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दोस्त की शादीशुदा बहन complete

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साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
दिल ने कहा- चुप कर रे मन... किसी ने सुन लिया तो?

मन ने कहा- कौन सुनेगा अपने मन की आवाज? कोई स्पीकर तो लगा नहीं है की सबको सुनाई दे। चल जाकर दरवाजा खोल और पटाले देवर को।

इतने में देवर ने दरवाजा खटखटाया और मैंने मुश्कुराते हुए दरवाजा खोला।

मैं (चम्पारानी)- अरे देवरजी आप? बड़ी देर लगा दी कालेज से आते-आते। क्या बात है?

देवर- मेरी बात छोड़िए... भाभीजी, पहले आप बताइए कि आपने क्यों बड़ी देर कर दी दरवाजा खोलते-खोलते?

मैं- अरे... देवरजी, आपके लिए तो मैं कब से खोलकर खड़ी हूँ आप ही हैं की घुसाते ही नहीं हो।

देवर- छीः छीः छीः भाभीजी कितनी गंदी हो आप? क्या बोल रही हो? किससे बोल रही हो? अरे मैं भैया नहीं हैं। आपका देवर हूँ। और मुझसे ऐसी बातें क्यों कार रही हो आप?

मैं- अरे देवर राजा। देवर भाभी में तो सब कुछ चलता है। और मैंने ऐसा क्या गंदा बोल दिया की आपको छीः छीः छीः कहना पड़ा।

देवर- जैसे आपको पता ही नहीं है। आपने कहा की अरे देवरजी मैं तो आपके लिए कब से खोलकर खड़ी हूँ, आप ही हैं की घुसाते ही नहीं हो... ऐसा नहीं कहा आपने?

मैं- कान में तेल डाला करो देवरजी... तेल। मैं क्या कह रही हूँ और आप सुन क्या रहे हो। हे... मैंने तो ये कहा था की कब से खोलकर खड़ी हैं। इसका मतलब है कि मैं कब से दरवाजा खोलकर खड़ी हूँ, अपने कपड़े नहीं।

देवर- अच्छा तो अब आप ये भी कहोगी की आप ही घुसाते नहीं हो।

मैं- मैंने कहा ना देवरजी कि कान में तेल डाला करो ताकी आपको साफ-साफ सुनाई दे। मैंने कहा था की मैं तो कब से खोलकर खड़ी हूँ। आप ही घुस आते नहीं हो।

पहले वाले भाग का मतलब आपको समझा चुकी हूँ की कब से दरवाजा खोलकर खड़ी हूँ। आप ही घुस आते नहीं हो अंदर। और आपने समझ लिया की घुसाते नहीं हो। छीः छीः छीः देवरजी कितनी गंदी सोच है आपकी। वैसे आपने क्या सोचा था की क्या घुसाते नहीं हो अंदर? हाय राम रे... देवरजी।

देवर- अब जाने भी दो भाभी, घुसने दो अंदर।

भाभी- क्या कहा देवरजी? घुसाने दें अंदर। क्या घुसाने दें अंदर मैं? आपको शर्म नहीं आती अपनी भाभी से ऐसी बातें करते हुए।

देवर- अरे भाभीजी, आपकी ही भाषा में कान में डाला करिए।

मैं- हाय... कान में डाल लँ? अंदर जाएगा कान में? दर्द नहीं होगा?

देवर- बिल्कुल भी नहीं... मैं ऐसे डालूंगा की बिल्कुल भी दर्द नहीं होगा।

 
मैं- छीः छीः देवरजी आपको शर्म आनी चाहिए... कहाँ डालने वाली चीज को कान में डालने की बात करते हो।

देवर- हाँ भाभी, पर सब लोग डालते हैं कान में।

मैं- पर आपका इतना मोटा, इतना बड़ा है। कान में कैसे जाएगा?

