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दूध ना बख्शूंगी/ complete

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रैना, विकास और मोन्टो की उत्सुक नजरें रघुनाथ के चेहरे पर चिपक गई, जबकि दिमाग पर जोर डालते हुए रघुनाथ ने कहा-------"मुझें याद नहीं आ रहा ।"

सबकी नजरें मिली ! !

रघुनाथ ने कहा-----“लेकिन-मैं इकबाल नहीं हो सकता।"

"क्यों नहीं हो सकते?" विजय ने पुछा।

"शयद-किसी भी व्यक्ति को अतीत के शुरू के चार-पांच साल याद नहीं रहते…अगर तुमसे पूछा जाए उस वक्त की कोई-धटना सुनाओ जव तुम तीन वर्ष के थे तो शायद तुम्हें भी कुछ याद न आ सके----मुमकिन है कि यह चोट मुझे उस समय लगी हो, जब मेरी आयु एक-से-तीन या सिर्फ चार साल की रही हो ?"

"क्या तुम्हें कोई ऐसी घटना याद है, जब तुम्हारी आयु बारह साल से कम रही हो ? !

" हां ----याद है?”

“सुनाओ ।"

"मुझे याद है उस वक्त मैं आठ साल का था…मुझे पतंग उड़ाने का बहुत शौक था-हम लखनऊ में रहते थे…कटी हुई पतंगों को लूट-लूटकर मैं बसंत पंचमी के लिए जोडा करता था--

एक दिन वहुत बड़ी सफेद रंग की पतंग लूटी और उसे बड़े अरमानों से-सम्मालकर इस मकसद से रखा कि उसे मैं बसंत पंचमी को ही उड़ाऊंगा-बसंत पंचमी की पहली रात को पिताजी अचानक ही मुझसे मजाक करते हुए बोले कि वे पेरी सफेद पतंग को काली कर सकते है…उनकी वात पर मुझे आश्चर्य हुआ क्योंकि मैं नहीं समझ सकता था फि सफेद पतंग भला कैसे हो सकती हे-उन्होने मुझसे काली करने के लिए पतंग मांगी-मैंने दे दी-वे मेरे ही सामने मिट्टी के तेल की जल रही कुप्पी की लो के उपर उठ रहे काले धुएं के उपर पतंग को लहराने लगे !

-----सफेद पतंग. पर धुआं जमा तो वह काली पड़ने लगी----मै हैरत में डूबा दिलचस्प निगाहों ने अपनी सफेद पतंग को काली होते देख रहा था-अचानक जाने कैसे पिताजी का हाथ बहका-----पतंग कुछ नीचे हो गई…पतंग के बारीक कागज ने तुरन्त ही कुप्पी की लो से आग पकड ली---पल भर में फर-फर करके सारी पतंग-जलकर राख हो गई---रो-रोकर मैंने सारा घर. सिर पर उठा लिया, जबकि पिताजी ठहाकों के साथ हंसते हुए जमीन पर पड़े जले हुए कागज की तरफ इशारा करते हुए बार-बार कह रहे धे-"देख रघुनाथ तेरी पंतग काली हो गई हो-जाने क्यों, मैं आज़ तक भी उस घटना को नहीं भूल पाया !"

“तुम यह दावा कैसे कर सकते कि जब यह घटना घटी हैं तब तुम आठ साल के थे !"

" मुझे अच्छी तरह याद है----उस. वक्त मैं सिर्फ चौथी कक्षा में पढ़ता था !"

“उम्र का कक्षा से क्या मतलब?"

"मेरे पिता ने बताया था कि मैं उस वक्त चार साल का था जबकि पढने बैठा और वे हमेशा ही यह कहतें वे कि मैं कभी-भी-किसी कक्षा में फेल नहीं हुआ।”

"क्या तुम उस प्राइमरी स्कूल का नाम बता सकते हो, जिसमें तुम पढ़े ?"

" मुझे अच्छी तरह याद है…लखनऊ में मैं ज्ञान भारती में पढ़ता था !"

विजय ने कहा---"तब तो तुम इकबाल नहीं हो ।"

"म---------मगर ।" विकास बोला…“वैसी स्थितिं में इस फोटो का क्या मतलब है गुरु?"

"मतलब यही है प्यारे दिलजले की यदि बात सिर्फ एकाध खासियत तक ही सीमित होती तो उसे संयोग भी माना जा सकता था, परन्तु चार खासियतें संयोग से नहीं मिल सकती…जरूर इस के पीछे कोई वहुत वडा मकसद छुपा है-----और यदि कोई मकसद नहीं है तो इकबाल को तलाश करना हमारे लिए इस विज्ञापनदाता से भी कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है --------

-------आखिर पता तो लगे कि दुनिया में वह' कौन सी हस्ती है, जिसकी न सिर्फ शक्ल ही बल्कि चोट का निशान----मस्सा---तिल और पैर -कीं उँगलियाँ भी अपने तुलाराशी से मिलती हैं…......हृमारे ख्याल से या तो रघुनाथ ही इकबाल है ओर यदि नहीं है तो इकबाल नाम के किसी आदमी का कहीं अस्तित्व ही नहीं है ओऱ यदि अस्तित्व नहीं है तो निश्चितृ रूप से इस झिज्ञापन के पीछे कोई बहुत बंडा षड्यंत्र पनप रहा है ! "

रैना उछल पडी…“कैसा षड्यंत्र ?"

"इस बारे में .…अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है !"

"गुरु-----क्यों न हम दिलबहार होटल के ,कमरा नम्बर सात सौ बारहं मे जाकर अहमद खान नाम के इस आदमी से मिलें जिसने यह विज्ञापन दिया हे?"

" मिलना तो, पडेगा ही, लेकिन इस तरह ऩही !”

" फिर किस-तरह! "

विजय धीरे धीरे कुछ कहने लगा !!!!
 
"अहमद खान के चुप होने पर दिलबहार होटल के कमरा नम्बर सात सौ बारह में गहरी खामोशी छा गई------विजय---- विकास…रैना और रधुनाथ की नजरे मिली...........चारों पुलिस वर्दी मे थे।

रोशनदान पर बैठे मोन्टो को भी यह कहानी सुनकर सोचने पर विवश होना पड़ा !

सभी के दिमागों में एक अजीब-सा तनाव उत्पन्न हो गया था ।

सबसे पहले विजय ने ही स्वयं को संभालकर सन्नाटा तोड़ा ।--"इसका मतलब ये कि अमीचन्द और सावित्री इकतीस साल पहले मिस्र मे तुम्हारे पडोसी थे?”

"उस जलजले के वाद आपने जो फोटो दिखाई

देखकर आज पहली वार ही उनकी याद आई है…साथ ही यह याद भी ताजा हो चुकी है कि उनके मकान के मलवे से उनकी लाश नहीं मिली थी ।"

"तुम् यह कहना चाहते हो कि तुम्हारे इकबाल को वे उठा लाए?”

"इस फोटो को देखने के बाद यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हुं ----" वे बेऔलाद थे…इकबाल से उन्हें प्यार भी था-वेसे भी इकबाल की याददाश्त गुम थी--उनके दिमाग में यह बात आ गई होगी कि भविष्य में इकबाल उन्हीं की औलाद कहलाएगी-----खुद इकबाल भी उन्हें ही अपने मां-बाप समझेगा--------- वे मिस्र से इतनी दूर यहां हिन्दुस्तान में आकर बस गए ।"

" इतने भयानक जलजले में से वे उसे निकालकर कैसे लाए ? "

"ये तो वे या उनका खुदा ही जाने ।”

एक क्षण चुप रहा विजय-----फिर अहमद खान को घूरता हुआ बोला---"अब किसी टेपरिकार्डर की तरह एक ही सांस में यह बताते जाओ प्यारे कि इस गढी हुई खूबसूरत कहानी के पीछे तुम्हारा मकसद क्या हैं ?"

" क. . .क्या मतलब-?" अहमद उछल पड़ा-----"अब भी अपको हमारी यह… कहानी झूठी लग रही है !"

"है ही गप ।"

"हरगिज नहीँ----अखिर आप हमारी बातों का यकीन क्यों नहीं करते ?"

"क्योंकि हम जानते हैं कि तुम सफेद झूठ बोल रहे हो….. अमीचन्द और' सावित्री कभी मिस्र से नहीं आए-वे हिन्दुस्तान में ही जन्मे औरं-ज़न्म से यहीं रहते थे।”

"यह झूठ है----!" अहमद चीख पड़ा-“आप मुझे उनके सामने ले चलिए-----वे मुझे देखते ही पहचान लेगे…तब उनका झूठ खुल जाएगा ।"

"वे आज से दस साल पहले स्वर्ग सिधार चुके है ।"

“ओह !" अहमद के मुंह से एक आह-सी निकली---आंखों में जो चमक उत्पन्न थी, वह बुझती चली गई, जबकि तबस्सुम ने पूछा--------इकबाल कहाँ है?"

बिजय उसकी तरफ देखकर धीमे से मुस्कराया और बोला-----“हमेँ अफसोस के साथ कहना पड रहा कि यदि वह हैं तुम्हारा इकबाल ही था तों अब मर चुका है ।"

"क.. .क्या?" एक साथ दोनों उछल पड़े ।

"जी हां…आज से सिर्फ एक महीने पहले हमें रेलवे साइन पर पडी एक व्यक्ति की लाश मिली थी…व्यक्ति ने आत्महत्या की थी-ह्रमने उसकी तंलाशी ली तो जेब से यह फोटो और एक पता मिला,हमने उस पते पर जाकर इस व्यक्ति के बारे में मालूम किया तो पता लगा कि उसका नाम रामनाथ था और वह अमीचन्द और सावित्री का लडका था-----हमने रामनाथ के अतीत तक खोज की----उसमें हम सिर्फ इतना ही पता लगा पाए कि रामनाथ के-माता-पिता राजनगर से पाले लखनऊ में रहते थे और रामनाथ ने प्राइमरी शिक्षा लखनऊ के ज्ञान भारती नामक स्कूल से प्राप्त की थी !"

