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दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma
"ओफ्फो-----अब ये क्या उठा लिया आपने?"
" जुदाई ।"
अमिता का दिल धक्क से रह गया------ जाने क्यों मुंह से कम्पित स्वर निकला-----"ज---जुदाई ।"
"हां भई---।" तोताराम -सी मुस्कान के साथ सामान्य स्वर में कहा------"मैं प्रेम बाजपेयी का बहुत पुराना पाठक हूं-------ओर 'जुदाई' -बाजपेयी की लेटेस्ट रचना है, जिसे मनोज पाॅकेट बुक्स ने प्रकाशित किया है ।"
"वह तो मैं जानती हू लेकिन आप पिछले तीन दिन से लगातार इसे अपने साथ तो चिपकाए फिर रहे हैं, ऐसा इसमे क्या है ?"
धीमे से हंसते हुए तोताराम ने जवाब दिया-------“तुम नहीं समझेगी!"
"क्या मतलब?"
“तुम उपन्यास नहीं पढ़ती हो ना, इसलिए तुम्हें उपन्यास की कशिश का अन्दाजा भी नहीं है-------मै तभी से वाजपेयी का पाठक हु जब विधायक नहीं था-----तब मेरे पास काफी समय होता था---- बाजपेयी का कोई भी उपन्यास प्रकाशित होते ही उसे एक ही बैठक में पढ जाना मेरे लिए खाना खाने से भी ज्यादा जरूरी होता था… इच्छा तो अब भी यही होती है, लेकिन क्या करू इतना समय ही नहीं मिलत्ता-----विधायक हूँ न--पिछले तीन दिन से यह चौबीस घण्टे मेरे साथ है-----खाली समय मिलते ही पड़ना शुरू कर देता हूं-अब भी पचास पेज बाकी रह गए हैं ।"
" अब आप 'सम्राट' में मेरे साथ डिनर लेने चल रहे है या इस क्लमुही 'जुदाई' के बाकी पचास पेज पढ़ने---?"
तोताराम ने हंसते हुए, जवाब दिया---------"तुमने तो तिल का पहाड़ बना दिया…....मैं तुम्हारे साथ डिनर लेने ही जा रहा हू ।”
"मैं तुमसे बात करती रहूगी और तुम इसमें डूवे रहना ।"
" ऐसा नहीं होगा-मैं सिर्फ खाली समय मे ही इसे पढूगा----चलें?"
"चलते हैं-----मै जरा अपने कमरे से अपना पर्स लेकर आती हू !" कहने के बाद बुरा-सा मुह बनाती हुई अमिता मुडी और तेज कदमों के साथ अपने कमरे की तरफ बढ गई॥॥॥
उसकी पीठ देखता हुआ तोताराम होठो-ही-होंठों मे बुदबुदाया------" मै जानता हू अमिता कि तू किस हद तक गिर सकती है और यदि,,, तू उस हद तक गिरी तो मनोज पॉकेट बुक्स से निकली प्रेम बाजपेयी की यह लेटेस्ट रचना ही तेरे लिए फांसी का फन्दा बन जाएगी---"सांरी दुनिया के सामने तुझे नग्न कऱ देगी ।"
वह तोताराम राजनगर के केंट क्षेत्र से विधानसभा से विपक्ष का विधायक था, जो कि 'सम्राट' होटल के हाॅल में अभी-अभी अपनी बीबी के साथ प्रविष्ट हुआ था--लम्बे चौड़े हॉल में तीव्र प्रकाश था-----अधिकांश सीटें भरी हुई थी-----कुछ रिक्त भी थीं । उन्हीं में से एक की तरफ वह जोड़ा बढ़ गया ।
अमिता के गोरे-सुडौल और तराशे गए बदन पर कीमती साड्री थी,, जबकि तोताराम खद्दर का कलफ़ लगा सफेद चिट्टा कुर्ता-पायजामा पहने था-उसके दाएं हाथ में अब भी 'जुदाई' थी-----सीट पर बैठने के कुछ देर बाद ही वेटर आ गया ।
तोताराम ने कहा…“अपनी पसन्द का आर्डर दे दो अमिता ।"
"अभी नहीं---।" अमिता ने अपना श्रृंगार से पुता चेहरा वेटर की तरफ उठाकर कहा-----"पहले हम एक राउण्ड डांस करेगे-उसके बाद डिनर लेगे ।"
जब वेटर "जेसी इच्छा" कहकर चला गया तब तोताराम ने कहा-----"डांस और मैं---? "
"क्यों क्या हुआ?" अमिता ने आंखें निकाली ।
"मैं भला डांस कैसे कर सकता हूं ?"
"क्यों नहीं कर सकते ?"