देवर- अरे भाभीजी, आप चिंता मत करो। मैं ऐसा डालूंगा की आपको पता भी नहीं चलेगा... और अंदर घुसकर ये अपना काम भी तुरंत ही चालू कर देगा। और आपको तुरंत आराम मिलेगा।

मैं- लेकिन... आपका इतना बड़ा, इतना मोटा... नहीं नहीं, मैं कान में तो हारगिज नहीं घुसवाऊँगी। कहीं दूसरी जगह की बात करो तो हिम्मत भी कर लँ।।

देवर- अरे भाभी, आपके कान में तेल डालने की बात कर रहा हूँ बोतल नहीं? जो नहीं घुसेगा।

मैं- क्या? तेल की बोतल? आपका दिमाग खराब हो गया है। मेरा कान सही है। मुझे अच्छा सुनाई देता है। वो तो मैं कुछ और ही समझी थी। वैसे आपने ये कैसे कहा की घुसाने दो अंदर? आपका क्या घुसाने दूं मेरे अंदर? और कहाँ घुसाने ?

देवर- अरे भाभी, इसीलिए तो मैं कह रहा था की तेल डाला करो कान में। मैं तो ये कह रहा था की घुस आने दो अंदर। मतलब मुझे कमरे के अंदर घुस आने दो।

मैं- अरे देवरजी तो घुसिए ना... वैसे आपने बताया नहीं की आपने आज कालेज से आने में देर क्यों की?

देवर- और आपने भी तो ये नहीं बताया की आपने दरवाजा खोलने में इतनी देर क्यों कर दी?

मैं- मैं तो वो... ऊपर कपड़ा सूखाने गई थी।

देवर- और मैं भी कालेज में एक्सट्रा क्लास करके आ रहा हूँ। मेडम ने आज एक्सट्रा क्लास ली है। कैसा होता है। चुदना।

मैं- है देवरजी.. ऐसी गंदी-गंदी बातें सिखाती हैं कालेज में? और वो भी एक मेडम बताती हैं कि कैसा होता है। चुदाना? एक लड़की होकर कैसे पढ़ाती है वो मेडम? उसे शर्म नहीं आती?

देवर- अरे भाभी, इसमें काहे की शर्म? और आजकल ऐसा कौन सा काम है जो लड़की नहीं कर सकती और एक लड़का कर सकता है?

मैं- अरे देवरजी ऐसे बहुत से काम हैं, जो एक लड़का कर सकता है, और एक लड़की नहीं कर सकती।

देवर- जैसे?

मैं- जैसे की सड़क पर दीवार के किनारे खड़े होकर पैंट की जिप खोलकर सू-सू को दीवार पर उछालना।

देवर- छीः छीः छीः भाभी।

 
मैं- क्यों सही कहा तो मिचें लग गई? हाँ कुछ काम ऐसे भी है जो हम औरतें कर सकती हैं, जो एक मर्द नहीं कर सकता। हमारे पास एक ऐसी मशीन है जो फुल्ली आटोमेटिक है, बिना फ्युयेल के ही चलती है। नट बोल्ट और लुब्रिकेंटस की कोई जरूरत नहीं पड़ती है। हर तरह के पिस्टन इसमें अड्जस्ट हो सकते हैं। बिना चाभी के सिर्फ एक उंगली से भी स्टार्ट हो जाती है। महीने में एक बार आटोमटिक ओवरहालिंग होकर फिर एक माह के लिए तैयार हो जाती है।

देवर- अच्छा... भाभीजी, बताइए ना कि ऐसी कौन सी मशीन है आपके पास? और हमारे पास अलग-अलग साइज का पिस्टन कैसे होता है।

मैं- मुन्ना, वो सब जानने के लिए आपकी अभी उमर नहीं हुई।

देवर- अरे भाभीजी, आपका देवर अभी दूध पीता बच्चा नहीं रहा वो अभी बड़ा हो गया है।

मैं- हाँ.. वो तो मैंने छत के ऊपर से देखा था। आप सचमुच जवान हो गये हो।

देवर- तो आपने छत के ऊपर से क्या देखा भाभीजी?

