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"आप फिक्र न करें।" विकास उनकी हिचक की बह समझता हुआ बोला…"उसे टार्चर करते समय मै व्यक्तिगत स्तर पर भावुक नहीं होऊंगा-----ऐसा कोई काम नहीं करूगा जिससे पुलिस कस्टडी में उसकी मृत्यु हो जाए और उसकी लाश मरे हुए साप-की तरह पुलिस की गर्दन में पड जाए !"
एक पल ठहरकर ठाकुर साहब ने कहा…“ठीक है, तुम कोशिश कर सकते हो ।"
“थेक्यू सर----और हां, मेरी रिक्वेस्ट है कि उस समय टार्चर रूम में मेरे और तबस्तुम के अलावा और कोई नहीं होगा-आप भी नहीं ।"
" जैसे तुम्हारी मर्जी ।"
दरवाजा अन्दर से बन्द करके जब विकास टार्चर चेयर की तरफ घूमा, तब उस पर कैद तबस्तुम उसी की तरफ देख रही थी…विकास ने अपनी सुर्ख आंखें उसके चेहरे पर टिका दी-------फिर धीरे--धीरे उसकी तरफ बडा---------जाने विकास के चेहरे पर वे कैसे भाव थे, जिन्हे देखकर टार्चर चेयर पर बैठी तबस्सुम का दिल जोर-जोर से धडकने तगा…हलक सूख-सा गया..चेहरा पीला पड गया----आंखों के सामने वह दृश्य चकरा उठा, जबकि विकास ने उसकी गर्दन दबाई थी ।
उसके ठीक सामने बेहद नजदीक पहुंचकर वह बोला…“क्या तुम मुझे जानती हो ?"
वडी मुश्किल से उसने स्वीकृति में गर्दन हिलाई।
" कौन हू मै ?"
तबस्तुम ने थूक निगला, बोली…“व...विकास ।"
'कड़ाक' से तबस्सुम की नाक परं एक बहुत ही जबरदस्त घूंसा पडा…उसके कंठ से एक चीख उबल पड़ी--------नाक से खून का फव्वारा उबल पड़ा-------हालांक्रि वह बराबर चीख रही थी किन्तु एक के बाद दूसरी चीख उसके कंठ से बाहर न निकल सकी-क्योकि मारने के तुरन्त बाद बिकास ने झपटकर उसकी गर्दन दबोच ली थी !
वही फौलादी पकड ।
तबस्सुम छटपटा गई-----विकास के पंजों का कसाव वढ़ता चला गया !
तबस्सुम की सांस रुकने लगी…नसै उभरी-आंखे उबलने-सी लगीं…बिकास. की तो पहले से ही उसं पर दहशत सवार थी और जिस ढंग से आते ही उसने आक्रामक रुख अपनाया, उसने तो तबस्सुम के तिरपन ही कंपकंपा दिए ।
दांत भीचे विकास पुछ रहा था-----"होटल के उस कमरे में तो तुझे डैडी ने बचा लिया था, लेकिन यहा बचाने कोई नहीं आएगा---- ठाकुर साहब की तरह बहस नहीं किया करता---------- मेरे चंगुल में फंसा शिकारं या तो बकता है या'मर जाता है--------इस वक्त खुद को मेरे सवालों का जवाब देकर तू खुद को बचा सकती है------------या तो मेरे हाथ तेरी गर्दन से तब जब तू लाश में बदल चुकी होगी------------या तब जबकि तू अपने माथे पर बल डाल लेगी, क्योंकि उन बलों को देखकर से ये समझ जाऊंगा कि तू मेरे सवालों का जवाब देने के लिए तैयार है--जिस क्षण इच्छा हो, बल, डाल लेना वरना---।"
" अपना वाक्य अधूरा ही छोड़कर वह गर्दन पर पकड़ सख्त करता चला गया ।
तबस्सुम की जीभ बाहर को लटकने लगी। विकास उसकी गर्दन पर अपने हाथों का कसाव बढ़ाता ही चला गया---------------------उसे इन्तजार था उस क्षण का जबकि तबस्सुम के मस्तक पर बल पड़ जाएंगे, किन्तु वह क्षण नहीं आया, जबकि तबस्सुम का-दम पूरी तरह टूटने लगा…हाथ-पर ढीले पड़ने लगे--जीम और आंखें लटक-सी गई थी ।
अचानक विकास ने उसकी गर्दन से हाथ हटा लिए है वह 'धम्म' से टार्चर चेयर की पुश्तगाह से जा टिकी---आंख बन्द-जिस्म ढीला पड गया था---------उसकी ऐसी अवस्था देखकर विकास घबरा-सा गया ।
उसने जल्दी-जल्दी तबस्सुम के गालो पर तमाचे मारे और बोला…"रेहाना...रेहाना-आंखें खोलो ।"
तबस्सुम ने एक झटके से आंखे खोल दी !
