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जाने किस झुंझलाहट में विजय ने स्टेयरिंग पर बहुत जोर से घूंसा मारा-----दाई तरफ का ट्रेफिक इस वक्त चौराहे पार गुजर रहा था-----------एकाएक ही विजय की नजर रघुनाथ की किराए वाली कार पर पड्री-----वह दाई तरफ के ट्रैफिक के-साथ चौराहा पार करके विजय के ठीक सामने वाली सडक पर मुडना चाहती थी ।
"विजय को जाने क्या हुआ कि, उसने एक झटके से गाडी गियर में डाली-----फिर लाल बत्ती के बावजूद विजय की कार अर्जुन के तीर की तरह सर-र्र र्र से रघुनाथ की कार की तरफ़ लपकी ।
अभी कोई कुछ समझ भी नहीं पाया था कि 'ध्रड़ाम' ।
एक कर्णभेदी विस्फोटा हुआ विजय की कार का अगला हिस्सा ठीक रघुनाथ की कार के बीच में जा टकराया---रधुनाथ की कार के इस दिशा के दोनों पहिए हवा में उठे…दूसऱी तरफ के दोनों पहियों पर कार विपरीत दिशा में कुछ दूर तक धिसटती चली गई----फिर उलट गई ! और उलटते ही एक और पलटा खाकर कार सीधी हो गई ।
रघुनाथ की कार का बीच का हिस्सा पिचक गया था ।
विजय की कार के बोनट ने मुंह फाड़ दिया----------मुह फाडे कार फिर रघुनाथ की कार की तरफ बढी, मगर इस बार रघुनाथ की कार ने भी बडी तेजी से दोड़कर अपना स्थान छोड दिया है !
कुछ आगे बढकर सम्भली-घूमी और इस बार वह कार भी आक्रामक रुख अपनाकर विजय की कार की तरफ लपकी विजय की कार ने कन्नी काटी, मगर फिर भी कारें टकरा ही गई !!
इसके बाद----!
खुले-चौराहे पर कारों का युद्ध का बडा ही अजीब और रोमांचकारी दृश्य उपस्थित हो गया ॥
-चौराहे पर उन दो कारों के अतिरिक्त कुछ नहीं था…हर वाहन अपनी-अपनी दिशा में खड़ा उस रोगटे खड़े कर देने वाले दृश्य को देख रहा था ।
मानो एक साथ, हर तरफ की सिर्फ लाल बत्ती ही आंन हो उठी हो ।
घुम घूमकर कारे एकं दूसरे से टकरा रहीं थीं…धमाके गूंज रहे थे--दोनों की ही बॉंडियां बुरी तरह-पिचक गई थी-य-देखने बाले दिल थामे उस भयानक दृश्य को देख रहे थे ।
फिर एंक बार ॥॥॥
रघुनाथ की कार दूर तक लुढ़कती चली गई---------जब रुकी तब सीधी खड़ी थी…पर उसमें आग लग चुकी थी----कार के सीधी होते ही उसके दो दरवाजे एक साथ खुले--एक में से स्वयं रघुनाथ ने बाहर जम्प लगाई, दूसरे से तबस्सुम ने…. तबस्सुम का हाथ पकड़कर रघुनाथ ने चौराहा पार करने के लिए एक तरफ़ को दोड़ना शुरू कर दिया-------
लेकिन अभी वे मुश्किल से पांच कदमं ही दौड सके थे कि….....
विजय की कार ने उनका रास्ता रोक लिया ।
बौखलाए से वे ठिठक गए…पलक झपकते ही कार का दरवाजा खुला और उनके सामने प्रकट होकर विजय किसी जिन के समान खडा था !
रघुनाथ कह उठा-----'त.......तुम?”