“मगर ।”

"यह तलाश हमने रामनाथ की लाश के किसी वारिस की तलाश में की थी मगर जब उसकी लाश का कोई बारिस न मिला तो हमें खुद ही उसका अन्तिम संस्कार करना पडा------- आज जब हमने अचानक अखबार में रामनाथ के फोटो को देखा तो हम चौंक पुड़े----मजमून में वे ही चार जिस्मानी खासियतें लिखी थीं, जो हमने रामनाथ का अन्तिम संस्कार करने से पहले उसके जिस्म पर से देखकर अपने-रजिस्टर में दर्ज की थी----यह सोचकर हमारा उलझन में पड़ जाना स्वाभाविक ही था कि जिसके किसी वारिस को तलाश करने में हम नाकामयाब रहे, उसका फोटो अखबार में छपा है-उस वक्त तो हैरत से हमारी आंखें` ही फैल गई जब हमने फोटो के नीचे -लिखी यह इबारत पढी ।"

"तो फिर आप हमारी कहानी को झूठी क्यों बता रहे थे?"

"हमें तो अब भी झूठी ही लग रही है, क्योंकि हमने उस प्राइमरी स्कूल तक का पता निकल लिया था, जिसमें रामनाथ पढा था प्राइमरी. स्कूल में बारह साल से कम आयु के ही बच्चे भी पढते हैँ------यदि वह बारह साल की आयु से पहले ज्ञान भारती में पढता था तो वह 'तुम्हारा इकबाल कैसे हो सकता है?"

“म. . मगर ये फोटो और जिस्मानी खासियतें ?"

"इनके आधार पर तो वह इकबाल ही था ।"

"नहीं!" तबस्सुम चीख पडी-“मेरा इकबाल मुझसे बिना मिले नहीं मर सकता-वह कोई और होगा-मेरा, इकबाल जिन्दा है-----वह मुझे ज़रूर मिलेगा ।"

तबस्तुम फूट-फूटकर रो पडी ।

बूढा अहमद खान र्किकर्तव्यविमूढ़-सा खड़ा रह गया ।

" मेरा इकबाल ?" पुलसिया अन्दाज मे ही रैना ने आगे बढ़कर कहा----" इस बुड्ढे का तो इकबाल बेटा है लेकिन वह तुम्हारा कौन है ?"

" तबस्सुम मेरी बहु है !" अहमद कह उठा ।।

रधुनाथ उछल पड़ा-----" क्या मतलब ?"

" इकबाल इस बदनसीब का शौहर है !" अहमद ने कहा ।

जाने क्यों उसके इस जबाब पर वे सभी चुपचाप खड़े रह गये----- बहुत गहरा सन्नाटा खिंच गया वहां ------- सुपर रधुनाथ का दिल तो अजीब से अन्दाज मे धक् धक् कर रहा था ।।।।।।

रघुनाथ के कमरे-में पहुंचते ही वरों थके से सोफ़ो पर गिर पड़े-एक सोफे की पुश्त पर बैठकर घनुषटंकार ने जेब से पव्वा निकालकर ढक्कन _खोला'और' पव्वा मुँह से लगा लिया ।

" अब बोलिए अंकल! " विकास बोला------आपका क्या ख्याल ? "

"अपना तो साला ख्याल ही घास चरने चला गया है प्यारे! हैं !"

रैना है पूछा…"क्या मतलब भइया?"

"उस साले अहमद खान और ~तबस्सुम ने अपनी खोपडी भक्क से उड़ा दी है-------उनकी 'बातों से सीधा मतलब ये निकलता है कि अपना तुलाराशि उसका लडका इकबाल है, जो कि मिस्र में रहता 'था और बारह वर्ष की आयु में जो एक दुर्घटना का शिकार होकर अपनी याददाश्त गंवा बैठा था-----------------------वे अमीवन्द और सावित्री जिन्हें हम और अपना तुलाराशी भी अपने मां-बाप समझते थे, दरअसल मिस्र में पडोसी थे और उस जलजले के बाद इकबाल को उठा लाए थे-यहाँ आकर उन्होंने इकबाल का नाम रघुनाथ रख लिया और अपना तुलाराशि खुद को रघुनाथ और उनका लड़का ही कहता है--- जब इसकी याददा३त ही गुम है तो स्वयं को यहाँ इकबाल कह भी कैसे -सकता' है?”

रधुनाथ झुंझलाकर चीख पड़ा-" मेरी कोई याददाश्त गुम नही है !"

" जिनकी याददाश्त गुम होती है, उसे यह भी याद नहीं रहता प्यारे कि उनकी याददाश्त गुम है ।

रघुनाथ हडवड़ा गया-----"क..... कमाल है------म....मै-यानी कि मैं--रघुनाथ नहीं हूं----------मै कैसे यकीन कर लू--तुमने कैसे यकीन कर लिया…तुम बोलो रैना-तुम कहो विकास कि क्या मैं रधुनाथ नहीं ?"

" क्या तुम रघुनाथ होने का कोई सबूत दे सकते हो ?"

“किस किस्म के सबूत की बात कर रहे हो?"

"क्या आप पहली से आठवी कक्षा के बीच की कोई मार्कशीट' जादि दिखा सकते है ?" विकास ने पूछा ।

"इस आयु तक भला आठवीं तक की मार्कशीट कौन सम्भालकर रखता है…उनकी मान्यता ही क्या होती है…हां, दसवीं की मान्यता होती है-उसकी मार्कशीट और सनद मेरे .. पास होगी ।"

"वह तो आपने चौदह साल की अणु में किया होगा ! " विजय ने पूछा…"आठर्बी कक्षा तक किसी कक्षा का ग्रुप फोटो?"

“बच्चों की कक्षा के ग्रुप फोटो खिंचने का फैशन अब चल गया है-पहले नहीं था, बोर्ड में बैठने वाली कक्षा का ग्रुप फोटों जरूर होता था ।"

"'दादा-दादी के साथ इससे पहले का और कोई फोटो ?"

"जहां तक मुझे याद है, इससे पहले मेरा कोई फोटो नहीं है ।"

विजय ने अजीब-सी मुद्रा में कहा-"सारे रास्ते ब्लॉक पड़े हैं प्यारे!”

“सारे कहां गुरु-----इस वक्त हमारे पास कम-से-कम एक रास्ता तो है ही ?"

" कौन सा ?"

"डैडी के पास कोई मार्कशीट न सही, लेकिन रकूलो-मे ये आठवीं तक पढे हैं, उनके रिकार्ड रजिस्टर तो होंगे ही ।"

"जहां इन्होंने अपना बचपन गुजारा था,.वहां के लोगों से भी पूछताछ की जा सकती है।”

"जव कोई रास्ता न बचेगा तो वह सब तो करना ही पडेगा रैना बहन!" विजय बोला-"मेरी केशिश यह थी के हम आपस में विचार करके यहीं बैठे-बैठे, किसी ऐसे तथ्य पर पहुच जाएं जिससे कि उनका बयान गलत साबित कर सके ।"

“गुरू !" कुछ सोचते हुए विकास ने कहा ।"

विजय तपाक से बोला-----" हो जाओ शुरू ।"

"कहीं सचमुच ऐसा तो नहीं है कि यह कोई बहुत् बड़ा षडूयंत्र हो ।"

"हो भी सकता है, लेकिन.. ।"

" लेकिन क्या?"

"लगता नहीं है ।"

" क्यों?"

"सोचो प्यारे-जरा दिमाग का फ्लूदा निकालकर सोचो कि इसमें आखिर उनकी क्या चाल हो सकती हे-----चलो ये मान लिया कि वे अपने तुलाराशि को इकबाल साबित करना चाहते हैं-मान लो कि हो गया---इस-से उन्हें क्या लाभ है--उल्टे अपने तुलाराशि को करोडों की सम्पति मिलेगी-सम्प्रत्ति मिल गई…अब बोलो ,कि उन्हें क्या लाभ हुआ?"
 
"मुमकिन है कि सचमुच उन्हें कोई लाभ हो'-ऐसा लाभ जो फिलहाल नजर नहीं आ रहा हो-तब नजर आए, जबकि वे … डैडी को इकबाल साबित कर सके !"

"हम तुम्हारी बात से असहमत नही है प्यारे दिलजले !”

"तो फिर?"

"मगर पूरी तरह सहमत भी नहीं हैं ।"

“औफ्फो-आप पहेलियों क्यों बुझा रहे है अंकल---साफ-साफं क्यों नहीँ कहते-आप इसे किसी षडूयंत्र की शुरुआत मानते हैं या सचमुच डैडी को इकबाल?"

" फिलहाल हमें दोनों ही बातों को अपने दिमाग में रखकर चलना पड़ रहा है प्यारे…इसका भी कारण है-अपने रघु प्यारे को हमें इकबाल मानने में इसलिए हिचक है, क्योंकि यह हमारा

पैन्टिया यार है और हमने यह कभी महसूस नहीं किया कि इसकी याददाश्त गुम हे…मानना इसलिए पड़ रहा है कि फिलहाल हमारे हाथ में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे अपने मन को ही यह समझा सके कि बारह साल की उम्र से पहले भी यह रघुनाथ ही था !"

"'फिर परिणाम आखिर निकलेगा कैसे?”

" फिलहाल ऐसा करो प्यारे दिलजले कि शाम की गाडी से तुम लखनऊ के लिए रवाना हो जाओ--कल सुवह तक तुम वहां पहुंच जाओगे-सारे दिन तुम्हें वहां तुलाराशी के बचपन की तलाश करनी है…कल शाम की गाडी से वापस बैठ जाना-परसों सुबह …यहां पहुच जाओगे-तब जैसी भी रिपोर्ट हुइ हम उसके आधार पर बैठकर नए सिरे से विचार-विमर्श करेंगे !"

“क्यों न हम डायेरेक्टरी से ज्ञान भारती का फोन नम्बर लेकर---।"

"फोन से काम नहीं चलेगा प्यारे, उस मुहल्ले में जाकर भी पूछताछ करनी है, जहां रधुनाथ का बचपन गुजरा है…जाने से ही बात बनेगी-इधर मेरी नजर दिलबहार के कमरा नम्बर सात सौ बारह पर रहेगी-कम से-कम तुम्हारे लौटने तक मैं उन्हें यहां से खिसकने नहीं दुगा----------मुमकिन है कि उन पर नजर रखने से किसी नई बात का पता लगे ।"

"ठीक है गुरु--मैं शाम को रवाना हो रहा हूं।”

पूरी बात सुनने के बाद ब्लेक व्वाय उर्फ अजय बोला-------"आपने तो सचमुच मुझे भी हैरत में डाल दिया है सर--ऐसा कैसे हो सकता है कि रघुनाथ रघुनाथ नहीं, इकबाल है ।"

"सभी जिस्मानी खसियते यह कहती हैं प्यारे!"

"मगर सर--!"

