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दूध ना बख्शूंगी/ complete

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"आप फिक्र न करें।" विकास उनकी हिचक की बह समझता हुआ बोला…"उसे टार्चर करते समय मै व्यक्तिगत स्तर पर भावुक नहीं होऊंगा-----ऐसा कोई काम नहीं करूगा जिससे पुलिस कस्टडी में उसकी मृत्यु हो जाए और उसकी लाश मरे हुए साप-की तरह पुलिस की गर्दन में पड जाए !"

एक पल ठहरकर ठाकुर साहब ने कहा…“ठीक है, तुम कोशिश कर सकते हो ।"

“थेक्यू सर----और हां, मेरी रिक्वेस्ट है कि उस समय टार्चर रूम में मेरे और तबस्तुम के अलावा और कोई नहीं होगा-आप भी नहीं ।"

" जैसे तुम्हारी मर्जी ।"

दरवाजा अन्दर से बन्द करके जब विकास टार्चर चेयर की तरफ घूमा, तब उस पर कैद तबस्तुम उसी की तरफ देख रही थी…विकास ने अपनी सुर्ख आंखें उसके चेहरे पर टिका दी-------फिर धीरे--धीरे उसकी तरफ बडा---------जाने विकास के चेहरे पर वे कैसे भाव थे, जिन्हे देखकर टार्चर चेयर पर बैठी तबस्सुम का दिल जोर-जोर से धडकने तगा…हलक सूख-सा गया..चेहरा पीला पड गया----आंखों के सामने वह दृश्य चकरा उठा, जबकि विकास ने उसकी गर्दन दबाई थी ।

उसके ठीक सामने बेहद नजदीक पहुंचकर वह बोला…“क्या तुम मुझे जानती हो ?"

वडी मुश्किल से उसने स्वीकृति में गर्दन हिलाई।

" कौन हू मै ?"

तबस्तुम ने थूक निगला, बोली…“व...विकास ।"

'कड़ाक' से तबस्सुम की नाक परं एक बहुत ही जबरदस्त घूंसा पडा…उसके कंठ से एक चीख उबल पड़ी--------नाक से खून का फव्वारा उबल पड़ा-------हालांक्रि वह बराबर चीख रही थी किन्तु एक के बाद दूसरी चीख उसके कंठ से बाहर न निकल सकी-क्योकि मारने के तुरन्त बाद बिकास ने झपटकर उसकी गर्दन दबोच ली थी !

वही फौलादी पकड ।

तबस्सुम छटपटा गई-----विकास के पंजों का कसाव वढ़ता चला गया !

तबस्सुम की सांस रुकने लगी…नसै उभरी-आंखे उबलने-सी लगीं…बिकास. की तो पहले से ही उसं पर दहशत सवार थी और जिस ढंग से आते ही उसने आक्रामक रुख अपनाया, उसने तो तबस्सुम के तिरपन ही कंपकंपा दिए ।

दांत भीचे विकास पुछ रहा था-----"होटल के उस कमरे में तो तुझे डैडी ने बचा लिया था, लेकिन यहा बचाने कोई नहीं आएगा---- ठाकुर साहब की तरह बहस नहीं किया करता---------- मेरे चंगुल में फंसा शिकारं या तो बकता है या'मर जाता है--------इस वक्त खुद को मेरे सवालों का जवाब देकर तू खुद को बचा सकती है------------या तो मेरे हाथ तेरी गर्दन से तब जब तू लाश में बदल चुकी होगी------------या तब जबकि तू अपने माथे पर बल डाल लेगी, क्योंकि उन बलों को देखकर से ये समझ जाऊंगा कि तू मेरे सवालों का जवाब देने के लिए तैयार है--जिस क्षण इच्छा हो, बल, डाल लेना वरना---।"

" अपना वाक्य अधूरा ही छोड़कर वह गर्दन पर पकड़ सख्त करता चला गया ।

तबस्सुम की जीभ बाहर को लटकने लगी। विकास उसकी गर्दन पर अपने हाथों का कसाव बढ़ाता ही चला गया---------------------उसे इन्तजार था उस क्षण का जबकि तबस्सुम के मस्तक पर बल पड़ जाएंगे, किन्तु वह क्षण नहीं आया, जबकि तबस्सुम का-दम पूरी तरह टूटने लगा…हाथ-पर ढीले पड़ने लगे--जीम और आंखें लटक-सी गई थी ।

अचानक विकास ने उसकी गर्दन से हाथ हटा लिए है वह 'धम्म' से टार्चर चेयर की पुश्तगाह से जा टिकी---आंख बन्द-जिस्म ढीला पड गया था---------उसकी ऐसी अवस्था देखकर विकास घबरा-सा गया ।

उसने जल्दी-जल्दी तबस्सुम के गालो पर तमाचे मारे और बोला…"रेहाना...रेहाना-आंखें खोलो ।"

तबस्सुम ने एक झटके से आंखे खोल दी !

अभी तक लम्बी-लम्बी सांसे ले रहीं थी

आखो मे भय का साम्राज्य था, किन्तु चेहरे पर हैरत के भाव उभर आए-अपनी उखड्री हुई सांस पर नियंत्रण पाकर वह बोली---"मेरा नाम तबस्सुम है .......!"

हल्की-सी मुस्कराहट के साथ विकास ने कहा कहा-----" तुम्हारा नाम रेहाना है ।"

"न----नहीं।"

"मैँ विकास नहीं रेहाना-ये मैं हू।” इस बार विकास के मुंह से निकलने वाला स्वर बदल गया !"

" रेहाना उछल पडी…“ह.. .ह.. . ।"

"नहीं । वह जल्दी से बोला----“मेरा नाम मत लेना रेहाना !"

"त.. .तुम'-डार्लिग…तुम यहां?"

“हां वचन दिया था न…पुलिस के चंगुल से निकाल के ले जाने के लिए आया हू मैं।"

“ओह !" गहन आश्चर्य में डूबी रेहाना ने पूछा… "म...मगर तुमने मेरी गर्दन ।"

“माफ़ करना डार्लिग-बिकास के रूप मे इस टार्चर रूम में कदम रखते ही मैंने तुम्हारे चेहरे पर भय और आतंक के कुछ ऐसे भाव देखे, जैसे तुम विकास से बहुत डरी-हुई हो… उसी क्षण मेरे दिमाग ,में यह बात आई कि इसंका मतलब तो ये है कि यदि विकास सचमुच ही तुम्हें टार्चर करने आया होता तो तुम उस पर मेरा एकाएक रहस्य उगल देती--ऐसा होता या नहीं----इसी की जांच करने के लिए मुझे बिकास बनकर यह .कोशिश करनी पडी !"

उसे कातर दृष्टि से देखती हुई रेहाना कह उठी-------इसका मतलब मेरी परीक्षा ले रहे थे ।"

"जिसमे तुम पास हो गई ।"

" यदि फेल होजाती ?"

"तब मुझे तुम्हे यहाँ से निकालने की कोई जरूरत शेष नहीं रहजाती-----गला घोंटकर तुम्हें हमेशा के दिए इसी टार्चर चेयर पर खामोश करके निकल जाता ।"

"अब बातें ही बनाते रहोगे या र्मुझें इस मुसीबत से निकालोगे भी ?"

" " जरूर !" कहकर वह रेहाना को टार्चर चेयर से मुक्त करने लगा !

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गुंप्त भवन के सीक्रेट कक्ष में इस वक्त ढेर सारा धुआ भरा हुआ था और वह धूआं किसी अन्य वस्तु के जलने का नहीं, बल्कि ब्लेक बॉय द्वारा पिए गए अनगिनत सिगारों का था-मेजं पर रखी ऐश-ट्रे का हैट ऊपर तक लबालब भर चुका था… ब्लैक बॉय की उगलियों के बीच इस वक्त भी एक सिगार सुलग रहा था-गहन चिन्ताओं में लीन वह अपनी कुर्सी पर अधेलेटी-सी अवस्था में पड़ा था ।

एकाएक मेज़ पर रखे फोन फी घण्टी घनघना उठी ।

ब्लैक बॉंय यह सोचकंर एकदम चौक उठा कि शायद बह फौन विजयं का हो, पर रिसीवर कान से लगाते ही बिकास का सपाट स्वंर उभरा----हैलो अकल !*

" व................विकास ?"

"गुरु या उनका कोई सन्देश आया?"

"नहीं ।"

कठोर लहजा------"इस किस्म के झूठ बोलने से वहुत: ज्यादा देर तक काम नहीं चंलेगा अंकल-----जो हालात है, उनमें ऐसा तो ही नहीं सकता कि गुरु या उसका कोई सन्देश आप तक न पहुंचा हो ।"

"उफ्फ । ब्लेक बॉय झुंझला उठा… "आखिर तुम यकीन क्यों नहीं करते बिकास ।"

"यकीन करने का प्रश्न ही कहां है अकंल ।"

“में सच कह रहा है विकास----"स्वयं परेशान हू-पता नहीं, वे कहां गायब हो गये है-------तभी से फोन पर सिर्फ इसलिए चिपका बैठा हू कि शायद उनका फोन आ जाएँ-----उससे भी है ज्यादा हैरत की बात तो ये है कि अपने फोनों पर अशरफ विक्रम, नाहर, परवेज और आशा भी नहीं मिल रहे हैं ।"

"'क्या मतलब?"

" मैंने इस इरादे से उन सभी क्रो फोन किए कि उन्हीं को विजय की. तलाश में लगाऊं, परन्तु मैं यह सोचकर हैरान हूं कि आंखिर उनमें से कोई भी अपने फोन पर क्यों नहीं है ।"

अचानक ही दूसरी तरफ से एक बड़ा ही विचित्र-सा कहकहा सुनाई दिय । "

चौके हुए ब्लैक बॉय ने --“तुम क्यों हंस रहे हो ?" अब उनमें से आपको कोई नहीं मिलेगा चीफ !"

“क...क्या मतलब-क्यों?"

"क्योंकि वे सभी मेरी केद-में हैं ।"

" त . . तुम्हारी कैद मे------म . , , मगर क्यों-----।" उन्हें क्यों पकड रखा है?"

