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रैना, विकास और मोन्टो की उत्सुक नजरें रघुनाथ के चेहरे पर चिपक गई, जबकि दिमाग पर जोर डालते हुए रघुनाथ ने कहा-------"मुझें याद नहीं आ रहा ।"
सबकी नजरें मिली ! !
रघुनाथ ने कहा-----“लेकिन-मैं इकबाल नहीं हो सकता।"
"क्यों नहीं हो सकते?" विजय ने पुछा।
"शयद-किसी भी व्यक्ति को अतीत के शुरू के चार-पांच साल याद नहीं रहते…अगर तुमसे पूछा जाए उस वक्त की कोई-धटना सुनाओ जव तुम तीन वर्ष के थे तो शायद तुम्हें भी कुछ याद न आ सके----मुमकिन है कि यह चोट मुझे उस समय लगी हो, जब मेरी आयु एक-से-तीन या सिर्फ चार साल की रही हो ?"
"क्या तुम्हें कोई ऐसी घटना याद है, जब तुम्हारी आयु बारह साल से कम रही हो ? !
" हां ----याद है?”
“सुनाओ ।"
"मुझे याद है उस वक्त मैं आठ साल का था…मुझे पतंग उड़ाने का बहुत शौक था-हम लखनऊ में रहते थे…कटी हुई पतंगों को लूट-लूटकर मैं बसंत पंचमी के लिए जोडा करता था--
एक दिन वहुत बड़ी सफेद रंग की पतंग लूटी और उसे बड़े अरमानों से-सम्मालकर इस मकसद से रखा कि उसे मैं बसंत पंचमी को ही उड़ाऊंगा-बसंत पंचमी की पहली रात को पिताजी अचानक ही मुझसे मजाक करते हुए बोले कि वे पेरी सफेद पतंग को काली कर सकते है…उनकी वात पर मुझे आश्चर्य हुआ क्योंकि मैं नहीं समझ सकता था फि सफेद पतंग भला कैसे हो सकती हे-उन्होने मुझसे काली करने के लिए पतंग मांगी-मैंने दे दी-वे मेरे ही सामने मिट्टी के तेल की जल रही कुप्पी की लो के उपर उठ रहे काले धुएं के उपर पतंग को लहराने लगे !
-----सफेद पतंग. पर धुआं जमा तो वह काली पड़ने लगी----मै हैरत में डूबा दिलचस्प निगाहों ने अपनी सफेद पतंग को काली होते देख रहा था-अचानक जाने कैसे पिताजी का हाथ बहका-----पतंग कुछ नीचे हो गई…पतंग के बारीक कागज ने तुरन्त ही कुप्पी की लो से आग पकड ली---पल भर में फर-फर करके सारी पतंग-जलकर राख हो गई---रो-रोकर मैंने सारा घर. सिर पर उठा लिया, जबकि पिताजी ठहाकों के साथ हंसते हुए जमीन पर पड़े जले हुए कागज की तरफ इशारा करते हुए बार-बार कह रहे धे-"देख रघुनाथ तेरी पंतग काली हो गई हो-जाने क्यों, मैं आज़ तक भी उस घटना को नहीं भूल पाया !"
“तुम यह दावा कैसे कर सकते कि जब यह घटना घटी हैं तब तुम आठ साल के थे !"
" मुझे अच्छी तरह याद है----उस. वक्त मैं सिर्फ चौथी कक्षा में पढ़ता था !"
“उम्र का कक्षा से क्या मतलब?"
"मेरे पिता ने बताया था कि मैं उस वक्त चार साल का था जबकि पढने बैठा और वे हमेशा ही यह कहतें वे कि मैं कभी-भी-किसी कक्षा में फेल नहीं हुआ।”
"क्या तुम उस प्राइमरी स्कूल का नाम बता सकते हो, जिसमें तुम पढ़े ?"
" मुझे अच्छी तरह याद है…लखनऊ में मैं ज्ञान भारती में पढ़ता था !"
विजय ने कहा---"तब तो तुम इकबाल नहीं हो ।"
"म---------मगर ।" विकास बोला…“वैसी स्थितिं में इस फोटो का क्या मतलब है गुरु?"
"मतलब यही है प्यारे दिलजले की यदि बात सिर्फ एकाध खासियत तक ही सीमित होती तो उसे संयोग भी माना जा सकता था, परन्तु चार खासियतें संयोग से नहीं मिल सकती…जरूर इस के पीछे कोई वहुत वडा मकसद छुपा है-----और यदि कोई मकसद नहीं है तो इकबाल को तलाश करना हमारे लिए इस विज्ञापनदाता से भी कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है --------
-------आखिर पता तो लगे कि दुनिया में वह' कौन सी हस्ती है, जिसकी न सिर्फ शक्ल ही बल्कि चोट का निशान----मस्सा---तिल और पैर -कीं उँगलियाँ भी अपने तुलाराशी से मिलती हैं…......हृमारे ख्याल से या तो रघुनाथ ही इकबाल है ओर यदि नहीं है तो इकबाल नाम के किसी आदमी का कहीं अस्तित्व ही नहीं है ओऱ यदि अस्तित्व नहीं है तो निश्चितृ रूप से इस झिज्ञापन के पीछे कोई बहुत बंडा षड्यंत्र पनप रहा है ! "
रैना उछल पडी…“कैसा षड्यंत्र ?"
"इस बारे में .…अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है !"
"गुरु-----क्यों न हम दिलबहार होटल के ,कमरा नम्बर सात सौ बारहं मे जाकर अहमद खान नाम के इस आदमी से मिलें जिसने यह विज्ञापन दिया हे?"
" मिलना तो, पडेगा ही, लेकिन इस तरह ऩही !”