मैं (चम्पारानी) वो सब बाद में देवरजी... कालेज से थके हारे आये हो, फ्रेश हो आओ। तब तक मैं आपके लिए चाय और नाश्ता बना देती हूँ।

देवर- ठीक है भाभी। पर आपको बताना ही होगा की आपने छत के ऊपर से क्या देखा? और देवर बाथरूम में घुस गया।

मैं अगले प्लान की सोचने लगी की आगे मुझे क्या करना होगा की मेरी चूत की खुजली भी मिट जाए और देवर की ट्रेनिंग भी हो जाए, तो दोनों का ही काम बन जाये। दूर से देखा था देवर का लौड़ा, पर मुझे पक्का यकीन था की उनका चूत फाडू लौड़ा है, मेरे भाई कामरू से भी बड़ा और मोटा है। इस चूत की खुजली कैसे मिटाऊँ? अब तो देवर का लौड़ा घुसेगा इस मुई चूत में तभी जाकर इसकी खुजली मिटेगी हाँ नहीं तो।।

इतने में देवर फ्रेश होकर आ गया। और मैंने चाय नाश्ता टेबल पे रख दिया। दोनों ही चाय की चुस्की लेने लगे। देवर मुझे एकटक देख रहा था और मैं देवर को।

देवर- तो भाभी?

मैं- क्या देवरजी?

देवर- कोई बहाना नहीं चलेगा? आपको बताना ही होगा की आपने छत से क्या देखा?

मैं- मुझे कहते हुए शर्म सी आ रही है।

देवर- इसमें शर्म की क्या बात है भाभी? देवर भाभी में कैसी शर्म? ये आपका ही कहना है ना?

मैं- हाँ... पर देवर ने आज जो किया है। वो भी तो बताने लायक नहीं है ना।

देवर- मैंने ऐसा क्या कर दिया जो बताने लायक नहीं है?

मैं- आपने... देवरजी आपने जो किया है। मुझे तो आश्चर्य हो रहा है की जो देवर अपनी भाभी के सामने ऊंची नजर से नहीं देखता... वो ऐसा कैसे कर सकता है।

देवर- अरे भाभी, मैंने ऐसा क्या कर दिया?

 
मैं- मैंने छत के ऊपर से देखा की आपने इधर-उधर देखा। एक लड़की चौक की तरफ जा रही थी और आपने उसको अनदेखाकर अपनी पैंट की जिप खोली और अपना सामान निकाला और... हाय... मुझे तो कहते हुए भी शर्म आ रही है। आपने अपना सामान निकाला और दीवार पे नकशा बनाने लगे। अभी थोड़ी देर पहले मैंने कहा था ना की ये काम हम लड़कियां नहीं कर सकतीं। तो आप दीवार पर अपने सामान से नकशा बना रहे थे। और वो लड़की पास आती जा रही थी... पास आती जा रही थी।

और फिर उसने आपके पास आकर कहा- ए लड़के... ये क्या कर रहे हो?

और उसकी धमकी भरी बात सुनकर आपने उसकी ओर मुड़कर देखा तो उस लड़की का मुँह खुला का खुला रह गया। वो एकटक आपके खड़े हुए सामान की तरफ ही देख रही थी... ना उसके मुँह से कोई आवाज निकली ना आपके मुँह से।

और फिर लड़की ने अपने आपको संभाला और कहा- हे भगवान्... क्या है ये?

फिर आपने कहा- कभी सामान नहीं देखा क्या?

तो उसने इधर-उधर देखा। सड़क एकदम सुनसान थी। वो लड़की बोली- “सामान तो बहुत ही देखा पर तेरे जैसे मोटा और लंबा नहीं देखा...” लड़की ने फिर आपको डांटा और कहा- तुमको दिखाई नहीं देता दीवार पर क्या लिखा है?

और तुमरी नजर उस दीवार पे गई, उहां लिखा था- गधों और कुतों का पेशाब घर।

फिर तुमने कहा- इहां पर लिखा है- “गधों और कुत्तों का पेशाब घर...”

लड़की ने कहा- कुत्ते तो तुम हो नहीं। गधे जैसे लण्ड के मालिक होने से कोई गधा नहीं बन जाता।

तब तुमने कहा- मैं इंसान हूँ।

उस लड़की ने कहा- तो फिर इस गधों और कुत्तों के पेशाब घर में क्यों पेशाब कर रहे हो?

तब तुमने कहा- अरे, मैं इंसान हूँ। इहां पर गधे और कुत्ते पेशाब कार सकते हैं तो क्या मैं इंसान होकर इहां पर पेशाब भी नहीं कार सकता? क्या हम इंसान इनसे भी गये गुजरे हो गये हैं?