"मैं ये नहीं बताऊंगा चीफ कि मेरे पास वे कहां कैद हैं, हां यह बताने के लिए फोन जरुर किया है कि यदि आज़ रात दस बंजे तक विजय गुरू मुझसे नहीं मिले तो ग्यारह बजे

तक सीक्रेट सर्विस के सदस्यों की लाशे राजनगर विभिन्न सडकों पर पड्री होंगी ।"

"य . . . . . यह तुम क्या कह रहे हो? " ब्लेक वाय के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए…' पागल हो गए हो क्या विकास?"

. "हां------सचमुच मैं पागल हो-गया हूं चीफ, क्योंकि मैंने डैडी की लाश देखी है-----चिंता के साथ जलकर उन्हे राख होते हुए देखा है--यदि यह आपके साथ ही यह सब कुछ होता तो शायद आप भी पागल हो जाते--आप जानते है मैं कभी खोखली धमकी नहीं दिया करत्ता--------मेरी चेतावनी विजय गुरु तक पहुचा दो-आज रात ठीक दस बजे मैं उन्हें पुराने -- शिकारगाह के खण्डहर' में मिलूंगा-यदि आप मेरी चेतावनी उन तक पहुंचाने

में नाकाम रहे - अथवा वे खण्डहर में नहीं आए तो ग्यारह बजे आपको उन सबकी लाशे देखनी होंगी ।

" म म.........मगर बिकास-मुझे सचमुच पता नहीं है कि वे कहाँ हे-मेरी बात तो-उफ्फ !' ब्लेक बाॅय थ्रोड़ा झुंझला-सा उटा-कसमसाकर रह गया वह------दूसरी तरफ से उसकी पूरी बात सुने विना ही सन्वन्थ विच्छेद कर दिया गया था !

कुछ देर वह लाइन पर उबरने बाली क्रिर्र-किर्र की आवाज सुनता रहा…पेशानी पर एक साथ ढेर सारे बल पड़ गए थे ।

उसने रिसीवर क्रंडिल पर रख दिया ।

अभी उसने सिगार में पहला ही कश लिया कि घण्टी पुनः बज उठी------उसने झपटने के से अन्दाज में रिसवीर उठाया भर्राए हुए स्वंर में बोला…“पवन हीयर! ”

“ये हम बोल रहे है प्यारे!"

"स . . . सर-आप मैं आप ही के लिए तो परेशान हूं----आप कहा से बोल रहे हैं !"

"इस बात कों छोडो प्यारे--काम की बात सुनो! "

”जी-कहिए ! !"

"हम तुमसे पहले सीकेट सर्विस के सभी सदस्यों से फोन पर सम्बन्थ स्थापित करने की कोशिश कर चुके है ----- मगर सव - नदारद--लगता है कि सबके सब साले कुम्भकरणी नीद में अंटा गाफिल हैं ।''

"क्या आपको उनसे कुछ काम है सर?"

"हाँ प्यारे…उन सबकों आदेश दो कि वे रात आठ बज तक. . . ।"

"लेकिन सर---" सव तो इस वक्त विकास की कैद में है ।"

"दिलजले की कैद में-क्यों?" ज़वाब में ब्लैक वाॅय विना किसी प्रकार का कोमा या विराम प्रयोग किए सव कुछ एक ही सांस में बताता चला गया--वात खत्म होने के बाद कुछ देर के लिए लाइन पर खामोशी छा गई----इस खामोशी को तोड़ते हुए ब्लैक व्वाय ने पूछा-'"आप क्या सोचने लगे सर ।"

"कुछ नहीं प्यारे-अपने दिलजले के बारे में ही सोच रहे ।"

"क्या?"

"'जो कुछ बह कह रहा है, उसे गलत भी तो नहीं ठहराया जा सकता------उसका पिता मरा है--दूध का वास्ता देकर मां ने हमारी लाश मांगी है…हम खुद ही स्वयं को उसका मुजरिम समझते है प्यारे !"

"ल . . लेकिन सर-यह सब्र कुछ-इतना अजीब आखिर हो कैसे गया? "

"हम दिलजले क्रो हमेशा समझाया करते थे कि उत्तेजना और क्रोध में पगलाया हुआ व्यक्ति हमेशा कोई अंटशंट मामला करता है-------------यह नहीं जानते थे कि स्वयं हम ही कभी ऐसा कर डालेगे------गुनहगार हम है प्यारे--------------दिलजले के मुजरिम है ।" कहने के साथ ही दुसरी तरफ़ से सम्बन्य विच्छेद कर दिया गया ।

ब्लैक क्षय के दिमाग में अब ही देर सारे प्रश्नवाचक चिन्ह जगमग करते रह गए।

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लगातार बज रही फोन की. घण्टी ने अंत में विकास को रिसीवर उठाने पर विवश कर ही दिया--सोफे पऱ अधलेटी भी अवस्था में विकास ने रिसीवर उठाया और बोला---विकास हियर! "

"तुम्हारी याद में यहां बैठे हम पी रहे हैं बीयर ।"

" क . कौन-बिजय गुरु?” बिकास एकदम इस तरह उछलकर खड़ा हो गया, जैसे उसे बिजली का झटका लगा हो--रिसीवर पर पकड सख्त हो गई-यह सुने बिना कि दूसरो तरफ से क्या कहा गया है, भभकते स्वर में विकास कहता ही चला गया-----"आप कहां से बोल रहे हैं----यूं औरतो की तरह मुंह क्यों छुपा लिया है आपने-----समने आओ गुरु…मर्द के बच्चे हो तो सामने आओ---- मां कसम, चीर----फाडकर आपको भी उसी चौराहे पर न डाल दिया, तो मेरा नाम विकास नहीं----मै कहता

हू--सामने आओ ।"

"हमारी बात तो सुनो प्यारे!”

" मै कुछ सुनना नहीं चाहता-आप बुजदिल हैं------कायर और डरपोक है-------मुझसे डर गए हैं आप ।"

"तुम चीज ही ऐसी हो प्यारे! "

"आपका खून सफेद पड़ गया है गुरू---थू! लडके ने सचमुच माउथपीस में थूक दिया…"थू है आप--------आपके बारे में मैं क्या सोचा करता था और आप क्या निकले------------बुजदिल-------अपनी मां का दूघ पिया है तो सामने आओ गुरु… देखू तो सही कि उन हाथों कितनी ताकत है, जिन्होंने डैडी के सीने में गोली उतार दी----------ऐसे कायरपन की उम्मीद तो गीद्ड्रो से भी नहीं की जा सकती आप तो कुत्ते से भी बदतर है ।"

शांत स्वर----" अक्सर तुम ठीक ही कहा करते हो प्यारे !"

"अरे अपनी मां के लाल हो तो बताओ गुरु--इंसी वक्त बताओ कि कहां से बोल -रहे हो-----अगर इसी वक्त वहां पहुचकर अपके परखच्चे न उडा दिए तो मेरा नाम निकास नही------------असली बाप की औलाद हो तो बोलो गुरु-------बताओ कि इस वक्त आपं कहां से बोल -रहै है ?"

"अभी नहीं प्यारे-----यह फोन हमने तुमसे. थोडी मोहलत मागंने के लिए किया है !"

" कैसी मोहलत?"

दर्द भरा, मायूस सा रबर---"जो हमने किया है या जो वक्त ने हमसे करा दिया है; उसका प्रायश्चित इसके अलावा ०कुछ और नहीं है कि खुद को तुम्हारे हवाले कर दे और जानते है कि उस वक्त तुम क्या करोगे----तुम जो भी करोगे ठीक ही करोगे दिलजले------अपनी सफाई मे हमें कुछ नहीं कहना है।"

"कहने के लिये आपके पास है'मी क्या?"

"सव विकास------जो हो गया है, उसके बाद हमारे पास कहने के लिए कुछ भी ऩहों।"

"मुझे आप चाहिए !"

"जानता हूँ प्यारे और वादा करता हूं कि बहुत जल्दी मैं खुदको तुम्हारे हवाले कर दूँगा-------- तुम्हारा मुजरिम हूं;;---तुम्हारे द्वारा निर्धारित की गई हर सजा बिना हिचक के मंजूर होगी--------अपने पिता के हत्यारे से बदला लेने का पूरा तुम्हे हक है,'लेकिन...।

. "लेकिन-----?" भभकता स्वरा !

"अशऱफ आदि ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा उन्हे छोड़ दो !"

"ओह इतनी ज्लदी यह इन्फाॅरमेशन आप तक पहुँच गई ।" बिकास का व्यंयात्म स्वर जहर में बुझ गया-----"इसका मतलब ये कि चीफ़ झूठ बोलते रहे थे, खेर------जब आपको यह पता है तो मेरी चेताबनी भी पता होगी--याद रखिए, आज रात दस बजे ।"

"हम उसी के बारे में बात करना चाहते थे ।"

"कहिए !"

"उन्होंने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा है गुनहगार हम है ,उन्हे छोड्र दो…हपे सिर्फ कल रात तक मोहलत चाहिए विकास--परसों सूरज निकलते ही हम खुद को तुम्हारे हवाले कर देगे ।"

"मोहलत किसलिए ?"

"हमेँ उस अपराधी तक पहुंचना है, जिसके जाल मे मैं फंसकर हम तुलाराशि की हत्या कर बैठे है! "

" नही मिलेगी।"

"बिकास !"

"मुझे कुछ नहीं सुनना है गुरु--मेरे लिए आपसे वडा अपराधी कोइ नहीं है-कान खोलकर सुन लिजीए -- आजज रात दस बजे तक यदि आप मेरे सामने नही आए तो मैं उनमैं से एक को भी गोली मारने में नहीं हिचकूगा और यदि तव भी तुम सामने न आए--- तुम्हारी कोठी-गुप्त पवन, और सारे राजनगर को जलाकर राख कर दूगा ।"

"उफ्फ !" विजय का कसमसाया हुआ स्वर------तुम समझते क्यों नहीं-दिलजले!"

"आज .रात दस बजे-----पुराने शिकारगाह के खण्डहर में ।" एक झटके तो कहने के बाद उसने रिसीवर केडिल पर इतनी जोर से पटका कि वह 'तड़क' गया ।

ठाकुर साहब वेचैनी के साथ टार्चर रूमके बाहर बाली गैलरी मे चहलकदमी कर रहे थे ---- दीबारो के सहारे दोनों तरफ खड़े सशस्त्र जबान इस वक्त पहले से कही ज्यादा मुसतैद नजर आ रहे थे-----एकाएक ही टार्चर रूम का दरबाजा खुला !