"जो बात तुम कहोगे प्यारे काले लड़के----उस पर अपने दिमाग में हम सैकडो बार विचार करके दिमाग का तन्दूर बना चुके हैं-----इसमे शक नहीं कि इस बार हमें अपनी खोपडी के

सभी बल्व फ्यूज होते नजर आ रहे हैं----ठीक से निश्चय नहीं कर पा रहे कि क्या सच और क्या झूठ है…साला मामला ही ऐसा सामने आया है कि हम चक्करघिन्नी बनकर रहगए हैं !"

सीक्रेट सर्विस के चीफ़ की सीट पर बैठे ब्लैक बॉय ने एक सिंगार सुलगाया और धुआं हवा उछालता हुआ बोला-----" अब इस बारे में आप क्या कार्यवाही करने जा रहे हैं?"

"देखो प्यारे-----तेल देखो और तेल की धार देखो ।" कहने के साथ ही उसने रिसीवर उठाया और नम्बर डायल किया ।

कुछ देर बाद दूसरी तरफ से रिसीवर उठाया गया, आशा की आबाज------"हैलौ”

" पवन हीयर ।" विजय का थर्राया हुआ स्वर

"य----यस सर !" आशा जैसे हड़बड़ाकर सम्भली हो । विजय ने उसी स्वर में पूछा--------"क्या कर रही थी !"

"आपके आदेश का इन्तजार संर !”

"गुड-काफी स्सार्ट होती जा रही हो ।"

" थ...थेक्यू सर !"

"होटल दिलबहार के रूम नम्बर सात सौ बारह में एक बूढा और खूबसूरत लड़की रह रही है---------" आपस में बहू और ससुर का रिश्ता बताते हैं-----उन पर नजर रखो--कहाँ आते-जाते हैं------क्या करते हैं-या किससे मिलते है-----मुझें पूरी रिपोर्ट चाहिए।"

"यस सर !”

“मदद के लिए अशरफ को साथ ले सकती हो-कल सुबह सात बजे तक तुम दोनों को उन पर नजर रखनी है----उसके बाद स्वयं गुप्त भवन आकर हमें रिपोर्ट दोगी-----अगर बीच में कोई विशेष बात देखो तो फौन पर तुरन्त विजय को रिपोर्ट देना ।"

“ओं.के.सर ! ”

विजय ने रिसीवर क्रेडिल पर पटका और मुर्खों की तरह आंखें मटकने लगा।

यू तो अपने आँफिस में बैठा सुपर रघुनाथ किसी पुराने केस की फाइल में खुद को डुबाने का प्रयास कर रहा था पर डूब नहीं पा रहा था…रह-रहकर उसकी आंखों के सामने बूढ़े अहमद खान और खूबसूरत तबस्सुम का चेहरा नाच उठता।

तोताराम के केस के सम्बन्थ उसे विभिन्न लोगों द्वारा फोन पर बधाइयां दी जाती रहीं, उसके दिमाग में एक बार भी ऐसी भावना न, उभर सकी वह आन्तरिक खुशी का नाम देता-हल्के-फुल्के काम करते हुए ही शाम हो गई---------फोन पर विकास ने बताया कि वह लखनऊ रवाना होने जो रहा है ।

इजाजत देकर उसने रिसीवर रख दिया ।

दिमाग में विचारों की उमड-धुमड कुछ ज्यादा ही तेजी होने लगी-बस सोचने लगा कि अचानक ही यह कैसा मोड़ आया, जिससे उसका व्यक्तित्व ही उलट गया।

वह रघुनाथ से कुछ और बनता जा रहा है ।

क्या वह सचमुच रघुनाथ नहीं है-----सचमुच उसका वह परिचय गलत है, जो वह दुसरों को देता रहा है---जो वह खुद को आज तक समझता रहा है ?

ऐसा कैसे हो सकता है?

उनके पास देश-विदेश के पुराने अखबार हैं-------इस बात के पूरे सबूत हैं उनके पास कि पिछले तीस साल से अपने इकबाल को तलाश कर रहे हैं-----जिस चीज का कोई अस्तित्व ही न हो, उसके लिए कोई तीस साल बरबाद नहीं कर सकता ।

इकबाल का अस्तित्व तो जरूर है।

संयोग से उसकी बचपन की शक्ल इकबाल से मिल गई होगी…इत्तफाक से जिस्मानी खासियतें भी मिल गई हैं…नहीं-नहीं-ये सब तुम क्या बेवकूफी की बाते सोच रहे हो रधुनाथ-----इतना बड़ा इत्तफाक भी कहीं होता है-किर अभीचन्द और सावित्री को भी तो उन्होंने देखते ही पहचान लिया ।

तो कही मैं इकबाल ही तो नही हू !!
 
नहीं-नहीं-मैं भला इकबाल कैसे सकता हूं-मैं रघुनाथ हू…मुझे अपना पूरा बचपन याद है ।

दिमाग में विचार उठा----क्यों न वह एक बार अहमद और तबस्सुम से मिले !!

मिलने से लाभ क्या होगा ?

मुमकिन है कि इस बाऱ बातचीत में वे कोई भूल कर जाएं और वह उनकी मंशा भांप ले---- ऐसा हो जाना स्वाभाविक ही है-यदि वह आज ही इस उलझन से निकल जाए तो अच्छा ही हे…रात को वह आराम से सो सकेगा।

एक बार मिल लेने में कोई बुराई नहीं है…यह अच्छा ही है कि वह किसी निष्कर्ष पर पहुच जाए-----विजय इस चक्कर में उलझा हुआ हैं-यदि वह इस बार विजय से पहले मामले की तह में पहुच जाए तो मजा ही आ जाए--फिर कभी विजय को यह कहने का मौका नहीं मिलेगा कि उसने स्वयं कभी कोई गुत्थी नहीं सुलझाइं है ।

इस गुत्थी को वह ही सुलझाएगा--------------मामले की तह में पहुंचने उसे पूरी कोशिश करनी है-यही सोचकर रघुनाथ एक झटके के साथ कुर्सी से उठ खड़ा हुआ ।

"मैं आशा बोल रंहीँ हू विजय! !"

"हांय…!" विजय ने एकदम ऐसे अन्दाज में कहा, जैसे कोई तीर सीधे उसके सीने में आ धंसा हो, बोला…"मिस गोगिया पाशा-----आजकल तुम कहां बजा रही हो ताशा------------सच, तुम्हारे विना तो हमारा दिल बन गया है पानी का बताशा ।"

“विजय! " आशा का झुंझलाया हुआ स्वर-------"मैंने तुम्हारी बकवास सुनने के लिए-फोन नहीं किया है।"

"तो फिर किसी पार्क में बुलाने के लिए किया होगा ।"

उसकी बात पर कोई ध्यान न देकर दूसरी तरफे से आशा ने कहा…"अब से कोई पन्द्रह मिनट पहले सुपर रघुनाथ कमरा नम्बर सात सौ बारह में गया है ।"

"हांय तुम उस तुलाराशि का पीछा कब से करने लगी मेरी मटर की फली----वह साला तो शादी शुदा है------हमे बताओ…....तुम हमारी इन्तजार का गुड़ कौन से कमरे में बैठकर खा रही हो?"

"मैं तुम्हारी बदतमीजी सहन नहीं कर सकती विजय !"

"कमीज नहीं तो साडी पहनकर आ जाएंगे डार्लिंग, लेकिन तुम…!"

उसकी पूरी बात सुने बिना ही आशा ने कहा…"मुझसे चीफ़ ने कहा था कि यहां कोई विशेष बात देखूं तो तुम्हें फोन पर सुचित कर दू…फ्ता नहीं क्यों मुझे सुपर रधुनाथ का उस कमरे जाना बिशेष बात लगी----सो,फोन कर

दिया है---अब तुम जानो ।" कंहने के साथ ही दूसरी तरफ से विजय की एक भी सुने विना रिसीवर पटक दिया गया ।

"धत्?" कहने के साथ ही विजय ने अपनी गुद्दी पर वहुत जोर से चपत मारी और स्वयं से ही बोला----" तुम साले खुद को वहुत चलतापुर्जा समझते हो बिजय दी ग्रेट-दुनिया साली वहुत आगे निकल गई है-अपनी गोगिया पाशा भी तुम्हारी एक नही सुनती-खैर-अब सोचने की बात तो प्यारे ये हैँ कि अपना तुलाराशि बहां क्यों गया है?"

हालांकि रघुनाथ तेज और लम्बे कदमों के साथ सातवी मंजिल का कांरीडोर पार करता हुआ रूम नम्बर सात सौ बारह की तरफ बढ रहा था, परन्तु जाने क्यों उसे अपने दिल की घड़कने असामान्य रूप से बढी हुई महसूस हो रही थी ।

अभी वह कमरे से कोई बीस कदम इंधर ही था कि ठिठक गया-----एक ट्रै में खाली वर्तन लिए सात सौ बारह में से एक वेटर निक्ला-उसे देखकर एक क्षण के लिए ही ठिठका था । रघुनाथ-फिर सामान्य गति से बढ गया ।

वेटर उसकी तरफ़ विशेष ध्यान दिए विना बगल से गुजर गया ।

रधुनाथ दरवाजे पर पहुचा-दरवाजा सिर्फ थोड़ा सा ढुका हुआ था---------कदाचित वेटर के निकलने के बाद अभी तक दरवाजों अन्दर से बन्द करने की जरूरत नहीं समझी गई थी ।

एकाएक उसने महसूस किया कि कमरे के अन्दर टेलीफोन की घण्टी बज रही है-तिपाई पर रखा फोन उसे स्पष्ट चमक रहा था, कमरे मे उसे कोई नजर नहीं आया ।

अचानक फोन की घण्टी बजनी बन्द हो गई ।

यह सोचकर रघुनाथ हलके से चौका कि विना किसी के द्वारों रिसीवर उठाए ही घण्टी बन्द हो गई है-फिर अचानक ही यह विचार उसके दिमाग में बिजली की तरह कौध गया कि

एक टेलीफोन भीतरी कमरे में भी होगा और यह घण्टी उसी का रिसीवर उठाए जाने पर बन्द हुई है-तुरन्त ही उसके दिमाग में यह विचार भी कौध गया यहाँ जो भी कोई है, भीतर कमरे मे ही है!!!!

एक ही क्षण में उसने निश्चय कर लिया

टेलीफोन पर होने, वली बाते सुनने का उसके लिए, यह सुनहरा मौका हे।

वह बडी तेजी से, फिन्तु दबे पांव कमरे में दाखिल हुआ ।

कमरा सचमुच खाली था----रधुनाथ ने जल्दी से रिसीवर उठाकर कान से लगा लिया दूसरी तरफ़ से आवाज सुनाई दी-----"मैं अहमद बोल रहा हू बहुरानी !!"

