर .........लेकिन जैसे ही सदानंद की हैसियत पार्टी मे बढ़ी, उसने दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका अपनी जिंदगी से मोहिनी को."

"अपने नीरज की मौत का इंतकाम लेते हुए कब मोहिनी एक तवायफ़ बन गयी उसे खुद पता नहीं चला........बड़ी भारी कीमत चुकाई उसने अपनी मुहब्बत के इंतकाम की........इससे ज़्यादा शायद मैं तुम्हे बता नहीं पाउन्गी......और शायद इस से ज़्यादा कोई बेटी अपनी माँ की बर्बादी सुन भी नहीं पाएगी." ऋुना ने बड़ी मुश्किल से आख़िरी शब्द कहे...दर्द की एक लकीर उसके चेहरे पर छा गयी थी.

कोहिनूर एकदम गुम्सुम सी बैठी सब सुन रही थी...

"कोहिनूर! अपने नीरज की मौत का बदला तो ले लिया मोहिनी ने...लेकिन खुद की ज़िंदगी बर्बाद कर ली.......पर कभी उसे इस बात का अफ़सोस रहा , ऐसा लगा नहीं.........हां अपनी नन्ही सी बेटी से अलग रहने का दर्द ज़रूर था ,जो अक्सर तन्हाई की रातों मे आँसू बनकर बह जाता था......"

ऋुना कहकर चुप हो गयी थी और कोहिनूर का पूरा चेहरा आँसुओ से भीग गया था...

"ऋुना बाजी ! अपनी माँ को कभी अच्छी औरत नहीं समझा था मैने.....हमेशा एक शिकवा रहा था मेरे दिल मे....लेकिन आज मुझे मेरी माँ सही लग रही है, हर कदम पर सही......आज मुझे फक्र हो रहा है अपनी माँ पर और आज मुझे यकीन है कि अगर मैं भी अपनी माँ की जगह होती तो यही करती"

कोहिनूर की आवाज़ मे एक मान था और आज शायद उसकी माँ की रूह को सुकून मिल गया था.....क्यूकी आज उसकी बेटी ने उसे सही कह दिया था.....उसे माफ़ कर दिया था.

काजल ऋुना के गले लगी थी और दोनो रो रही थी........काजल के दिल मे एक हुक सी उठ रही थी...आज उसे अपनी माँ बहुत याद आ रही थी....वो माँ जिसे सारी उम्र उसने सवालों के घेरे मे रखा...वो माँ जिसने खुद को अपनी मासूम बच्ची से दूर रखा...आज काजल को अपनी माँ का दर्द महसूस हो रहा था...... उसकी माँ तो दर्द की मूरत थी...ना जवानी मे पति का साथ मिला ना ढलती उम्र मे औलाद का सुख...सारी ज़िंदगी अपने इंतकाम की आग मे झुलसे हाथो को छुपाती रह गयी , वो दर्द सहती रही……….घुट'ती रही...लेकिन कोई भी ऐसा नहीं रहा उसके पास जिसे वो अपना कह लेती……...जिसके काँधे पर सर रख कर रो लेते.

आज काजल खुद को भी कम दोषी नहीं मान रही थी....कम से कम उसे तो अपनी माँ का साथ देना चाहिए था, वो क्यू ना समझी अपनी माँ की आँखो का ख़ालीपन, क्यू उसे अपना ही दर्द सबसे ज़्यादा महसूस होता रहा.....काजल के मन मे इन सारे सवालो ने उथल पुथल मचा रखी थी....और वो ऋुना के गले लगी अपने दर्द को आँसुओ मे बहा देना चाहती थी……….लेकिन ये दर्द कम होने वाला दर्द ना था...उम्र भर का रोग था.

"मैं बहुत बुरी हू ऋुना बाजी...मैने भी अपनी माँ के साथ वही किया जो सारी दुनिया ने किया......मेरी माँ को मैं भी ना समझी...."काजल सिसकियों के बीच बोलती जा रही थी.

"नहीं मेरी बच्ची, तू तो बहुत प्यारी है....खुद को दोष मत दे...हालत बुरे थे...और तू तो उन्ही हालत मे फँस कर रह गयी………...तेरा कोई दोष नहीं ." ऋुना उसे समझा रही थी.

"ऋुना बाजी, आपको ये सब कैसे पता है..कैसे जानती हैं आप मेरी माँ को...आपने बताया नहीं........" काजल ने ऋुना की ओर देखते हुए पुछ लिया.

" बताउन्गा बेटा ,वो भी बताउन्गा.....लेकिन अभी उस से ज़रूरी जो काम है वो करना है.......तू अभी बस ये समझ ले कि मेरी कहानी भी कुछ ऐसी ही है.....और इसीलिए मुझे पता है....." ऋुना जल्दी से जल्दी बात को ख़त्म करना चाहती थी.