चारों तरफ़ देखते हुए तोताराम ने कहा-----------" यहाँ बहुत से ऐसे लोग बैठे हैं, जो मूझे जानते हैं----बे देखेंगे तो क्या कहेंगे ?"
"क्या कहेगे, बीबी के साथ डांस कराना क्या -जुर्म है ? "
" ओंफ्फो----तुम समझती क्यों नहीं अमिता----इस शहर का विधायक हू----मेरा यू तुम्हारे साथ फ्लोर पर जाकर डास करना अच्छा नहीं लगता-किसी ने फोटो खिंचबाकर अखवार में छपवा दिया को जबरदस्ती सरदर्द करने वाला स्कैंण्डल खडा हो जाएगा ।"
"तो फिर मैं यहां क्या आपका मुंह देखने आई हूं ?" अमिता भड़क उठी ।
"अरे नाराज क्यों होती हो ? ”
"नहीं तो, क्या खुश होऊं ।" अमिता बिफर पडी-"मुझे नहीं लेना ऐसा डिनर आप ही बैठो यहा -मै चली ।"
"अरे----रे----कहां जाती हो?" ,तोताराम बौखला गया ।
अमिता गुर्रा-सी उठी------मै तो आपसे शादी करके पछताई----यदि मुझें पता होता कि विधायक से शादी करके अपंने सारे अरमानो का खून करना पड़ता है तो ये शादी कभी न करती ।"
"अमिता !'!'!"
"मैं जा रही हू ।” कहने के साथ ही एक झटके से अमिता उठ खडी हुई ।।
तोताराम ने जल्दी से उसका हाथ पकड़कर दबे स्वर में कहा…"ठ-ठहरो अमिता-बैठो…........मैं वेसा ही करूंगा बाबा, जैसा कहती हो, लेकिन भगवान के लिए बैठ जाओ ।"
गुस्से में भुनभुनाती हुई--सी अमिता बैठ गई------तोताराम उसके उखड़े हुए मूड को सामान्य करने की चेष्ठा करने लगा… कम-से-कस इस हाँल में वह तमाशा बनना नहीं चाहता था ।
दस मिनट के अन्दर तोताराम ने अमिता का मूड 'फ्रैश' कर दिया था--------अचानक अमिता ने कुर्सी से उठते हुए कहा…"मैं अभी टॉयलेट से होकर आती हूं ।"
तोताराम ने गर्दन हिलाकर स्वीकृति दी ।
"ओफ्फो-----अब ये क्या उठा लिया आपने?"
" जुदाई ।"
अमिता का दिल धक्क से रह गया------ जाने क्यों मुंह से कम्पित स्वर निकला-----"ज---जुदाई ।"
"हां भई---।" तोताराम -सी मुस्कान के साथ सामान्य स्वर में कहा------"मैं प्रेम बाजपेयी का बहुत पुराना पाठक हूं-------ओर 'जुदाई' -बाजपेयी की लेटेस्ट रचना है, जिसे मनोज पाॅकेट बुक्स ने प्रकाशित किया है ।"
"वह तो मैं जानती हू लेकिन आप पिछले तीन दिन से लगातार इसे अपने साथ तो चिपकाए फिर रहे हैं, ऐसा इसमे क्या है ?"
धीमे से हंसते हुए तोताराम ने जवाब दिया-------“तुम नहीं समझेगी!"
"क्या मतलब?"
“तुम उपन्यास नहीं पढ़ती हो ना, इसलिए तुम्हें उपन्यास की कशिश का अन्दाजा भी नहीं है-------मै तभी से वाजपेयी का पाठक हु जब विधायक नहीं था-----तब मेरे पास काफी समय होता था---- बाजपेयी का कोई भी उपन्यास प्रकाशित होते ही उसे एक ही बैठक में पढ जाना मेरे लिए खाना खाने से भी ज्यादा जरूरी होता था… इच्छा तो अब भी यही होती है, लेकिन क्या करू इतना समय ही नहीं मिलत्ता-----विधायक हूँ न--पिछले तीन दिन से यह चौबीस घण्टे मेरे साथ है-----खाली समय मिलते ही पड़ना शुरू कर देता हूं-अब भी पचास पेज बाकी रह गए हैं ।"
" अब आप 'सम्राट' में मेरे साथ डिनर लेने चल रहे है या इस क्लमुही 'जुदाई' के बाकी पचास पेज पढ़ने---?"
तोताराम ने हंसते हुए, जवाब दिया---------"तुमने तो तिल का पहाड़ बना दिया…....मैं तुम्हारे साथ डिनर लेने ही जा रहा हू ।”
"मैं तुमसे बात करती रहूगी और तुम इसमें डूवे रहना ।"
" ऐसा नहीं होगा-मैं सिर्फ खाली समय मे ही इसे पढूगा----चलें?"