" फिर किस-तरह! "
विजय धीरे धीरे कुछ कहने लगा !!!!
सबकी नजरें मिली ! !
रघुनाथ ने कहा-----“लेकिन-मैं इकबाल नहीं हो सकता।"
"क्यों नहीं हो सकते?" विजय ने पुछा।
"शयद-किसी भी व्यक्ति को अतीत के शुरू के चार-पांच साल याद नहीं रहते…अगर तुमसे पूछा जाए उस वक्त की कोई-धटना सुनाओ जव तुम तीन वर्ष के थे तो शायद तुम्हें भी कुछ याद न आ सके----मुमकिन है कि यह चोट मुझे उस समय लगी हो, जब मेरी आयु एक-से-तीन या सिर्फ चार साल की रही हो ?"
"क्या तुम्हें कोई ऐसी घटना याद है, जब तुम्हारी आयु बारह साल से कम रही हो ? !
" हां ----याद है?”
“सुनाओ ।"
"मुझे याद है उस वक्त मैं आठ साल का था…मुझे पतंग उड़ाने का बहुत शौक था-हम लखनऊ में रहते थे…कटी हुई पतंगों को लूट-लूटकर मैं बसंत पंचमी के लिए जोडा करता था--
एक दिन वहुत बड़ी सफेद रंग की पतंग लूटी और उसे बड़े अरमानों से-सम्मालकर इस मकसद से रखा कि उसे मैं बसंत पंचमी को ही उड़ाऊंगा-बसंत पंचमी की पहली रात को पिताजी अचानक ही मुझसे मजाक करते हुए बोले कि वे पेरी सफेद पतंग को काली कर सकते है…उनकी वात पर मुझे आश्चर्य हुआ क्योंकि मैं नहीं समझ सकता था फि सफेद पतंग भला कैसे हो सकती हे-उन्होने मुझसे काली करने के लिए पतंग मांगी-मैंने दे दी-वे मेरे ही सामने मिट्टी के तेल की जल रही कुप्पी की लो के उपर उठ रहे काले धुएं के उपर पतंग को लहराने लगे !
-----सफेद पतंग. पर धुआं जमा तो वह काली पड़ने लगी----मै हैरत में डूबा दिलचस्प निगाहों ने अपनी सफेद पतंग को काली होते देख रहा था-अचानक जाने कैसे पिताजी का हाथ बहका-----पतंग कुछ नीचे हो गई…पतंग के बारीक कागज ने तुरन्त ही कुप्पी की लो से आग पकड ली---पल भर में फर-फर करके सारी पतंग-जलकर राख हो गई---रो-रोकर मैंने सारा घर. सिर पर उठा लिया, जबकि पिताजी ठहाकों के साथ हंसते हुए जमीन पर पड़े जले हुए कागज की तरफ इशारा करते हुए बार-बार कह रहे धे-"देख रघुनाथ तेरी पंतग काली हो गई हो-जाने क्यों, मैं आज़ तक भी उस घटना को नहीं भूल पाया !"
“तुम यह दावा कैसे कर सकते कि जब यह घटना घटी हैं तब तुम आठ साल के थे !"
" मुझे अच्छी तरह याद है----उस. वक्त मैं सिर्फ चौथी कक्षा में पढ़ता था !"
“उम्र का कक्षा से क्या मतलब?"
"मेरे पिता ने बताया था कि मैं उस वक्त चार साल का था जबकि पढने बैठा और वे हमेशा ही यह कहतें वे कि मैं कभी-भी-किसी कक्षा में फेल नहीं हुआ।”
"क्या तुम उस प्राइमरी स्कूल का नाम बता सकते हो, जिसमें तुम पढ़े ?"
" मुझे अच्छी तरह याद है…लखनऊ में मैं ज्ञान भारती में पढ़ता था !"
विजय ने कहा---"तब तो तुम इकबाल नहीं हो ।"
"म---------मगर ।" विकास बोला…“वैसी स्थितिं में इस फोटो का क्या मतलब है गुरु?"
"मतलब यही है प्यारे दिलजले की यदि बात सिर्फ एकाध खासियत तक ही सीमित होती तो उसे संयोग भी माना जा सकता था, परन्तु चार खासियतें संयोग से नहीं मिल सकती…जरूर इस के पीछे कोई वहुत वडा मकसद छुपा है-----और यदि कोई मकसद नहीं है तो इकबाल को तलाश करना हमारे लिए इस विज्ञापनदाता से भी कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है --------
-------आखिर पता तो लगे कि दुनिया में वह' कौन सी हस्ती है, जिसकी न सिर्फ शक्ल ही बल्कि चोट का निशान----मस्सा---तिल और पैर -कीं उँगलियाँ भी अपने तुलाराशी से मिलती हैं…......हृमारे ख्याल से या तो रघुनाथ ही इकबाल है ओर यदि नहीं है तो इकबाल नाम के किसी आदमी का कहीं अस्तित्व ही नहीं है ओऱ यदि अस्तित्व नहीं है तो निश्चितृ रूप से इस झिज्ञापन के पीछे कोई बहुत बंडा षड्यंत्र पनप रहा है ! "
रैना उछल पडी…“कैसा षड्यंत्र ?"
"इस बारे में .…अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है !"
"गुरु-----क्यों न हम दिलबहार होटल के ,कमरा नम्बर सात सौ बारहं मे जाकर अहमद खान नाम के इस आदमी से मिलें जिसने यह विज्ञापन दिया हे?"
" मिलना तो, पडेगा ही, लेकिन इस तरह ऩही !”
" फिर किस-तरह! "
विजय धीरे धीरे कुछ कहने लगा !!!!