"मेरी माँ अच्छी थी ऋुना बाजी, बहुत अच्छी.........."काजल ने बस इतना ही कहा ....ऋुना उसके बालो मे हाथ फेरती उसे चुप करती रही.

"हां बेटा,...तेरी माँ बहुत अच्छी थी...और तू उस से भी अच्छी है....जो तूने किया है वो करने के लिए बहुत बड़ा कलेजा चाहिए और मुहब्बत का पागलपन......इंशाल्लाह ! सब ठीक हो जाएगी...बस अब खुदा तेरी आज़माइश ख़त्म कर दे........."

"नहीं बाजी…….मेरी आज़माइश ख़त्म नहीं होनी चाहिए…ये तो मेरी मुहब्बत की कीमत हो जो मैं चुका रही हू……....मैं अपनी मुहब्बत को हारने नहीं दूँगी.....ज़माना देखे तो सही की एक तवायफ़ की मुहब्बत मे कितनी शिद्दत होती है……………..अभी तो और तमाशा बन'ना है इस कोहिनूर का............." काजल के आँसू सुख गये मानो...वो एक ठोस लहजे मे बस इतना ही बोली की दरवाज़ा खोलकर जुंमन चला आया.

 


लगभग आधे घंटे के बाद वो लोग एक बस मे बैठे जुंमन के गाओं को रवाना हो गये थे...काजल ने थोड़ा बहुत पुछा लेकिन ऋुना उसे समझा दिया कि अब वो यहाँ नहीं आएँगे............और जुंमन के गाओं से ही जब लैला कहेगी शहर वापस चले जाएँगे.............काजल ने भी ज़्यादा नहीं पुछा……....क्यूकी उसे खुद पर यकीन था…………..उसने सोच लिया था कि जब फ़ैसले की घड़ी आ जाएगी तो उसे क्या करना है………….....शायद उसने भी खुद को किस्मत के हाथो छोड़ दिया था………...हां इस बात पर कोई बहस उसे बर्दाश्त नहीं थी की वो वही करेगी जो लैला कहेगी.

अपने मन मे जुंमन और ऋुना दुआएँ माँग रहे थे,………..कोहिनूर के फिर से काजल बन जाने की दुआ……...उसकी खुशियों की दुआ……..उसकी मुहब्बत की दुआ…...लगभग 3 घंटे बाद वो लोग एक छोटे से गाओं के एक छोटे से कच्चे घर मे पहुचे.

ऋुना के अनुमान के ठीक विपरीत जुंमन ने सारा इंतज़ाम पहले ही करवा दिया था.....उसकी नज़रो मे आज जुंमन के लिए इज़्ज़त बढ़ती जा रही थी………...वो तो जो भी कर रही थी फिर भी एक वजह थी उसकी............उसने खुद एक तवायफ़ होने का दर्द महसूस किया था…...लेकिन जुंमन?...वो तो बस इंसानियत का फ़र्ज़ निभाने निकल पड़ा था.............जान हथेली पर लेकर.

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इधर सदानंद के घर पर.......

"ओये…..अबे…...अबे कौन हो तुम..??..ऐसे कैसे अंदर घुसे चले आ रहे हो ..हैं???......."बंगले के मेन गेट पर खड़ा वॉचमन फ़ोन पर मुस्कुरा मुस्कुरा कर बातें किए जा रहा था जब उसकी नज़र गेट से अंदर घुस चुके मजबूत कद काठी वाली पहलवान जैसे शख्स पर पड़ी जो बिना कुछ पुछे ,बिना किसी की परवाह के अंदर चला जा रहा था…………..जल्दी से दौड़कर वॉचमन ने उसे रोका और बड़ी बुरी तरह से डाँट'ते हुए पुछा.

वो शख्स रुक गया……..वॉचमन उसके करीब पहुचा और एक बार भरपूर नज़र उसपर डाली………...करीब 5,7' कद...मजबूत गठा हुआ बदन......लाल आँखे, गोरा तन्तनाता हुआ सा चेहरा..............कला पाइज़मा कुर्ता और गले मे मोटी सी चैन......शकल से गुरूर और गुसा झलकता हुआ.....उसने वॉचमन को खा जाने वाली नज़रो से देखा.

"ऐसे क्या देखता है बे…....पता भी है ये किसका घर है.......चलो निकलो यहाँ से...........जाने कहाँ कहाँ से आ जाते हैं............"वॉचमन कुछ ज़्यादा ही बदतमीज़ी से बात कर रहा था...शायद सदानंद का वॉचमन होने का असर था....

"अबे चूहे !!....तुझे पता है तू किस'से बात कर रहा है.......अबे जान जाएगा तो मूत निकला जाएगा तोहरा........छोड़ अभी अपुन थोड़ा ज़रूरी काम से इधर आया है……..तेरे कू फिर कभी समझाएगा....... " पलक झपकते ही शेरा का हाथ उस वॉचमन के मूह को बंद कर गया और जेब से तमंचा निकालकर उसके सर पर दे मारा…...बेचारा वॉचमन चीख भी ना पाया और बेहोश हो गया………….शेरा को जो जुंमन ने बताया था उसके बाद उसे शायद अनुमान हो गया था कि यहाँ के हालात ऐसे ही होने वाले हैं……पता था कि किसी अंजान को आलोक से मिलने नहीं दिया जाएगा............और जो उसने किया ये उसी का नतीजा था.