“हां---- मै ।” कहने के साथ ही विजय, ने उछलकर एक जबरदस्त घूंसा रघुनाथ के जबड़े पर मारा-------मुँह से चीख निकली, पैर जमीन से उखड़ गए----हवा में लहराकर वह दुर-सड़कं पर जा गिरा ।
कुछ दूर तक घिसटता चला'गया रघुनाथ! !!!!!
रुका-अपनी तरफ़ से काफी जल्दी सम्भलकर खड़ा होगया , लेकिन विजय ने झपटकर दोनों हाथो से उसका गिरेबान पकड़ लिया…दांत भीचकर गुर्राया-----"तुम भले ही तुलाराशि सही-भले ही रैना बहन के सुहाग सही, लेकिन तुम्हें बेजबान मोन्टो की एक-एक बूंद का हिसाब देना है होगा रघुनाथ ------मरते समय अपने ऊपर हुए जुल्म का बदला लेने का वचन भी जो किसी से नहीं ले सकता था…उसी मोन्टो की कसम-------- उसकी चिता के साथ ही तुम्हें भी जलाकर राख कर दिया जाऐगा !"
रघुनाथ ने संभलकर कहने की कोशिश की-"वं.,.वह जानवर...!"
विजय के सिर की टक्कर "भड़ाक' से उसकी नाक पर पडी…वातावरण में रघुनाथ की बिलबिलाहटयुक्त चीख गूंजती चली गई…उसकी नाक फट गई थी------सारा चेहरा खून से पुत गया-बह्र सडक पर पड़ा. चीख रहा था, जबकि विजय गुर्रया--------------"उससे बड़े जानवर तो तुम हो तुलाराशी !"
फिर-विजय पर मानो खून सवार था--------------वह बराबर आक्रामक रुख अपनाए था, जबकि रघुनाथ की सारी शक्ति उसके वारों से खुद को बचाने की असफल कोशिश में ही जाया हो रही थी--------------चौराहे पर ऐसी जबरदस्त फाइटिंग हो रही थी कि देखने बालों ने किसी फिल्म मे भी नही देखी थी ।
एक तरफ़ खडी तबस्सुम थरथर कांप रही थी ।
रैना ने दूर ही से देख लिया कि वाहनों की जबरदस्त भीड ने सारा रास्ता ब्लॉक कर रखा है-----कार की तो बात ही दूर---किसी साइकिल तक के पार निकल जाने की जगह तक नहीं थी--विवश रैना को भीड के इस सिरे पर कार रोकनी पडी--पहले उसने सोचा था कि ये सब वाहन रैड लाइट के कारण रूके पड़े हैं, मगर जल्दी ही उसका भ्रम टूट गया ।
हऱ कोई अपने वाहन के ऊपर खड़ा चौराहे की तंरफ देख रहा था !
रैना ने भी ऐसा ही किया और जब उसने चौराहे का दृश्य देखा तो दहल उठी-अपनी कार के बोनट पर खडी वह वहीं से चीख पडी…"र...रूकी जाओ विजय भइया?"
भीड ने चौंककर उसकी तरफ देखा।
किन्तु विजय ने मानो वह आवाज सुनी ही नहीं।
रैना कार से कूदी----भीड़ ने काई तरह फटकर उसे जगह दी------चीखती-चिल्लाती वह वाहनों के बीच में से गुजरती हुई चौराहे पर पहुँची ।
वह बार-बार विजय को रुक जाने के लिए कहती हुई विजयं और रघुनाथ की तरफ बढी…दिजय ने पलटकर उसकी तरफ़ देखा ।
इसी क्षण--रघुनाथ ने उछलकर एक फ्लाइंग किक उसके सीने पर जड़ दी----पहली बार विजय अपने मुंह से चीख निकालता हुआ सडक पर जा गिरा…रघुनाथ सम्भाला-अवसर मिलते ही वह अपनी जेब से रिवॉल्वर निकाल चुका था-रैना उसकी तरफ वढ़ रही थी ।
उसने हैना पर भी रिवॉल्वर तान दिया ।
ठिठककर रैना चीख पडी------"आप क्या कर रहे हैँ…क्या बेवकूफी हे…आप विजय भइया को सब कुछ बता क्यों नहीं देते कि...........!"