"कुछ पंता लगा अब्बा हुजूर?" इस तरफ़ से तबस्सुम का स्वर ।

"हमारा इकबाल मरा नहीं, बल्कि जीवितं है ।"

""ज. . जीवित है-----"क. .क. .कहां है वह?” प्रसन्नता में डूबा स्वर । "

दूसरी तरफ़ से कहा गया…"हम उससे मिल -भी चुके हैं।"

"म…मिल चुके हैं?"

“हां !"

"आप ये क्या पहेलियां बुझा रहे हैं अब्बा हुजूर--"साफ़-साफ़ कहिए ना”

"आज सुबह हमारे पास जो चार पुलिस वाले मिलऩे आए थे, उनमें से वह जो उन सबका अफसर यानी जिसके जिस्म पर सुपरिटेंडेंट की वर्दी थी-----वही हमारा इकबाल है ।"

" य....ये आप क्या कह रहे हैं अब्बा हुजूर!"

"सच यही है तबस्सुम! "

“म. . मगर-यह आपको पता कैसे लगा?"

"बहुत लम्बी कहानी है बहूरानी-वड्री मेहनत से पता निकाल सका हूं…बस, मैं कुछ ही देर में होटल पहुंचकर तुझे सब कुछ बताऊंगा-फिलहाल तुम सिर्फ इतना समझ तो कि वह

ही वह व्यक्ति है-जिसकी परवरिश अमीचन्द और सावित्री ने की है-----अपनी खुशी को रोक नहीं सका, इसलिए फोन पर ही खबर दी है !"

"अब्बा हुजूर अपको किसी तरह का धोखा तो नहीं हुआ है?"

"नहीं-तू फिक्र न कर ।"

"लेकिन---सुबह तो उन्होंने खुद ही कहा था कि रामनाथ मारा-जा चुका ।"
 
"'उसने झूठ बोला था ।"

"क्यों-----क्या उसे मालूम नहीं था कि हमारे इकबाल वही है ! "

"मालूम था…यदि मालूम न होता तो उन्हे हमारे पास आने की जरूरत ही क्या थी?"

"तो फिर-----सब कुछ मालूम होते भी उन्होंने दिल में हजारों छेद कर देने बाला झूठ क्यों बोला ?"

" अभी वह खुद उलझन मे है बहू!"

“ओह-क्या मे मास्टर को खबर कर दूँ कि इकबाल मिल गया ?"

"नही , तबस्सुम---अभी मास्टर को खबर देनी ठीक नहीं होगी !"

" क्यो?"

"मास्टर ने कहा था कि मुझे वह इकबाल नहीं चाहिए, जिसे अपने शुरू के बारह वर्ष याद न हों…उसे उस इकबाल की जरूरत है, जिसे अपने बारे में सबकुछ याद हो-हम उसके पंजे से तभी आजाद हो सकेंगे, जबकि उसे सबकुछ याद दिला देगे--यदि हम उसको सब कुछ याद दिलाने में नाकामयाब हो गए तो मास्टर सारी दुनिया मे तबाही मचा देगा-मास्टर बहुत जालिम है तबस्सुम-उसके कहर से दुनिया को बचाने के लिए रघुनाथ को सबकुछ याद दिलाना ही होगा----अभी उसे खबर मत करना-मैँ पहुच रहा हूं।"

"जल्दी आइए ।"

दूसरी तरफ़ से सम्बन्धविच्छेद हो गया…रिसीवर हाथ में लिए रघुनाथ हक्का बक्का सा खड़ा रहा-फोन पर होने वाली एक-एक बात उसके जेहन में गंजने लगी--------हर बात का सिर्फ एक ही मतलब निकलता था----यह कि वह इकबाल है ।

मगर-उसके दिमाग में नया विचार उभरा----, मास्टर कौन है?

दुनिया को उससे कैसी तबाही का खतरा है-उसकी याददाश्त से दुनिया की उस तबाही का क्या सम्बन्ध-----ये लोग किस तरह मास्टर के फन्दे में फंसे हुए हैं?

रघुनाथ अभी यह सबकुछ सोच ही रहा था कि एकदम से उछल पडा ।

उसकी समस्त आशाओं के विपरीत भीतरी कमरे से अचानक ही तबस्सुम इस कमरे में आ गई थी…उसे यहां देखकर वह भी चौकी और उंसके मुह से …जैसे बरबस ही निकला------------" अ....आप !"

" ह. ..हां !" बुरी तरह हड़बड़ाए हुए रघुनाथ के हाथ से रिसीवर छुट गया ।

"आप यहां ? "

"म. . .मैं आप लोगों से मिलने आया था कि दरवाजा खुला...।"

रघुनाथ एक शब्द भी आगे नहीं बोल सका….....हलक सूखता चला गया उसका-सूखता भी क्यों नहीं…तबस्तुम उसकी तरफ़ देख ही कुछ ऐसे अन्दाज में रही थी-ऐसी नजरे जैसे वह लाख लाख जान से उस पर कुर्बान हो रहीं हो ।

नीली आंखों में दूर…दूर तक सिर्फ प्यार का सागर ही ठाठे लगा रहा था। "

रघुनाथ जड़ हो गया…जुबान तालु से चिपक गई…आंखें पथरा गई…वह एकटक तबस्सुम को देखता रह गया-उसे, जिसे देखकर स्वयं सौन्दर्यं की देवी भी इंर्ष्या कर उठे----इस वक्त उसके जिस्म पर सिर्फ एक जीना हल्का आसमानी गाउन था-झीने गाउन के पार उसका संगमरमरी जिस्म स्पष्ट चमक रहा था-उरोजों की गोलाइयों को देखकर कर रधुनाथ के सारे जिस्म में चिंट्रियां सी रेग गई-सारा जिस्म पसीने से भरभरा उठा ।

तबरसुम , तो मानो ही गई थी कि वह लगभग नंग्नावस्था में उसके सामने खडी है ।

रघुनाथ का दिलो दिमाग, जाने कौन-सी दुनिया में तैरने लगा…दिल ने मानो धडकना ही बन्द कर दिया!!!! वह किसी गहरे नशे मे डूबता चला गया !!!!

एकाएक तबस्सुम ने उसे पुकारा----" इकबाल-"

“हूं।" उसी नशे में डूबा रधुनाथ कह उठा ।

"म.....मेरे इकबाल!" अधीर मन से कहकर वह उसकी तरफ बढी ।

रघुनाथ के दिलो-दिमाग को एकाएक ही तीव्र झटका लगा…जैसे वह किसी मदहोश कर देने वाले नशे से बाहर निकला हो-----वह एकदम चीख-सा पड़ा---"म. ..मैँ इकबाल नहीं हू ।"

वह ठिठक गई-भोले मुखड़े पर एकाएक ही ऐसे भाव उभरे, जैसे किसी खिलौने से खेल रहे बच्चे का खिलौना छीन लिया गया हो-वह दुढ़तापूर्वक बोली----"आप ही इकबाल है ।"

"नहीं ।" रघुनाथ ने कमजोर-सा विरोध किया-" तुम लोग मुझे इकबाल बनाना चाहते हो!"

"इससे भला हमें क्या लाभ होगा?"

रघुनाथ ने काफी हद तक खुद को सम्भाल लिया था, बोला…"ये मास्टर कौन है?"

"ओह!" तबस्सुम का चेहरा सफेद पड़ गया--------"तो आपने फोन परं होने वाली बाते सुन ली है ?"

"हां ।" कहने के साथ ही रघुनाथ ने चहलकदमी-सी की…अपना अत्मविश्वास उसे लौटता हुआ महसुस हो रहा था…. हालांकि झीने गाउन में से छलक पड रहा यौवन अव भी उसे विचलित किए दे रहा था, पर अपनी आंखे अब वह सिर्फ और सिर्फ तबस्सुम के चेहरे पर चिपकाए ही बोला-----" मै सुन चुका हूं कि मास्टर के लिए तुम मुझे जबरदस्ती इकबाल बना देना चाहती हो ।"

"आपने गलत सुना है-आप इकबाल तो हैं ही-हां, आपको उसके सामने पेश करने से पहले सारी दुनिया को तबाही से बचाने और खुद को उसके फ़न्दे से मुक्त करने के लिए हम आपकी याददाश्त बापस जरूर लाना चाहोते है ।"

"मेरी याददाश्त का दुनिया की तबाही से क्या मतलब?"

" प ..प्लीज इकबाल-यह मत पूछो-------"मैं तुम्हारे इस सवाल का जवाब नहीं दे सकती !"

रघुनाथ ने जेब से रिवॉल्वर निकालकर उसकी तरफ तान दिया बोला----" तुम्हें मेरे हर सवाल का जवाब देना होगा----याद रहे, गोली चलाते वक्त मेरा हाथ बिल्कुल नहीं कांपेगा ।"

आश्चर्यजनक ढंग से तबस्सुम की आंखें भरती चली गई… मुखड़े पर असीमित दर्द के चिन्ह उभरे-------बडे : ही अजीब से स्वर मे उसने कहा----"चला दो इकबाल-गोली चला दो ।"

"क्या मतलब----?" रघुनाथ हड़बड़ा गया !

“बचपन से शायद यहीं दिन देखने के लिए मैं तुम्हारी दीवानी थी-तुम्हारी तलाश मे देश-विदेश की खाक छानती घूम रही थी कि शायद इसीलिए घूम रही थी कि अन्त में तुम्हारी. गोली का शिकार होना है ।”
 
रघुनाथ… को लगा कि वह आसानी से उसके इस सवाल का जवाब नहीं देगी--एकाएक ही वह तबस्सुम के पीछे देखकर वहुत ही सामान्य स्वर में कह उठा-----" अरेतुम यहां?"

तबस्सुम ने तेजी से घूमकर पीछे देखा और बस----इसी क्षण रघुनाथ ने विजय जैसी फुर्ती दिखाई थी-किसी गुरिल्ले की तरह झपटकर उसने रिवॉल्वर के दस्ते का बार _ कनपंटी पर किया !"

एक चीख के साथ लहराकर तबस्सुम फर्श पर गिरने ही बाली थी कि जाने किस भावना के वशीभूत रघुनाथ ने उसे बांहों में सम्भाल लिया-तराशे हुए नग्न जिस्म के स्पर्श ने रघुनाथ के होश उडा दिए।

उस वक्त तो वह कांप ही उठा, जब अनजाने मे उसकी उंगलियां तबस्सुम के कठोर वक्षस्थल से स्पर्श हुई ।

दिल-बहार होटल के पीछे संकरी गली में खड़े अशरफ से विजय यह मालूम कर चुका था कि रघुनाथ अभी तक सात सौ बारह से बाहर नहीं निकला है…गली मे पर्याप्त अंधेरा था और

विजय गन्दे पानी के उस पाइप की तरफ बढा, जो कि होटल की छत तक चला गया था।

एकाएक बुरी तरह चौककर अशरफ फुसफुसाया------" व.......विजय !"