शेरा ने उसे एक कोने मे डालकर पास मे पड़ी टाट उसके उपर डाल दी और तेज तेज कदमो से अंदर को चल दिया………..घर के नौकरो से बचते बचाते आख़िर 15 मिनट की जहमत के बाद वो आलोक के कमरे मे घुसने मे कामयाब हो ही गया.

कोई 20 मिनिट बाद आलोक की गाड़ी हवा की तेज़ी के साथ उस बंगले से निकली और किसी को भी कुछ सोच पाने का मौका मिलने से पहले ही वो गेट से बाहर थी.....

ड्राइविंग सीट पर बैठे आलोक की आँखे रतजगे और रोने के कारण लाल हो गयी थी…..उन आँखो मे सारे जमाने का दर्द उमड़ आया था.....आज किस्मत ने एक बार फिर उसे मौका दिया था……….और इस बार वो हार नहीं मान'ने वाला था.............उसकी चेहरे की सख्ती बता रही थी कि इस बार वो नहीं झुकेगा……….चाहे कोई भी कीमत चुकानी पड़े. चाहे किसी भी हद से गुजर जाना पड़े………उसके ठीक बगल मे बैठा था शेरा और पिछे बैठी थी उसकी दोस्त सोफी

"आलोक बाबू , एक बात बोलू बुरा ना मानो तो.............वैसे मान भी जाओगे तो मेरा क्या ......"शेरा, शायद अकड़ का दूसरा नाम था.

"नहीं शेरा भाई, बिल्कुल नहीं बुरा मानूँगा...बोलो..."आलोक ने धीरे से कहा.

"तुम जाओ जहाँ जाना है.....शायद देर हो जावे, तो बहुत देर हो जावे...इन मेडम को शेरा छोड़ देगा हवाई अड्डे तक......हां, पन अपुन गुंडा है……सोचकर ही भरोसा करियो......"

"आलोक ने एक बार उसके ओर देखा और कुछ ना बोला.....

"ये ठीक कह रहे हैं आलोक.......यू प्लीज़ गो...आइ विल मॅनेज.......माइ हंबल रिक्वेस्ट टू यू...डॉन"ट वेस्ट टाइम........."

 
आलोक भी शायद दिल से यही चाहता था….लेकिन वो सोफी को छोड़ कर भी नहीं जा सकता था…………इतनी दूर एक उसके ही भरोसे पर तो आई थी वो…..…और आज जब वो जा रही थी तो कैसे अकेले उसे जाने देता…….उसे सी-ऑफ करने एरपोर्ट जा रहा था और वहाँ से जुंमन के गाओं…….लेकिन दूसरी तरफ उसकी मुहब्बत थी…………आज उसका बस नहीं चल रहा था कि वो उड़ कर अपनी काजल के पास पहुच जाए…उसने सुनी सुनी आँखो से सोफी को सिर्फ़ देखा.

“प्लीज़ जाओ…..गो!!!!...” सोफी ने ज़ोर देकर कहा और आख़िर आलोक मान गया…

“शेरा भाई , बहुत बड़ा अहसान किया है आपने मुझपर……..…जान रही तो कभी इस अहसान का बदला ज़रूर चुका दूँगा………बस एक अहसान और करदो, सोफी को छोड़ दो एरपोर्ट तक सही सलामत…..” आलोक ने हाथ जोड़ दिए शेरा के आगे.

“ओ हीरो…अपुन को सेनटी मत कर………अभी अपुन के पास अद्धा-पौवा कुछ नहीं है….चल जा तू…अपुन पहुचा देगा इन मादम को…”

आलोक ने साइड मे गाड़ी रोकी………..एक टॅक्सी को रुकवाया………शेरा से हाथ मिलाया और सोफी को गले लगाकर उस टॅक्सी मे बैठा दिया.

“ सी यू सून , आलोक” सोफी ने टॅक्सी के चलने से ठीक पहले कहा.

“प्रे फॉर माइ लव सोफी” आलोक की आँखे दबदबा गयी.

“आइ विल, काजल तुम्हे ज़रूर मिलेगी….गॉड ब्लेस्स यू”

सोफी शेरा के साथ एरपोर्ट को निकल गयी और आलोक गाड़ी मे बैठा जुनूनी अंदाज़ मे जुंमन के गाओं को निकल गया, जहा उसकी मुहब्बत की किस्मत का फ़ैसला होना था.