बिकास चमका !

ठाकुर साहब तेजी से उसके नजदीक पहुंचकर 'बोले-"क्या रहा?"

"उसने सब कुछ वक दिया है ।"

"क्या बताया उसने?"

मगर इस बार ज़वाब मुँह से नहीं--बल्कि हाथ से दिया------यानी बिल्कुल अप्रत्याशित ढंग से लम्हें लड़के का घूसा ठाकुर साहव के जवड़े पर पड़ा-प्रहार इतना जोरदार अचानक था कि ठाकुरसाहव का भारी-भरकम जिस्म भी हवा में लहराकर दूर जा गिरा है , सशस्त्र जबान चौंके…पर उनके सम्भलने से पहले ही लड़के ने एक छोटा-सा-बम फर्श पर दे मारा---कमाल की फुर्ती से यानी अगले ही क्षण सारी गैलरी गाढे, सफेद और अपारदर्शी धुएं से भर गई----ठाकुर साहब चीख पडे------"पकडो इन्हें----भागने ना पाएं ।"

परन्तु अगले ही क्षण स्वयं ठाकुर साहब जोर से खिलखिलाकर हंस पडे ।

यही हाल गैलरी मे सशस्त्र जवानों का हुआ, यानी वे सभी जौर-जोर से हंस रहे थे-घुआं इतना तीखा-तीव्र एवं कड़वा था कि आंखों में घूस कर--उसने बडी ही जबरदस्त जलन पैदा की-----आखे मिच गई--धुलने लगी--ढेर सारा पानी निकलने लगा ।

साथ ही वह सब हँसने लगे ।

स्वयं ठाकुर साहब भी ठहाके लगा-लगाकर हंस रहे थे ।

लडका और रेहाना आंखों पर ऐसे चश्मे लगाए, जिनकी मौजूदगी में धूएं का एक भी कण उनकी आंखों तक नहीं पहुंच पहुँच पा रहा था,गैलरी से गुजरते चले गए-हाँ, खिलखिला वे भी रहे थे । धुएं के अन्तिम सिरे तक पहुंचते ही लडके ने एक और 'बम' फोड दिया--आगे का रास्ता भी धुएं से भर गया-तबस्सुम का हाथ पकडे वह धुएं के बीच से गुजरता ही चला गया ।

दस मिनट के अन्दर उस अपारदर्शी धूए ने समूचे पुलिस हेडक्वार्टर पर कब्जा कर लिया-------हर व्यक्ति की आखो से बेशुमार पानी बह रहा था------हर व्यक्ति बुरी तरह हंस रहा था ।

ठहाके लगा-लगाकर--खिलखिलाकर!
 
टार्चर रूम के बाहर बाली गैलरी से धुआं साफ होने लगा ! अव वहां का दृश्य कुछ-कुछ स्पष्ट होने लगा था-सभी बुरी तरह पेट पकडकर हंसते हुए नजर आ रहे थे-सवकै हथियार फर्श पर इधर-उधर पड़े थे…किसी को हंसने से फुर्सत हो तो हथियारों की तरफ ध्यान भी जाए ।

सबकी हालात बैरंग थी ।

आंखों से पानी बह रहा था…पेट पकडकर हंसते सभी गैलरी में इधर-उधर घूम रहे थे ।

'कई तो हंसते इतने पागल हो गए थे कि वे फर्श पर लेटे-लेटे फिर रहे थे-धुआं छंटा-ठाकुर साहव ने अपने ठहाकों पर काबू पाया-------------दौड़कर टार्चर रूम में गए-टार्चर चेयर खाती देखते तुरन्त लोटे---दरवाजे पर खड़े होकर उन्होंने बेतहाशा हंसते जबानों को देखा और चीख पड़े-“ख...खामोश !'

जवानों ने घबराकर उनकी तरफ देख.----कुछ तो -जड़वत सै खडे रह गए और कुछ ठहाका लगा उठे ।

"मैं कहता हुं, चुप रहो-हसो मत !" ठाकुर साहव हलक फाड़कर चिला उठे-“विकास तबस्सुम को हमारी कैद से निकालकर ले गया है-उसे तलाश करो "

हंसने वाले अब संभलकर अपने-अपने शस्त्रों पर झपट पडे ।

............................

अंगूठी रूपी द्रान्समीटर ऑफ करते समय विजय के चेहरे पर झुझलाहट---उलझन और खीज के से भाव थे !

उसके सामने बैठे गुलफाम ने पूछा-“क्या बात है मास्टर दूसरी तरफ से किसने क्या कहा है, जिसे सुनकर आप बुरी तरह चौंके थे?

“लगता है गुलफाम प्यारे कि ये साला अपना दिलवाला सारा खेल ही चौपट कर देगा ।"

"क्यों-क्या किया है विकास ने?"

" हेडववार्टर से तबस्सुम को ले उड़ा।"

"क . .क्या…-?" गुलफाम इस मैं कद्गर उछल पड़ा---- जैसे अचानक ही बिब्छू ने उसे डंक मारा दिया !! शब्द स्वयं ही उसके मुँह से निकलते चले गए-----"म. . . . मगर आपने तो ........ ।"

" यही तो घपला है प्पारे हैडक्यार्टर पर , तैनात टोडे ने अभी-अभी ट्रान्समीटर पर सुचना दी है कि विकास किसी किस्म की गेस का प्रयोग करके वहाँ से तबस्सुम को निकाल ले गया है ।"

"क्या टोडे विकास का पीछा का रहा है?"

" नही----उसने इजाजत मांगी थी,लेकिन हमने इंकार कर दिया !'

" म-मगर क्यों मास्टर?"

" अभी यह विश्वासपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि जिसने किडनेप किया है, वह दिलजला ही हे।"

"म...मगर टोडे की रिपोर्ट-----मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि आप क्या कह रहे है?"

"हमारी बातत बड़े-बड़े बुजुर्गो की समझ मे नहीं आती है प्यारे---- तुम तो अभी बच्चे हो !"

"क्या मतलब मास्टर ?"

-"मुमकिन है कि बह विकास के मेकअप मे तबस्सुम को निकाल ले गया हो?"

गुलफाम का चौका हुआ स्वर----" ऐसा कैसे हो सकता है मास्टर ?"

" तुम टिंकू को भूल रहे हो प्यारे-बह अपने दिलजले की कोठी पर तैनात है--------हमने उससे कहा था कि विकास जैसे ही कोठी से बाहर निकले, हमे ट्रान्समीटर पर सूचना दे--------अभी तक उसकी ऐसी-कोई सूचना नहीं ,आई है, मतलब विकास अभी तक अपने बिल से बाहर नहीं निकला है । जबकि हेडक्वार्टर पर तैनात टोडै की रिपोर्ट है कि तबस्सुम को विकास किडनैप कर ले गया है------क्या इससे नहीं लगता है कि तबस्सुम को किडनैप करने वाला विकास नकली है!"

"मगर-ऐसा भी हो सकता है मास्टर कि टिंकू धोखा' खा हो गया हो------ विकास उसकी तरह नजरों से बचकर कोठी से निकलने में कामयाब हो गया हो?"

किसी बुजुर्ग की तरह गर्दन हिलाते हुए विजय ने कहा------"बिल्कुल हो सकता है-क्यों नहीं हो सकता ?"

"तो फिर ?"

"मामला दोनों तरफ बराबर बराबर है गुलफाम प्यारे----यदि वह विकास ही है सारा मामला सिर के बल लटका रह जाएगा और यदि बह विकास नही है-----यदि यह विकास नहीं है-----कुछ ही देर बाद बापूजान दल-वल सहित बिकास को पकडने कोठी पर जाएंगे-सारी बात सुनकर बिकास चौकैगा-भले ही वह कुछ समझे या न समझे , मगर खुद को पुलिस के चंगुल में कभी नहीं र्फंसने देगा-बह भागेगा ।”

"भागकर वह जाएगा` कहां?"

विजय एकदम उछलकर चीख पड़ा--------------वो मारा साले पापड वाले को?"

"क्या हुआ मास्टर ? "

"पुलिस के चंगुल से निकलकर भागने के बाद फिलहाल अपने दिलजले के पास -कौई जगंह नहीं है- उस जगह को वह सुरक्षित जरूर समझेगा, जहाँ उसने अशरफ आदि को कैद किया होगा !"

"म.....मगर मास्टर----!"

"फिलहाल कुछ देर के लिए तुम अपनी बौलती पर ठक्कन लगा लो प्यारे !" कहने के साथ ही बह अंगुठी रूपी ट्रान्समीटर पर किसी से सम्बन्ध स्थापित करने की कोशिश कर रहा था-------" हैलो टिकु हीयर ओबर !"

"हम है टिकू प्यारे--तुम्हारे उस्ताद के मास्टर !" विजय ने अपने बारे मैं बताने,के बाद पूछा----- " तुम इस वक्त कहां से बोल रहे हो , ओवर !"

"बहीं से -जहां आपने नियुक्त किया था ओवर ।"

विजय ने पूछा…"क्या अभी तक अपना दिलजेला कोठी से बाहर नहीं निकला है, ओवर !”

“नो सर-ओवर !"

"क्या तुम यह रिपोर्ट पूरे विस्वास के साथ दे रहे हो टिंकू प्यारे, ओवर! "

"आप कैसी बात कर रहे है माँस्टर-----मैं कोठी के ठीक सामने सडक के पार बैठा जूते चमका रहा हू----न तो विकास ही बाहर निकला है और न ही उससे मिलने अभी तक कोई यहाँ आया है ।"

"तो अब कुछ ही देर बाद पुलिस उसे गिरफ्तार करने आने वाली है प्यारे-तुम सतर्क हो जाओद------बह किसी भी कीमत पर खुद को पुलिस के चंगुल में नहीं फंसने देगा- वहां से भागना पडेगा-----हालांकि हम स्वयं बहीं आ रहे हैं, पर यदि पुलिस हमसे पहले ही वहां पहुच जाए और बिकास भागे तुम उसका पीछा करना--मगर सावधानी से-अगर उसे अपना पीछा किए जाने का शक हो आया तो सारा गुड़-गोबर समझो !"