तब उस लड़की ने कहा- जब तुमने पेशाब कर लिया है इहां पर तो दूसरा काम भी कर दो जो गधे और कुत्ते कहीं भी कभी भी शुरू कर देते हैं।

उसने तुरंत इधर-उधर देखा और किसी को नहीं आता देखकर तुरंत ही अपनी सलवार को नीचे किया और अपनी चूत दिखाते हुए कहा- इसमें इसे घुसाएगा?

तो फिर आपने उसकी फुद्दी की तरफ आश्चर्य से देखा और कहा- हे भगवान्... तुम्हारी नूनी कहाँ गई?

 
लड़की ने हँसते हुए कहा- मेरी वाली टूट गई। क्या मैं तेरी वाली नूनी पकड़ सकती हूँ?

तो फिर आपने उसे डांटते हुए कहा- नहीं... अपना वाला तो तोड़ दिया तूने अब मेरा वाला भी तोड़ेगी क्या? मुझे नहीं तुड़वानी अपनी नूनी।

देवर- तो इसमें मैंने गलत क्या कहा भाभीजी? साली लड़की ने खेलते खेलते अपनी नूनी तो तोड़ दी। और मेरी नूनी को अपने छेद में घुसा के तुड़वाने को उतारू थी। बड़ी मुश्किल से मैं वहाँ से भागकरके अपने दरवाजे पे आया और दरवाजा खटखटाने लगा। पर आप हैं की कपड़े सुखाने के चक्कर में दरवाजा खोलने में बड़ी देर कर दी। वो लड़की तो आज सचमुच ही मेरी नूनी को तोड़ ही देती।

मैं (चम्पारानी)- ऐसे कैसे तोड़ देती आपकी नूनी को? साली की बुर में भूसा नहीं भरवा देती।

देवर- तोड़ने के बाद आप भरवाती रहती भूसा उसकी फुद्दी में। वैसे ये फुद्दी किसको कहते हैं भाभीजी?

मैं- क्या? देवरजी, आपको फुद्दी नहीं मालूम? अरे देवरजी जैसे आपकी नूनी है ना... हम लड़कियों की वैसी नूनी नहीं होती है। उसकी जगह एक प्यारा सा, गुलाबी रंग का मुलायम छेद होता है। उसे हम बड़े प्यार से पुत्ती, फुद्दी, चूत, बुर ऐसे कहते है।

देवर- ओह... तो इसीलिए आप कह रही थी की हम लड़कियां दीवार के ऊपर सू-सू से नकशा नहीं बना सकती।

मैं- हाँ... देवरजी। वैसे आपका लौड़ा है बड़ा जानदार।

देवर- ये तो गलत बात है भाभीजी। आपने हमारा देख लिया और अपना वाला दिखाया भी नहीं। मुझे लड़कियों का नूनी... ओहह... सारी, फुद्दी देखनी है।

मैं- क्या? सचमुच में आपने किसी औरत की फुद्दी नहीं देखी है देवरजी?

देवर- हाँ... भाभी, प्लीज दिखाईए ना।

मैं- खैर, मैं तो दिखाऊँगी ही... पर आप झूठ बोल रहे हैं की आपने आज से पहले कभी किसी की फुद्दी नहीं देखी।

देवर- नहीं भाभी नहीं.. मैंने सचमुच में किसी लड़की की फुद्दी नहीं देखी है।

मैं- अच्छा... जब मैं रोज नहाने जाती हैं। तो दरवाजे की झिरी में से झाँक-झाँक कर कौन अंदर का नजारा देखते रहता है।

देवर- “वो... वो... भाभी...”

मैं- क्या वो... वो... लगा रखा है? बताइए ना आपने किसी की फुद्दी देखी है की नहीं?

देवर- अच्छा भाभी, देखी है पर दूर से देखी है। मुझे पास से देखना है।

मैं- पर... मैं आपको अपनी फुद्दी क्यों दिखाऊँ?

देवर- “अरे भाभी, प्लीज... दिखा दो ना... अपने प्यारे देवर के लिए इतना भी नहीं कर सकती? प्लीज...”

मैं- ठीक है। पर बदले में मुझे क्या मिलेगा?

देवर- आप जो कहोगी मुझे मंजूर होगा।

 
मैं- मेरा कहना मनोगे?