एरपोर्ट पर सोफी ने शेरा को थॅंक यू बोला और अपने सामान को संभाले अंदर की ओर चल दी….शेरा ने जब देखा कि वो गेट से अंदर घुस गयी तो वो भी वापस चल दिया………..आज ज़िंदगी मे पहली बार उसके दिल को बहुत सुकून मिला था…………उसके दिल मे भी बस यही दुआ थी…… “आलोक को उसकी मुहब्बत मिल जाए…”

सोफी कुछ कदम ही अंदर चली थी कि किसी ने उसे आवाज़ दी “सोफ़ियाअ!!”

किसी लड़की की आवाज़ थी,सोफी ने पलटकर देखा ,उसके पिछे थोड़ी डोर पर एक लड़की खड़ी थी……सोफी को चेहरा जाना पहचाना लग रहा था लेकिन उसे याद नहीं आ रहा था………...वो वही रुक गयी…लड़की भागती हुई उसकी ओर आ गयी…..उसके साथ मे एक लड़का था जिसे सोफी बिल्कुल नहीं पहचान रही थी…….लड़का काफ़ी कमजोर और शक्ल से बीमार-बीमार लग रहा था..

“यू आर सोफ़िया…..राइट…???.व्हेअर ईज़ आलोक….??…....मैने पता किया वहाँ तो पता चला कि तुम दोनो इंडिया आए हो.........मैं उसे दो दिन से लगातार ट्राइ कर रही हू………ना उसका फोन लग रहा है ना वो किसी भी कम्यूनिकेशन का रेस्पॉंड कर रहा है…….…कहाँ है वो…प्लीज़ बताओ…इट”स अर्जेंट…… ?? ही ईज़ ओके ना??”लड़की बहुत घबराई हुई और बदहवास सी लग रही थी.

“आइ एम रियली वेरी सॉरी…बट..मैने पहचाना नहीं ….हू आर यू ??…कभी देखा तो है तुम्हे बट आइ कॅन”ट रीकॉल ”” सोफी ने कहा.

“मे…अंजलि आलोक की सिस्टर…स्काइप पर बात हुई थी एक दो बार जब तुम आलोक के साथ थी…रिमेंबर???...बताओ कहाँ है आलोक…और कुछ मत पुच्छना ….मैं बाद मे सब बताउन्गी,…..”उस लड़की ने जल्दी जल्दी से इतना ही कहा

“ओह…य्स्स…हाई अंजलि..आलोक तो……???...कम फास्ट…जल्दी आओ मेरे साथ..वो अभी अभी इस शहर से बाहर गया है…प्लीज़ कम………” सोफी कुछ कुछ बता रही थी जिसे सुनकर अंजलि और बेचैन होती जा रही थी.

अंजलि , वो लड़का और सोफी भागते हुए एरपोर्ट से बाहर निकले…….सोफी की नज़रे चारो ओर शेरा को तलाश कर रही थी…..उसने आलोक का फ़ोन भी ट्राइ किया पर वो बंद था……….शेरा भी कही नहीं दिख रहा था…..वही एक था जो उन्हे अभी आलोक के पास ले जा सकता था….…सोफी दौड़ती हुई थोड़ी सी और आगे बढ़ी………कुछ दूर पर उसे आख़िर शेरा दिख ही गया…………..फोन कान से लगाए और एक हाथ मे सिगरेट पकड़े वो थोड़ी दूर पर खड़ा शायद किसी का इंतज़ार कर रहा था..

 


“एक्सक्यूस मी….!!!...हेल्लूऊओ…”शेरा की नज़रे सोफी की आवाज़ पर उसकी ओर उठ गयी…….उसने फोन काट किया और बड़े गौर से उन सबको देखने लगा…

“ऐंन्न…तू गयी नहीं ??……..और ये सब कौन आ गये??…….चक्कर क्या है मेडम??” शेरा ने आस्चर्य से पुछा .

“देखिए भैया, प्लीज़ आप हमे आलोक तक ले चलिए……..ये बहुत अर्जेंट है…….प्लेअसस्स्स्सीई,,,मैं रास्ते मे सब बता दूँगी…………”अंजलि ने जल्दी से कहा.

“उम्म्ममहूऊऊ…….हा…कहाँ फँसा दिया साले जुंमन ने,,,…..ओके चलो …लेकिन अब मुझे सब बताना पड़ेँगा तुम सबको…साला अपुन का खोपड़ी सटक रही है अब” शेरा बेमतलब दूसरे के लफडे मे पड़ने वाला शक्स नहीं था लेकिन आज वो मना ना कर सका.

“जी मैं सब बता दूँगी…प्लीज़……..”

“ओये जग्गा…..सुन! मेरी गाड़ी, थोड़े पैसे और कुछ “समान” लेकर 10 मिनिट मे, पुराने चर्च के पास मिल………….कोई सवाल नहीं और लेट हुआ तो तू जानता है अपुन को………” शेरा ने फ़ोन पर इतना ही कहा और बिना जवाब सुने फ़ोन काट कर दिया.