"लेकिन मास्टर----आखिर---- ।"

उसकी बात सुने बिना ही विजय ने सम्बन्ध-विच्छेद कर दिया ।
 
तभी गुलफाम बोला…"क्या आप खुद वहीं जा रहे है मास्टर?"

"मजबूरी है प्यारे-----हमें नहीं पता कि उसने अशरफ आदि को यहाँ कर रखा है-हमें उम्मीद है कि वह पुलिस है भाग कर सीधा बहीं जाएगा, अत: संयोग से वहीं तक पहुंचने का जो यह एक मौका मेरे हाथ लगा है-इसे खो नहीं सकते----क्या एक मिनट के अन्दर किसी मोटरसाइकिल का प्रवन्ध हो सकता है?”

"क्यों नहीं मास्टर ! " कहकर गुलफाम एक ही छलांग मे कमरे से बाहर निकल गया

मोटरसाइकिल ठीक फुटपाथ पर बैठकर पालिश कर रहे टिंकू के सामने रोकी----------खुद को पॉलिश करने ने व्यस्त दर्शाते हुए टिंकू ने विजय की तरफ देखा--विजय ने एक नजर सडक के पार रघुनाथ की कोठी पर डाली-----मोटरसाइकिल स्टैंण्ड पर खडी की !

जूता स्टैण्ड पर रखा !

हाथ का जूता एक तरफ ऱखकर स्टैण्ड पर रखे विजय के जूते पर ब्रुश मारना शुरू कर दिया-----बिजय ने थोड़ा नीचे झुककर बहुत धीमे स्वर में पूछा-----"क्या अभी तक पुलिस यहां नहीं पहुंची-है?"

"नहीं मास्टर!''

"ओह-लो प्यारे----बह आ गई बारात ।" विजय ने दाई तरफ से आरहे पुलिस जीपों के काफिले को देखकर जल्दी'से कहा-----चक्कर शुरू होने वाला है प्यारे-लो, इसे अपनी जेब में डाल लो।"

कहने के साथ ही विजय ने एक शुगर क्यूब जैसी चीज उसकी गोद में डाल दी है उसे देखकर टिंकू बोला…"ये क्या. है मास्टर?"

"जेब मे डाल लो प्यारे -----यह तुम्हें हर मुसीबत से बचाएगी------इसकी मौजूदगी मे तुम्हें किसी किस्म की फिक्र करने की जरूरत नही है ----भले ही अनाडीपन से दिलजले का पीछा करो !"

" मै समझा नही मास्टर ?"

" बारात बहुत करीब आ गई है प्यारे---------समझाने क समय नही है----- यदि उन्होंने मुझे देख लिया तो अपने दिलजले से पहले मुझे दबोच लेंगे-----बिकास का पीछा तुम ही करोगे !" कहने के तुरन्त बाद उसने मोटरसाइकल स्टैण्ड से उतारी--किक मारी और पुलिस है वहाँ पहुंचने से पहले ही विपरीत दिशा में दौड्र लियां------जाते जाते उसने टिंकु को शुगर क्यूब उठाकर जेब में डालते देख लिया थे !!!!

...........

विकास ब्रेकों की चरमराहट से ही समझ गया कि उसकी कोठी के लॉन में एक साथ कई पुलिस जीपे रुकी हैं-अगले ही पल भारी बूटों की आवाज उसके कमरे की तरफ आई------- अभी ,वह उछलकर खडा हुआ ही था कि कमरे में दनदऩाते हुए ठाकुर साहब प्रविष्ट हुए-उनकै साथ डी.एस.पी. जैसी रैक के कई अफ्सर थे-----अन्दर आते ही जब उन सबने एक साथ रिवॉल्वर निकालकर उस पर तान दिए तो विकास बौखला गया----वह पुलिस की इस फुर्ती और हरकत का मतलब न समझ सका ।

खुद को जल्दी से संभालकर उसने पूछा----------“क्या बात है नानाजी ?"

"वनने की कोशिश मत करो विकास !" ठाकुर 'साहब गुर्राये !

बिकास की आंखें सुकडी, बोला-----"क्या मतलब?"

"कानून अपने हाथ में लेने का हक किसी को नहीं है।"

"म...मगऱ…मैंने किया क्या है?"

"सीधी तरह बता दो कि तबस्सुम कहा है ?"

"त...तबस्सुम?”

"हां-जिसे तुम पुलिस लॉकअप से किडनैप कर लाए हो ।"

विकास चकरा गया-----"आम्र क्या कह रहे हैं----तो पुलिस हैडक्वर्टर गया भी नहीं!"

" बको मत-तुम् हथेली पर सरसों जमाने की कोशिश कर रहे हो !'

" ओह, समझा ।"' विकास के जेहन में एक धमाका-सा हुआ-मेरी-धमकी से घबऱाकर गुरु ने यह चाल चली है--वह चाहते हैं कि मैं पुलिस- चंगुल फंस जाऊं ताकि अशरफ

आदि महफूज रहे-उनकी कोठी, गुप्त भबन और, राजनगर जलकर राख न हो जाएं।"

"क्या-बकवास कर रहे हो ?"

ठाकुर साहव का वाक्य मानो उसने सुना ही नहीं, लाल आंखें शुन्य में टिकाए-सपाट चेहरे वाला विकास जहरीले स्वर मैं कडकडाता ही रहा-----“मैं समझता हूँ गुरू-आखिर मैं भी आपका शिष्य हूं--------जानता हू कि अपना काम निकालने के लिए आप किस-किस तरह के हथकंडे इस्तेमाल कर सकते हैं ।"

ठाकुर साहव बोले-आगे बडो शर्मा--विकस को हथकडी पहना दो !"

"नही !" चीखकर विकास पीछे हटा।

शर्मा ठिठका, ठाकुर साहब बोले-तो बताओ तबस्सुम कहा है ?"

"वह विजय गुरू रहे होंगे नानाजी-----मैंने उनके चन्द सथियों को मार डालने की धमकी दी है------मेरी धमकी से डर गए है--------------वे मुझें इस डर से पुलिस के चंगुल में फंसा देना चाहते है कि कही मै धमकी पुर्ण ना कर दू !'

"क्या मतलव?"

" लाॅकअप से तबस्सुम को ले जाने वाले मेरे मेकअप में विजय गुरु होगे ।"

“हम तुम्हारी इस बकवास में फंसने वाले नहीं हैं-----रूक क्यों गए शर्मा…आगे बडो ।"

शर्मा ने अभी एक ही कदम बढाया था कि बिजली-सी कौधी-----विकास का जिस्म हवा में ठीक किसी धनुष से छोडे गए तीर की तरह सनसनाया-----पिछले लाॅन में खुलने बाली वन्द खिडकी के शीशे से टकराया---------------खनखनाकर शीशा बिखरा ।।।

विकास पार! !

"'धांय...धांय!" कई रिवॉल्वर गरजे-----मगर देर को चुकी थी-----ठाकुर साहब चीख पडे…“रोको उसे-जाने न पाए पाजीं-शर्मा तुम पीछे पहुंचो-लान मे !"

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कदचित् पुलिस को यह उम्मीद नहीं थी कि यहां इतनी जल्दी ऐसे हालात वन जाएंगे, जैसे जेल से निकलकर कोई कैदी भाग रहा हो !

इसीलिए जब तक सम्मले तब तक विकास अपनी कार में सवार होकर कोठी की न सिर्फ चारदीवारी पार कर गया था, बल्कि सड़क पर एक तरफ को दौढ़ चुका था ।

दुसरे अफसरों के साथ ही ठाकुर साहब भी जीपों की तरफ लपके-अभी वे जीपों तक पहुंचे भी नहीं थे, कि-"धांय... धांय...धांय...धांय !"

किसी अज्ञात दिशा से अन्धाघुन्ध फायरिंग होने लगी ।

सभी हड़बड़ागए ।
 
इस फायरिंग ने सभी को चौका दिया था, क्योंकि ऐसी हरकत करने वाले एकमात्र यानी विकास को उन सभी ने कार लेकर बाहर निकलते देखा था ।

बडी तेजी से हरेक ने पोजीशन ले ली ।

पर वे फाॅयर किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि लाॅन में खडी पुलिस जीपो पर हुए थे----जीपों के लगभग सभी पहिए बैठ गए थे-ठाकुर साहब ने यह ताड़ लिया था कि फायरिंग कोठी की दूसरी मंजिल के एक कमरे से हुई है-उन्होंने उस कमरे की खुली खिड़की की तरफ देखा ।

जेहन मे दो नाम गूंजे रैना और मोन्टो ।

विकास के अतिरिक्त कोठी में सिर्फ वही दो हो सकते हैं---नि:सन्देह यह सोचकर मोन्टो यह काम कर सकता है कि पुलिस विकास का पीछा न कर सके-फिर दिमाग में बड़ी तेजी यह सवाल कौंधा कि क्या रैना भी ऐसाकर सकती है--पहले क्षण दिमाग में -जवाव उभरा----नही ।"

अगले ही क्षण ठाकुर साहब ने सोचा…क्यों नहीं----रैना अपने बेटे को पुलिस के चंगुल से भाग निकलने का मौका देने के लिए ऐसा क्यों यहीँ कर सकती-जरूर कर सकती है---!

जिस बहन ने अपने बेटे से पति के हत्यारे भाई की लाश मांगी हो, वह ऐसा जरूर कर सकती है।

यह विचार दिमाग में आते ही उनका चेहरा कठोर हो गया, हाथ में दबा रिवॉल्वर उस खिड़की की तरफ़ तानकर चीखे ----" कौन है उस ऊपर वाले कमरे मे…सामने आए ।"

सभी की दृष्टि उस कमरे की खुली खिड़की पर चिपक गई ।

ठाकुर साहब एक ही जम्प बाॅलकनी के नीचे पहुच गए-तेजी से भागे-----दूसरी मंजिल पर पहुचे----कमरे में कदम रखा, किन्तु कमरा एकदम खाली था ।

अचानक वातावरण में एक मोटरसाइकिल के स्टार्ट होने की आवाज गूंजी ।

ठाकुर साहब तेजी से खुली हुई खिड़की पर झपटे कोठी की बाउन्ड्री से बाहर सड़क पर उन्होंने एक मोटरसाइकिल को तेजी से दौड़कर विपरीत दिशा में जाते देखा-एक ही पल में -

उन्होंने रिवॉत्वर सीधा करके फायॅर कर दिए ।

परन्तु सवार रिवॉल्वर की रेंज से बाहर हो चुका था ।

" अरे-वह तो शायद विजय है !" ठाकुर साहब जोश में चीख पड़े---" उसका पीछा करो ।"

ऐसा आदेश देते वक्त जोश में है यह भूल गए थे कि पुलिस के पास पीछा करने का कोई साधन शेष नहीं बचा है !