"क्या बात है प्यारे झानरोखे !"

"ऊपर देखो।"

ऊपर देखते ही विजय के होंठ सीटी बजाने के से अन्दाज में सुकड़ गए--सातवी मंजिल की एक खुली हुई खिड़की से एकं इंसानी साया पाइप पर झूल गया-----उंसके कन्धे पर बेहोश अवस्था में एक अन्य जिस्म था ।

विजयं बुदबुदा उठा----" ओह---अपना तुलाराशि तो पूरा जेम्स बॉंण्ड बन गया है ।"

" क्या करना है विजय है ?"

" कुछ नहीं करना है प्यारे-तेल देखो और तेल की घार देखते रहो----तुमने कहा था कि बूढा अहमद खान कमरे में नहीं है, इसका सीथा-सा मतलब है कि अपना तुलाराशि तबस्सुम को कन्धे पर डाले उत्तर रहा है-------अंधेरे में छुप जाओ-----देखना है कि अपना तुलाराशि कितना ऊंचा उड रहा है ।"

वे अत्थेरे में छुप गए ।

तबस्सुम को कन्धे पर डाले रघुनाथ पूरी सावघानी के साथ नीचे उत्तर रहा था…वह गली में पहुंचा---विजय औरं अशरफ के पास से गुजार गया…वे उसके पीछे हो लिए------गली से बाहर निकलकर रघुनाथ ने तबस्सुम का बेहोश जिस्म जीप की पिछली गद्दी पर डाला!!!!

स्वयं ड्राइविंग सीट पर बैठा और एक झटके के साथ जीप आगे बढ गई!

उसके साथ ही एक ऐसी कार स्टार्ट हुई थी , जिसकी ड्राइविंग सीट पर विजय और उसकी बगल में अशरफ बैठा था ।

पीछा जारी हो गया !

कुछ देर तक जीप भीड़-भरे इलाकों से गुजरती रही-फिर एक सुनसान-मार्ग पर पहुंच गई-वहां पहुँचते ही जीप की गति आश्चर्यजनक रूप से बढ गई-मजबूरन विजय को भी अपनी कार की रफ्तार बढानी पड्री-सड़क पर ऱघुनाथ की जीप या विजय की कार ही थी--सामने की तरफ से आने वाला इक्का-दुक्का वाहन उनके समीप से_ गुजार जाता--जीप-और कार के बीच एक निश्चित अन्तराल वना हुआ था-जीप की गति आश्चर्यजनक रूप से बढती ही चली गई एक्सीलेटर पर दबाव डालते हुए विजय बुदबुदाया-“ये साले अपने तुलाराशि को हो क्या गया हे?"

“अरे !" अशरफ चोंक पड़ा-"जीप लहरा रही है विजय !"

स्वयं विजय की पेशानी पर चिन्ता की लकीरें उभर आई---- सचमुच जीप सडक पर बूरी तरह लहरा रही थी…जैसे ड्राइवर के क्रट्रोल से बाहर हो गई हो…जबड़े भीचकर विजय एक्सीलेटर पर दबाव बडाता ही चला गया ।

सूनी सड़क पर जीप अब लहराने लगी थी, मानो बिना किसी ड्राइवर के ही दौड्री चली जा रही हो ।

और फिर…उनके देखते-ही-देखते जीप तेजी से झटककर एक पेड़ की जड़ से जा टकराई-एक कर्णभेदी विस्फोट के साथ जीप उल्टी और भक्क से आग लग गई! !

चर्र-र्र…र्र….।

ब्रेकौं की तीव्र चरमराहट के साथ कार जलती हुई जीप से थोडी आगे जाकर जाम हो गई-------एक साथ कार के अगले दोनों दरवाजे खुले एक से अशरफ ने और दूसरे से विजय ने सडक पर जम्प लगा दी----आंघी-तूफान की तरह से जलती हुई जीप की तरफ़ लपके ।

पेड़ की जड़ में घुसी जीप धू धू करके जल रही थी------विजर्य जल्दी से चीखा----अपना ओवरकोट उतारो प्यारे--जल्दी करो !"

ओवरकोट उतारते हुए अशरफ ने पूछा-"क्या करना चाहते हो?"

"अपने तुलाराशि को जलकर भस्म होने से पहले ही निकालना है ।" कहने के साथ ही उसने अशरफ से ओवरकोट छीनकर सिर ढापते हुए कहा।

"व......विजय-----तुम---!"

अशरफ ने उसे रोकना चाहा-मगर वह जलती. जीप की तरफ लपका-----जडवत्-सा खड़ा अशरफ विजय को उल्टी पडी जल रही जीप के अन्दर दाखिल होते देखता रहा-विजय भभकती हुईं आग के अन्दर गुम हो गया…अशरफ के सारे चेहरे पर पसीना उभर आया-यह पहला मौका नहीं रा, जबकि उसने विजय को अपने किसी साथी को बचाने के लिए इस तरह मौत के मुह मे घुसते देखा हो?

दो मिनट बाद आग की लपटों में घिरा एक साया जीप से बाहर कुदा-अपने जिस्म से ओवरकोट उतारकर उसने दूर फेंक दिया!!!!

आग की लपटें भी उस ओवरकोट के साथ ही दूर होगई ।

विजय ने उसके नजदीक पहुंचकर हांफ़त्ते हुए कहा…“जीप में कोई नहीं है.प्यारे!"

अशरफ उछल पड़ा-----“ऐसा कैसे हो सकता है?"

"ऐसा ही है प्यारे--" विजय ने जल्दी से कहा-उन्हें जीप के आसपास तलाश करो ।"

फिर-----वे दोनों दौड़कर जलती हुई जीप के दूसरी तरफ़ पहुचे----जिस पेड़ से जीप टकराई थी, उससे करीब पाचं गज दुर जख्मी अवस्था में रघुनाथ बेहोश पड़ा था ।।।

उसके सिर, चेहरे और जिस्म के अन्य कई भागों से खून बह रहा था।

विजय ने जल्दी से कहा…“मैं इसे लेकर चलता हू प्यारे -झानझरोखे…तुम सुन्दरी को तलाश करों ।"

"ओ.के. ।" अशरफ ने कहा---उसकी इस स्वीकृति से पहले ही रघुनाथ को कन्धे पर लादकर विजय अपनी कार की तरफ़ दौड चुका था ।

कालबेल की आवाज पर दरवाजा खोलते ही रैना चौक पडी----------"ये क्या हुआ विजय भईया-आपकी यह हालात और-अरे-ये तो जख्मी हैं-बेहोश भी---क्या हुआ है ?"

कुछ विशेष नहीं रैना बहन !" प्रविष्ट होते विजय ने कहा ।

" क.......कुछ क्यों नहीं---ये तो बुरी तरह जख्मी है-क्या हुआ है ?"

"सिर्फ एक्सीडेण्ट ।"
 
“एक्सीडेण्ट?"

“ड्राइविंग आती नहीं और जीप ऐसे तेज चला रही था, जैसे उसे हवाई जहाज बना देना चाहता हो…एक पेड से टकरा बैठा ।" कहने के साथ ही उसने रघुनाथ के जिस्म क्रो पलंग पर लिटा दिया ।

रैना दौड़कर रघुनाथ के करीब पहुंची-कांम्ते हाथ उसके रक्तरंजित चेहरे पर घुमाती हुई डबडबाइं आंखों से बोली--------" हे ,

भगवान-मेरे सुहाग की रक्षा करना ।"

बिना कुछ कहे विजय ने आगे बढकर डॉक्टर का नम्बर डायल किया-फोन करने के बाद वह बैड के समीप आता हुआ बोला…"मैंने फोन कर दिया है रैना बहन--कुछ ही देर बाद डॉक्टर आ जाएगा ।"

"म.......मगर-----ये हुआ कैसे भइया?"

"ये होटल दिलबहार के रूम नम्बर सात सौ बारह में गया था। "

रैना उछल पडी-----"व.......वहां-----क्यों?"

"वह तो यहीं जाने, लेकिन जहाँ तक मेरा ख्याल है…उनंसे मिलकर यह अपने तरीके से अपने दिमाग की उलझन दूर करना चाहता था-र-कमरे में यह काफी देर तक रहा-नहीं कहा जा सकता कि वहां, इसकी क्या बातें हुई, परन्तु जब यह कमरे से बाहर निकला तो इसके कंधे पर बेहोश तबस्सुम थी ।"

विजय संक्षेप में सब कुछ बताता चला गया ।

सुनने के बाद रैना ने पूछा…"अब तबस्सुम कहां है?"

" फिलहाल कुछ नहीं पता ।"

रैना शायद अमी भी अपने किसी सवाल का जवाब चाहती थी, मगर तभी कमरे में डॉक्टर भटनागर ने प्रवेश किया-वे दोनो ही खडे हो गए-बैड के समीप एक कुर्सी डाल दी गई----

भटनागर अंपने काम में लग गया…रघुनाथ को ज्यादा चोटें नहीं लगी थीं ।।।

सिर्फ सिर पर ही एक गहरा ज़ख्स था…उसी का खून उसके सारे चेहरे पर पुत गया था…बेण्डेज के बाद भटनागर ने उसे दो-तीन इन्वेक्शन लगाए और फिर बोला----"पन्द्रह मिनट बाद इन्हें होश आ जाना चाहिए।"

धड़कते दिल से तीनों ने पन्द्रह मिनट गुजारे---..सोलहवां मिनट था, जबकि उन्होंने रघुनाथ की पलकों में हत्का सा कम्पन महसूस किया ।

"..न.........नाथ…!” भर्राए स्वर में कहकर रैना अभी उसकी तरफ बढी ही थी कि भटनागर ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया…रघुनाथ ने धीरे-धीरे आंखें खोली।।।

निश्चल पड़ा कुछ देर तक वह सूनी-सी आंखों से छत को घूरता रहा…चेहरे पर ऐसे भाव उभरे जैसे वह दिमाग पर यह सोचने के लिएं जोर डाल रहा हो कि वह कहां है-एकाएक डॉक्टर भटनागर ने उस पर खुलकर पुकारा---" मि. रघुनाथ !"