तकरीबन 30 मिनिट बाद सोफी, अंजलि और वो लड़का शेरा के साथ उसकी गाड़ी मे जुंमन के गाओं के लिए रवाना हो गये.

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कोई 8 घंटे बाद…

सुबह हो चुकी थी…….और ऋुना के घर पर पहुच चुके सदानंद का गुस्सा देखने लायक था.

“लैला अगर वो लड़की नहीं मिली, और वो हो गया जो मैं नहीं चाह रहा तो तेरा वो हश्र करूँगा…..” सदानंद ने लैला को खा जाने वाली नज़रो से देखते हुए कहा..

“वो कही नहीं जाएगी हुज़ूर………..वो…वो..सब ज़रूर उस कमीने जुंमन के घर गये होंगे…….ये सब उसी का किया धरा है……..आप पता करवाईए जुंमन के घर का अड्रेस्स……..यही से कुछ दूर है पर मुझे ठीक ठीक पता नहीं है……..” लैला की हालत खराब हो रही थी…बड़ी मुश्किल से इतना बोल पाई.

“कमीनी……....रंडी…………मैं कैसे पता करवाऊ..बोल “

“वो ..व..वो….वो एक दो बार जैल गया है…शायद उधर से कुछ पता चल सके……” सदानंद ने उसे घूरा तो लैला की जान हलक मे आ गयी…

“तुझे तो मैं बाद मे देखूँगा…” सदानंद ने दाँत पीसते हुए कहा और अपने किसी खास आदमी को फ़ोन करने लगे………….

“हेलो वेरमा साहब………..एक काम था….” और फिर सदानंद कुछ देर तक बात करते रहे .

कोई 2 घंटे बाद एक बार फिर से सदनादन और उसके आदमियों की गाड़ियों का काफिला निकल पड़ा…..इस बार रुख़ था जुंमन का घर.

जाने किस्मत को क्या मंजूर था……….आलोक , अंजलि और सदानंद, सब जुंमन के गाओं निकल पड़े थे…………...अपने अपने मकसद के लिए……………एक की जीत दूसरे की हार थी………….खून के रिश्ते मे और मुहब्बत के रिश्ते मे टकराव होने वाला था………….. देखना था कौन कमजोर पड़ता है…वो खून का रिश्ता या ये मुहब्बत का रिश्ता…..

ऋुना और काजल जुंमन के साथ उसके घर पहुच चुकी थी...दोपहर का खाना खाकर ऋुना के साथ काजल लेटी थी ...जुंमन कुछ काम है बोलकर कही बाहर गया हुआ था.

"ऋुना बाजी, बताइए ना आप कैसे जानती हैं आलोक के पापा को.....? काजल ने छत को एकटक देखते हुए पुछा.

"कोई ऐसा रिश्ता नहीं है कोहिनूर जिसे नाम दे सकूँ.........बस ये समझ लो कि एक मजबूर लड़की अपना सहारा ढूँढने निकली थी,और धोखा खा गयी........." ऋुना ने कुछ सोचते हुए कहा.

"मैं समझी नहीं....." कोहिनूर बोली.

" मेरी दास्तान भी हर तवायफ़ के जैसे ही मजबूरी की दास्तान है....जिस दिन कोठे पर ये "रानी" ऋुना बन गयी उस रात मेरी इज़्ज़त का पहला सौदागर सदानंद ही था...जानती हो, बड़े सपने दिखाए थे इसने मुझे...."ऋुना अपने बारे मे बताती गयी.....

 


"मैं दिल्ली से हूँ.......अपने प्यार के साथ मुंबई भाग आई थी..घर वालो के खिलाफ जाकर अपना सब कुछ उसे सौप दिया.....लेकिन ..." ऋुना की आँखे भर आई....मांझी की दर्दनाक यादें उसके सीने मे शूल बनकर चुभ रही थी..........काजल उठकर बैठ गयी, उसके कंधे पर हाथ रख दिया.

"वो बेवफा निकला कोहिनूर...!.दर दर की ठोकरे खाती रही मैं उसके साथ, हर दर्द हर तकलीफ़ सहने को तैयार थी......लेकिन वो कमजोर निकला....उसका दिल मुझसे भर गया, और उस दिल की मुहब्बत मर गयी......मेरे साथ जीने मरने की कसमे खाने वाला, मरते दम तक साथ निभाने के वादे करने वाला, चार कदम भी मेरे साथ ना चल पाया......सोई तो मैं उसकी बाहों मे थी, लेकिन जब नीद खुली तो खुद को एक कोठे पर पाया...उस जगह पर जहाँ पायल की झंकार और तबले की तान के बीच एक मजबूर औरत की दर्दनाक चीख घुट घुट कर दम तोड़ देती है......हां कोहिनूर , मेरे दीपक ने मुझे बेच दिया था...मेरी पहली मुहब्बत ने..मेर अपने दीपक ने." पुराना जख्म आज फिर से उभर आया था.....ऋुना के आँसुओ मे सैलाब आ गया था....पर वो रुकी नहीं, बोलती रही....