"चलते हैं-----मै जरा अपने कमरे से अपना पर्स लेकर आती हू !" कहने के बाद बुरा-सा मुह बनाती हुई अमिता मुडी और तेज कदमों के साथ अपने कमरे की तरफ बढ गई॥॥॥
उसकी पीठ देखता हुआ तोताराम होठो-ही-होंठों मे बुदबुदाया------" मै जानता हू अमिता कि तू किस हद तक गिर सकती है और यदि,,, तू उस हद तक गिरी तो मनोज पॉकेट बुक्स से निकली प्रेम बाजपेयी की यह लेटेस्ट रचना ही तेरे लिए फांसी का फन्दा बन जाएगी---"सांरी दुनिया के सामने तुझे नग्न कऱ देगी ।"
वह तोताराम राजनगर के केंट क्षेत्र से विधानसभा से विपक्ष का विधायक था, जो कि 'सम्राट' होटल के हाॅल में अभी-अभी अपनी बीबी के साथ प्रविष्ट हुआ था--लम्बे चौड़े हॉल में तीव्र प्रकाश था-----अधिकांश सीटें भरी हुई थी-----कुछ रिक्त भी थीं । उन्हीं में से एक की तरफ वह जोड़ा बढ़ गया ।
अमिता के गोरे-सुडौल और तराशे गए बदन पर कीमती साड्री थी,, जबकि तोताराम खद्दर का कलफ़ लगा सफेद चिट्टा कुर्ता-पायजामा पहने था-उसके दाएं हाथ में अब भी 'जुदाई' थी-----सीट पर बैठने के कुछ देर बाद ही वेटर आ गया ।
तोताराम ने कहा…“अपनी पसन्द का आर्डर दे दो अमिता ।"
"अभी नहीं---।" अमिता ने अपना श्रृंगार से पुता चेहरा वेटर की तरफ उठाकर कहा-----"पहले हम एक राउण्ड डांस करेगे-उसके बाद डिनर लेगे ।"
जब वेटर "जेसी इच्छा" कहकर चला गया तब तोताराम ने कहा-----"डांस और मैं---? "
"क्यों क्या हुआ?" अमिता ने आंखें निकाली ।
"मैं भला डांस कैसे कर सकता हूं ?"
"क्यों नहीं कर सकते ?"
चारों तरफ़ देखते हुए तोताराम ने कहा-----------" यहाँ बहुत से ऐसे लोग बैठे हैं, जो मूझे जानते हैं----बे देखेंगे तो क्या कहेंगे ?"
"क्या कहेगे, बीबी के साथ डांस कराना क्या -जुर्म है ? "
" ओंफ्फो----तुम समझती क्यों नहीं अमिता----इस शहर का विधायक हू----मेरा यू तुम्हारे साथ फ्लोर पर जाकर डास करना अच्छा नहीं लगता-किसी ने फोटो खिंचबाकर अखवार में छपवा दिया को जबरदस्ती सरदर्द करने वाला स्कैंण्डल खडा हो जाएगा ।"
"तो फिर मैं यहां क्या आपका मुंह देखने आई हूं ?" अमिता भड़क उठी ।
"अरे नाराज क्यों होती हो ? ”
"नहीं तो, क्या खुश होऊं ।" अमिता बिफर पडी-"मुझे नहीं लेना ऐसा डिनर आप ही बैठो यहा -मै चली ।"
"अरे----रे----कहां जाती हो?" ,तोताराम बौखला गया ।
अमिता गुर्रा-सी उठी------मै तो आपसे शादी करके पछताई----यदि मुझें पता होता कि विधायक से शादी करके अपंने सारे अरमानो का खून करना पड़ता है तो ये शादी कभी न करती ।"
"अमिता !'!'!"
"मैं जा रही हू ।” कहने के साथ ही एक झटके से अमिता उठ खडी हुई ।।
तोताराम ने जल्दी से उसका हाथ पकड़कर दबे स्वर में कहा…"ठ-ठहरो अमिता-बैठो…........मैं वेसा ही करूंगा बाबा, जैसा कहती हो, लेकिन भगवान के लिए बैठ जाओ ।"
गुस्से में भुनभुनाती हुई--सी अमिता बैठ गई------तोताराम उसके उखड़े हुए मूड को सामान्य करने की चेष्ठा करने लगा… कम-से-कस इस हाँल में वह तमाशा बनना नहीं चाहता था ।
दस मिनट के अन्दर तोताराम ने अमिता का मूड 'फ्रैश' कर दिया था--------अचानक अमिता ने कुर्सी से उठते हुए कहा…"मैं अभी टॉयलेट से होकर आती हूं ।"
तोताराम ने गर्दन हिलाकर स्वीकृति दी ।