उसने पलटकर भटनागर की तरफ देखा, बोला----"आप कौन है ।"

"आपने मुझे नहीं पहचाना !" भटनागर हल्के से मुस्कूराए----"आपका फेमिली डॉक्टर !"

"र रहीम चाचा ?" डॉक्टर भटनागर चौक पडे-----"र----रहीम चाचा…कौन रहीम ?"

"नहीं-आप डाॅक्टर अंकल तो नहीं हैं कौन है आप?"

विजय की आंखें अजीब-ही गोलाई में सुकढ़ती चलीं गई !

रैना हक्की बक्की-सी, रघुनाथ को देख रही थी…उमकी समझ में अभी तक कुछ नहीं आया था-जबकि चकराए से मिस्टर भटनागर ने पूछा…“आप कौन से डॉक्टर अकल की वात कर रहे हैं-----मैं हूं भटनागर ।"

"म. .मैं कहा हुं---?" अजीब से-अन्दाज में रघुनाथ ने चोरों तरफ देखते हुए पूछा-आप लोग कौन हैं------- तबस्सुम कहां है…तबस्सुम-!" कहने के साथ ही वह एक झटके से उठ बैठा ।

बौखलाए से डाँक्टर भटनागर कुर्सी छोड़कर खड़े हो गए---बिजय एकदम आगे, बढकर बोला…" तुम, कौन हो प्यारे-बोलो,क्या नाम है तुम्हारा?"

“इकबाल ।"

रैना के कंठ से चीख निकल पडी।

रघुनाथ ने चौंककर उसकी तरफ देखा-कई क्षण तक बस देखता रहा…बोला कुछ नहीं, फिर वह रैना के चेहरे से दृष्टि हटाकर बिजय से बोला…“ आप लोग कौन है---मेरे अब्बा-अम्मी कहां हैं…तबस्सुम…?”

“क्या तुम्हारा एक्सीडेण्ट हुआ था?" उसकी आखों मे झाकंते हुए विजय ने पूछा।

" हां !"

"किस चीज से?"

“सामने से बिगडा हुआ एक सांड आ रहा था-ड्राइवर ने गाडी उससे बचाने की बहुत कोशिश की मगर एक पेड से टकरा गई-मैं बेहोश हो गया----"आप कौन है-तबस्सुम कहा है ?"

" तबस्सुम तुम्हारी कौन है?"

" उससे मेरा निकाह हुआ है ।"

" य....ये आप क्या कह रहे हैं नाथ?" रैना पागलों के समान चीख पडी--" आप इकबाल नहीं है…आपका नाम रघुनाथ है-जब आपका एक्सीडेंट हुआ तब आप कार में नही----जीप में थे ।"

"आप कौन हैं?"

"हैं-आप मुझे नहीं जानते…मैं रैना हूं…रैना ।"

"कौन रैना?"

"आपकी पत्नी नाथ…मैं आपकी पत्नी हूं।"

"म......मेरी पत्नी इतनी वडी-नही-नहीं--------मेरी बीबी तो तबस्सुम है-वह तो अभी सिर्फ चार साल की है--इमामुद्दीन चाचा कहते है कि वह पैदा ही मेरे लिए हुई है ।"

"हे भगवान्-इन्हें क्या हो क्या?" रैना अजीब से अंदाज में कह उठी ।।

विजय ने रघुनाथ से पूछा-“ कब की बात कर रहे हो प्यारे ?"

" बस-दो-चार दिन पहले की ही ।"

"तुम्हारी उम्र क्या है?"

" अभी कुछ ही दिन पहले तो मेरी बारहवीं सालगिरह मनाई गई है !"

"बारहवीं सालगिरह-वहाँ सामने शीशा लगा है-ज़रा उस शीशे में अपनी शक्ल तो देखो।”

रघुनाथ ने'किसी आज्ञाकारी बंच्चे की तरह पालन किया…शीशे मे शक्ल देखते ही वह बुरी तरह चौंककर उछल पडा----"अरे-ये मेरे चेहरे को क्या हुआ…म. . .मैं इतना बड़ा कैसे हो गया?"

"तुम इकबाल -नहीं मेरी जान…रपुंनाथ हो ।"

" रघुनाथ-----कौन रघुनाथ?"

"जरा शीशे में जिस्म पर मौजूद वर्दी देखो प्यारे--तुम राजनगर के पुलिस सुपरिटेण्डेट हो-बडे-वडे- काम किया करते हो तुम…सारा पुलिस विभाग तुम्हारी वाह-वाह किया करता है ।"

शीशे में देखकर रघुनाथ एक बार फिर चौंक पड़ा, बोला---" स.....सचमुच------मगर मैं रघुनाथ कैसे हो सकता हू------सुपरिटेण्डेण्ट कैसे हो सकता हूं…ये मेरी शक्ल…मैं इतना बड़ा कैसे हो गया----ये सब क्या नाटक है…मैँ तो सिर्फ बारह साल का हू।"

"तुम्हें चिमटे खींचकर लम्बा कर दिया गया है प्यारे !"

"क...क्या मतलब?"

विजय ने घूमकर मेज से आज का अखबार उठाया----उसका प्रथम पृष्ठ खोलकर उसकी तरफ बडाता हुआ बोला…"इसे पढो----इंसमेँ छपे फोटो को देखो----इसमे गप नहीं छपती ।"

अखबार देखते ही वह कह उठा----अरे-ये तो हिन्दुस्तानी अखबार है!"

"तुम इस वक्त हिन्दुस्तान में ही हो प्यारे ?"

"म...मगर मैं तो मिस्री हूं------मैं यहां कैसे---?"

“पहले अखबार पढो ।"

पढने के बाद रघुनाथ ने कहा-----'ये तो किसी रघुनाथ'फी तारीफ से भरा पड़ा । आप कहते है कि मैं रधुनाथ हूं-इसमें छपे फोटो की शक्ल भी मुझसे मिलती है----मगर मैं रघुनाथ नही हू ,नही, मै इकबाल हूं…मेरी ये शक्ल भी नकली है ।"

"तोताराम दम्पति के हत्यारे को तुम्ही ने गिरफ्तार किया था !

" ऐसा कैसे हो सकता है-मैं तो बेहोश था ।"

"इसका मतलब ये हुआ प्यारे कि तुम्हें कुछ भी याद नहीं----तोते की तरह ए-बी-सी-डी तुम्हें शुरू से रटानी पडेगी----तुम तो एक दम निल हो गये हो !"

"मैं समझा नहीं कि आप क्या कह रहे हे?"
 
" समझ जाओगे प्यारे तुलाराशि---ओंह-मगर अब तो तुम्हारी राशि ही बदल गई है…"अच्छी तरह से याद कर लो--- तुम्हारा नाम सिर्फ रघुनाथ है-----पुलिस में सुपरिटेण्डेण्ट हो तुम-ये रैना बहन तुम्हारी बीबी है-हम तुम्हारे दोस्त-विकास नाम का तुम्हारा एक लड़का भी है ।"

"म-----मेरा लडका?"

"हां प्यारे-लड़का भी ऐसा जो आते ही तुम्हें सबकुछ याद दिला देगा-आओ, उस कमरे में चेले.-----वहां तुम्हें उसके फोटो दिखाऊँगा ।"

रघुनाथ किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसके साथ चल दिया---बिजय ने आंखों से रैना और डॉक्टर भटनागर को वहीं रुकने का संकेत दिया…रघुनाथ को लेकर बह भीतरी कमरे में चला गया---कुछ ही देर-बाद दौड़ता हुआ विजय कमरे के बाहर निकला-----फुर्ती के साथ उसने घूमकर दरवाजा बन्द करके बाहर से बोल्ट कर. दिया----रैना और भटनागर ने चकित दृष्टि से यह सब कुछ देखा था, जबकि दूसरी तरफ़ से दरवाजा पीटता हुआ-रघुनाथ कह रहा था…“ये आप क्या कर रहे है--आपने मुझे बन्द क्यों कर दिया !"

"फिलहाल आराम करो प्यारे?"

विजय के निकट पहुंचकर हड़बड़ाई सी रैना ने कहा…"'य. ..ये इन्हें क्या हुआ भइया-----ये कैसी बाते कर रहे है-----कुछ भी याद क्यों नहीं रहे है----हममे है किसी को ये पहचान क्यों नही रहे हैं ?"

"क्यों डॉक्टर-आपके ख्याल से अपने तुलाराशि को क्या हुआ है?”

"म मुझे लगता है सुपर साहब अपनी याददाश्त गंवा बैठे है !"

"गवा नहीं बैठा डाँक्टर, बल्कि वह सब कुछ उसे याद आ गया है, जो भूल गया था ।"

"क्या मतलब?" भटनागर चकरा उठा !

“जो याददाश्त भूल जाते हैं, वः अपने नाम की जगह कोई दूसरा नाम लेकर यह नहीं कहते कि मैं वह हूं बल्कि होश में आते ही यह पूछते हैं कि मैं कौन हूं…दरअसल, बारह वर्ष की आयु का इकबाल नाम का एक लड़का एक दुर्घटना का शिकार होकर अपनी _याददाश्त गवा बैठा था…वक्त ने उसे रघुनाथ बना दिया---------तव से आज तक वह सिर्फ रघुनाथ बना रहा----- उसे बिल्कुल याद नहीं रहा कि वह इकबाल है ।"

" ओह! ! ! शायद आज की दुर्घटना से उसकी याददाश्त वापस आ गई है।”

" हां !" विजय बोला-----" आपसे सिर्फ यह पूछना है कि क्या ऐसाहो सकता है?"

"जरूंर हो सकता है ।"

रैना ने जल्दी से पूछा-“तो क्या अब उन्हें कभी याद नहीं आएगा कि वे रघुनाथ हैं !"

"अरे याद क्यों नहीं आएगा रैना बहन !" डॉवंटर से पहले विजय बोल पड़ा-------"उसके तो बाप को भी सब कुछ याद करना पड़ेगा-----हमे उसकीं याददाश्त के आंन-ओंफ के स्विच का पता लग गया है-सिर में है-जहाँ चोट लगी है-पहले एक्सीडेण्ट से वह आँफ हो गया था----इस एक्सीडेण्ट से ऑन हो गया----उस स्विच को फिर आँफ़ होना होगा -भले हो उसके लिए हमें एक और एक्सीडेण्ट

करना पृड़े ।"

रैना रो पडी ।

" अरे----तुम रोती क्यों हो रैना बहनं?"

“म...मेरी तो कूछ समझ में नहीं आ रहा है भइया-जाने आप क्या कह रहे है !"