" मैं बिल्कुल टूट गयी थी...जिसपर आँख मूंद कर ऐतबार किया था उसी ने खून कर दिया था मेरे ऐतबार का...जीने की कोई वजह नहीं थी, लेकिन मर भी ना सकी........शायद कुछ करना बाकी था इस दुनिया मे........घर वालो ने पहले ही मरा मान लिया था, कोई नहीं था जिसे मेरी हालत से मतलब था.....पैरो मे घुंघरे बँधे तो फिर सिर्फ़ एक पहचान रह गाइिईई - सिर्फ़ एक तवायफ़ .."

"कुछ दिन तक अपना दामन बचाती रही..लेकिन कब तक..सदानंद ने बड़े वादे किए मुझसे...मुझे उस जहन्नुम से निकालने का वादा, एक नयी ज़िंदगी का वादा,हर वादे पर एक और वादा.........कसमों वादो पर ऐतबार तो खैर बहुत पहले ही छोड़ दिया था मैने...बस अपनी बर्बादी का तमाशा देखती रही.....कुछ दिन बाद मुझे उस कोठे वालो ने बेच दिया....सदानंद तो कभी नहीं आया फिर, लेकिन यहाँ मैं तुम्हारी माँ से मिली..मोहिनी से" ऋुना ने काजल की ओर देखा...दोनो की आँखो मे आँसू थे.

"मोहिनी की आँखे बड़ी सुंदर थी काजल...लेकिन उन आँखो मे हमेशा इंतकाम नज़र आता था........मोहिनी हम सबसे अलग थी...हम से ज़्यादा बहादुर थी.....और इसी लिए शायद अपना मकसद पा सकी....एक दिन मोहिनी आई तो बहुत खुश थी...आते ही मुझे गले लगा कर बोली..---

"आज जीने का मकसद पूरा हो गया ऋुना बेहन.......अब जान जब चाहे चली जाए को मलाल नहीं रहेगा........बस एक माँ होने का फ़र्ज़ ना निभा पाई यही दर्द हमेशा डाँसेगा.........अपनी बेटी की गुनहगार हू मैं....."

काजल की आँखे फिर से भर आई...आज उसे लग रहा था कि काश उसकी माँ उसे ये सब पहले बता देती तो वो अपनी माँ को कभी अकेला ना छोड़ती .लेकिन वो ये भी समझ रही थी कि उसकी माँ ने ऐसा क्यू नहीं किया...लेकिन वाह री किस्मत...........उसी राह पर काजल को ले चली जहाँ से बचाने के लिए उसकी माँ सारा दर्द अकेले ही पी गयी थी.

कुछ दूर खड़ा जुंमन बिल्कुल खामोशी से उनकी बात सुन रहा था..........धीरे धीरे चलता हुआ उनके पास आया और थोड़ी दूर पड़ी चारपाई खिचकर बैठ गया.........

ऋुना एक पल को ठिठकी , उसकी ओर देखा और फिर बोलना सुरू किया......

"काजल, उसी रात मोहिनी ने मुझे अपने बारे मे सब बताया था..सदानंद और तुम्हारे पापा के बारे मे भी..........लेकिन अगली सुबह मैं जागी तो मोहिनी वहाँ नहीं थी........शायद तुमसे मिलने कोल्कता गयी थी...और उसके दूसरे ही दिन फिर से मेरा सौदा हुआ......मैं फिर से बेची और खरीदी गयी......मैं यहाँ आ गई...." ऋुना ने अपने आँसू पोन्छे............काजल एक टक उसकी ओर देखती रही......और जुंमन भी.

जुंमन का चेहरा भी गंभीर हो गया था...वो रातें जिन्हे वो "र्नगीं और हसीन " समझता था किसी के लिए कितनी दर्दनाक होती थी आज उसे अहसास हो रहा था. उसके लिए तो जिस्म बेचना भी एक पेशा था, जिसके बदले एक तवायफ़ पैसे लेती थी.........लेकिन तिल तिल कर कैसे एक रूह ज़ख्मी होती थी ये आज उसे समझ आ रहा था.

वही काजल फिर से आज उसी सोच मे डूब गयी थी......कैसा है ये समाज जो एक जीती जागती, विधाता की सबसे सुंदर कृति को एक "वस्तु" समझता है...एक चीज़ समझता है...जिसे खरीदता और बेंचता है.......उसके साथ राते तो रंगीन करता है लेकिन उस रात के बाद होने वाले उजाले मे उसे तवायफ़ नाम की गाली देता है...........कैसा है ये समाज , क्यू ऐसा है ये समाज???.

तीनो ही चुप थे, जैसे कुछ बचा ही ना था कहने सुनने को.........तीनो ही अपनी अपनी सोचो के भवर मे डूबे हुए थे.........बाहर गाड़ी के टायरों की तेज़ी से चर्चराने की आवाज़ पर एक साथ तीनो चौंक पड़े........जुंमन ने भागकर दरवाज़ा बंद किया और आँखे खिड़की से लगा दी.