यह विचार दिमाग में आते ही वे झुंझला उठे-खिडकी पर लगभग लटककर चीख पड़े---"शर्मा-वायरलेस पर शहर में गश्त कर रहीं पैट्रोल कारों को उनकी जानकारी दो-आदेश दो कि उनमें से एक भी बचकर न निकल पाए।"

आदेश होते ही शर्मा वायरलेस जीप पर झपटा।

ठाकुर साहब भागते हुए कमरे से बाहर निकले-रह-रहकर वे रैना और मोन्टो को पुकार रहे थे-मगर उत्तर में कहीं से कोई आवाज सुनाई न दी-उस वक्त तो उनके दिमाग में सैकडों प्रश्न चकराने लगे थे, जब पूरी कोठी छान मारने पर भी उन्हें कहीं मोन्टो या रैना न मिल सके।

सारी कोठी खाली पडी थी ।

विकासं की कार सुनसान पडी सडक पर उडी चली जा रही थी-----गति विकास की जिन्दगी के समान ही तेज थी, फिर भी लडके की दृष्टी रह…रहकर 'बेक-व्यू-मिरर' पर पड़ती ।

एक मोटरसाइकिल अब भी उसे नजर आ रही थी ।

कोठी से भागते ही बिकास ने ऐसे ऊटपटांग रास्ते अपनाए थे कि यदि पुलिस पीछा या वायरलेस की मदद से उसे घेरने की कोशिश करे तो धोखा खा जाए-उस वक्त उसका पूरा ध्यान खुद ,को पुलिस की निगाहों से ओझल कर लेने की तरफ था ।

मोटरसाइकल सवार की तरफ वह ध्यान नहीँ दे पाया… था ।

मगर अव वह महसूस कर रहा था कि यह मोटरसाइकिल उसकी कोठी के बाहर से ही निरन्तर उसके पीछे है-भीड़-भरी सडकों पर तो वह कई बार मिर्र से ओझल भी हुई थी, किन्तु सूनी सड़क पर तो वह बराबर मौजूद रहीँ थी ।

विकास को यकीन हो गया कि मोटरसाइकिल सवार उसका पीछा कररहा है ।

बडी तेजी से उसके जेहन में यह सवाल उठा कि वह कौन हो सकता है?

इस वक्त तीन किस्म के लोग उसका पीछा कर सकते हैं--"पुलिस-उस कथित मुजरिम का कोई आदमी , जिसका दिमाग इस सारे वखेड़े के पीछे काम कर रहा है या विजय का आदमी ।

उसे शीघ्र ही कहीं शरण लेनी थी------ज्यादा सोचने-समझने का समय नहीं था…वह जानता था कि अगर वह ज्यादा देर तक राजनगर की सडकों पर चकराता रहा तो शीघ्र ही उसे पुलिस की पैट्रोल कार इस तरह घेर लेगी कि वह ऐडी…चोटी का जोर लगाने के बावजूद भी निकल नहीं सकेगा ।

काफी देर से वह यह सोच रहा था कि पीछा करने वाले का क्या करे?
 
एक बार यह विचार दिमाग में आया कि फिलहाल वह इसे डाँज देकर निकल जाए-----------तभी उसने सोचा कि ऐसा करने पर यह रहस्य रहस्य ही रह जाएगा कि वह किसका आदमी है-पहली बार इस मोटरसाइकिल सवार के रूप में उसके सामने ऐसा कोई व्यक्ति आया है, जिसका सम्बन्ध उसके तीन दुश्मनों में से किसी एक से निश्चय ही है----अतः इसे हाथ से नही निकलने देना चाहिए !!!

विकास ने आश्चर्यजनक ढंग से एकदम ब्रेक लगा दिए!

घबराकर मोटरसाइकिल सवार ने भी ब्रेक लगाए, परन्तु कार और मोटरसाइकिल के ब्रेकों में जमीन-आसमान का अन्तर होता है- गाडी तो थोडी आगे जाकर जाम हो गई, जबकि

मोटरसाइकिल लड़खड़ाती हुई कार के काफी निक़ट तक चली आई ।

विकास ने रिवॉल्वर निकालकर उसके अगले टायर पर फायर किया ।

टायर के परखच्चे उड़ गए--मोटरसाइकल उछलकर जा गिरी----टकी फटी-पेट्रोल गर्म इंजन पर गिरा और 'फ़क्त' से आग लग गई, किन्तु टिंकू यह सब कुछ होने से पहले ही मोटरसाइकल से कूद चुका था-वह सडक से उठकर तेजी से एक तरफ भाग क्या है ।

कार से बाहर निकलकर विकास गर्जा-"रुक जाओ--- वरना गोली मार दूंगा।"

वह नहीं रूका ।

विकास ने उसके भागते कदमों पर गोली चला दो ।

अचूक लक्ष्य ।

टिंकू के कंठ से एक चीख निकली-लड़खंड़ाकर वह मुंह के बल सडक पर गिरा !!!!!

हाथ में रिवॉल्वर लिए लम्बा लड़का लम्बे-लम्बे कदमों के साथ उसकी तरफ़ दोड़ा-----जिस वक्त टिकु पुन: खड़ा होकर भागने की कोशिश कर रहा था , उस वक्त विकास उसके सिर पर पहुँच गया-----झपटकर उसने टिंकू का गिरेबान पकडा और … जबडे पर रिवाॅल्बर का दस्ता दे मारा ।

एक जबरदस्त चीख…चेहरे का भूगोल बिगड गया ।

इस बार जब वह सड़क पर गिरा बेहोश हो चुका था !

पहले विकास ने जांच की कि वह सचमुच बेहोश हुआ है या नाटक कर रहाहै !

आश्वस्त होने कै बाद उस ने टिंकू के जिस्म को रुई के बबुए की तरह उठा कर कन्धे पर डाला ओंर रिवाॅल्बर जेब मे रखकर कार की तरफ बढ गया----सडक पर पडी धू धू करके जल रही मोटरसाइकिल के समीप से गुजरते वक्त बुरा-सा मुंह बनाया-----बेहोश टिकु को कार की पिछली सीट पर डाला।

कार एक झटके सेआगे बढ़ गई।

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एक होटल के केबिन मे बैठे विजय की आंखें मेज पर रखी छोटी सी "विराम गडी' पर टिकी हुई थी…बह विराम घडी किसी वस्तु की दिशा और दूरी बता रही थी ॥

हरी सुई दिशा बता रही थी और लाल रंग की सूई दूरी ।

हरी सूई दक्षिण दिशा में लगभग स्थिर-सी हो गई थी,

जबकि लालल सुई निरन्तर गतिशील थी-विजय ध्यान से उसे देख रहा था---अब दस किलोमीटर से आगे निकलनी शुरू हो गई थी-------जाने क्या मिलाने के लिए उसने रिस्टबॉंच पर नजर डाली ।

एकाएक केबिन के बाहर से पदचार्पो की ध्वनि उभरी ।

विजय ने जल्दी से विराम घडी पर हथेली रख ली…घड्री इतनी छोटी थी कि वह छुपकर रह गई…वेटर' ने मेज पर कॉफी रखी और पर्दा व्यवस्थित करता हुआ चला गया ।

अब घडी पर दृष्टि टिकाए विजय कॉफी सिप करने लगा--अभी वह आधी काॅफी भी सिप नहीं कर पाया था कि लाल सूई रूकी गई-वह सत्रह किलोमीटर के निशान पर स्थिर हो गई थी-------विजय ने रिस्टवॉच में समय देखा ।

विराम घड्री उठाकर जेब में डाली और फिर कॉफी खत्म करने के अन्दाज में लम्बे-लम्बे घूंट भरने लगा…शीघ्र ही उसने मग खाली करके मेज पर रखा-एक बार फिर जेब से विराम घडी निकालकर देखी और उठ खड़ा हुआ ।

॥॥॥॥॥॥॥

विकास की कार सीधी पुराने 'मांडल की उस इमारत के पोर्च में रुकी----वह बाहर निकला-------पिछली सीट से टिंकू का बेहोश जिस्म उठाकर कंधे पर डाला और इमारत के द्वार की

तरफ़ बढ़ गया-------दरवाजे पर इस वत्त भी ताला लटका हुआ था, जिसे विकास ने जेब से चाबी निकालकर खोला ।
 
गेलरी पार करके वह अभी एक कमरे में पहुंचा ही था कि हाथ में रिवॉल्वर लिए मोन्टो सामने आ गया-----इस वक्त वह किसी भी किस्म के खतरे का मुकाबला करने के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रहा था, किन्तु विकास को देखते ही उसने रिवाॅल्बर जेब मे डाल लिया।

"कहो मोन्टो सब ठीक है न?”

सांकेतिक भाषा में जवाब देने के बाद मोन्टो ने उसी भाषा में यह पूछा, कि ये किसे उठा लाए…बिकास ने कहा…"फिलहाल इसे एक कुर्सी से बांघकर होश में लाना है !"

मोन्टो फुर्ती से सारे प्रबन्ध करने लगा।

जिस वक्त रेशम की डोरी की मदद से कुर्सी पर बँधे टिंकू को होश आ रहा था, तब तक विकास उसे बता चुका था कि वह इसे क्ति हालातों में यहाँ लाया है ।

टिंकू ने आंखें खोली ही थी कि विकास ने झपटकर दोनों हाथों से उसका गिरेबान पकड लिया-----गुर्राया-----"बोलो कौन हो तुम और मेरा पीछा क्यों कर रहे थे ?"