"अपने भाई पर भरोसा रखो रैना बहन !" विजय थोड़ा गम्भीर हो रया----- " अपने तुलाराशि को मैं कुछ और नहीं बनने दूंगा-तुम फिक्र मत करो----फिलहाल मैं जा रहा हूं--------कुछ ही देर वाद लौटकर आऊंगा-----सब ठीक हो जाएगा---तुम वह दरवाजा मत खोलना ।"

रैना आंसुओं से भीगा चेहरा ऊपर उठाकर उस तरफ देखने लगी ।

सांत्वना देने के से अन्दाज में विजय उसका कंधा थपथपाकर बाहर निकल गया ।

"'लेकिन सर-अखिर रघुनाथ वहां गया ही क्यों था?" सव कुछ सुनने के बाद हैरत में डूबे ब्लैक बाॅय ने पूछा ।

“वह किसी को बताकर नहीं गया था…कहा नहीं जा सकता कि कमरे में तबस्सुम से उसकी क्या बाते हुई-सोचा था कि होश में आने पर पूछेंगे, लेकिन उसके होश में आने ने तो हमारे ही होश गुम कर दिए हैं-जब उसे यही याद नहीं कि वह रघुनाथ है तो उसे यह कैसे बाद होगा कि वहां वह क्या सोचकर गया था-खैर, शायद तबस्सुम से कुछ पता लगे…अपने झानझरोखे का फोन आया?"

“नहीं सर !'

अभी उसने ऐसा कहा ही था कि मेज पर रखे टेलीफोन की घण्टी घनघनाने लगी…हाथ बढ़ाकर विजय ने रिसीवर उठाया, बोला-----" पवन हीयर ।"

“ वह लड़की मिल गई है सर !"

"कहां से?”

“दुर्घटनास्थल से एक किलोमीटर पीछे वह झाडियों में बेहोश पडी थी-ऐसा लगता है जैसे कि किसी ने उसे दुर्घटना होने से पहले ही जीप से बाहर फेक दिया था।"

विजय' ने एक पल कुछ सोचा, फिर बोला…"उसे लेकर सुपर रघुनाथ के घर पहुंचो---कुछ देर बाद विजय भी वहाँ पहुंचेगा, लेकिन उसके वहां पहुंचने से पहले तुम्हें तबस्सुम को होश में लाने की कोशिश करने के अलावा कुछ नहीं करना है।" कहने के साथ ही उसने सम्बन्ध-विच्छेद कर दिया ।।।

फिर ब्लेक क्बयाॅ से बोला--“अपनी गोगिया पाशा से सम्बन्थ स्थापित करों प्यारे-उसे आदेश दो कि वह अपने स्थान पर मौजूद रहे और बूढे अहमद खान को देखते ही अपनी गिरफ्त में ले ले----अहमद को लेकर वह तुरन्त अपने तुलाराशि की कोठी पर पहुंच जाए ।"

ब्लैक वॉय ने ट्रांसमीटर पर आशा से-सम्बन्ध स्थापित किया,बोला----"क्या अहमद खान होटल-लौट आया है?"

" जी हां !"

"उसे तुरन्त अपनी गिरफ्त में लेकर रघुनाथ की कोठी पर पहुंच जाओ!" पवन की आवाज में कहने के-बाद ब्लेक बाॅय ने तुरन्त समन्ध-विच्छेद कर दिया----तब उसने विजय 'से कहा-----"ल.. लेकिन सर-अब आखिर आप करना क्या चाहते हैं !"

" फिल्लहाल यह तो मैं खुद भी नहीं जांनता प्यारे?"

“क...क्या मतलब सर?"

उठते हुए विजय ने कहा-"वैसे ऊपर से देखने पर मामला सीधा-सादा नजर आ रहा है, मगर कुछ बाते ऐसी भी हैं,जो हमें रहस्यमय लग रही हैं।"

" जैसे?"

" अभी-अभी अपने झानझरोखे ने बताया कि तबस्सुम को किसी ने दुर्घटनास्थल से एक किलोमीटर पहले ही जीप से बाहर फेंक दिया था…सबसे पहला सवाल उउठता है-किसने---दुसरा सवाल है क्यों…क्या फेकने वाले को मालूम था कि कुछ देर बाद जीप दुर्धटनाग्रस्त होने बाली है?"

ब्लेक बाॅय के नेत्र सिकुड़ते चले गए ।

" दुसरी रहस्यमय बात हमने तब देखी जबकि हम अपने झानझरोखे के साथ कार में बैठकर तुलाराशि की जीप का पीछा कर रहे थे…हमने देखा कि सुनसान सडक पर पहुचते ही जीप विना किसी वजह के अचानक ही वहुत तेज और अन्धाधुन्ध भागने लगी-----हम दावे के साथ कह सकते हैं कि उतनी तेज और ऊटपटांगं गाडी अपना तुलाराशि नहीं चला

सकता ।"

"क्या आप यह कहना चांहते है कि ड्राइविंग़ सीट पर कोई और था ?"

"अभी हम स्पष्ट रूप से भी कहने की स्थिति में नहीं है प्यारे…मगर हां, इंन सब को मद्देनजर रखकर' हम यह दावा जरूर कर सकते है कि यह एक्सीडेणट रहस्यमय है ।"
 
डॉक्टर भटनागर वहां सें जा चुका था।।

रैना ने रो - रोकर अपना बूरा हाल का लिया था-ज़ब बेहोश ततबस्सुम को लिए अशरफ वहाँ पहुचा तो रैना तबस्सुम को देखकर चौक पडी-------रैना को रोते देखकर अशरफ भी चौका था…दोनों, ने अपने साथ साथ घटी एक-दूसरे को सुनाई-----रैना की सुनने के बाद अशरफ स्वयं भी चकित रह गया, परन्तु रैना को सात्वना देने की उसने भरपूर चेष्टा की !!

रघुनाथ उसी कमरे में केद था।

कुछ ही देर बाद वहां विजय भी पहुंच गया !

उसने आते ही तबस्तुम को होश में लाने की प्रक्रिया जारी कर दी--तबस्सुम को ज्यदा चोट नहीं लगी थी-हां,चन्द खरोचे ज़रूर थीं।

उसका झीना-गाउन कई जगह भी फट गया था !

विजय के प्रयासों से वह होश में आते ही उछलकर खडी हो गईं--यह महसूस करते ही वह झेंप गई कि वह लगभग नग्नावस्था में है ।

विजय ने कहा…"अपने कमरे में ले जाकर इसे ढंग से कपडे पहना दो रैना बहन !"

स्वयं को उनके बीच पाकर तबस्सुम खुद चकित थीं…जब तक रैना उसे अपनी साडी और ब्लाउज़ पहनाकर कमरे में लाई, तब तक आशा भी अहमद को लेकर वहाँ पहुच चुकी थी ।

आशा ने अहमद को अपने रिवॉल्वर से कवर कर रखा था ।

तबस्सुम को देखते ही अहमद चौंककर कह उठा…"अरे बहूरानी-तू यहां?"

"अ.......आप----?' तबस्सुम के मुंह से सिर्फ यही एक लपज निकला ।

अहमद विजय और रैना कौ देखकर कह उठा-"आप दोनों तो वही हैं न, जो सुबह होटल में पुलिस की वर्दी पहनकर आए थे?"

"हां प्यारे ।” विजय बोला--तुम बूढे जरूर हो, लेकिन आखें अभी तक तेज हैं ।"

"'आप लोग हमेँ इस तरह पकडकर यहाँ लाने वाले होते कौन हैं?"

"हमारे चक्कर मे पडने वाला वही बन जाता है प्यारे, जो शिकारपुर में रहते हैं---हम काले चोर हैं--फिलहाल तुम ये बताओं कि तुमने जीप पेड़ में क्यो दे मारी?"

"ज....... जीप पेड़ में दे मारी-कौन-सी जीप?"

"वही, जिससे अपना तुलाराशि बेहोश तबस्सुम को लेकर चला था ।"

" त......तुलाराशि कौन?"

"तुम्हारा इकबाल ।"

"ह हमारा इकबाल--""मगर आपने तो बताया था कि वह मर गया है-क्या सचमुच इकबाल जिन्दा है-----:कहां है-प प्लीज, मुझें मेरे बेटे की एक झलक दिखा' दो।”

झपटकर विजय ने दोनों हाथो से उसका गिरेबान पकड लिया और दांत भीचकर गुर्राया------“ज्यादा नाटक करने की कोशिश मत करो प्यारे वरना एक ही झापड में सारे कसवल ढीले हो जाएंगे?"

"आप ये क्या का रहे है----मै भला क्या नाटक कर रहा हू !"

"यदि तुम नाटक नहीं कर रहे हो प्यारे-तो बताओं कि अपने होटल से गायब होकर तुम पूरे दो घण्टे कहां रहे और क्या करते रहे ?"

अहमद ने जबाब दिया…"मैं आई जी पुलिस ठाकुर साहब से मुलाकात करने उनके बंगले पर गया था ।"

समी उछल पड़े ।

विजय की तो बुद्धि चकराकर रह गई फिर भी काफी जल्दी उसने स्वयं को सम्भालकर कहा-----" तुम ठाकुर साहब से मिलने गए थे…क्यों?"

“उनसे अपने इकबाल के बारे में बात करने ।"

“इकबाल के बोरे में तुमने उनसे वया बातें की ?"

"वही सव कुछ जो आपसे की थीं…मैँने उन्हे यह भी बताया कि सुबह सुपरिटेण्डण्ट साहब हमारे पास आए थे-----वे सारी बाते भी उन्हें बताई-----जो आपने की री-कहने लगे कि मेरी जानकारी में रामनाथ नामक कोई आदमी ऐसा नहीं है, जिसकी लाश रेल की पटरी से मिली हो और जिसकी जिस्मानी खासियतें इस बच्चे से मिलती हों----मैंने कहा कि आपके सुपरिटेण्डेण्ट साहब तो वही कह रहे थे-वे बोले कि सुपरिटेण्डेण्ट साहब से बात करेंगे ।"

"जब तुम्हें हमने सब कुछ बता दिया था तो तुम वहां क्यों गए?”

" मुझे यकीन नहीं आया था कि आप अस ली पुलिस वाले है और आपने सच बोला है।"

" ओह----क्या तुमने उन्हें हमारे नाम बताए थे?"

"मुझे मालूम नहीं थे ।"

कुछ कहने के लिए विजय ने अभी मुह खोला ही था कि घण्टी घनघना उठी-विजयं ने आगे बढकर रिसीवर उठा लिया, दूसरी तरफ से ठाकुर साहव की आवाज़ उभरी-----"हेलो ।"

विजय सम्भला---उसने तत्परतापूर्वक रघुनाथ की अबाज़ में कहा--" य यस सर !"