खिड़की से आँख लगाए जूमन गाड़ी को रुकते और फिर उसमे से निकलते शख्स को देखता है, उसके ठीक पिछे खड़ी ऋुना उस शख्स को देखकर अपनी ख़ुसी छुपा नहीं पाती.

"आलोक बाबू आ गये जुंमन , दरवाज़ा खोलो "

आलोक की कार जुंमन के घर से थोड़ी दूर पर खड़ी थी और कार से निकलकर आलोक बेचैनी से इधर उधर देख रहा था, उसकी आँखो मे मिलन की तड़प सॉफ झलक रही थी.

जुंमन पलट कर ऋुना की ओर देखता है , दोनो के आँखो मे चमक थी ,लेकिन ऋुना की बात सुन काजल के चेहरे का रंग उड़ चुका था.......

"ये क्या कर रहे हो आप लोग.....ऋुना बाजी आप तो सब जानती हो ना...क्या फ़ायदा होगा मेरी इतने दिनो की कुर्बानी का ??....क्या होगा उस....."

" हर बार कुर्बानी तू ही क्यू देगी मेरी बच्ची, तूने तो अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर दी उस मुहब्बत का भरम रखने के लिए जिसके होने का पूरा यकीन भी तुझे नहीं....बता क्या मैं ग़लत कह रही हू.......??" ऋुना एक पल को रुकी, काजल बिल्कुल चुप हो गयी ,

 


"कोहिनूर ! अब तक तो इतना यकीन नहीं था, लेकिन आज मैं कह सकती हूँ कि तेरी मुहब्बत की तड़प बेवजह नहीं है.......देख उसकी आँखो की दीवानगी,बावरा लग रहा है.... पागलो की तरह भागा चला आया है तेरे लिए....अब वक़्त आ गया है कि एक मौका उसे भी दिया जाए........तूने तो सारे फ़ैसले खुद कर लिए....तब भी और आज भी करना चाह रही है......क्या कसूर है उसका ??...बता ?......ऐसा ना कर मेरी बच्ची...एक मौका उसे भी दे अपनी मुहब्बत साबित करने का...एक बार आज़मा ले अपनी मुहब्बत को........"

ऋुना काजल को समझा रही थी लेकिन काजल उसकी ओर ऐसे देखती है जैसे ऋुना ने कोई बचकानी बात कह दी हो........हल्की सी हँसी आ जाती है काजल के होंठो पे....

"ऋुना बाजी ! आपको क्या लगता है कि मुझे आलोक की मुहब्बत पर यकीन नहीं था ??...नहीं बाजी ! आप ग़लत समझी....एक लड़की की आँखे कभी ये धोखा नहीं खा सकती ...आलोक तो लाखों मे एक हैं....वो मुझसे बहुत प्यार करते हैं...तब भी करते थे और आज भी, लेकिन अपनी सच्चाई जानकार मैने खुद को उनके लायक ही नहीं समझा और उसके बाद जो कुछ किया मैने......." काजल की बात अधूरी रह गयी...... उनकी इस बहस के बीच जाने कब जुंमन बाहर निकल चुका था....दरवाज़ा एक झटके मे खुला और काजल के सामने आलोक खड़ा था.......उफफफफफफ्फ़!!!! कितनी बेबसी थी उन आँखो मे.......!!

काजल भी एक तक आलोक को देखे जा रही थी ...बिखरे बाल, बढ़ी हुई शेव....लाल सूजी हुई आँखे और मैंले से कपड़े....काजल की आँखे डबडबा गयी ...क्या हाल बना लिया था अपना आलोक ने...कहा वो कॉलेज वाला चहकता स्मार्ट सा आलोक और कहाँ ये मुहब्बत की दीवानगी मे पागल सा आलोक...बहुत कुछ बदल गया था लेकिन दिल तो आज भी वही था.......काजल का दिल रो उठा आलोक की दशा देख कर.......बड़ी मुश्किल से खुद पर काबू किया हुआ था उसने.

दोनो एक दूसरे को देख रहे थे और ऋुना उन्हे...जुंमन बाहर ही रह गया था...ऋुना ने आगे बढ़कर आलोक के कंधे पर हाथ रखा और बाहर निकल गयी.

आलोक चन्द पल काजल को देखता रहा और फिर अपने घुटनो के बल गिरकर तड़प तड़प कर रोने लगा..... अब बर्दाश्त कर पाना काजल के बस मे ना था..दौड़कर आलोक को अपने सीने से लगा लिया........

"मत रोइए आलोक... प्लीज़ मत रोइए.......मैं हू आपके पास .....प्लीज़ मत रो...."

आलोक ने अपना सर उपर उठाया.........