" आपका पीछा?" टिंकू ने अनभिज्ञता जाहिर की ।

' आपको गलतफहमी हुई है-----मि आपका पीछा नहीं..; ।" वाक्य पूरा होने के पहले ही 'भड़ाक' से उसके चेहरे पर विकास का घूंसा पड़ा-----टिंकू के कंठ से एक चीख निकली------कुर्सी उलटने ही वाली थी कि विकास ने झपटकर उसके साथ बंधे टिकु के लम्बे बाल पकड़ लिए…र्टिंकू झूलता-सा रह गया, जबकि विकास कह रहा था---"इसपे शक नहीं कि तुम मेरा पीछा कर रहे थे और जब पीछा कर ही रहे थे तो मैं दाबे के साथ कह सकता हूं कि मेरा नाम भी जानते होगे और मेरा नाम जानने वाला हर शख्स जानता है कि विकास जब अपने चंगुल में फंसे किसी व्यक्ति की जुबान खुलबाता है तो चमडी तक उधेड़ लेता है-----------आज तक मुझें एक व्यक्ति ऐसा नहीं मिला है, जिसकी जुबान मेरे चंगुल में फंसने के वाद बन्द रही हो--बोलो---सीधी तरह सब कुछ बताते हो या पहले चमडी उथड़वाना पसन्द करोगे?"

"मैं नहीं जानता कि आप कौन है और क्या कह रहे है !"

बस-----अपने मुंह से टिंकु के लिए यह, वाक्य निकालना मानो गजब हो गया-एक नही विकास के लगातार देर सारे प्रहार उसे सहने पड़े------चीख के बाद चीखें ही गूंजती चली गई-------------सारा चेहरा खून से लथपथ हो गया-----किंसी जुनूनी के समान विकास उसे मारता चला गया ।

यहाँ तक कि वह बेहोश हो गया !

विकास के घुटने की अन्तिम चोट से कुर्सी पीछे-उलट गई---- तभी उसकी जेब से एक शुगर क्यूब जैसी चीज़ है निकलकर फर्श पर लुढ़कती चली गई ।।।

विकास के साथ ही मोन्टो की दृष्टि भी उस पर जम गई ।

विजय मोटरसाइकिल को सुनसान इलाके में स्थित पुराने मांडल की इमारत के सामने से गुजारता चला गया----हां,, इसी समय में उसने इमारत के पोर्च में खडी विकास की कार जरूर देख ली थी----आधा फर्लाग के करीब निकल आने के बाद उसने मोटरसाइकिल रोकी ।

उसे खींचकर समीप वाली झाडियों में डाला और खुद पैदत ही सड़क छोड़कर खेतों में से होता हुआ इमारत के पिछले भाग की तरफ बढ़ गया…इस वक्त वह बिल्कुल मस्त नजर आ रहा था, तभी तो दोनों हाथ पंतलून की जेब में डाले सीटी बजाता चला जा रहा था ।

अपनी यह मुद्रा उसने-पदयात्रा की समाप्ति यानी कोठी के पीछे जाकर ही तोडी------------इमारत तीन मंजिली थी, किन्तु इस तरफ कहीं भी कोई, गन्दे पानी का पाइप नजर नहीं आ रहा था ।

'उसने अजीब से ढंग से मुंह पिचकाया।

फिर कोई ऐसा स्थान ढूंढने लगा, जहां से वह किसी कमरे की खिड़की तक पहुच जाए-----------कोशिश करने पर उसे दाई तरफ शीघ्र ही ऐसा स्थान मिल गया------एक जंगला था-जंगले के ऊपर उसका लेटर शेड…शेड के ऊपर दूसरी मंजिल की बाल्कनी------बाल्कनी के नीचले भाग मे बहा लोहे का मोटा छल्ला लटक रहा था ।।।

-हालांकि किसी साधारण व्यक्ति के लिए इस रास्ते 'से चढ़ना असम्भव. की सीमा तक कठिन था, किन्तु इस किस्म के कामों का अभ्यस्त विजय थोड़े से परिश्रम के बाद ही दूसरी मंजिल की बालकनी में पहुच गया ।

उसने सभी खिड़की और दरवाजों परं दबाव डाला ।। बे अन्दर से बन्द थे-किस्मत से उसे एक ऐसी खिडकी मिल गई, जिसके किवाड़ अन्दर की तरफ खुलते चले गए।

चौखट पार करके वह निशब्द गैलरी में कूद गया ।

गैलरी सुनसान पडी थी।

विजय का रिवॉल्वर जेब से निकलकर हाथ में आ गया…एक-एक नजर उसने गैलरी में दोनों तरफ डाली----फिर रिवॉल्वर सम्भालकर एक तरफ़ बढ़ गया-उसके कान हल्की सी आवाज को भी सुनने के लिए पूरी तरह तैयार थे-चारों तरफ गहरी खामोशी छाई थी और जाने क्यों अब यह खामोशी रहस्यमय-सी महसूस होने लगी थी…।

वह सीढियों के सिरे पर पहुंचा----सीढियां सीधी ग्राउण्ड फ्लोर के हाॅल में जाकर खत्म होती थी-सीढियां उतरने के लिए अभी उसने पहला कदम बढाया ही था कि अपने पीछे से हल्की-सी आहट का अहसास पाकर विद्युतीय गति से घूमा, परन्तु घूमते हुए विजय के कुल्हे पर एक चमकदार बूट की जबरदस्त ठोकर पडी-बिजय का बैलेंस बिगडा-गिरा और फिर सीढियों पर लुढ़कता ही चला गया, किन्तु अपने हाथ से उसने रिवॉल्वर नहीं निकलने दिया।

हाल के फर्श पर पहुंचते ही उसने रिवॉल्बर बाला हाथ घूमाया -रुख अभी संढियों के शीर्ष तरफ घूमा ही था कि------" धांय !"

विजय के हाथ से रिवॉल्वर निकलकर दुर जा गिरा। हाथ झनझना उठा-हाथ को अजीब से अन्दाज में झटकते हुए विजय ने ऊपर देखा-सीढियों के शीर्ष यानी सबसे ऊपर बाली सीढी पर विकास खड़ा था।

हाथ में रिवॉल्वर' लिए ।

नाल सै अभी तक धुआं निकल रहा था---------विजय ने देखा कि बिकास के चेहरे पर इस वक्त दूर-दूर तक सिर्फ नफरत ही नफरत थी----------उसके चेहरे-का गोरा रंग बिल्कुल काला नजर आ रहा था-आंखें यूं भभक रही थी, जैसे अंगारे हो----उसके एक हाथ में रिवॉल्वर था और दूसरे हाथ की मुट्ठी कसी हुई थी…बार-बार फूलते-पिचकते जबडों के मसल्स स्पष्ट चमक रहे वे----इस वक्त विकास का ऐसा रूप विजय के सामने था कि एक बार को तो विजय जैसे व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी में भी सिहरन-सी दौड गई…सारा जिस्म झुरझुरा गया अगले ही पल सम्भलकर बोला--------------" ये क्या बात हुई प्यारे------बादे के मुताबिक हमारी कुश्ती तो आज रात दस बजे होनी थी न?"

एक सीढी उतरते हुए विकास ने कहा-----" मगर आपको मरने की जल्दी थी ।"

“वह कैसे प्यारे ?"

"खुद को बहुत ज्यादा चालाक समझते हैं न आप-मेरे मेकअप में तबस्सुम को उडा ले गए…सिर्फ इसलिए कि पुलिस मेरे पीछे पड जाए-आपने सोच लिया था कि पुलिस से बचने के लिए मैं वहीं-शरण लूगा, जहाँ अशरफ आदि को कैद किया गया हे…सचमुच आप बहूत चालाक हैं गुरु-अपने एक आदमी को ऐसे अनाडीपन से मेरा पीछा करने का हुक्म दिया, है जिससे कि मैं ताड जाऊं कि मेरा पीछा हो रहा है-आप जानते थे कि पीछा करने वाले को कब्जे में करके यहाँ ले आऊंगा----------------उसकी जेब में शुगर क्यूब की शक्ल मे एक छोटा, मगर शक्तिशाली ट्रान्समीटर डाल दिया दिया-------जिसका सम्बन्ध एक विराम घड्री से था और अपनी योजना के मुताबिक आप बिराम घडी की मदद से यहां तक पहुंच गए ।"

'तो तुम सव कुछ समझ गए प्यारे?"

"तभी पहले से ही यहां आपके स्वागत का प्रवन्ध था।"

"कम चालाक तुम भी नहीं हो!" .

व्यंग्यभरी मुस्कान--------“आखिर शिष्य किसका हू ?"

"लेकिन -------!"

"माफ करना गुरु--सामने पहुँचते ही चरण स्पर्श न करने की गुस्ताखी कर बैठा हूं-ये लीजिए !” कहने के साथ ही उसने ट्रिगर दबा दिया-गोली सीधी विजय के चरणों के समीप फर्श में धंस गई ।

बिजय उछला।

“डरो नहीं गुरु-बिकास के पिता का हत्यारा इतनी आसान मौत नहीं मर सकता।"
 
तभी वहां एक अन्य फायॅर की आवाज गूंजी------यह दूसरी गोली थी, जो उसके चरणों के समीप फर्श में जा धंसी------यह गोली विकास के रिवॉल्वर से नहीं चली थी, इसलिए फुर्ती से घूमकर उस तरफ़ देखा-----रिवॉल्बर एक रोशनदान पर बैठे मोन्टो के हाथ में था-उसे देखते ही विजय कह उठा----"ओह-तुम भी यहीं हो प्यारे…राहू-केतू-मगर तुम यहाँ क्यों…लटके हुए हो गान्डीव प्यारे!"

"आपकी हत्या करने में मोन्टो मेरी कोई मदद नहीं करेगा गुरू !"

"क्यों प्यारे?"