देवर- हाँ भाभी हाँ... पर दिखाओ ना। आज भैया भी घर पे नहीं हैं। मम्मी पापा भी तीर्थ यात्रा पे गये हुए हैं। ऐसा मौका बार-बार नहीं आएगा भाभी।

मैं- चलो ठीक है। मैं आपको अपना सामान दिखाऊँगी तो बदले में मैं भी आपका सामान देखना चाहूँगी। मैंने भी आज से पहले इतना बड़ा, इतना मोटा लौड़ा नहीं देखा है।

देवर- क्यों? भैया का तो हर रविवार रात को देखती ही हो।

मैं- पर... आपको कैसे मालूम? अच्छा... खिड़की से आप ही झाँकते हो रात में।

देवर- हाँ भाभी, मैं सब देखता हूँ। पर इस रविवार को कुछ ज्यादा ही मजा आया।

मैं- क्योंकी मैंने खिड़की के पर्दे को पूरा का पूरा ही हटा दिया था। ताकी आपको हमारी सारी रासलीला दिख सके।

देवर- अच्छा... तो आप हमें ट्रेनिंग दे रही थी।

मैं- हाँ... देवरजी, पर अपना तो दिखाओ? चलो, मैं ही खोल देती हूँ आपके पैंट की जिप। अरे राम रे... देवरजी क्या है ये? इतना बड़ा भी कभी होता है? बाप रे इतना मोटा? इतना लंबा? मेरे तो एक हथेली में समाए नहीं समा रहा है। जब मेरी फुद्दी में घुसेगा तो मेरी फुद्दी का क्या हाल होगा? मैं तो इसे चूस ही नहीं पाऊँगी... अपनी फुद्दी के अंदर लेने की तो बात ही छोड़ दो।

देवर- क्यों झूठ बोल रही हो भाभी? आपने तो इस लण्ड को पहले से छुवा भी है और चूसा भी है।

मैं- नहीं तो? मैंने आज से पहले कभी भी आपके लण्ड को ना छुवा है ना ही चूसा है। कशम से।

देवर- किसकी कशम खाती हो?

मैं- “मैं चम्पारानी, अपनी चूत के चारों तरफ उगी हुई धुंघराली झांटों को अपने साये के ऊपर से सहलाते हुए, ये कशम खाकर कहती हूँ की अगर मैंने आज से पहले अपने प्यारे देवर के लण्ड को गलती से भी छुआ है या । देवरजी जैसे कहते हैं की इनके लण्ड को मैंने चूसा भी है तो अभी का अभी इस फुद्दी की सभी धुंघराली झाँटें सहीद हो जाएं। मेरी फुद्दी के चारों तरफ चूत को लण्ड से रखवाली करने को एक भी झाँट ना बचे। मेरी इस फुद्दी में आज मेरे प्यारे देवर का लण्ड घुसे ही घुसे। भले ही मैं कितना भी चिल्लाऊँ.. कितना भी रोऊँ... मेरा देवर आज मेरी जमकरके, कसकरके चुदाई करे? और इतना कहकरके मैंने साया साड़ी के ऊपर से ही खुजलाते हुए अपनी चूत को हथेली से सहलाया।

देवर- अरे भाभी... ये आपने कैसा कठोर कशम खा लिया? हो सकता है की मैंने कोई सपना देखा हो। पर रोज रात को लगता है, वो भी सिर्फ रवीवार को छोड़कर, की अंधेरे में कोई मेरे लण्ड को सहला रहा है। और फिर वो हसीना अपने मुँह में भरके मेरे लण्ड को चूसती है। और जब मेरे लण्ड से पानी निकलता है तो उसको भी वो गटक जाती है। मुझे मजा भी आता है और डर भी लगता है। और फिर वो साया कमरे में से बाहर निकल जाता है। मैं कमरे की बत्ती जलाकर सोता हूँ। पर... वो साया जब आती है, तब कमरे में अंधेरा होता है।