"कहाँ हो तुम मेरे पास ??...तुम तो मुझसे बहुत दूर निकल गयी काजल.........बिना कुछ कहे , बिना कुछ बताए..कोई शिकवा ही कर लेती...कुछ सज़ा देती कोई खता हुई थी तो...लेकिन ऐसा क्यू किया.........बताओ.......मुझ पर यकीन नहीं था या मेरी मुहब्बत पर यकीन नहीं था ??? बोलो ??क्यू चली गयी बिना कुछ कहे......" आलोक आज बरसो से दिल मे दबे सारे सवाल कर रहा था काजल से. करता भी क्यू ना, हक़ था उसे..

और काजल !!... कदम कदम पर मजबूर, आज एक बार फिर से मजबूर ..होठ सिल गये थे मानो.

"बोलो काजल, कुछ तो कहो......क्यू किया ऐसा तुमने....एक बार मुझे कहकर तो देखती..सारी दुनिया से टकरा जाता तुम्हारा आलोक.....तुम मिली भी तो इस रूप मे, क्यू हुआ ये सब.....कैसे बन गयी मेरी काजल कॉहनूर ??.....बोलो प्लीज़.......बहुत दिनो से ये सवाल मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रहा है कि मेरा कसूर क्या था , आज मुझे जवाब चाहिए काजल...बोलो...प्लीज़ चुप मत रहो...तुम्हारी ये खामोशी मेरी जान ले लेगी....??” आलोक आज सब कुछ जानना चाह रहा था...लेकिन काजल अभी भी कुछ कह नहीं रही थी.

काजल की आँख से आँसू निकले और उसके होंठो से शब्द...

“आलोक ,मेरी ममा ..एक.....एक.... तवायफ़ थी मेरी माँ.....!” काजल ने बड़ी मुश्किल से ये अल्फ़ाज़ अदा किए, और सर झुका लिया..काजल को शायद लग रहा था कि उसने आलोक के सवालो का जवाब दे दिया...लेकिन उसका ये भरम सिर्फ़ कुछ पल ही रहा....

“ तो ???????........काजल , तवायफ़ कोई औरत अपनी ख़ुसी से नहीं बनी होगी.....”

आलोक काजल की आँखो मे देख रहा था, और वो खूबसूरत आँखे सावन की बदली के जैसे बरसे ही जा रही थी.....आलोक से बर्दाश्त नहीं हो रहे थे उन आँखो के आँसू......

“जाने दो काजल !!!, अगर तुम नहीं बताना चाहती तो मैं वो वजह भी नहीं पूछूँगा ...तुम्हारी मॉं क्या थी, तुम क्या बन गयी....कुछ मत बताओ मुझे...बस अब मेरे पास चली आओ..........और बर्दाश्त नहीं कर पाउन्गा मैं.”आलोक की बात सुन काजल का दिल फिर से तड़प उठा.....क्या था वो , इंसान या कोई फरिश्ता ?...काजल उसे बेयकीनी से देखने लगी.......इतनी बड़ी बात कितनी आसानी से कह गया था आलोक........कुछ पल बेयकीनी मे बीते, फिर उन निगाहो मे मान था...अपनी मुहब्बत के लिए मान .

“हां काजल, बहुत तड़पा हू मैं इस जवाब के लिए कि मेरा कसूर क्या था , क्यू गयी तुम मुझे छोड़ कर...लेकिन आज ऐसा लग रहा है कि वजह ऐसी है शायद जिसे कहने मे तुम्हे तकलीफ़ होगी...और ये मुझे बर्दाश्त नहीं.....तो नहीं जान’ना मुझे कुछ भी........कोई वास्ता नहीं मुझे तुम्हारी माझी से........बस अब मैं तुम्हे जाने नहीं दूँगा. ......कभी कह नहीं पाया , शायद मौका ही नहीं मिला..आज कहता हू.....आइ लव यू काजल, आइ लव यू वेरी मच........जान से ज़्यादा चाहता हूँ मैं तुम्हे...दीवानगी की हद तक, पागलपन की इंतेहा तक....बस अब मेरी हो जाओ.....चलो यहाँ से ..कही दूर चल कर एक प्यार का आशियाना बसा लें...चलो मेरे साथ...”आलोक ने आज दिल चीरकर रख दिया था, काजल की आँखे बरस रही थी.

क्या चाहती है एक लड़की?? यही कि कोई उसे इतना चाहे जितना आजतक किसी ने किसी को ना चाहा हो...कोई हो जो सिर्फ़ उसका हो, उसके लिए हो....काजल ने भी यही चाहा था...उसके आँखो मे भी बरसो यही ख्वाब पाला था...लेकिन आज जब वो ख्वाब हक़ीक़त बन कर उसके सामने आ गया था, तो काजल आगे बढ़कर उस हक़ीक़त को महसूस नहीं कर पा रही थी....कैसा अजीब इत्तेफ़ाक़ था, जो कभी उसका तस्स्वुर होता था आज वो हक़ीक़त था, लेकिन वो हक़ीक़त होकर भी एक ख्वाब था.

 
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