अभी तक लम्बी-लम्बी सांसे ले रहीं थी
आखो मे भय का साम्राज्य था, किन्तु चेहरे पर हैरत के भाव उभर आए-अपनी उखड्री हुई सांस पर नियंत्रण पाकर वह बोली---"मेरा नाम तबस्सुम है .......!"
हल्की-सी मुस्कराहट के साथ विकास ने कहा कहा-----" तुम्हारा नाम रेहाना है ।"
"न----नहीं।"
"मैँ विकास नहीं रेहाना-ये मैं हू।” इस बार विकास के मुंह से निकलने वाला स्वर बदल गया !"
" रेहाना उछल पडी…“ह.. .ह.. . ।"
"नहीं । वह जल्दी से बोला----“मेरा नाम मत लेना रेहाना !"
"त.. .तुम'-डार्लिग…तुम यहां?"
“हां वचन दिया था न…पुलिस के चंगुल से निकाल के ले जाने के लिए आया हू मैं।"
“ओह !" गहन आश्चर्य में डूबी रेहाना ने पूछा… "म...मगर तुमने मेरी गर्दन ।"
“माफ़ करना डार्लिग-बिकास के रूप मे इस टार्चर रूम में कदम रखते ही मैंने तुम्हारे चेहरे पर भय और आतंक के कुछ ऐसे भाव देखे, जैसे तुम विकास से बहुत डरी-हुई हो… उसी क्षण मेरे दिमाग ,में यह बात आई कि इसंका मतलब तो ये है कि यदि विकास सचमुच ही तुम्हें टार्चर करने आया होता तो तुम उस पर मेरा एकाएक रहस्य उगल देती--ऐसा होता या नहीं----इसी की जांच करने के लिए मुझे बिकास बनकर यह .कोशिश करनी पडी !"
उसे कातर दृष्टि से देखती हुई रेहाना कह उठी-------इसका मतलब मेरी परीक्षा ले रहे थे ।"
"जिसमे तुम पास हो गई ।"
" यदि फेल होजाती ?"
"तब मुझे तुम्हे यहाँ से निकालने की कोई जरूरत शेष नहीं रहजाती-----गला घोंटकर तुम्हें हमेशा के दिए इसी टार्चर चेयर पर खामोश करके निकल जाता ।"
"अब बातें ही बनाते रहोगे या र्मुझें इस मुसीबत से निकालोगे भी ?"
" " जरूर !" कहकर वह रेहाना को टार्चर चेयर से मुक्त करने लगा !
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एक पल ठहरकर ठाकुर साहब ने कहा…“ठीक है, तुम कोशिश कर सकते हो ।"
“थेक्यू सर----और हां, मेरी रिक्वेस्ट है कि उस समय टार्चर रूम में मेरे और तबस्तुम के अलावा और कोई नहीं होगा-आप भी नहीं ।"
" जैसे तुम्हारी मर्जी ।"
दरवाजा अन्दर से बन्द करके जब विकास टार्चर चेयर की तरफ घूमा, तब उस पर कैद तबस्तुम उसी की तरफ देख रही थी…विकास ने अपनी सुर्ख आंखें उसके चेहरे पर टिका दी-------फिर धीरे--धीरे उसकी तरफ बडा---------जाने विकास के चेहरे पर वे कैसे भाव थे, जिन्हे देखकर टार्चर चेयर पर बैठी तबस्सुम का दिल जोर-जोर से धडकने तगा…हलक सूख-सा गया..चेहरा पीला पड गया----आंखों के सामने वह दृश्य चकरा उठा, जबकि विकास ने उसकी गर्दन दबाई थी ।
उसके ठीक सामने बेहद नजदीक पहुंचकर वह बोला…“क्या तुम मुझे जानती हो ?"
वडी मुश्किल से उसने स्वीकृति में गर्दन हिलाई।
" कौन हू मै ?"
तबस्तुम ने थूक निगला, बोली…“व...विकास ।"
'कड़ाक' से तबस्सुम की नाक परं एक बहुत ही जबरदस्त घूंसा पडा…उसके कंठ से एक चीख उबल पड़ी--------नाक से खून का फव्वारा उबल पड़ा-------हालांक्रि वह बराबर चीख रही थी किन्तु एक के बाद दूसरी चीख उसके कंठ से बाहर न निकल सकी-क्योकि मारने के तुरन्त बाद बिकास ने झपटकर उसकी गर्दन दबोच ली थी !
वही फौलादी पकड ।
तबस्सुम छटपटा गई-----विकास के पंजों का कसाव वढ़ता चला गया !