मैं- अरे, पर देवरजी... आपको कैसे मालूम की वो साया कोई औरत का है।

देवर- वो... भाभी, आप बुरा तो नहीं मनोगी? एक दिन मैंने उत्तेजान में आकर उसकी छातियां सहलाई थी। तब उसकी गुदाज छातियां सहलाकर मुझे लगा की ये पक्का औरत ही होगी। मैंने तो ये समझा था की वो साया आप ही हैं, पर आपने जिस तरीके से ये कठोर कशम खाई है... आप वो नहीं हो। मुझे माफ कर देना भाभीजी।

 
साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
मैंने चैन की साँस ली। मैंने तो सोचा था की देवर घोड़े बेचकरके सोता है और कमरे में अंधेरा करके ही मैं ये काम करती थी। पति के मूंगफली जैसे नूनी से थोड़ी फुद्दी की खुजली मिटती है। और वो भी सट दिन में एक बार... मैंने कई दिन पहले से ये प्लान सोचकर देवर के मन में ये बात गहरी बैठा दी थी की रात को एक साया आता है तो लाइट नहीं जलानी चाहिए... चिल्लाना नहीं चाहिए... वरना वो साया तुमरी जान भी ले सकता है। और फिर मैंने उसके कमरे में अंधेरा करके मौके का फायदा उठाना चालू किया था। और आज... आज मैं पकड़ी ही जाती।

मैंने अपनी पीठ खुद थपथपाई- वाह... चम्पारानी, मन गए तुमको... क्या कशम खाई है की देवर को भी बिश्वास हो गया की वो साया तुम नहीं थी। वो दूसरी दुनियां से आई कोई परीजात थी। वाह... मन गये तेरे दिमाग को।

देवर- तो भाभीजी, आपने मुझे माफ कर दिया ना?

मैं (चम्पारानी)- एक ही शर्त पर माफी मिल सकती है।

देवर- मुझे आपकी हर शर्त मंजूर है। बोलिए?

मैं- चलिए आप मुझे अपना सारा सामान दिखाईए और मेरा सब सामान आप देख लीजिए।

देवर- बस... इतनी से बात। चलिए, फिर मेरे कमरे में चलिए, आपको मेरा सब सामान दिखा देता हूँ।

मैं- अरे बुद्धू... कमरे का सामान नहीं... अपना सामान।

देवर- मेरा सामान? मतलब क्या है आपका?

मैं- इतने भी बुद्धू ना बनो मेरे देवरजी। वही सामान जो रविवार को छोड़कर हर रात को कोई परीजात आकर आपका सहलाती है और फिर चूसती भी है।

देवर- छीः छीः भाभी, आप मेरी नूनी देखेंगी। आपको शर्म नहीं आएगी?

मैं- शर्म कैसी देवरजी? अगर वो पराई परीजात आपके लण्ड को सहला सकती है, चूस सकती है तो फिर मैं क्यों नहीं।

देवर- पर... उस समय तो अंधेरा रहता है।

मैं- अरे, वो दूसरी दुनियां की परीजात है, उसे अंधेरे में दिखता होगा। पर मैं थोड़े ही परीजात हूँ। मुझे तो उजाले में ही दिखाई देगा ना।

देवर- ठीक है भाभीजी... पर मैं भी आपका सामान देखना चाहता हूँ।

मैं- पर देवरजी... मेरे पास तो आपके जैसे नूनी याने की लण्ड नहीं है, उसकी जगह एक छेद है।

देवर- आप भी ना... भाभीजी, मुझे शर्मिंदा किए जा रही हैं।

मैं- चलो ठीक है। मैं अपने कमरे में हूँ। जब आपको आवाज दें तभी आना।

देवर- क्यों भाभीजी? मुझसे शर्म आ रही है?

मैं- नहीं... नहीं... अच्छा चलो साथ में ही चलते हैं, पर जरा मेन-गेट को तो बंद कर दो। कहीं हम एक-दूसरे का सामान देख रहे हों और बाहर से कोई पड़ोसी टपक गया तो बड़ी बदनामी होगी।

देवर- “हाँ भाभी, मैं अभी मेन-गेट बंद करके आता हूँ..” और उसने मेन-गेट को ठीक से बंद किया और मेरे बेडरूम में आ गया।

मैं- चलो देवरजी, अपना खोलो।

देवर- क्या बात करती हैं भाभीजी? मेरी नूनी में कोई नट बोल्ट थोड़ी लगा रखा है की खोल के दिखाऊँ। आपको मेरे पास आकर ही देखना पड़ेगा।