विजय की ठोकर ने रघुनाथ को उठाकर दूर फेक दिया ।
"विजय को जाने क्या हुआ कि, उसने एक झटके से गाडी गियर में डाली-----फिर लाल बत्ती के बावजूद विजय की कार अर्जुन के तीर की तरह सर-र्र र्र से रघुनाथ की कार की तरफ़ लपकी ।
अभी कोई कुछ समझ भी नहीं पाया था कि 'ध्रड़ाम' ।
एक कर्णभेदी विस्फोटा हुआ विजय की कार का अगला हिस्सा ठीक रघुनाथ की कार के बीच में जा टकराया---रधुनाथ की कार के इस दिशा के दोनों पहिए हवा में उठे…दूसऱी तरफ के दोनों पहियों पर कार विपरीत दिशा में कुछ दूर तक धिसटती चली गई----फिर उलट गई ! और उलटते ही एक और पलटा खाकर कार सीधी हो गई ।
रघुनाथ की कार का बीच का हिस्सा पिचक गया था ।
विजय की कार के बोनट ने मुंह फाड़ दिया----------मुह फाडे कार फिर रघुनाथ की कार की तरफ बढी, मगर इस बार रघुनाथ की कार ने भी बडी तेजी से दोड़कर अपना स्थान छोड दिया है !
कुछ आगे बढकर सम्भली-घूमी और इस बार वह कार भी आक्रामक रुख अपनाकर विजय की कार की तरफ लपकी विजय की कार ने कन्नी काटी, मगर फिर भी कारें टकरा ही गई !!
इसके बाद----!
खुले-चौराहे पर कारों का युद्ध का बडा ही अजीब और रोमांचकारी दृश्य उपस्थित हो गया ॥
-चौराहे पर उन दो कारों के अतिरिक्त कुछ नहीं था…हर वाहन अपनी-अपनी दिशा में खड़ा उस रोगटे खड़े कर देने वाले दृश्य को देख रहा था ।
मानो एक साथ, हर तरफ की सिर्फ लाल बत्ती ही आंन हो उठी हो ।
घुम घूमकर कारे एकं दूसरे से टकरा रहीं थीं…धमाके गूंज रहे थे--दोनों की ही बॉंडियां बुरी तरह-पिचक गई थी-य-देखने बाले दिल थामे उस भयानक दृश्य को देख रहे थे ।
फिर एंक बार ॥॥॥
रघुनाथ की कार दूर तक लुढ़कती चली गई---------जब रुकी तब सीधी खड़ी थी…पर उसमें आग लग चुकी थी----कार के सीधी होते ही उसके दो दरवाजे एक साथ खुले--एक में से स्वयं रघुनाथ ने बाहर जम्प लगाई, दूसरे से तबस्सुम ने…. तबस्सुम का हाथ पकड़कर रघुनाथ ने चौराहा पार करने के लिए एक तरफ़ को दोड़ना शुरू कर दिया-------
लेकिन अभी वे मुश्किल से पांच कदमं ही दौड सके थे कि….....
विजय की कार ने उनका रास्ता रोक लिया ।
बौखलाए से वे ठिठक गए…पलक झपकते ही कार का दरवाजा खुला और उनके सामने प्रकट होकर विजय किसी जिन के समान खडा था !
रघुनाथ कह उठा-----'त.......तुम?”
“हां---- मै ।” कहने के साथ ही विजय, ने उछलकर एक जबरदस्त घूंसा रघुनाथ के जबड़े पर मारा-------मुँह से चीख निकली, पैर जमीन से उखड़ गए----हवा में लहराकर वह दुर-सड़कं पर जा गिरा ।
कुछ दूर तक घिसटता चला'गया रघुनाथ! !!!!!