तबस्सुम की सांस रुकने लगी…नसै उभरी-आंखे उबलने-सी लगीं…बिकास. की तो पहले से ही उसं पर दहशत सवार थी और जिस ढंग से आते ही उसने आक्रामक रुख अपनाया, उसने तो तबस्सुम के तिरपन ही कंपकंपा दिए ।
दांत भीचे विकास पुछ रहा था-----"होटल के उस कमरे में तो तुझे डैडी ने बचा लिया था, लेकिन यहा बचाने कोई नहीं आएगा---- ठाकुर साहब की तरह बहस नहीं किया करता---------- मेरे चंगुल में फंसा शिकारं या तो बकता है या'मर जाता है--------इस वक्त खुद को मेरे सवालों का जवाब देकर तू खुद को बचा सकती है------------या तो मेरे हाथ तेरी गर्दन से तब जब तू लाश में बदल चुकी होगी------------या तब जबकि तू अपने माथे पर बल डाल लेगी, क्योंकि उन बलों को देखकर से ये समझ जाऊंगा कि तू मेरे सवालों का जवाब देने के लिए तैयार है--जिस क्षण इच्छा हो, बल, डाल लेना वरना---।"
" अपना वाक्य अधूरा ही छोड़कर वह गर्दन पर पकड़ सख्त करता चला गया ।
तबस्सुम की जीभ बाहर को लटकने लगी। विकास उसकी गर्दन पर अपने हाथों का कसाव बढ़ाता ही चला गया---------------------उसे इन्तजार था उस क्षण का जबकि तबस्सुम के मस्तक पर बल पड़ जाएंगे, किन्तु वह क्षण नहीं आया, जबकि तबस्सुम का-दम पूरी तरह टूटने लगा…हाथ-पर ढीले पड़ने लगे--जीम और आंखें लटक-सी गई थी ।
अचानक विकास ने उसकी गर्दन से हाथ हटा लिए है वह 'धम्म' से टार्चर चेयर की पुश्तगाह से जा टिकी---आंख बन्द-जिस्म ढीला पड गया था---------उसकी ऐसी अवस्था देखकर विकास घबरा-सा गया ।
उसने जल्दी-जल्दी तबस्सुम के गालो पर तमाचे मारे और बोला…"रेहाना...रेहाना-आंखें खोलो ।"
तबस्सुम ने एक झटके से आंखे खोल दी !
अभी तक लम्बी-लम्बी सांसे ले रहीं थी
आखो मे भय का साम्राज्य था, किन्तु चेहरे पर हैरत के भाव उभर आए-अपनी उखड्री हुई सांस पर नियंत्रण पाकर वह बोली---"मेरा नाम तबस्सुम है .......!"
हल्की-सी मुस्कराहट के साथ विकास ने कहा कहा-----" तुम्हारा नाम रेहाना है ।"
"न----नहीं।"
"मैँ विकास नहीं रेहाना-ये मैं हू।” इस बार विकास के मुंह से निकलने वाला स्वर बदल गया !"
" रेहाना उछल पडी…“ह.. .ह.. . ।"
"नहीं । वह जल्दी से बोला----“मेरा नाम मत लेना रेहाना !"
"त.. .तुम'-डार्लिग…तुम यहां?"
“हां वचन दिया था न…पुलिस के चंगुल से निकाल के ले जाने के लिए आया हू मैं।"
“ओह !" गहन आश्चर्य में डूबी रेहाना ने पूछा… "म...मगर तुमने मेरी गर्दन ।"
“माफ़ करना डार्लिग-बिकास के रूप मे इस टार्चर रूम में कदम रखते ही मैंने तुम्हारे चेहरे पर भय और आतंक के कुछ ऐसे भाव देखे, जैसे तुम विकास से बहुत डरी-हुई हो… उसी क्षण मेरे दिमाग ,में यह बात आई कि इसंका मतलब तो ये है कि यदि विकास सचमुच ही तुम्हें टार्चर करने आया होता तो तुम उस पर मेरा एकाएक रहस्य उगल देती--ऐसा होता या नहीं----इसी की जांच करने के लिए मुझे बिकास बनकर यह .कोशिश करनी पडी !"
उसे कातर दृष्टि से देखती हुई रेहाना कह उठी-------इसका मतलब मेरी परीक्षा ले रहे थे ।"
"जिसमे तुम पास हो गई ।"
" यदि फेल होजाती ?"
"तब मुझे तुम्हे यहाँ से निकालने की कोई जरूरत शेष नहीं रहजाती-----गला घोंटकर तुम्हें हमेशा के दिए इसी टार्चर चेयर पर खामोश करके निकल जाता ।"
"अब बातें ही बनाते रहोगे या र्मुझें इस मुसीबत से निकालोगे भी ?"
" " जरूर !" कहकर वह रेहाना को टार्चर चेयर से मुक्त करने लगा !
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