आशा और अशरफ के अतिरिक्त रेनां सहित सभी चौंककर चकिंत्त दृष्टि से उसकी तरफ देखते रह गए, जबकि दूसरी तरफ़ से ठाकुर साहब पूछ रहे थे----क्या तुम सुबह दिलबहार होटल के रूम नम्बर सात सौ बारह में किसी से मिलने गए थे रघुनाथ?”

"ज़...जीं-नही तो?” रघुनाथ की आबाज मे कहा ।

"क. क्या मतलब ? " ठाकुर साहब चौंक पड़े-“तुम वहां नहीं गए…क्या तुम्हें अच्छी तरह याद है?”

"मैं भला अपनी दिनचर्या कैसे मूल सकता हूं----मै वहां नहीं गया------फिर भला वहां मैं क्यों जाऊंगा सर ?"

" उस विज्ञापन के सिलसिले में...जो आज के अखबार में तिसरे पृष्ठ पर निकला है।"

"मेरा किसी विज्ञापन से क्या सम्बन्ध सर !"

"कमाल है-यदि तुम वहां नहीं गए तो वह यहां कैसे आ गया?”

"कौन सर! "

"मेरे पास एक व्यक्ति आया था जिसने अपना नाम अहमद खान बताया था।"

इसके बाद ठाकुर साहब वही सब कुछ बताते चले गए, जो अहमद कुछ ही देर पहले बता चूका था….सुनने के बाद विजय ने रघुनाथ के स्वर में कहा-“कमाल हैं सर-मै नहीं समझ सकता कि सुपरिटेण्डेण्ट की वर्दी में बहाँ कौन पहुच गया और वह उस आदमी से रामनाथ वाला झूठ बोलकर अपना क्या उल्लू सीधा करना चाहता था ।"
 
"यदि वह तुम नहीं थे तो मामला सचमुच गम्भीर है रघुनाथ-कोई नकली सुपरिटेण्डेण्ट बना घूम रहा है--उसे पुलिस की गिरफ्त मे होना चाहिए ।"

"य…यस सर, लेकिन........!"

ठाकुर साहब जैसे रिसीवर रखते-रखते रूक गए हो--"लेकिन क्या?"

"मैं आपसे चन्द सवाल करना चाहता हू।"

“हमसे सवाल?''

"अहमद खान नाम का वह आदमी आपके-पास कितनी पहले आया था ?"

“करीब ढाई घण्टे पहले ।"

“कब गया सर ?"

ऊभी-केवल तीस मिनट ही गुजरे हैं ।"

"ओ के. सर'-थेंक्यू।" कहकर विजय ने रिसीवर रख दिया…उसने रिस्टबॉंच पर नजर डाली-रघुनाथ की जीप का . . एक्सीडेंट हुए अभी सिर्फ एक ही घण्टा गुजरा था…उसे स्वयं ही अपना यह अनुमान गलत साबित होता हुआ प्रतीत दिया कि जीप एक्सीडेण्ट अहमद का कोई हाथ था ।

कई -पल तक अपने स्थान पर खडा जाने वह क्या सोचता रहा-अब उसे अहमद से कोई भी प्रश्न करने का कोई औचित्य नजर नहीं आ रहा था-अत: उसकी तरफ़ कोई ध्यान दिए विना वह तबस्सुम की तरफ बढा-उसके नजदीक पहुंचकर बोला-जब तुम्हारे पास अपना,तुलाराशि पहुचा-तो उसने तुमसे क्या बातें की?"

"तुलाराशि नहीं, इकबाल कहिए ।"

“क्या मतलब?"

"उसने मुझसे कहा कि वे सभी जिस्मानी खासियत उसमें हैं, जो हम इकबाल में बताते हैं-----कहने के बाद उसने मुझे वे सभी खासियतें दिखाई भी थीं-मैं खुश होकर कहने लगी कि तुम ही इकबाल हो-बह नहीं माना--उल्टे यह कहने लगा कि उसे फंसाने के लिए हम कोई षडूयंत्र कर रहे हैँ…मैं उसे यह यकीन दिलाने की भरसक चेष्टा करती रही, जबकि वह मुझसे पूछता रहा कि हमारी साजिश क्या है…अंत में यह कहने के साथ ही उसने मेरे सिर पर रिवॉल्वर के दस्ते का वार किया कि मैं उसे इस तरह कुछ नहीं बताऊंगी, अत: वह मुझे टॉर्चर करने अपने साथ ले जा रहा हे…मैं बेहोश हो गईं-उसकै बाद मुझे यहीं होश आया है-मैं नहीं जानती कि इस बीच क्या हुआ…पै यहाँ कैसे पहुच गई ।"

विजय पुन: उलझकर रह गया-----वह किसी आशाजनक परिणाम पर न पहुच सका । "

इस वक्त दिमाग में यह बिचार भी उठा ,कि कहीं एक सामान्य एक्सीडेंट मे उसे व्यर्थ ही तो कोई रहस्य नजर नहीं आ रहा है--वेसे भी रघुनाथ की याददाश्त लौटने वाली घटना यह कहती थी कि ये सचमुच मुसीबत के मारे हैं------ फिलहाल उसके पास एक ही रास्ता था-----यह कि अहमद और तबत्सुम को अपने विश्वास में लेकर चले-उसने निश्चय किया कि ऐसा ही करेगा…इसी निश्चय के वशीभूत उसने कहा-----हमारा तुलाराशि और तुम्हारा इकबाल एक ही व्यक्ति है ।"

" अब आप स्वयं ही यह बात मान रहे है ?"

"बेशक !"

"क्यों ?"

" घटना ही कुछ ऐसी हो गई है !"

" क्या घटना हो गई है ?"

"वह घटना बताने से पहले मैं तुम लोगों से एक समझोता करना चाहूगा ।"

_ "कैसा समझौता?"

"इकबाल तुम्हारे साथ सिर्फ बारह साल रहा था, इसी वजय से तुम्हें उससे इतनी मुहब्बत होगई कि आज इकत्तीस साल से तुम उसके लिए सारी दुनिया में मारे-मारे फिर रहे हो, तो क्या आप यह नहीं मानेंगे उसे भी उससे कुछ मुहब्बत हुईं होगी, जिनके साथ वह बीस-पच्चीस या तीस साल रहा ।

"जरूर हुई होगी ।"

"अगर बह उनसे एकदम जुदा हो जाए तो क्या उन्हें दुख नहीं होगा?"

"क्यों नहीं होगा?"

"क्या आप उन्हे दुख देगे ?"

एक पल के लिए सन्नाटा छा गया-----अशरफ रैना और आशा समझ नहीं पा रहे थे कि विजय क्या चाहता है, जबकि तबस्सुम और अहमद खान की आंखे मिली…तब तबस्सुम ने कहा----"हम समझे नहीं…अपना प्रयोजन यदि आप साफ भाषा में कहे तो अच्छा होगा ।"

"मेरा मतलब ये है कि आप उसे उन लोगों से जुदा नहीं करेगे, जो रघुनाथ समझकर उसे प्यार करते है।"

"उसे हमारे साथ मिस्र जाना होगा !"

"यही आप नंहीं करेगे !"

" क्यों ?"

"क्योंकि ऐसा, होने से उसी विरह की आग में कुछ और लोग सुलजते रह जाएंगे, जिसमेँ आज तक आप सुलग रहे थे ।"

"इसमें हमें क्या लेना-देना हे…वह हमारा इकबाल है ।"

"जब तक आप मुझसे यह समझोता नहीं करेगे, तब तक वह आपको नहीं मिलेगा !"

"आप उसे हमसे न मिलने देने वाले कौन होते है?”

एकाएक विजय का स्वरं कड़ा हो गया-----" हम काले चोर होते है !"

"काला चोर कौन?"

"उसके प्रति हमे तुम्हारी मुहब्बत देखकर सहानुभूति हो गई थी प्यारे-सोचा था कि ऐसा रास्ता निकल आए, जिससे तुम्हें तुम्हारा इकबाल भी मिल जाए और हमारा तुलाराशि भी हमारे पास रहे । लेकिन यदि तुम नहीं मान रहे हो-तो इकबाल कभी नहीं मिलेगा…वह हमेशा हमारा ही रहेगा-बल्कि किसी को यह ही पता नहीं लगेगा कि तुम मिस्र से भारत आने के बाद कहीं गुम हो गए ।

अहमद खान कह उठा……" हमें धमकी दे रहे हो?” '

"इन्हें पकड़ तो प्यारे झानझरोखे और मिस गोगिया पाशा?" विजय ने आदेश दिया---" हमने सोचा था कि सीधी उंगली से ही घी निकल जाएगा, लेकिन इन्होंने हमें उंगली टेढी करने के लिए विवश कर ही दिया ।"

आशा और अशरफ ने रिवॉत्वर निकालकर उनकी कापटियो पर रख दिए-विजय ने सचमुच यह निर्णय ले लिया था कि अब वह कभी रघुनाथ को इनके सामने नहीं पडने देगा-वह समझ चुका था कि रघुनाथ इनका इकबाल ही है ------किन्तु इनसे सहानुभूति रखने का सीधा मतलब था कि वह हमेशा के लिए अपने रघुनाथ को खो दे…ऐसा वह हरगिज नहीं होने दे सकता था।

"ले चलो इन्हें ।" तभी कमरे के अन्दर से रघुनाथ की आवाजं गूजी----"यदि मेरे पिता और पत्नी को कुछ हो गया मिस्टर विजय----, मैं तुम्हें जिन्दा नहीं छोडूगा ।

अचानक ही रघुनाथ की आवाज सुनकर सब चोंक पड़े । रैना कह उठी-" हे भगवान-इन्हें क्या हो गया है?”

"य ये-----आवाज इकबाल की ही है अब्बा हुजूर !" अधीर मन से तबस्सुम लगभग चीख पडी-----"हमरि इकबाल को इन्होंने उस कमरे मे केद-कर रखा है !"

“इकबाल !” चीखकर अहमद कमरे की तरफ दौड़ा, मगर बीच ही में उसके जबड़े पर विजय' का घुसा पड़ा तो वह उलट पड़ा-उसके कंठ से एक चीख निकली और उस चीख को सुनते ही दूसरी तरफ से बंद दरवाजे को झझोड़ता हुआ रघुनाथ चीख पडा । पागलो के समान तबस्सुम दरवाजे की तरफ दोडी ।
 
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