मैं- अरे देवरजी, मैं नूनी खोलने की बात नहीं कर रही हूँ... कपड़े खोलने की बात कर रही हैं। हाँ नहीं तो।

देवर- अच्छा... अच्छा तो ये लो। उसने सबसे पहले अपनी कमीज उतारी।

 
मैं- तो देवरजी, मैंने भी अपना ब्लाउज़ ये निकाला।

देवर- वाउ... भाभीजी, आप तो बहुत ही सुंदर दिख रही हैं। ये काले रंग की ब्रा आपके गोरे बदन पर बहुत ही जंच रही है।

मैं- अरे देवरजी, आपको एक बात पता है?

देवर- क्या भाभीजी?

मैं- कोई भी कपड़ा उसी औरत के ऊपर सुंदर दिखता है। जो औरत बिना कपड़े के सुंदर दिखती है।

देवर- हाँ... भाभीजी, आप बिना कपड़े के तो कयामत ढा देती हैं।

मैं- आपने हमें कब देख लिया बिना कपड़े के?

देवर- भूल गये आप? रोज जब नहाती हैं तो मैं दरवाजे की झिरी से आपको रोज नहाते हुए देखता था। जब आप अपनी चूचियों के ऊपर, दोनों जांघों के बीच में साबुन लगाकर रगड़-रगड़ के नहाती थी।

मैं- बड़े बदमाश हो आप तो देवरजी। मैं तो आपको एकदम सीधा सादा समझ रही थी। पर आप तो बड़े छुपे रुस्तम निकले।

देवर- और हर रविवार को रात को जब भैया अपना लण्ड आपकी फुद्दी में घुसाते थे तब भी मैं देखा करता था।

मैं- मुझे पता है देवरजी। तभी तो इस रविवार को मैंने खिड़की से पर्दा ही हटवा दिया था ताकी आप हमारी खाट-कबड्डी बड़े ही आराम से देख सको।

ये मेरी तरफ से तोहरी ट्रेनिंग थी देवरजी... ताकी आप बड़े आराम से मेरी देवरानी को चोदन-सुख दे सको।

देवर- पर... खाली थ्यूरी पढ़ाई से क्या होगा भाभीजी? प्रैक्टिकल भी तो होना मांगता है ना?

मैं- अच्छा... प्रैक्टिकल भी चाहिए? चलो ठीक है... तो इतने दिन जो आपने देखा उससे आपने क्या-क्या सीखा है। मैं आपके परीक्षा लेती हूँ। तभी आगे का ट्रेनिंग देंगी।

देवर- जो आज्ञा गुरूवानी... मेरा मतलब है भाभीजी।

दीदी- हाँ तो अब आगे की कहानी भी सुना दो मेरी चम्पारानी कि तुम्हारा देवर चुदाई की ट्रेनिंग में पास हुआ की फेल?

चम्पा- अरे भाभीजी, वो मेरा देवर है... मेरा, याने चम्पारानी का देवर। जिस पर मैंने पिछले दो माह से हर रात मेहनत की है। जिसे मैंने बाथरूम से अपने शरीर के हर अंग को बारीकी से दिखाया है। रविवार की रात को मेरे पति के संग संभोग, और चूत चुसाई का आँखों देखा हाल दिखाया है। वो भला फेल कैसे हो सकता है? उसे तो पास होना ही था और हर हाल में पास होना था।

अब हम दोनों एक-दूसरे को नंगा करने पर तुले हुए थे। देवर ने अपनी कमीज और मैंने अपनी ब्लाउज़ को अपने बदन से आजाद कर दिया था।

देवर- तो भाभी, अब बरी है मेरी बनियान की।

मैं (चम्पारानी)- आप अगर बनियान उतरोगे तो हम भी अपनी चोली उतार फेकेंगे। देवरजी, हम भी अपने वायदे के पक्के हैं।

और अगले ही पल... मेरा गोरा बदन ऊपर से पूरा का पूरा वस्त्रविहीन हो चुका था। और मेरा प्यारा सा देवर आँखें फाड़-फाड़कर मेरे दोनों कबूतरों को देख रहा था।
 
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