नीचे उतरते हुए विकास ने कहा-----" उसे समझा दिया गया है ।"

.'"हो सकता है कि उसकी समझ में न आया हो प्यारे?" विजय ने अजीब-सा मुह बनाया ।

उसकी बात पर ध्यान न देकर विकास घीरे-धीरे बराबर सीढियां उतरता हुआ बोला----------" मै जानता हू कि आप यहाँ मेरी कैद से अशरफ आदि को निकालने का मकसद लेकर आए थे यह निश्चय कर चुका हू गुरु कि आने वाले चन्द क्षणों बाद या तो मैं जिन्दा रहूगा या आप…ये मैं नहीं कह सकता कि आप ही मरेंगे या मैं, इसलिए बता रहा हु---यदि मैं मर जाऊं तो जहां आप खड़े हैं, वहां से दाई तरफ एक गैलरी है-गैलरी में तीसरा कमरा आपके काम का है-उसमें एक स्विच बोर्ड लगा है-----------बोर्ड का ऐक स्विच ऑन करने पर आपकी भेंट अपने साथियों से हो जाएगी ।"

"बताने के लिए शुक्रिया प्यारे? '

"मुमकिन है कि आप मर जाएं, इसलिए उससे पहले आप से अपने चन्द सवालों का जवाब चाहूंगा !"

"ज़रूर प्यारे?"

" अपने डैडी क्यों मारा ?"

" हमारी जानकारी में वह मोन्टो के बाद रैना बहन को मी गोली मारने वाला था !"

"उन्हे रोकने के लिए आप सिर्फ उनकी टांग में मैं गोली मार सकते थे…ठीक इस तरह !”

कहने के साथ ही लड़के ने ट्रिगर दबा दिया------'धांय' की एक जोरदार आवाज के साथ रिवॉल्वर से एक शोला लपककर विजय की बाई टांग में घुटने के नीचे धंस गया ।

बिजय कंठ से एक चीख निकली-चकरधिन्नी की तरह वह घूमा और फिर 'धड़ाम' से फर्श पर गिर गया-----आखे फैल गई उसकी------------सचमुच उसने विकास से एकदम इतनी बेरहमी की उम्मीद नहीं की थी, इसी वजह से वह संग आर्ट का प्रदर्शन करके गोली से न वच सका।"

उसी रफ्तार से नीचे उतरता हुआ विकास गुर्रा रहा था------"जो बात मैं कहना चाहता हू वह शायद अब आपकी समझ में अच्छी तरह आ गई होगी-------बोलो गुरू-------मेरे सवाल का जवाब दो…उन्हें रोकने के लिए आखिर आपने उनकी टांग में गोली क्यों नहीं मार दी?”

"उस वक्त जल्दी में हम यह नहीं सोच सके !"

'धांय !'

इस बार शोला विजय की दाई टांग पर झपटा था, विजय न सिर्फ रबर के किसी बबुए की तरह उछलकर खुद को बचा गया, बल्कि अब वह फर्श पर एक ही टांग पर फुदक भी रहा था-------उसी मुद्रामे सीढियां उतरते हुए विकास ने कहा------------"ये मैं नहीं मान सकता गुरु-"

"क्यों नहीं मान सकते प्यारे?"

"क्योंकि जानता हूं कि आप कठिन-से-कठिन हालातों मैं भी अपने दिमाग से नियन्त्रण नहीं खोते हैं------मै ऐसा नही मान सकता कि आप नियंत्रण खो सकते हैं !"

"अब इस बात का तो मेरे पास कोई जवाब नहीं है प्यारे !"

"मेरे पास है ।"

"क्या?"

"धांय-धांय !"

इस बार-निकास का रिवॉल्वर एक साथ दो बार गर्जा------ एक ही पैर पऱ किसी बन्दर के समान उछलकर विजय न सिर्फ स्वयं को बचा गया, बल्कि पलक झपकते ही उसने फर्श पर पड़ा अपना रिवॉल्वर उठाकर फायॅर भी झोंक दिया-----विजय के रिवाॅल्बर से निकलकर दहकती हुई बुलेट सीधी विकास के रिवॉल्वर की नाल में आ फंसी-------विकास ने ट्रेगर दबाया, लेकिन कोई गोली बाहर नहीं निकली--अगले ही पल उसने रिवॉल्वर ही खींचकर विजय के हाथ में दबे रिवॉल्वर पर मारा ।

आपस में गुथे-से दोनों रिवॉल्वर फर्श पर जा गिरे। सभी सीढियां तय करने के बाद विकास नीचे पहुंच चुका था-एक भी शिकन नहीं थी उसके चेहरे पर…पत्यर कोयले की तरह काला-सख्त एवं खुरदरा चेहरा-आंखों में सिर्फ

हिंसा, जबकि विजय इस वक्त भी अपने एक पैर पर फुदक रहा था-उसके जख्म से खून की बूंदे टपक रही थी, परन्तु उनकी परवाह किए विना विजय विकास के हर आक्रमण का

मुकाबला करने के लिए तैयार था !

-विकास निरन्तर उसकी तरफ़ बढ़ता हुआ बोला---------“मेरी मां ने आपकी लाश मांगी है गुरू-------उन्हे इस बात से मतलब नहीं कि उसमें थोड़ा बहुत खून हो या नहीं-+++----खून का हिसाब मुझे चुकाना है…डैडी के खून की एक-एक बूद का बदला लूगा मैं ।"

" उसके लिए हम तैयार हैं प्यारे, लेकिन. . !'

लड़का ठिठका, बोला-------“लेकिन क्या?"

"उससे पहले हम उस मुजरिम... ।"

मगर-विजय का वाक्य पूरा होने से पहले ही विकास ने ठीक किसी चीते की तरह उछलकर विजय पर जम्प लगा दी---विजय सही समय पर किसी फिरकर्नी के समान घूम गया---------- झोंक में विकास 'मुंह के बल फर्श पर गिरा-बिज़य झपटकर उस पर जम्प लगा दी और अगले ही पल उसके मजबूत हाथों में विकास की गर्दन थी -विजय जानता था कि यदि बिकास को मौका दे दिया गया तो फिर वह चूकेगा नहीं------------विकास के ऊपर पडा वह उसकी गर्दन दबाता ही चला गया ।

विकास छटपटा उठा ।

चेहरा सुर्ख पड़ता चला गया------------------------आंखें और जीभ उबल पडी-चेहरे और आंखों की एक…एक नस स्पष्ट चमकने लगी थी------हाथ-पैर सुन्न-से पड़ते चले गए----------गर्दन के आर-पार खून का दौरा एकदम रुक गया -विकास अपने हार्थों से अपने ऊपर से धकेलने की भरपूर चेष्टा कर रहा था, किन्तु कामयाब न हुआ---विकास को लगा कि अब वह कभी इस फौलादी पकड़ से मुक्त न हो सकेगा----फिर भी, अन्तिम कोशिश के रूप में उसका दायां पैर विजय की बाई टांग पर सरसरा रहा था ।

फिर विकस के बूट की नोक विजय के जख्म पर स्थिर हो गई ।

एक ही झटके में उसने नोक जख्म में घुसेड़ दी।

विजय के मुंह से मर्मान्तक चीख निकली-क्षण-मात्र के लिए उसकी पकड विकास की गर्दन पर ढीली पड़ी और विकास ने पूरी बेरहमी के साथ सिर की टक्कर विजय के नाक पर मारी ।

एक विलबिलती--सी चीख के साथ विजय दूर जा गिरा । विकास किसी 'रबर' के बबुए की तरह उछलकर खडा हुआ-------------फिर उसकी लम्बी टांग चली-----वूट की ठोकर विजय के जिस्म पर यूं पडी जैसे बह विजय का जिस्म नहीं, बल्कि फुटबॉल हो ।

एक बार जब विकास हावी हुआ तो उसने सांस न लिया… बिजय को मारता ही चला गया वह-यहां तक कि विजय जब अन्त में फर्श पर गिरा तो वह हिला तक नहीं निश्चल पड़ा रह गया…मुंह से कोई आबाज भी नहीं .निक्ल रही थी---स्थिर-सा खड़ा विकास, उसकी तरफ देख रहा था------एकाएक ही लड़के की आंखें भरती चली गई । अजीब से स्वर में बोला---"नहीँ गुरु--सिर्फ बेहोश होने से काम नहीं चलेगा-मां ने आपकी लाश मांगी है--उनके कदमो में आपकी लाश ही ले जाकर डालूगा मै !"

आंखों उबलते हुए आँसू फर्श पर गिरे।

हाथ में रिवॉल्वर लिए खड़ा-सा मोन्टो विकास को रोता हुए देख रहा था…विकास उसी मुद्रा में आगे वढा-बिजय के समीप जाकर झुका हाथों से उसका गिरेबान पकडा लडके ने…ज़बरदस्ती उठाकर उसके ढीले-डाले शरीर को अपने सामने-खड़ा करके बोला-----"पानी लाओ मोन्टो-इन्हें होश में लाना है न तो विकास के पिता के हत्यारे की मौत इतनी आसान हो सकती है और न ही विकाश के गुरु इतनी आसानी से मर सकते हैं--- संघर्ष करना होगा-यदि विजय गुरु यूं मर गए तो लोग कहेंगे… ।"

"आ-एह-ई--ई---ई-" विकास के मुह से निकलने वाले आगे के शब्द एक दर्दनाक और लम्बी चीख में बदल गए--हुआ यूं कि जिसे विकास ने बेहोश समझा था , एकाएक ही उसके दाएं पेर का घुटना बिजली की सी गति से उसकी जांघों के जोड पर पड़ा-प्रहार इतना सख्त और अप्रत्याशित था कि बिलबिलाता हुआ विकास झुका-तभी--------!"

विजय का दुहत्थड़ उसकी गुद्दी पर पड़ा ।

विकास का चेहरा फ़र्श से जा टकराया !
 