रुका-अपनी तरफ़ से काफी जल्दी सम्भलकर खड़ा होगया , लेकिन विजय ने झपटकर दोनों हाथो से उसका गिरेबान पकड़ लिया…दांत भीचकर गुर्राया-----"तुम भले ही तुलाराशि सही-भले ही रैना बहन के सुहाग सही, लेकिन तुम्हें बेजबान मोन्टो की एक-एक बूंद का हिसाब देना है होगा रघुनाथ ------मरते समय अपने ऊपर हुए जुल्म का बदला लेने का वचन भी जो किसी से नहीं ले सकता था…उसी मोन्टो की कसम-------- उसकी चिता के साथ ही तुम्हें भी जलाकर राख कर दिया जाऐगा !"
रघुनाथ ने संभलकर कहने की कोशिश की-"वं.,.वह जानवर...!"
विजय के सिर की टक्कर "भड़ाक' से उसकी नाक पर पडी…वातावरण में रघुनाथ की बिलबिलाहटयुक्त चीख गूंजती चली गई…उसकी नाक फट गई थी------सारा चेहरा खून से पुत गया-बह्र सडक पर पड़ा. चीख रहा था, जबकि विजय गुर्रया--------------"उससे बड़े जानवर तो तुम हो तुलाराशी !"
फिर-विजय पर मानो खून सवार था--------------वह बराबर आक्रामक रुख अपनाए था, जबकि रघुनाथ की सारी शक्ति उसके वारों से खुद को बचाने की असफल कोशिश में ही जाया हो रही थी--------------चौराहे पर ऐसी जबरदस्त फाइटिंग हो रही थी कि देखने बालों ने किसी फिल्म मे भी नही देखी थी ।
एक तरफ़ खडी तबस्सुम थरथर कांप रही थी ।
रैना ने दूर ही से देख लिया कि वाहनों की जबरदस्त भीड ने सारा रास्ता ब्लॉक कर रखा है-----कार की तो बात ही दूर---किसी साइकिल तक के पार निकल जाने की जगह तक नहीं थी--विवश रैना को भीड के इस सिरे पर कार रोकनी पडी--पहले उसने सोचा था कि ये सब वाहन रैड लाइट के कारण रूके पड़े हैं, मगर जल्दी ही उसका भ्रम टूट गया ।
हऱ कोई अपने वाहन के ऊपर खड़ा चौराहे की तंरफ देख रहा था !
रैना ने भी ऐसा ही किया और जब उसने चौराहे का दृश्य देखा तो दहल उठी-अपनी कार के बोनट पर खडी वह वहीं से चीख पडी…"र...रूकी जाओ विजय भइया?"
भीड ने चौंककर उसकी तरफ देखा।
किन्तु विजय ने मानो वह आवाज सुनी ही नहीं।
रैना कार से कूदी----भीड़ ने काई तरह फटकर उसे जगह दी------चीखती-चिल्लाती वह वाहनों के बीच में से गुजरती हुई चौराहे पर पहुँची ।
वह बार-बार विजय को रुक जाने के लिए कहती हुई विजयं और रघुनाथ की तरफ बढी…दिजय ने पलटकर उसकी तरफ़ देखा ।
इसी क्षण--रघुनाथ ने उछलकर एक फ्लाइंग किक उसके सीने पर जड़ दी----पहली बार विजय अपने मुंह से चीख निकालता हुआ सडक पर जा गिरा…रघुनाथ सम्भाला-अवसर मिलते ही वह अपनी जेब से रिवॉल्वर निकाल चुका था-रैना उसकी तरफ वढ़ रही थी ।
उसने हैना पर भी रिवॉल्वर तान दिया ।
ठिठककर रैना चीख पडी------"आप क्या कर रहे हैँ…क्या बेवकूफी हे…आप विजय भइया को सब कुछ बता क्यों नहीं देते कि...........!"
विजय की ठोकर ने रघुनाथ को उठाकर दूर फेक दिया ।