"भड़ाक' से विजय ने उसके सिर में बूट की ठोकर मारी- चीख के साथ विकास ने उसकी टांगे पकडने के लिए दोनों हाथ फैलाए----विजय उछलकर उसके पीछे पहुचा-----------------दोनों टांगें पकडी और फिर फ़र्श पर किसी फिरकनी की सी तेजी के साथ घूम गया----------उसके हाथों में लटका विकास का उल्टा जिस्म भी घूम रहा था ।

देर सारे चक्करों के बाद विजय ने उसे छोड़ दिया ।

बिकास हाॅल की एक दीवार से जा टकराया---------फ़र्श पर गिरा--------सम्भलकर खडा हुआ ही था कि हवा में लहरा रहे बिजय की फ्लाइंग किक उसके चेहरे पर पडी।

गर्ज यह कि इस बार हावी होने बाद विजय ने उसे सम्भलेने का हल्का सा भी मौका नहीं दिया…पानी लेने के लिए जाता हुआ, मोन्टो ठिठककर इन दृश्यों को देखने लगा था ॥॥॥॥॥

अत्त में विजय की एक 'कर्राट' के बाद विकास बेहोश होकर फर्श पर गिर पड़ा ।

सावधानीपूर्वक उसने विकास की बेहोशी को चैक किया।

आश्वस्त होने के बाद उसने मोन्टो की तरफ़ र्देखा-सांस बुरी तरह फूली हुई थी-फिर भी उसने अजीब से ढंग से पटापट-पटापट मोन्टो को आंखें मारनी शुरू कर दी----जाने मोन्टो' को क्या हुआ कि रिवॉल्वर सीधा करके उसने एक साथ दो फायर विजय पर झोंक दिए !

विजय ने दोनों ही गोलियों को संग आर्ट से धोखा दिया और बोला---" क्या बात हुई गान्डीव प्यारे---कम-से-कम तुम्हें तो हमारा साथ देना चाहिए-भले ही जिसे तुलाराशि ने मारा था, , वह तुम नहीं थे…मगर हमने तो यही समझा था न कि तुम मर गए--------------हमने तुम्हारी ही मौत का बदला लेने के लिए तुलाराशि का राम नाम सत्य करा दी और उल्टे तुम ही हमें।"

घृणा से फर्श पर थूक दिया मोन्टो ने-जैसे उसे यह बात पसन्द न आई हो…गुस्से में भुननुनाते हुए उसने अपने रिवॉल्वर मे बची शेष तीन गोलियाँ भी विजय पर चला दी !

किन्तु मजाल है कि एक भी गोली विजय को छं जाए-----समी गोलियाँ हाॅल की दीबारों में जा धंसी-अंत में मोन्टो ने खुद विजय पर जम्प लगा ही ।

विजय ने उसे किसी छोटे से बच्चे की तरह हवा में ही लपका और घुमाकर एक दीवार पर दे मारा ।!।!

ची-ची की आबाजं के साथ वह फर्श पर निरा ।

मोन्टो बेहोश हो चुका था-लंगड़ाता हुआ विजय गेलरी की, तरफ बढ़ गया ।

"मैं कहता हू मान जाओं जुलिया----------------------रोक तो इस अनर्थ को-----अब भी समय है-इस खूनी खेल में तुम्हारा अपना वेटा

भी मौत के घाट उतर सकता है !"

मोटी-मोटी जंजीरों में कैद जैकी अर्द्धविक्षिप्तों की-सी अवस्था में चीखे चला जा रहा था ।

वैसी ही मोटी जंजीरों में कैद जूलिया कह उठी…"वह सिर्फ मेरा बेटा ही नहीं है ।"

"जूलिया !"

"मेरा हैरी अमेरिकी सीक्रेट सर्विस कां नम्बर वन एजेन्ट भी है------मै उसी सीक्रेट सर्विस की चीफ हूं-----मेरा काम दुनिया से अमेरिकी दुश्मनों को खत्म करना है और चीफ की हैसियत से मैं हैरी को हमेशा यही आदेश देती रही हुं-----विजय और विकास अमेरिका के सबसे वड़े दुश्मन है-------यदि हैरी उन्हें आपस में भिड़ाकर खत्म कर सकता है तो मैं क्यों न करने दूं ?"

"ल...लेकिंन वह यहां किसी और मकसद से आया है ।"

"में जानती हूं !" गम्भीर स्वर में कहती हुई जूलिया की दृष्टि जैकी के कटे हुए बाएं हाथ पर जम गई-----हाथ हथेली के अन्तिम सिरे से थोडा ऊपर से कटा हुआ था-----वहां से , जहां रिस्टवॉच बाधीं जाती है, बोली------* वह आपकै इस कटे हुए हाथ का बदला लेने भारत आया है ।"

"जबकि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए।"

" क्यों? "

"माना कि यह हाथ विकास ने काटा है-मगर हाथ धर्मयुद्ध के बीच कटा है जूलिया-वह धर्मयुद्ध भी विकास के साथ खुद मैंने ही शुरू किया था-इसमें विकास का कोई दोष नहीं है--------मेरा चक्रव्युह तोड़कर वह जैकी विजेता-वन गया--------धर्मयुद्ध की समाप्ति के साघृ ही वह अध्याय भी बन्द होना चाहिए ।"

"आपकी इस विचारधारा की ये दिली तौर पर हमेशा समर्थक रही हू ------------सचमुच आपका हाथ कटने मैं विकास का कोई दोष नहीं -बह घृर्मयुद्ध था------आपके द्वारा शुरु किया गया धर्मयुद्ध------वह अध्याय सचमुच विकास की जीत के साथ बन्द हो जाना चाहिए, लेकिन... ।"

"ल---- -लेकिन----!"

"आपके बेटे को कौन समझाए?" .

"तुम जुलिया , यदि तुम उसे समझाना चाहो तो हैरी ये खूनी खेल बन्द कर देगा !"

“आपकी तरह, आप ही के सामने उसकी मां और आपकी पत्नी होने की हैसियत से मैंने भी उसे समझाने की भरपूर कोशिश की----------------उसी का तो यह परिणाम है कि आपकी तरह मैं भी यहाँ मोटी-मोटी जंजीरों में बधी उसकी कैद में पड़ी हू-----आपसे उसने खूब पूछा कि आपका ये हाथ किसने काटा आपने नहीं बताया-----------उसने मुझसे भी पूछा--------मैंने भी नहीं बताया-----------------क्योंकि हम जानते, थे कि हैरी का खून गर्म है--------------यह मालूम होते ही कि यह हाथ विकास ने काटा हैं वह पागल हो जाएगा---धर्मयुद्ध के महत्व को न समझकर वह विकास से बदला लेने के लिए निकल पडेगा---------आपकी तरह मैं भी नहीं चाहती थी कि ऐसा हो-----------इसीलिए मैंने भी उसे कभी न बताया, किन्तु माइक से उसे सच्चाई पता लग गई ----सच्चाई पता लगने . पर वहीं हुआ, जिसका हमें डर था---------------चीखता-चिंघाड़ता और गुस्से में पागल हुआ हैरी धर आया------------विकास से इस कटे हाथ का बदला लेने की कसम खाई उसने-आपके साथ मैंने भी उसे समझाया---------------धर्मयुद्ध का महत्व बताना चाहा, लेकिन वह नहीं माना-हमने उसका विरोध किया…यह धमकी दी कि यदि उसने ऐसा किया तो हम विकास के साथ मिल का उसके सामने खड़े होंगे----उसने-हम ही को कैद कर लिया !"

" लेकिन-तुम इस मामले में हमेशा दुहरे व्यक्तित्व का प्रयोग करती रहीं हो जूलिया !"

"मैं समग्री नहीं ।"

"तुमने हैरी की मां और मेरी पली के रूप में निसंदेह, उसका _ विरोध किया है, परन्तु सीक्रेट सर्विस की चीफ के नाते तुमने उसे भारत आकऱ विकास से टकराने के लिए भडकाया है-------तुमने खुद ही बताया कि माइक से सच्चाई पता लगने पर वह घर से पहले सीक्रेट सर्विस के आँफिस मेँ तुमसे मिला--------विकास से बदला लेने के लिए भारत में मदद चाही तुमने न सिर्फ उसे इजाजत और मदद दी, बल्कि बह ककहकर उसे उकसाया भी कि उसे हर हालत में अपने पिता के कटे हुए हाथ का बदला लेना चाहिए ।"

"नकाब पहनकर अमैंरिकी सीक्रेट सर्विस के चीफ की कुर्सी पर हैरी से यही कहना मेरा फर्ज था ।" जुलिया कहती ही चली गई-----------------" उस वक्त मैं न तो आपकी बीबी होती हू और न हैरी की मा-------उस वक्त मैं सिर्फ सीकेट सर्विस की चीफ होती हू और अमेरिका के दुश्मनों को खत्म करना ही मेरा मकसद होता है------अब पुरी तरह धमकते ज्वालामुखी के समान हैरी वहां पहुंचा तो सीक्रेट सर्विस के चीफ को लगा कि उसका यह नम्बर वन एजेन्ट सचमुच देश के विजय और विकास जैसे दुश्मनों को खत्म कर सकता है---------सीक्रेट सर्विस के चीफ़ ने यह भी महसूस किया कि हैरी को भारत जाने की इजाजत और भारत में स्थित अमेरिकी जासूसों की मदद देनी राष्ट्रहित में है---- वह सब कुछ किया गया ।"

"म...मगर जूलिया---तुम्हारा यह दुहरा व्यक्तित्व मेरी समझ में नहीं आया?"

फीकी मुस्कान के साथ जूलिया कह उठी---------'आपकी समझ में नहीं आया----------------आप-जो खुद कलियुग के द्रोणाचार्य हैं------जिस तरह मन से न चाहते हुए अपने मुल्क की बेहतरी के लिए विकास को मार डालने के लिए चक्रव्यूह का निर्माण करना पडा था, उसी तरह चीफ़ की कुर्सो पर बैठकर मुझे भी मुल्क के लिए ऐसे बहुत्-से काम करने पडते हैं, जिन्हें दिल गवारा नहीं करता !"

“ जुलिया !"

" यह भी एक वैसा ही काम है !'

" उफ्फ! " जैकी झुंझला उठा---------फिर पागलों की तरह चीख पड़ा-----"कुछ देर के तुम अपने इस दुहरे व्यक्तित्व को त्याग क्यों नहीं देती-------कितना अजीब-सा लगता है हैरी नहीं जानता कि यहां आने की इजाजत और मदद देने वाली तुम हो-----उसे यह आदेश देने-बाली भी तुम हो कि विजय और विकास को खत्म कर दो-----फिर उसकी मा और मेरी बीवी के रूप में तुमने उसकी इन्तकाम से भरी इस मुहिम का विरोध भी डटकर किया है ।"

"दिल से वही किया है जैकी !"

"तभी तो मेरे साथ-साथ उस कम्बख्त ने तुम्हें भी मोटी जंजीरों में कैद करके रखा है।"
 
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